ये गाय 50 से 55 लीटर तक देती हैं दूध, यहां से ले सकते हैं इस नस्ल का सीमन

हरियाणा के लाला लाजपत राय पशु-चिकित्सा एंव पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (लुवास) के वैज्ञानिकों ने तीन नस्लों के मेल से तैयार की गाय की नई प्रजाति ‘हरधेनु’ को रिलीज कर दिया है। इस समय इस नस्ल की लगभग 250 गाय फार्म में हैं। जहां से इस नस्ल के सांड का सीमन ले सकते है।

उत्तरी-अमेरीकी (होल्स्टीन फ्रीजन), देसी हरियाणा और साहीवाल नस्ल की क्रॅास ब्रीड गाय हरधेनु लगभग 50 से 55 लीटर तक दूध देने की क्षमता रखती है। हरधेनू प्रजाति के अंदर 62.5 प्रतिशत खून उत्तरी-अमेरिका नस्ल और 37.5 प्रतिशत खून हरियाणा और साहीवाल का है।

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लुवास विश्वविद्यालय के पशु आनुवांशिकी एवं प्रजनन विभागाध्यक्ष और इस शोध के वैज्ञानिक डॉ. बी.एल.पांडर ने बताते हैं, ”हरधेनु गाय स्थानीय नस्ल की अपेक्षा हर मामले में बेहतर गाय है और इससे पशुपालकों को काफी लाभ मिलेगा क्योंकि यह जल्दी बढ़ने वाली नस्ल है।” अन्य नस्लों की तुलना करते हुए डा. पांडर बताते हैं,”स्थानीय नस्ल औसतन लगभग 5-6 लीटर दूध रोजाना देती है, जबकि हरधेनु गाय औसतन लगभग 15-16 लीटर दूध प्रतिदिन देती है।”

1970 में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। उस समय केंद्र सरकार की ओर से गाय की नस्ल सुधार के लिए ‘इवेलेशन ऑफ न्यू ब्रीड थ्रू क्रॉस ब्रीडिंग एंड सिलेक्शन’ को लेकर प्रोजेक्ट शुरु हुआ। 2010 में वेटनरी कॉलेज को अलग कर लुवास विश्वविद्यालय बनाया गया।

इस गाय की खुराक की जानकारी देते हुए पांडर बताते हैं,”एक दिन में लगभग 40-50 किलो हरा चारा और 4-5 किलो सूखा चारा खाती है।”

हरधेनु गाय के गुण

  • 20 महीने में प्रजनन के लिए विकसित हो जाती है जबकि स्थानीय नस्ल इसके लिए 36 महीने का समय लेती है।
  • हरधेनु 30 महीने की उम्र में ही बछड़े देना शुरू कर देती है, जबकि स्थानीय नस्ल 45 महीने में बछड़े देती है।
  • दूध देने की क्षमता और उसमें फैट की मात्रा भी अधिक है।
  • किसी भी तापमान में जीवित रह सकती है।

अगर आप इस गाय के नस्ल के सीमन को लेना चाहते है तो लाला लाजपत राय पशु विश्वविद्यालय में भी संपर्क कर सकते हैं–

  • 0166- 2256101
  • 0166- 2256065

15 मिनट में 1 ट्राली भूसा भर देती है ये भूसा भरने वाली मशीन ,यहाँ से खरीदें

तमाम फसलों में कटाई व मड़ाई करने के बाद निकले भूसे को भरने में बहुत समय लगता है और तकलीफ भी बहुत होती है. हाथ से भरने और ज्यादा समय लगने के कारण लागत भी बढ़ जाती है. कई बार तो समय पर भूसा न भर पाने के कारण खेत पर ही काफी भूसा हवाओं द्वारा उड़ा दिया जाता है या फिर बरसात की चपेट में आने के कारण बुरी तरह से भीग जाता है.

मगर अब चिंता करने की बात नहीं है, क्योंकि भूसा भरने वाली खास मशीन बाजार में आ चुकी है. इसे मध्य प्रदेश की एक निजी कंपनी ने ईजाद किया है. यह मशीन स्ट्रा ब्लोअर के नाम से बाजार में आ गई है.

स्ट्रा ब्लोअर से संबंधित जानकारियां इस तरह हैं :

  •  यह मशीन पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है. ट्रैक्टर चालित इस मशीन को किसी भी कंपनी के ट्रैक्टर के सहारे आसानी से चलाया जा सकता है. इस का आकार देखने में तोपनुमा होता है.
  • भूसा भरने और निकालने के लिए इस मशीन में 6-6 इंच लंबाई के 2 पाइप लगाए जाते हैं, जिन्हें सुविधा और जरूरत के मुताबिक घटायाबढ़ाया जा सकता है.
  • भूसा भरने वाले पाइप को सक्सन पाइप और भूसा बाहर निकालने वाले पाइप को डिलीवरी पाइप कहा जाता है.

  • इस मशीन से 15 मिनट में 1 ट्राली भूसा भरा जा सकता है.
  • इस के जरीए 20 फुट ऊंचाई तक भूसा भर सकते हैं.
  • अगर भूसा गीला हो तो भी इस मशीन से भूसा भरने में कोई परेशानी नहीं होती है.
  • कंपनी सीधे बिक्री का काम करती है, जिस से देश भर में कहीं इस के डीलर नहीं हैं. इस की बुकिंग कर के इसे हासिल कर सकते हैं.
  • सीधे बिक्री के पीछे कंपनी का मानना है कि इस से किसानों को सस्ती दर पर मशीनें मिल जाती हैं.

ज्यादा जानकारी के लिए कंपनी के प्रबंध संचालक भगवान दास विश्वकर्मा के मोबाइल नंबर 09425483416 पर संपर्क किया जा सकता है.

कंपनी का पूरा पता इस प्रकार है :

भारत कृषि यंत्र उद्योग, उदय नगर कालोनी, सागर रोड, विदिशा (मध्य प्रदेश)

फोन नंबर : 07592-250216, 09826294216

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इस विधि से खेती की तो बढ़ सकती है आय

खेती से मुनाफा कमाना धीरे-धीरे मुश्किल होता जा रहा है। सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने की बात कर रही है। लेकिन सरकार ये मंशा बिना किसानों के प्रयास से नहीं हो सकती है। ऐसे में जब खेती-किसानी से किसानों के हाथ सिवाय निराशा के कुछ नहीं लग रहा तो खेती की ये विधि अन्नदाता के लिए लाभकारी साबित हो सकती है।

यहां हम बात कर रहे हैं एकीकृत खेती की। एकीकृत का सीधा सा मतलब है कि खेती के साथ कृषि से जुड़ी सह गतिविधियों को भी जोड़ देना। किसान अगर ऐसा कर पाते हैं तो खेती को आर्थिक रूप से सफल तो बनाया ही जा सकता है, किसानों की आय बढ़ने की संभावना भी प्रबल हो जाती है।

एकीकृत के जरिए ऐसा किया जा सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के कई शोध संस्थान और राज्यों के कृषि विश्वविद्यालय भी इस दिशा में काम कर रहे हैं। वे एकीकृत कृषि पर काम कर रहै हैं और अपने-अपने क्षेत्र की जरूरत के हिसाब से एकीकृत उद्योग को ढालने के तरीके तलाश रहे हैं। पिछले दिनों आईसीएआर शोध परिसर ने कुछ विश्वसनीय और व्यावहारिक परीक्षण किया। ये परीक्षण छोटे और सीमांत किसानों के लिए किया गया।

बिहार में 75 फीसदी से भी ज्यादा किसानों के पास आधा हेक्टेयर से भी कम जमीन है। सबसे खराब बात है कि छोटी जमीन के ये टुकड़े भी एक जगह नहीं होकर दूर दूर होते हैं और एक उद्यम आधारित कृषि के लिए ये जरा भी उपयुक्त नहीं हैं। बिहार में 75 फीसदी से भी ज्यादा किसानों के पास आधा हेक्टेयर से भी कम जमीन है। सबसे खराब बात है कि छोटी जमीन के ये टुकड़े भी एक जगह नहीं होकर दूर-दूर होते हैं और एक उद्यम आधारित कृषि के लिए ये जरा भी उपयुक्त नहीं हैं।

आईसीएआर, पटना सेंटर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ संजीव कुमार कहते हैं “जिस उद्यम मिश्रण को हासिल किया है वह एक हेक्टेयर से कम भूमि वाले किसानों के लिए बिल्कुल उपयुक्त और काफी आकर्षक है। सेंटर द्वारा खोजे गए तरीके के तहत एक हेक्टेयर से कम भूमि वाले किसान मुर्गीपालन और बकरी पालन करने के साथ ही फसल (अनाज, सब्जियां, फल और चारा) उगा सकते हैं।

इस संयोजन में मशरूम उत्पादन को भी शामिल किया जा सकता है क्योंकि इसमें बहुत ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं पड़ती है। ये सभी गतिविधियां आसानी से एक साथ जाती हैं और किसानों की पारिवारिक जरूरतों को पूरा करने में मदद करने के साथ ही बिक्री के लिए भी पर्याप्त फसल के उत्पादन में मदद कर सकती हैं।

शोध केंद्र के अनुमान के अनुसार उद्यमों के इस संयोजन से एक हेक्टेयर भूमि का मालिक भी सालाना 1.42 लाख रुपये की आमदनी कर सकता है जबकि उसे लागत पर महज 24,250 रुपये ही खर्च करने होंगे। दो हेक्टेयर जमीन वाले किसानों के लिए विशेषज्ञ दलहन, सब्जियों और फलों की खेती के साथ मछलियां और बतख पालने का सुझाव देते हैं। इस तरह की एकीकृत खेती से सालाना करीब 2 लाख रुपये की आय होने का अनुमान है।

इन दोनों ही मामलों में आधे खेत में फसल चावल व गेहूं जैसे अनाज और सब्जियां मसलन पत्ता गोभी, मटर और फूलगोभी उगाने का सुझाव दिया जाता है। खेत या तालाब की मेढ़ का इस्तेमाल केले, नींबू और अमरूद जैसे फलों के पेड़ लगाने के लिए किया जा सकता है। बेल पर लगने वाली सब्जियां मसलन खीरे, ककड़ी भी मेढ़ या खेत के चारों ओर लगाई गई बाड़ पर भी उगाई जा सकती हैं। बकरी या गाय जैसे पशुओं को रखने के लिए अलग से छप्पर डालकर ठिकाना बनाया जा सकता है।

खेती की करीब 20 फीसदी जमीन पर खोदे गए तालाब का उपयोग बतख पालने या फिर ऐसी मछलियों की प्रजाति का पालन किया जा सकता है, जो एक साथ रह सकती हों यानी वे अपना भोजन जल की अलग अलग परत से ग्रहण करती हों। उदाहरण के लिए कैटला जल की सतह से भोजन लेती है, रोहू थोड़ा नीचे रहकर भोजन लेना पसंद करती है जबकि मृगाल तल पर भोजन लेती है। बतखों की बीट मछली तालाब के लिए अच्छे खाद का काम करती है।

एकीकृत खेती के सभी उद्यमों के लिए केंचुओं की खेती की सलाह दी जाती है। दरअसल ये केंचुएं जैविक कचरे को खाद बनाने में मदद करते हैं। पौधों के लिए जरूरी माइक्रोन्यूट्रिएंट्स में समृद्घ होने के अलावा वानस्पतिक खाद में इन जीवित केंचुओं की मौजूदगी मिट्टी का भौतिक ढांचा बेहतर बनाने के साथ ही इसकी उर्वरता में भी बढ़ोतरी करती है।

एक साथ किए जा सकने वाले कृषि कार्यों की कोई कमी नहीं है। इनमें पशुपालन, बागवानी, हर्बल खेती, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, रेशम उत्पादन, मत्स्य पालन और कृषि-वानिकी जैसे काम शामिल हैं। किसान मिश्रित खेती से अपरिचित नहीं हैं। करीब 80 फीसदी किसान नियमित तौर पर खेती के साथ मवेशी भी रखते हैं जिनमें गाय एवं भैंसों की बहुतायत होती है।

मवेशी पालने से किसानों का कृषि से संबंधित जोखिम तो कम होता ही है, उसके अलावा उनकी आय और पोषण स्तर में भी बढ़ोतरी होती है। कई किसान बकरियां, भेड़ें या मुर्गियां भी रखते हैं। लेकिन अधिकांश खेतों में जिस तरह की मिश्रित खेती की जाती है वह एकीकृत खेती की श्रेणी में आने के लायक नहीं है। दरअसल मिश्रित खेती में विभिन्न सहयोगी गतिविधियों को इस तरह से समाहित किया जाता है कि वे संबंधित क्षेत्रों के लिए लाभदायक साबित हो सकें।

 

23 फरवरी के लिए मौसम विभाग की चेतावनी

भारतीय मौसम विभाग ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब समेत पूरे उत्तर भारत के लिए चेतावनी जारी की है। इसके अलावा मध्य प्रदेश, मध्य महाराष्ट्र, विदर्भ और मराठवाड़ा के लिए भी चेतावनी जारी की गई है।

मौसम विभाग ने उत्तर भारत के पहाड़ी राज्यों में बर्फबारी और ओले गिरने की आशंका जताई है साथ में मैदीनी राज्यों में आंधी तूफ़ान के साथ ओले गिरने की चेतावनी जारी की है।

ज्ञात हो की फिलहाल पंजाब, हरयाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश में मुख्यतः सरसों और गेहूं की फसलों की कटाई जोरों पर है, जबकि महाराष्ट्र में चने के अलावा अन्य रबी दलहनों के साथ-साथ अनाज की कटाई हो रहा है और ऐसे में यदि ओला वृष्टि होती है तो फसलों को नुकसान होने के साथ-साथ कटाई में भी देरी हो सकती है।

23 फरवरी के लिए मौसम विभाग की चेतावनी

मौसम विभाग के मुताबिक 23 फरवरी के दिन पश्चिम मध्य प्रदेश और उत्तर मध्य महाराष्ट्र में कुछेक जगहों पर आंधी तूफ़ान के साथ ओले गिरने की चेतावनी दी है।

24-25 फरवरी को इन राज्यों पर दिखेगा ज्यादा असर

24 फरवरी के दिन जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पहाड़ी क्षेत्रों में कुछेक जगहों पर बर्फबारी की चेतावनी है। इसके अलावा पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम मध्य प्रदेश, मराठवाड़ा में कुछेक जगहों पर गरज के साथ ओले गिर सकते हैं।

सरकार ने जारी की नई “ई-नाम” ऐप,ऐसे करेगी किसानो की मदद

कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने किसानों के उत्पादों को बेहतर बाजार मूल्य दिलाने के लिए 6 नए फीचर से युक्त राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) मोबाइल ऐप को बुधवार को यहां जारी किया।

सिंह ने कहा कि इस ऐप को इस प्रकार से तैयार किया गया है जिससे किसान घर बैठे अपने उत्पाद के बाजार मूल्य की नवीनतम जानकारी प्राप्त कर सकेंगे तथा बाजार में पंजीयन भी करा सकेंगे।

उन्होंने कहा कि ई-नाम वैबसाइट हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, तमिल, तेलुगु, बंगला और उडिय़ा भाषा में उपलब्ध है तथा इसमें अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को भी जोड़ा जाएगा।

ई-नाम पोर्टल में एम.आई.एस. डैशबोर्ड, व्यापारियों को भीम ऐप द्वारा भुगतान की सुविधा, मोबाइल भुगतान की सुविधा आदि को शामिल किया गया है ।

खेती से जुड़े बिजनेस से करें कमाई, सरकार दे रही है 8000 रुपए में ट्रेनिंग

आप अगर नया बिजनेस शुरू करने की सोच रहे हैं या आपको लगता है कि एग्री प्रोडक्‍ट्स का बिजनेस करना फायदे का सौदा साबित हो सकता है, लेकिन आपको इस बिजनेस के बारे में कोई जानकारी नहीं है तो आपके पास अच्‍छा मौका है कि आप एग्री बिजनेस पर हो रहे एंटरप्रेन्‍योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम में हिस्‍सा ले सकें।

सरकार के मिनिस्‍ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट के अधीन नेशनल इंस्टिट्यूट फॉर एंटरप्रेन्‍योरशिप एंड स्‍मॉल बिजनेस डेवलपमेंट (निसबड) द्वारा खेती से जुड़े अलग- अलग तरह के बिजनेस के बारे में ट्रेनिंग ले सकें। आप को इस ट्रेनिंग प्रोग्राम के दौरान एग्री बिजनेस से जुड़ी छोटी से छोटी जानकारी दी जाएगी।

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आज हम अपको बताएंगे कि निसबड किस-किस तरह की ट्रेनिंग देगा और आप कैसे इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल हो सकते हैं।

कैसे करें ऑर्गेनिक फार्मिंग

निसबड द्वारा ऑर्गेनिक फार्मिंग के बारे में पूरी जानकारी दी जाएगी, जैसे कि क्‍या है ऑर्गेनिक फार्मिंग, इसके फायदे क्‍या हैं, ऑर्गेनिक फार्मिंग की मार्केट क्‍या है, किस तरह की टैक्‍नोलॉजी का इस्‍तेमाल होता है, न्‍यूट्रेशन मैनेजमेंट क्‍या है, आर्गेनिक फार्मिंग की मैथोलॉजी, क्‍वालिटी अश्‍योरेंस, नेशनल प्रोग्राम ऑन ऑर्गेनिक प्रोडक्‍शन, ऑनलाइन सेल्‍स मॉडल, इको टूरिज्‍म, सरकार की स्‍कीम और सपोर्ट सिस्‍टम, भारत सरकार का असिस्‍टेंस प्रोग्राम आदि की जानकारी दी जाएगी।

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कैसे करें डेयरी बिजनेस

इसी दौरान आपको डेयरी बिजनेस के बारे में भी ट्रेनिंग दी जाएगी। इसमें डेयरी लगाने से लेकर चलाने तक की पूरी गाइडेंस दी जाएगी। साथ ही, आपको सरकार के सपोर्ट सिस्‍टम और स्‍कीम के साथ साथ लोन स्‍कीम की भी जानकारी दी जाएगी। डेयरी बिजनेस में सफल स्‍टार्ट-अप्‍स के बारे में भी केस स्‍टडी के बारे में निसबड द्वारा बताया जाएगा।

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कैसे करें फूड प्रोसेसिंग बिजनेस

निसबड के इस एंटरप्रेन्‍योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम के दौरान आपको फूड प्रोसेसिंग बिजनेस के अलग-अलग मॉडल के बारे में भी बताया जाएगा। जैसे कि – फूड प्रोसेसिंग के एवेन्‍यू, छोटा फूड प्रोसेसिंग प्‍लांट कैसे लगाएं, फूड प्रोसेसिंग ब्रांड कैसे क्रिएट किया जाए, सरकार की सपोर्ट स्‍कीम, सक्‍सेसफुल स्‍टार्ट अप्‍स की केस स्‍टडी के बारे में जानकारी दी जाएगी।

कैसे खोलें कोल्‍ड स्‍टोरेज चेन

इसके अलावा आपको कोल्‍ड स्‍टोरेज चेन खोलने के फायदे, तरीके और सरकारी स्‍कीम के बारे में भी ट्रेनिंग दी जाएगी। यहां यह उल्‍लेखनीय है कि देश में कोल्‍ड स्‍टोरेज चेन की सख्‍त जरूरत है और सरकार भी प्रमोट कर रही है। आप कोल्‍ड स्‍टोरेज चेन शुरू करने के बारे में सोच सकते हैं।

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इन बिजनेस के भी लें सकेंगे ट्रेनिंग

  • ग्रीन हाउस
  • अरोमेटिक ऑयल
  • फ्लोरीकल्‍चर
  • फ्रूट कल्‍टीवेशन
  • पॉल्‍यूटरी एंड फिशरी

कैसे करें अप्‍लाई

यह दो दिन का ट्रेनिंग प्रोग्राम है। जो 24 व 25 फरवरी को निसबड के नोएडा सेक्‍टर 62 स्थित सेंटर में होगा। इस प्रोग्राम की फीस 8000 रुपए है। अगर आप हिस्‍सा लेना चाहते हैं तो इस लिंक पर क्लिक करके रजिस्‍ट्रेशन फॉर्म डाउनलोड कर सकते हैं।
http://niesbud.nic.in/docs/edp-on-agriculture-business-24-feb-to-25-feb-2018.pdf

300 रुपए लीटर बिक रहा इस पशु का दूध, दो महीने तक नहीं होता खराब

जिले के सादड़ी में 23 साल पहले देश की पहली कैमल मिल्क डेयरी की शुरुआत करने वाले लोकहित पशुपालक संस्था व केमल करिश्मा सादड़ी के निदेशक हनुवंत सिंह राठौड़ ने बताया कि सादड़ी और सावा की ढाणी के ऊंटों के दूध पर लंबे समय से शोध चल रहा है। खेजड़ी, बैर खाने से उनके शरीर में हाई प्रोटीन बनता है। इसके दूध में इंसुलिन और लो फेट है, इसलिए डायबिटीज और मंदबुद्धि बच्चों के इलाज के लिए बेहतर माना जा रहा है।

  •  सिंगापुर को ऊंटनी का दूध एक्सपोर्ट करने की तैयारी की जा रही है। जो 300 रुपए प्रति लीटर में बेचा जा रहा है। यह दूध दो महीने तक खराब नहीं होता।
  • राठौड़ ने बताया कि चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, सिरोही में 5-6 हजार लीटर दूध प्रतिदिन संग्रहित हो सकता है।
  • जिले में सावा की ढाणी की ऊंटनी का दूध विमंदित व कमजोर बच्चों के साथ गंभीर बीमारियों के उपचार में काम आ सकता है। इस संभावना से इजरायल के बाद अब जर्मनी में भी शोध शुरू हो गया है। नतीजा और सार्थक रहा तो मेवाड़ी ऊंटों के दूध की डिमांड पूरी दुनिया में बढ़ सकती है।
  • इसका खुलासा रविवार को यहां जिलास्तरीय पशु मेला व प्रदर्शनी में आए सावा की ढाणी के ऊंट पालक मुखिया देवीलाल रायका ने किया।

टाइफाइड में भी फायदेमंद

  •  उन्होंने बताया कि यह दूध बरसों से चाय के साथ बीमारियां में भी उपयोग लिया जा रहा है। शुगर, टीबी, दमा, सांस लेने में दिक्कत व हड्डियों को जोड़ने सहित टाइफाइड में भी फायदेमंद माना जाता है।
  •  27 साल से राजस्थान के ऊंटों पर शोध कर रही जर्मनी की डॉ. इल्से कोल्हर रोलेप्शन ने एक माह पूर्व सावा की ढाणी में इस दूध के सैंपल लेकर विदेश में भेजे। जर्मनी, सिंगापुर में शोध चल रहा है।

इजरायल की टीम भी सैंपल ले गई

  • छह माह पहले इजरायल की टीम भी सैंपल ले गई। जिनके अनुसार दिमागी रूप से कमजोर व 17 साल से कम उम्र के बच्चों का कद बढ़ाने में यह फायदेमंद साबित हो सकता है।
  •  पशुपालन विभाग के उपनिदेशक डॉ. ताराचंद मेहरड़ा ने बताया कि जिले में पशुगणना के अनुसार ऊंट की संख्या 2166 है। जबकि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है।
  • देवीलाल रायका , गोविंदसिंह रेबारी ने कहा कि ऊंट खरीदने, बेचने पर प्रतिबंध है। मादा के लिए तो प्रतिबंध ठीक है, लेकिन नर ऊंट पर प्रतिबंध हटना चाहिए। सब्सिडी भी कम है। जंगलों या चारागाह भूमि पर भी इसे चरने नहीं दिया जाता है। ऊंटनी की संख्या कमी हो रही है।

ऊंटनी के दूध में कई विशेषताएं होती हैं। बच्चों के शारीरिक विकास में भी यह उपयोगी है। इस पर शोध हो चुका है। छह माह पूर्व इजरायल की टीम ने भी यहां ऊंटनी के दूध के लिए सैंपल लिए थे। जिले में भदेसर, बेगूं और गंगरार क्षेत्र में ऊंटपालन होता

सबसे ज्यादा ऊंटनी चित्तौड़गढ़ में

ऊंट पालक देवीलाल रायका , गोविंद सिंह रायका , अमरचंद, जगदीश, आदि ने कहा कि सरकार ने जयपुर में केमल दूध मिनी प्लांट लगाया है। जबकि चित्तौड़ जिले से एक हजार लीटर दूध प्रतिदिन संग्रहित हो सकता है। प्लांट यहीं लगना चाहिए था। राज्य में सबसे ज्यादा ऊंटनी चित्तौडग़ढ़, भीलवाड़ा में हैं।

मंडी में फसल बेचकर किसान को मिल सकता है ट्रैक्टर और पावर टिलर ,ये है पूरी स्कीम

अक्सर छोटे किसान अपनी उपज को सीधे मंडी में न लाकर गाँव में ही व्यापारियों को सस्ते में बेच देते हैं। गाँव में व्यापारी किसान की उपज की तौल में गड़बड़ी करके और दूसरे तरीकों से किसानों को उनके माल का पूरा पैसा नहीं देते हैं।

किसानों को अपनी उपज को खुद मंडी तक लाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए मंडी परिषद किसानों को ट्रैक्टर, पावर टिलर और साइकिल उपहार के तौर पर दे रहा है।

किसानों खुद मंडी आकर वहां पर अपने सामान का सही दाम व उपज की सही तौल पाने के अलावा मंडी व्यापार का गणित खुद समझें इसके लिए मंडी परिषद , उत्तर प्रदेश ने मंडी आवक किसान उपहार योजना शुरू की है। इस योजना नें किसान अपनी उपज मंडी में बेचकर मंडी कार्यालय की मदद से किमती उपहार जीत सकते हैं।

मंडी आवक किसान उपहार योजना के बारे में नवीन गल्ला मंडी लखनऊ के सचिव डी के वर्मा बताते हैं, ” मंडी में किसान अपनी अपज को व्यापारी को बेचता है, तो व्यापारी उसे एक खरीद पर्ची यानी कि 6R स्लिप देता है।

किसान इस पर्ची को मंडी समिति कार्यालय पर दिखा कर निशुल्क लकी ड्रॉ का कूपन ले सकता है। अगर ड्रॉ में किसान का कूपन चुना जाता है, तो उसे साइकिल, प्रेशर कुकर, पंपिंग सेट, स्प्रेयर ,पंखा जैसे इनाम मिल सकते हैं।

” वो आगे बताते हैं कि हर छठे महीने में मंडी में होने वाले बंपर ड्रॉ में कूपन शामिल होने पर किसानों को पावर टिलर , हार्वेस्टर और 35 हार्स पावर का ट्रैक्टर दिया जाता है।

मंडी में किसान की लाई गई उपज के बिक जाने पर उसे 6R स्लिप मिलती है, जिसमें उसकी बेची गई उपज की कीमत लिखी रहती है। 6R स्लिप पर लिखे हुए रेट के हिसाब से हर 5,000 रुपए की बिक्री होने पर किसान मंडी समिति के कार्यालय पर जाकर एक कूपन ले सकते हैं।

इस कूपन को हर महीने , तीन महीने और छठे महीने पर होने वाले लकी ड्रॉ में शामिल किया जाता है, कूपन चुने जाने पर मंडी की तरफ से किसानों को उपहार दिए जाते हैं। यह लकी ड्रॉ मंडलायुक्त द्वारा निकाला जाता है।

”मंडियों में किसानों को लाने के लिए कृषि में दुर्घटना सहायता, खलिहान आग दुर्घटना सहायता योजना और मंडी आवक किसान उपहार योजना चलाई जा रही हैं और किसान भी इन योजना का फायदा उठा रहे हैं। हाल ही में हुए ड्रॉ में हमने किसान किसानों को साइकिलें और दूसरे उपहार दिए हैं।” मंडी सचिव डी के वर्मा ने बताया।

मंडियों में किसानों के लिए होने वाले लकी ड्रॉ में मिलने वाले उपहार

  • हर महीने होने वाला लकी ड्रॉ-इनाम ( मोबाइल – 10 ,साइकिल -10 , प्रेशर कुकर – 10)
  • हर तीसरे महीने होने वाले लकी ड्रॉ-इनाम (पंपिंग सेट -एक , स्प्रेयर – दो , पंखा – तीन)
  • हर छठे महीने वाले लकी ड्रॉ – इनाम ( ट्रैक्टर – एक, पावर टिलर – दो , थ्रेशर – तीन)

सिर्फ 2 घंटे खेत में काम करके ये किसान हर महीने कमाता है 15 से 20 हजार रुपए

फतेहपुर जिले के किसान अमित पटेल पिछले 13 वर्षों से हरी धनिया की खेती कर रहे हैं। वह दिन में सिर्फ दो घंटे की मेहनत करके हरी धनिया बेचकर हर महीने 15 से 20 हजार रुपये आसानी से कमा रहे हैं।

अमित की माने तो सालाना डेढ़ बीघे खेत से धनिया की खेती कर दो लाख रुपये कमा रहे हैं। 12 महीने धनिया की फसल उगाने वाले अमित पटेल (28 वर्ष) उत्तर प्रदेश में फतेहपुर जिले से 26 किलोमीटर दूर मलवां ब्लॉक के रहने वाले हैं।

अमित पटेल बताते हैं, “हमारे यहाँ बंदर बहुत ज्यादा हैं। कोई भी फसल करो तो ये बहुत नुकसान करते हैं, इसलिए मैंने सोंचा क्यों न धनिया की फसल की जाये। तब धनिया की खेती शुरू की और पिछले 13 वर्षों से धनिया की खेती कर रहा हूं और अच्छा मुनाफा मिल रहा है।

“ वो आगे बताते हैं, “सुबह शाम मिलाकर दो घंटे ही खेत पर निराई करने जाता हूँ। बाजार से हर दिन भाव के हिसाब से 800 से लेकर 2000 रुपये तक कमा लेता हूं।

अमित पटेल बताते हैं, “एक बीघा में 40 क्यारी बनाते हैं, इसके बाद बुवाई कर देते हैं। ऐसे में 40 दिन में धनिया बेचने के लिए तैयार हो जाती है।“ वहीं, बाराबंकी के बेलहरा गाँव के किसान रामकुमार (45 वर्ष)बताते हैं,

“हरी धनिया की फसल के लिए दोमट मिट्टी उत्तम है। धनिया की फसल में इस बात का ध्यान रखना है कि खेत में पानी न रुकता हो। जबसे हरी धनिया की खेती की है तबसे हर दिन 800-1200 रुपये तक की बिक्री हो जाती है।

धनिया की बुवाई और देखरेख का तरीका

एक बीघे में 10 किलो धनिया का बीज लगता है। धनिया बारह महीने चलती है इसलिए किसी भी महीने इसकी बुवाई कर सकते हैं। बुवाई के दसवें दिन पहला पानी और जैविक खाद डालते है, दूसरा पानी 20 दिन के आस-पास लगाते हैं।

दूसरे पानी के दौरान ही 35 से 40 किलो डीएपी डालते हैं। अगर तापमान डाउन है तो 25 दिन के अन्दर 250-300 ग्राम यूरिया का स्प्रे कर देते हैं। एक टंकी में 16 लीटर पानी में 100 ग्राम यूरिया डालते हैं बीघे भर में तीन टंकी का छिड़काव करते हैं।

जब गर्मी ज्यादा पड़ती है तो हफ्ते में दो बार पानी लगाना पड़ता हैं। इस बारे में किसान अमित पटेल बताते हैं कि जिस दिन भी धनिया बोयें उसके 40वें दिन वो तैयार मिलेगी। इसके बाद फिर उसी क्यारी में धनिया बो दें। धनिया बोते समयांतराल का विशेष ध्यान रखें।

खेतीबाड़ी से खड़ा किया करोड़ों का कारोबार, कभी 45 हजार का करता था जॉब

एक ओर जहां आए दिन किसानों की खुदकुशी की खबरें सुनने को मिलती हैं। वहीं दूसरी ओर नौकरी छोड़ खेतीबाड़ी से जुड़ने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। असम के रहने वाले समीर रंजन बोरडोलोई भी इनमें से एक हैं जिन्होंने अपनी नौकरी छोड़ खेतीबाड़ी को न सिर्फ अपना करियर बनाया बल्कि करोड़ों का कारोबार भी खड़ा कर दिया। आइए जानते हैं समीर ने कैसे ये मुकाम हासिल किया।

समीर ने बताया किया कि एग्रीकल्चर में ग्रैजुएशन करने के बाद वो टाटा केमिकल्स के एग्रोकेमिकल डिविजन में नौकरी करने लगे। असम के जोरहट जिले में उनकी पोस्टिंग हुई। यहां उन्होंने देखा कि अधिकांश किसान टी क्रॉप पर निर्भर हैं। वो अच्छी उपज के लिए केमिकल्स और फर्टीलाइजर्स का बहुत ज्यादा उपयोग कर रहे हैं।

किसानों को केमिकल्स के कॉकटेल से बचाने के लिए उनको आइडिया मिला और 2003 में उनकी फर्स्ट वेंचर एसएस बोटैनिकल्स की शुरुआत हुई। समीर एग्रीप्रेन्योर हैं और उन्होंने एक से ज्यादा बिजनेस में हाथ आजमाया है। उनकी कंपनी का टर्नओवर 3 करोड़ रुपए से ज्यादा है।

समीर कहते हैं कि आइडिया से प्रभावित होकर दो बैंकों ने उनका साथ दिया। एसबीआई से उन्होंने 5 लाख रुपए का लोन लेकर शुरुआत की थी। इसके बाद इंडियन बैंक ने 10 लाख रुपए का लोन दिया। लोन मिलने के बाद उन्होंने एक एग्री क्लीनिक की शुरुआत की। यहां पर वो मिट्टी की जांच के साथ खेती से जुड़े से अन्य मसलों पर किसानों को सुझाव देते हैं।

बच्चों को देते हैं एग्रीप्रेन्योर बनने का मंत्र

इसके अलावा समीर स्कूली स्तर पर बच्चों को खेती के बारे में जानकारी देने के मकसद से फार्म स्कूल भी चलाते हैं। यहां पर बच्चों को खेतीबाड़ी की जानकारी दी जाती है। उनका कहना है कि इसका मकसद युवाओं का गांव से पलायन रोकना है। साथ ही वे खेती कर अपने पैरों पर खड़े हो सकें और अच्छी इनकम अर्जित कर सकें। उनके साथ 2000 से ज्यादा किसान जुड़े हैं।

फार्म टूरिज्म पर शुरू किया है काम

समीर का कहना है कि खेतीबाड़ी में कमाई की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने हाल ही में फार्म टूरिज्म पर काम शुरू किया है। इसके जरिए वो पर्यटकों को गांव के रहन-सहन से रूबरू करवाते हैं। इसके अलावा उन्होंने एक ग्रीन कमांडो का कॉन्सेप्ट तैयार किया है जिसका मकसद युवाओं को खेती के बारे में जानकारी देना है।

मॉडल विलेज किया डेवलप

उन्होंने नॉथ-ईस्ट के कुछ जिलों में मॉडल विलेज की शुरुआत की है। जहां किसान सिर्फ ऑर्गेनिक खेती करते हैं और संसाधनों को बचाने पर जोर देते हैं। इसके अलावा बांस की खेती को बढ़ावा दिया है। बांस से बने सामानों की अच्छी डिमांड है। इससे किसानों की इनकम बढ़ाने में मदद मिलेगी।

ऐसा है बिजनेस मॉड्यूल

समीर ने एक और फर्म की नींव रखी जिसका नाम फार्म2फूड फाउंडेशन है। इसके जरिए वो किसानों और युवाओं को खेती की टेक्निक्स सिखाते हैं। एमडी ऑग्रेनिक्स के अंतर्गत 250 गायें हैं। वहीं वो अपने फर्म से 650 टन वर्मी कम्पोस्ट भी तैयार करते हैं। इनको बेचकर भी पैसे मिल जाते हैं। इसके अलावा वो उन कंपनियों में स्टेक खरीदते हैं जिनका फोकस रूरल होता है।