किसान ने 1.5 लाख रुपए खर्च कर शुरू की केसर की खेती

गुड़गांव के खंड के गांव खंडेवला के युवा जमीदार प्रदीप पुत्र रामकरण कटारिया द्वारा फसल चक्र में किए गए बदलाव के कारण वह चर्चा का विषय बना हुआ है। उसने गेंहू की आगेर्निक खेती को तो बढ़ावा दिया ही साथ में बेस कीमती फसल माने जाने वाली केसर की खेती करके सभी को आश्चर्य में डाल दिया है। केसर की खेती में सफलता मिलने से प्रदीप फूला नहीं समा रहा है।

वह जिले का पहला किसान है जिसने आधा एकड़ भूमि में केसर की खेती की और अपनी मेहनत और सच्ची लगन से केसर की चुटाई का कार्य कर रहा है। उसकी माने तो उसने कम खर्च में ज्यादा कमाई और रातो रात अमीर बनने के सपने को मानों पंख से लग गए है। आधा एकड में अभी तक करीब पांच किलो केसर की चुटाई कर चुका है और 10 से 12 किलों होने की और उम्मीद जताई है। जिसके कारण वह क्षेत्र के लोगों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

प्रदीप कटारिया ने बताया कि उसके पास करीब 17 एकड़ भूमि है। वह हर बार गेंहू, सरसों, और जौ की खेती करता था। वह कृषि विभाग द्वारा चलाए जाने वाले जागरुकता सेमिनार में भाग लेता था । कृषि वैज्ञानिक आगेर्निंक खेती को तो बढ़ावा देने पर बल देते थे।

जिसके चलते पिछले तीन वर्षों में उसने अपने खेतों में डीएपी, यूरिया आदि का प्रयोग नहीं किया और केवल आगेर्निंक खाद का ही प्रयोग किया। जिसके कारण उसकी गेंहू, जौ, सरसों आदि की फसल भी बेहतरीन होने लगी। इसी दौरान एक सेवानिवृत कृषि चिकित्सक ने उसे केसर की खेती करने के लिए सुझाव दिए।

केसर की खेती करने के लिए कैनेडा से अमेरिकन केसर सैफरान का बीज 3 लाख 28 हजार रुपए किलों की दर से आधा किलों मंगवाया और आधा एकड़ भूमि में अक्टूबर माह में एक-एक फीट की दूरी पर बिजाई कर दी।

उसके बाद 20 से 25 दिनों में अन्य फसलों की तरह पानी से सिंचाई करते रहे। उन्होंने बताया कि इस फसल में फंगस का रोग होता है। उसके बचाव के लिए भी देशी उपाय के रुप में उसने नीम के पत्ते, आकडा और धतूरे के पत्तों को पानी में उबाल कर फसल पर छिडकाव और जडों में छोडा जिसके कारण उसकी केसर की फसल सुरक्षित रहीं।

 

इसमें तापमान 8 से 10 डिग्री तक होना चाहिए। इसमें बरसात काफी लाभकारी और तेज हवा और ओलावृष्टी नुकसानदायक है। उसने बताया कि मार्किट में केसर की कीमत ढ़ाई से तीन लाख रुपए किलो बताई जा रही है। इस खेती का सबसे बडा फायदा यह है कि इसके बीज, केसर तो मेहंगे बिकते ही है साथ में फसल के शेष बचे अवशेष भी हवन सामग्री में प्रयोग किए जाते है।

केसर को बेचने के लिए वह राजस्थान या गुजरात के व्यापारियों से सम्र्पक् करेंगे। साथ उसने क्षेत्र के किसानों से भी इस कम लागत वाली व अधिक मुनाफा देने वाली खेती को अपनाने के लिए आवाहन किया है।

उन्होंने बताया कि वह गेंहू, जौ, सरसों की के लिए जो कठिन परिश्रम करके भी नहीं कमा पाए वह मात्र आधा एकड भूमि में केसर की खेती से लाभ कमा चुके है। उन्होंने बताया कि यह खेती कम जमीन वाले किसानों के लिए काफी लाभदायक साबित होगी। मात्र 6 माह में ही लखपति होने का सपना साकार हो सकता है। इसमें सिर्फ मामली देखभल और फिर किसान मालामाल हो जाता है।

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