1000 प्रति किल्लो वाली पिस्ता की खेती कैसे करें

पिस्ता सबसे ज्यादा पसंद क्या जाना वाला ड्राई फ्रूट है इसकी इतनी ज्यादा मांग है की मांग के मुकाबले इसकी पूर्ति बहुत कम है इस लिए इसके इतने ज्यादा दाम है और ये हमेशा ऐसे ही रहेंगे आज हम इस महंगे ड्राई फ्रूट की खेती के बारे मैं आप को बताएंगे

मिट्टी

पिस्ता की खेती कई तरह की मिट्टी में हो सकती है। हालांकि इसके लिए अच्छी तरह से सूखी गहरी चिकनी बलुई मिट्टी उपयुक्त मिट्टी है। ऐसे पेड़ सूखे का आसानी से सामना करने में सक्षम हैं लेकिन जहां ज्यादा आर्द्रता होती है वहां अच्छा नहीं कर पाते हैं। बड़े पैमाने पर पिस्ता की खेती करने के लिए मिट्टी की जांच कराना काफी लाभदायक साबित होगा। जिस मिट्टी में पीएच की मात्रा 7.0 से 7.8 है वहां पिस्ता का पेड़ अच्छी किस्म का और ज्यादा मात्रा में पैदा होता है। ये पेड़ थोड़े कठोर जरूर होते हैं लेकिन उच्च क्षारीयता को काफी हद तक बर्दाश्त भी करते हैं।

जमीन की तैयारी

पिस्ता की खेती के लिए जमीन की तैयारी में भी दूसरे नट या बादाम जैसी स्थिति होती है। जमीन की अच्छी तरह से जुताई, कटाई और लाइन खींची होनी चाहिए ताकि अच्छी जुताई की स्थिति हासिल की जा सके। अगर मिट्टी में 6-7 फीट की लंबाई में कोई कठोर चीज है तो उसे तोड़ देना चाहिए। क्योंकि पिस्ता की जड़ें गहरे तक जाती है और पानी के जमाव से प्रभावित होती है।

आवश्यक जलवायु

पिस्ता की फसल के लिए मौसम की स्थिति बेहद अहम तत्व है। पिस्ता के बादाम को दिन का तापमान 36 डिग्री सेटीग्रेड से ज्यादा चाहिए। वहीं, ठंड के महीने में 7 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उनके शिथिल अवधि के लिए पर्याप्त है। इसके पेड़ ज्यादा ऊंचाई वाली जगहों पर ठंडे तापमान की वजह से अच्छी तरह बढ़ नहीं पाते हैं।

खेती में प्रसारण 

सामान्यतौर पर पिस्ता के पेड़ को लगाने के लिए अनुकूल पिस्ता रुटस्टॉक के जरिए पौधारोपन किया जाता है। इस रुट स्टॉक या पौधे को नर्सरी में भी उगाया जा सकता है। सामान्यतौर पर पौधारोपन नीचे स्तर पर किया जाता है और अंकुरित पेड़ को उसी साल या अगले साल लगा दिया जाता है। यह सब कुछ रुट स्टॉक (पौधे) के आकार को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।

 पौधों के बीच दूरियां

पौधारोपन के लिए बड़ा और पर्याप्त गड्ढा खोदा जाना चाहिए ताकि इसकी जड़ें अच्छी तरह इसमे समा सके। सामान्यतौर पर नर्सरी या डिब्बे के मुकाबले पिस्ता के पौधे को एक इंच नीचे लगाना चाहिए। और जब बात पौधों के बीच दूरियों की आती है तो वह सिंचाई पर निर्भर करता है। अगर सिंचिंत बाग है तो ग्रिड पैटर्न के लिए 6 मीटर गुणा 6 मीटर की दूरी रखी जानी चाहिए।

वैसे इलाके जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं है वहां पौधों के बीच दूरी 8मीटर गुणा 10 मीटर होनी चाहिए। पिस्ता के बादाम(नट) के लिए नर और मादा पेड़ को लगाना चाहिए और इसका अनुपात1:8(एक नर और आठ मादा पेड़) से 1:10(एक नर और 10 मादा पेड़) का होना चाहिए।

सिंचाई

वैसे तो पिस्ता का पेड़ सूखे को बर्दाश्त कर लेता है लेकिन उनकी देखभाल पर्याप्त नमी के साथ होनी चाहिए(जब उन्हें इसकी आवश्यकता हो)। पानी हासिल करने के लिए गीले घास का इस्तेमाल एक बेहतर तरीका हो सकता है। पानी का अच्छी तरह से उपयोग हो सके इसके लिए ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल किया जा सकता है। यहां पानी के जमाव से भी बचना चाहिए। बारिश के मौसम में सिंचाई की जरूरत नहीं होती है। पिस्ता के लिए खाद और

ऊर्वरक 

दूसरे बादाम(नट) पेड़ की तरह ही पिस्ता को भी नाइट्रोजन की जरूरत होती है, क्योंकि बादाम जैसी फसल के लिए नाइट्रोजन एक महत्वपूर्ण ऊर्वरक माना जाता है। हालांकि पौधे में पहले साल ऊर्वरक का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए लेकिन उसके बाद अगले साल से की जा सकती है। आने वाले मौसम के दौरान प्रत्येक पिस्ता के पौधे में 450 ग्राम अमोनियम सल्फेट की मात्रा दो भाग में डाली जानी चाहिए। बाद के वर्षों में प्रति एकड़ 45 से 65 किलो वास्तविक नाइट्रोजन (एन) प्रयोग करना चाहिए। आनेवाले मौसम के दौरान नाइट्रोजन को दो भागों में बांटकर इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

पिस्ते की खेती में कार्यप्रणाली-

पिस्ता के पेड़ को इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता जाए और उसका ओपन-वेस शेप में विकास हो। पेड़ के मध्य भाग को इस तरह खुला रखना चाहिए कि वो सूर्य की रोशनी को ग्रहण कर सके ताकि अच्छी तरह से फूल खिल सके और बेहतर फल लग सके। ऐसी जरूररत चौथे या पांचवें शीत ऋतु में पड़ सकती है। पेड़ों को पतला ऱखने के लिए दूसरे दर्जे की या कम महत्वपूर्ण शाखाओं की छंटाई कर देनी चाहिए।

एक बार जब पेड़ का ढांचा अच्छी तरह शक्ल ले ले तब हल्की-फुल्की कटाई-छटाई की ही जरूरत पड़ेगी। पेड़ के स्वस्थ विकास और अच्छी किस्म के बादाम(नट) के लिए खर-पतवार का नियंत्रण दूसरा कार्य है। इस बात को सुनिश्चित करें कि पेड़ों के बीच अच्छी तरह सफाई रहे, नहीं तो जंगली घास पोषक तत्वों को हासिल करने के लिए संघर्ष करना शुरू कर देते हैं। बर्म्स(berms) के लिए तृणनाशक प्रक्रिया या जंगली घास(पहले उगनेवाले या बाद में उगनेवाले घास के लिए) को खत्म करने की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए।

पिस्ता की फसल की कटाई-

पिस्ता का पेड़ बादाम या नट के उत्पादन के लिए काफी लंबा समय लेता है। इसके अंकुरित पेड़ अगले पांच साल तक फल देने के लिए तैयार हो जाते हैं और पौधारोपन के 12 साल के बाद से पर्याप्त फल देना शुरू कर देते हैं। (अंकुरण के पांच साल बाद पिस्ता का पेड़ फल देने लगता है। जब तक सातवां या आठवां सीजन नहीं हो जाता है तब तक इस फसल की कटाई नहीं की जाती है। पहला पूरी तरह से फल उत्पादन 12वें साल के आसपास शुरू होता है)।

जब इसके गोला से छिलका उतरने लगता है तब समझ लेना चाहिए कि फल पूरी तरह तैयार हो गया है। आमतौर पर ये अवधि 6 से 10 दिनों तक बढ़ सकती है। कटाई के दौरान सावधान रहने की जरूरत है और अविकसित केरनेल से बचना चाहिए। पिस्ता की पैदावार- पिस्ता बादाम (नट) की पैदावार मौसम, किस्में और फसल प्रबंधन के तौर-तरीके पर निर्भर करता है। पौधारोपन के 10 से 12 साल बाद पिस्ता का पौधा करीब 8 से 10 किलो का उत्पादन करता है।

सिर्फ 50 हजार में करें टी-शर्ट प्रिंटिंग का बिजनेस

अगर आप काम पैसों में छोटा बिज़नेस करना चाहते है तो आपके लिए स्माल स्‍केल में टी-शर्ट प्रिंटिंग बिजनेस काफी फायदेमंद हो सकता है। प्रिंटेड टी-शर्ट की इन दिनों बाजार में काफी डिमांड है। कुछ लोग अपने हिसाब से भी टी-शर्ट को‍ प्रिंट करवाकर पहनना पसंद करते हैं।

वहीं, स्‍कूल, कंपनियों व अन्‍य संस्‍थाओं में कई मौके पर विशेष टी-शर्ट प्रिंट करवाई जाती हैं। कुल मिलाकर इस बिजनेस में काफी संभावनाएं हैं। खास बात यह है कि यह बिजनेस बहुत ही कम पूंजी के साथ और घर में ही शुरू किया जा सकता है। जानकारों की माने तो केवल 50 से 70 हजार रुपए के इन्‍वेस्‍टमेंट से ही आप शुरुआती स्‍तर पर 30 से 40 हजार रुपए महीना कमा सकते हैं।

इसके अलावा अगर आप इसमें कामयाब हो जाते हैं तो अपने इन्‍वेस्‍टमेंट को बढ़ाकर अपने बिजनेस का दायरा भी बढ़ा सकते हैं। इसके बाद आपकी इनकम भी लाखों रुपए महीना से करोड़ों रुपए साल तक में भी पहुंच सकती है।

50 हजार रुपए से शुरू हो सकता है काम

टी-शर्ट प्रिंटिंग कारोबार को करने के लिए आपको बहुत बड़े इन्‍वेस्‍टमेंट की जरूरत नहीं पड़ती है। इसमें कुछ प्रिंटर, हीट प्रेस, कंप्‍यूटर, कागज व रॉ मटेरियल के रूप में टी-शर्ट चाहिए होती हैं। इस कारोबार को अगर आप बहुत बड़े स्‍तर पर करना चाहते हैं तो आप को सिर्फ 5 -6 लाख की जरूरत होगी ।

कितना होगा कुल खर्च

टी-शर्ट प्रिंटिंग मशीन(हीट प्रेस) = 11,999 रु ,टेफलॉन शीट (2) = 800 रु , सब्‍लीमेशन पेपर प्रिंट के लिए पेपर (100) = 300 रु , 805 प्रिंटर = 16,800 रु , इंक प्रिंटर= 2,100 रु ,प्‍लेन टी-शर्ट (100) =10,000 रु , कंप्‍यूटर = 25,000 रु , कुल खर्च =66,999 रु

कमाई

केवल 70 सेकेंड में तैयार होती है टी-शर्ट टी-शर्ट प्रिंट करने के लिए जिस मशीन की जानकारी दी गई है यह मैन्‍युअल मशीन है। इस मशीन से एक टी-शर्ट 70 सेकेंड तैयार की जा सकती है।

मार्केट-एक्‍सपर्ट कंस्‍लटेंसी सर्विसेज के अनुसार एक टी-शर्ट को प्रिंट करने के लिए लगभग 20 से 30 रुपए का खर्च आता है। यह मैन्‍युअल मशीन में आने वाला खर्च है जबकि अगर आप ऑटोमैटिक डिजिटल प्रिंटिंग मशीन रखते हैं तो इसमें यह खर्च और भी कम होता है। बाजार में प्‍लेन टी-शर्ट को प्रिंट करने के 150 से 200 रुपए चार्ज किए जाते हैं।

इसके साथ ही किसी स्‍कूल, कॉलेज, या बड़े फंक्‍शन में बड़ी संख्‍या में टी-शर्ट प्रिंट करवाकर मंगाई जाती है तो तो इस पर बाजार में लगभग 50 से 60 रुपए लिए जाते हैं। इस तरह अगर आप महीने में 600 टी-शर्ट का ऑर्डर भी पूरा करते हैं और एक टी-शर्ट पर आप 20 रुपए का प्रोफिट भी लेते हैं तो आपकी कमाई 30 हजार रुपए हेा जाती है।

जबकि, बड़े ऑर्डर जिसमें हजारों की संख्‍या में टी-शर्ट पहुंचानी होती हैं.तो आपकी यह इनकम बढ़ भी जाती है।अगर आप इसकी मशीने लेना चाहते है तो इंडियामार्ट और अलीबाबा वेबसाइट पर सर्च कर सकते है

टी-शर्ट प्रिंटिंग कैसे करते है उसके लिए वीडियो भी देखें

दिल दहला देने वाला आंकड़ा ,भारत में हर साल 12,000 किसान कर रहे हैं आत्महत्या

सरकार 2013 से किसानों की आत्महत्या के आंकड़े जमा कर रही है. इसके मुताबिक हर साल 12 हजार किसान अपनी जिंदगी खत्म कर रहे हैं. कर्ज में डूबे और खेती में हो रहे घाटे को किसान बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं.

सरकार के अनुसार 2015 में कृषि क्षेत्र से जुड़े कुल 12,602 लोगों ने आत्महत्या की. इनमें 8,007 किसान-उत्पादक थे जबकि 4,595 लोग कृषि संबंधी श्रमिक के तौर पर काम कर रहे थे. 2015 में भारत में कुल 1,33,623 आत्महत्याओं में से अपनी जान लेने वाले 9.4 प्रतिशत किसान थे.

2015 में सबसे ज्यादा 4,291 किसानों ने महाराष्ट्र में आत्महत्या की जबकि 1,569 आत्महत्याओं के साथ कर्नाटक इस मामले में दूसरे स्थान पर है. इसके बाद तेलंगाना (1400), मध्य प्रदेश (1,290), छत्तीसगढ़ (954), आंध्र प्रदेश (916) और तमिलनाडु (606) का स्थान आता है. 2014 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 12,360 और 2013 में 11,772 थी.

 

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता में तीन जजों वाली एक बेंच किसानों की स्थिति और उसमें सुधार की कोशिशों से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई कर रही है. इसी के दौरान सरकार ने ये आंकड़े पेश किए हैं. यह याचिका सिटिजन रिसोर्स एंड एक्शन इनीशिएटिव की तरफ से दायर की गई है

पिछले एक दशक के दौरान किसानों की आत्महत्या के हजारों मामले सामने आये हैं. अधिकतर किसानों ने कीटनाशक पीकर तो कुछ ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी. किसानों पर सबसे अधिक मार बेमौसम बारिश और सूखे से पड़ती है और कई बार दाम गिरने से भी इनकी कमाई पर असर पड़ता है.

किसानों की बदहाली की एक तस्वीर पिछले दिनों दिल्ली में भी दिखाई दी तमिलनाडु से आए किसानों ने अपने विरोध प्रदर्शन से तरीकों से सबका ध्यान खींचा.

खेती पर इनकम टैक्स लगाने के पक्ष में सरकार!

नीति आयोग ने आज ग्रोथ पर 15 साल का रोडमैप पेश किया है। इसमें खेती से कमाई को इनकम टैक्स के दायरे में लाने की बात कही गई है। नीति आयोग खेती पर टैक्स के पक्ष में है। सरकार जल्द ही इस बारे में फैसला ले सकती है।

उधर नीति आयोग के सदस्य विवेक देबरॉय ने सीएनबीसी-आवाज से एक्सक्लूसिव बातचीत में कहा कि खेती से होने वाली आय पर इनकम टैक्स लगना चाहिए। हालांकि खेती से एक सीमा से ज्यादा आमदनी पर इनकम टैक्स लगाना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि टैक्स की दर और आमदनी की दर वही हो जो शहरों के लोगों की आमदनी पर लगती है लेकिन खेती से होने वाली आमदनी का आकलन एक साल की बजाय लंबे समय सीमा के आधार पर करना चाहिए।

गो तस्करी पर लगाम लगाने के लिए अब गायों का भी बनेगा

गायों की तस्करी रोकने के लिए सरकार एक अनूठा कदम उठाने जा रही है. सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि दूध देना बंद करने के बाद त्याग दी गई हर गाय और उसके बछड़े का एक ‘अद्वितीय पहचान संख्या’ (यूआईएन) होगा और हर जिले में राज्य सरकार द्वारा निर्मित गो आश्रमों में रखा जाएगा.

महाधिवक्ता रंजीत कुमार ने प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे. एस. केहर और न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ की पीठ से कहा कि हर गाय और उसके हर बच्चे का अपना यूआईएन होगा, ताकि उनकी निगरानी की जा सके.

रंजीत कुमार ने अखिल भारत कृषि गोसेवा संघ की याचिका खारिज करने की मांग करते हुए कहा, “केंद्रीय कृषि मंत्री ने खराब न होने वाली पॉलीयूरीथेन से बने यूआईएन संख्या वाले टैग का इंतजाम किया है.

पूरे भारत में गो संरक्षण एवं गोरक्षा के लिए एकसमान कानून होगा. इससे देश में कानून का पालन न करने वाले इलाकों में कमी आएगी और गोसंरक्षण और गोरक्षा का पालन बेहतर तरीके से हो सकेगा.”

रंजीत कुमार ने बताया कि गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारियों की एक समिति ने पॉलीयूरीथेन टैग के इस्तेमाल का सुझाव दिया है. इस आधार कार्ड में पशु का सारा ब्यौरा, जैसे उम्र, लिंग, नस्ल, वजन, रंग, पूंछ और सींग का आकार और किसी खास निशान का उल्लेख किया जाएगा. उन्होंने कहा, “समिति की सिफारिशों पर अंतिम फैसला ले लिया गया है और उचित अधिकारियों द्वारा इसे मंजूरी भी मिल चुकी है.”

याचिकाकर्ता संगठन ने अनुपयोगी गायों सहित गोवंश के जानवरों की बांग्लादेश को होने वाली तस्करी पर रोक लगाने के लिए एक विस्तृत योजना बनाए जाने की मांग की थी.

लहसुन की उन्नत खेती कैसे करे

लहसुन एक महत्त्वपूर्ण व पौष्टिक कंदीय सब्जी है। इस का प्रयोग आमतौर पर मसाले के रूप में कियाजाता है। लहसुन दूसरी कंदीय सब्जियों के मुकाबले अधिक पौष्टिक गुणों वाली सब्जी है। यह पेट के रोग, आँखों की जलन, कण के दर्द और गले की खराश वगैरह के इलाज में कारगर होता है। हरियाणा की जलवायु लहसुन की खेती हेतु अच्छी है।

उन्नत किस्में

जी 1– इस किस्म के लहसुन की गांठे सफेद, सुगठित व मध्यम के आकार की होती हैं। हर गांठ में 15-20 कलियाँ पाई जाती हैं। यह किस्म बिजाई के 160 – 180 दिनों में पक कर तैयार होती है। इस की पैदावार 40 से 45 क्विंटल प्रति एकड़ है।
एजी 17– यह किस्म हरियाणा के लिए अधिक माकूल है। इस की गांठे सफेद व सुगठित होती है। गांठ का वजन 25-30 ग्राम होता है। हर गांठ में 15-20 कलियाँ पाई जाती हैं। यह किस्म बिजाई के 160-170 दिनों में पक कर तैयार होती है। पैदावार लगभग 50 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

मिट्टी और जलवायु

वैसे लहसुन की खेती कई किस्म की जमीन में की जा सकती है, फिर भी अच्छी जल निकास व्यवस्था वाली रेतीली दोमट मिट्टी जिस में जैविक पदार्थों की मात्रा अधिकं हो तथा जिस का पीएच मान 6 से 7 के बीच हो, इस के लिए सब से अच्छी हैं। लहसुन की अधिक उपज और गुणवत्ता के लिए मध्यम ठंडी जलवायु अच्छी होती है।

खेती की तैयारी

खेत में 2 या 3 गहरी जुताई करें इस के बाद खेत को समतल कर के क्यारियाँ व सिंचाई की नालियाँ बना लें।

बिजाई का समय

लहसुन की बिजाई का सही समय सितंबर के आखिरी हफ्ते से अक्टूबर तक होता है।

बीज की मात्रा

लहसुन की अधिक उपज के लिए डेढ़ से 2 क्विंटल स्वस्थ कलियाँ प्रति एकड़ लगती हैं। कलियों का व्यास 8-10 मिली मीटर होना चाहिए।

बिजाई की विधि

बिजाई के लिए क्यारियों में कतारों दूरी 15 सेंटीमीटर व कतारों में कलियों का नुकीला भाग ऊपर की ओर होना चाहिए और बिजाई के बाद कलियों को 2 सेंटीमीटर मोटी मिट्टी की तह से ढक दें।

खाद व उर्वरक

खेत की तैयारी के समय 20 टन गोबर की सड़ी हुई खाद देने के अलावा 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 20 किलोग्राम फास्फोरस व 20 किलोग्राम पोटाश रोपाई से पहले आखिरी जुताई के समय मिट्टी में अच्छी तरह मिलाएँ। 20 किलोग्राम नाइट्रोजन बिजाई के 30-40 दिनों के बाद दें।

सिंचाई

लहसुन की गांठों के अच्छे विकास के लिए सर्दियों में 10-15 दिनों के अंतर पर और गर्मियों में 5-7 दिनों के अंतर पर सिंचाई होनी चाहिए।

अन्य कृषि क्रियाएँ व खरपतवार नियंत्रण

लहसुन की जड़ें कम गहराई तक जाती हैं। लिहाजा खरपतवार की रोकथाम हेतु 2-3 बार खुरपी से उथली निराई गुड़ाई करें। इस के अलावा फ्लूक्लोरालिन 400-500 ग्राम (बासालिन 45 फीसदी, 0.9-1.1 लीटर) का 250 लीटर पानी में घोल बना कर प्रति एकड़ के हिसाब से बिजाई से पहले छिड़काव करें या पेंडीमैथालीन 400-500 ग्राम (स्टोम्प 30 फीसदी, 1.3-1.7 लीटर) का 250 लीटर पानी में घोल बना कर बिजाई के 8-10 दिनों बाद जब पौधे सुव्यवस्थित हो जाएँ और खरपतवार निकलने लगे, तब प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें।

गांठो की खुदाई

फसल पकने के समय जमीन में अधिक नमी नहीं रहनी चाहिए, वर्ना पत्तियाँ फिर से बढ़ने लगती हैं और कलियाँ का अंकुरण हो जाता है। इस से इस का भंडारण प्रभावित हो सकता है।
पौधों की पत्तियों में पीलापन आने व सूखना शुरू होने पर सिंचाई बंद कर दें। इस के कुछ दिनों बाद लहसुन की खुदाई करें। फिर गांठों को 3 से 4 दिनों तक छाया में सुखाने के बाद पत्तियों को 2-3 सेंटीमीटर छोड़ कर काट दें या 25-30 गांठों की पत्तियों को बांध कर गूछियों बना लें।

भंडारण

लहसुन का भंडारण गूच्छीयों के रूप में या टाट की बोरियों में या लकड़ी की पेटियों में रख कर सकते हैं। भंडारण कक्ष सूखा व हवादार होना चाहिए। शीतगृह में इस का भंडारण 0 से 0.2 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान व 65 से 75 फीसदी आर्द्रता पर 3-4 महीने तक कर सकते हैं।

पैदावार

इस की औसतन उपज 4-8 टन प्रति हेक्टेयर ली जा सकती है।

बीमारियाँ व लक्षण

आमतौर पर लहसुन की फसल में बैगनी धब्बा का प्रकोप हो जाता है। इस के असर से पत्तियों परGarlicजामुनी या गहरे भूरे धब्बे बनने लगते हैं। इन धब्बों के ज्यादा फैलाव से पत्तियाँ नीचे गिरने लगती हैं। इस बीमारी का असर ज्यादा तापमान और ज्यादा आर्द्रता में बढ़ता जाता है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए इंडोफिल एम् 45 या कॉपर अक्सिक्लोराइड 400-500 ग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से ले कर 200-500 लीटर पानी में घोल कर और किसी चपकने वाले पदार्थ (सैलवेट 99, 10 ग्राम, ट्रीटान 50 मिलीलीटर प्रति 100 लीटर ) के साथ मिला कर 10-15 दिनों के अन्तराल पर छिड़कें।