आइशर ट्रेक्टर के ऊपर ही तैयार किया अनोखा स्प्रै पंप जाने इसमें क्या है खास

आमतौर पर फसलों के सही ग्रोथ के लिए कीटों और नदीन को मारना पड़ता है और इसके लिए आपको तरह-तरह की कीटनाशक और नदीननाशक की जरूरत पड़ती है । लेकिन असली समस्या तब आती है जब फसल लंबी और घनी हो ऐसे हालातों के लिए बूम स्प्रे पंप ((self propelled boom sprayer) इस्तेमाल किया जाता है ।

इस पंप की खासियत यह है किसके टायर ऊँचे और पतले होते हैं । साथ ही इस की ऊंचाई जमीन से ज्यादा होती है जिस से फसल को नुकसान बहुत कम पहुंचता है ।

इस को अलग अलग कंपनियों द्वारा प्यार किया जाता है जिसमें कुछ इंटरनेशनल ब्रांड भी है। लेकिन इन कंपनियों द्वारा तैयार किए गए बूम स्प्रे पंप काफी महंगे हैं जो छोटे किसानों की पहुंच से बाहर हैं ।

ऐसे में गांव सुखचैन, जिला सिरसा, हरियाणा के किसान कुलबीर सिंह खालसा में भूकंप की तरह आइशर ट्रेक्टर (EICHER TRACTOR) के ऊपर ही बूम स्प्रेयर पंप तैयार किया है । जो बहुत ही कामयाब है और सिर्फ दो चक्कर में 1 एकड़ से स्प्रे कर देता है ।

कुलबीर किसी भी ट्रैक्टर के ऊपर यह पंप प्यार कर सकते हैं । लेकिन आइशर ट्रेक्टर के ऊपर यह सबसे ज्यादा कामयाब है । इसकी कीमत और इससे जुड़ी हुई और जानकारी के लिए आप 9466265668 नंबर पर संपर्क कर सकते हैं । छोटे किसान इसको किराए पर भी चला सकते हैं ।

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Khalsa spray pump Mandi Kalanwali

Posted by Kulvir Singh Sidhu on Monday, July 10, 2017

इन तरीकों से पहचानें की ऊर्वरक (खाद ) असली है या नकली

कई बार किसान अपनी फसल में छिड़काव करने के लिए जो ऊर्वरक (खाद )लाते हैं वो अच्छा नहीं होता है, या नकली होता है। लेकिन किसानों को इसकी जानकारी नहीं होती है कि वो कैसे पहचानें कि ऊर्वरक असली है या नकली। इस लिए आज हम बताने जा रहे हैं कि किसान किस ऊर्वरक की गुणवत्ता को कैसे पहचान सकता है।

डीएपी

डीएपी असली है या नकली इसकी पहचान के लिए किसान डीएपी के कुछ दानों को हाथ में लेकर तम्बाकू की तरह उसमें चूना मिलाकर मसलने पर यदि उसमें से तेज गन्ध निकले, जिसे सूंघना मुश्किल हो जाये तो समझें कि ये डीएपी असली है।

किसान भाइयों डीएपी को पहचानने की एक और सरल विधि है। यदि हम डीएपी के कुछ दाने धीमी आंच पर तवे पर गर्म करें यदि ये दाने फूल जाते हैं तो समझ लें यही असली डीएपी है किसान भइयों डीएपी की असली पहचान है। इसके कठोर दाने ये भूरे काले एवं बादामी रंग के होते है। और नाखून से आसानी से नहीं टूटते हैं।

यूरिया

यूरिया के दाने सफेद चमकदार और लगभग समान आकार के कड़े दाने होते हैं। यह पानी में पूरी तरह से घुल जाती है तथा इसके घोल को छूने पर ठंढा लगता है। किसान यूरिया को तवे पर गर्म करने से इसके दाने पिघल जाते है यदि हम आंच तेज कर दें और इसका कोई अवशेष न बचे तो समझ लें यही असली यूरिया है।

पोटास

पोटाश की असली पहचान है इसका सफेद नमक तथा लाल मिर्च जैसा मिश्रण। पोटाश के कुछ दानों पर पानी की कुछ बूंदे डालें अगर ये आपस में नहीं चिपकते हैं तो समझ लें कि ये असली पोटाश है। एक बात और पोटाश पानी में घुलने पर इसका लाल भाग पानी में ऊपर तैरता रहता है।

सुपर फास्फेट

सुपर फास्फेट की असली पहचान है इसके सख्त दाने तथा इसका भूरा काला बादामी रंग। इसके कुछ दानों को गर्म करें यदि ये नहीं फूलते हैं तो समझ लें यही असली सुपर फास्फेट है। ध्यान रखें कि गर्म करने पर डीएपी के दाने फूल जाते हैं जबकि सुपर फास्फेट के नहीं।

इस प्रकार इसकी मिलावट की पहचान आसानी से की जा सकती है। सुपर फास्फेट नाखूनों से आसानी से नहीं टूटता है। इस दानेदार उर्वरक में मिलावट बहुधा डीएपी व एनपीके मिक्स्चर उर्वरकों के साथ की जान की आशंका रहती है।

जिंक सल्फेट

जिंक सल्फेट की असली पहचान ये है कि इसके दाने हल्के सफेद पीले तथा भूरे बारीक कण के आकार के होते हैं। किसान भाइयों जिंक सल्फेट में प्रमुख रूप से मैगनीशियम सल्फेट की मिलावट की जाती है। भौतिक रूप से सामान्य होने के कारण इसके असली व नकली की पहचान करना कठिन होता है।

किसान भाइयों एक बात और डीएपी के घोल मे जिंक सल्फेट का घोल मिलाने पर थक्केदार घना अवशेष बनाया जाता है। जबकि डीएपी के घोल में मैगनीशियम सल्फेट का घोल मिलाने पर ऐसा नही होता है। किसान भाइयों यदि हम जिंक सफेट के घोल मे पलती कास्टिक का घोल मिलायें तो सफेद मटमैला मांड जैसा अवशेष बनता है।

यदि इसमें गाढ़ा कास्टिक का घोल मिला दें तो ये अवशेष पूर्णतया घुल जाता है। किसान भाइयों इसी प्रकार यदि जिकं सल्फेट की जगह पर मैगनीशियम सल्फेट का प्रयोग किया जाय तो अवशेष नहीं घुलता है।

बि‍जनेस करने के लि‍ए चाहि‍ए सरकार की मदद, तो ऐसे करें अप्‍लाई

देश के नए और युवा कारोबारि‍यों को प्रमोट करने के लि‍ए केंद्र सरकार ने स्‍टार्टअप इंडि‍या, स्‍टैंडअप इंडि‍या को शुरू कि‍या था। इसके तहत कारोबारि‍यों को कई सुवि‍धाएं दी जा रही है।

कारोबारि‍यों को फंड जुटाने से लेकर टैक्‍स छूट का फायदा मि‍ल रहा है। इसके अलावा, देश के सफल कारोबारि‍यों के साथ नेटवर्क बनाने का मौका भी मि‍लेगा। लेकि‍न इन सबका फायदा तभी मि‍लेगा जब आप सरकार के साथ खुद को रजि‍स्‍टर करेंगे और सभी शर्तों को पूरा करेंगे।

कि‍से कहा जाता है स्‍टार्टअप

  • सरकार ने अपने प्रोग्राम के तहत स्‍टार्टअप की परि‍भाषा दी है।
  • डीआईपीपी की गाइडलाइन के मुताबि‍क, सरकारी फायदे उठाने के लि‍ए कंपनी का 1 अप्रैल 2016 को इनकॉरपोरेट होना जरूरी है।
  • उस कंपनी के ऑपरेशन को पांच साल से ज्‍यादा वक्‍त हुआ हो।
  • कंपनी का सालाना टर्नओवर 25 करोड़ रुपए से ज्‍यादा नहीं होना चाहि‍ए।
  • कंपनी को इनोवेशन, डेवलपमेंट, टेक्‍नोलॉजी या आईपी द्वारा नया प्रोडक्‍ट, प्रोसेस या सर्वि‍सेज का ऑफर देना होगा।

ऐसे करें सरकार के साथ रजि‍स्‍टर

कि‍सी भी स्‍टार्टअप को अगर सरकार के साथ रजि‍स्‍टर होना है तो वह स्‍टार्टअप इंडि‍या की वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन एप्‍लीकेशन भर सकता है।आप http://www.startupindia.gov.in/registration.php पर जाकर अपनी सारी डि‍टेल भरें। एप्‍लीकेशन भरने के साथ-साथ स्‍टार्टअप्‍स को खुद की योग्‍यता को साबि‍त करने के लि‍ए डॉक्‍युमेंट जमा कराने होंगे।सरकार द्वारा मान्‍यता प्राप्‍त इंक्‍युबेटर से योग्‍यता पत्र लेना होगा।
अगर डॉक्‍युमेंट अपलोड करने में परेशानी आ रही है तो आप स्‍टार्टअप इंडि‍या हब के टॉल फ्री नंबर 1800115565 पर कॉल कर सकते हैं।

सरकार ऐसे करेगी मदद…

सेल्‍फ सर्टि‍फि‍केशन – स्‍टार्टअप्‍स पर रेग्‍युलेटरी बोझ कम करने के लि‍ए सेल्‍फ सर्टि‍फि‍केशन का फायदा दिया जाएगा।

  • आमतौर पर कारोबारि‍यों को वि‍भि‍न्‍न लेबर और एन्‍वायरमेंट कानूनों को पूरा करना पड़ता है।.लेकि‍न रजि‍स्‍टर करने के बाद उनको इस सबसे मुक्‍ति‍ मि‍ल जाएगी।
  •  वह स्‍टार्टअप मोबाइल ऐप के जरि‍ए 9 लेबर और एन्‍वायरमेंट कानूनों के साथ सेल्‍फ सर्टि‍फाइ कम्‍पलायन्‍स कर सकते हैं।
  •  3 साल के लि‍ए कोई इन्‍सपेक्‍शन नहीं होगा।.

हर साल 2500 करोड़ रुपए का फंड

  • सरकार ने 2,500 करोड़ रुपए की शुरुआती रकम के साथ फंड ऑफ फंड बनाया है।
  • 4 साल के दौरान सि‍डबी की ओर से 10 हजार करोड़ रुपए का फंड बनाया गया है।
  • सरकार के साथ रजि‍स्‍टर्ड स्‍टार्टअप्‍स को यह फंड दि‍या जा सकता है।

यह फायदा भी आपको मि‍लेगा

  • स्‍टार्टअप इंडि‍या पॉलि‍सी के तहत आने वाले स्‍टार्टअप्‍स अब इनकम टैक्‍स एक्‍ट, 1961 सेक्‍शन 80-आईएसी के तहत पहले सात साल में से तीन साल टैक्‍स छूट का फायदा उठा सकते हैं।
  •  इससे पहले पांच साल में तीन साल टैक्‍स छूट दी जाती थी। सरकार को कई प्रस्‍ताव मि‍ले थे जि‍समें कहा गया था कि‍ स्‍टार्टअप्‍स अपने ऑपरेशन के शुरुआती सालों में प्रॉफि‍ट नहीं कमा पाते हैं।

यह है दुन्या के 5 सबसे बड़े ट्रेक्टर

 

आप ने बहुत से ट्रेक्टर देखें होंगे लेकिन यह ट्रेक्टर इतने ताकतवर है की आप कल्पना भी नहीं कर सकते । यहाँ भारत में अभी भी सब से बड़े ट्रेक्टर जो अभी सोनालिका ने लॉन्च क्या है 120 HP के बराबर है । लेकिन इन बड़े ट्रैक्टरों की पावर तो 680 HP से भी ज्यादा है । आओ जानते है इन राक्षस जैसे दिखने वाले ट्रैक्टरों की खासियत

बिग बड (Big Bud 16V-747)

यह ट्रैक्टर 28 फीट लंबा 20 फीट चौड़ा है । इस ट्रैक्टर की ऊंचाई का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस ट्रैक्टर की एक टायर की ऊंचाई 8 फीट तक होती है । इस ट्रैक्टर को पहली बार 1977 में बनाया गया था । इस ट्रैक्टर का 16 सिलेंडर डीजल इंजन बहुत ताकत देता है ।

बिग रॉय (Big Roy: Versatile 8-WD Model 1080 )

यह ट्रैक्टर भी 1977 में कनाडा में तैयार किया गया था । यह ट्रैक्टर 30 फीट लंबा ,20 फीट चौड़ा ,11 फीट ऊंचा है । इसके इंजन में 600 HP की ताकत है । अगर आप इसको देखना चाहते हैं तो मैनिटोबा एग्रीकल्चर म्यूजियम कनाडा में देख सकते हैं ।

आगको चैलेंजर (AGCO Challenger MT975B)

यह यह संसार का सबसे भारा और छोड़ा ट्रैक्टर है । यह ट्रैक्टर 24 फीट लंबा , 16 फीट चौड़ा ,12 फीट ऊंचा है । यह ट्रैक्टर का इंजन 570 HP का है । इस ट्रैक्टर के कैबिन में चढ़ने के लिए छह पौड़ी चढ़ना पड़ता है ।

केस स्टिगेर (Case IH Steiger Quadtrac 620)

यह ट्रेक्टर पहली बार 2013 में लांच किया गया यह ट्रैक्टर संसार का पहला बड़ा कम तेल खाने वाला ट्रेक्टर है । यह ट्रैक्टर 25 फीट लंबा, 14 फीट चौड़ा ,13 फीट ऊंचा है । यह ट्रैक्टर का इंजन 682 HP की पावर जनरेट करता है ।

उपटन (Upton HT14/350 2WD)

इस ट्रैक्टर का निर्माण 1978 में आस्ट्रेलिया में किया गया । इस ट्रैक्टर की ताकत 350 HP है । यह ट्रैक्टर 21 फीट लंबा ,11 फीट चौड़ा, 10 फीट ऊंचा है । यह ट्रैक्टर बाकी ट्रैक्टरों की तरह ताकतवर नहीं था ।

 

जाने कैसे रिक्शा चलाने वाला बन गया करोड़पति बिजनेसमैन

मेहनत और मजदूरी के दम पर रिक्शा चलाने वाले हरिकिशन पिप्पल ने सफलता की अनूठी मिसाल बनाई है.

दरअसल, आज करोड़ों के मालिक हरिकिशन पिप्पल का जन्म एक गरीब और दलित परिवार में हुआ था. पिता की जूता मरम्मत करने की दुकान थी. पर इससे घर का खर्च नहीं चल पाता था. यहां तक कि दो वक्त की रोटी नसीब हो जाए, ये बड़ी बात थी.

अपने घर के हालात को देखते हुए हरिकिशन पिप्पल मजदूरी करने लगे. लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी. दिन में काम करते थे और रात में मन लगाकर पढ़ाई.

लेकिन हरिकिशन जैसे ही 10वीं में पहुंचे उनके पिता की तबियत खराब हो गई. घर की हालात और भी खराब हो गई. घर का खर्च और पिता की दवाओं का बोझ बढ़ गया. ऐसे में परिवार वालों को बिना बताए हरिकिशन ने अपने किसी रिश्तेदार से उधार में साइकिल रिक्शा मांगी और चलाने लगे. कोई पहचान न ले, इसलिए चेहरे पर कपड़ा बांध लेते.

फिर एक दिन हरिकिशन को एक फैक्ट्री में 80 रुपये की तनख्वाह वाली नौकरी मिल गई. उनकी पत्नी की सलाह पर हरिकिशन ने कुछ समय बाद बैंक से 15 हजार रुपये कर्ज लेकर अपनी पुरानी दुकान को ही दोबारा शुरू कर दिया.

हालांकि पारिवारिक विवाद के कारण हरिकिशन और उनके परिवार को घर छोड़ना पड़ा. लेकिन उन्होंने अपने सपने का दामन नहीं छोड़ा.

फिर एक दिन हरिकिशन की जिंदगी में टर्निंग प्वॉइंट आया और उन्हें स्टेट ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन से 10 हजार जोड़ी जूता बनाने का ऑडर मिला. इसके बाद हरिकिशन ने पीछे पलटकर कभी नहीं देखा.

हरिकिशन के पास इसके बाद बाटा से भी ऑर्डर आने लगा और इसी बीच उन्होंने पीपल्स एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड नाम से कंपनी लॉन्च की, जिसमें वो अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के लिए जूते तैयार करने लगे.

हरिकिशन यहीं नहीं रुके. उन्होंने रेस्टोरेंट खोला और शादार शादीखाना भी बनाया. हेल्थकेयर सेक्टर में उन्होंने साल 2001 में हैरिटेज पीपुल्स हॉस्प‍िटल की स्थापना की. इसके अलावा उन्होंने वाहन डीलरशिप और पब्ल‍िकेशन फर्म में भी अपनी पैठ जमाई.

अपनी मेहनत और दूरदर्श‍िता के आधार पर हरिकिशन ने कामयाबी का परचम लहराया. इनकी कंपनी का टर्नओवर 100 करोड़ से ज्यादा है.

अब रसोई गैस की तरह राशन पर भी मिलेगी सब्सिडी, सरकार ला रही योजना

 

जल्द ही आपको रसोई गैस सब्सिडी की तरह अनाज की सब्सिडी भी मिला करेंगी। सरकार सब्सिडी वाले अनाज के सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए एलपीजी जैसी सब्सिडी ट्रांसफर मॉडल अपनाने की योजना बना रही है।

यह पहल सब्सिडी और खाद्य अनाज के शून्य रिसाव को भी सुनिश्चित करेगा। मंत्रालय ने हाल ही में रांची में जमीन की स्थिति का आकलन करने के लिए तीन प्रशिक्षुओं के आईएएस अधिकारियों को नियुक्त किया था, जहां एक पायलट को शुरू किया जा सकता है।अभी 81 करोड़ पहचाने गए लाभार्थियों को राशन दुकानों से 1-3 रुपए किलो प्रति किलोग्राम सब्सिडी मिल जाती है।

सरकार ने 23 करोड़ राशन कार्ड धारकों के आधार कार्डों को लगाने के लिए कई उपायों को अपनाया है, साथ ही सब्सिडी वाले खाद्यान्नों के मोड़ पर अंकुश लगाने के लिए उचित मूल्य की दुकानों (ईपीएस) मशीनों पर इलेक्ट्रानिक बिन्दु बिक्री (ई-पीओएस) स्थापित करने के अलावा कई तहर की स्कीमें बना रही है।

सिर्फ ढेड़ लीटर डीज़ल में एक एकड़ धान काटने वाली मिनी कम्बाइन

 

वैसे तो धान की फसल तैयार करना काफी मुश्किल भरा होता है, किसान जी-जान लगा देता है फसल को तैयार करने में, लेकिन इसके बाद भी धान की मड़ाई करना भी काफी मुश्किल भरा काम होता है।

हलांकि जो किसान धान की खेती ज्यादा क्षेत्र में करते हैं वो तो कम्बाइन से अपनी फसल कटवा लेते हैं, लेकिन जो किसान कम क्षेत्र में धान की खेती करते हैं उन किसानों को फसल की मड़ाई करने में काफी मेहनत करनी पड़ीती है, उन्हीं किसानों के लिए ग्रीव्स कंपनी मिनी कम्बाइन ले कर आए है जो छोटे किसानो के बेहद फायदेमंद साबित होगी।

कम क्षेत्र में धान की खेती करने वाले किसानो के लिए यह कम्बाइन बहुत ही उपयोगी है । इस मशीन के इस्तेमाल करने के बहुत से फायदे है जैसे यह बहुत कम जगह लेता है ।

छोटा होने के कारण हर जगह पर पहुँच जाता है । और इस मिनी कम्बाइन से एक एकड़ काटने में बहुत ही कम खर्च आता है यह एक एकड़ काटने में सिर्फ 1.5 से 2 लीटर के लगभग डीज़ल का प्रयोग करती है ।

इसमें 17.2 Hp डीजल इंजन लगा हुआ है इस मॉडल का नाम Model – GS4L-0.5 है । इस मॉडल की कीमत 3 लाख के करीब । यह कम्बाइन दो से ढाई घंटे में एक एकड़ फसल काट देती है।

इस कम्बाइन का एक फ़ायदा यह भी है के यह फसल को सीधे ही बोरे में डाल देती है । सिर्फ धान ही नहीं इस से आप बाकी की अनाज फसलें जैसे गेहूं ,सरसों अदि भी काट सकते है

यह कंबाइन कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें

अगर आप इस कंबाइन को खरीदना चाहते है तो नीचे दिए हुए पते और नंबर पर संपर्क करें

Phone: +91-22-33551700
REGISTERED OFFICE:
Greaves Cotton Limited
3rd Floor Motilal Oswal Tower
Junction of Gokhale & Sayani Road
Prabhadevi Mumbai – 400025

गन्ने के क्षेत्र में चोखा मुनाफा लेने के लिए करें लेमन ग्रास की खेती

गन्ना की फसल वाली मिटटी पर लेमन घास मुनाफे का सौदा साबित हो सकती है। अलग-अलग किस्मों की घासवह उनसे निकलने वाले तेल को बेहतर आमदनी का जरिया बना बन सकते हैं।

दर्द निवारक औषधीय उत्पादों के साथ ही सौंदर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल किए जाने वाले इन तेलों की बड़ी मांग है। इसके लिए पूरा शोधन संयत्र विकसित करते हुए वह आत्मनिर्भरता की डगर पर अग्रसर हैं।

उत्तर प्रदेश के गाँव मीठेपुर निवासी निवासी कर्मवीर (55 वर्ष) पेशे से शिक्षक हैं। गन्ना बेल्ट के रूप में पहचानी जाने वाली वेस्ट यूपी की धरती पर उन्होंने अपनी पैतृक कृषि भूमि को फिजूल समझी जाने वाली घास उगाकर सजाया है।

वह अलग-अलग किस्मों की घास उगा रहे रहे हैं। लीक से हटकर आगे बढ़ने के जुनून के बीच यही खेती अब उनके लिए बेहतर मुनाफे का पर्याय बन चुकी है।

लेमन, सिट्रोनेला, कैमोमिल समेत घास की कई अन्य किस्मों का भी वह उत्पादन कर रहे हैं। इनकी पत्तियों से निकलने वाले तेल का उपयोग विभिन्न औषधीय एवं सौंदर्य प्रसाधन से जुड़े उत्पादों में किया जा रहा है। इसके दम पर वह बेहतर मुनाफा कमा रहे हैं।

कर्मवीर बताते हैं,“ करीब छह माह में एक बीघा क्षेत्रफल में उगाई गई लेमन ग्रास की पत्तियों से 22 लीटर तक तेल निकलता है।जो बाजार में 950 से 1150 रुपए प्रति लीटर की दर पर आसानी से बिक जाता है। ठीक इसी तरह सिट्रोनेला घास के तेल की बाजार कीमत 1200 से 1400 रुपए प्रति लीटर है।फिलहाल, उनका उत्पादन बेहद सीमित मात्रा में है तो स्थानीय स्तर पर ही उनके तेल की बिक्री हो जाती है।

गाँव के अन्य किसानों से जब बात की गई तो हरिकेश (54वर्ष) बताते हैं,“ ये तो दिन-रात इसमें लगा रहता है। कई बार मन में आता है कि क्यों न वे भी घास की खेती कर लें, लेकिन मेहनत देखकर हिम्मत नहीं जुटा पाते।” इसी गाँव के निवासी किसान राममेहर सिंह (57वर्ष) बताते हैं,“ कर्मवीर के कहने पर उन्होंने इस बार घर में ही करीब 500 गज जमीन पर घास की दो किस्म उगाई हैं? देखते हैं क्या रिजल्ट आता है।”

भारत में इस जगह पर बनता है इंसान के मूत्र से यूरिया

इस बात पर सुनने में यकीन नहीं होगा लेकिन ये बात सच्च है । कर्णाटक के जिला बेल्लारी में बिना पानी वाले मूत्रालय बढ़ते फसलों के लिए खाद का एक स्रोत बन गए हैं। वाल्मीकि सर्किल में पायलट प्रोजेक्ट के तहत स्थापित किए गए मूत्रालय लोगों के लिए वरदान साबित हुए हैं। वहीं, बेल्लारी सिटी कारपोरेशन द्वारा मूत्र से यूरिया निकालने का एक स्रोत बन गया है।

बेल्लारी डीसी रामप्रसाद मनोहर ने कहा कि जिले में स्वच्छ बेल्लारी मिशन के तहत वाटरलेस मूत्रालयों को स्थापित किया गया था। ये यूरीनल्स टच फ्री हैं इसलिए इनसे बीमारी फैलने का जोखिम भी कम होता है।

उपायुक्त ने कहा कि मूत्र में नाइट्रोजन, पोटेशियम और फॉस्फेट शामिल होते हैं, इसका उपयोग कृषि उद्देश्य के लिए किया जाता है। पायलट आधार पर एक बिना पानी वाला मूत्रालय स्थापित किया गया था और अधिक संख्या में लोग इसे प्रयोग कर रहे हैं। हम यहां जमा हुए मूत्र से यूरिया भी निकाल रहे हैं।

कृषि वैज्ञानिकों ने यह प्रमाणित किया है कि मूत्र से निकाले जाने वाले कंपोस्ट का इस्तेमाल फसलों के लिए किया जा सकता है। इसकी सफलता से उत्साहित जिला प्रशासन शहर के भीड़-भाड़ वाले इलाकों में पांच और ऐसे ही मूत्रालय स्थापित करने की योजना बना रहा है। बाद में इसे जिले के अन्य स्थानों में भी लगाया जाएगा।

बेल्लारी सिटी कॉर्पोरेशन के कमिश्नर एमके नवलदी ने कहा कि एक पारंपरिक मूत्रालय को बनाने में करीब 50,000 रुपए का खर्च आता है। वहीं वॉटरलेस यूरीनल को स्थापित करने में 20,000 रुपए से लेकर 25,000 रुपए का खर्च आता है। 20 लीटर क्षमता के पानी के डिब्बे का इस्तेमाल मूत्र को जमा करने के लिए बेसिन की तरह किया जाता है।

किसानों की उम्मीदों पर सरकार ने फेरा पानी, स्वामीनाथन रिपोर्ट पर दिआ यह जवाब

खरीफ की बुवाई में जी-जान से जुटे किसानों को उम्मीद थी कि इस बार सरकार उनकी मेहनत का उचित मूल्य देगी उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा लेकिन केन्द्र सरकार ने किसानों को उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। किसानों को फसल लागत मूल्य से 50 प्रतिशत अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को नकार दिया है।

लोकसभा में मंगलवार को कृषि राज्यमंत्री एसएस अहलूवालिया ने कहा कि फसल लागत पर कम से कम 50 फीसदी वृद्धि को निर्धारित करने से बाजार में विकृति आ सकती है। सरकार के इस फैसले से किसानों को झटका लगा है। भारतीय किसान यूनियन अध्यक्ष भानू प्रताप सिंह ने कहा ” देशभर में अपने हक के लिए आंदोलन कर रहे किसान सरकार के इस फैसले से निराश हैं।”

उन्होंने कहा कि घाटे का सौदा बनती जा रही खेती को लेकर सरकार का अगर यही रवैया रहा तो किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हो जाएगा। किसानों की समस्यओं के अंत के लिए हाल ही में मंदसौर से दिल्ली तक किसान मुक्ति यात्रा निकालने वाले स्वराज इंडिया के संयोजक योगेन्द्र यादव ने कहा ” नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी ने किसानों को वादा किया था कि उनको फसलों की लागत पर 50 प्रतिशत का मुनाफा दिलाया जाएगा। उस हिसाब से देखें तो एक भी फसल में सरकार अपने वादे का आधा भी नहीं दे रही है। ”

उन्होंने कहा कि पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने घोषणा कि खरीफ 2017-18 के लिए सब फसलों के दाम बढ़ा दिए गए हैं। धान का समर्थन मूल्य बढ़ाकर 1550 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है, जबकि अरहर-तुअर दाल के समर्थन मूल्य में 400 रुपए बढ़ाकर 5450 रुपए कर दिया गया है, लेकिन इसके पीछे जो सच है सरकार ने उसे छिपा लिया है। ”

धान की लागत 1484 रुपए है और अगर किसान को 1550 रुपए प्रति कुंतल का समर्थन मूल्य मिल भी जाए तो उसे सिर्फ 4 प्रतिशत बचत होगी। ” योगेन्द्र यादव ने कहा कि सरकार जिस तरह समर्थन मूल्य का फैसला करती है उस पर किसान संगठनों ने बार-बार सवाल उठाए हैं।

कृषि नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने बताया ” सरकारों ने किसानों को उनके उचित आय से वंचित रखा है, जो किसानों का न्यूनतम समर्थन मूल्य से मिलता है। जब भी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की बात होती है, तब कहा जाता है कि इसकी जरूरत नहीं है, फसलों का मूल्य कम रखना चाहिए, नहीं तो खुदरा खाद्य कीमतों में वृद्धि होगी। यानी उपभोक्ताओं को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने के लिए किसानों को गरीब रखा गया है। ”

देश में किसानों की समस्याओं और कृषि संकट के अंत को लेकर एक नीति बनाने के लेकर लगातार काम कर रहे कृषि नीति विशेषज्ञ रमनदीप सिंह मान ने बताया ” न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर केन्द्र से लेकर राज्य सराकरों का रवैया किसानों के हित में नहीं है। ” उन्होंने केन्द्र सरकार की तरफ से खरीफ सीजन 2017-18 के लिए जारी न्यूनतम समर्थन मूल्य से किसानों को कोई लाभ नहीं होगा, जबतक सरकार किसानों की आय को लेकर गंभीर होकर काम नहीं करती है।