किसान द्वारा सलेक्शन विधि से तैयार की 3 फीट लंबी काले रंग की देशी गाजर

झीगरबड़ी के प्रगतिशील किसान झाबर मल पचार द्वारा सलेक्शन विधि से तैयार की गई तीन फीट लंबी काले रंग की देशी गाजर की तर्ज पर देशभर में बुआई होगी। किसान द्वारा तैयार किया गया देशी गाजर का बीज राष्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान अहमदाबाद की टीम ने कारगर माना है।

इस विधि की संस्थान द्वारा देशभर के किसानों के उपयोग के लिए सिफारिश की जाएगी। पचार ने प्रयोग सफल होने के बाद इस साल 200 किलो देशी गाजर का बीज तैयार किया। यह बीज शेखावाटी सहित देश के कई हिस्सों के किसानों को बुआई के लिए सप्लाई किया गया।

पचार ने बताया कि काली देशी गाजर की खासियत है कि किसान को सामान्य फसलों से पांच गुना ज्यादा पैदावार मिल रही है। एक कंद 400 से 500 ग्राम वजन तक है। कंद की मोटाई भी सामान्य है। नवप्रवर्तन संस्थान अहमदाबाद की टीम ने किसान के खेत से फसल का जायजा लिया है।

वहीं संस्थान द्वारा अपने स्तर पर पचार द्वारा तैयार गाजर को पूसा प्रदर्शनी में भी प्रदर्शित किया जा चुका है। उद्यान विभाग के क्षेत्रीय उपनिदेशक हरलाल सिंह बिजारणियां का कहना है कि झीगर के किसान झाबर मल पचार द्वारा तैयार किया गया देशी गाजर का बीज एक अनूठा प्रयोग है। यह किस्म देशी गाजर उत्पादन में महत्वपूर्ण साबित हो रही है।

मिठास शक्कर जैसी आती है |बीज की गुणवत्ता मिठास बढ़ाने के लिए किसान ने घी शहद से बीजोपचार किया है। उद्यान विभाग के अनुसार बीजोपचार के बाद खेत में तैयार गाजर के कंद में शक्कर जैसी मिठास रही है। बीज को किसान ने एक किलो बीज को पांच ग्राम घी पांच ग्राम शहद में मिलाकर उपचारित किया। इस विधि से बीज का अंकुरण भी जल्दी होता है।

यूं तैयार किया देशी गाजर का बीज

तीनसाल पहले काली गाजर के ज्यादा लंबाई वाले कंद की छंटनी शुरू कर दी। तीन साल बाद अक्टूबर में किसान ने लंबे बीज वाले कंद से 300 वर्ग फीट क्षेत्र में प्रायोगिक तौर पर गाजर की बुआई की। चार माह में किसान के खेत में तीन फीट लंबी काले रंग की देशी गाजर का कंद तैयार हो गया है।

1 बीघा बीज की खेती से 18 लाख की आय

झाबरमल पचार का कहना है वह देशी गाजर की खेती से सालाना 8 से 10 लाख रुपए कमा रहा है। इस बार उन्होंने एक बीघा में गाजर के बीज की खेती की है। करीब डेढ़ क्विंटल बीज उत्पादन की उम्मीद है। मार्केट भाव 1200 रुपए प्रतिकिलो तय किया है। इससे सीजन में 18 लाख की आमदनी की उम्मीद है।

एग्रीकल्चर युनिवर्सिटी एवं बीज एजेंसियों की प्रदर्शनियों में काबिलियत जानने के बाद बुआई सीजन शुरू होने से पहले ही दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, कोलकाता सहित राजस्थान के कई जिलों से 3 हजार से ज्यादा किसानों ने बीज की एडवांस बुकिंग करा दी है। हालांकि अभी तक बीज सरकारी एजेंसी से प्रमाणित नहीं हुआ है। यह मांग कंद की गुणवत्ता और मिठास को देखते हुए बढ़ी है।

पशु खरीदने जा रहे हैं तो रखें इन बातों का ध्यान ,नहीं तो हो सकते है ठगी का शिकार

ज्यादातर पशुपालक दूसरे राज्यों से महंगी कीमत पर दुधारू पशु तो खरीद लेते हैं। लेकिन बाद में पता चलता है कि दूध का उत्पादन उतना नहीं हो रहा जितना बिचौलिए या व्यापारी ने बताया था और कई बार पशु को कोई गंभीर बीमारी होती है जो कभी ठीक नहीं हो सकती ऐसे में पशुपालकों को आर्थिक नुकसान भी होता है।

ऐसे में आप निचे दी हुई बातों का ध्यान रख कर ठगी से बच सकते है और आपको सही नस्ल का पशु चुनने में भी आसानी होगी

शारीरिक बनावट : अच्छे दुधारू पशु का शरीर आगे से पतला और पीछे से चौड़ा होता है। उस के नथुने खुले हुए और जबड़े मजबूत होते हैं। उस की आंखें उभरी हुई, पूंछ लंबी और त्वचा चिकनी व पतली होती है। छाती का हिस्सा विकसित और पीठ चौड़ी होती है। दुधारू पशु की जांघ पतली और चौरस होती है और गर्दन पतली होती है। उस के चारों थन एकसमान लंबे, मोटे और बराबर दूरी पर होते हैं।

दूध उत्पादन कूवत : बाजार में दुधारू पशु की कीमत उस के दूध देने की कूवत के हिसाब से ही तय होती है, इसलिए उसे खरीदने से पहले 2-3 दिनों तक उसे खुद दुह कर देख लेना चाहिए. दुहते समय दूध की धार सीधी गिरनी चाहिए और दुहने के बाद थनों को सिकुड़ जाना चाहिए।

आयु : आमतौर पर पशुओं की बच्चा पैदा करने की क्षमता 10-12 साल की आयु के बाद खत्म हो जाती है। तीसरा चौथा बच्चा होने तक पशुओं के दूध देने की कूवत चरम पर होती है, जो धीरे धीरे घटती जाती है। दूध का कारोबार करने के लिए 2-3 दांत वाले कम आयु के पशु खरीदना काफी फायदेमंद होता है। पशुओं की उम्र का पता उन के दांतों की बनावट और संख्या को देख कर चल जाता है। 2 साल की उम्र के पशु में ऊपर नीचे मिला कर सामने के 8 स्थायी और 8 अस्थायी दांत होते हैं। 5 साल की उम्र में ऊपर और नीचे मिला कर 16 स्थायी और 16 अस्थायी दांत होते हैं। 6 साल से ऊपर की आयु वाले पशु में 32 स्थायी और 20 अस्थायी दांत होते हैं।

वंशावली : पशुओं की वंशावली का पता लगने से उन की नस्ल और दूध उत्पादन कूवत की सही परख हो सकती है। हमारे देश में पशुओं की वंशावली का रिकार्ड रखने का चलन नहीं है, पर बढि़या डेरी फार्म से पशु खरीदने पर उस की वंशावली का पता चल सकता है।

प्रजनन : सही दुधारू गाय या भैंस वही होती है, जो हर साल 1 बच्चा देती है। इसलिए पशु खरीदते समय उस का प्रजनन रिकार्ड जान लेना जरूरी है। प्रजनन रिकार्ड ठीक नहीं होने, बीमार और कमजोर होने से पाल नहीं खाने, गर्भपात होने, स्वस्थ बच्चा नहीं जनने, प्रसव में दिक्कतें होने जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं।

इस तरीके को अपनाकर आप लौकी की एक बेल से ले सकते है 800 लौकी

आज हम बात करेंगे लौकी के एक ही पौधे से ज्यादा से ज्यादा फल लेने के बारे में। औसतन एक पौधे (बेल) से 50-150 लौकियां निकलती हैं। लेकिन अगर थोड़ी मेहनत और तकनीकी की मदद ली जाए तो एक ही बेल से 800 तक लौकियां ली जा सकती हैं.. यानि आप का मुनाफा की गुना बढ़ जाएगा, जबकि लागत ज्यादा प्रभावित नहीं होगी।

लौकी की खेती करने वाले किसान इस तकनीक से लौकी की ज्यादा फसल उगाकर फायदा उठा सकते हैं। सभी तरह के सजीव में नर और मादा होते हैं। ऐसे ही सब्जियों में भी नर और मादा दो तरह के फूल होते हैं। लेकिन लौकी की बेल में नर फूल ही होते हैं। लौकी में एक विशेष तरह की तकनीकि का इस्तेमाल करने पर ही उसमें मादा फूल आते हैं और लौकी की एक बेल से लौकी का ज्यादा उत्पादन किया जा सकता है। इस तकनीकि का नाम है 3 ‘जी’।

ये है तरीका

लौकी की बेल की एक खासियत है कि उसकी बेल चाहे जितनी भी लंबी हो जाए उसमें नर ही फूल आते हैं। इसको रोकने के लिये एक नर फूल छोड़कर बाकी सारे नर फूल तोड़ दें। उसके कुछ दिनों के बाद उसी बेल में साइड से एक शाखा निकलने लगेगी अब उस शाखा में आने वाले जितने नर फूल हैं उनमें से एक को छोड़कर बाकी के सारे नर फूल तोड़ दें।

अब उस शाखा को किसी लकड़ी से बाध दीजिये ताकि वो चलती रहे। ध्यान रखें तीन से ज्यादा शाखाएं न होने दें। अब कुछ दिन के बाद बेल से तीसरी शाखा निकलने लगेगी। अब इस शाखा के हर पत्ते में मादा फूल आएगा। यही मादा फूल फल में बदल जाएगा। मादा फूल की पहचान के लिये बता दें कि ये कैप्सूल की लंबाई में होगा। इस तरीके को अपना कर लगभग 300 से 400 तक लौकी एक बेल में आएंगी।”

ये तरीका अपना कर कर सकते हैं 800 तक लौकी का उत्पादन

3 जी तकनीकि में कुछ एहतियात के साथ अगर लौकी की खेती करें तो एक बेल से लगभग 800 तक लौकी का भी उत्पादन किया जा सकता है। ये काफी हद तक मौसम पर भी निर्भर करता है। और 3 जी की प्रक्रिया को मचान पर करने से लगभग 800 तक की लौकी का उत्पादन कर सकते हैं। ध्यान रहे कि 20 लौकी के पौधे में ये प्रक्रिया अपनाने के बाद 21 वें पेड़ में कुछ नहीं किया जाएगा। इसके बाद 22 वें पेड़ से फिर से वहीं प्रक्रिया दोहराते रहिये। मान लीजिये कि एक हेक्टेयर में 500 लौकी के पौधे लगाए गए तो 20 पौधों के बाद 21 वें पौधे पर ये प्रक्रिया न अपनाएं उसके बाद 22 वें पेड़ से फिर से वो प्रक्रिया दोहराएं।

अगर चाहते हैं लौकी लगे देखने में अच्छी तो ये तरीका अपनाएं

इसके लिये जब लौकी छोटी हो तो उसे हार्ड पारदर्शी प्लास्टिक से बांध दीजिये। ध्यान रहे कि पॉलिथीन का साइज वही हो जो लौकी का है। मान लीजिये अगर लौकी का साइज दो फीट है तो पॉलिथीन की लंबाई भी दो फीट की होनी चाहिये। यहां पर ये भी ध्यान रखें कि पॉलिथीन दूसरे छोर से फटी होनी चाहिये। ताकि लौकी में वाष्पोत्सर्जन हो सके। इससे लौकी की क्वालिटी अच्छी रहेगी। इस क्रिया को अपनाने से लौकी अन्य लौकियों से ज्यादा आकर्षक लगेगी और किसान को कीमत भी अच्छी मिलेगी।

स्वाद पर असर

इस प्रयोग से अगर आप लौकी की खेती करते हैं तो लौकी के स्वाद में कोई परिवर्तन नहीं होता है। उसका स्वाद प्राकृतिक ही रहता है। वैसे तो लौकी हर मौसम में होती है। लेकिन रबी के मौसम में लौकी की खेती अच्छी होती है।

(3जी तकनीकी का वीडियो नीचे देखिए)

धर्मेंद्र यहां बिताते हैं फुर्सत के पल, ऐसा दिखता है उनका फार्म हाउस

गुजरे जमाने के हीरो धर्मेंद्र 82 साल (8 दिसंबर) के हो गए हैं। कई सुपरहिट फिल्मों में काम करने वाले धर्मेंद्र अभी भी फिल्मों में एक्टिव हैं। उनकी अपकमिंग फिल्म ‘यमला पगला दीवाना 3’ है, जिसकी शूटिंग जारी है। बता दें कि फेसबुक पर ‘धर्मेंद्र-ही मैन’ नाम से पेज है, जिस पर उन्होंने अपनी लाइफ की कई फोटोज शेयर कर रखी हैं।

लोनावला स्थित फार्म हाउस पर उनके फुर्सत के लम्हों की कुछ फोटोज भी इनमें शामिल हैं, जिनमें उन्हें कहीं गाय का दूध दूहते देखा जा सकता है तो कहीं वे अपने पालतू डॉग के साथ खेलते नजर आ रहे हैं। उनकी ये फोटोज आप आगे की स्लाइड्स में देख सकते हैं।

ज्यादातर समय फार्म हाउस पर ही बिताते हैं धर्मेंद्र…

एक इंटरव्यू के दौरान धर्मेंद्र ने कहा था, “मैं जाट हूं और जाट जमीन और अपने खेतों से प्यार करता है। मेरा ज्यादातर समय लोनावाला स्थित अपने फार्म हाउस पर ही बीतता है। हमारा फोकस ऑर्गनिक खेती पर है, हम चावल उगाते हैं। फार्म हाउस पर मेरी कुछ भैंसें भी हैं।

आखिरी बार ‘सेकंड हैंड हसबैंड’ में दिखे थे धर्मेंद्र

  •  धर्मेंद्र ने अपने करियर में ‘शोले’, ‘मां’, ‘चाचा भतीजा’, ‘धरम वीर’, ‘राज तिलक’, ‘सल्तनत’ और ‘यकीन’ जैसी कई पॉपुलर फिल्मों में काम किया।

  •  82 साल के हो चुके धर्मेंद्र को आखिरी बार साल 2015 में ‘सेकंड हैंड हसबैंड’ में देखा गया था, जिससे गोविंदा की बेटी टीना आहूजा ने बॉलीवुड डेब्यू किया था।

ब्याने से पहले पशुओं की देखभाल और खुराक के संबंधी जानकारी जरूरी पढ़े

यह जानकारिया पशु के ब्याने से पहले पता होनी चाहिए

ब्याने से पहले दुधारू पशुओं की देखभाल और खुराक के संबंधी जानकारी होनी बहुत जरूरी है। पशुओं को अपने शरीर को सेहतमंद रखने के अलावा, दूध देने के लिए और अपने पेट में पल रहे कटड़े/ बछड़े की वृद्धि के लिए खुराक की जरूरत होती है।

यदि गाभिन पशु को आवश्यकतानुसार खुराक ना मिले, तो इनकी अगले ब्याने में दूध देने की क्षमता कम हो जाती है और कमज़ोर कटड़े/बछड़े पैदा होते हैं जो कि इन बीमारियों का अधिक शिकार होते हैं।

  • ब्याने से कुछ दिन पहले यदि आप पशु को सरसों का तेल देते हो तो प्रतिदिन 100 ग्राम से अधिक नहीं देना चाहिए।
  •  ब्याने से 4-5 दिन पहले पशुओं को कब्ज नहीं होनी चाहिए। यदि ऐसा हो तो अलसी का दलिया देना चाहिए।

  • यदि पशु खुले स्थान में हों, तो उन्हें ब्याने से 15 दिन पहले बाकी पशुओं से अलग कर दें और साफ सुथरे कीटाणु रहित कमरे में रखें।
  • पशु से अच्छा व्यवहार करना चाहिए और दौड़ाना नहीं चाहिए और ना ही ऊंची नीची जगहों पर जाने देना चाहिए।
  • गर्भावस्था के आखिरी महीने में दुधारू पशुओं के हवानों को हर रोज़ कुछ मिनटों के लिए अपने हाथ से सिरहाना चाहिए ताकि उन्हें इसकी आदत पड़ जाए।

  • इस तरह करने से इनके ब्याने के उपरांत दूध निकालना आसान हो जाता है।
    ब्याने वाले पशु को हर रोज़ दिन में 5-7 बार ध्यान से देखना चाहिए।
  • पशुओं को हर रोज़ धातुओं का चूरा 50-60 ग्राम और 20-30 ग्राम नमक आदि भी देना चाहिए।

1800 रुपये किलो बिकती है काले चावल की यह किसम

मणिपुर में पैदा होने वाले विशेष काले चावल के दाम सुनकर कइयों के होश उड़ जाएंगे। 1800 रुपये प्रति किलो के आसपास के दाम पर बिकने वाले इस विशेष चाक हाओ (सेंटेड काला चावल) में पोषक तत्वों की मात्रा अन्य चावलों से ज्यादा है, इसलिए इसके गुणों को देखकर 1800 रुपये किलो का दाम भी सस्ता लगने लगता है।

राज्य के किसानों को आर्थिक लाभ पहुंचाने और इसमें पाए जाने वाले औषधीय गुणों से अधिकांश लोगों को लाभ प्रदान कराने के मकसद से मणिपुर सरकार का कृषि विभाग इस चावल की ब्रांडिंग में जुटा हुआ है। प्रदेश सरकार का कहना है कि चाक हाओ मणिपुर के संसाधन की आर्थिक थाती बन सकता है। सरकार इस चावल की जोर-शोर से ब्रांडिंग भी कर रही है।

 

मणिपुर में काले धान की पैदावार होती है, जिससे काला चावल निकलता है। मणिपुर सरकार के कृषि विभाग ने इसकी प्रजाति को उन्नत बनाते हुए इसमें औषधीय गुणों और पोषक तत्वों की प्रचुरता वाले काले धान की किस्म ईजाद की है। इससे निकलने वाला चावल सामान्य काले चावलों से ज्यादा गुणी है, इसलिए चाक हाओ की कीमत करीब 1800 रुपए प्रति किलो के आसपास है। अभी इसका व्यवसायिक उत्पादन उतना तेज नहीं हुआ है।

वैसे सामान्य काले चावल की बाजार में कीमत भी 150 से 200 रुपए किलो के आसपास है। मणिपुर कृषि विभाग के अनुसार 2015 के खरीफ सीजन के दौरान 60 से 70 हेक्टेयर खेत पर चाक हाओ की उपज हुई थी। राज्य सरकार ने इसकी खेती का दायरा बढ़ाने का निर्णय लिया है। मिशन ऑर्गेनिक वेल्यू चेन, एनई के तहत वर्ष 2016 के खरीफ सीजन में प्रदेश सरकार ने किसानों को करीब 2000 हेक्टेयर में इसकी पैदावार के लिए प्रेरित किया है। सरकार को उम्मीद है कि इसकी मांग देश-दुनिया के बाजार में तेजी से बढ़ेगी। राज्य के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने कहा कि देश-दुनिया में हमारे चावलों की मांग बढ़ रही है।

चाक हाओ है फायदे का सौदा

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मणिपुर सरकार के कृषि मंत्रालय के जरिए दिए गए आंकड़ों के अनुसार अन्य काले चावलों के मुकाबले चाक हाओ किसान, व्यापारियों से लेकर उपभोक्ता तक के लिए लाभ का सौदा है। इसकी खेती में प्रति हेक्टेयर 60 हजार रुपये की लागत आती है।

इससे करीब 2880 किलो धान का उत्पादन होता है और उस धान से यदि 65 प्रतिशत चावल की रिकवरी मानें तो प्रति हेक्टेयर के धान से 1872 किलो चावल निकलता है। सरकार ने 100 किलो के चावल का बिक्री मूल्य 182720 रुपये निर्धारित किया है। इस हिसाब से देखा जाए तो तो एक  हेक्टेयर से 35 लाख और एक एकड़ से 14 लाख की धान की फसल होगी ।

काले चावल को स्वास्थ्य के लिए सबसे लाभकारी

यूं तो काले चावल को स्वास्थ्य के लिए सबसे लाभकारी माना जाता है। सफेद और भूरे चावल के मुकाबले काले चावल में विटामिन और खनिज तत्वों की प्रचुरता ज्यादा रहती है। एंथोसायनिन पाए जाने की वजह से इस चावल का रंग काला होता है जो कि इसमें एंटी ऑक्सिडेंट को बढ़ाता है। एंटी ऑक्सिडेंट हमारे शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर करने में मदद करता है।

इस विशेष चावल में एंटीऑक्सिडेंट की मात्रा ज्यादा है। इसके अलावा इसमें विटामिन ई, फाइबर और प्रोटीन की प्रचुरता सामान्य काले चावलों से भी ज्यादा है जबकि सामान्य काले चावल में यह तत्व सफेद और भूरे चावल से ज्यादा है।अगर गुणवत्ता की बात करें तो इसके 100 ग्राम में कार्बोहाइड्रेट-34, प्रोटीन-8.7, आयरन-3.5, फाइबर-4.9 और सर्वाधिक एंटी ऑक्सिडेंट मौजूद रहता है।

मणिपुर सरकार ने दावा किया है कि तमाम शोधों के बाद यह प्रमाणित हुआ है कि इस काले चावल के खाने से गंभीर ऐथिरोस्क्लेरोसिस बीमारी, उच्च रक्तचाप, तनाव, उच्च कोलेस्ट्रॉल, आर्थराइटिस, कैंसर और एलर्जी सरीखी बीमारियों से पीड़ितों को बचाव एवं राहत प्रदान करता है।

 

 

 

पाॅली हाउस में यह विदेशी सब्जियां ऊगा कर किसान ले रहा है चोखा मुनाफा

राजस्थान के नाथद्वारा शहर के पास शिशोदा पंचायत के दड़वल में आधुनिक तकनीक से पाॅली हाउस में विदेशी सब्जियां उगाई जा रही है। लाल पत्ता गोभी, लाल-पीली-हरी रंगीन शिमला मिर्च और ब्रोकली जैसी विदेशी सब्जियां कमाई का साधन बनी हुई है। क्षेत्र के युवा पारंपरिक खेती की जगह आधुनिक तकनीक को अपनाते हुए उन्नत खेती में भविष्य संवार रहे है।

दड़वल गांव के दिनेश जोशी ने 2013 में कुल 1016 वर्ग मीटर जमीन पर पाॅली हाउस लगवा विदेशी सब्जियों की खेती शुरू की, जो उनका जीविकोपार्जन है। उन्होंने लाल अौर पीली हरी मिर्च और ब्रोकली से शुरुआत की। पहली बार कुछ समस्या के बावजूद अच्छा मुनाफा हुआ तो उन्होंने खीरा, जुकनी, लाल पत्ता गोभी, सलाद पत्ता, अमेरिकन मक्का सहित सब्जियों को भी उगाना शुरू किया।

ऐसे की शुरुआत

जिला कृषि विभाग के सहयोग से मिट्टी का परीक्षण कर 2013 में कुल 1016 वर्ग मीटर में अत्याधुनिक तकनीक युक्त पाॅली हाउस लगाया गया।अच्छा मुनाफा होने पर 2015 में दूसरा पाॅली हाउस 2016 वर्ग मीटर पर लगवाया।

यह है दाम

ब्रोकली खेत पर 80 तथा बाजार में 200 से 250, लाल पत्ता गोभी 80 से 90 तथा बाजार में 100 से 130 तक मिल रही। शिमला मिर्च जहां किसान 70 में दे रहे वहीं बाजार में 120 से 150 में मिल रही है। सलाद पत्ता 70 में ले कर बाजार में 150 तक बेचा जा रहा है।

दूसरे लोगों को दे रहे है रोजगार

दड़वलके किसान दिनेश और तुलसीराम जोशी ने जहां आधुनिक खेती को अपनाया वहीं गांव के करीब 4 परिवार को भी रोजगार दिया है। पाॅली हाउस पर कटाई छटाई और पैकिंग के लिए जोशी ने कर्मचारी भी रखे है।

क्षेत्र के कई किसान जोशी से आधुनिक खेती के गुर भी सीख रहे है। किसान दिनेश जोशी का कहना है कि मनुष्य को यदि प्रतिदिन एक ही वस्तु खिलाई जाए तो वह भी नहीं खाएगा। फिर जमीन पर एक जैसी खेती क्यों करें, यहीं सोच कर नए प्रयोग किए।

पॉली हाउस में उगाई लाल गोबी।

पाॅली हाउस में पौधा रोपण के 3 माह बाद फसल तैयार होती है। बीज को नर्सरी में तैयार किया जाता है, पौधा उगने के बाद पाॅली हाउस में एक समान दूरी पर पौधे लगाएं जाते है। इसमें मौसम का इंतजार नहीं करना पड़ता है।

पाॅलीहाउस में सुरक्षा

पारंपरिकखेती की जगह पाॅली हाउस में फसल की गुणवत्ता और मात्रा में भी काफी अंतर है। पाॅली हाउस में गर्मी, सर्दी हवा को नियंत्रित किया जाता है। हवा अौर धूप के लिए पाॅली हाउस के पर्दे उठा लिए जाते है, वहीं सर्दी आैर तेज धूप पड़ने पर पौधों को उन्हीं पर्दों से बचाया जाता है।

विदेशी सब्जियों की स्थानीय स्तर पर खपत नहीं होने से बड़े शहरों में भेजा जाता है। मुंबई, बड़ौदा, सूरत, जयपुर, पूना और आगरा के बाजार तक क्षेत्र के किसानों ने पहुंच बनाई है। फाइव स्टार होटलों और पार्टियों में विदेशी सब्जियों की काफी मांग रहती है।

पशुओं के लिये बहुत उपयोगी ये नुस्खे, नहीं पड़ेगी डॉक्टर की जरूरत

फैट बढ़ाने का फार्मूला

पशु चारे के साथ 100 ग्राम कैल्शियम व 100 ग्राम सरसो का तेल तथा चुटकी भर काला नमक डालकर 7 दिन तक खिलाने से दूध में फेट बढ़ जाएगी ।

पशु को दस्त लगने पर

देसी आंकड़े के 10 फूल तोड़ कर एक रोटी में डालकर खिला देने से चार-पांच घंटे में दस्त ठीक हो जाएगा ।

पशु को हीट पर लाने का तरीका

  • 100ग्राम गुड पुराना वाला कम से कम एक साल पुराना हो..
  • 100 ग्राम सरसो का तेल..
  • 100 ग्राम कैल्शियम..

उपरोक्त तीनों चीजों को मिलाकर 18-20 दिन खिला दे जानवर हीट पर आ जाएगा पशुओं को क्रास या बीज डलवाने के बाद गुड व तेल बंद कर दें और कैल्शियम को ढाई सौ ग्राम जौ के दलिया के साथ पिलाएं

पशु की जड़ टूट जाने पर

1 किलो गुड़ वह साथ में 50 ग्राम अजवाइन 40 /50 आम के पत्तों को पांच लीटर पानी में खूब अच्छी तरह उबालो और उस पानी को ठंडा करके 100 ग्राम कैल्शियम डालकर पशु को पिला देने से आधे घंटे में जड़ बाहर फेंक देगा ।

पशु को चेक करने का फार्मूला

पशु ग्याबन है या नहीं जब पशु 40 – 45 दिन का गर्भ धारण किया हो जाए उस पशु का सुबह के टाइम का पहला पेशाब को कांच के गिलास में भरकर उसमें 2 बूंद सरसों के तेल की डाल दो अगर तेल की बूंद पेशाब पर बिखर जाती है तो पशु ग्याबन नहीं होगा और यदि तेल की बूंद पेशाब पर बनी रह जाती है तो पशु ग्याबन होगा ।

गैस अफारा के लिए

एक लीटर खट्टी छाछ में 50 ग्राम हींग व साथ में 20 ग्राम काला डालकर जानवर को पिलाए तथा सूती कपड़े को घासलेट में भिगोकर पशु को 4/5 मिनट तक सुघा देने से 15 /20 मिनट में ही अफारा उतर जाएगा ।

20 रुपए की ये शीशी किसानों को कर सकती है मालामाल, पढ़िए पूरी जानकारी

खेती-किसानी में सबसे ज्यादा पैसा उर्वरक पर खर्चा होता है। डीएपी यूरिया और दूसरे फर्टीलाइजर एक तरफ जहां काफी महंगे होते हैं वहीं इनके लगातार इस्तेमाल से जमीन की उर्वरा शक्ति भी घटती है। पहले की तरह किसान अब खेत में गोबर का कम इस्तेमाल करते हैं और फसलों को अवशेष (पुवाली आदि) खेत में नहीं छोड़ते, जिसके चलते जमीन में कार्बन तत्व घट रहे हैं।

इसकी एक वजह जैविक खरीदे से कंपोस्ट (खाद) बनाने में काफी समय लगता है। उर्वरक मंगाने में सरकार के भी डालर खर्च होते हैं इसलिए वो जैविक खेती और किसान खुद पर खाद बनाएं इसके लिए प्रेरित कर रही है।

भारत सरकार के कृषि विभाग के जैविक कृषि केंद्र ने भी एक वेस्ट डीकंपोजर बनाया है। राष्‍ट्रीय जैवि‍क खेती केंद्र ने इस तरह वेस्ट डीकंपोजर के 40 मिलीलीटर शीशी की कीमत 20 रुपए रखी है। संस्थान का दावा है इससे कुछ ही देर में कई सौ लीटर तरल खाद तैयार ( लिक्‍वि‍ड खाद) तैयार हो जाती है।

इसके अलावा आप इसकी मदद से घरेलू कचरे से कई एकड़ जमीन के लि‍ए बेहतरीन खाद भी तैयार कर सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी खासि‍यत है कि‍ यह केवल 20 रुपए (40 मिलीलीटर) में आता है और दूसरी बात ये है कि‍ इसे कोई प्राइवेट कंपनी नहीं बल्‍कि‍ खुद सरकार दे रही है।

इसका इस्तेमाल करने के लिये दी जाती है ट्रेनिंग

इसका प्रयोग फसलों की सिंचाई, तैयार फसल में छिड़काव और बीजों के शोधन में किया जा सकता है। केंद्र सरकार न केवल इस प्रोडक्‍ट को उपलब्‍ध कराता है बल्‍कि‍ कि‍सानों को इसे यूज करने की ट्रेनिंग भी देता है। इसके लि‍ए बाकायदा वीडि‍यो भी बनाए गए हैं। खेतीबाड़ी में रासायनों के इस्‍तेमाल को कम करने के मकसद से ही इसका नि‍र्माण कि‍या गया है। केंद्र के मुताबि‍क, जि‍न भी कि‍सानों ने इसका इस्‍तेमाल कि‍या है, उनके न केवल पैसे बचे हैं बल्‍कि‍ अच्‍छा उत्‍पादन भी हासि‍ल कि‍या है।

देखिए पूरा वीडियो कैसे काम करती है ये ‘दवा’

कि‍सान उठा रहे हैं लाभ

केंद्र के नि‍देशक डॉक्‍टर कि‍शन चंद्रा ने इस संबंध में एक वीडि‍यो भी अपलोड कि‍या है, जि‍समें वह इसके फायदों के बारे में बता रहे हैं। चंद्रा कहते हैं कि‍ सभी कि‍सान बेधड़क इसका यूज कर सकते हैं। उन्‍होंने बताया कि‍ पहले इस तरह के फॉर्मूले को प्राइवेट इंडस्‍ट्री को बेच दि‍या जाता था और वह प्रोडक्‍ट बनाकर बाजार में लाते थे। मगर उसकी क्‍वालि‍टी सही नहीं होती थी इसलि‍ए इस बार सरकार ने यह फैसला लि‍या है कि‍ वेस्‍ट डीकंपोजर को सरकार खुद ही कि‍सानों तक पहुंचाएगी।

कि‍स तरह से काम करता है यह प्रोडक्‍ट

यह एक छोटी सी शीशी में होता है। इस्‍तेमाल करने के लि‍ए 200 लीटर पानी में 2 किलो गुड़ के साथ इसे डालकर अच्‍छे से मि‍ला दें। गर्मियों में दो दिन और सर्दियों में 4 दिन तक इसे रखें। इसके बाद यह यूज करने के लि‍ए तैयार हो जाता है। इस दौ सौ लीटर घोल से एक बाल्टी घोल को फिर 200 लीटर पानी में मिला लें। इस तरह यह घोल बनाते रहें और खेत की सिंचाई करते समय पानी में इस घोल को डालते रहें। ड्रिप सिंचाई के साथ भी इस घोल का प्रयोग कर सकते हैं। इससे पूरे खेत में यह फैल जाएगा। इसके अलावा फसलों की बीमारी को दूर करने के लिए हर एक महीने में एक बार वेस्‍ट डीकंपोजर का छिड़काव कर सकते हैं।

इस तरह से बनाएं खाद और बीजों का शोधन

कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए 1 टन कूड़े-कचरे में 20 लीटर वेस्‍ट डीकंपोजर का तैयार घोल छिड़क दें। इसके ऊपर एक परत बिछा दें और फिर घोल का छिड़काव करें। फि‍र सब ढक कर छोड़ दें। तकरीबन 40 दिन में कम्पोस्ट खाद तैयार हो जाएगी। केंद्र से मि‍ली जानकारी के मुताबि‍क, एक शीशी से 20 किलो बीज का शोधन किया जा सकता है। एक शीशी डिकम्पोस्ट को 30 ग्राम गुड़ में मिला दें। यह मिश्रण 20 किलो बीज के लिए पर्याप्त है। शोधन के आधे घंटे बाद बीज की बुआई कर सकते हैं।

इस तरह से पाएं ये प्रोडक्‍ट

वेस्‍ट डीकंपोजर राष्‍ट्रीय जैवि‍ खेती केंद्र के सभी रीजनल सेंटर पर उपलब्‍ध है। यह गाजि‍याबाद, बंगलुरु, भुवनेश्‍वर, पंचकूला, इंम्‍फाल, जबलपुर, नागरपुर और पटना के रीजनल सेंटर से प्राप्‍त कि‍या जा सकता है

अब हाइड्रोजेल से सिर्फ एक सिंचाई से होगी फसल

इस हालात में खेती को अगर बचाना है तो ऐसे विकल्पों पर विचार करना होगा जिसमें सिंचाई में पानी की बर्बादी न हो और पूरी कवायद में hydrogel (हाइड्रोजेल) किसी चमत्कार से कम नहीं है।अब बार बार सिंचाई करने की जरूरत नहीं है क्योंकि सिर्फ एक बार सिंचाई करने पर इतना पानी सोख लेता है की बाद में सिंचाई की जरूरत ही नहीं रहती ।

दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) जिसे पूसा संस्थान भी कहा जाता है, के वैज्ञानिकों ने ही इस अद्र्घ-कृत्रिम हाइड्रोफिलिक पॉलिमर जेल का विकास किया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस जेल में कई ऐसी खासियत हैं जो जैव चिकित्सा में इस्तेमाल किए जाने वाले दूसरे तरल पदार्थों को अवशोषित करने वाले जेल से उसे अलग करती है।

इसे ‘पूसा हाइड्रोजेल’ नाम दिया गया है । इस तरह प्रति हेक्टेयर जमीन में केवल 2.5 से 3.75 किलो जेल डालने की जरूरत होती है। अब तक दुनिया में ऐसे जितने भी जेल तैयार किए गए हैं उनकी तकरीबन 10 किलो मात्रा एक हेक्टेयर जमीन में डालनी पड़ती है।

हाल ही में कृषि विज्ञानियों ने एक शोध किया है जिसमें पता चला है कि hydrogel (हाइड्रोजेल) की मदद से बारिश और सिंचाई के पानी को स्टोर कर रखा जा सकता है और इसका इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है जब फसलों को पानी की जरूरत पड़ेगी।

hydrogel (हाइड्रोजेल) पोलिमर है जिसमें पानी को सोख लेने की अकूत क्षमता होती है और यह पानी में घुलता भी नहीं। hydrogel (हाइड्रोजेल) बायोडिग्रेडेबल भी होता है जिस कारण इससे प्रदूषण का खतरा भी नहीं रहता है।

शोधपत्र में कहा गया है कि hydrogel (हाइड्रोजेल) खेत की उर्वरा शक्ति को तनिक भी नुकसान नहीं पहुँचाता है और इसमें 400 गुना पानी सोख लेने की क्षमता होती है। शोधपत्र में कहा गया है कि एक एकड़ खेत में महज 1 से 2 किलोग्राम hydrogel (हाइड्रोजेल) ही पर्याप्त है।hydrogel (हाइड्रोजेल) 40 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी खराब नहीं होता है, इसलिये इसका इस्तेमाल ऐसे क्षेत्रों में किया जा सकता है, जहाँ सूखा पड़ता है।

शोधपत्र के अनुसार, खेतों में hydrogel (हाइड्रोजेल) का एक बार इस्तेमाल किया जाये, तो वह 2 से 5 वर्षों तक काम करता है और इसके बाद ही वह नष्ट हो जाता है लेकिन नष्ट होने पर खेतों की उर्वरा शक्ति पर कोई नकारात्मक असर नहीं डालता है, बल्कि समय-समय पर पानी देकर फसलों और खेतों को फायदा ही पहुँचाता है।

hydrogel (हाइड्रोजेल) का इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है जब फसलें बोई जाती हैं। फसलों के साथ ही इसके कण भी खेतों में डाले जा सकते हैं।hydrogel (हाइड्रोजेल) के इस्तेमाल को लेकर कई प्रयोगशालाओं में व्यापक शोध किया गया है और इन शोधों के आधार पर ही यह शोधपत्र तैयार किया गया है।

शोधपत्र में कहा गया है कि मक्के, गेहूँ, आलू, सोयाबीन, सरसों, प्याज, टमाटर, फूलगोभी, गाजर, धान, गन्ने, हल्दी, जूट समेत अन्य फसलों में hydrogel (हाइड्रोजेल) का इस्तेमाल कर पाया गया कि इससे उत्पादकता तो बढ़ती है, लेकिन पर्यावरण और फसलों को किसी तरह का नुकसान नहीं होता है।

Hydrogel (हाइड्रोजेल) कैसे काम करता है ?

hydrogel (हाइड्रोजेल) अपने भार के मुकाबले 400 गुना से भी ज्यादा पानी को सोख सकते हैं. धीरे-धीरे जब इसके आसपास गर्मी बढ़ने लगती है, तो hydrogel (हाइड्रोजेल) तेजी से पानी छोडना शुरू करता है.

यह सोखे गये जल का 95 फीसदी तक वापस छोड़ता है. पानी को छोड़ने की प्रक्रिया के दौरान यह रीहाइड्रेट होगा और इसे स्टोर करने के लिए इस प्रक्रिया को फिर से दोहराया जा सकता है. इस प्रकार यह प्रक्रिया दो से पांच सालों तक जारी रह सकती है, जिस दौरान बायोडिग्रेडेबल hydrogel (हाइड्रोजेल) डिकंपोज होता रहेगा. यानी फसलों के लिए पानी की जरूरतों को पूरा करता रहेगा.