ऐसे शुरू करें अपना खुद का डेयरी फार्म

आजकल डेयरी फार्म का कारोबार शुरू कर के कोई बेरोजगार या किसान खासी कमाई कर सकता है| पारंपरिक खेती से ऊब चुके या घाटा उठा चुके किसानों के लिए डेयरी फार्म सौगात की तरह है|

सब से खास बात यह है कि सरकार और कई संस्थाएं इस कारोबार को चालू करने के लिए कई तरह की सुविधाएं मुहैया करा रही हैं, जिस का फायदा उठा कर खुद की माली हालत को सुधारा जा सकता है और कुछ जरूरतमंदों को रोजगार भी दिया जा सकता है| इस कारोबार की खास बात यह है कि कम से कम 2 गायों से भी डेयरी फार्म की शुरुआत की जा सकती है|

लघु डेयरी फार्म : उन्नत नस्ल की 2 गायों के साथ लघु डेयरी फार्म शुरू किया जा सकता है| इस पर कुल खर्च 1 लाख 10 हजार रुपए होता है, जिस में 65 फीसदी यानी 70 हजार 850 रुपए बैंक से कर्ज मिल सकता है और लागत का 25 फीसदी यानी 27 हजार 250 रुपए गव्य विकास निदेशालय की ओर से मुहैया कराए जाते हैं|

फार्म शुरू करने वाले को अपनी जेब से करीब 11 हजार रुपए लगाने होंगे| चारा, दाना, पशु बीमा और इलाज पर हर साल करीब 65 हजार रुपए खर्च होते हैं और बैंक कर्ज चुकाने में हर साल 20 हजार रुपए खर्च होंगे| दूध और बछियाबछड़े बेच कर सवा लाख रुपए तक की कमाई हो सकती है| इस में चारा और लोन चुकाने का खर्च घटा दिया जाए तो सालाना 42 हजार रुपए का शुद्ध मुनाफा हो जाता है|

मिनी डेयरी फार्म : उन्नत किस्म की 5 गायों से मिनी डेयरी फार्म लगाया जा सकता है| इस में करीब 2 लाख 70 हजार रुपए की लागत आती है, जिस में 65 फीसदी यानी 1 लाख 75 हजार रुपए बैंक से कर्ज और 25 फीसदी यानी 67 हजार रुपए विभाग से अनुदान के रूप में आसानी से हासिल किए जा सकते हैं|

डेयरी फार्म लगाने वाले को कुल लागत का 10 फीसदी यानी करीब 27 हजार रुपए का जुगाड़ करना पड़ेगा| मिनी डेयरी फार्म से हर साल करीब 90 हजार रुपए की शुद्ध कमाई की जा सकती है| गायों को खिलाने, इलाज और बीमा वगैरह पर सालाना 1 लाख 90 हजार रुपए और बैंक का कर्ज चुकाने में करीब 46 हजार रुपए खर्च हो जाएंगे|

मिडी डेयरी फार्म : उन्नत नस्ल की 10 गायों से मिडी डेयरी फार्म खोला जा सकता है| इसे खोलने पर कुल 5 लाख 50 हजार रुपए का खर्च बैठता है| जिस में 70 फीसदी यानी 3 लाख 85 हजार रुपए बैंक से कर्ज मिल सकता है| और लागत का 20 फीसदी यानी 1 लाख 10 हजार रुपए गव्य विकास निदेशालय की ओर से मुहैया कराए जाते हैं| फार्म शुरू करने वालों को अपनी जेब से करीब 55 हजार रुपए लगाने पड़ते हैं|

चारा, दाना, मजदूरी, पशु बीमा और इलाज पर हर साल करीब 3 लाख 67 हजार रुपए खर्च होते हैं और बैंक कर्ज चुकाने में हर साल 1 लाख 8 हजार रुपए खर्च हो जाएंगे| दूध व बछियाबछड़े बेच कर 6 लाख 37 हजार रुपए तक की कमाई हो सकती है| इस में चारा और लोन चुकाने का खर्च घटा दिया जाए तो सालाना 1 लाख 62 हजार रुपए का शुद्ध मुनाफा हो जाएगा|

व्यावसायिक डेयरी फार्म : इस दर्जे का डेयरी फार्म शुरू करने में करीब 15 लाख रुपए की लागत आएगी| इस के लिए कम से कम उन्नत नस्ल की 20 गायों की जरूरत पड़ती है| इस के लिए लागत का 75 फीसदी यानी साढ़े 10 लाख रुपए बैंक कर्ज और 15 फीसदी यानी करीब 2 लाख रुपए विभागीय अनुदान के रूप में हासिल किए जा सकते हैं|

हर साल गायों को खिलाने, इलाज कराने, बीमा और मजदूरी वगैरह पर साढ़े 7 लाख रुपए और बैंक का लोन चुकाने पर 2 लाख 70 हजार रुपए खर्च हो जाएंगे| दूध व बछियाबछड़े बेच कर 12 लाख 75 हजार रुपए फार्म मालिक के हाथ में आएंगे और सारा खर्च काट कर 1 साल में 2 लाख 70 हजार रुपए की शुद्ध कमाई होगी|

 

 

 

ऐसे करें जीरे की उन्नत खेती

जलवायु- जीरे की फसल को शुष्क एवं साधारण ठंडे मौसम की आवश्यकता होती है। बीज पकने के समय शुष्क एवं साधारण गर्म मौसम जीरे की फसल के लिए अच्छा रहता है। अधिक वायुमण्डलीय नमी, रोग व कीड़ों को पनपाने में सहायक होती है तथा जीरे की फसल पाला सहन करने में असमर्थ होती है।

उपयुक्त किस्में- आर.जेड. – 19, आर.जेड. – 209, आर.जेड़. – 223, गुजरात जीरा -4 (जी.सी-4)

भूमि तथा भूमि की तैयारी – जीवांश युक्त दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास की उचित व्यवस्था हो जीरे की खेती के लिए उपयुक्त होती है। बुवाई से पूर्व यह आवश्यक है कि खेत की तैयारी ठीक तरह की जाये इसके लिये खेत को अच्छी तरह से जोत कर उसकी मिट्टी को भुरभुरी बना लिया जाए।

खाद एवं उर्वरक – जीरे की अच्छी पैदावार लेने के लिये 10 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से जुताई से पहले गोबर की अच्छी तरह से सड़ी हुई खाद खेत में बिखेर कर मिला देना चाहिये। एक औसत उर्वर भूमि में 30 किलो नत्रजन एवं 20 किलो फास्फोरस प्रति हैक्टेयर की दर से दें।

फास्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई पूर्व आखिरी जुताई के समय भूमि में मिला देना चाहिये एवं नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के 30-35 दिन बाद एवं शेष 15 किलो नत्रजन बुवाई के 60 दिन बाद सिंचाई के साथ दे। बुवाई के समय 20 किलो प्रति हैक्टेयर गंधक खेत में डालें।

बीजदर व बीजोपचार – जीरे का 12 किलोग्राम बीज एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पर्याप्त है। बीज जनित रोगों से बचाव के लिए बुवाई से पूर्व जीरे के बीज को 2 ग्राम कार्बेण्डाजिम 50 डब्ल्यू.पी. प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित कर बोना चाहिए।

बुवाई का समय व तरीका- जीरे की बुवाई मध्य नवम्बर के आसपास कर देनी चाहिये। बुवाई आमतौर पर छिटकवां विधि से की जाती है। तैयार खेत में पहले क्यारियां बनाते है। उनमें बीजों को एक साथ छिटक कर क्यारियों में लोहे की दंताली इस प्रकार फीरा देनी चाहिए कि बीज के ऊपर मिट्टी की एक हल्की सी परत चढ़ जाये। कतारों में बुवाई के लिए क्यारियों में 25-30 सेन्टीमीटर की दूरी पर लोहे या लकड़ी के बने हुक से लाईने बना देते हैं। बीजों को इन्हीं लाईनों में डालकर दंताली चला दी जाती है।

सिंचाई- पहली हल्की सिंचाई बुवाई के तुरन्त बाद की जाती है। इस सिंचाई के समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि क्यारियों में पानी का बहाव अधिक तेज न हो। दूसरी सिंचाई बुवाई के एक सप्ताह पूरा होने पर जब बीज फूलने लगे तब करें। इसके बाद मृदा की संरचना तथा मौसम के अनुसार 15-25 दिन के अन्तराल पर 5 सिंचाईयां पर्याप्त होगी। फव्वारा विधि द्धारा बुवाई समेत पांच सिंचाईयां बुवाई के समय, दस, बीस, पचपन एवं अस्सी दिनों की अवस्था पर करें। फव्वारा तीन घण्टे ही चलायें।

निराई-गुड़ाई – प्रथम निराई-गुड़ाई बुवाई के 30-35 दिन बाद व दूसरी 55-60 दिन बाद करनी चाहिये।

कटाई- जीरे की फसल 120 दिन में पककर तैयार हो जाती है। फसल को दांतली से काटकर अच्छी तरह सूखा लेवें।

उपज – उपयुक्त उन्नत कृषि विधियां अपनाने से 6 से 10 क्विंटल प्रति हैक्टेयर जीरा की उपज प्राप्त की जा सकती है।

भण्डारण – भण्डारण करते समय दानों में नमी की मात्रा 8-9 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। संग्रहित जीरे को समय-समय पर धूप में रखें।

अब बाबा रामदेव ले के आ रहे है पतंजलि के आर्गनिक बीज, जाने क्या है खास ?

योग और आयुर्वेद के क्षेत्र में काम करने बाद पतंजलि योगपीठ पर देश में कृषि क्रांति करने की तैयारी में है। इसके लिए गेहूं और धान की नई प्रजाति का बीज तैयार कर लिया गया है।  इसके साथ ही सब्जियों के क्षेत्र में भी बड़ा काम शुरू हो चुका है। आर्गेनिक बीज उपलब्ध कराने के लिए उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की कई जमीनों का उपयोग किया जा रहा है। कृषि कार्यों के लिए बाबा रामदेव ने करीब 500 एकड़ भूमि पर आर्गेनिक खेती शुरू कर दी है।

गौरतलब है कि बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण का उद्देश्य देश में रसायनिक खादों का उपयोग समाप्त कराना है। इस दिशा में एक लंबी कार्ययोजना भी तैयार की गई है। आचार्य बालकृष्ण मानते हैं कि इस कार्य में काफी समय लगेगा, लेकिन यह होकर रहेगा। उनका कहन है कि रसायनिक खादों से तैयार फल सब्जी और अनाज खा-खाकर पूरा देश बीमार हो गया है।

जब तक देश में कंपोस्ट खाद और गोबर खाद का प्रयोग होता था, असाध्य बीमारियां देश में नहीं आती थी।समय के साथ जमीन की उर्वरकता समाप्त होती चली गई। अब जमीनें भी जहर उगलने लगी हैं। आचार्य ने बताया कि इसे देखते हुए पतंजलि योगपीठ ने कृषि क्रांति की तैयारी की है। योजना है कि तमाम देश के किसानों को आर्गेनिक बीज उपलब्ध कराए जाएं। यह कार्य पतंजलि में पहले ही प्रारंभ हो चुका था।

बाबा रामदेव ने बताया कि देश में समय-समय पर खेती के क्षेत्र में नए प्रयोग होते रहे हैं। पतंजलि के वैज्ञानिकों ने गेहूं और धान की नई प्रजाति तैयार की है, जो अधिक उपज प्रदान करती है। इसके बीज कुछ क्षेत्रों में भेजे गए हैं।

योजना है कि बड़े पैमाने पर बीज तैयार कराए जाएं और फिर उनका वितरण देशभर के कृषि केंद्रों पर किया जाए। इन दिनों दो प्रदेशों की 500 एकड़ भूमि पर उन्नत फसल तैयार करने का काम चल रहा है। उन्होंने बताया कि बीज तैयार करने का काम देश के किसानों को भी सौंपा जाएगा। उद्देश्य है कि आर्गेनिक खाद से किसान अपना बीज स्वयं तैयार करें।

गाय जो रोजाना देती है 65 लीटर दूध,खुराक जानकर रह जाओगे हैरान

एक दिन में 65 लीटर दूध देने वाली गाय देखी है क्या आपने। अगर नहीं तो आज देख लीजिए। इसकी खुराक आपको हैरान कर देगी । हरियाणा दूध के लिए अपनी अलग पहचान रखता है। शायद हरियाणा कुलदीप जैसे कई डेयरी फार्मर की वजह से आज भी अपनी पहचान को बरकरार रख पाया है।

कुलदीप की एक गाय हर रोज 65 लीटर दूध देती है। गाय का नाम एंडेवर है। गाय एंडेवर 5 साल की है वह । हर रोज 65 लीटर दूध देती है। दूध दिन में तीन बार 8 घंटे के अंतराल के बाद निकाला जाता है। वे सुबह 5 बजे फिर दोपहर 1 बजे और रात को 9 बजे दूध निकालते हैं।

कुलदीप 27 साल के युवा हैं और पुश्तैनी बिजनेस संभाल रहे हैं। करनाल के दादूपुर गांव के डेयरी फार्मर कुलदीप ने बताया कि उसकी । गाय की नस्ल होल्सटीन फ्रीजन है, जो विदेशी यानी हॉलैंड की नस्ल है। गाय के लिए उन्होंने यूएसए से सीमन मंगाया था।

इन गायों की खुराक सुनेंगे तो आप यकीन नहीं कर पाएंगे, एक गाय को हर रोज 35 किलो साइलेज, 20 किलो हरा चारा, 12 किलो फीड, 5 किलो चने खा जाती है। इसके अलावा मौसमी सब्जियां मिलती हैं वो अलग।

वे अपनी तीन गायों का दूध बेचकर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। उन्होंने अभी तक किसी गाय की कीमत नहीं लगवाई है।कुलदीप के पास 3 गाय 26 बार अलग-अलग जगह दूध देने की प्रतियोगिताओं में चैंपियन रह चुकी हैं।

गन्ना किसानो को राहत इतने रुपए बढ़ा गन्ने का समर्थन मूल्‍य

मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति (सीसीईए) ने 2017-18 के लिए गन्ने का समर्थन मूल्‍य (एफआरपी) 25 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाने को मंजूरी दे दी है.
अक्‍टूबर से शुरू होने वाले 2017-18 के इस खरीद मौसम में गन्ना एफआरपी को 255 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है. मौजूदा 2016-17 के खरीद मौसम में गन्ने का एफआरपी 230 रुपये प्रति क्विंटल है.

क्या है एफआरपी?

एफआरपी वह न्यूनतम मूल्य होता है, जिस पर गन्ना किसानों का कानूनन गारंटीशुदा अधिकार होता है. हालांकि राज्य सरकारों को अपने राज्य में राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) तय करने का अधिकार होता है या चीनी मिलें एफआरपी से अधिक किसी भी मूल्य की किसानों को पेशकश कर सकती हैं.

मंत्रालय ने उसी दर की सिफारिश की थी, जिसकी सिफारिश कृषि लागत और कीमत आयोग (सीएसीपी) ने की थी. यह एक सांविधिक निकाय है, जो सरकार को प्रमुख कृषि उत्पादों का मूल्य निर्धारित करने के बारे में सलाह देता है.

खाद्य मंत्रालय ने 2017-18 के खरीद मौसम के लिए गन्ना एफआरपी 255 रुपये प्रति क्विंटल करने और इसे चीनी प्राप्ति की दर 9.5 प्रतिशत से जोड़ने की सिफारिश की थी. प्राप्ति दर से मतलब गन्ना की पेराई से चीनी प्राप्त करने के अनुपात से है.

अब मिल्क टेस्ट से ही पता चल जाएगा कि पशु गर्भ से है या नहीं

अब दुधारू पशुओं की गर्भावस्था मिल्क टेस्ट से ही एक महीना पहले पता चल जाएगी। इसके लिए कारगिल कंपनी ने बठिंडा में अपनी लेबोरेट्री स्थापित की है। यह डेयरी किसानों के लिए नई तकनीक लेकर आया है जिसमें दुधारू पशुओं की प्रेग्नेंसी के समय गाय में हार्मोन्स की जाँच करके उनके गर्भवास्था का पता लगाया जा सकता है।

इसे प्रेग्नेंसी के लिए मार्कर के तोर पर इस्तेमाल किया जायेगा। इस दिशा में कारगिल ने बठिंडा में एक मिल्क टेस्टिंग प्रयोगशाला की स्थापना की है जिसकी क्षमता हर साल 1 लाख सैम्पल का परीक्षण करने की है।

कारगिल की ओर से लाया गया मिल्क प्रेग्नेंसी टेस्ट प्रजजन के 28 दिनों पहले ही गर्भ अवस्था की स्थिति बता देता है जो की पारम्परिक पद्धति की तुलना में 1 महीना पहले है। इसके उत्पादक प्रजनन के लिए तैयार पशुओं की पहचान कर सकता है जिससे समय पर प्रजनन को सुनिचित किया जा सकता है।

60 दिनों तक इंतज़ार करने की जरूरत नहीं

पारंपरिक तौर पर किसानो को 60 दिनों तक इंतज़ार करने की जरूरत होती है और पशु चिकित्सक हाथ से इस बात की जाँच करता है की गाय गर्भवती है या नहीं इसमें अधिक समय लगता है और इसमें खर्च भी ज्यादा आता है।

इस मौके पर विक्रम भंडारी का कहना है की ये पहली कम्पनी है और किसानो को देखते हुए इस टेक्नॉलाजी को लाया गया है। इससे पहले उन्होंने ग्लोबल टीम के साथ बात की फिर वह इस तकनीक को लेकर आये। अमृतसर में तकनीक शुरू करने के बाद इसे जीरा लुधियाना और बाकी पंजाब में भी इस तकनीक को लाया जायेगा।

एेसे कर सकते हैं परीक्षण

इसके लिए डेयरी किसानों को 300 रुपए की एक किट खरीदनी होगी। उसके बाद किट के जरिये मिल्क सेम्पल को उनकी लेबोरेट्री में भेज सकते है।

एप्पल बेर का बाग लगाएं ,15 साल बगैर पूंजी का उत्पादन पाएं

एप्पल बेर लांग टाइम इंवेस्टमेंट है। इससे एक बार फसल लेने के बाद करीब 15 साल तक फसल ले सकते हैं। कम रखरखाव व कम लागत में अधिक उत्पादन के कारण किसान इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं।

बेर… लगभग सबने खाया और देखा होगा, लेकिन एप्पल जैसा आकार और खाने में बेर का स्वाद, यह शायद पहली बार ही सुना होगा, लेकिन यह सच्चाई है।  थाईलैंड का यह फल इंडिया में थाई एप्पल बेर के नाम से प्रसिद्ध है। थाईलैंड में इसको जुजुबी भी कहते हैं।

राजस्थान के सीकर के  रसीदपुरा गांव के अरविन्द और आनंद ने ऐसे ही बेर अपने 21 बीघा खेत में उगा रखे हैं। आनंद बताते हैं कि 14 माह पहले इस फल के 1900 पेड़ खेत में लगाए गए थे। यह दूसरा मौका है जब पेड़़ों में फल आए हैं।

पांच वर्ष बाद उन्हें 21 बीघा के इस खेत से सालाना करीब 25 लाख रुपए की आय होने वाली है। उन्हें इस वर्ष करीब आठ लाख रुपए की आय होगी। उनकी प्रेरणा लेकर करीब 50 और खेतों में थाई एप्पल बेर के पेड़ लगाए गए हंै।

चार माह में फल

बकौल अरविन्द और आनंद पेड़ लगाने के चार माह बाद इसमें फल आना शुरू हो जाता है। पहली बार फल प्रति पेड़ में दो से पांच किलो, दूसरी बार में प्रति पेड़ 20 से 40 और पांच वर्ष बाद प्रति पेड़ में एक से सवा क्विटल फल आते हैं। इसके लिए सीकर का क्षेत्र अनुकूल है। यह माइनस डिग्री से +50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी कारगर हुआ है। उनका कहना है कि अप्रेल माह में इसके पेड़ को नीचे से गन्ना की तरह काट दिया जाता है।

दिसंबर तक इसके फलों को बाजार में सप्लाई किया जा सकता है। यह बेर 60 से 120 ग्राम वजनी होता है। आनंद के पिता किशोर सिंह थाईलैंड गए थे। वहां पर थाई एप्पल बेर की खेती देखकर आए थे। इसके बाद हम दोनों भाइयों ने नेट पर इसके बारे में पढ़ा। अहमदाबाद जाकर इसकी खेती देखी। सीकर में इसका प्रयोग किया तो सफल रहा।

सेब व बेर के मिश्रित स्वाद वाले फल की मांग इंदौर, अहमदाबाद, वडोदरा, मुंबई समेत बड़े शहरों में बढ़ रही है। बेर के खरीदार अधिकांश निजी कंपनियां है। वे इन्हें विदेशों में निर्यात करती हैं। इसके आकर्षक रूप व स्वाद के कारण स्थानीय बाजारों में इसकी मांग बढ़ रही हैं।  पहले साल में  एक पौधे से 60 से 70 किलो का उत्पादन मिला। बाजार में इसका भाव 45 से 50 रुपए किलो तक जाता है।

अब किसान भी करेंगे हड़ताल ! एक जून से शुरू होगा महाराष्ट्र के किसानो का हड़ताल

महाराष्ट्र के विभिन्न किसान संगठनों की समन्वयन समिति किसान क्रांति ने आज कहा कि अपनी समस्याओं की ओर राज्य सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए वह एक जून से राज्य-व्यापी किसान हड़ताल पर अटल है।

किसानो ने कहा के अब वो सिर्फ अपने लिए ही फसल बोयेंगे। शहर में दूध,सब्ज़ी,फल बेचना बांध, मंडियों में जाना बंध ।किसानो की मुख्या मांगे है स्वामीनाथन रिपोर्ट लागु करना , किसानों का कर्ज़ा माफ़ करना, नि:शुल्क बिजली आपूर्ति की मांग हर फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करना और फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही उठाना इत्यादि

किसान क्रांति के प्रवक्ता धनंजय धोरडे ने पीटीआई से कहा, अहमदनगर जिले से पुंताम्बा में किसानों के 200 से ज्यादा प्रतिनिधि एकत्र हुए और प्रदर्शन जारी रखने का फैसला लिया।

धोरडे ने कहा, पहले ही अहमदनगर, नासिक और औरंगाबाद जिले के 40 गांवों के विभिन्न ग्राम पंचायतों से समर्थन जुटा रहे 2000 से अधिक किसानों ने घोषणा कर दी है कि 31 मई तक उनकी मांगे नहीं माने जाने पर वह अपने उत्पाद बाजार में नहीं बेचेंगे।

आज की बैठक में शामिल हुए एक किसान कार्यकर्ता का दावा है कि मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस अहमदनगर में भाजपा से जुड़े कुछ किसानों को मंत्रालय में बैठक के लिए बुलाकर किसान समुदाय को बांट रहे हैं।

कार्यकर्ता ने कहा, मुख्यमंत्री ने हाल ही में भाजपा से जुड़े कुछ किसानों के साथ मंत्रालय में बैठक की थी, जिसके बाद उन्होंने प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन वापस लेने की घोषणा की थी।उन्होंने कहा, यह उन किसानों के बीच फूट डालने का प्रयास है जो दूध और सब्जी सहित अपने उत्पाद शहरी बाजार में नहीं बेचने पर अटल हैं।

धोरडे ने कहा, हड़ताल के दौरान बाजार में कोई कृषि उत्पाद नहीं बेचा जाएगा और नाहीं किसी नये फसल की बुआई होगी।

15 दिन में बने युवा किसान ने सिर्फ 40 दिन में किया 14 टन खीरे का उत्पादन

सुनने में थोड़ा फ़िल्मी सा लगता है लेकिन ये बात बिलकुल सच है । एक नए बने किसान ने वो कर दिखया जो शयद दूसरे किसान सोच भी ना सकें । एमबीए के बाद इस युवा की व्यवसायी बनने की ख्वाहिश थी।

लेकिन पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाने के बाद उसे लगा कि हर सेक्टर में मंदी है, लेकिन कृषि में नहीं। इसी सोच ने उसे तमिलनाडु पहुंचा दिया। यहां टैरेस गार्डन और पॉली हाउस में फसलों का उत्पादन लेना सीखा।

15 दिन बाद खंडवा लौटा और सिहाड़ा रोड पर आधे एकड़ में पॉली हाउस और आधे में नेट हाउस खोल दिया। ये कहानी है 29 साल के युवक किसान श्रेय हूमड़ की। श्रेय ने पहले ही प्रयास में 14 टन खीरा का उत्पादन किया है। पढ़ें, श्रेय की सक्सेस स्टोरी…

– श्रेय ने बताया कि 2010-11 में इंदौर से एमबीए करने के बाद खंडवा में पिता का बिजनेस संभाला।
– इस दौरान देखा कि ऑटोमोबाइल से लेकर अन्य सेक्टरों में मंदी का दौर आया। लेकिन कृषि में आज तक कभी ऐसा नहीं आया।
– मैंने केलकुलेशन किया कि आने वाले दौर में फूड में अच्छा स्कोप है। मैं तमिलनाडु के मदुराई व अन्य शहरों में गया।
– यहां टैरेस गार्डन और पॉली हाउस देखे। आइडिया अच्छा लगा। खंडवा लौटकर इसके बारे में तीन महीने तक रिसर्च किया।
– इसके बाद लीज पर एक एकड़ जमीन ली। शासन की योजना का लाभ लिया। आधे एकड़ में पॉली हाउस और आधे में नेट हाउस खोल दिया।
– पॉली हाउस से श्रेय ने 40 दिन में 14 टन खीरा का उत्पादन लिया। उन्होंने कहा मार्केट में दूसरों की ककड़ी 10 से 12 रुपए किलो थोक में बिकती है।
– हमारी 18 से 20 रुपए तक बिक जाती है। इसी तरह श्रेय ने टमाटर, मैथी, लौकी व धनिया सहित अन्य सब्जियां भी ली हैं। उन्हें इनके दाम भी अच्छे मिले।
– श्रेय ने बताया कि इसके बीज उन्होंने पुणे से मंगवाए हैं, इसमें अंदर बीज नहीं निकलते हैं। जब ये पकने के कगार पर आ जाती है जब बीज बनते हैं।
– श्रेय ने कहा मेरे परिवार में कोई भी किसान नहीं है। मैंने भी कभी नहीं सोचा था कि मैं किसान बनूंगा। लेकिन इस क्षेत्र में अच्छा स्कोप है।

पॉली हाउस और नेट हाउस में उत्पादन ज्यादा

श्रेय ने बताया कि परंपरागत खेती के मुकाबले पॉली हाउस और नेट हाउस में उत्पादन भी ज्यादा और उन्नत क्वालिटी का होता है। पॉली हाउस में जो भी सब्जियां लगाई जाती हैं, उसे किसान जितना भी खाद, पानी और ऑक्सीजन देगा, उतना ही फसलों को मिलेगा।

इसमें बारिश का पानी भी अंदर नहीं जा सकता। नेट हाउस में भी प्रकाश और बारिश का पानी आधा अंदर आता है और आधा बाहर जाता है। यह गर्मी और ठंड में फसलों के लिए अच्छा होता है, जबकि पॉली हाउस सभी सीजन में फसलों के लिए फायदेमंद होता है।

व्यवसायी की तरह सोचना होगा किसानों को

सूखे और बेमौसम बारिश की मार झेल रहे किसान संकट के दौर से गुजर रहे हैं। कई किसान मौत को भी गले लगा चुके हैं। वहीं श्रेय का मानना है कि किसान इस संकट से बच सकता है। किसानों को व्यवसायी की दृष्टि से सोचना होगा। उसे एक बार में एक के बजाय तीन-चार फसलें लेना होगी।

श्रेय कहते हैं वर्तमान में किसान जिस भी खाद्य वस्तु के दाम बढ़ते हैं, उसे बड़ी मात्रा में बो देते हैं। ऐसे में निश्चित तौर पर उत्पादन ज्यादा होता है और मांग कम हो जाती है। दाम कम मिलते हैं फिर वह रोता है।

बारहमासी आम की अनोखी किस्म विकसित सिर्फ एक साल के अंदर ही देने लगती फल

पहले अगर आप को ताज़े आम खाने का मन होता था तो आप को गर्मी का इंतज़ार करना पड़ता था क्यूंकि अभी तक आम साल में एक बार ही फल देता है, लेकिन अब आम की अनोखी किस्म विकसित की है जिसको लगाकर साल में दो बार आम का उत्पादन पा सकते हैं। यही नहीं ये किस्म साल के अंदर ही फल भी देने लगती है।

उत्तर प्रदेश में गोंडा जिले के गौरा चौकी के मुकुल कांति दास (50 वर्ष) ने आम की नयी किस्म ‘विपुल’ विकसित की है, बंगाल के रहने वाले मुकुल 1980 में गोंडा में आ गए थे। मुकुल बताते हैं, “जब गोंडा में आया तो यहां पर क्लीनिक की शुरुआत की, लेकिन मेरा रुझान पेड़-पौधों में शुरू से था, कई साल से इनके बारे में पढ़ता रहता था।”

“बागवानी के एक शोध में मैंने पढ़ा था, तब से थाईलैंड की किस्म से यहां की देशी किस्म को मिलाकर नयी किस्म विपुल तैयार की। अभी पिछले साल जुलाई में ही इसे तैयार किया था, इस बार इसमें फल आ गए हैं।

उद्यान विभाग और कई जिलों के लोग इसकी जानकारी लेने आ रहे हैं।” मुकुल कांति दास ने बताया। इस नयी किस्म में फरवरी मार्च के बाद फिर अक्टूबर-नवंबर तक फल देते हैं, इसके फल का वजन भी 350 से 360 ग्राम तक होता है।

मुकुल आगे कहते हैं, “अभी इनकी और भी पौध तैयार की जा रही है, इनकी पौध तैयार होने के बाद यह नर्सरी में बिक्री होगी। बारहमासी आम के पेड़ से लोग सालभर आम ले सकते हैं।”इसे घर के बगीचे में लगाया जा सकता है। एक पेड़ से एक बार में 30 से 40 किलो आम मिलते हैं।