जाने क्या है गन्ना उत्पादन की एस.एस.आई. तकनीक और इसके क्या फायदे है

हैदराबाद स्थित इक्रीसेट व डब्लू.डब्लू.एफ. प्रोजेक्ट ने गन्ना उत्पादन की एस.एस.आई. तकनीक का विकास किया है, जिसके उत्साहजनक परिणाम प्राप्त हो रहे है।एस.एस.आई.अर्थात सस्टेनेबल सुगरकेन इनीशियेटिव (दीर्धकालीन गन्ना उत्पादन तकनीक) गन्ना उत्पादन की वह विधि है जिसमें गन्ने से प्रति इकाई अधिकतम उत्पादन लेने न्यूनतम बीज और कम पानी में भूमि व उर्वरकों का कुशल उपयोग किया जाता है ।

 

वास्तव में यह बीज, जल और भूमि का गहन उपयोग करने वाली गन्ना उत्पादन की नवीन वैकल्पिक विधि है । दरअसल, पर्यावरण को क्षति पहुँचाये बिना प्रति इकाई जल, जमीन और श्रम से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने की यह नवीन अवधारणा है, जिसके प्रमुख सूत्र इस प्रकार हैः

1. गन्ने की एकल कलिका वाले टुकडो का प्रयोग करते हुए पौधशाला स्थापित करना

2. कम आयु (25-35 दिन) की पौध रोपण

3. मुख्य खेत में पौधों के मध्य उचित फासला( 5 x 2 फीट) रखना

4. मृदा में आवश्यक नमीं कायम रखना तथा खेत में जलभराव रोकना

5. जैविक माध्यम से पोषक तत्व प्रबंधन व कीट-रोग प्रबंधन

6. भूमि और अन्य संसाधनो का प्रभावकारी उपयोग हेतु अन्तर्वर्ती फसलें लगाना ।

गन्ना लगाने की पारंपरिक विधि में रोपाई हेतु 2-3 आँख वाले टुकडॉ का उपयोग किया जाता है। एस.एस.आई. विधि में स्वस्थ गन्ने से सावधानी पूर्वक एक-एक कलिकाएं निकालकर पौधशाला (कोको पिथ से भरी ट्रे) में लगाया जाता है । मुख्य खेत में 25-35 दिन की पौध रोपी जाती है । पौधशाला में एक माह में पौधों की वृद्धि बहुत अच्छी हो जाती है। पारंपरिक विधि में एक एकड़ से 44000 गन्ना प्राप्त करने हेतु दो कतारों के मध्य 45 से 75 सेमी.(1.5-2.5 फीट) की दूरी रखी जाती है और प्रति एकड़ तीन आँख वाले 16000 टुकड़े (48000 आँखे) सीधे खेत में रोप दी जाती है ।

परन्तु अंत में सिर्फ 25000 पिराई योग्य गन्ना ही प्राप्त हो पाता है । जबकि एस.एस.आई. विधि में अधिक फासलें (कतारों के मध्य 5 फीट और पौधों के मध्य 2 फीट) में रो पाई करने से कंसे अधिक बनते है जिससे 45000 से 55000 पिराई योग्य गन्ना प्राप्त हो सकता है । इस प्रकार से कतारों व पौधों के मध्य चौड़ा फासला रखने से न केवल कम बीज ( तीन आँख वाले 16000 टुकड़¨ं की अपेक्षा एक आँख वाले 5000 टुकड़े) लगता है बल्कि इससे प्रत्येक पौधे को हवा व प्रकाश सुगमता से उपलब्ध होता रहता है जिससे उनका समुचित विकास होता है ।

एस.एस.आई. विधि में जल प्रबंध पर विशेष ध्यान दिया जाता है । खेत में पर्याप्त नमीं बनाये रखना लाभकारी पाया गया है । बाढ. विधि से सिंचाई करने से पानी कि अधिक मात्रा तो लगती ही है, पौधों की बढ़वार पर भी बिपरीत प्रभाव पड़ता है । पौधशाला में पौध तैयार करना, कूड़ या एकान्तर कूड़ विधि या टपक विधि से आवश्यकतानुसार सिंचाई करने से 40 प्रतिशत तक जल की वचत संभावित है ।

दीर्धकाल तक अधिक उत्पादन प्राप्त करने हेतु रासायनिक उर्वरको और कीटनाशको पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता है । इसके लिए जैविक खाद व जैव उर्वरकों का प्रयोग किया जाना आवश्यक है । समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन करना अधिक लाभकारी पाया गया है । एस.एस.आई. विधि में गन्ने की दो कतारों के बीच गेंहू, चना, आलू, राजमा, बरवटी, तरबूज, बैगन आदि फसलों की अन्र्तवर्ती खेती को प्रोत्साहित किया जाता है । इससे भूमि, जल आदि संसाधनों का कुशल उपयोग होने के साथ-साथ खरपतवार भी नियंत्रित रहते है और किसानो को अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त हो जाती है ।

आ गया हाथ ,सोलर और बॅटरी तीनो से चलाया जाने वाला स्प्रे पंप

थ्री इन वन स्प्रे पंप एक आधुनिक स्प्रे पंप है । ज्यादातर किसनो के पास हाथ से चलने वाला पंप होता है । जिस से काम भी कम होता है और साथ में मेहनत भी बहुत करनी पड़ती है ऐसे किसानो के लिए हीरा एग्रो ले कर आया है 3 इन 1 स्प्रेअर।

 

कम मेहनत के साथ इसके और भी बहुत से फायदे है जो निचे लिखे हुए है ।

1) 3 इन 1 स्प्रेअर हाथ से,सोलर पर और बॅटरी से तीनो से चलाया जाता है ।
2) 16 लिटर की क्षमता ।
3) एक बार बॅटरी चार्ज करने के बाद 25 बार स्प्रे कर सकते है ।
4) स्प्रेअर नोझर अत्यंत उत्तम तकनीकी से बना होने के कारण स्प्रे एक जैसा आता है ।
5) इंजिनियरिंग प्लास्टिक से बने होने के कारण आयु मर्यादा बढ जाती है ।
6) 3 इन 1 स्प्रेअर को उत्तम बेल्ट होने के कारण पीठ दर्द नही होता ।

कहाँ से खरीदें

अगर आप इसे खरीदना चाहते है तो इसकी कीमत सिर्फ 3500 रु के करीब ज्यादा जानकारी के लिए आप हिरा अॅग्रो कॅाल सेंटर से 7741903237 / 9370722722 संपर्क कर सकते है । अगर आप व्हाट्सअप का प्रयोग करते है ।

तो आपका नाम,गाव, Whats app के जरिए 9422207468 / 9360622622 इस नंबर पर भेजे । वो बहुत जल्द आप से संपर्क करेंगे

सोलर स्प्रेअर कैसे काम करता है इसके लिए वीडियो भी देखें

जानो कैसे खाजू की खेती ने बदली आदिवासी किसानो की किस्मत

आम लोगों की पहुंच से दूर रहने वाला काजू यदि आदिवासी किसानों के घरों में बोरियों में रखा मिले तो चौंकना लाजिमी है। लेकिन यह हकीकत है और बैतूल जिले के शाहपुर ब्लाक में आने वाले ग्राम अड़माढाना के लगभग हर घर में एक- दो नहीं क्विंटलों से काजू भरा पड़ा है।

ड्राय फूड्स में सबसे मंहगा मिलने वाला काजू छोटे से गांव के हर घर में बाड़ी परियोजना के माध्यम से 6 साल पहले कराए गए पौधरोपण के कारण मिल रहा है। यह बात अलग है कि काजू की खेती से अपनी किस्मत संवरने की उम्मीद लगाए बैठे किसानों को इसे बेचने की कोई राह नहीं मिल पा रही है जिससे उन्हें खासा मुनाफा नहीं हो पा रहा है।

जिले के मौसम को देखते हुए काजू का उत्पादन किया जाना संभव है, इसी के चलते बाड़ी परियोजना की शुरूआत में किसानों को आम और काजू के पौधे देकर उनके खेतों में रोपे गए हैं। 6 साल बीत जाने के बाद काजू के पौधों में फूल और फल लगने शुरू हो गए।

अब तो यह हालत है कि हर किसान के पास अन्य फसलों की तरह ही काजू की भी उपज घर में भरी हुई है।ग्राम पंचायत देसावाड़ी के अंतर्गत आने वाले अड़माढाना के 70 वर्षीय किसान पांडे सलाम ने बताया कि उनके एक एकड़ खेत में काजू के 30 और आम के 20 पौधे लगाए थे। पांच साल बीतने के बाद ही काजू के पेड़ में फूल आने शुरू हो गए। पहले साल तो फल बेहद कम लग पाए थे लेकिन इस साल भरपूर उत्पादन मिला है।

एक पेड़ से 5 किलो काजू

ग्राम के रामजी पेन्द्राम ने बताया कि पहले तो यही लगा कि यहां बंजर जमीन में इतना मंहगा फल कैसे लग पाएगा। लेकिन दो साल से काजू की फसल अच्छी हो रही है। ठंड की शुरूआत के साथ ही पेड़ो में फूल लगने शुरू हो जाते हैं औ मार्च के महीने में फल लग जाते हैं। अप्रैल में इनके पक जाने पर तुड़ाई कर ली जाती है। हर पौधे से करीब 5 किलो काजू निकल जाते है।

फूल भी देते हैं मुनाफा

काजू के फूल के साथ ही फल भी लगा होता है। जब तुड़ाई की जाती है तो फल को अलग निकालकर फूल के हिस्से को भी सुरक्षित रख लिया जाता है। इस फूल का उपयोग फैनी बनाने में किया जाता है। काजू की फसल पैदा कर रहे किसान शिवकिशोर धुर्वे ने बताया कि जैसे-जैसे पेड़ बड़ा होगा उससे उत्पादन भी अधिक मिलेगा।

50 किसान कर रहे खेती

शाहपुर ब्लाक के ग्राम अड़माढाना में 50 किसानों के द्वारा 50 एकड़ में काजू के पौधे लगाए गए हैं। सभी के पास दो साल से काजू का उत्पादन हो रहा है। किसान मुन्न्ा सलाम ने बताया कि काजू की खेती में कोई खास मशक्कत नहीं करनी होती है। सप्ताह में एक दिन पौधों को पानी देकर महीने में एक बार वर्मी कम्पोस्ट डाला जाता है।

उत्पादन तो ले लिया बेचने का टेंशन

काजू उत्पादक किसानों ने इस साल भरपूर उपज तो ले ली है, लेकिन इसे बेचने के लिये कोई राह ही नहीं मिल पा रही है। बाजार उपलब्ध न होने के कारण यहां के किसान केवल आसपास के क्षेत्रों से जो लोग गांव पहुंचकर बाजार से कम दाम पर काजू खरीदकर ले जाते हैं उसी के भरोसे पर निर्भर हैं। किसानों का कहना है कि बाड़ी परियोजना के अधिकारियों से भी इसे बेचने की व्यवस्था करने के लिये कहा गया लेकिन उन्होंने भी कोई मदद नहीं की है।

एक्सपर्ट व्यू

जिले के वरिष्ठ उद्यान अधीक्षक एम आर साबले के मुताबिक जिले का मौसम काजू की फसल के अनुकूल तो नहीं है। इसकी फसल के लिये मौसम में आर्दत्रा और ठंड के साथ गर्मी भी जरूरी होती है। देसावाड़ी क्षेत्र में फसल हो रही है, इससे लग रहा है कि जिले में इसका उत्पादन अब संभव हो रहा है।

एक बार लगाने पर कई साल तक हरा चारा देगी ये घास, अपने खेत में लगाने के लिए यहां करें संपर्क

आमतौर पर पशुपालक चारा खरीदने पर काफी पैसा खर्च कर देते है या फिर मेहनत कर हरा चारा उगाते है, लेकिन भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) ने पशुओं को पूरे वर्ष पौष्टिक एवं हरा चारा मिल सके इसके लिए बहुवर्षीय जिजुवा चारे की घास उगाई है जिसको गाय, भैंस, बकरी सभी बड़े पशु चाव से खाते है।डेयरी वाले किसानों के लिए ये काफी फायदेमंद हो सकती है।

पीलीभीत जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी दूर बिलसंडा ब्लॉक के भदेहीखजा गाँव में रहने वाले श्वेतांश सिंह (75 वर्ष) ने लगभग चौथाई बीघा में जिजुवा घास को बोया हुआ है। चारे की बजाय वह अपनी 21 गाय (साहीवाल और गिर) को जिजुवा घास खिलाते है।

श्वेतांश बताते हैं, “चारे की तरह इसको मशीन में काटना नहीं पड़ता है और केमिकल फर्टिलाइजर की भी जरुरत नहीं पड़ती है। एक साल हो गया इसको बोए अभी तक काटकर पशुओं को खिला रहे है।”

गुजरात की जिज्वा घास को उत्तर भारत की जलवायु में आसानी से उगाया जा सकता है। इस घास में अन्य घासों की अपेक्षा ज्यादा प्रोटीन होता है। इस घास को गाय, भैंस, भेड़, बकरी सभी पशु बड़े चाव से खाते है।

द्वारिका (राजकोट) में उगने वाली जिजुवा घास पर बंशी गौशाला(अहमदाबाद) के संचालक गोपाल भाई सुतालिया ने एक साल तक परीक्षण किया। उन्होंने 10-10 बीघे खेत में जिजुवा सहित करीब आधा दर्जन किस्म की घास उगाई और उनको खिलाने के लिए दुधारू पशुओं को खेतों में खुला छोड़ दिया। पाया गया कि पशुओं ने जिजुवा घास को अधिक पसंद किया।

“इस घास को लगाने से जो किसान बार-बार चारे की फसल लगाता है उसका जो खर्चा होता है वो खत्म हो जाता है। इस घास को अगर किसान एक बार बोता है तो पांच साल तक चारा मिल सकता है। मीठी होने के कारण पशु इसको ज्यादा खाते है।

आईवीआरआई ने फार्मर फर्स्ट प्रोगाम के अंतर्गत बरेली के अतरछेड़ी, निसोई और इस्माइलपुर समेत कई गाँव के किसानों को इस घास को दिया है। इससे पशुओं के दूध की गुणवत्ता भी अच्छी होती है।”ऐसा बताते हैं, बरेली स्थित आईवीआरआई के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. रणवीर सिंह।

डॉ सिंह आगे बताते हैं, “हमारा यही उद्देश्य है कि किसान के पास ऐसी चारे की फसल होनी चाहिए जो कम से कम खर्च में पूरे साल चारा दें, जो किसान इस घास को बोना चाहता हैं, वो जुलाई में इसकी रुट स्लिप बो सकता है, इसको साल भर पानी के निकास वाली जमीन में बोया जा सकता है।

जाड़ों के दिनों में(दिसंबर और जनवरी) इसकी बढ़वार कम होती है वरना बाकी दिनों में इसकी अच्छी फसल होती है। इस घास को किसान खेतों की मेड़ों पर और उचित पानी के निकास वाली उर्वर भूमि में लगा सकते है।

आईवीआरआई में जिज्वा घास के लिए संपर्क कर सकते है—

डॉ. रणवीर सिंह

0581-2303382

 

आपका एसी का बिजली बिल जो महीने का 3500 रु आता था अब आएगा सिर्फ 500 रु

आपके बैड का साइज क्या है – 6’x6’=36 वर्गफुट.और बैडरूम का.? शायद 10’x10′ या इससे ज्यादा. शायद 12’x15′. औसतन 150 वर्गफुट मान लेते हैं.

आपके बैडरूम में एसी तो लगा ही होगा, आजकल ज्यादातर लोगों के पास है.रात को सोते समय जब आप एसी चलाते हो तो आपको सिर्फ 36 वर्गफुट जगह की बजाय 150 वर्गफुट जगह को ठंडा करना पड़ता है, और क्योंकि आपके पास कोई और उपाय नहीं है. इसके कारण ज्यादा बिजली भी खर्च होती है और पर्यावरण को भी ज्यादा नुकसान होता है.

लेकिन अब इसका उपाय आ गया है. अहमदाबाद की एक कंपनी ने आपके बैड के साइज का एक फोल्डिंग चैम्बर और एक पोर्टेबल एसी बनाया है जो सिर्फ उतनी ही जगह को ठंडा करेगा जितनी की जरूरत है.

साधारण 1.5 टन का एसी 2800 वाट बिजली खर्च करता है, लेकिन ये एसी सिर्फ 400 वाट की खपत करता है यानि बिजली का खर्च 7 गुना कम.

मतलब आपका एसी का बिजली बिल अगर एक महीने का 3500 रु आता है, तो इसका सिर्फ 500 रु आएगा.इसकी कीमत 28,000 रु है. लेकिन इसकी बिजली बचत को देखा जाए तो ये एक साल में ही पैसे बचाकर अपनी कीमत निकाल देगा.

छोटे किसानो का नया बैल मेगा टी, ट्रेक्टर से पांच गुना कम कीमत पर करें ट्रैक्टर के सारे काम

बहुत से किसान हर साल इस लिए खेती करना छोड़ देते है क्यूंकि उनके पास खेती करने के लिए जरूरी साधन नहीं होते । एक किसान के लिए सबसे जरूरी चीज ट्रेक्टर होता है लेकिन ट्रेक्टर महंगा होने के कारण हर किसान इसे खरीद नहीं पता ।

ऐसे किसानो के लिए किर्लोस्कर कंपनी ने मेगा टी पेश क्या है । जिसकी कीमत तो ट्रेक्टर के मुकाबले कम है लेकिन यह ट्रेक्टर वाले सारे काम कर देता है । इस मशीन से आप जुताई ,बिजाई ,निराई गुड़ाई ,भार ढोना,कीटनाशक सप्रे आदि काम कर सकते है ।जो किसानों का काम आसान बना देती है।इसकी कीमत तकरीबन 1 लाख 40 हजार है।

मशीन की जानकारी

      • मॉडल – मेगा-टी (15 HP) हैंडल स्टार्ट
      • लंबाई – 2950 mm. चौड़ाई – 950 mm. ऊंचाई – 1300 mm.
      • इंजन का वजन – 138 किलोग्राम
      • इंजन की ऑयल कैपेसटी – 3.5 लीटर
      • प्रकार- वाटर कूल्ड डीजल इंजन
      • Rated RPM – 2000
      • ब्लेडों की संख्या – 20
      • गिअर – 6 आगे, 2 रिवर्स

     

  • यह मशीन कैसे काम करता है इसके लिए वीडियो भी देखें

    https://youtu.be/IjA8bA7TqaQ

आ गया बर्षा पंप, अब सिंचाई के लिए न बिजली की जरूरत और न ही ईंधन की

खेती के लिए सबसे ज्यादा जरूरी क्या है ? आप कुछ देर के लिए सोचेंगे और कहेंगे सिंचाई की सुविधा, क्योंकि इसके बिना सारी तैयारियां अधूरी रह जाती है। और अगर हम आपको कहें कि सिंचाई के लिए हमारे पास एक ऐसा वाटर पंप है जो बिना बिजली और किसी ईंधन के ही चलती है तो क्या कहेंगे?

आज हम इसी खास तकनीक के बारे में बात करने जा रहे हैं जिसका विकास नीदरलैंड में हुआ है और जो हमारे पड़ोसी देश नेपाल में सफलतापूर्वक काम कर रहा है। इस तरह की तकनीक भारत के लिए भी वरदान साबित हो सकती है जहां आज भी चौबीस घंटे बिजली की बात तो छोड़ दीजिए कई जगहों पर तो बिजली पहुंचती भी नहीं है।

ऐसे इलाकों के लिए यह तकनीक कृषि के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगी। यह वाटर पंप जिस तकनीक पर काम करता है उसके लिए भारत की परिस्थिति बिल्कुल सही जगह है। तो चलिए अब विस्तार से इस खास तकनीक से लैस पंप के लिए बात करते हैं।

बर्षा पंप से किसानों के खेतों में होगी वर्षा

हाल में नीदरलैंड के शोधकर्ताओं ने खेतों में सिंचाई को बेहद आसान बनाने के लिए एक नया सिंचाई पंप विकसित किया है। यह एक ऐसा बर्षा पंप है, जिसके लिए किसानों को बिजली या ईंधन का खर्च भी नहीं उठाना पड़ेगा।

बस किसानों को इस पंप को नहर या नदी में रखना होगा और इसके सहारे किसान आसानी से अपने आस-पास के खेतों में सिंचाई कर सकेंगे। किसानों के लिए यह एक तरह का बिल्कुल नया उपकरण है, जिसके इस्तेमाल से किसानों को सिंचाई संबंधी एक बड़ी समस्या दूर हो सकेगी।

किसानों के लिए सिंचाई बड़ी समस्या

अपने खेतों में सिंचाई के लिए किसानों को बड़ी मुश्किल उठानी पड़ती है। एक तरफ जहां कुछ किसान आस-पास की नदियों, नालों या नहर में सिंचाई पाइप लगाकर डीजल पंप के जरिये अपने खेतों की सिंचाई करते देखे जा सकते हैं, वहीं दूसरी ओर किसान अन्य जटिल तरीकों से खेतों से सिंचाई की व्यवस्था करते हैं, ताकि अपने खेतों में सही स्थिति और समय पर रोपाई कर सकें।

असल में बर्षा पंप का निर्माण नीदरलैंड की कंपनी क्यूस्टा ने किया है। इस बर्षा पंप के लिए यूरोपीय संस्था क्लाईमेट केवाईसी की ओर से यूरोप की इस साल की सबसे बड़ी तकनीकि खोज का अवॉर्ड दिया गया है।

शोधकर्ताओं की मानें तो यह एक तरह का बिल्कुल नया उपकरण है और विकासशील देशों में यह तकनीक बहुत कारगार साबित होगी। चूंकि पहला बर्षा पंप इस साल नेपाल में लगाया गया है और नेपाल में बारिश को बर्षा कहा जाता है। इसलिए इस पंप का नाम बर्षा रखा गया है।

ऐसे चलता है बर्षा पंप

असल में यह पंप पानी की लहरों से चलता है। लहरों से टकराकर बर्षा पंप का एक बड़ा सा पहिया घूमता है और इससे वायु का दबाव बनता है। इस वायु के दबाव की वजह से ही पानी को एक नली के जरिये किसानों के खेतों तक पहुंचा देता है।

ऐसे में नदी, नहर या नालों में पानी की लहर की गति ही इस पंप के लिए कारगार होती है और जितनी तेज पानी की रफ्तार होगी, उतनी दूर तक किसानों के खेत तक पानी पहुंच सकेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रदूषण न फैलाने की वजह से यह बर्षा पंप पर्यावरण के भी अनुकूल है। अब एशिया में ही नहीं, बल्कि लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में इस बर्षा पंप के निर्माण की तैयारी शुरू की जा रही है।

शोधकर्ताओं की मानें तो इस बर्षा पंप के जरिए फसल का उत्पादन 5 गुना तक बढ़ाया जा सकता है। यह पंप एक लीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से पानी छोड़ता है। पानी की रफ्तार अच्छी होने पर इस पंप के जरिये 82 फीट की ऊंचाई तक भी पानी को पहुंचाया जा सकेगा। सबसे अच्छी बात यह है कि एक साल में ही इस पंप की पूरी लागत वसूल हो जाएगी।

बर्षा पंप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

किसानों के फायदे के लिए महाराष्ट्र सरकार ने किया ये फैसला

 

महाराष्ट्र सरकार ने किसानों के फायदे के लिए दूध का खरीद मूल्य प्रति लीटर 3 रुपए बढ़ाने का फैसला किया है। खुदरा बिक्री मूल्य फिलहाल अपरिवर्तित रखे गए हैं।

राज्य के डेयरी विकास मंत्री महादेव जांकर ने कहा, ‘नई दरें 21 जून से लागू होंगी लेकिन खुदरा ग्राहकों के लिए दूध की दरों में कोई बदलाव नहीं होगा।’ उन्होंने कहा कि दूध के दाम को बढ़ाने का फैसला एक समिति की सिफारिश पर किया गया है।

राज्य सरकार ने दूध के खरीद दाम के संशोधन के लिए इस समिति का गठन किया था।

जांकर ने कहा, ‘नई दरों के मुताबिक डेयरियां अब गाय दूध 24 रुपए प्रति लीटर के बजाय 27 रुपए प्रति लीटर की दर से खरीदेंगी।

इसी तरह, भैंस का दूध अब 33 रुपए प्रति लीटर के बजाय 35 रुपए प्रति लीटर की दर से खरीदा जाएगा।’

किसानो के लिए खुशखबरी इतने रुपए बड़ा धान और बाकी फसलों का मूल्य

मोदी सरकार ने पिछले तीन वर्ष के दौरान दलहनों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में करीब 80 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि की है लेकिन धान और मक्का की कीमतों में यह वृद्धि एक सौ रुपये क्ल की ही बढोतरी हो पायी है ।

कृषि मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार 2015-16 में अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4625 रुपए प्रति क्विंटल था जिसमें 200 रुपए बोनस भी शामिल था । अरहर की खेती को बढावा देने के उद्देश्य से सरकार ने 2016-17 में 425 रुपए प्रति क्विंटल का बोनस घोषित किया जिससे इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य 5050 रुपए प्रति क्विंटल पहुंच गया ।

इस बार अरहर का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5250 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है और इस पर 200 रुपए का बोनस भी घोषित किया गया है जिससे इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य बढकर 5450 रुपए हो गया है।

वर्ष 2015-16 में मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4650 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया था और इस पर 200 रुपए का बोनस भी दिया गया था जिससे इसका कुल मूल्य 4850 रुपए प्रति क्विंटल हो गया था ।

अगले वर्ष इस पर बोनस की राशि 425 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित की गयी जिससे न्यूनतम समर्थन मूल्य 5225 रुपए प्रति क्विंटल हो गया था। चालू वित्त वर्ष के दौरान मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5375 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है और इस पर 200 रुपए का बोनस दिया गया है जिससे इसकी कुल कीमत 5575 रुपए प्रति क्विंटल हो गई है ।

आ गया बोलने वाला ट्रेक्टर अब बोल कर बताएगा अपना हाल

क्या होगा अगर आप का ट्रेक्टर बोलने लगे, जी हाँ यह सच हो चूका है अब ट्रेक्टर बोल कर अपनी जरूरत अपने मालिक को बताएगा। ट्रेक्टर बताएगा की उस को कब उसको तेल और सर्विस की जरूरत है ।अगर ट्रेक्टर गर्म हो रहा हो तो भी पता चल जायगा

यही नहीं अगर ट्रेक्टर चोरी हो जाए तो वो अपने मालिक को अपनी जगह बताएगा की वह कहाँ पर है । इतना ही नहीं और भी बहुत कुश बताएगा ।जो किसान ट्रेक्टर किराए पर देते है जा जिनके ड्राइवर ट्रेक्टर चलते है उन सब के लिए यह तकनीक बहुत ही लाभदायक है ।

यह सपना पूरा किया है न्यू हॉलैंड और जॉन डियर कंपनी ने । यहाँ न्यू हॉलैंड ट्रेक्टर कंपनी अपने ट्रैक्टर में sky watch तकनीक लांच की है ।वहीँ जॉन डियर कंपनी ने JDLINK तकनीक का अविष्कार क्या है । इन तकनीक में ट्रेक्टर में GPRS और GPS से काम करती है ।

इस तकनीक का फ़ायदा यह होता है की ट्रेक्टर में होने वाली कोई भी गड़बड़ी का पता पहले ही किसान को मिल जाती है । ट्रेक्टर इस बारे में जानकारी आप को SMS के जरिए आप के मोबाइल फ़ोन पर भेजता रहता है

यह तकनीक सिर्फ कुश चुने हुए मॉडल्स पर ही उपलब्द है जैसे न्यू हॉलैंड के 5500 और 3630 में और जॉन डियर कंपनी के 5045 डी , 5050 डी और सारे E मॉडल्स पर उपलब्द है ।नए ट्रैक्टर्स के इन मॉडल्स पर यह सुविधा फ्री में उपलब्द है लेकिन आप अपने पुराने ट्रेक्टर पर इस सुविधा का फ़ायदा उठाना चाहते है तो सिर्फ 18000 रु देकर इसे लगवा सकते है ।

यह तकनीक कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें