जाने क्या है चावल की उछलने वाली गेंद का सच्च

आजकल सोशल मीडिया पर प्लास्टिक के चावल होने का अफवाह फैला जा रहा है। विडियों में चावल का गेंद बनाकर उछाला जा रहा है जिससे काफी लोग उस विडियों को सच मान रहे है।

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात निर्यात एजेंसी (एपीईडीए) ने प्लास्टिक चावल के बारे में तेजी से फैल रही अफवाहों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। गौरतलब हो कि आजकल सोशल मीडिया पर प्लास्टिक के चावल होने का अफवाह फैला जा रहा है।

इस प्रकार के वीडियो और प्रेस रिपोर्ट भ्रामक हैं क्योंकि कई प्रकार के चावल की ऐसी प्रकृति होती है।
इस के लिए जब एपीईडीए ने असली चावल के साथ प्रयोग क्या तो हैरान कर देने वाली बात सामने आई ।असल में एपीईडीए ने दो तरह के चावल उबाल कर उनकी गेंद बनाई । एक तरह के चावल में कम स्टार्च था और दूसरे में ज्यादा स्टार्च था ।

जब कम स्टार्च वाले चावल की गेंद बनाई गई तो उसकी गेंद तो बन गई लेकिन वो उछल नहीं रही थी लेकिन ज्यादा स्टार्च वाले चावल की गेंद प्लास्टिक गेंद उछल भी रही थी । चावल की गेंद का उछलना उसका प्राकृतिक गुण है ।चावल की गेंद उछलेगी या नहीं ये बात उसमें पाए जाने वाले स्टार्च की मात्रा पर निर्भर करता है।

एपीईडीए ने कहा कि “सोशल मीडिया और मीडिया में सूचना का प्रसार किया जा रहा है, जिससे यह कहा गया है की सिर्फ प्लास्टिक वाले चावल की गेंद उछलती है वो गलत है । दरअसल ज्यादा स्टार्च वाले चावल की गेंद भी वैसे ही उछलती है जैसे प्लास्टिक की बनी हो ।”

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चावल पैदा करने वाला देश है. चीन चावल पैदा तो करता है लेकिन विश्व का सिर्फ 1.9 फीसदी चावल एक्सपोर्ट यानि बाहर भेजता है और भारत तो चीन से ना के बराबर चावल खरीदता है.इस लिए इस बात में कोई सचाई नहीं के भारत चीन में चीन के प्लास्टिक के चावल आ रहे है ।

मिट्टी के बिना खेती, अब घर पर ही पैदा होंगी फल-सब्जियां

खेती का भविष्य

जिला बागवानी अधिकारी दीन मोहम्मद खान ने बताया कि यह खेती का भविष्य है। इस विधि में मिट्टी की जगह नारियल फाइबर को पोट्स में भरा जाता है अौर नियंत्रित वातावरण में तरल पोषक तत्व प्रदान किए जाते हैं। वहीं इस परियोजना से जुड़े किसान ध्रुव कुमार का कहना है कि हमें उर्वरकों और कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं है क्योंकि एक नियंत्रित वातावरण में सब्जियां उगाई जाती हैं। हम पराबैंगनी किरणों से सब्जियों को बचाने के लिए एक पॉलिथीन शीट का उपयोग करते हैं।

तीन दोस्तों ने किया कमाल 

इस प्रोजेक्ट को 2015 में तीन दोस्तों रुपेश सिंगल, अविनाश गर्ग अौर विनय जैन ने सेटअप किया। ये तीनों आई.टी प्रोफैशनल हैं। नियंत्रित वातावरण के लिए इन तीनों ने इनडोर खेती तकनीक का प्रयोग किया। इस तकनीक द्वारा टमाटर, यूरोपियन खीरा, चेरी टमाटर, तुलसी आदि की खेती की। अविनाश का कहना है कि हमने हमारे खेतों में दो रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) जल संयंत्र स्थापित किए हैं। संयंत्र की क्षमता 2,000 लीटर/घंटा है। हमने कृषि उत्पादन के लिए भारी मात्रा में उत्पादन के लिए आरओ जल का उपयोग करने का निर्णय लिया है और इसके लिए पौधों को आवश्यक मात्रा में आवश्यक पोषक तत्व और खनिज सही अनुपात में मिलना अनिवार्य हैं।

 

कैसे की जाती है खेती

इस खेती में मिट्टी के स्थान पर नारियल के अवशेष का प्रयोग होता है और इसे छोटे-छाटे बैगों में डालकर पोली हाऊस में सब्जी के पौधे उगाए जाते हैं। नारियल के इस अवशेष को खेती के लिए लगातार तीन साल तक प्रयोग किया जा सकता है। इस तकनीक से लगातार 7 महीनों तक सब्जियों का उत्पादन होता है। बिना मिट्टी के खेती करने का तरीका हाइड्रोपोनिक्स कहलाता है। इसमें फसलें उगाने के लिए द्रव्य पोषण या पौधों को दिए जाने वाले खनिज पहले ही पानी में मिला दिए जाते हैं।

हाइड्रोपोनिक जैविक खेती के लाभ 

हाइड्रोपोनिक जैविक खेती के कई लाभ हैं। इस खेती के लिए कम पानी के साथ-साथ बहुत कम जगह की आवश्यकता होती है और यहां तक कि खिड़कियां, बालकनियों, छतों पर भी इस तकनीक से सब्जियां उगाई जा सकती हैं । सबसे अहम बात इस इस तकनीक से सुरक्षित अौर अच्छी फसलों का उत्पादन होता है। इस तकनीक से उगाई गई फसल कीटनाशकों से मुक्त होती है और पैदावार अधिकतम पोषक तत्वों के साथ बेहतर गुणवत्ता वाली होती है ।

हाइड्रोपोनिक जैविक खेती में कुछ कमियां

इस तकनीक के जहां फायदे हैं वहीं कुछ कमियां भी हैं। हर कोई हाइड्रोपोनिक खेती पर होने वाले खर्चों को हैंडल नहीं कर सकता। इसे अच्छी देखभाल और रख रखाव की आवश्यता होती है।

बहरहाल अब लोग पारंपरिक खेती को छोड़ आधुनिक तरीकों से फसलों को उगाने में लग गए हैं। इस तकनीक से फसलों को खेतों के बजाय बहुमंजिला इमारतों में उगाया जाएगा जहां कम मिट्टी औऱ पानी से अच्छी फसलों का उत्पादन होगा।

8 मीटर की ऊंचाई और 10 मीटर की दुरी तक स्प्रे कर सकता है यह कमाल का मिस्ट स्प्रे पंप

सभी फसलों पर कीट तथा बीमारियों का प्रकोप होता है। कभी-कभी इन बीमारियों के प्रकोप से पूरी फसल नष्ट भी हो जाती है। इसके अतिरिक्त पौधे की वृद्धि को खरपतवार से भी नुकसान होता है। कीट, बीमारियों एवं खरपतवार की रोकथाम के लिए विभिन्न प्रकार की दवाईयों का प्रयोग किया जाता है। ये दवाईयाँ पौध संरक्षण यंत्र जिन्हें स्प्रेयर तथा डस्टर के नाम से जानते हैं, के द्वारा फसलों पर छिड़काव के लिए किया जाता हैं।

पौधे में कीड़े-मकोड़े एवं बीमारी नियंत्रित करने के लिए स्प्रेयर से सूक्ष्म ड्राप स्प्रे की आवश्यकता पड़ती है, तथा खरपतवार नियंत्रित करने के लिए बड़े ड्राप स्प्रे की आवश्यकता पड़ती है। विभिन्न प्रकार के स्प्रेयर भिन्न-भिन्न कार्य करने के लिए उपलब्ध हैं। इनकी उपयोगिता अनेक कारकों पर निर्भर है। जैसे- स्प्रे करने का प्रकार, खेत का आकार, फसल का प्रकार, इत्यादि। यहाँ पर कुछ प्रमुख स्प्रेयरों का वर्णन किया जा रहा हैं, जो सभी राज्यों के लिए उपयोगी हैं।

आज हम जिस स्प्रेयर की बात कर रहे है उसे मिस्ट स्प्रेयर बोला जाता है यह बहुत प्रेशर के साथ स्प्रे करता है बहुत प्रेशर के साथ छोटी छोटी बूंदें बन जाती है जिस से ऐसा लगता है जैसे धुंध हो इस लिए इसे मिस्ट जा फोग स्प्रेयर बोला जाता । इसका इस्तमाल से हम 8 मीटर की ऊंचाई तक स्प्रे कर सकते है जो किसी भी बाग़ में स्प्रे करने के लिए उपुक्त है साथ में इस से हम कम से कम 10 मीटर की दुरी तक स्प्रे कर सकते है । जिस से किसी भी फसल के ऊपर स्प्रे करना बहुत ही आसान हो जाता है ।

यह पेट्रोल के इंजन पर चलता है और एक घंटे में सिर्फ आधा लीटर पेट्रोल का इस्तमाल करता है ।इसका वजन 10 किल्लो के करीब होता है और इसमें आप एक वक़्त पर 11 लीटर तक कीटनाशक भर सकते है वैसे तो मार्किट में बहुत से मिस्ट स्प्रेयर मिल जयँगे लेकिन हम जिसकी बात कर रहे है उसका नाम है किसानक्राफ्ट मिस्ट ब्लोअर इसकी कीमत 5,780 रु है।

किसानक्राफ्ट मिस्ट ब्लोअर खरीदना चाहते है तो इस नंबर पर 91-80-22178200 संपर्क कर सकते है और ज्यादा जानकारी के लिए वीडियो देखें

अब पथरीली ज़मीन पर स्प्रींग कल्टीवेटर से करें खेत की जुताई

स्प्रींग टाइन कल्टीवेटर में फ्रेम, टाइन, रिवर्सिबल शावेल, खिंचने वाली प्रणाली, भारी कार्य करने वाला स्प्रिींग इत्यादि भाग होते हैं। स्प्रींग का कार्य टाइन को चलते समय कठोर-वस्तु एवं पत्थर से बचाना है। शावेल हीट ट्रिटेड स्टील का बना होता है।

इसका इस्तेमाल विशेष तोर पर उस भूमि में किया जाता है जहाँ पर बड़े पथर ज्यादा होते है ।
यहाँ पर आम कल्टीवेटर के इस्तमाल से कल्टीवेटर को बहुत नुकसान उठाना पड़ता है और उसके मुड़ने और टूटने का डर रहता है । वहीँ स्प्रिंग कल्टीवेटर में स्प्रिंग लगे होने के कारण ये टूटता नहीं है।

यह कल्टीवेटर माउन्टेड टाइप होता हैं जो ट्रैक्टर के हाइड्रोलिक प्रणाली द्वारा नियंत्रित होता है। यह यंत्र पशु चालित कल्टीवेटर (डोरा) की तुलना में 50 प्रतिशत मजदूरी की बचत तथा 30-35 प्रतिशत संचालन खर्च में बचत करती है।

उपयोग: इसका मुख्य कार्य सूखा या गीला नर्सरी बेड तैयार करने एवं चौड़ी कतार में निकाई-गुड़ाई करने तथा कादो करने में भी इसका प्रयोग करते हैं।

  • उत्पाद विवरण:
  • फ़्रेम: 75 x 40 मिमी
  • ट्यून्स संख्या : 11
  • ट्यून्स: 50 x 19 मिमी (जाली)
  • एंगल पिन: 50 x 6 मिमी
  • स्प्रिंग: 10 mm
  • लंबाई: 2458 मिमी:
  • पावर की आवश्यकता (एचपी): 50 – 55 एचपी
  • वजन : 260 किलोग्राम

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यह  कैसे काम करते  है उसके लिए वीडियो भी देखें

जापान के इस वैज्ञानिक के फार्मूले से आप कर सकते है सूखे खेत में धान की खेती

अगर आप सोचते है के धान की खेती के लिए बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है तो आप गलत सोच रहे है ।आप सूखे खेत में भी धान की खेती कर सकते है । ऐसा संभव किया था जापान के शिकोकु द्वीप पर रहने वाले मासानोबू फुकुओका (1913-2008) एक किसान और दार्शनिक ने अपने जीवन के अगले पैंसठ सालों तक उन्होंने प्राकृतिक खेती को समृद्ध बनाने में लगा दिए।

वो अपने खेत की जुताई नहीं करते, कोई रासायनिक उर्वरक या खाद का इस्तेमाल नहीं करते, और एशिया के तकरीबन सभी भागों में धान की खेती करने वाले किसानों की तरह वो अपने धान के खेत में पानी भी नहीं भरते और तब भी उनके खेतों का उत्पादन जापान के इसी तरह के अन्य खेतों के उत्पादन से ज्यादा या तकरीबन बराबर होता था।

मासानोबू ने कहते थे की उनके पड़ोसी के खेत में चावल के पौधे की ऊंचाई अगस्त के महीने में उनकी कमर तक या उससे ऊफर तक आ जाती थी। जबकि उनके खुद के खेत में ये ऊंचाई करीब आधी ही रहती थी। लेकिन फिर भी वो खुश रहते थे क्योंकि उनको मालूम होता था कि उनका कम ऊंचाई वाला पौधा बाकियों के बराबर या ज्यादा पैदावार देगा।

मासानोबू के मुताबिक आमतौर पर साइज में बड़े पौधे से अगर 1 हजार किलो पुआल निकलता है तो करीब 500 से 600 किलो चावल का उत्पादन होता है। जबकि मासानोबू की तकनीक में 1 हजार किलो पुआल से 1 हजार किलो ही चावल निकलता है। फसल अच्छी रहने पर ये 1200 किलो तक चला जाता है।

क्या है फार्मूला

  • दरअसल, अगर आप चावल के पौधे को सूखे खेत में उगाते हैं तो ये ज्यादा ऊंचे नहीं हो पाते। कम ऊंचाई का फायदा मिलता है। इससे सूरज की रोशनी पौधे के हर हिस्से पर पड़ती है। पौधे के पत्ते से लेकर जड़ तक सूरज की रोशनी जाती है।
  • 1 वर्ग इंच की पत्ती से 6 दाने पैदा होने की संभावता ज्यादा बन जाती है। जबकि पौधे के सबसे ऊपरी हिस्से पर आने 3-4 वाली पत्तियों से ही करीब 100 दाने आ जाते हैं।
  • मासानोबू बीज को थोड़ी ज्यादा गहराई में बोते थे, जिससे 1 वर्ग गज में करीब 20 से 25 पौधे उगते हैं। इनसे करीब 250 से लेकर 300 तक दानों का उत्पादन हो जाता है।
  • खेत में पानी नहीं भरने से पौधे की जड़ ज्यादा मजबूत होती है। इससे बिमारियों और कीड़ों से लड़ने में पौधे को काफी मदद मिलती है।
  • जून महीने में मासानोबू करीब 1 हफ्ते के लिए खेत में पानी को जाने से रोक देते हैं। इसका फायदा ये मिलता है कि खेत के खतरपतवार पानी की कमी की वजह से जल्दी मर जाते हैं। इसका फायदा ये होता है कि इससे चावल के अंकुर ज्यादा अच्छे से स्थापित हो पाते हैं।
  • मासानोबू, मौसम के शुरु में सिंचाई नहीं करते। अगस्त के महीने में थोड़ा थोड़ा पानी जरूर देते हैं लेकिन उस पानी को वो खेत में रूकने नहीं देते।
  • इस सबसे बावजूद उनकी इस तकनीक से चावल की पैदावार कम नहीं होती।

अब बंटाई या ठेके पर ज़मीन देने वाले किसानो पर भी लगेगा 18% जी.ऐस.टी टेक्स

अगले महीने से लागू हो रही वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की नई कर व्यवस्था में खेत बंटाई या ठेके पर देने वालों को भी टैक्स चुकाना पड़ेगा। उन्हें इससे होने वाली आय पर 18 फीसदी जीएसटी देना होगा। जीएसटी की व्यवस्था में सिर्फ उन्हीं को राहत दी गई है जो जमीन का उपयोग अपने उपयोग या बिक्री के लिए फसल उगाने में करेंगे। खेती के लिए दूसरे को जमीन देने वाले को कारोबारी मानते हुए उसे 18 फीसदी के स्लैब में रखा गया है। उसे बकायदा जीएसटी के तहत रजिस्टर करना होगा और सभी तरह के जरूरी रिटर्न फाइल करने होंगे।

बंटाई पर देने वाले को इनपुट क्रेडिट की भी सुविधा नहीं

बंटाई पर देने वाले को इनपुट क्रेडिट की भी सुविधा नहीं होगी। ऐसे में इस बोझ का अधिकांश हिस्सा खेती करने वाले पर ही पड़ेगा जो पहले से ही बेहद दबाव में हैं। खेती में बढ़ते नुकसान को देखते हुए बहुत से लोग इन दिनों खुद दूसरा काम कर रहे हैं और अपनी जमीन अपने पड़ोसी, रिश्तेदार या किसी अन्य को दे रहे हैं। अपने साथ ही दूसरे के खेत में भी खेती करने को व्यक्ति इसलिए तैयार होता है क्योंकि इससे उसकी लागत थोड़ी कम हो जाती है। सिर्फ उनको छूट होगी जिनकी सालाना आमदनी 20 लाख से कम हो। 1,60,000 मासिक से ज्यादा की आय पर जीएसटी देनी होगी। उत्तर पूर्व के राज्यों के लिए यह सीमा 10 लाख सालाना है।

क्यों चिंताजनक

जमीन बंटाई पर देने वाला व्यक्तिया तो अपना काम छोड़ कर खेती करने को ही मजबूर होगा। या फिर इस टैक्स का पूरा या अधिकांश बोझ खेती करने वाले पर डालेगा।

सरकार की दलील

नीति आयोग के सदस्य प्रो. रमेश चंद्र ने बताया कि यह तभी लागू होगा जब उसकी आमदनी जीएसटी की सालाना छूट सीमा से ऊपर होगी। छोटी जोतों वाले इसमें नहीं आएंगे।

अरबी की जैविक (आर्गेनिक) खेती कैसे करें

अरबी के लिए पर्याप्त जीवांश वाली रेतीली दोमट मिटटी अच्छी रहती है इसके लिए गहरी भूमि होनी चाहिए ताकि इसके कंदों का समुचित विकास हो सके |

जलवायु

अरबी कि फसल को गर्म और आर्द्र जलवायु कि आवश्यकता होती है यह ग्रीष्म और वर्षा दोनों मौसमों में उगाई जा सकती है इसे उष्ण और उप उष्ण देशों में उगाया जा सकता है उत्तरी भारत कि जलवायु अरबी कि खेती के लिए सर्वोत्तम मानी गई है |

प्रजातियाँ

अरबी की उन्नत किस्मे

आजकल भी अरबी कि स्थानीय किस्मे उगाई जाती है देश के प्रत्येक क्षेत्र में कुछ स्थानीय किस्मे उगाई जाती है अब कुछ उन्नत किस्मे भी उगाई जाने लगी है |

स्थानीय किस्मे

  • फ़ैजाबाद ,
  • लाधरा वंशी ,
  • बंगाली बड़ा ,
  • देशी बड़ा ,
  • पंचमुखी ,
  • गुर्री काचू ,
  • आस काचू ,
  • काका काचू ,
  • सर काचू

नवीनतम किस्मे

  • नरेंद्र -1 अरबी
  • नरेंद्र अरबी -2

इन दोनों किस्मों का विकास नरेंद्र देव कृषि एवं प्रोद्योगिक वि 0 वि 0 द्वारा किया गया है दोनों किस्मे अधिक उपज देने वाली है |

बोने का समय

अरबी कि बाई साल में दो बार कि जाती है|

  • फरवरी मार्च ,
  • जून जुलाई

बीज कि मात्रा

अरबी के लिए 8-10 क्विंटल बीज प्रति हे 0 कि फदर से उप्योद करे बुबाई के लिए केवल अंकुरित बीज का उपयोग करे |

बोने विधि

अरबी कि बुबाई निम्नलिखित दो बिधियों से की जाती है |

समतल क्यारियों में

भली भाँती तैयार करके पंक्तियों कि आपसी 45 से 0 मि 0 और पौधों कि आपसी दुरी दुरी 30 से 0 मि 0 रखकर बीज बलि गांठों को 7.5 से 0 मि 0 गहराई पर मिटटी के अन्दर बो दे |

डौलों पर

45 से.मी. की दुरी पर डौलीयां बनायें डौलीयों के बिच दोनों किनारों 30 पर से.मी. की दुरी पर गांठे बो दें |

आर्गनिक जैविक खाद

गोबर की सड़ी हुयी खाद 25-30 टन प्रति हे . खेत में सामान मात्रा में बिखेर कर जुताई कर आर्गनिक 2 बैग भू पावर 50 किलो ग्राम , 2 – बैग माइक्रो फर्टी सिटी कम्पोस्ट वजन 40 किलो ग्राम , 2 – बैग माइक्रो भू पावर 10 किलोग्राम वजन , वजन खाद 2 बैग सुपर गोल्ड कैल्सी फर्ट वजन 10 किलो ग्राम , 2 बैग माइक्रो नीम वजन 20 किलो ग्राम और 50 किलो ग्राम अरंडी कि खली इन सब खादों को मिला कर मिश्रण तैयार कर प्रति एकड़ खेत में सामान मात्रा में बिखेर कर जुताई कर खेत तैयार कर बुवाई करे |

फसल 20 – 25 दिन कि हो जाये तब 2 किलो सुपर गोल्ड मैग्नीशियम 500 मी.ली. माइक्रो झाइम 400 लीटर पानी में मिलाकर अच्छी तरह घोलकर पम्प द्वारा तर बतर कर छिड़ काव करे दूसरा और जब – तीसरा हर छिड़काव 20 – 25 दिन पर लगातार करते रहें |

सिंचाई

ग्रीष्म ऋतू कि फसल को अधिक सिचाइयों कि आवश्यकता होती है जबकि वर्षा ऋतू वाली फसल को कम सिचाइयों कि आवश्यकता पड़ती है गर्मियों में सिचाई 6-7 दिन के अंतर से 10-12 करते रहना चाहिए और वर्षा वाली फसल कि सिचाई दिन या आवश्यकतानुसार करते रहना चहिये अंतिम जून या जुलाई के प्रथम सप्ताह तक मिटटी चढ़ा देनी चाहिए यदि तने अधिक मात्रा में निकल रहे हों तो एक या दो मुख्य तनों को छोड़कर शेष सभी छटाई कर देनी चाहिए |

खरपतवार नियंत्रण

आवश्यकतानुसार प्रत्येक सिचाई के बाद – निराई गुड़ाई करे आमतौर पर 2-3 बार निराई गुड़ाई करने से काम चल जाता है |

किट नियंत्रण

अरबी कि पत्तियां खाने वाले कीड़ों ( सुंडी व मक्खी ) द्वारा हानी होती है क्योंकि ये कीड़े नयी पत्तियों को खा जाते है |

रोकथाम

नीम का काढ़ा या गौ मूत्र का माइक्रो झाइम के साथमिलाकर छिडकाव करे |

रोग नियंत्रण

१.अरबी का झुलसा

यह रोग फाइटोफ्थोरा कोलोकेसी नामक फफूंदी के कारण होता है इसका प्रकोप – जुलाई अगस्त में होता है पत्तियों पर पहले गोल काले धब्बे पड़ जाते है बाद में पत्तियां गलकर गिर जाती है कंदों का निर्माण बिलकुल नहीं होता है |

रोकथाम

  • उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए |
  • रोगी पौधों को उखाड़ कर जाला देना चाहिए |
  • नीम का काढ़ा या गौ मूत्र का माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर लगातार 15 – 20 दिन के अंतराल पर छिड़काव करते रहना चाहिए |

 

नीम का काढ़ा

25 ग्राम नीम कि पत्ती ताजा हरा तोड़कर कुचल कर पिस कर किलो 50 लीटर पानी में पकाएं जब पानी 20 – 25 लीटर रह जाये तब उतार कर आधा लीटर प्रति पम्प पानी में मिलाकर प्रयोग करे |

गौ मूत्र

देसी गाय का गौ मूत्र 10 लीटर लेकर पारदर्शी बर्तन कांच या प्लास्टिक में लेकर 10 – 15 दिन धुप में रख कर आधा लीटर प्रति पम्प पानी मिलाकर प्रयोग करे |

खुदाई

अरबी कि जड़ों कि खुदाई का समय जड़ों के आकार , जाति , जलवायु और भूमि कि उर्बर शक्ति पर निर्भर करता है इसकी फसल बोने के लगभग 3 महीने बाद खुदाई के लिए तैयार हो जाती है पत्तियां सुख जाती है तब उनकी खुदाई करनी चाहिए |

उपज

प्रति हे 0 300-400 क्विंटल तक उपज मिल जाती है |

भण्डारण

अरबी कि गांठों को ऐसे कमरे में रखना चाहिए जहा गर्मी न हो गांठों को कमरे में फैला दे गाठों को कुछ दिन के अंतरसे पलटते रहना चाहिए सड़ी हुयी गांठों को निकालते रहें इस प्रक्रिया से मिटटी भी झड जाती है आवश्यकतानुसार बाजार में बिक्री के लिए भी निकालते रहे – कही कही अरबी को सुखाने बाद स्वच्छ बोरों में भरकर भंडार गृह में रखते|

महाराष्ट्र सरकार का बड़ा फैसला- किसानों का डेढ़ लाख तक का कर्ज माफ, लोन भरने वाले किसान को 25 फीसदी रिटर्न

फडणवीस ने कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि किसानों का कर्ज माफ करने का बोझ हम कर पड़ेगा। इसके चलते हमें अपने खर्च में कटौती करनी होगी। उन्होंने सभी मंत्रियों और विधायकों से कर्ज माफी के समर्थन में अपनी एक महीने की सैलरी देने की भी अपील की है।

कर्ज के तले दबे किसानों को महाराष्ट्र सरकार ने बड़ी राहत प्रदान की है। महाराष्ट्र सरकार ने बड़ा फैसले लेते हुए किसानों के 34000 करोड़ के कर्ज माफी का शनिवार को ऐलान किया। इस बात की जानकारी खुद राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दी। सीएम देवेंद्र फडणवीस ने किसानों के लिए 34 हजार करोड़ रुपये की कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि हम 1.5 लाख रुपये तक के ऋण को पूरी तरह से माफ कर रहे हैं।

साथ ही उन्होंने कहा कि जिन किसानों ने अपने ऋण का नियमित रूप से भुगतान किया है, हम उन्हें 25% ऋण वापसी लाभ (loan return benefit) देंगे। राज्य के 90% किसानों के कर्ज माफी की घोषणा की। महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले का फायदा राज्य के 89 लाख किसानों को होगा।

फडणवीस ने कर्ज माफी का ऐलान करते हुए कहा कि किसानों का कर्ज माफ करने का बोझ सरकार पर पड़ेगा। इसके चलते हमें अपने खर्च में कटौती करनी होगी। उन्होंने सभी मंत्रियों और विधायकों से कर्ज माफी के समर्थन में अपनी एक महीने की सैलरी देने की भी अपील की है।

महाराष्ट्र से पहले पंजाब और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने भी कर्ज माफी का ऐलान किया था। किसानों के कर्ज माफ किए जाने की जानकारी सरकार की ओर से पहले भी दी गई थी।

बता दें कि महाराष्ट्र में किसान कर्ज माफी को लेकर 1 जून से हड़ताल पर है। इस दौरान कई किसानों की आत्यहत्या करने के मामले भी सामने आए। राज्य के किसान लंबे समय से कर्ज माफी की मांग कर रहे थे। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, किसान आत्महत्याओं में 42% की बढ़ोतरी हुई है।

आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र में सामने आए थे। 30 दिसंबर 2016 को जारी एनसीआरबी के रिपोर्ट ‘एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015’ के मुताबिक साल 2015 में 12,602 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने आत्महत्या की।

इस तारिक को होगा देश का सबसे बड़ा किसान आंदोलन

अब तक किसान आंदोलन सिर्फ एक दो राज्यों में ही सीमित था लेकिन अब देश के किसान जल्द बड़े आंदोलन की तैयारी में हैं। इसके लिए देश के 62 किसान संगठन एक मंच पर आ गए हैं।

उन्होंने 3 जुलाई को दिल्ली में जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरने का एलान कर दिया है। इसमें देश के कई राज्यों से हजारों किसानों के शिरकत करने का अनुमान है। दुर्दशा से नाराज किसान इस दौरान एक दिन नीति आयोग का घिराव कर विरोध दर्ज कराएंगे।

मध्य प्रदेश में आंदोलन के दौरान किसानों की पुलिस की गोली लगने से मौत के बाद भी पूरी तरह मांग नहीं माने जाने, महाराष्ट्र में आंदोलित किसानों को प्रताड़ित करने, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश के किसानों की आवाज दबाने की कोशिश करने,

यूपी के किसानों के कर्ज माफ नहीं करने, हरियाणा और पंजाब के किसानों की पुरानी मांगों के साथ किसानों का फसली की जगह पूरे देश में सारा कर्ज माफ करने जैसे मुद्दों को लेकर किसान लामबंद हुए हैं।

देश के 62 किसान संगठनों ने एक किसान महासंघ गठित किया है। उसके सात संयोजक बनाए गए हैं।दो यूपी, एक हरियाणा, एक पंजाब, एक उड़ीसा। इसी तरह अन्य स्टेट से भी संयोजक बनाए गए हैं।

यूपी के संयोजक राष्ट्रीय किसान आंदोलन के नेता हरबीर सिंह निलोहा का कहना है कि देश के हर हिस्से में किसान परेशान है।आवाज उठाने के बाद भी उसे इंसाफ नहीं मिल रहा बल्कि गोली मारकर और लाठी फटकार कर दबाने की कोशिश की जा रही है। अब किसान झुकने वाला नहीं है।

जाने क्या है गन्ना उत्पादन की एस.एस.आई. तकनीक और इसके क्या फायदे है

हैदराबाद स्थित इक्रीसेट व डब्लू.डब्लू.एफ. प्रोजेक्ट ने गन्ना उत्पादन की एस.एस.आई. तकनीक का विकास किया है, जिसके उत्साहजनक परिणाम प्राप्त हो रहे है।एस.एस.आई.अर्थात सस्टेनेबल सुगरकेन इनीशियेटिव (दीर्धकालीन गन्ना उत्पादन तकनीक) गन्ना उत्पादन की वह विधि है जिसमें गन्ने से प्रति इकाई अधिकतम उत्पादन लेने न्यूनतम बीज और कम पानी में भूमि व उर्वरकों का कुशल उपयोग किया जाता है ।

 

वास्तव में यह बीज, जल और भूमि का गहन उपयोग करने वाली गन्ना उत्पादन की नवीन वैकल्पिक विधि है । दरअसल, पर्यावरण को क्षति पहुँचाये बिना प्रति इकाई जल, जमीन और श्रम से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने की यह नवीन अवधारणा है, जिसके प्रमुख सूत्र इस प्रकार हैः

1. गन्ने की एकल कलिका वाले टुकडो का प्रयोग करते हुए पौधशाला स्थापित करना

2. कम आयु (25-35 दिन) की पौध रोपण

3. मुख्य खेत में पौधों के मध्य उचित फासला( 5 x 2 फीट) रखना

4. मृदा में आवश्यक नमीं कायम रखना तथा खेत में जलभराव रोकना

5. जैविक माध्यम से पोषक तत्व प्रबंधन व कीट-रोग प्रबंधन

6. भूमि और अन्य संसाधनो का प्रभावकारी उपयोग हेतु अन्तर्वर्ती फसलें लगाना ।

गन्ना लगाने की पारंपरिक विधि में रोपाई हेतु 2-3 आँख वाले टुकडॉ का उपयोग किया जाता है। एस.एस.आई. विधि में स्वस्थ गन्ने से सावधानी पूर्वक एक-एक कलिकाएं निकालकर पौधशाला (कोको पिथ से भरी ट्रे) में लगाया जाता है । मुख्य खेत में 25-35 दिन की पौध रोपी जाती है । पौधशाला में एक माह में पौधों की वृद्धि बहुत अच्छी हो जाती है। पारंपरिक विधि में एक एकड़ से 44000 गन्ना प्राप्त करने हेतु दो कतारों के मध्य 45 से 75 सेमी.(1.5-2.5 फीट) की दूरी रखी जाती है और प्रति एकड़ तीन आँख वाले 16000 टुकड़े (48000 आँखे) सीधे खेत में रोप दी जाती है ।

परन्तु अंत में सिर्फ 25000 पिराई योग्य गन्ना ही प्राप्त हो पाता है । जबकि एस.एस.आई. विधि में अधिक फासलें (कतारों के मध्य 5 फीट और पौधों के मध्य 2 फीट) में रो पाई करने से कंसे अधिक बनते है जिससे 45000 से 55000 पिराई योग्य गन्ना प्राप्त हो सकता है । इस प्रकार से कतारों व पौधों के मध्य चौड़ा फासला रखने से न केवल कम बीज ( तीन आँख वाले 16000 टुकड़¨ं की अपेक्षा एक आँख वाले 5000 टुकड़े) लगता है बल्कि इससे प्रत्येक पौधे को हवा व प्रकाश सुगमता से उपलब्ध होता रहता है जिससे उनका समुचित विकास होता है ।

एस.एस.आई. विधि में जल प्रबंध पर विशेष ध्यान दिया जाता है । खेत में पर्याप्त नमीं बनाये रखना लाभकारी पाया गया है । बाढ. विधि से सिंचाई करने से पानी कि अधिक मात्रा तो लगती ही है, पौधों की बढ़वार पर भी बिपरीत प्रभाव पड़ता है । पौधशाला में पौध तैयार करना, कूड़ या एकान्तर कूड़ विधि या टपक विधि से आवश्यकतानुसार सिंचाई करने से 40 प्रतिशत तक जल की वचत संभावित है ।

दीर्धकाल तक अधिक उत्पादन प्राप्त करने हेतु रासायनिक उर्वरको और कीटनाशको पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता है । इसके लिए जैविक खाद व जैव उर्वरकों का प्रयोग किया जाना आवश्यक है । समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन करना अधिक लाभकारी पाया गया है । एस.एस.आई. विधि में गन्ने की दो कतारों के बीच गेंहू, चना, आलू, राजमा, बरवटी, तरबूज, बैगन आदि फसलों की अन्र्तवर्ती खेती को प्रोत्साहित किया जाता है । इससे भूमि, जल आदि संसाधनों का कुशल उपयोग होने के साथ-साथ खरपतवार भी नियंत्रित रहते है और किसानो को अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त हो जाती है ।