प्रोफेसर का अनोखा जुगाड़, घास काटने वाली मशीन से बना दी धान काटने वाली मशीन

जेरोम सोरेंगे को-ऑपरेटिव कॉलेज और वर्कर्स कॉलेज में मनोविज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं. रिटायरमेंट के बाद उन्होंने बालीगुमा गोड़गोड़ा में फार्म हाउस खोला. यहां वे सूकर, मुर्गी, ऐमु और मछली पालन कर रहे हैं. थोड़ी जमीन पर खेती-बाड़ी भी है. उन्हें खेत में धान काटने-कटवाने में बहुत परेशानी होती थी.

इससे बचने के लिए वह दिमाग लगाते रहते थे. अंतत: उन्होंने धान काटने की मशीन बना डाली. उन्होंने अलग से कुछ किया नहीं. मवेशी को खिलाने के लिए उनके पास पहले से घास मशीन हेच कटर थी. इस मशीन में ही उन्होंने विज्ञान ढूंढ़ निकाला.

तर्क भिड़ाया कि इससे घास कट सकता है तो धान क्यों नहीं. धान तो कट जा रहा था लेकिन इसकी बालियां बिखर जा रही थीं. उनके मुताबिक इस समस्या का हल उनकी बेटी नीरा मृदुला सोरेंग ने ढूंढ़ निकाला. नीरा चिरीमिरी (छत्तीसगढ़) में रहती हैं. वहां से उन्होंने पापा को धान काटने वाली मशीन का फोटो ह्वाट्सएप किया. इससे प्रो सोरेंग को आइडिया मिल गया.

उन्होंने हेच कटर में प्रोटेक्टर की जगह धान की बाली समेटने के लिए प्लास्टिक की पुरानी बाल्टी काटकर लगा दी. हो गयी मशीन तैयार. जेरोम बताते हैं कि तीन मजदूर तीन दिन में जितना काम कर सकता है, उतना काम कुछ घंटे में यह मशीन कर देती है.

मशीन में सिर्फ दो लीटर डीजल खर्च होगा. दो लीटर डीजल की कीमत 120 से 130 रुपये होती है. मान लिया जाये दो घंटे मशीन चलाने के लिए आप एक व्यक्ति को 150 रुपये देते हैं. इस तरह हिसाब लगाया जाये तो कुल खर्च 280 रुपये या अधिक-से-अधिक 300 रुपये होता है.

धान काटने के लिए एक मजदूर की प्रतिदिन की मजदूरी 150 रुपये होती है. तो तीन मजदूर की तीन दिनों की मजदूरी 1350 रुपये होती है. इस तरह समय के साथ-साथ एक हजार रुपये से अधिक की बचत भी हो रही है.इनके इस प्रयोग के बाद बहुत सारी कंपनी यह मशीन बनाने लगी है .जिनमे बाल्टी की जगह पर धातु लगाई जाती है .और ब्लेड भी बदल दिया है . जिससे अब यह मशीन पूरी तरह से कामयाब बन गई है

इसी सिद्धांत पर बनी मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

किसान ने बनाई ट्रेक्टर के साथ चलने वाली 5 गुना सस्ती कंबाइन मशीन

भारत की कृषिजोत छोटी है और खेतों तक जाने वाले रास्ते संकरे व पेड़ों से घिरे होते हैं. ऐसे में इन खेतों तक बड़े कृषि यंत्रों को ले जाना मुश्किल होता?है. खेती में काम आने वाले जुताई, बोआई, मड़ाई वगैरह के कृषि यंत्र अलगअलग फसलों के लिए अलगअलग तरह के होते हैं.

मड़ाई के कृषि यंत्र फसल के अनुसार अलगअलग तरह के बने होते हैं, जिन के द्वारा गेहूं, धान, राई वगैरह की मड़ाई की जाती है. छोटे किसानों के लिए अपनी फसल की मड़ाई के लिए महंगे व बड़े यंत्र खरीदना मुश्किल होता है. ऐसे में कभीकभी मड़ाई में देरी हो जाती है और देरी की वजह से कई बार बारिश या अन्य वजहों से फसल खराब भी हो जाती है.

किसानों की इन्हीं परेशानियों को देखते हुए उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के विकास खंड कप्तानगंज के गांव खरकादेवरी के रहने वाले 12वीं तक पढ़े नवाचारी किसान आज्ञाराम वर्मा ने एक ऐसी कंबाइन मशीन ईजाद की है, जो कई खूबियों के साथ कम लागत से तैयार की जा सकती है. यह विचार उन के दिमाग में तब आया जब साल 2015 में उन की तैयार गेहूं की फसल बरसात की वजह से कई बार भीग गई और वह अपने गेहूं की फसल की मड़ाई नहीं कर पाए. उन्होंने सोचा क्यों न एक ऐसी गेहूं कटाईमड़ाई की मशीन तैयार की जाए जो कटाई व मड़ाई करने के साथसाथ भूसा भी तैयार कर सके.

आज्ञाराम वर्मा ने इन्हीं परेशानियों को ध्यान में रख कर एक ऐसी कंबाइन मशीन का खाका तैयार किया, जो गेहूं की मड़ाई करने के साथसाथ भूसा भी तैयार कर सकती थी. इस के बाद वे इस मशीन को बनाने में जुट गए. इस के लिए उन्होंने लोहे के तमाम पुर्जे व जरूरी सामान खुले बाजार से खरीद कर अपनी एक वर्कशाप तैयार कर के मशीन बनानी शुरू कर दी. 11 नवंबर 2015 को उन्होंने एक ऐसी कंबाइन मशीन बना कर तैयार की, जो छोटी होने के साथसाथ किसी भी संकरे रास्ते से खेतों में पहुंचाई जा सकती थी.

उन के द्वारा तैयार की गई इस कंबाइन मशीन को बनाने में बहुत ही कम खर्च आया. करीब 2 लाख 75 हजार रुपए में बनी इस कंबाइन मशीन का वजन 18 क्विंटल है. यह अन्य कंबाइन मशीनों से करीब 5 गुना सस्ती है. साथ ही इस की खूबियां इसे और भी बेहतर बनाती हैं. इस मशीन को चलाने के लिए किसी तरह की ट्रेनिंग की जरूरत नहीं होती है और मशीन में आने वाली खराबी को किसान खुद ठीक कर सकता है. इस के लिए अधिक पावर के ट्रैक्टर की भी आवश्यकता नहीं होती है. यह कंबाइन मशीन गेहूं की फसल को जड़ के साथ काटती है.

खूबियां बनाती हैं बेहतर : इस कंबाइन मशीन की खूबियां इसे बेहतर साबित करती हैं. इस मशीन द्वारा 1 घंटे में करीब 1 एकड़ खेत की कटाई की जा सकती है. 7 फुट चौड़े कटर वाली इस मशीन में 9 बेल्टों का प्रयोग किया गया है. इस में इस्तेमाल किए गए सभी कलपुर्जे बाजार में आसानी से मिल जाते हैं और मशीन में किसी तरह की खराबी आ जाने से इस को आसानी से ठीक किया जा सकता है. इस मशीन से एकसाथ गेहूं की कटाई व भूसा बनाने का काम किया जा सकता है. इस के लिए मशीन में अलगअलग 2 भंडारण टैंक लगाए गए हैं. मशीन के बगल में मड़ाई के दौरान गेहूं का भंडारण हो जाता है व मड़ाई से निकलने वाला भूसा मशीन के ऊपर लगे टैंक में चला जाता है.

इस मशीन को ट्रैक्टर के आगे या पीछे जोड़ कर चलाया जा सकता है. ट्रैक्टर के पीछे जोड़ने के लिए 20 हजार रुपए खर्च होते हैं व 20 मिनट का समय लगता है व आगे जोड़ने में 20 हजार रुपए खर्च आता है व 1 घंटे का समय लगता है. फसल की मड़ाई के बाद इस कंबाइन मशीन को ट्रैक्टर से अलग कर के ट्रैक्टर को दूसरे इस्तेमाल में भी लाया जा सकता है.

किसान आज्ञाराम वर्मा द्वारा तैयार की गई मशीन को देखने के लिए दूरदूर से लोग आ रहे हैं और उन के द्वारा तैयार की गई इस मशीन की भारी मांग बनी हुई है. बस्ती जिले के सांसद हरीश द्विवेदी ने किसान आज्ञाराम वर्मा के खेतों में जा कर खुद इस मशीन से गेहूं की मड़ाई कर के इस की खूबियों को जांचापरखा. उन का कहना है कि यह मशीन छोटे किसानों के लिए फायदेमंद साबित होगी.

कृषि विज्ञान केंद्र बस्ती में कृषि अभियंत्रण के वैज्ञानिक इंजीनियर वरुण कुमार का कहना है कि आज भी खेतीकिसानी में काम में आने वाली मशीनें महंगी हैं, जिस की वजह से सभी किसान उन का फायदा नहीं ले पाते हैं. ऐसे में किसान आज्ञाराम वर्मा द्वारा तैयार की गई कंबाइन मशीन छोटे किसानों को आसानी से मिल सकेगी.

इस के पहले भी किसान आज्ञाराम वर्मा ने खेती से जुड़ी कई खोजों की हैं. उन्होंने जहां अधिक चीनी की परते वाली गन्ने की नई प्रजाति कैप्टन बस्ती के नाम से विकसित की है, वहीं गेहूं की नई किस्म एआर 64 भी विकसित की है. वे वर्तमान में खुशबूदार धान की नई किस्म को तैयार करने पर काम कर रहे हैं. आज्ञाराम वर्मा को उन की खोजों की वजह से राष्ट्रीय नव प्रवर्तन संस्थान द्वारा मार्च में 1 हफ्ते के लिए राष्ट्रपति भवन में अपने गन्ने की नई प्रजाति को प्रदर्शित करने का मौका भी दिया गया था. इसी के साथ ही केंद्रीय कृषि मंत्री द्वारा उन्हें नवाचारी किसान के रूप में सम्मानित भी किया गया है.

आज्ञाराम वर्मा का कहना है कि कोई भी किसान चाहे तो खेती में काम आने वाले नए कृषि यंत्रों व बीज वगैरह को ईजाद कर सकता है, क्योंकि वह खेती के दौरान आने वाली तमाम समस्याओं को महसूस करता है. उस दौरान उस के दिमाग में परेशानियों को दूर करने के लिए तमाम ऐसे खयाल आते?हैं, जो किसी भी नई मशीन या बीजों को जन्म दे सकते हैं.

आज्ञाराम वर्मा द्वारा तैयार यह मशीन छोटे किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो रही है. आज्ञाराम ने अपनी इस कंबाइन मशीन का नाम कैप्टन बस्ती रखा है. इस मशीन के बारे में अधिक जानकारी के लिए आज्ञाराम वर्मा के मोबाइल नंबरों 7398349644 व 9721885878 पर संपर्क किया जा सकता है.

यह मशीन कैसे काम करती है जानने के लिए वीडियो देखें

सबसे महंगी कॉफी ऐसे होती है तैयार, जानकर पीना छोड़ देंगे!

अगर आप कॉफी पीने के शौकिन है तो हमारी यह ख़बर आपको निराश कर सकती है। जी हां, दुनिया की सबसे मंहगी कॉफी ‘कोपी लुवाक’ जो पीने में तो बेहद टेस्टी लगती हैं लेकिन इसको बनाने की प्रक्रिया काफी हैरान कर देने वाली है।

कॉफी ‘कोपी लुवाक’ जिसका जायका लेने के लिए लोग दुनिया भर से इंडोनेशिया आते हैं। लोगों की मानें तो इस कॉफी को जो एक बार टेस्ट कर ले फिर उसे कोई और कॉफी रास नहीं आती।
इस कॉफी की कीमत €550 / US$700 प्रति किलोग्राम होती है। यानि के 42000 रूपए प्रति किल्लो ।जो आम कॉफी की तुलना में बहुत ही ज्यादा है ।

आईए अब हम आपको बताते हैं कैसे बनाई जाती है दुनिया की सबसे महंगी कॉफी…

यह कॉफी किसी किसान के द्वारा खेतों में नहीं उगाई जाती बल्कि इस कॉफी का निर्माण जंगली रेड कॉफी बीन्स से होता है जो कि एशियन पाम सिवेट नाम के जानवर की पॉटी से निकलती है।यह जानवर पेड़ पर ही अपना आसियाना टिकाए रहता है। बेर खाने वाला यह जानवर बेर तो ज़रुर खाता है लेकिन यह पचा नहीं पाता।

आप सोच रहे होंगे एशियन पाम सिवेट के पेट में बेर ना पचने से कॉफी के तैयार होने से क्या लेना-देना… अब जो हम बताएंगे आप चौंक जाएंगे… दरअसल एशियन पाम सिवेट पेड़ो पर रहने वाला जानवर होता है जो कि बेरी खाता है लेकिन वो बेरी के बीजों को पचा नहीं पाता है और मल के जरिये उसे पेट से बाहर निकाल देता है जो कि बींस के रूप में वातावरण में आता है और इसी बींस को सुखाकर ‘कोपी लुवाक’ कॉफी बनायी जाती है, जो कि यह बहुत ज्यादा दुर्लभ होती है ।

पहले यह जानवर सिर्फ जंगल में मिलते थे और यह कॉफी बहुत ही दुर्लभ थी । लेकिन अब इसकी फार्मिंग होने लगी है लोग एशियन पाम सिवेट को अपने फार्म में उसका मल लेने के लिए पालते है।क्यों हैरान हो गए ना इस ख़बर को पढ़कर कि जिस कॉफी को सभी राजसी घरानों की पार्टी में शामिल किया जाता है वह ऐसे तैयार होता है।

गेहूं लगाने वाले किसानों के लिए सबसे बड़ी ख़ुशख़बरी !,अब होगी बंपर पैदावार, खराब मौसम का असर भी नहीं पड़ेगा

गेहूं किसानों के लिए ये सबसे बड़ी खबर है। दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने मिलकर गेहूं के कठिन जीनोम को तैयार कर लिया है। अब किसान गेहूं की बंपर पैदावार तो करेंगे ही साथ ही उनकी फसल कीट-पतंगों से भी सुरक्षित रहेगी।

लगभग 13 साल के अथक प्रयासों के बाद आखिरकार वैज्ञानिकों की एक टीम ने गेहूं का जीनोम बनाने में सफलता अर्जित कर ली है। खास बात यह भी है कि दुनियाभर के इन वैज्ञानिकों में 18 वैज्ञानिक भारत के हैं।

इस शोध के बाद अब उन जीनों की पहचान हो पाएगी जो उत्पादन और अनाज की गुणवत्ता को प्रभावित करते थे। इसके अलावा अब गेहूं की फसलों में लगनी वाली बीमारियों और कीड़ों को नियंत्रित किया जा सकेगा। गेहूं की फसल के लिए तापमान में बदलवा सबसे बड़ी समस्या है, लेकिन अब जीनोम बनने के बाद इस समस्या से भी निजात मिल सकती है।

वैज्ञानिक अब इस जानकारी के आधार पर गेहूं की अलग-अलग क़िस्मों के बारे अधिक जानकारी जुटा सकेंगे और उन्हें बेहतर बना सकेंगे। किसानों और कृषि वैज्ञानिकों को इसके कई फ़ायदे हो सकते हैं, मिसाल के तौर पर वे फसल तैयार होने का समय कम कर सकते हैं, मौसम और जलवायु के अधिक अनुकूल नस्लें तैयार की जा सकती हैं और गेहूं का उत्पादन तो बढ़ाया ही जा सकता है।

2050 तक दुनिया भर की आबादी 9.6 अरब हो जाएगी. इस हिसाब से खाद्य आपूर्ति के लिए हर साल गेहूं के उत्पादन में 1.6 फीसदी की बढ़ोतरी जरूरी है। ऐसे में यह खोज से किसानो और लोगों बहुत फ़ायदा होगा ।

इस ऑटो ड्राइवर ने लगाए आंवले के 60 पौधे और बन गया करोड़पति

अगर सफल होना चाहते हैं तो एक चीज जो आपके पास होनी चाहिए है वह है ‘धैर्य’. मेहनत और सच्ची लगन से किए हुए काम का अच्छा नतीजा तभी मिलता है जब आपके पास धैर्य हो. इसी का जीता-जागता उदाहरण है राजस्थान के किसान अमर सिंह. 57 साल के अमर सिंह सभी किसानों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है, जो खेती-बाड़ी कर पैसा कमाना चाहते है.

दरअसल अमर मूल रूप से किसान नहीं हैं बल्कि ऑटोड्राइवर हैं. इन्होंने सालों पहले महज 1200 रुपये में आंवला के 60 पौधे रोपे थे. 22 साल बाद ये पौधे बड़े हुए. आपको जानकर यकीन नहीं होगा लेकिन मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आज अमर इन्हीं पेड़ों से 26 लाख का टर्नओवर कमा रहे हैं.

इस कारोबार में अमर सिंह की मदद करने वाले ल्यूपिन ह्यूमन वेलफेयर ऐंड रिसर्च फाउंडेशन के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर सीताराम गुप्ता बताते हैं कि उनकी मेहनत के कारण आज कई लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ है. जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं.

ऑटोड्राइवर अमर सिंह ऐसे बने किसान

अमर सिंह का पैतृक पेशा खेती का था. साल 1977 में अमर सिंह के पिता का देहांत हो गया. हालांकि खेती से ही उनका घर चल रहा था. पर उस दौरान खेती से कुछ कमाई नहीं होती थी. घर के हालात ठीक नहीं थे इसलिए अमर ने ऑटो चलाना शुरू कर दिया.

हालांकि इसमें उनका मन नहीं लगा और 1985 में वह अपने ससुराल में, गुजरात, अहमदाबाद पहुंच गए. वहीं रास्ते में सड़क पर उन्हें अखबार का एक टुकड़ा मिला था, जिसमें आंवले की खेती के बारे में जानकारी दी गई थी.

वह उस आर्टिकल से इतने इंप्रेस हुए कि उन्होंने ठान लिया की वह अब आंवले की ही खेती करेंगे. उन्होंने 2 एकड़ जमीन पर आंवले के 60 पौधे बोए. उन्हीं बोए हुए पौधों का नतीजा है कि आज वे करोड़पति किसानों में गिने जाते हैं.

ये है अनार की सिंदूरी किसम,किसानो को कर रही है मालामाल

शेखावाटी के धोरों को सिन्दूरी अनार भा गया है। आबोहवा की अनुकूलता के कारण जिले में कई स्थानों पर सिन्दूरी अनार के पेड़ लहलहा रहे हंै। महज छह वर्षों में सीकर जिला प्रदेश में सिन्दूरी अनार के लिए प्रथम स्थान पर पहुंच गया है।

इसके साथ ही किसानों की तकदीर बदल गई है। इस समय जिले में करीब 1500 हैक्टेयर में सिन्दूरी अनार की खेती हो रही है। विशेषज्ञों की माने तो अगले दो वर्ष में सिन्दूरी अनार की खेती दो हजार हैक्टेयर में होने लगेगी।

तीन वर्ष में उत्पादन शुरू

राष्ट्रीय बागवानी मिशन योजना के तहत सीकर जिले में वर्ष 2008-09 में सिन्दूरी अनार की खेती शुरू हुई थी। सिन्दूरी अनार का पौधा तीन वर्ष में उपज देना शुरू कर देता है। सिन्दूरी अनार का बगीचा लगाने के लिए उद्यान विभाग की ओर से 30 हजार रुपए प्रति हैक्टेयर तक अनुदान दिया जाता है। अनार की अन्य किस्मो की बजाए सिन्दूरी अनार टिकाऊ, स्वादिष्ट व निर्यात योग्य होते हैं।

ऐसे होती है अनार की खेती

  • अनार के पौधों में लवण एवं क्षारीयता सहन करने की अच्छी क्षमता होती है। -6.5 से 7.5 पीएच मान, 900 ईसी/मिमी मृदा लवणता तथा 6.78 ईएसपी तक क्षारीयता वाली मिट्टी में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।
  • अनार की खेती के लिए गहरी बलुई दोमट भूमि सबसे उपयुक्त होती है, परन्तु क्षारीय भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है।
  • यही नहीं लवणीय पानी से सिंचाई करके भी अनार की अच्छी पैदावार ली जा सकती है।
  • शुष्क एवं अद्र्ध शुष्क क्षेत्र की जलवायु अनार उत्पादन के लिए अति उत्तम है।
  • फलों के विकास तथा पकने के समय गर्म एवं शुष्क जलवायु उपयुक्त होती है।
  • पूर्ण विकसित फलों में रंग तथा दानों में गहरा लाल रंग तथा मिठास के लिए अपेक्षाकृत कम तापमान की आवश्यकता होती है।
  • वातावरण तथा मृदा में नमी एवं तापमान में अत्यधिक उतार-चढ़ाव से फलों के फटने की समस्या बढ़ जाती है, जिससे उनकी गुणवत्ता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

प्रदेश में होने लगे पौधे

सिन्दूरी अनार की किस्म मूलत: महाराष्ट्र इलाके की है। पौधे की मांग को देखते हुए उद्यान विभाग ने शुरुआती वर्षों में महाराष्ट्र के मालेगांव से सिन्दूरी अनार के पौधे मंगवाए। किसानों के रूझान को देखते हुए अब खेतों व सरकारी नर्सरियों में सिन्दूरी अनार की कलम से पौधे तैयार किए जाने लगे है।

किसानो ने RTI तहत मांगी थी ये जानकारी , विभाग ने 150 किलो कागज पर लिख भेजा जवाब

गेहूं और सरसों की खरीद से जुड़ी जानकारियां एवं किसानों को किए गए भुगतान के संबंध में मांगी गई आरटीआइ के बदले सिरसा के हैफेड विभाग ने 68,834 रुपये सूचना के बदले वसूल किए हैं। सूचना के 32017 पेज बनाए गए है। 32017 पेजों की सूचना के लिए एक ¨क्वटल साठ किलो कागज डाक विभाग के पास भेजा गया है।

दड़बा निवासी अनिल कस्वां ने सूचना उपायुक्त कार्यालय से मांगी कि सरसों व गेंहू की कितनी कितनी खरीद हुई। कितने किसानों ने फसल बेची और विभाग के पास किसानों को देने के लिए कब बजट पहुंचा। बैंक में किस खाते में कितने दिनों तक राशि रखी गई या अन्य खातों में रखी गई, उनकी जानकारी मांगी गई थी।

साथ ही उन किसानों की जानकारी भी मांगी गई, जिनके खातों में अभी तक राशि नही गई। उपायुक्त कार्यालय ने 25 जून 2018 को इस सूचना को हैफेड और फूड सप्लाई विभाग को भेज दिया और जानकारी उपलब्ध करवाने को कहा।

हैफेड ने 16 जुलाई को आवेदक को पत्र भेज कर 68,834 रुपये जमा करवाने को कहा, जिसमें 32017 पेजों की सूचना तैयार किए जाने व 800 रुपये पोस्टल खर्च के बताए गए। प्रति पेज दो रुपये की दर से बताते हुए 19 जुलाई को डाक से सूचना भेजी गई, जिसके बाद शिकायतकर्ता की ओर से 30 जुलाई को बैंक के माध्यम से मांगी गई राशि जमा करवा दी गई।

विभागीय अधिकारियों ने सूचना भेज देने की जानकारी दे रहे हैं और एक् ¨क्वटल साठ किलो वजन की सूचना भेजी गई है। उधर डाक विभाग को इतनी अधिक मात्रा में डाक भेजने के लिए सिरसा से दड़बा के लिए गाड़ी भेजनी होगी। डाक विभाग के कर्मचारी ने बताया कि हैफेड की डाक दड़बा कलां के लिए आई है। स्पेशल गाड़ी भेजनी पड़ रही है। कर्मचारियों के अनुसार आरटीआइ में इतना अधिक वजनी सूचना भेजने का सिरसा का यह पहला मामला है।

मुझे तो अभी तक नहीं मिली डाक

आरटीआइ लगाने वाले अनिल कुमार ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से हैफेड के अधिकारी सूचना उपलब्ध करवाने की बात कह रहे है परंतु उसे अभी तक सूचना नहीं मिली है। हालांकि यह जरूर बताया जा रहा है कि डाक से सूचना भेज रहे हैं। उसने यह भी बताया कि अभी भी किसानों को फसल बेचने का भुगतान प्राप्त नहीं हुआ है और वे इसकी सूची भी दे सकते हैं। सूचना नहीं सैकड़ों पेड़ काट दिए, चुप नहीं बैठूंगा

आरटीआइ कार्यकर्ता करतार ¨सह ने कहा कि बड़ी ही हैरानी वाली बात है कि जो जानकारी साफ्ट कॉपी में दी जा सकती थी, उसके लिए 96000 से अधिक पेज नष्ट कर दिया गया। जिसका मतलब है असंख्य पेड़ कट गए। क्योंकि सूचना देने से पूर्व एक कॉपी विभाग के पास रही होगी, एक आरटीआइ कार्यकर्ता को गई और एक उपायुक्त कार्यालय को भी गई होगी, क्योंकि आरटीआइ वहीं से आई थी।

अगर उपायुक्त कार्यालय को भी छोड़ दें तो भी 64000 पेज तो तैयार हुए हैं। इससे मंशा है कि अधिकारी किसी गलत नीयत को छिपाने के लिए असंख्य कागजात की राशि तैयार कर आवेदक को परेशान करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि मुख्य सचिव को पत्र लिख दिया है।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को भी जानकारी दी गई है और उन्होंने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश को भी पत्र भेजकर कहा है कि आरटीआइ से आभास हो रहा है कि जो सूचना 50 से 100 पेज में तैयार की जा सकती थी उसके लिए 32000 पेज की सूचना गलत मंशा से तैयार की गई। सिरसा हैफेड का कैग से स्पेशल ऑडिट करवाया जाना चाहिए।

इस तकनीक से बिना फ्रिज और केमिकल से 9 महीने तक दूध नहीं होता है खराब

दूध को लेकर हमारी मां कुछ ज्यादा ही चिंता में रहती है।  दूध को फ्रिज में संजोकर रखा जाता है, बार-बार गर्म किया जाता है। पर क्या आपने कभी सोचा है आखिर दूध को लेकर इतना सतर्क क्यों रहते हैं?

दरअसल दूध में कई बैक्टीरिया मौजूद होते हैं, जिसके चलते उसे पीने योग्य बनाए रखने के लिए ये सारे जातन किए जाते हैं। अगर ऐसा न किया जाए तो दूध खराब हो जाता है।

अब भारत के हर गांव-कस्बे में तो फ्रिज है नहीं, जिसके चलते हमारे देश में कई टन दूध वेस्ट हो जाता है। दूसरी ओर दूध को बड़े शहरों तक पहुंचाने में हर दिन हजारों-लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं।

आखिर कौन-सी है ये तकनीक और किस तरह देश में दूध की क्रांति को बढ़ावा दे सकती है चलिए जानते हैं।

अल्ट्रा हाई टेम्परेचर प्रोसेसिंग

अल्ट्रा हाई टेम्परेचर प्रोसेस या ultra-pasteurization नाम की तकनीक दूध को लंबे समय तक बिना फ्रिज के स्टोर करने में मदद करती है। इस तकनीक में दूध को काफी हाई टेंपरेचर पर गर्म किया जाता है और फिर एकदम ठंडा किया जाता है। इसके बादि प्रोसेस्ड मिल्क को हर्मेटिकली सील्ड कंटेनर में बंद कर देते हैं। इससे दूध में मौजूद सभी बैक्टीरिया एक ही बार में खत्म हो जाते हैं।

6-9 महीनों तक नहीं होता खराब 

इस तरह प्रोसेस किए गए दूध की खासियत होती है कि वो लगभग 6 से 9 महीनों तक खराब नहीं होता। न ही इसे फ्रिज में रखने की जरुरत होती है यानी हर्मेटिकली सील्ड डिब्बे में बंद दूध को फ्रिज के बाहर ही कई महीनों तक रखा जा सकता है।

फ्रांस में प्रसिद्ध है ये तकनीक 

कहा जाता है कि इस तकनीक का ईजाद 70 के दशक में कर लिया गया था। और तभी से कुछ देशों में इसका उपयोग जारी है। आज फ्रांस में उपयोग किए जाने वाले दूध का लगभग 95% भाग अल्ट्रा हाई टेम्परेचर प्रोसेसिंग की मदद से स्टोर किया जाता है।

इस तरह हो सकती है भारत के लिए उपयोगी 

यूरोप की तरह ही भारत में भी ये तकनीक काफी मददगार हो सकती है। जैसा कि हमने ऊपर बताया इस तकनीक की मदद से स्टोर किया गया दूध कई महीनों तक खराब नहीं होता। तो जिन गांवों में फ्रिज या बिजली की समस्या हो वहां ये तकनीक काफी उपयोगी होगी। साथ ही मेट्रो सिटी में एक साथ कई दिनों का स्टाक पहुंचाकर, हर दिन दूध भेजने की ट्रांस्पोर्टेशन कॉस्ट कम की जा सकती है।

अभी क्या है भारत का हाल

फिलहाल भारत में सबसे ज्यादा यूएचटी दूध कर्नाटक राज्य में बिकता है। इसके बाद महाराष्ट्र और तमिलनाडु में इसकी बिक्री अधिक है। रिसर्च के अनुसार, पिछले कुछ सालों के मुकाबले 2017 में इसकी मांग बढ़ी है और 2023 तक भारत में यूएचटी मिल्क का मार्केट लगभग 156 बिलियन (15,600 करोड़ रुपयें) का हो सकता है।

 

सही तरह से विज्ञापन करने की जरुरत

आंकड़ों की मानें तो भारत में यूएचटी मिल्क की बिक्री धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन अधिकांश लोग इसकी उपयोगिता से अनजान हैं। अभी देश की ज्यादातर जनता इसे मात्र पैकेट वाले दूध के रूप में जानती है। ऐसे में लोगों को इस तकनीक के असल उपयोग और फायदों से अवगत करवाने की जरुरत है।

टेस्ट को लेकर कही जाती है ऐसी बातें 

हाई टेंपरेचर पर प्रोसेस्ड किए गए दूध के स्वाद को लेकर लोगों के बीच दो मत पाए जाते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इसका स्वाद नार्मल दूध से काफी अलग होता है, वहीं कुछ लोगों के अनुसार दूध के स्वाद में कोई अंतर नहीं होता।

चाहे जो भी हो लेकिन दूध स्टोर करने की ये प्रोसेस निश्चित ही भारत के लिए काफी फायदेमंद साबित होगी। इससे दूध के वेस्टेज को तो कम किया ही जा सकता है, साथ ही साथ पैसों की बचत भी संभव है।

मौसम विभाग ने जारी की चेतावनी, केरल के बाद इन राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट

केरल में भारी बारिश और बाढ़ के चलते बीते नौ दिनों में 324 लोगों की जान चली गई है. अब तक दो लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है. एनडीआरएफ और बचाव दल जी जान से बाढ़ में फंसे लोगों को बचाने की कोशिश में लगे हैं.

मौसम विभाग के मुताबिक, केरल से बारिश का खतरा अभी टला नहीं है. यहां आने वाले 48 घंटों में भारी से भारी बारिश की चेतावनी जारी की गई है. केरल में भीषण तबाही मचाने के बाद अब गुजरात और कर्नाटक में बारिश ने अपना तांडव दिखाना शुरू कर दिया है. गुजरात के कई इलाकों में शुक्रवार को भारी बारिश के चलते जलभराव की स्थिति पैदा हो गई थी. हालांकि यहां शनिवार को बारिश में कुछ कमी देखने को मिली है.

इन राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट

भारतीय मौसम विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक, अगले 4 दिनों में गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ, कर्नाटक, महाराष्ट्र के तटीय इलाकों, कोंकण, गोवा और लक्षद्वीप में भारी बारिश हो सकती है. इसके अलावा पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, मध्य महाराष्ट्र और तेलंगाना के कुछ इलाकों में तेज बारिश हो सकती है.

जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली के कुछ इलाकों, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, असम और मेघालय और ओडिशा में बारिश हो सकती है.

कहां कितनी बारिश हुई

मौसम विभाग के मुताबिक, गुरुवार को अहमदाबाद में 9cm, उदयपुर में 6cm, सुरेंद्रनगर में 4cm बारिश रिकॉर्ड की गई. इसके अलावा पंजाब के लुधियाना और अंबाला में 2-2 Cm बारिश दर्ज की गई. बारिश के चलते गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में तापमान में तीन से पांच डिग्री तक गिरावट देखी गई.

पंजाब बना चन्दन की खेती का हब, 30 रुपये का मिलता है पौधा , प्रति एकड़ होती है एक करोड़ तक की कमाई

दक्षिण भारत का एकाधिकार तोड़ अब पंजाब चंदन हब बनने की राह पर है। इसके लिए होशियारपुर का वन विभाग अग्रणी भूमिका अदा कर रहा है। होशियारपुर में स्थापित 1 लाख पौध की नर्सरी से चंदन के पौधों की सप्लाई हो रही है। वो दिन दूर नहीं जब धीरे-धीरे सूबा चंदन की खुशबू से महकेगा।

होशियारपुर से न केवल पंजाब के अन्य जिलों बल्कि पड़ोसी राज्यों हिमाचल प्रदेश, हरियाणा को भी पौधे सप्लाई हो रहे हैं। पंजाब चंदन की खेती के लिए हिमाचल प्रदेश का गुरु साबित होने जा रहा है। चंदन की खेती से किसान लाखों-करोड़ों रुपए कमा सकते हैं। इसकी खेती से सूबे में चंदन से संबंधित उद्योग भी प्रफुल्लित होगा।

पंजाब के उद्योग आैर वाणिज्य मंत्री सुन्दर शाम अरोड़ा ने कहा कि पंजाब सरकार चंदन से संबंधित उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है आैर करती रहेगी। उन्होंने कहा कि जहां किसान चंदन की खेती के साथ आर्थिक तौर पर मजबूत होंगे, वहीं उद्योग और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा।

क्योंकि चंदन के तेल का दवा, धूप, अगरबत्ती, साबुन, परफ्यूम आदि में प्रयोग होता है। उन्होंने कहा कि उनके विभाग की तरफ से चंदन की प्रोसेसिंग के लिए उद्योग आैर चंदन उत्पादों की मार्केटिंग के लिए विशेष व्यापारिक सुविधाएं मुहैया करवाने जैसे कदम उठाए जाएंगे ताकि पंजाब चंदन की खेती और चंदन उत्पाद में अग्रणी प्रदेश बन सके।

चंदन का जनक बना कंडी क्षेत्र …तलवाड़ा, जनौड़ी और होशियारपुर स्थित वन विभाग की नर्सरियों में तैयार किए जा रहे चंदन के पौधे

डिप्टी कमिश्नर ईशा कालिया ने बताया कि इस समय तलवाड़ा, जनौड़ी और होशियारपुर स्थित वन विभाग की नर्सरियों में चंदन के पौधे तैयार किए जा रहे है। एक पौधे की कीमत 30 रुपए रखी गई है ताकि किसानों पर इन्हें लेने पर आर्थिक बोझ न पड़े।

विभाग की तरफ से अब तक 15 हजार से अधिक पौधे फाजिल्का, अबोहर, मुक्तसर, जालंधर, मोगा और हिमाचल प्रदेश सहित प्रदेश के अलग-अलग जिलों में सप्लाई किए गए हैं। विभाग के पास करीब सवा लाख चंदन के पौधे तैयार हैं। होशियारपुर के गांव बिछोही के प्रगतिशील किसान कमलजीत सिंह रंधावा ने 100 पौधे लगाए हैं और वह फसली चक्र में फंसे बाकी किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बने हैं।

प्रति हेक्टेयर चंदन के करीब 532 पौधे लगाए जा सकते हैं

डीएफओ कुलराज सिंह ने बताया कि प्रति हेक्टेयर चंदन के करीब 532 पौधे लगाए जा सकते हैं। एक पौधे के साथ 20 किलो अंदरुनी लकड़ी (हार्टवुड) मिलती है और 7वें साल में हार्टवुड तैयार होनी शुरू हो जाती है। यह लकड़ी बाजार में 4 से 8 हजार रुपए प्रति किलो के हिसाब से बिक जाती है।

चंदन के पौधे से चार साल बाद ही बीज मिलने शुरू हो जाते हैं, जिससे किसान की अच्छी आय हो जाती है। करीब 14 साल तक इसकी अंदरूनी लकड़ी तैयार हो जाती है और इससे किसान प्रति हेक्टेयर 2.25 करोड़ तक आय ले सकता है।

चंदन का तेल करीब पौने तीन लाख रुपए लीटर बिकता है। चंदन की अंतरराष्ट्रीय बाजारा में भी काफी मांग है। वन विभाग की ओर से न सिर्फ किसानों को चंदन के पौधे दिए जा रहे हैं बल्कि इसकी खेती की जानकारी भी दी जा रही है ताकि इसकी खेती को कामयाब बनाया जा सके।

दूसरे पौधों से लेता है खुराक, 14 साल लगते हैं तैयार होने में, पेड़ की कीमत करीब डेढ़ लाख

डीसी ईशा कालिया ने बताया कि चंदन का पौधा लगभग 14 साल में तैयार हो जाता है। इस समय चंदन के पेड़ की कीमत करीब डेढ़ लाख रुपए तक है। चंदन के पौधे की खास बात यह है कि यह पैरासाइटिक प्लांट है। भाव यह कि यह अपनी खुराक दूसरे पौधे से लेता है।

इसको तैयार होने में समय लगता है, इसलिए किसान इसके साथ-साथ डेक, आम, आंवला लगा सकते हैं। कम समय के अंतराल में किसानों को आय शुरू हो जाती है। उन्होंने कहा कि सूबे में वन क्षेत्र बढ़ाने में किसान सहयोग दे सकते हैं। इसके साथ ही उन्हें इससे आया का अतिरिक्त साधन मिलेगा।