मणिपुर के एक किसान ने धान की खेती में किया अनोखा कमाल

मणिपुर के एक किसान ने ऐसा कमाल कर दिखाया है। जिसपर यकीन कर पाना आसान नहीं है। 5 साल पहले 63 साल के  किसान देवकांत ने इम्फाल के अपने घर में चावल की 4 किस्मों की पैदावार शुरू की थी। और देखते ही देखते जैव विविधता को संजोने के माहिर पोतशंगबम देवकांत ने धान की सौ परंपरागत प्रजातियों की ऑर्गेनिक खेती कर एक नई मिसाल कायम कर ली।

वर्तमान समय में देवकांत सिर्फ धान की दुलर्भ प्रजातियों की ही खेती नहीं करते हैं, बल्कि यह प्रजातियां औषधीय गुणों से भी भरपूर होती हैं। उनमें से सबसे मशहूर है  “चखाओ पोरेटन” नाम का काला चावल। इस काले चावल के औषधीय गुणों से वायरल फीवर, नजला, डेंगू, चिकनगुनिया और कैंसर जैसे रोग तक ठीक हो जाते हैं। देवकांत को उनके इस अनोखे काम के लिए 2012 में पीपीवीएफआरए संरक्षण अवार्ड (प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैराइटीज एंड फारमर्स राइट्स एक्ट) भी मिल चुका है।

जुनून और लग्न से हासिल किया मुकाम

मणिपुर के 63 वर्षीय पोतशंगबम देवकांत ने अपने जुनून और लग्न के साथ एक दो नहीं बल्कि 165 तरह के चावलों की किस्मों की खोज कर डाली है। 5 साल पहले पी देवकांत ने इम्फाल के अपने घर में चावल की खेती अपने शौक के लिए शुरु की थी। लेकिन उनका यह जुनून बन गई यह वह खुद भी नहीं जानतें।

देवकांत धान की पारंपरिक किस्मों की तलाश में मणिपुर की पहाड़ियों पर बसे दूरदराज के गांवों की खाक छानते नजर आते हैं। देवकांत को धान की कई किस्मों के बीज मिले, हालांकि कई किस्मों के बीज अब तक वह नहीं जुटा पाए हैं। इस उम्र में भी धान को लेकर देवकांत का जज्बा कम नहीं है और उन्होंने जितनी हो सके, उतनी किस्मों के बीज इकट्ठा करने की ठानी है।

जलवायु नहीं करती सपोर्ट

मणिपुर के पहाड़ी इलाकों की जलवायु एक जैसी नहीं है, हर इलाके की जलवायु अलग किस्म को सपोर्ट करती है। धान की प्रजातियों के लिए मणिपुर बहुत ही समृद्ध राज्य है। अपने हरे-भरे खेतों में देवकांत ने धान की 25 प्रजातियों को उगाया है। हालांकि उन्होंने अब तक सौ देसी प्रजातियों को संरक्षित किया है। आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर इन प्रजातियों को देश भर में उगाया जा सकता है।

इम्फाल के गांव में उनका धान का खेत प्रयोग करने की जगह का रूप ले चुका है। देवकांत को उनके इस अनोखे काम के लिए 2012 में पीपीवीएफआरए संरक्षण अवार्ड (प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैराइटीज एंड फारमर्स राइट्स एक्ट) भी मिल चुका है।

धान की दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण

देवकांत ने पांच बेहद दुलर्भ, आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर और पौष्टिक प्रजातियों को भी संरक्षित किया है, जिसमें चखाओ पोरेटन नाम का काला चावल भी शामिल है। उन्होंने कम पानी में उपजने वाले सफेद चावल के साथ ही भूरे चावल और काले चावल की कई प्रजातियों का प्रचार-प्रसार भी किया है।

कम लागत में ज्यादा मुनाफा लेने के लिए ऐसे करें सहजन की खेती

सहजन की खेती कम समय में मुनाफे का सौदा साबित होने वाली फसल है। कम लागत में तैयार होने वाली इस फसल की खासियत ये है कि इसकी एक बार बुवाई के बाद चार साल तक बुवाई नहीं करनी पड़ती है।

गुजरात के मोरबी जिले से पूरब दिशा से 30 किलोमीटर दूर चूपनी गाँव में किसान प्रतिवर्ष 200 से 250 एकड़ खेत में सहजन की खेती करते हैं।

यहां के किसान पिछले 6 वर्षों से सहजन की खेती कर रहे हैं। उन्होंने इसकी शुरूआत एक एकड़ खेत से की थी और इसके बढ़ते मुनाफे को देखकर अब 250 एकड़ सहजन की खेती की जा रही है। सहजन 300 रोगों की रोकथाम कर सकता है |

चूपनी गाँव में रहने वाले किसान रवि सारदीय (42 वर्ष) बताते हैं, “मैं पिछले तीन साल से सहजन की खेती कर रहा हूं। इसके एक एकड़ में खेती से किसान एक लाख से ज्यादा मुनाफा सिर्फ 10 महीने में कमा सकते हैं। ”

रवि सारदीय ने सहजन की एक नई प्रजाति की खोज की है जिसका नाम है “ज्योति-1” है। इस प्रजाति को लगाने से एक पौधे में 700 फलियां लगती हैं, जबकि दूसरी प्रजाति में सिर्फ 250 ही फलियां लगती हैं |

रवि सारदीय आगे बताते हैं, “एक एकड़ खेत में सहजन के 250 ग्राम बीज की जरूरत होती है,लाइन से लाइन की दूरी 12 फिट और प्लांट से प्लांट की दूरी 7 फिट रखी जाती है, एक एकड़ खेत में 518 पौधे लगाए जाते हैं |

अप्रैल महीने में बुवाई के बाद सितम्बर महीने में फलियां बाजार में बिकनी शुरू हो जाती हैं। ”

गर्मी के मौसम में 10 रुपए किलो और सर्दियों के मौसम में 40 रुपए किलो के हिसाब से बिकती हैं। बारिश के मौसम को छोड़कर सहजन के पेड़ में दो बार फलियां लगती हैं और एक बार सहजन लगाने के बाद 4 साल तक लगातार पैदावार होती है। एक पौधे में लगभग 20 किलो तक सहजन की फलियां लगती हैं।

गोरखपुर में राष्ट्रीय बागवानी शोध एवं विकास संस्थान (एनएचआरडीएफ) के उप निदेशक डॉ रजनीश मिश्र बताते हैं, “करीब पांच हजार साल पहले आयुर्वेद ने सहजन की जिन खूबियों को पहचाना था, आधुनिक विज्ञान में वे साबित हो चुकी हैं।”

देश के अपेक्षाकृत प्रगतिशील दक्षिणी भारत के राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और कर्नाटक में इसकी खेती होती है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने पीकेएम-1 और पीकेएम-2 नाम से दो प्रजातियां विकसित की हैं।”

औषधीय गुणों से भरपूर

डॉ रजनीश मिश्र ने बताया कि सहजन को अंग्रेजी में ड्रमस्टिक कहा जाता है। इसका वनस्पति नाम मोरिंगा ओलिफेरा है। फिलीपीन्स,मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में भी सहजन का उपयोग बहुत अधिक किया जाता है।

दक्षिण भारत में व्यंजनों में इसका उपयोग खूब किया जाता है। सेंजन, मुनगा या सहजन आदि नामों से जाना जाने वाला सहजन औषधीय गुणों से भरपूर है।

इसके अलग-अलग हिस्सों में 300 से अधिक रोगों के रोकथाम के गुण हैं। इसमें 92 तरह के मल्टीविटामिन्स, 46 तरह के एंटी आक्सीडेंट गुण, 36 तरह के दर्द निवारक और 18 तरह के एमिनो एसिड मिलते हैं।

पशुओं के चारे के रूप में उपयोगी

चारे के रूप में इसकी पत्तियों के प्रयोग से पशुओं के दूध में डेढ़ गुना और वजन में एक तिहाई से अधिक की वृद्धि की रिपोर्ट है। कुपोषण, एनीमिया (खून की कमी) में सहजन फायेदमंद होता है।

ऐसे होती है इजराइल में खेती जान कर आप रह जाओगे हैरान

दुनिया में सबको भरपेट खाना मिले और जो खेतों में उगाया जा रहा है उसे सुरक्षित रखा जा सके ये बहुत बड़ी समस्या है। अकेले भारत में हर साल बिना रखरखाव के अरबों रुपये का अन्न बर्बाद हो जाता है।

कभी सूखे से बिना पानी फसलें सूख जाती हैं तो कभी बाढ़ के सैलाब में खेत के खेत बर्बाद हो जाते हैं। जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, वैसे-वैसे मांग भी बढ़ रही है। ऐसे में खेती और खाद्य सुरक्षा जरूरी होता जा रही है।

भारत ही नहीं दुनिया का लगभग हर देश इन समस्याओं से जूझ रहा है। लेकिन युवा किसानों का देश कहे जाने वाले इजरायल ने खेती से जुड़ी कई समस्याओं पर न सिर्फ विजय पाई है बल्कि दुनिया के सामने खेती को फायदे का सौदा बनाने के उदाहरण रखे हैं।

1950 से हरित क्रांति के बाद इस देश ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इजरायल ने केवल अपने मरुस्थलों को हराभरा किया, बल्कि अपनी खोजों को चैनलों और एमएएसएचएवी (MASHAV, विदेश मामलों का मंत्रालय) के माध्यमों से प्रसारित किया ताकि अन्य देशों के लोग भी इसका लाभ उठा पाएं। इजरायल-21 सी न्यूज पार्टल ने ऐसे की कुछ प्रमुख मुद्दों को उठाया है जिससे अन्न उत्पादन और उसके रखरखाव के लिए पूरे विश्व में इजरायल की तूती बोल रही है।

1-टपकन सिंचाई (ड्रिप इरगेशन)- पानी और पैसा दोनों बचाइए

इस मामले कोई आधुनिक और ज्यादा कारगर खोज अभी तक नहीं हो पाई है। इजरायल में भी ये प्रथा पहले से ही अस्तित्व में थी। इजरायल की वाटर इंजीनियर सिम्चा ब्लास ने इस पद्धति में नई क्रांति ला दी।

सिम्चा ने खोज की कि अगर ड्रिप को धीमा और संतुलित कर दिया जाए तो उत्पादन क्षमता बढ़ सकती है। उन्होंने ऐसे ट्यूब का निर्माण किया, जिससे पानी की मात्रा कम होकर गिरने लगी, ये ज्यादा कारगर साबित हुआ। इस पद्धति पर उन्होंने काम शुरू किया इससे संबंधित फर्म भी बनाया।

इजरायल की ये टपका सिंचाई विधि अब कई देशों में इस्तेमाल की जा रही है। इस विधि से इजरायल से बाहर लगभग 700 ऐसे किसान परिवार हैं जो साल में अब तीन फसलें पैदा कर रहे हैं जो कि पहले एक बार ही होता।

2-अन्न कोष- सुरक्षित रखे जा सकते हैं अनाज

इजरायल ने एक ऐसे अन्न कोष का निर्माण किया है जिसमें किसान कम खर्चों में ही अपनी फसल को ताजा और सुरक्षित रख सकते हैं।

इंटरनेशनल फूड टेक्नोलॉजी कंसलटेंट प्रोफेसर श्लोमो नवार्रो ने इस बड़े बैग को बनाया है। ये बैग हवा और पानी, दोनों से सुरक्षित रहेगा।

बैग का प्रयोग पूरे अफ्रीका के साथ-साथ कई सम्पन्न देशों में किया जा रहा है। पाकिस्तान ने भी इस बैग के लिए इजरायल के साथ समझौता किया है।

50 प्रतिशत से ज्यादा फसलें उत्पादन के बाद कीड़े और फफूंद की वजह से खराब हो जाती हैं। ऐसे में ये बैग उपज की सुरक्षा के लिए कारगार साबित हो रहा है। भीषण गर्मी और सीलने होने के बाद भी इस बैग में रखी फसलें सुरक्षित रहती हैं।

3- जैविक कीट नियंत्रण- शत्रु कीटों पर हमला, मित्र कीटों का संरक्षण

बायो-बी नामक कंपनी ने ऐसे कीट नियंत्रक दवा का निर्माण किया है जिसके छिड़काव से कीड़े तो दूर रहते हैं लेकिन इससे मक्खी और भौरों को कोई नुकसान नहीं होता। कंपनी परागण के लिए भौरों का भी प्रयोग करती है।

ऐसे में परागण की प्रक्रिया प्रभावित नहीं होती। कंपनी के मैनेजर डॉ शीमोन ने बताया कि हमारी कंपनी कीटनाशक दवाओं की बिक्री के मामले प्रमुख कंपनियों में से एक है।

कैलिफोर्निया में पैदा होने वाले 60 फीसदी स्ट्राबेरी पर 1990 से इसी दवा का छिड़काव किया जा रहा है, और इसके प्रयोग के बाद से पैदावार में 75 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। बायो बी की दवा और भौरों का प्रयोग इस समय 32 देशों में किया जा रहा है, जिसमें जापान और चिली भी शामिल हैं।

4-डेयरी फार्मिंग

होफ हैशरोन डेयरी फार्म (Hof Hashron), एसएई एफिकिम (SAE Afikim) और एससीआर प्रीसाइज डेयरी फार्म (SCR Precies Dairy Farming) ने मवेशियों के झुंड प्रबंधन की नई तकनीकी ईजाद की और इसका प्रयोग अपने डेयरी उत्पादन में बखूबी कर रहे हैं।

एसएई एफिकिम वियतनाम में चल रहे उस पांच साल के प्रोजेक्ट का भी हिस्सा है जिसका लक्ष्य 5 लाख मिलियन डेयरी फार्म का है, जो दुनिया का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है। प्रोजेक्ट के चैनल में 30 हजार गायों को जोड़ा जा चुका है, कार्यक्षेत्र 12 राज्यों में फैला हुआ है।

इसके माध्यम से प्रतिदिन 3 लाख लीटर दूध की सप्लाई की जा रही है। चायना ने इससे प्रभावित होकर इससे संबधित मंत्रालयों को लोगों को इजरायल भेजता है और कहता है कि इजराय से सीखने लायक है कि कैसे दुग्ध उत्पादन बढ़ाया जाए।

5- हवा से निचोड़ रहे पानी की हर बूंद (ओस की बूंदों से सिंचाई)

ताल-या वाटर टेक्नोलाजी ने दोबारा प्रयोग में लिए जाने वाले ऐसे प्लास्टिक ट्रे का निर्माण किया है जिससे हवा से ओस की बूंदे एकत्र की जा सकती है।

दांतेदार आकार का ये ट्रे प्लास्टिक को रीसाइकिल करके बनाया जाता है। इसमें यूवी फिल्टर और चूने का पत्थर लगाकर पेड़ों के आसपास इसे लगाया जाता है।

रात को ये ट्रे ओस की बूंदों को साख लेता है और बूंदों को पौधों की जड़ों तक पहुंचाता है। इसके निर्माता अवराहम तामिर बताते हैं ट्रे कड़ी धूप से भी पौधों को बचाता है। इस विधि से पौधों की 50 प्रतिशत पानी की जरूरत पूरी हो जाती है।

6-रेगिस्तान में पालते हैं मछली

मछलियों को अत्यधिक पकड़ाजाना खाद्य सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन जाता है, वो भी ऐसे में जब मछली ही हजारों लोगों के लिए प्रोटीन का मुख्य जरिया हो। इजरायल में भी ऐसी समस्या थी।

लेकिन अब इजरायल में अब कहीं भी मछलियां मिल जाती है। इसे संभव बनाया जीएफए (ग्रो फिश एनव्हेयर) के एडवांस्ड तकनीकी ने।

इजरायल के जीरो डिस्चार्ज सिस्टम ने मछली पालन के लिए बिजली और मौसम की बाध्यता को खत्म कर दिया। बिजली और मौसम मछली पालन के लिए बड़ी समस्या बन रहे थे। इस तकनीकी में एक ऐसा टैंकर बनाया जाता है जिनपर इस समस्याओं का असर नहीं पड़ता। अमेरिका में इस तकनीकी का प्रयोग बड़ी संख्या में किया जा रहा है।

हार्ट अटैक से एक महीने पहले आपकी बॉडी देती है वॉर्निंग, नज़रअंदाज़ ना करें ये लक्षण

भारत समेत दुनिया भर में सबसे ज़्यादा मौतें हृदयाघात या हार्ट अटैक से होती हैं। ऐसा माना जाता है कि अटैक से कुछ समय पहले ही इसके संकेत मिलना शुरू हो जाते हैं लेकिन लोग इन लक्षणों को आम समझ कर इन्हें नज़रअंदाज़ कर देते हैं जिसकी वजह से उनकी जान पे बन आती है। आइए जानते हैं कि कौन से हैं वो लक्षण जिनपर आपको हमेशा गौर करते रहना चाहिए।

तकनीकी रूप से हार्ट अटैक तब आता है जब हार्ट का कोई हिस्सा ब्लॉक हो जाता है एवं हार्ट को ऑक्सीजनयुक्त रक्त नहीं मिल पाता। ऐसे में तुरंत इलाज न मिलने पर मरीज़ की मृत्यु भी हो सकती है। ऐसी स्थिति बनने से पहले ही आप हाई ब्लडप्रैशर के शिकार हो जाते हैं तो यदि आपको उच्च रक्तचाप की शिकायत है तो अभी से सावधान हो जाएं।

हमारे दिल की सेहत में हुए बदलाव को जिस लक्षण के रूप में पहचाना जा सकता है वह है

थकान- थकान से यहाँ अभिप्राय है कि बिना श्रम करे अथवा मामूली कार्य करने में भी यदि अक्सर थकान महसूस करते हैं तो यह एक चिंता का कारण हो सकता है। यदि अपने पर्याप्त मात्रा में भोजन किया हो तथा नींद भी भरपूर ली हो तब भी यदि आपको थकान महसूस हो तो यह सामान्य बात नहीं है।

बेवजह नींद उचटना-दूसरा लक्षण है बेवजह नींद उचटना। यदि बार-बार आप नींद से जाग जाते हैं तो यह आपके अवचेतन का आपको जताने का एक तरीका है कि आपके शरीर के साथ कुछ ठीक नहीं है। ऐसे में बार-बार आपको लग सकता है कि आपको बाथरूम जाना है अथवा आपको बार-बार प्यास लगने के कारण उठना पड़ता है।

अपच की शिकायत -सामान्य भोजन करने के पश्चात् भी यदि आपको अपच की शिकायत रहती है तो यह भी आपके दिल की सेहत से जुड़ा मामला हो सकता है।यदि आप इन लक्षणों को महसूस कर रहे हैं तो आज ही आपको सजग हो जाना चाहिए। हमारी सेहत का ख्याल रखना हमारा परम कर्तव्य है। बिना समय गंवाए अपने दिल की जाँच कराएं और आवश्यक उपचार करें।

अन्य लक्षण जो कि हार्ट की किसी समस्या को इंगित करता है वह है हांफ भर आना। जब शरीर को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल पाती उस परिस्थिति में ऐसा होता है। इसके अलावा अक्सर आपको गहरी सांस लेने की भी आवश्यकता महसूस होती है।

अब हिरा रेन गन से जब चाहे खेत में बारिश होगी

भारत की खेती मानसून पर निर्भर है देशभर में मानसून की रफ्तार को लेकर कयास लगते रहते हैं कि मानसून समय पर पहुंचेगा या नहीं। लेकिन इसके उल्ट हिरा रेन गन से अब जब चाहो तब बारिश होगी।

चौकिए मत…! हिरा रेन गन लगाने के बाद सिंचाई के लिए प्रबंधन को न तो नहर की आवश्यकता होती है और न ही बारिश के लिए आसमान का मुंह ताकना होगा। रेन गन से आप जब चाहो बारिश की बौछारें पैदा कर सकेंगा। रेन गन से पानी की खपत कम हो जाती है ।

रेन गन सिस्टम लगने के बाद पानी की खपत 10 गुना कम हो जाती है। हिरा रेन गन से आप फसल को जितना चाहे, जब चाहे, नियंत्रित पानी देने की व्यवस्था होती है ।

रेन गन की इस्तमाल कहाँ क्या जा सकता है

  • गन्ने, मुँगफली,बाजरा,गेहूँ, चने और दालो की खेती में प्रयोग होता है ।
  • इनका उपयोग चाय बागान,कॉफी पौधकरन में भी किया जाता है ।
  • धूल दमन, हरी चराई, खेल के मैदान और गोल्फ कोर्स में इस्तेमाल होता है ।

हिरा रेन गन के दो मॉडल आते है जिनकी विशेषता निचे लिखी हुई है

पेंग्विन 

  • नोजल (मिमी) 12×4
  • प्रेशर (प्रेशर/ सेमी²) 4
  • रेडीअस (मीटर) 26
  • डिस्चार्ज (लिटर मिनट) 211

पेलिकन 

  • नोजल (मिमी) 14×5
  • प्रेशर (प्रेशर/ सेमी²) 4
  • रेडीअस (मीटर) 26
  • डिस्चार्ज (लिटर मिनट) 277

हिरा रेन गन के दोनों मॉडल की कीमत

  • पेंगुइन रेन गन = 2200 Rs. और स्टैंड = 2000 Rs.
  • पेलिकन रेन गन = 3300 Rs.और स्टैंड = 2500 Rs

भविष्य में इस तरह की अलग – अलग जानकारी इस तरह ही अलग – अलग तरीको से देते जाएगे तो आप हमसे जानकारी पाने के लिए हमसे जुड़ सकते हें.

और ज्यादा जानकारी के लिए निचे दिए हुए नंबर पर संपर्क करें

हिरा अॅग्रो कॅाल सेंटर से 7741903237 / 9370722722  संपर्क करे.

रेन गन कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

ग्रीन हाउस निर्माण की लागत और आमदनी

ग्रीनहाउस क्या है ? वास्तव में ग्रीन हाउस एक ऐसी निर्मित संरचना है जो पारदर्शी सामग्री से ढंकी होती है। ग्रीनहाउस सब्जियों और फुलों की वृद्धि के लिए नियंत्रित वातावरण की परिस्थितियां उपलब्ध कराता है। परंपरागत तरीके में खुली ज़मीन पर होने वाली खेती की तुलना में कम ज़मीन पर नियंत्रित खेती और अधिक उत्पादकता की वजह से भारत में इन दिनों ग्रीनहाउस की अवधारणा लोकप्रिय होती जा रही है।

ग्रीनहाउस खेती में आरंभिक निवेश लागत अधिक होती है। हालांकि ग्रीनहाउस संरचना के निर्माण के लिए लोन या सब्सिडी का विकल्प भी उपलब्ध है। आरंभिक स्तर पर लागत को कम करने के लिए कम लागत या कम प्रौद्योगिकी वाली ग्रीनहाउस संरचना के निर्माण का भी विकल्प उपलब्ध है जिसमें स्थानीय सामग्रियों मसलन बांस, लकड़ियों आदि का इस्तेमाल करके ग्रीनहाउस की सामान्य संरचना तैयार की जाती है।

इस लेख में हम उदाहरण के लिए निर्यात बाजार और घरेलु जरूरतों की पूर्ती के लिए गुलाब के फुलों के उत्पादन के मॉडल और उसके लिए तैयार की जाने वाली ग्रीनहाउस संरचना की लागत को सामने रख कर विचार करते हैं।

ग्रीनहाउस संरचना के निर्माण में लगने वाली सामग्री निम्नलिखित हैं

ज़मीन खरीद की आवश्यकता (लोकेशन बहुत महत्वपूर्ण, स्थानीय बाज़ार के नजदीक जमीन लेना अच्छा विचार)
ग्रीनहाउस संरचना का निर्माण (सामग्रियों सहित)
संरचना में लगने वाली सामग्रियों की खरीद
सिंचाई में काम आने वाली सामग्रियों की खरीद
फर्टिलाइज़र से जुड़ी सामग्री की खरीद
ग्रेडिंग और पैकिंग के लिए जगह की खरीद
रेफ्रेजरेटेड वैन की खरीद
कार्यालय उपकरण की खरीद
निर्यात के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी की खरीद
इन सभी संसाधनों को तैयार करने के लिए लगने वाली मजदूरी
तकनीक से जुड़े श्रमिकों पर होने वाले खर्च
कीटनाशकों, ऊर्वरकों & प्रेजेर्वेटिव्स की खरीद की लागत

ग्रीन हाउस कृषि में दो प्रकार की लागत आती है

1) निश्चित लागत वाली सामग्री

स्थायी सामग्री की लागत उदाहरण के लिए जमीन की लागत, निर्माण सामग्री की लागत, सिंचाई सुविधा या अन्य जरूरी सामग्रियों की लागत

2) समय समय पर होने वाले खर्च या आवर्ती लागत

पौधों को लगाने में होने वाले खर्च, बुआई की लागत, रखरखाव और मजदूरों पर आने वाले खर्च, स्टोरेज, पैकिंग और ढुलाई पर होने वाले खर्च आदि आदि।

दोनों ही परिस्थितियों में आने वाले खर्च का एक प्रकार का लेखा जोखा नीचे दिया गया है। नीचे दिए गए ये खर्च एक हेक्टेयर के ग्रीन हाउस में गुलाब की खेती से जुड़ा है।

निवेशक के द्वारा लगाया जाने वाले प्रारंभिक निवेश

प्रोजेक्ट की कुल लागत का 25 फ़ीसदी उद्यमी की ओर से लगाया जाएगा
मूल धन और ब्याज सात साल में वापिस किए जाने हैं जिसमें पहले साल ब्याज औऱ दो साल तक मूल धन पर रोक रहेगी।

स्थायी लागत का वर्णन इस प्रकार है                                                               सम्मिलित सामग्री राशि (रुपये में)

ज़मीन & उसको तैयार करने का खर्च                                                                          4 लाख
ग्रीन हाउस की लागत                                                                                                    13 लाख
कोल्ड स्टोरेज की लागत                                                                                              10 लाख
ऑफिस एरिया की लागत                                                                                            2.5 लाख
ग्रेडिंग & पैकिंग की लागत                                                                                          5 लाख
रेफ्रिजरेडेट वैन की लागत                                                                                           1 लाख
जेनेरेटर सेट                                                                                                               2 लाख
फैक्स, टेलिफोन, कम्प्यूटर                                                                                     1 लाख
फर्नीचर की लागत                                                                                                      50 हजार
विधुत आपूर्ति की स्थापना का खर्च                                                                     2 लाख
जल आपूर्ति, ड्रीप सिंचाई & फागिंग मशीन की प्रणाली का खर्च                                          6 लाख
बुआई सामग्री & बुआई की लागत                                                                         30 लाख
कुल                                                                                                                       77 लाख

प्रोजेक्ट की आवर्ती लागत का ब्यौरा

संख्या सामग्री खर्च

इलेक्ट्रिसिटी चार्ज प्रति वर्ष                                                                                     6 लाख
खाद & फर्टीलाइजर की लागत                                                                              1 लाख
पौधों की सुरक्षा का खर्च                                                                                          1 लाख
प्रीजरवेटिव्स की लागत                                                                                        3 लाख
पैकिंग सामग्री की लागत                                                                                      2 लाख
हवाई माल ढुलाई का खर्च                                                                                  125 लाख
श्रमिकों का खर्च                                                                                                      3 लाख
कमीशन/इंश्योरेंस                                                                                                  15 लाख
वेतन कर्मचारियों का                                                                                              5 लाख
उपरी लागत                                                                                                            50 हजार
अन्य खर्च                                                                                                                 4 लाख
कुल आवर्ति लागत                                                                                              166.5 लाख

इस तरह से ग्रीन हाउस प्रोजेक्ट की लागत स्थायी और आवर्ती लागत मिला कर पहले साल में 2 करोड़ 43 लाख और 50 हजार रुपया आता है।

इस प्रोजेक्ट से होने वाले उत्पादन का ब्यौरा

  • प्रति हेक्टेयर गुलाब के पौधों की संख्या – साठ हजार
    प्रत्येक पौधे से मिलने वाले गुलाब की संख्या – 100 से 150
  • निर्यात की गुणवत्ता वाले गुलाब की संख्या – 60-100
  • अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रति गुलाब मिलने वाली कीमत – 6-11 रुपया
  • प्रति एकड़ में निर्यात किए जा सकने लायक गुलाब की संख्या – साठ लाख गुलाब
  • निर्यात से होने वाली आमदनी – कम से कम तीन करोड़ रुपया सालाना
  • ये आमदनी ग्रीन हाउस की स्थिति और वर्तमान बाजार मूल्य के मुताबिक परिवर्तिनीय है।

किसानो को बड़ी राहत, ट्रेक्टर और खाद की जीएसटी में मिली इतने फीसदी की छूट

जीएसटी काउंसिल ने किसानों को बड़ी राहत दी है. अब फर्टिलाइजर पर जीएसटी के तहत 12 फीसदी की बजाए 5 फीसदी टैक्स ही देना होगा. शुक्रवार को जीएसटी काउंसिल की बैठक में इस पर फैसला लिया गया. ट्रैक्‍टर के कल-पूर्जों पर भी टैक्‍स 28 फीसदी से कम करके 18 फीसदी कर दिया गया है.

अभी 8 फीसदी तक था टैक्‍स

फर्टिलाइजर पर 12 फीसदी टैक्‍स लगाए जाने पर कई राज्‍यों ने चिंता जताई थी. उनकी दलील थी कि इससे किसानों पर बोझ बढ़ेगा. जीएसटी लागू होने से पहले अभी तक खाद पर शून्‍य से लेकर 8 फीसदी तक टैक्‍स लगता था.

550 लाख टन खाद का होता है उपयोग

देश में हर साल करीब 22.4 करोड़ टन खाद्यान्‍न का उत्‍पादन होता है, जिसके लिए किसान करीब 550 लाख टन खाद का उपयोग करते हैं. अगर खाद पर 12 फीसदी टैक्‍स लगाया जाता तो 50 किलो के एक यूरिया बैग की कीमत में 35 रुपए का इजाफा हो जाता. लेकिन जीएसटी काउंसिल ने इसे कम करके किसानों को बड़ी राहत दी है.

ट्रैक्‍टर के कल-पूर्जों पर 18 फीसदी टैक्‍स

जीएसटी काउंसिल ने ट्रैक्‍टर के कल-पूर्जों पर भी कर की दर 28 फीसदी से कम करके 18 फीसदी कर दिया है. अभी तक इन पर 5 से लेकर 17 फीसदी के बीच कर लगता रहा था. जीएसटी काउंसिल ने इसे बढ़ाकर 18 फीसदी से 28 फीसदी कर दिया था. इस पर किसानों ने भारी चिंता जताई थी. देश में हर साल लगभग 6.5 लाख ट्रैक्‍टर की बिक्री होती है. सबसे अधिक बिक्री कॉम्‍पैक्‍ट ट्रैक्‍टर की होती है.