ये मशीन जो चारा काटने के साथ अट्टा चक्की का काम भी करती है

ये है आधुनिक और छोटी मशीन चारा काटने वाली मशीन (Chaff Cutter Cum Pulverizer) ।इसकी खास बात यह है ये मशीन चारा काटने के साथ अट्टा चक्की का भी काम करती है । इस लिए यह मशीन डेरी फार्मिंग ,बकरी पालन ,गौशाला आदि जगह पर उपयोग हो सकती है ।

यह मशीन किसी बड़ी चारा काटने वाली मशीन जितना चारा काट सकती है इसकी क्षमता एक घंटे में 500 से 1000 किल्लो तक की है ।

इसकी बॉडी 6MM लोहे से बनी है । इसका वजन सिर्फ 100 किल्लो है । इतने हलके वजन होने के कारण आप इसको कहीं भी रख जा लेजा सकते है ।

इसमें 3 High Carbonized ब्लेड लगे होते है जिनकी धार कभी कम नहीं होती । इस मशीन को 2 H .P की मोटर के साथ चलाया जाता है । बिना मोटर के इस मशीन की कीमत 23100 रुपए है ।

अगर आप इस मशीन को खरीदना चाहते है जा किसी तरह की और जानकारी लेना चाहते है तो इस 09033329666 पर कॉल जा Whats App कर सकते है

यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें

 

किसानो की जरूरत के हिसाब से बनया है यह लीफान कार्गो

कहते है की आवशकता ही अविष्कार की जननी है । ऐसे ही किसानो की जरूरत के हिसाब से त्यार क्या गया है यह लीफान तिपहिया कार्गो (lifan cargo tricycle) । इसमें लीफान के इंजन के साथ एक ट्राली जुडी हुई होती है ।

यह 800 किल्लो तक का वजन उठा कर 80 किल्लो मीटर की स्पीड से भाग सकता है । इसकी चैसी फ्रेम और कार्गो बॉक्स मजबूत होता है। इसका इंजन एक सिलेंडर होता है ।यह पेट्रोल से चलता है गियर शिफ़्ट में इसके 5 आगे + 1 रिवर्स होता है ।

यह तीन मॉडल (175cc , 200cc , 150cc ,250cc ) में आता है । 150cc वाले लीफान इंजन कार्गो 3 व्हीलर मोटरसाइकिल थोक कीमत 36000 रुपये है । जो की मॉडल के हिसाब से बढ़ती रहती है ।

अभी यह सिर्फ चीन में ही मिलते है । बहुत जल्द यह कंपनी भारत में इस प्रोडक्ट को लॉन्च करने वाली है । लेकिन अगर इसे अभी ऑनलाइन अलीबाबा वेबसाइट से भारत मंगवा सकते है ।

वीडियो भी देखें

Product Specification: item number: HY250ZH-Aengine type:LIFAN 150ccengine :single cylinder,4-stroke, water-cooledway valveunderneath type camshaft:lubricating systempressure splash:fuel consumption≤354exhaust pollution:CO≤3.8%,HC≤800ppmstarting ability:≤15sclutch type:Wet Multi-Platederailleur type:Regular meshing gear typetransmission ratio,junior:4.055Output sprocket teeth:15The capacity of lubricating oil:1.1Lcarburetor:PZ30lubricating oil pump:Internal and external rotorMagnetor type:Permanent magnet ACtransmission Type:ShaftTricycle specificationsDimension: 3500*1300*1150mmmmCargo box size:1.4m*2.2m (all flowered pattern)Rear axle:Full floating 5 holes booster king real axle 1140Front shocker:mountain type strong absorberRear shocker:5+4 lever steel plate with spring Wheels : 5.00-12 wheels(three wheels can be exchanged) 50*100mm keel frame28A battery3rd generation Wuyang round type headlightBigger fuel tankSmall footplate Max.Load capacity:1500 KG-2500KGMax.Speed:75km/htransmission Type:Shaft

Posted by Zou Jingli on Monday, June 26, 2017

एक शख्स, जो कभी साइकिल पर किन्नू बेचते थे, आज कमाते हैं करोड़ों

 

यह दिलचस्प कहानी है एक ऐसे किसान की जो कभी साइकिल पर टोकरी में फल बेचा करते थे लेकिन आज दुनिया भर के 12 देशों में इनका कारोबार फैला हुआ है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इन्होंने महज़ प्राथमिक विद्यालय तक की पढ़ाई पूरी की,

फिर चंद पैसों से फल बेचने के धंधे को गले लगाया और आज देश के सबसे सफल किसानों में से एक हैं। एक ऐसा देश जहाँ हर साल हजारों की तादात में किसान आत्महत्या करते हैं और जहाँ के युवा खेती-बाड़ी के धंधों को गिरी नजरों से देखतें हैं, उन तमाम लोगों के लिए इस किसान की कहानी एक सीख साबित होगा

हम बात कर रहें हैं पंजाब के अबोहर निवासी सुरिंदर कुमार की सफलता के बारे में। एक गरीब परिवार में जन्में और पले-बढ़े सुरिंदर ने गांव के ही सरकारी स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद फल बेचने शुरू कर दिए। साल 1997 में किसानों या मंडी से किन्नू खरीदकर लाते और गली-गली उसे बेचा करते। कई सालों तक यह सिलसिला चलता रहा।

कुछ दिनों बाद सुरिंदर को इस फल के बिज़नेस में अपार सभावनाओं का अहसास हुआ। फिर उन्होंने बाज़ार में फल की एक स्टाल लगा ली। इसके बाद इन्होंने बिज़नेस के दायरे को बढ़ाने के बारे में सोचा लेकिन सबसे बड़ी अरचन पूंजी को लेकर थी। कुछ पैसे लोन लेकर इन्होंने पंजाब की मंदी में एक होलसेल दूकान खोल ली। उनका यह सफर चुनौती भरा रहा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

कारोबार को बड़ा करने के लिए सुरिंदर के दिमाग में एक आइडिया सूझा। फिर उन्होंने पंजाब के आस-पास के शहरों की मंडियों मन किन्नू भेजने शुरू कर दिए। इनका यह आइडिया बेहद कारगर साबित हुआ और काफी मुनाफा हुआ।शुरूआती सफलता के बाद इन्होंने विदेश में भी अपना कारोबार फैलाने की सोची। आज दुबई, बांग्लादेश, ब्राजील, यूक्रेन जैसे कई देशों में उनका कारोबार फैला हुआ है

अपनी सफलता को लेकर सुरिंदर बतातें हैं कि वैसे तो किन्नू का सीजन केवल साढ़े तीन महीने का होता है, लेकिन उक्त कारोबार को बढ़िया तरीके से चलाने के लिए उन्होंने खुद ही करोड़ों रुपये की लागत से पैक हाउस व कोल्ड स्टोर विकसित किया।

आज सुरिंदर के पास 40-40 लाख की चार एसी ट्रक भी है। इस ट्रक का इस्तेमाल कर वह ऑफ सीजन में किन्नू दक्षिण भारत में बेचते हैं। आज सुरिंदर के फल कारोबार का सालाना टर्नओवर करोड़ों में है। इतना ही नहीं करीब 400 लोगों को रोजगार मुहैया करा सुरिंदर ने भारत जैसे कृषि प्रधान देश में अन्य किसान भाइयों के सामने मिसाल पेश की है।

यह है भारत के टॉप 10 ट्रैक्टर

देश के कृषि को बल देने वाला एक अहम वाहन है ट्रैक्टर। आइए जानते हैं कि देश की तरक्की में अहम योगदान देने वाले कौन से हैं टॉप 10 ट्रैक्टर।

10. स्टैंडर्ड ट्रैक्टर्स

इस लिस्ट में 10वें नंबर पर है स्टैंडर्ड ट्रैक्टर्स। यह कंपनी 1975 में स्थापित हुई थी। यह कंपनी हार्वेस्टर्स और ट्रैक्टर्स बनाती है और कस्टमर्स को कई तरह की वैरायट के प्रॉडक्ट बेचती है। यह कंपनी दिल्ली आधारित है और इसके ट्रैक्टर पंजाब में बनते हैं।

 

9. प्रीत ट्रैक्टर्स

9वें स्थान पर काबिज प्रीत ट्रैक्टर्स 1980 में स्थापित हुई थी। यह कंपनी खेती से जुड़े विभिन्न प्रॉडक्ट बनाती है। इसके ट्रैक्टर 30 से 90 हॉर्सपॉवर तक की क्षमता के हैं। इस कंपनी को कई किसान पसंद करते हैं।

8. बलवान ट्रैक्टर्स

फोर्स मोटर्स के अंडर में आने वाली यह कंपनी 8वें स्थान पर है। पुणे आधारित यह कंपनी 1957 से ट्रैक्टर बना रही है। फोर्स मोटर्स न सिर्फ ट्रैक्टर बनताी है बल्कि कॅ​मर्शियल और पैसेंजर व्हीकल भी बनाती है।

7. एचएमटी लिमिटेड

एचएमटी का नमा जेहन में आते ही कई लोग घड़ीके बारे में सोचने लगते हैं। अगर आप भी ऐसा ही सोच रहे हैं तो हां यह सच है कि एचएमटी ही घड़ी भी बनाती थी और ट्रैक्टर भी बनाती है। यह कंपनी 1971 में बेंगलुरू से शुरू हुई थी।

6. न्यू हॉलैंड

बेहतरीन कस्टमर सपोर्ट के लिए मशहूर यह ट्रैक्टर कंपनी मूल रूप से इटली की है। न्यू हॉलैंड कई प्रॉडक्ट बनाती है। यह कंपनी भारत में 1996 में शुरू हुई और अबतक 2.5 लाख ट्रैक्टर से ज्यादा बेच चुकी है।

5. जॉन डियरे

इस लिस्ट में 5वें स्थान पर काबिज है जॉन डियरे। अमरीका की यह कंपनी भारत में अच्दा परफॉर्म कर रही है। यह कंपनी 1837 में स्थापित हुई थी और ग्लोबल फॉच्र्यून की लिस्ट में 300वें स्थान के आसापास है।

4. सोनालीका

इंटरनेशनल पंजाब आधारित यह कंपनी चौथे स्थान पर है। भारत की सबसे पुरानी ट्रैक्टर कंपनियों में से एक सोनालीका ने 2004 में पैसेंजर कार बनाने की ओर भी रुख किया था।

3. एस्कॉर्ट एग्री मशीनरी

कृषि के क्षेत्र में एस्कॉर्ट का नाम काफी मशहूर है। यह सिर्फ भारत में ही नहीं, विदेश में भी चर्चित है। 1960 में इस कंपनी की स्थापना हुई। यह कंपनी भारत के अलावा 40 अन्य देशों में भी ट्रैक्टर एक्सपोर्ट करती है।

 

2. टैफे

ट्रैक्टर एंड फार्म इक्विपमेंट्स लिमिटेड नामक यह कंपनी 1960 में ​स्थापित हुई थी। चेन्नई स्थित यह कंपनी टॉप 10 ट्रैक्टर्स की लिस्ट में दूसरे स्थान पर काबिज है।

1. महिंद्रा

महिंद्रा केवल भारत की ही नंबर एक ट्रैक्टर निर्माता कंपनी नहीं है, बल्कि दुनिया में सबसे ज्यादा ट्रैक्टर ​बेचने वाली कंपनी है महिंद्रा। 1964 में स्थापित हुई यह कंपनी ट्रैक्टर निर्माता कंपनियों में सर्वश्रेष्ठ है। साथ ही यह कंपनी पैसेंजर और कॅमर्शियल सेगमेंट के वाहनों में भी काफी मशहूर है।

वीडियो भी देखें

नीलगाय को अपने खेतों से दूर रखने के लिए इस्तेमाल करें यह 10 परंपरागत नुस्ख़े

किसान नीलगाय के आतंक से परेशान हैं। हजारों रुपए की लागत और हड्डी तोड़ मेहनत से तैयार होती फसल को छुट्टा जानवर बर्बाद कर देते हैं, किसानों को सबसे अधिक नुकसान नीलगाय करती हैं। कई किसान रात-रात भर जागकर खेतों की रखवाली कर रहे हैं। इन छुट्टा जानवरों का असर खेती पर पड़ रहा है।

नीलगाय के आतंक से परेशान किसानों के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कई घरेलू और परंपरागत नुस्ख़े बताए हैं जिससे काफी कम कीमत में किसानों को ऐसे पशुओं से आजादी मिल सकती है।

भारतीय गन्ना अऩुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक (कीट और फसल सुरक्षा) डॉ. कामता प्रसाद बताते हैं, परंपरागत तरीके किसानों को जरुर आज़माने चाहिए।

नीलगाय रोकने के लिए करें यह 15 उपाय

  1. नीलगाय को खेतों की ओर आने से रोकने के लिए 4 लीटर मट्ठे में आधा किलो छिला हुआ लहसुन पीसकर मिलाकर इसमें 500 ग्राम बालू डालें। इस घोल को पांच दिन बाद छिड़काव करें। इसकी गंध से करीब 20 दिन तक नीलगाय खेतों में नहीं आएगी। इसे 15 लीटर पानी के साथ भी प्रयोग किया जा सकता है।
  2. बीस लीटर गोमूत्र, 5 किलोग्राम नीम की पत्ती, 2 किग्रा धतूरा, 2 किग्रा मदार की जड़, फल-फूल, 500 ग्राम तंबाकू की पत्ती, 250 ग्राम लहसुन, 150 लालमिर्च पाउडर को एक डिब्बे में भरकर वायुरोधी बनाकर धूप में 40 दिन के लिए रख दें। इसके बाद एकलीटर दवा 80 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करने से महीना भर तक नीलगाय फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाती है। इससे फसल की कीटों से भी रक्षा होती है
  3. खेत के चारों ओर कंटीली तार, बांस की फंटियां या चमकीली बैंड से घेराबंदी करें।
  4. खेत की मेड़ों के किनारे पेड़ जैसे करौंदा, जेट्रोफा, तुलसी, खस, जिरेनियम, मेंथा, एलेमन ग्रास, सिट्रोनेला, पामारोजा का रोपण भी नीलगाय से सुरक्षा देंगे।
  5. खेत में आदमी के आकार का पुतला बनाकर खड़ा करने से रात में नीलगाय देखकर डर जाती हैं।
  6. नीलगाय के गोबर का घोल बनाकर मेड़ से एक मीटर अन्दर फसलों पर छिड़काव करने से अस्थाई रूप से फसलों की सुरक्षा की जा सकती है।
  7. एक लीटर पानी में एक ढक्कन फिनाइल के घोल के छिड़काव से फसलों को बचाया जा सकता है।
  8. गधों की लीद, पोल्ट्री का कचरा, गोमूत्र, सड़ी सब्जियों की पत्तियों का घोल बनाकर फसलों पर छिड़काव करने से नीलगाय खेतों के पास नहीं फटकती।
  9. देशी जीवनाशी मिश्रण बनाकर फसलों पर छिड़काव करने से नीलगाय दूर भागती हैं।
  10. कई जगह खेत में रात के वक्त मिट्टी के तेल की डिबरी जलाने से नीलगाय नहीं आती है।

आ गया कम कीमत वाला मिनी ट्रेक्टर जो करे बड़े ट्रेक्टर वाले सारे काम

एक किसान के लिए सब से ज्यादा जरूरी एक ट्रेक्टर होता है । लेकिन महंगा होने के कारण हर किसान ट्रेक्टर खरीद नहीं सकता । क्योंकि छोटे से छोटा ट्रेक्टर कम से कम 4 लाख से शुरू होता है।

लेकिन अब एक ऐसा ट्रेक्टर आ गया है जो ट्रेक्टर से 4 गुना कम कीमत पर भी ट्रेक्टर के सभी काम कर सकता है । जी हाँ यह है त्रिशूल कंपनी द्वारा त्यार किया हुआ त्रिशूल मिनी ट्रेक्टर (TRISHOOL MINI TRACTOR)

10 HP से शुरू होने वाले यह मिनी ट्रेक्टर एक छोटे किसान के सारे काम कर सकता है । त्रिशूल मिनी ट्रेक्टर से आप जुताई ,बिजाई ,निराई गुड़ाई ,भार ढोना,कीटनाशक सप्रे आदि काम कर सकते है ।जो किसानों का काम आसान बना देती है। इसके शुरुआती 10 HP वाले ट्रेक्टर की कीमत तकरीबन 1 लाख 75 हजार रु है।

इसके बाकी मॉडल्स की कीमत इस तरह है।

  • 12 HP – 250000/-
  • 16 HP – 265000/-
  • 22 HP – 325000/-

त्रिशूल मिनी ट्रेक्टर 10 HP की जानकारी इस तरह है

  • इंजन – 510 CC ,फोर स्ट्रोक
  • लंबाई – 1950 MM . चौड़ाई – 860 MM. ऊंचाई – 1250 MM.
  • वजन – 550 किलोग्राम
  • इंजन सिलेंडर – एक
  • प्रकार- एयर कूल्ड डीजल इंजन
  • Rated RPM – 3000
  • डीज़ल की खपत – 750 मी.ली एक घंटे में
  • गिअर – 3 आगे, 1 रिवर्स

बाकी मॉडल की जानकारी इस फोटो में देखें

यह मिनी ट्रेक्टर कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें

अगर आप इसे खरीदना चाहते है तो नीचे  दिए हुए नंबर और पते पर संपर्क कर सकते है

  • घोड़ावदार रोड , गोंडल
  • Dist :राजकोट (गुजरात)
  • फ़ोन:9825546964 and 9978443843

एक चरवाहे ने एक व्यापारी को दी ऐसी नसीहत की उसकी जिंदगी बदल गई

एक बहुत ही अमीर व्यापारी था उसका बिज़नेस बहुत बड़ा था और वो अक्सर अपने बिज़नेस को लेकर अलग-अलग राज्यों में घूमता रहता था । बहुत पैसा होने के बावजूद भी वो हर वक़्त चिंता में रहता ।रात को नींद के लिए वो नींद की गोली खाता था ।

ऐसे ही वो एक दिन एक बिज़नेस डील के लिए जा रहा था के रस्ते में उसकी गाड़ी ख़राब हो गई । ड्राईवर ने बोला की इसको ठीक करने के लिए शहर से मकैनिक बुलाना पड़ेगा इस लिए आप थोड़ी देर टहल ले ।

जब व्यापारी वहां घूम रहा था तो उसकी नज़र एक चरवाहे पर पड़ी जो एक पेड़ के नीचे आराम से सो रहा था । व्यापारी हैरान था कोई ऐसे कैसे दिन में आराम से सो सकता है ।व्यापारी से रहा नहीं गया वो चरवाहे के पास चला गया । जब व्यापारी चरवाहे के पास गया तो उसकी नींद खुल गई ।

व्यापारी ने चरवाहे को कहा “तुम यह भेड़ बकरी चरवाने की जगह पर कोई और काम क्यों नहीं करते जिस से तुम्हे और आमदनी हो बहुत पैसा आये”

चरवाहा “और काम से क्या होगा ?”
व्यापारी “अगर अच्छे पैसे होंगे तो तुम शहर जा सकते हो अपना छोटा बिजनेस शुरू कर सकते हो ”

चरवाहा “बिजनेस शुरू करने से क्या होगा ?”
व्यापारी “उस से तुम शहर में बढ़िया घर ले सकते हो तुम्हारे पास नौकर चाकर होंगे, बड़ी गाड़ी होगी ”

चरवाहा “नौकर-चाकर से क्या होगा ?”
व्यापारी “नौकर-चाकर से तुम्हे कोई भी काम करने की जरूरत नहीं रहेगी आराम से टांगे फैला कर सोना ”

चरवाहा ” तो साहब अब भी टांगे फैला कर सो रहा हूँ ,ऐसे ही मेरी नींद खरब की ,मुझे ज्यादा तो नहीं पता पर इतना जरूर कह सकता हूँ की मुझे इस पेड़ के नीचे आप के महल से अच्छी नींद आती है । जिंदगी में बहुत सी चीजें है जो मुफत में मिलती है पैसे से पीछे भागने से पहले उनका आनंद लेना सीखें ”

इतना बोल कर चरवाहा आराम से सो गया और व्यापारी पास में सुन्न बैठा जिंदगी के मायने ढूंढ़ता रहा ।अगर बात अच्छी लगी तो शेयर जरूर करें

मणिपुर के एक किसान ने धान की खेती में किया अनोखा कमाल

मणिपुर के एक किसान ने ऐसा कमाल कर दिखाया है। जिसपर यकीन कर पाना आसान नहीं है। 5 साल पहले 63 साल के  किसान देवकांत ने इम्फाल के अपने घर में चावल की 4 किस्मों की पैदावार शुरू की थी। और देखते ही देखते जैव विविधता को संजोने के माहिर पोतशंगबम देवकांत ने धान की सौ परंपरागत प्रजातियों की ऑर्गेनिक खेती कर एक नई मिसाल कायम कर ली।

वर्तमान समय में देवकांत सिर्फ धान की दुलर्भ प्रजातियों की ही खेती नहीं करते हैं, बल्कि यह प्रजातियां औषधीय गुणों से भी भरपूर होती हैं। उनमें से सबसे मशहूर है  “चखाओ पोरेटन” नाम का काला चावल। इस काले चावल के औषधीय गुणों से वायरल फीवर, नजला, डेंगू, चिकनगुनिया और कैंसर जैसे रोग तक ठीक हो जाते हैं। देवकांत को उनके इस अनोखे काम के लिए 2012 में पीपीवीएफआरए संरक्षण अवार्ड (प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैराइटीज एंड फारमर्स राइट्स एक्ट) भी मिल चुका है।

जुनून और लग्न से हासिल किया मुकाम

मणिपुर के 63 वर्षीय पोतशंगबम देवकांत ने अपने जुनून और लग्न के साथ एक दो नहीं बल्कि 165 तरह के चावलों की किस्मों की खोज कर डाली है। 5 साल पहले पी देवकांत ने इम्फाल के अपने घर में चावल की खेती अपने शौक के लिए शुरु की थी। लेकिन उनका यह जुनून बन गई यह वह खुद भी नहीं जानतें।

देवकांत धान की पारंपरिक किस्मों की तलाश में मणिपुर की पहाड़ियों पर बसे दूरदराज के गांवों की खाक छानते नजर आते हैं। देवकांत को धान की कई किस्मों के बीज मिले, हालांकि कई किस्मों के बीज अब तक वह नहीं जुटा पाए हैं। इस उम्र में भी धान को लेकर देवकांत का जज्बा कम नहीं है और उन्होंने जितनी हो सके, उतनी किस्मों के बीज इकट्ठा करने की ठानी है।

जलवायु नहीं करती सपोर्ट

मणिपुर के पहाड़ी इलाकों की जलवायु एक जैसी नहीं है, हर इलाके की जलवायु अलग किस्म को सपोर्ट करती है। धान की प्रजातियों के लिए मणिपुर बहुत ही समृद्ध राज्य है। अपने हरे-भरे खेतों में देवकांत ने धान की 25 प्रजातियों को उगाया है। हालांकि उन्होंने अब तक सौ देसी प्रजातियों को संरक्षित किया है। आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर इन प्रजातियों को देश भर में उगाया जा सकता है।

इम्फाल के गांव में उनका धान का खेत प्रयोग करने की जगह का रूप ले चुका है। देवकांत को उनके इस अनोखे काम के लिए 2012 में पीपीवीएफआरए संरक्षण अवार्ड (प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैराइटीज एंड फारमर्स राइट्स एक्ट) भी मिल चुका है।

धान की दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण

देवकांत ने पांच बेहद दुलर्भ, आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर और पौष्टिक प्रजातियों को भी संरक्षित किया है, जिसमें चखाओ पोरेटन नाम का काला चावल भी शामिल है। उन्होंने कम पानी में उपजने वाले सफेद चावल के साथ ही भूरे चावल और काले चावल की कई प्रजातियों का प्रचार-प्रसार भी किया है।

कम लागत में ज्यादा मुनाफा लेने के लिए ऐसे करें सहजन की खेती

सहजन की खेती कम समय में मुनाफे का सौदा साबित होने वाली फसल है। कम लागत में तैयार होने वाली इस फसल की खासियत ये है कि इसकी एक बार बुवाई के बाद चार साल तक बुवाई नहीं करनी पड़ती है।

गुजरात के मोरबी जिले से पूरब दिशा से 30 किलोमीटर दूर चूपनी गाँव में किसान प्रतिवर्ष 200 से 250 एकड़ खेत में सहजन की खेती करते हैं।

यहां के किसान पिछले 6 वर्षों से सहजन की खेती कर रहे हैं। उन्होंने इसकी शुरूआत एक एकड़ खेत से की थी और इसके बढ़ते मुनाफे को देखकर अब 250 एकड़ सहजन की खेती की जा रही है। सहजन 300 रोगों की रोकथाम कर सकता है |

चूपनी गाँव में रहने वाले किसान रवि सारदीय (42 वर्ष) बताते हैं, “मैं पिछले तीन साल से सहजन की खेती कर रहा हूं। इसके एक एकड़ में खेती से किसान एक लाख से ज्यादा मुनाफा सिर्फ 10 महीने में कमा सकते हैं। ”

रवि सारदीय ने सहजन की एक नई प्रजाति की खोज की है जिसका नाम है “ज्योति-1” है। इस प्रजाति को लगाने से एक पौधे में 700 फलियां लगती हैं, जबकि दूसरी प्रजाति में सिर्फ 250 ही फलियां लगती हैं |

रवि सारदीय आगे बताते हैं, “एक एकड़ खेत में सहजन के 250 ग्राम बीज की जरूरत होती है,लाइन से लाइन की दूरी 12 फिट और प्लांट से प्लांट की दूरी 7 फिट रखी जाती है, एक एकड़ खेत में 518 पौधे लगाए जाते हैं |

अप्रैल महीने में बुवाई के बाद सितम्बर महीने में फलियां बाजार में बिकनी शुरू हो जाती हैं। ”

गर्मी के मौसम में 10 रुपए किलो और सर्दियों के मौसम में 40 रुपए किलो के हिसाब से बिकती हैं। बारिश के मौसम को छोड़कर सहजन के पेड़ में दो बार फलियां लगती हैं और एक बार सहजन लगाने के बाद 4 साल तक लगातार पैदावार होती है। एक पौधे में लगभग 20 किलो तक सहजन की फलियां लगती हैं।

गोरखपुर में राष्ट्रीय बागवानी शोध एवं विकास संस्थान (एनएचआरडीएफ) के उप निदेशक डॉ रजनीश मिश्र बताते हैं, “करीब पांच हजार साल पहले आयुर्वेद ने सहजन की जिन खूबियों को पहचाना था, आधुनिक विज्ञान में वे साबित हो चुकी हैं।”

देश के अपेक्षाकृत प्रगतिशील दक्षिणी भारत के राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और कर्नाटक में इसकी खेती होती है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने पीकेएम-1 और पीकेएम-2 नाम से दो प्रजातियां विकसित की हैं।”

औषधीय गुणों से भरपूर

डॉ रजनीश मिश्र ने बताया कि सहजन को अंग्रेजी में ड्रमस्टिक कहा जाता है। इसका वनस्पति नाम मोरिंगा ओलिफेरा है। फिलीपीन्स,मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में भी सहजन का उपयोग बहुत अधिक किया जाता है।

दक्षिण भारत में व्यंजनों में इसका उपयोग खूब किया जाता है। सेंजन, मुनगा या सहजन आदि नामों से जाना जाने वाला सहजन औषधीय गुणों से भरपूर है।

इसके अलग-अलग हिस्सों में 300 से अधिक रोगों के रोकथाम के गुण हैं। इसमें 92 तरह के मल्टीविटामिन्स, 46 तरह के एंटी आक्सीडेंट गुण, 36 तरह के दर्द निवारक और 18 तरह के एमिनो एसिड मिलते हैं।

पशुओं के चारे के रूप में उपयोगी

चारे के रूप में इसकी पत्तियों के प्रयोग से पशुओं के दूध में डेढ़ गुना और वजन में एक तिहाई से अधिक की वृद्धि की रिपोर्ट है। कुपोषण, एनीमिया (खून की कमी) में सहजन फायेदमंद होता है।

ऐसे होती है इजराइल में खेती जान कर आप रह जाओगे हैरान

दुनिया में सबको भरपेट खाना मिले और जो खेतों में उगाया जा रहा है उसे सुरक्षित रखा जा सके ये बहुत बड़ी समस्या है। अकेले भारत में हर साल बिना रखरखाव के अरबों रुपये का अन्न बर्बाद हो जाता है।

कभी सूखे से बिना पानी फसलें सूख जाती हैं तो कभी बाढ़ के सैलाब में खेत के खेत बर्बाद हो जाते हैं। जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, वैसे-वैसे मांग भी बढ़ रही है। ऐसे में खेती और खाद्य सुरक्षा जरूरी होता जा रही है।

भारत ही नहीं दुनिया का लगभग हर देश इन समस्याओं से जूझ रहा है। लेकिन युवा किसानों का देश कहे जाने वाले इजरायल ने खेती से जुड़ी कई समस्याओं पर न सिर्फ विजय पाई है बल्कि दुनिया के सामने खेती को फायदे का सौदा बनाने के उदाहरण रखे हैं।

1950 से हरित क्रांति के बाद इस देश ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इजरायल ने केवल अपने मरुस्थलों को हराभरा किया, बल्कि अपनी खोजों को चैनलों और एमएएसएचएवी (MASHAV, विदेश मामलों का मंत्रालय) के माध्यमों से प्रसारित किया ताकि अन्य देशों के लोग भी इसका लाभ उठा पाएं। इजरायल-21 सी न्यूज पार्टल ने ऐसे की कुछ प्रमुख मुद्दों को उठाया है जिससे अन्न उत्पादन और उसके रखरखाव के लिए पूरे विश्व में इजरायल की तूती बोल रही है।

1-टपकन सिंचाई (ड्रिप इरगेशन)- पानी और पैसा दोनों बचाइए

इस मामले कोई आधुनिक और ज्यादा कारगर खोज अभी तक नहीं हो पाई है। इजरायल में भी ये प्रथा पहले से ही अस्तित्व में थी। इजरायल की वाटर इंजीनियर सिम्चा ब्लास ने इस पद्धति में नई क्रांति ला दी।

सिम्चा ने खोज की कि अगर ड्रिप को धीमा और संतुलित कर दिया जाए तो उत्पादन क्षमता बढ़ सकती है। उन्होंने ऐसे ट्यूब का निर्माण किया, जिससे पानी की मात्रा कम होकर गिरने लगी, ये ज्यादा कारगर साबित हुआ। इस पद्धति पर उन्होंने काम शुरू किया इससे संबंधित फर्म भी बनाया।

इजरायल की ये टपका सिंचाई विधि अब कई देशों में इस्तेमाल की जा रही है। इस विधि से इजरायल से बाहर लगभग 700 ऐसे किसान परिवार हैं जो साल में अब तीन फसलें पैदा कर रहे हैं जो कि पहले एक बार ही होता।

2-अन्न कोष- सुरक्षित रखे जा सकते हैं अनाज

इजरायल ने एक ऐसे अन्न कोष का निर्माण किया है जिसमें किसान कम खर्चों में ही अपनी फसल को ताजा और सुरक्षित रख सकते हैं।

इंटरनेशनल फूड टेक्नोलॉजी कंसलटेंट प्रोफेसर श्लोमो नवार्रो ने इस बड़े बैग को बनाया है। ये बैग हवा और पानी, दोनों से सुरक्षित रहेगा।

बैग का प्रयोग पूरे अफ्रीका के साथ-साथ कई सम्पन्न देशों में किया जा रहा है। पाकिस्तान ने भी इस बैग के लिए इजरायल के साथ समझौता किया है।

50 प्रतिशत से ज्यादा फसलें उत्पादन के बाद कीड़े और फफूंद की वजह से खराब हो जाती हैं। ऐसे में ये बैग उपज की सुरक्षा के लिए कारगार साबित हो रहा है। भीषण गर्मी और सीलने होने के बाद भी इस बैग में रखी फसलें सुरक्षित रहती हैं।

3- जैविक कीट नियंत्रण- शत्रु कीटों पर हमला, मित्र कीटों का संरक्षण

बायो-बी नामक कंपनी ने ऐसे कीट नियंत्रक दवा का निर्माण किया है जिसके छिड़काव से कीड़े तो दूर रहते हैं लेकिन इससे मक्खी और भौरों को कोई नुकसान नहीं होता। कंपनी परागण के लिए भौरों का भी प्रयोग करती है।

ऐसे में परागण की प्रक्रिया प्रभावित नहीं होती। कंपनी के मैनेजर डॉ शीमोन ने बताया कि हमारी कंपनी कीटनाशक दवाओं की बिक्री के मामले प्रमुख कंपनियों में से एक है।

कैलिफोर्निया में पैदा होने वाले 60 फीसदी स्ट्राबेरी पर 1990 से इसी दवा का छिड़काव किया जा रहा है, और इसके प्रयोग के बाद से पैदावार में 75 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। बायो बी की दवा और भौरों का प्रयोग इस समय 32 देशों में किया जा रहा है, जिसमें जापान और चिली भी शामिल हैं।

4-डेयरी फार्मिंग

होफ हैशरोन डेयरी फार्म (Hof Hashron), एसएई एफिकिम (SAE Afikim) और एससीआर प्रीसाइज डेयरी फार्म (SCR Precies Dairy Farming) ने मवेशियों के झुंड प्रबंधन की नई तकनीकी ईजाद की और इसका प्रयोग अपने डेयरी उत्पादन में बखूबी कर रहे हैं।

एसएई एफिकिम वियतनाम में चल रहे उस पांच साल के प्रोजेक्ट का भी हिस्सा है जिसका लक्ष्य 5 लाख मिलियन डेयरी फार्म का है, जो दुनिया का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है। प्रोजेक्ट के चैनल में 30 हजार गायों को जोड़ा जा चुका है, कार्यक्षेत्र 12 राज्यों में फैला हुआ है।

इसके माध्यम से प्रतिदिन 3 लाख लीटर दूध की सप्लाई की जा रही है। चायना ने इससे प्रभावित होकर इससे संबधित मंत्रालयों को लोगों को इजरायल भेजता है और कहता है कि इजराय से सीखने लायक है कि कैसे दुग्ध उत्पादन बढ़ाया जाए।

5- हवा से निचोड़ रहे पानी की हर बूंद (ओस की बूंदों से सिंचाई)

ताल-या वाटर टेक्नोलाजी ने दोबारा प्रयोग में लिए जाने वाले ऐसे प्लास्टिक ट्रे का निर्माण किया है जिससे हवा से ओस की बूंदे एकत्र की जा सकती है।

दांतेदार आकार का ये ट्रे प्लास्टिक को रीसाइकिल करके बनाया जाता है। इसमें यूवी फिल्टर और चूने का पत्थर लगाकर पेड़ों के आसपास इसे लगाया जाता है।

रात को ये ट्रे ओस की बूंदों को साख लेता है और बूंदों को पौधों की जड़ों तक पहुंचाता है। इसके निर्माता अवराहम तामिर बताते हैं ट्रे कड़ी धूप से भी पौधों को बचाता है। इस विधि से पौधों की 50 प्रतिशत पानी की जरूरत पूरी हो जाती है।

6-रेगिस्तान में पालते हैं मछली

मछलियों को अत्यधिक पकड़ाजाना खाद्य सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन जाता है, वो भी ऐसे में जब मछली ही हजारों लोगों के लिए प्रोटीन का मुख्य जरिया हो। इजरायल में भी ऐसी समस्या थी।

लेकिन अब इजरायल में अब कहीं भी मछलियां मिल जाती है। इसे संभव बनाया जीएफए (ग्रो फिश एनव्हेयर) के एडवांस्ड तकनीकी ने।

इजरायल के जीरो डिस्चार्ज सिस्टम ने मछली पालन के लिए बिजली और मौसम की बाध्यता को खत्म कर दिया। बिजली और मौसम मछली पालन के लिए बड़ी समस्या बन रहे थे। इस तकनीकी में एक ऐसा टैंकर बनाया जाता है जिनपर इस समस्याओं का असर नहीं पड़ता। अमेरिका में इस तकनीकी का प्रयोग बड़ी संख्या में किया जा रहा है।