सिर्फ 3 लाख में ऐसे शुरू करें सोया पनीर का बिज़नेस

किसी भी व्यवसाय व उद्योग के संचालन के लिए पर्याप्त पूजी होना जरूरी होता है।पूजी के अभाव में व्यवसाय संचालन का अरमान धरे के धरे रह जाते है।परन्तु डेयरी उद्योग के संचालन का अरमान रखने वालों के लिए एक मशीन अा गई है जाें गाय भैंस के जैसे भूसा तो नही खाएगी, लेकिन दिन में साै लीटर दूध जरूर देगी।

इस बात पर विश्वास करना थोड़ा मुशि्कल हो रहा होगा, लेकिन ऐसा सम्भव हो चुका है। लघु उद्योग की चाह रखने वाले लोगो के लिए ऐसा मशीन बनाया है जिसमें एक घंटे में 1 किलो सोयाबीन से आठ किलो दूध, 6 किल्लो दही, डेढ़ किलो सोया पनीर, 10 किलो छांछ निकलता है यानी दिन भर मैं सौ लीटर दूध निकलता है।

बेशक इस दूध की पौष्टिकता और स्वाद गाय और भेस के दूध के जैसी नहीं होती लेकिन मरीजों के लिए यह दूध बहुत ही अच्छा माना जाता है । इसके दूध से बनने वाले पनीर को टोफू कहा जाता है जिसकी बाजार मैं बहुत मांग है ।

डेरी की तरह इसको चलने के लिए ज्यादा जगह नहीं चाहिए साथ ही इस मशीन के संचालन के लिए एक व्यकि्त की जरूरी होता है अधिक जनशकि्त की आवश्यकता नही होती ।मशीन की कीमत 2 लाख 50 हजार है। 4 लाख इसका सारा सेटअप हो जनता है जिससे आप 1 लाख रुपया महीना कमा सकते हो । साथ ही खरीददार को कम्पनी की ओर से निशुल्क परशिक्षण दिया जाता है।अधिक जानकारी के लिए 8308482293 पर सम्पर्क कर सकते है।

इस बिजनेस के बारे में और जानकारी के लिए ये वीडियो देखें

ये मशीन कैसे काम करते है इसके लिए ये वीडियो देखे

पशुओं को हीट में लाने के लिए करें इन घरेलु नुख्सों का प्रयोग

कई बार किसान भाईओं को अपने पशओं को हीट मैं लाने मैं काफी दिक्कत आती है | कई बार पशुओं के डॉक्टर को दिखाने पर भी कोई फ़ायदा नहीं होता उल्टा जो पैसे का नुक्सान होता है वो अलग आज हम आपको कुश घरेलू नुक्से बतायंगे जिनको इस्तेमाल कर आप अपने पशुओं को हीट में ला सकते है |

पशुओं को गुड़ देना:- थोड़ी मात्रा में दिया गया गुड़ पशुओं के पेट में सूक्ष्मजीवों के बढ़ने और पाचन शक्ति बढ़ाने में सहायक होता है| इससे पशु की भूख बढ़ जाती है| गुड़ ऊर्जा देने के साथ साथ भूख भी बढ़ाता है इसलिए जरूरी तत्वों की पूर्ति में सहायक होता है जिससे पशु हीट में आ जाता है| पर कोशिश करें की ज्यादा मात्रा में एवं लगातार गुड़ न दें क्योंकि ज्यादा मात्रा में दिया गया गुड़ पशु के लिए परेशानी का कारन बन सकता है|

पशुओं को बिनौले खिलाना:- पशुओं को हीट में लाने के लिए बिनौले दिए जाते हैं क्योंकि इनकी तासीर गरम होने की वजह से पशु जल्दी बोल पड़ता है और नए दूध हो जाता है| पर बिनौले हमेशा उबाल कर ही देने चाहियें क्योंकि कच्चे बिनौलों में गोसीपोल नाम का जहर होता है जिससे पशु को नुकसान भी हो सकता है|

गुड़ और तारामीरा तेल का मिश्रण देना:-अपने पशुओं को गुड़ एवं तारामीरा तेल का मिश्रण लगभग आधा किल्लो से एक किलो 5 – 7 दिनों तक देना चाहिए| कई बार इस मिश्रण में थोड़ा नमक भी मिला लिया जाता है यां कुछ लोग सौंफ, अजवाइन, सौंठ और गुड़ का काहड़ा बना कर भी पशुओं को देते हैं|

गुड़+सरसों के तेल और तिल का मिश्रण देना- इस नुस्खे अनुसार एक पाव गुड़ एवं समान मात्रा में तिल ले कर उसमे लगभग 100 मिलीलीटर तेल डाल कर मिला लिया जाता है फिर इस मिश्रण को पीस कर 4 से 5 दिनों तक पशुओं को खिलाया जाता है|गुड़, सरसों के तेल एवं तिल में बाईपास प्रोटीन होता है इसलिए जब ये सरे तत्व मिल जाएँ तो पशु के गर्भ धारण करने की सम्भावना बढ़ जाती है|

इतने रुपए बढ़ेगा धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य

सरकार जुलाई से शुर होने वाले आगामी फसल वर्ष 2017-18 के लिए धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) को 80 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ा कर 1,550 रुपए करने के बारे में विचार कर रही है।  चालू फसल वर्ष में साधारण किस्म के धान का एम.एस.पी. 1,470 रुपए  क्विंटल था।

‘ए’ ग्रेड धान का एम.एस.पी. थोड़ा उंचा रहता है जो इस वर्ष के लिए 1,510 रुपए निर्धारित किया गया था। सूत्रों के अनुसार कृषि मंत्रालय ने अंतर मंत्रालयीय विचार विमर्श के लिए एक मंत्रिमंडलीय परिपत्र को जारी किया है तथा इसे जल्द ही मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने की संभावना है।

मंत्रालय ने फसल वर्ष 2017-18 के लिए धान के एमएसपी को 80 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाने का प्रस्ताव किया है। एम.एस.पी. के बारे में जो सुझाव है वह कॉमन ग्रेड के लिए 1,550 रुपए  तथा ‘ए’ ग्रेड के लिए 1,590 रुपए का है। धान के लिए जो मूल्य वृद्धि का प्रस्ताव किया गया है वह फसल वर्ष 2016-17 के लिए प्रभावी 60 रुपए की वृद्धि से मामूली अधिक है।

प्रस्तावित दरें विशेषज्ञ निकाय कृषि लागत एवं मूल्य आयोग :सीएसीपी: की सिफारिशों के अनुरूप है।  चालू वर्ष में चावल उत्पादन सर्वकालिक उच्च स्तर 10 करोड़ 91.5 लाख टन होने का अनुमान है जिसमें से नौ करोड़ 50.9 लाख टन का उत्पादन खरीफ के धान का है इससे पहले का उच्चम रिकॉर्ड फसल वर्ष 2013-14 का है जबकि 10 करोड़ 66.5 लाख टन धान की पैदावार हुई थी।

ये है देश के 4 करोड़पति किसान, जाने कैसे किसी ने नौकरी और किसी ने चाय बेचना छोड़ कर बन गए सफल किसान

देश का किसान दिन बे दिन गरीब होता जा रहा है । एग्रीकल्‍चर को अक्‍सर लोग फायदे का सौदा नहीं मानते हैं। इस लिए कोई भी खेती में अपना भविष्य नहीं देखता यहाँ तक की खुद किसान खेती छोड़ कर कोई और काम करना चाहते है ।

लेकिन, इन सबके बीच आधुनिक तकनीकों का सहारा और नए तरीकों से खेती करने वाले किसान सफलता की नई कहानी बन रहे हैं। देश में एेसे चार किसान है जिनका नाम भारत के करोपड़पति किसानों में लिया जाता है। ये चारों किसान आज कांट्रेक्‍ट फार्मिंग को आधार बनाकर हर साल लाखों नहीं बल्कि करोड़ों रुपए में इनकम करते हैं।

परंपरागत खेती से की शुरआत

गुजरात के अमीरगढ़ ताललुका के रामपुर वदला गांव निवासी इस्‍माइलभाई रहीमभाई शेरू बीकॉम तक पढ़े थे। शुरुआत में माता पिता ने इनसे नौकरी कराना चाहा लेकिन, इनका मन अपनी खेती में ज्‍यादा रहा। परंपरागत खेती करते-करते शेरू लगभग 15 साल पहले मैक डोनाल्‍ड और फिर मैक केन जैसी कंपनियों के संपर्क में आए।

इन कंपनियों के साथ कांट्रेक्‍ट कर शेरू ने उत्‍तम क्‍वालिटी के फ्रेंच फ्राइज और आलू टिक्‍की के लिए आलू उगाना शुरू कर दिया। इनकम की गारंटी के चलते ये दिनोंदिन आगे बढ़ते गए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शेरू भाई के पास आज 400 एकड़ कृषि भूमि है। जिसमें वे हर साल करोड़ों रुपए कमाते हैं।

खेती करने के लिए नौकरी छोड़ी

गुजरात राज्‍य में ही पार्थीभाई जेठभाई चौधरी गुजरात पुलिस में काम करते थे, लेकिन, लगभग 18 साल पहले उन्‍होंने अपनी खेती करने के लिए नौकरी छोड़ दी। बनासकांठा के दांतीवाड़ा में पानी की दिक्‍कत होती है लेकिन, इन्‍होंने अपने खेतों पर ड्रिप इरीगेशन और स्प्रिंकलर लगवाए जिससे वे हर साल 750 एम.एम. पानी चाहने वाले स्‍थान पर बहुत कम पानी में ही काम चलाते हैं।

चौधरी का भी मैक केन के साथ आलू पैदा करने का ही कांट्रेक्‍ट है। चौधरी के खेतों में 2 किलोग्राम तक के आलू होते हैं जिन्‍हें वे हर साल निश्चित दर पर ही बेचते हैं। वर्तमान में उनके पास 87 एकड़ कृषि भूमि अपनी और इतनी ही किराए पर है। पिछले साल चौधरी ने 3.5 करोड़ रुपए के आलू बेचे थे।

20 साल पहले चलाते थे चाय की दुकान

महाराष्‍ट्र के जलगांव के रहने वाले तेनु डोंगर बोरोले 63 साल के हो चुके हैं। करीब 20 साल पहले तक वे चाय बचेने का काम करते थे लेकिन, उस दौरान उन्‍हें किसी ने केले की खेती के बारे में जानकारी दी। उनके पास कुछ जमीन तो अपनी थी और कुछ उन्‍होंने किराए पर ले ली।

इसके बाद उन्‍होंने इस पर केले की खेती शुरू कर दी। कुछ साल पहले ही उन्‍हें ग्रैंड नाइन वैराइटी के बारे में पता चला जिससे उनकी उपज 3 गुनी हो गई। बोरोले आज 100 एकड़ में खेती करते हैं।

प्राइमरी स्‍कूल की नौकरी छोड़ी

जलगांव महाराष्‍ट्र के ही रहने वलो ओंकार चौधरी प्राइमरी स्‍कूल में टीचर थे। उन्‍होंने बोरोले के साथ साथ ही केले की खेती शुरू की थी। आज चौधरी भी 120 एकड़ में केले की खेती कर रहे हैं।

उनका अमेरीका की एक कंपनी के साथ कांट्रेक्‍ट भी है जिसको वे हर साल निश्चित दर पर केला बेचते हैं। चौधरी की साल की इनकम भी करोडों रुपए में है।

मौजूदा खेती की तुलना में सिर्फ दस प्रतिशत खर्च में ऐसे करें जीरो बजट खेती

जीरो बजट प्राकृतिक खेती देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र पर आधारित है। एक देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र से एक किसान तीस एकड़ जमीन पर जीरो बजट खेती कर सकता है। देसी प्रजाति के गौवंश के गोबर एवं मूत्र से जीवामृत, घनजीवामृत तथा जामन बीजामृत बनाया जाता है। इनका खेत में उपयोग करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की वृद्धि के साथ-साथ जैविक गतिविधियों का विस्तार होता है।

जीवामृत का महीने में एक अथवा दो बार खेत में छिड़काव किया जा सकता है।जबकि बीजामृत का इस्तेमाल बीजों को उपचारित करने में किया जाता है। इस विधि से खेती करने वाले किसान को बाजार से किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। फसलों की सिंचाई के लिये पानी एवं बिजली भी मौजूदा खेती-बाड़ी की तुलना में दस प्रतिशत ही खर्च होती है ।

सफल उदहारण

गाय से प्राप्त सप्ताह भर के गोबर एवं गौमूत्र से निर्मित घोल का खेत में छिड़काव खाद का काम करता है और भूमि की उर्वरकता का ह्रास भी नहीं होता है। इसके इस्तेमाल से एक ओर जहां गुणवत्तापूर्ण उपज होती है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन लागत लगभग शून्य रहती है। राजस्थान में सीकर जिले के एक प्रयोगधर्मी किसान कानसिंह कटराथल ने अपने खेत में प्राकृतिक खेती कर उत्साह वर्धक सफलता हासिल की है । श्री सिंह के मुताबिक इससे पहले वह रासायिक एवं जैविक खेती करता था, लेकिन देसी गाय के गोबर एवं गोमूत्र आधारित जीरो बजट वाली प्राकृतिक खेती कहीं ज्यादा फायदेमंद साबित हो रही है।

प्राकृतिक खेती के सूत्रधार महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर की मानें तो जैविक खेती के नाम पर जो लिखा और कहा जा रहा है, वह सही नहीं है। जैविक खेती रासायनिक खेती से भी खतरनाक है तथा विषैली और खर्चीली साबित हो रही है। उनका कहना है कि वैश्विक तापमान वृद्धि में रासायनिक खेती और जैविक खेती एक महत्वपूर्ण यौगिक है। वर्मीकम्पोस्ट का जिक्र करते हुये वे कहते हैं…यह विदेशों से आयातित विधि है और इसकी ओर सबसे पहले रासायनिक खेती करने वाले ही आकर्षित हुये हैं, क्योंकि वे यूरिया से जमीन के प्राकृतिक उपजाऊपन पर पड़ने वाले प्रभाव से वाकिफ हो चुके हैं।

आयातित केंचुआ या देसी केंचुआ?

वर्मीकम्पोस्ट खाद बनाने में इस्तेमाल किये जाने वाले आयातित केंचुओं को भूमि के उपजाऊपन के लिये हानिकारक मानने वाले श्री पालेकर बताते है कि दरअसल इनमें देसी केचुओं का एक भी लक्षण दिखाई नहीं देता। आयात किया गया यह जीव केंचुआ न होकर आयसेनिया फिटिडा नामक जन्तु है, जो भूमि पर स्थित काष्ट पदार्थ और गोबर को खाता है।

जबकि हमारे यहां पाया जाने वाला देशी केंचुआ मिट्टी एवं इसके साथ जमीन में मौजूद कीटाणु एवं जीवाणु जो फसलों एवं पेड़- पौधों को नुकसान पहुंचाते है, उन्हें खाकर खाद में रूपान्तरित करता है। साथ ही जमीन में अंदर बाहर ऊपर नीचे होता रहता है, जिससे भूमि में असंख्यक छिद्र होते हैं, जिससे वायु का संचार एवं बरसात के जल का पुर्नभरण हो जाता है । इस तरह देसी केचुआ जल प्रबंधन का सबसे अच्छा वाहक है । साथ ही खेत की जुताई करने वाले “हल “ का काम भी करता है ।

सफलता की शुरुआत

जीरो बजट प्राकृतिक खेती जैविक खेती से भिन्न है तथा ग्लोबल वार्मिंग और वायुमंडल में आने वाले बदलाव का मुकाबला एवं उसे रोकने में सक्षम है । इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाला किसान कर्ज के झंझट से भी मुक्त रहता है । प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक देश में करीब 40 लाख किसान इस विधि से जुड़े हुये आयातित ।

जाने इस डेयरी में क्या है खास जो अमिताभ बच्चन से लेकर अंबानी तक पीते हैं इसका दूध

पुणे के मंचर में चल रही इस डेयरी का दूध अंबानी परिवार, अमिताभ बच्चन, सचिन तेंडुलकर जैसी सेलिब्रिटी तक पीते हैं। यह कोई छोटी-मोटी डेरी नहीं है। 27 एकड़ में फैले एक फार्म में इसका पूरा सेटअप लगा है।

इसमें 3500 गाय हैं। 75 कर्मचारी यहां काम करते हैं। इस डेरी के 12 हजार से ज्‍यादा कस्टमर्स हैं और यहां के दूध की कीमत भी कम नहीं है। यहां का दूध 80 रुपए लीटर बिकता है।

इस फार्म के ऑनर देवेंद्र शाह को देश सबसे बड़ा ग्वाला कहा जाता हैं। वे पहले कपड़े का धंधा करते थे, बाद में दूध के बिजनेस में आ गए। प्राइड ऑफ काउ प्रोडक्ट 175 कस्टमर्स के साथ शुरू किया था।

इनके मुंबई और पूना में 12 हजार से ज्यादा कस्टमर है। इनमें कई सेलेब्स भी शामिल हैं। कई बॉलीवुड से लेकर हाई प्रोफाइल बिजनेसमैन भी शामिल है।

यहां गायों को मिलता है आरो का पानी

गायों को पीने के लिए आरो का पानी दिया जाता है। मौसम को ध्यान में रखकर डॉक्टर चेकअप के बाद गायों को खाना दिया जाता है। दूध निकालने के समय रोटरी में जब तक गाय रहती है तब तक जर्मन तकनीक से उसकी मसाज की जाती है।

2-3 बार सफाई का काम

गायों के लिए बिछाया गया रबर मैट दिन में 3 बार धोया जाता है। यहां 54 लीटर तक दूध देने वाली गाय है। पुराने कस्टमर की रेफरेंस के बिना नहीं बनता नया कस्टमर। हर साल 7-8 हजार पर्यटक डेयरी फार्म घूमने आते है।

दूध निकालने में लगता हाथ

गाय का दूध निकालने से लेकर पैकिंग तक का पूरा काम ऑटोमैटिक होता है। फार्म में दाखिल होने से पहले पैरों पर पाउडर से डिसइंफेक्शन करना जरूरी है। दूध निकालने से पहले हर गाय का वजन और तापमान चेक किया जाता है।

बीमार गाय को डॉक्टर के पास भेजा जाता है। दूध सीधा पाइपों के जरिए साइलोज में और फिर पॉश्चुराइज्ड होकर बोतल में बंद हो जाता है। एक बार में 50 गाय का दूध निकाला जाता है जिसमें सात मिनट लगते हैं।

जीएसटी टेक्स लागू होने से इतने रुपए बढ़ सकते है यूरिया के दाम

देश में गुड्स एंड सर्विस टैक्स यानी जीएसटी एक जुलाई से लागू हो रहा है । जैसे बाकी उद्योगों पर इसका असर पड़ेगा वैसे ही खेती पर इसका असर पड़ेगा ।

लेकिन अफ़सोस की बात है के जीएसटी पास होने के बाद सबसे पहले उर्वरकों पर लगने वाली टेक्स बढ़ जायगी जिस से सभी जरूरी उर्वरकों की कीमत भी काफी बढ़ जायगी ।अब सोचने की बात यह है के पहले से मंदी की मार झेल रहा किसान अब ये नए खर्चे कैसे झेल पाएगा

जीएसटी काउंसिल ने जीएसटी व्यवस्था में उर्वरकों पर लगने वाली टैक्स दर 12% तय की है जबकि अभी ये 4% से 8% टैक्स दायरे में आते हैं।

माना जा रहा है कि इससे सामान्य तौर पर इस्तेमाल होने वाले उर्वरकों और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स के दाम बढ़ जाएंगे। बतौर रिपोर्ट्स, यूरिया के दाम प्रति टन ₹300-₹400 तक बढ़ सकते हैं।

प्राइवेट नौकरी छोड़ कर शुरू की केले की खेती ने बदली किसानो की किस्मत

बिहार के युवा इन दिनों प्राइवेट नौकरी छोड़कर अब केले की खेती करने में लगे हैं। इतना ही नहीं आर्थिक तंगी से जूझ रहे इन युवा किसानों की किस्मत केले की खेती ने चमका दी है। कम लागत में अधिक मुनाफे की इस खेती से आज किसान संपन्न हो रहे हैं।

दो दर्जन से अधिक गांवों में किसान केले की खेती कर रहे हैं। खास बात यह है कि इन किसानों को उद्यान विभाग से कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता। केले की पौध तैयार कर जून-जुलाई और मार्च में दो से ढाई मीटर की दूरी पर बोआई करते हैं।

एक बार फसल बोने के बाद तीन किटंग दो वर्ष में लेते हैं। पहली बार की बोआई में खर्च थोड़ा ज्यादा आता है और समय भी अधिक लगता है। इसके बाद दो-दो पौध जड़ से ही तैयार कर लेते हैं।

एक कटता है तो दूसरा तैयार हो जाता है। केले के बीच में हल्दी, अदरक, सरसों, मसूर, बकला, उड़द आदि की फसल बोकर किसान दोहरा लाभ लेते हैं। एक वर्ष में चार बार पानी चलाना पड़ता है।

एक एकड़ में 18 सौ पौधे

तीन तरह के केले की पौध बिहार के हाजीपुर और गोरखपुर के पीपीगंज क्षेत्र से मंगाते हैं। एक एकड़ में 17 सौ से 18 सौ पौधों को लगाया जाता है।

खेती के पीछे किसानों का आकर्षण लाजमी है। केला की खेती नगदी व्यवसाय है। व्यापारी खेत से ही केला खरीदकर ले जाते हैं। इस खेती से बड़ी संख्या में किसान जहां आत्मनिर्भर हुए हैं, वहीं उनकी आर्थिक तंगी भी दूर हुई है।

इनकी चमकी किस्मत

ततायार के शिव बरन कुशवाहा के दो लड़के संजय कुशवाहा और सत्यप्रकाश कुशवाहा महानगरों में रहकर प्राईवेट नौकरी करते थे। वे चार साल से केले की खेती में जुटे हैं। केले की खेती के मुनाफे ने उन्हें महानगर जाने रोक दिया है। इनके अलावा दर्जनों ऐसे किसान हैं, जो पूरी तरह केले की खेती में रमे हैं।
ऐसे होती है केले की खेती

केले का पौधा जुलाई माह में दो से ढाई मीटर की दूरी पर लगाया जाता है, इस के लिए मई में ही खेत में पौधा लगाने के लिए एक फीट गड्डा तैयार कर उसमें गोबर की खाद डाल दी जाती है। जिसे जुलाई तक खुला रखा जाता है, ताकि उसे खूब लू लग जाये।

एक बार फसल लग जाने के बाद इसकी तीन साल तक पेडी की जाती है। एक एकड जमीन में 1250 पौधे लागए जाते हैं। ज्यादा बारिश भी फसल को नुकसान नहीं पहुचाती है, बल्कि उसे फायदा ही पहुंचाती है। इस फसल में दवाओं के स्प्रे थोड़े से ही करने पडते है। केले की फसल 13 से 15 माह में तैयार हो जाती है। एक एकड जमीन में तीन क्विंटल से साढे तीन क्विंटल तक केला निकल आता है। बरहाल किसान केले की खेती से खुश है।

परंपरागत खेती में हो रहा है घाटा

बता दें कि रामपुर जिले के किसान मुख्य रूप से धान, गेंहू, गन्ना और मेंथा की खेती करते रहें हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों से मौसम की मार कहे या सरकार की उदासीनता जिसकी वजह से किसान घाटे में जी रहें हैं।

गेंहू और धान की फसलों में लागत ज्यादा और कीमत कम मिल रही है। इसकी वजह से किसान कर्ज के बोझ में दब रहें हैं। ऐसे हालात में किसान दूसरे विकल्प तलाश रहे थे। जिसे केले की खेती ने पूरा किया है। किसानों को केले की खेती से काफी फायदा हो रहा है।

आ गया ब्राजील का कैक्टस अब बंजर भूमि में भी मवेशियों को मिलेगा चारा

कैक्टस एक ऐसा पौधा है जो हर तरह की बंजर और ज़मीन में उग सकता है ।और सोचो अगर इसके इस्तेमाल से पशुआ का चारा बन जाये तो कभी भी कहीं ही चारे की कमी नहीं आयगी। आने वाले दिनों में सूखे क्षेत्र और बंजर जमीन का उपयोग कैक्टस के उत्पादन के लिए किया जा सकेगा। मवेशियों को चारे के लिए कैक्टस की 24 प्रजातियों का उपयोग किसान कर सकेंगे। कैक्टस ब्राजील में पाया जाता है जहां से अब इसे इकार्डा सेंटर लाया गया है।

इस पर शोध किए जा रहे हैं। इकार्डा सेंटर इंटरनेशनल सेंटर फार एग्रीकल्चर रिसर्च इन द ड्राय एरिया के वैज्ञानिक शोघ कार्य में जुटे हुए हैं। यहां पर 24 सितंबर 2014 को ब्राजील से कैक्टस मंगाया गया था। यहां पर 24 पैड मंगाए गए थे जिनमें से ओरेला डे एलीफेंटा मेक्सीकाना प्रुमख हैं। अब यह 3 एकड़ के रकबे में लगा है।

अन्य कामों में भी होता है उपयोग

इकार्डा सेंटर के फार्म मैनेजर विवेक सिंह तोमर ने बताया 24 किस्मों पर शोध चल रहा है। चारे की ये उत्तम किस्में हैं। दो साल पहले ब्राजील से इसे लाया गया था। इस साल इसके पौधों की ऊंचाई दो फीट और चौड़ाई डेढ़ फीट तक हो गई है। बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी होगा।

इससे ये होते हैं फायदे

कैक्टस बंजर भूमि पर भी हो सकता है। इसके लिए पानी होना लाजमी नहीं है। यह बिना पानी के ही बेहतर उत्पादन देता है। ये चारे के काम आता है। पशु पालकों को इसकी 24 किस्में मिल पाएंगी। इसका उपयोग औषधियों के निर्माण में भी होता है। खासकर सौंदर्य प्रसाधन के लिए इसका उपयोग होता है। इसका गूदा चाॅकलेट बनाने के काम भी आता है। इसका उपयोग पेय प्रदार्थों के लिए भी होता है। मवेशियों के दूध के उत्पादन की क्षमता भी बढ़ जाती है।

मलचिंग तकनीक से खेती, आधे पानी से दोगुनी फसल

21वीं सदी में खेती की बात आते ही झट से आपके मन में सवाल आता है कि अब कौन सी तकनीक है जो खेतों में उत्पादन बढ़ा सकती है और किसान की जेब भर सकती है। नई तकनीकों की लंबी फेहरिस्त में इस बार किसानखबर.कॉम आपके लिए लेकर आया है प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक (Plastic Mulching) की पूरी जानकारी।

प्लास्टिक मल्चिंग क्या है।

खेत में पौधों की जमीन को चारों तरफ से प्लास्टिक की एक फिल्म के जरिए सही ढंग से कवर करने (ढकने) की तकनीक को प्लास्टिक मल्चिंग कहते हैं। यह फिल्म कई साइज, क्वालिटी और कई रंगों में बाजार में मिलती है।

इस तकनीक का क्या फ़ायदा होता है।

अगर आप मिट्टी में कम नमी और मिट्टी के कटाव से परेशान हैं तो ये तकनीक आपके लिए बेहद ही कारगर साबित हो सकती है। इस तकनीक के जरिए खेत में पानी की नमी को बनाये रखने में तो मदद मिलती ही है साथ ही सूरज की तेज धूप के कारण मिट्टी से पानी सोख लेने की समस्या से भी निजात मिल जाती है।

इस तकनीक की मदद से खेत में मिटटी का कटाव रोकने के साथ साथ खतपतवार को भी सफलतापूर्वक रोका जा सकता है।

अगर आप बागवानी करते हैं तो फिर आपको प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक से बागवानी में होने वाले खतपतवार को रोकने के अलावा पोधों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने में बहुत मदद मिलेगी। इसके अलावा जमीन के कठोर होने की परेशानी भी खत्म होती है और पौधों की जड़ों का विकास भी अच्छे से होता है।

कैसे होता है सब्जियों की फसल में प्लास्टिक मल्चिंग का इस्तेमाल

जिस खेत में सब्जी वाली फसल लगानी हें उसे पहले अच्छे से जुताई कर ले। इस बीच मिट्टी की जांच करवा लें। जांच की रिपोर्ट के हिसाब से जोते हुए खेत में गोबर की खाद उचित मात्रा में डाल दें। इसके बाद खेत में उठी हुई क्यारियां बनाएं। फिर उनके ऊपर ड्रिप सिचाई की पाइप लाइन को बिछाए।

सब्जियों की खेती के लिए 25 से 30 माइक्रोन लास्टिक मल्च फिल्म बेहतर होती है। इस फिल्म को उचित तरीके से बिछाते जाएं और फिल्म के दोनों किनारों को मिटटी की परत से दबाते जाएं। इसे आप ट्रैक्टर से चलने वाली मशीन से भी दबा सकते हैं।

इसके बाद आपको उस फिल्म पर गोलाई में पाइप से दो पौधों की बराबर दूरी तय करके छेद करने होंगे। फिर इन छेंदों बीज या नर्सरी में तैयार पौधों का रोपण करना होगा।

फल वाली फसल में कैसे होता है प्लास्टिक मल्चिंग का इस्तेमाल

फल वाले पौधों के लिए 100 माइक्रोन की लास्टिक की फिल्म मल्च अच्छी रहती है। अगर आपने खेत में फलदार पौधे लगाएं हैं तो फिर इसका इस्तेमाल वहां तक करिए जहां तक पौधे की छाव रहेगी। इसके लिए फिल्म मल्च की सही लम्बाई-चौड़ाई में काट लें। इसके बाद पौधों के नीचे के नीचे उग रही घास और खरपतवार को पूरी तरह हटा दें।

फिर सिंचाई का नली को सही ढंग से सेट करने के बाद 100 माइक्रोन की लास्टिक की फिल्म मल्च को पौधों के तने के आसपास अच्छे से लगाना होता है। इसके बाद उसके चारो कोनो को 6 से 8 इंच तक मिटटी की परत से ढकना जरूरी होगा।

प्लास्टिक मल्चिंग करते समय क्या सावधानियां बरतें।

  • प्लास्टिक फिल्म हमेशा सुबह या शाम के समय लगानी चाहिए।
  • फिल्म में ज्यादा तनाव यानी टाइट नहीं लगानी चाहिए। उसको थोड़ा ढीला छोड़ना चाहिए।
  • फिल्म में जो भी सल हो उसे निकलने के बाद ही मिटटी चढ़ावे।
  • फिल्म में छेद करते वक्त सावधानी से करें और सिचाई नली का ध्यान रख के लगाएं।
  • छेद एक जैसे हो और फिल्म न फटे।
  • मिटटी चढाने में दोनों साइड एक जैसी रखें
  • फिल्म की घड़ी (फोल्ड करना) हमेशा गोलाई में करें
  • फिल्म को फटने से बचाएं, ताकि उसका उपयोग दूसरी बार भी कर पाए और उपयोग होने के बाद उसे सुरक्षित रखें।

लागत कितनी आती है?

प्लास्टिक मल्चिंग की लागत कई बातों पर निर्भर करती है। जैसे क्यारियां का साइज क्या है और बाजार में फिल्म का मौजूदा रेट क्या है। रेट हर साल कम-ज्यादा होते रहते हैं। लेकिन फिर भी अगर औसत लागत की बात करें, तो औसत लागत प्रति बीघा लगभग 8 हजार रूपए तक आती है।

सरकारी अनुदाना मिलता है क्या?

देश की कई राज्य सरकारों ने प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक का इस्तेमाल करने पर किसानों को अनुदान की सुविधा दे रखी है। मध्य प्रदेश सरकार प्लास्टिक मल्चिंग की लागत का 50 प्रतिशत या फिर अधिकतम 16 हजार रूपए प्रति हेक्टेयर का अनुदान दे रही है।