जाने बोलापल्ली श्रीकांत की जीरो से हीरो बनने की कहानी

40 वर्षीय बोलापल्ली श्रीकांत का जीवन पूरी तरह से खिले फूलों की तरह है। श्रीकांत जिन्होंने सोलह साल की उम्र में एक फूलों की फार्म में 1000 रूपये महीने की पगार में नौकरी किया, आज भारत में फूलों की खेती करने वालों की सूची में उन्होंने एक खास जगह बनाई है। इस खेल के वह माहिर खिलाड़ी बन गए हैं। आपको यकीन नहीं होगा आज उनका वार्षिक टर्न-ओवर करोड़ो का है।

दसवीं कक्षा की पढ़ाई छोड़कर, श्रीकांत तेलंगाना के निज़ामाबाद जिले में अपने गृहनगर से नालमंगला, जो बंगलुरू के बाहरी इलाके में स्थित है, एक परिचित के फूलों के फार्म में काम करने आ गए थे। उनका परिवार खेती पर निर्भर था और पूरी तरह से कर्ज में डूबा हुआ था। तब उन्होंने यह तय किया कि वह पढ़ाई छोड़ देंगे और नौकरी करेंगे

नालमंगला के फार्म में वह अठारह से बीस घंटे काम करते थे। दो साल तक काम करते हुए उन्होंने फूलों की खेती के बिज़नेस के बारे में पूरा ज्ञान हासिल कर लिया। कल्टीवेशन, हार्ववेस्टिंग, मार्केटिंग और उन्हें निर्यात करना सब में श्रीकांत ने महारथ हासिल कर ली।

जब वह 18 वर्ष के हुए तब उन्होंने 20,000 रुपयों से अपने फूलों के रिटेल का बिज़नेस शुरू किया। शुरुआत में उनके पिता उनके इस काम के लिए अनिच्छुक थे क्योंकि वह चाहते थे कि वह अपने घर की खेती में उनकी मदद करे। लेकिन श्रीकांत ने अपने मन की आवाज़ सुनी और अपनी योजना के साथ आगे बढ़े

1000 रुपये महीना सैलरी पर की माली की नौकरी

22 साल पहले, तेलंगाना के एक छोटे से शहर से ताल्लुक रखने वाले बोलापल्ली श्रीकांत का सपना था कि वह अपनी जमीन पर खेती करें। मगर गरीबी की वजह से घर-परिवार की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह जमीन खरीद सकें। हालात बिगड़ने पर श्रीकांत को अपना शहर निजामाबाद छोड़ना पड़ा और वह वर्ष 1995 में बेंगलुरु अपना करियर बनाने के लिए आ गये। उस समय डोड्डाबल्लापुरा क्षेत्र के पास श्रीकांत को फूलों की खेती से जुड़ी एक कंपनी में नवस्थापित ग्रीन हाउस परियोजना में बतौर पर्यवेक्षक के रूप में काम मिला। उस समय श्रीकांत की सैलरी 1000 रुपये महीना थी।

ऐसे हुई शुरुआत

श्रीकांत ने दो साल तक इस कंपनी में काम किया और फूलों की खेती में वैज्ञानिक खेती के बारे में काफी जानकारी हासिल की। इस बीच श्रीकांत ने अपनी दो साल की सैलरी यानी 20000 हजार रुपये से जब वह 18 वर्ष के हुए तब बैंगलुरु में ही फूलों का छोटा सा व्यापार शुरू किया और विभिन्न कंपनियों, किसानों और वितरकों से संपर्क साधकर फूलों का व्यापार करना शुरू कर दिया।

उन्होंने बेंगलुरू के विल्सन गार्डन में स्थित अपने घर पर ही अपनी फूलों की दुकान खोली। 200 स्क्वायर फ़ीट की जगह पर इन्होंने काम शुरू किया। अपनी शॉप का नाम उन्होंने ओम श्री साई फ्लावर्स रखा। अपने पुराने अनुभव से और संपर्कों की बदौलत इन्होंने दो सालों में ही अपने बिज़नेस को अच्छी जगह पर खड़ा कर दिया। शुरू में तो वे फूल उत्पादकों और थोक डीलर्स से फूल लेकर उन्हें पैक कर खुद ही ग्राहकों तक पहुंचाया करते थे।

दिन-प्रतिदिन उनके ग्राहक बढ़ते चले गए और फिर उनके फूल बड़े-बड़े होटलों, शादी, जन्मदिन और बहुत सारे आयोजनों में जाने लगे।पहले श्रीकांत अकेले ही फूलों को एकत्र करते थे और फिर पैकिंग और पार्सल किया करते थे। मगर मांग बढ़ने पर उन्होंने दो और कर्मचारियों को अपने साथ जोड़ लिया।

वर्ष 2012 में खरीदी जमीन

काफी लंबे समय तक फूलों का व्यापार करने के बाद साल 2012 में श्रीकांत ने डोड्डाबल्लापुरा में ही 10 एकड़ जमीन खरीदी और इस जमीन पर आधुनिक कृषि तकनीक से फूलों की खेती करना शुरू की। मगर आज चार साल बाद श्रीकांत 30 एकड़ जमीन पर फूलों की वैज्ञानिक खेती कर रहे हैं। श्रीकांत ने फूलों की खेती से पिछले साल 9 करोड़ रुपये का बड़ा मुनाफा कमाया और अब इस वर्ष 12 करोड़ लाभ कमाने की अनुमान लगा रहे हैं।

मांग इतनी ज्यादा की विदेशों भी मंगवाते है फूल

उनके खेतों के फूलों से उनके बिज़नेस के लिए केवल 10% तक के फूल हो पाते है बाकि वह ऊटी, कोडाइकनाल से मंगाते हैं। ज्यादा मांग होने पर थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और हॉलैंड से भी फूल आयात किया जाता है। श्रीकांत रेन वाटर हार्वेस्टिंग भी करते हैं अपने फार्म्स में। उनके यहाँ 300 कर्मचारी हैं जो उनके विल्सन गार्डन स्थित फार्म में काम करते हैं। और श्रीकांत 80 कर्मचारियों के रहने-खाने की व्यवस्था भी अपने फार्म में करते हैं।

महिन्द्रा लांच करेगा ट्रैक्टर का तीसरा ब्रांड ‘ट्रेकस्टार’

19 बिलियन अमरीकी डॉलर के महिन्द्रा समूह की कम्पनी महिन्द्रा एंड महिन्द्रा (एमएंडएम) ने आज अपनी सहायक कम्पनी महिन्द्रा गुजरात ट्रैक्टर लिमिटेड (एमजीटीएल) का नया नाम अब ग्रोमेक्स एग्री इक्विपटमेंट लिमिटेड होगा।

ग्रोमेक्टस किसानों को विशेष, बेहतर और किफायती कृषि उपकरण उपलब्ध करवाएगा। ग्रोमेक्स ने ट्रैक्टर के अपने नए ब्रांड ट्रेकस्टार को लांच किए जाने की घोषणा भी की।

यह ब्रांड उन किसानों के लिए होगा, जिन्हें बेहतर क्वालिटी चाहिए और यह उनकी समृद्धि बढ़ाने में उनका सहयोग करेगा। ट्रेकस्टार 30-50 एचपी श्रेणी में पांच एचपी पॉइन्ट्स में उपलब्ध होगा।

इस मौके पर महिन्द्रा एंड महिन्द्रा लिमिटेड के फार्म इक्विपमेंट सैक्टर के प्रेसीडैंट राजेश जेजुरीकर ने कहा कि कृषि यंत्रीकरण में गुणवत्ता बढ़ाकर किसानों की आय दोगुनी करने की हमारी यात्रा में ग्रोमेक्स एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

यह ब्रांड मूल्य बचत को इच्छुक किसानों पर केंद्रित होगा। उसने कहा कि ग्रोमैक्स कृषक समुदाय को किफायती प्रणाली और समाधान मुहैया कराएगी। इस संयुक्त उपक्रम में कंपनी की 60 फीसदी तथा गुजरात सरकार की 40 फीसदी हिस्सेदारी है।

अब बिना इंटरनेट के भी किसान इस एप से जाने कौन सी फसल में कितनी डालनी है खाद

देशभर के किसान अब अपने मोबाइल फोन पर यह मालूम कर सकेंगे कि उन्हें अपने क्षेत्र में किस फसल के लिए कितनी मात्रा में खाद डालनी है। यह जानकारी उन्हें कृषक एप पर मिलेगी। इसे एक बार डाउनलोड करने के बाद इसके इस्तेमाल के लिए इंटरनेट की कनेक्टिविटी भी जरूरी नहीं है।

इंडो यूराेपियन चेंबर ऑफ काॅमर्स एंड इंडस्ट्रीज (आईईसीसीआई) के एग्रीकल्चर नेटवर्क ने किसानों के लिए हाल ही में यह लाॅन्च किया है। इसमें पूरे देश के क्षेत्रों की मिट्टी का डेटा और 100 से ज्यादा फसलों की रिकमंडेड मेक्रो न्यूट्रिएंट वेल्यू फीड की गई है।

आईईसीसीअाई की डायरेक्टर अनुराधा सिंघई ने बताया कि पिछले साल केंद्र सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया था। इसमें फर्टिलाइजर डीलर की शैक्षणिक योग्यता बीएससी एग्रीकल्चर, डिप्लोमा इन एग्रीकल्चर इनपुट या फिर केमेस्ट्री से एमएससी होने मापदंड तय किया था। इसका उद्देश्य यह था कि किसानों को यह डीलर सही खाद की सही मात्रा फसल और मिट्टी के अनुसार बताएं।

किसान मोबाइल फोन के प्ले स्टोर पर जाएं और krashak टाइप कर इसे इंस्टाल कर लें। फिर ओपन करें। कोई रजिस्ट्रेशन लॉग इन या ओटीपी नहीं। नाम-पता एक्सेस यानी कोई जानकारी नहीं मांगता है। एक बार डाउनलोड कर लिया तो पूरे समय इंटरनेट से कनेक्ट रहने की जरूरत नहीं है। हिंदी और अंग्रेजी दोनों में है।

अगला स्टेप : सबसे पहले फसल की श्रेणी का चयन करें, फिर फसल का चयन करें, आपका खेत एरिया हेक्टेयर या एकड़ में डालें। सॉइल टेस्ट यानी मिट्टी परीक्षा कार्ड है तो कार्ड के अनुसार एनपीके की वेल्यू डालें। नहीं है तो अपना राज्य, जिला और ब्लाक चुनें। इसके बाद सामान्य उर्वरक पर क्लिक करें। खाद के छह सम्मिश्रण उपलब्ध हैं। यह भी कि इन मिश्रणों को कब और कैसे डालना है।

यह होगा फायदा 

  • घर बैठे खाद की सटीक जानकारी फसल के अनुसार किसानों को मिल जाएगी।
  • मिट्टी परीक्षण कार्ड नहीं होने पर भी जानकारी मिल सकेगी।
  • इंटरनेट कनेक्शन नहीं होने पर भी जानकारी ले सकते हैं।
  • कृषि विभाग की बिना सलाह के भी फसल में खाद के बारे में निर्णय ले सकते हैं।

सोनीपत के इंजीनियर ने बनाई ईंट बनाने की मशीन , 120 मज़दूरों का काम करती है अकेले

सोनीपत में 10वीं पास सतीश नाम के युवा ने एक ऐसी मशीन का आविष्कार किया है, जो 120 मज़दूरों का काम अकेले ही कर लेती है। ये ईंट बनाने की मशीन है।

गांव लडरावन निवासी सतीश ने अपने इस आविष्कार से भट्टा उद्योग में एक नयी मिसाल पेश की है। दरअसल, सतीश गांव फिरोजपुर बांगड में लगाए अपने ईंट के भट्टे पर काम करने वाले मज़दूरों से काफी परेशान थे। वो पैसे लेने के बाद भी भट्टे पर काम करने नहीं आते थे। इसी के चलते सतीश के दिमाग में ऐसी मशीन बनाने का आइडिया आया और फिर उस पर सतीश ने काम करना शुरू किया।

सतीश ने साल 2007 में मशीन बनाने के लिए अलग-अलग जगह से पुर्जे और उपकरण लाकर मशीन बनाना शुरू कर दिया। मशीन बनाने में लाखों रुपये लगने के बाद भी सतीश की कोशिशें नाकाम होती रही लेकिन सतीश ने कभी हार नहीं मानी।

सतीश के हौंसलों को देखते हुए उसके चचेरे भाई राजेश, विकास, प्रवेश, राकेश और उसके दोस्तों ने उसका साथ देना शुरू किया। भाई और दोस्तों के सहयोग ने सतीश का मनोबल इतना बढ़ा दिया कि इन सब ने मिलकर ईंट बनाने वाली मशीन का आविष्कार कर डाला।

सतीश मशीन के बारे में बात करते हुए कहते हैं, “ये मशीन ईंट-भट्टे पर एक दिन में काम करने वाले 120 मज़दूरों के बराबर काम करती है। यह मशीन आसानी से ईंटें बना देती है। बी एम एम नाम की यह मशीन एक मिनट में 150 ईंटें बनाती है। दिन भर में इस मशीन से करीब 40000 ईंटें बनाई जाती है।

वहीं इस मॉडल के अलावा बी एम एम-300 मशीन भी तैयार की गई है, जो एक मिनट में 300 ईंटें तैयार करती है। यह मशीन दिनभर में करीब 85000 ईंटें तैयार करती है। इस मशीन से ईंट-भट्टों पर मज़दूरो की आ रही किल्लत को काफी हद तक खत्म कर दिया है।”

मशीन बनाने में सहयोगी इंजीनियर पंकज राणा कहते हैं कि ये मशीन सतीश की 8 सालों की मेहनत का फल है। मशीन पर आने वाली लागत को देखते हुए सतीश ने गांव के अपने मकान और पुश्तैनी जायदाद को दांव पर लगा दिया था।

लेकिन इतने सालों की मेहनत का फल 2013 में तीन मशीनें तैयार कर मिला। मशीन बनाने के हमारे जुनून को देखते हुए सभी लोगों ने हमें पागल कहना शुरू कर दिया था लेकिन अब सब लोग हमारी तारीफ करते नहीं थकते।

सतीश का कहना है कि अब इस मशीन की डिमांड दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। मशीन के आविष्कार का पेटेंट करा लिया गया है। मशीन के पार्ट्स अब जर्मन और इटली से मंगाये जाते हैं। अब तक हम करीब 25 मशीनें बेच चुके हैं। हरियाणा, यूपी, बिहार, तमिलनाडु, राजस्थान, बिहार और कर्नाटक के अलावा पड़ोसी देश नेपाल में भी हम इस मशीन की सप्लाई कर चुके हैं।

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यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

घर की छत पर करें मोती की खेती, कमा सकते हैं सालाना लाखों रुपये

हिसार.  घाटे का सौदा बन रही परंपरागत खेती के बीच मोती की खेती किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आई है। थोड़ी सी लागत और जगह में काम शुरू करके किसान सालाना 3 से 4 लाख रुपए तक कमा सकते हैं। महाराष्ट्र के किसानों के बाद प्रदेश के किसानों में भी इस खेती प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। महाराष्ट्र के नागपुर में मोती की खेती हर तीसरे घर में की जा रही है। इसे आप अपने घर की छत्त पर भी कर सकते है ।

इस खेती को शिक्षित और तकनीकी रूप से दक्ष युवा पीढ़ी भी इसे अपना रही है। इसे देखते हुए हरियाणा के किसानों में भी मोती की खेती की तरफ रुझान तेजी से बढ़ रहा है। विशेषकर जींद, हिसार, सिरसा, डबवाली, फतेहाबाद और रोहतक के किसानों ने यह खेती शुरू कर दी है।

50 वर्ग फीट में बनाएं तालाब

मोती की खेती के लिए कोई विशेष जमीन की जरूरत नहीं है। इसे घर में बने कमरे, छत से लेकर खेत तक में शुरू किया जा सकता है। इसके लिए 6 फुट गहरा 5 बाई 10 गुना का छोटा तालाब चाहिए। एक हजार सीप से इसकी शुरुआत कर सकते हैं, जिस पर 5 से 10 रुपए प्रति सीप के हिसाब से खर्चा आएगा। माह में एक बार इनको फीड देना पड़ेगा। विशेष ट्रेनिंग की जरूरत भी नहीं है।

ट्रेनर एवं आयुर्वेदाचार्य, डॉ. जगन मस्ताना ने बताया कि एक सीप से न्यूनतम दस माह में दो मोती निकलते हैं। जिसे बाजार में आसानी से बेचा जा सकता है। एक हजार सीप की खेती से सालाना 3 से 4 लाख रुपए की कमाई कर सकता है। नागपुर से सीखने के बाद अब तक 150 से अधिक किसानों को इस खेती की ट्रेनिंग दे चुका है। खुद भी यह खेती कर रहा है।

साइकिल के पहिए में से जंगली जानवरों को भागने के लिए किसान ने बनया अनोखा जुगाड़

मध्यप्रदेश समेत देश में नील गाय, जंगली जानवर खेतों में खड़ी फसलों को नष्ट कर देते हैं। किसानों के लिए जंगली जानवर हमेशा चिंता का विषय बना रहता है। ऐसे में प्रदेश सरकार ने सोलर पॉवर फेंसिंग मशीन योजना लेकर आई है,

लेकिन प्रदेश के कुछ किसानों के पास सोलर पॉवर फेंसिंग लगाने के लिए पर्याप्त रुपए नहीं रहते हैं, इस कारण वे इसे लगाने में समर्थ रहते हैं, लेकिन धार जिले के खिलेड़ी गांव के किसान विनोद खोकर ने एक नया नवाचार किया है। उन्होंने एक ऐसा यंत्र बनाया है, जिसकी आवाज से जंगली जानवर भाग जाए।

हवा चलित पंखे लगने के बाद खेत के आसपास अब कोई नहीं आता

किसान विनोद खोखर ने खेत में मक्का लगा रखी है। इसमें अब भुट्‌टे भी आ गए हैं। ऐसे में जंगली जानवर रात और दिन फसल को नुकसान पहुंचाने खेतों में घुस जाते हैं, ये हवा चलित पंखे लगने के बाद खेत के आसपास कोई नहीं आता है।

किसान खोखर ने भंगार को ऐसा निर्मित किया है, जिससे वह उपयोगी यंत्र बन सके। उन्होंने भंगार में रखी साइकिल का पहिया और एक्सल लिया।

पुराने कूलर की पंखुड़ी के ठीक पीछे एक डिब्बा लगाकर उसे नट से पैक कर दिया। जिससे वह चलित हवा पंखा तैयार कर इसे खेत में लगाया। जैसे ही तेज हवा चलती है तो पंखा चलता है तो नट डिब्बे से टकराते रहते हैं और जोर-जोर से आवाज आती है।

आवाज आने से खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले पक्षी और खासकर घोड़ा भाग जाते हैं। यानी भंगार के सामान से तैयार यह पंखे खेत में कांग भगोड़ा की काम कर रहे है।

अनचाही गाजर घास का इस्तेमाल करके अब आप बना सकेंगे खाद

काफी वक्त पहले कांग्रेस की सत्ता में रहते वक्त मैक्सिको से आए गेहूं के बीज के साथ आए गाजर घास के बीज किसानों के लिए आज तक मुसीबत बने हैं। इससे फसलों को काफी नुकसान हो रहा है।

इस घास को खत्म करने के समय—समय पर कई तरीके आए लेकिन सभी इतने कारगर साबित नहीं हुए हैं। इसको देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने इस घास का इस्तेमाल खाद बनाने के लिए करने में सबसे अच्छा बताया है।

रेलवे लाइन के किनारे और खेतों के किनारे निकलने वाली अनचाही गाजर घास उगी रहती है। गाजर घास फसलों के अलावा मनुष्यों और पशुओं के लिए भी गम्भीर समस्या है। इस खरपतवार के सम्पर्क में आने से एग्जिमा, एलर्जी, बुखार, दमा व नजला जैसी बीमारियां हो जाती हैं। इसे खाने से पशुओं में कई रोग हो जाते हैं।अगर गाय या भैंस इसे खा लेती हैं तो उनके थनों में सूजन आ जाती है और पशुओं के मरने का भी खतरा होता है।

जी हाँ आप ने सही पढ़ा अब आप इस घास का इस्तेमाल करके आप खाद बना सकते हैं। इतना ही नहीं यदि आप अपने खेत में गाजर घास से बनी खाद डालते हैं तो आपको दूसरी कोई खाद डालने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वहीं कृषि वैज्ञानिक गाजर घास की खाद को फसलों के लिए फायदेमंद भी बता रहे हैं।

कैसे बनाई जा सकती है खाद

कृषि वैज्ञानिक के अनुसार गाजर घास से खाद बनाने के लिए किसानों को एक गड्ढा खोदना होता है। गड्ढे की लम्बाई 12 फीट, चौड़ाई चार फीट और घहराई पांच फीट होनी चाहिए। इस गड्ढे में नौ इंच चौड़ी की दीवार बनानी होगी। इसे सीधा जोड़ेंगे। जब तीन स्टेप तीन रदृा ईंट रखने के बाद सात इंच चारों ओर जाली बनाई जाएगी। इसी तरह ईंट की जोड़ाई सीधी और जालीदार करते रहेंगे। इसके बाद सूखी गाजर घास को अलग और हरी गाजर घास को अलग रख लेंगे।

छह इंच तक हरा और सूखा वाला डंठल नीचे भर देंगे। इसके बाद 5 किलो गोबर पानी में ढीला घोलकर इसमें डाल देंगे। साथ में 2 इंच मिट्टी भी डालेंगे। भराई करने के बाद उसके उपर से मुलायम वववावला डंठल डाला जाएगा। फिर पांच किलो गोबर पानी के साथ मिक्स करके तर करेंगे। इसी तरह गड्ढे को उपर तक भरना होगा।

खाद बनाने का दूसरा तरीका

गाजर घास से खाद बनाने का दो तरीका है। दूसरा तरीका यह है कि आपको चार गड्ढे खोदने होते हैं। सबकी एक दूसरे से दूरी डेढ़ फीट की होनी चाहिए। खाद बनाने की पहले वाली विधि की ही तरह पहले गड्ढे में घास और गोबर की भराई कर दी जाए। जब मैटेरियल अच्छी तरह सड़ जाए तो पहले वाले गड्डे से मैटेरियल निकाल दूसरे में डाल देना चाहिए।

फिर दूसरे का मैटेरियल निकाल कर तीसरे और पहले इसी तरह चौथे में डाल देना चाहिए। यह प्रक्रिया पहले, दूसरे तीसरे और चौथे गड्ढे में चलेगी और फिर खाद तैयार हो जाएगी। कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. संदीप कन्नोजिया कहते हैं, “गाजर घास से बनी 20 टन खाद एक हेक्टेयर खेत के लिए मुफीद है।

ऐसे शुरू करें पापड़ बनाने का उद्योग

पापड़ आमतोर पर स्नेक्स के रूप में लिया जाने वाला खाद्य पदार्थ हैं. भारत में पापड़ खाना काफी पसंद किया जाता हैं. इसलिए पापड़ की मांग हमेशा रहती हैं. आम तौर पर लगभग सभी मौकों और त्यौहारों में भोजन के बाद पापड़ परोसा जाता है. अत: इनकी खपत हर देश के हर शहर और गांव के हर घर में होती है यानी इस उद्योग में करियर उज्ज्वल है.

पहले महिलाएं घरों में ही एकत्रित होकर अपने परिवार के लिए पापड़ आदि सामान बना लेती थी लेकिन अब एकल परिवार के चलन के चलते महिलाओं के पास इतना समय ही नहीं बचता कि पापड़ घर पर ही तैयार किये जा सके ऐसे में पापड़ बनाने का उद्योग आपको अपना बिज़नस शुरू करने का एक बेहतर मौका दे सकता हैं.

कितना स्कोप हैं पापड़ बनाने के बिज़नस में

भारत के गाँव व शहरों में पापड़ समान रूप से लोकप्रिय हैं. भारत के अतिरिक्त पापड़ को विदेशों में भी निर्यात किया जाता हैं. ब्रिटेन, अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, नाइजीरिया, ओमान, मलेशिया, कुवैत, कनाडा, बहरीन और ऑस्ट्रेलिया ऐसे कुछ देशों के नाम जहाँ हमारे यहाँ बने पापड़ की अधिक मांग होती हैं. इस लिहाज से देखें तो पापड़ उद्योग अवसरों से भरा हुआ हैं.

साथ ही पापड़ बनाने में किसी एक ब्रांड या कंपनी का नाम नहीं चलता. कुछ कंपनियां पुरे देश में फैली हुई हैं लेकिन 60 प्रतिशत बिज़नस लोकल पापड़ निर्माता द्वारा की किया जाता हैं. अपने बिज़नस को मजबूत आधार देने के लिए पापड़ के ब्रांड के विकास पर ध्यान केंद्रित करना महत्वपूर्ण है.

कैसे करें तैयारी व निवेश

पापड़ बनाने का उद्योग लगाने के लिए आपको लोकल लोगों की पसंद की जानकारी होना आवश्यक हैं. साथ ही आपके रीजन में एक अनुभवी डिस्ट्रीब्यूटर का भी आपको साथ चाहिए. पापड़ उद्योग लघु उद्योगों में गिना जाता हैं इसलिए इसमें बहुत अधिक निवेश की आवश्यकता नहीं होती. और आपको बैंक, ग्राम पंचायत आदि संस्थानों से आसनी से लोन मिल भी सकता हैं.

इसके लिए आप प्राइवेट स्तर पर या सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न स्कीमों के तहत नजदीकी बैंक में आवेदन कर सकते हैं. बैंक से भी आपको लोन इसी शर्त पर मिलेगा जब आपके पास उचित बिज़नस प्लान होगा, जिसमें कि आपकी उत्पादक क्षमता आदि की जानकारी दी गयी हो.

कच्चा माल व मशीनरी

पापड़ बनाने के लिए आवश्यक कच्चा मान अच्छी क्वालिटी का होना आवश्यक है क्यूंकि कच्चे माल की क्वालिटी पर आपके पापड़ की क्वालिटी निर्भर करेगी. पापड़ बनाने के लिए दालों, अट्टों, मसाले पाउडर, मिर्च , सोडियम बाई कार्बोनेट और नमक के मिश्रण का उपयोग किया जाता है, ये सभी सामान कहीं से भी आसानी से मिल सकता हैं.

पापड़ बनाने के लिए अगर आप लघु स्टार पर अपना बिज़नस सेट कर रहे हैं तो आपको बहुत बड़ी मशीनरी की आवश्यकता नहीं होगी.

 

 

  • Grinding Machine
  • Mixing Machine
  • Electric Papad press machine (इस मशीन के माध्यम से पापड़ को आसानी से आकार दिया जा सकता है )
  • Sieve Set (चलनी सेट)
  • Drying Machine with trolley या फिर यदि उद्यमी का बजट कम है तो वह पापड़ को धुप में भी सूखा सकता है |
  • पानी भरने और उसको रखने के लिए टैंक |
  • Packaging के लिए Pouch Sealing Machine
  • इसके अलावा BIS मानकों पर खरा उतरने के लिए कुछ Laboratory equipments की भी आवश्यकता हो सकती है |

ये मशीनें दिल्ली, मुंबई आदि शहरों में मिल जाती हैं. पानी भरने के टैंक की आवश्यकता भी होगी व पापड़ पैक करने के लिए पोलीथीन भी चाहिए. BIS मनको पर खरा उतरने के लिए कीच लैब से जुड़े उपकरण भी जरूरी हैं जो उत्पाद की क्वालिटी चेक कर सकें.

कैसे बनाएं पापड़

सबसे पहले, आप नमक, मसालों और सोडियम बाइकार्बोनेट को दालों के आटे में समान रूप से मिलाएं फिर इस मिश्रण में पर्याप्त मात्रा में पानी मिला कर गूँथ लें. पापड़ विभिन्न दालों से बनाये जा सकते हैं, जैसे अगर आपको उड़द की दाल से पापड़ बनाना हैं तो उसे रात भर भिगों कर रखें व सुबह ग्राइंडर में पिस कर दल की पिट्ठी में सभी मसालें मिलाकर मिश्रण तैयार कर लें.

लगभग 30 मिनट के बाद, छोटी-छोटी आटे की गोली बना लें. फिर इन गोलियों को पापड़ बनाने वाली मशीन में रखना हैं. यहां आप मोल्ड के आकार के अनुसार पपड़े का उत्पादन कर सकते हैं. अब पापड़ को धुप या ड्रायर की सहायता से सुखा लें. सूखने के बाद एक आकर्षक पैकिंग में पापड़ पैक कर लें.

अब आपके पापड़ बिकने के लिए तैयार हैं. लघु स्तर पर आप इस उद्योग से 20 से 25 हजार तक की कमाई कर सकते

इस इंजीनियर ने छोड़ा 30 लाख का पैकेज, अब चाय बेच कर कमा रहे है उस से भी ज्यादा

जिस जगह मन ना लगे वह काम छोड़ दो और दिल की सुनो. ऐसी ही एक कहानी है मधुर मल्होत्रा की जो पेशे से वैसे इंजीनियर हैं. अगर आपको लाखों का पैकेज मिले तो शायद ही आप उस नौकरी को छोड़ने के बारे में सोचेंगे.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 33 साल के मधुर मल्होत्रा ने अपने जिंदगी को नया मोड़ देते हुए ऑस्ट्रेलिया के 30 लाख के पैकेज की नौकरी को छोड़ भारत लौट आए.

जहां उन्होंने वो काम शुरू किया, जिसकी शायद उन्होंने भी कल्पना नहीं की थी. 2009 में भारत लौटे मधुर ने नौकरी छोड़ चाय की दुकान खोल ली. उनका कहना है कि चाय सदाबहार पेय है. हालांकि सर्दी और बारिश में चाय की चुस्कियों का मजा ही कुछ और होता है.

आईटी और कम्यूनिकेशन में ऑस्ट्रेलिया से ही मास्टर्स कर चुके मधुर की मां एक बार गंभीर रूप से बीमार हो गईं, जिसके बाद उन्हें मां की देखभाल करने के लिए तुरंत ऑस्ट्रेलिया से इंडिया आना पड़ा. वह बताते हैं कि मेरी मां की ओपन हार्ट सर्जरी होनी थी. वह 72 साल की हैं और मेरे पिता 78 साल के.

इंडिया वापस लौटने के बाद मधुर ने फैमिली का कंस्ट्रक्शन बिजनेस शुरू किया, लेकिन पुराना काम होने की वजह से उन्हें मजा नहीं आ रहा था और वह इससे असंतुष्ट हो रहे थे.

एक बार वह अपनी दोस्त के साथ चाय पीने निकले. तब उन्होंने देखा कि चाय बनाने वाले के हाथ साफ नहीं है और वह उन्हीं खुले हाथों से दूध निकालकर चाय बना रहा था. इसके अलावा वहां चाय की दुकान पर अधिकतर लोग सिगरेट फूंकने वाले थे. इसके बाद मधुर ने सोचा कि क्यों न इससे बेहतर कोई चाय की दुकान खोली जाए.

फिर क्या था मधुर और उनके दोस्त ने मिलकर एक छोटा-सा चाय का कैफे खोलने का प्लान बनाया जहां अच्छे माहौल में लोग अपनी फैमिली या दोस्त के साथ सिर्फ चाय पीने आएं. उन्होंने चाय पर काफी रिसर्च की और पाया कि अगर कुल्हड़ में सामान्य चाय को बेहतर बनाकर बेचा जाए तो लोग आकर्षित हो सकते हैं.

फिर क्या था उन्होंने कुल्हड़ वाली चाय को एक अलग अंदाज में पेश किया. साथ ही पाया कि कुल्हड़ पर्यावरण के लिहाज से भी अच्छा विकल्प है. धीरे-धीरे मधुर ने चाय की 22 कैटिगरी बना दीं.सेल इतनी है के उनकी पास 50 लीटर का स्टोरेज है, जो एक ही घंटे में खत्म हो जाता है। इनमें तुलसी-इलाइची, तुलसी-अदरक, मसाला चाय जैसे देसी वैराइटीज के अलावा लेमन-हनी, लेमन-तुलसी और रॉ टी फ्लेवर्स भी शामिल हैं।

कैफे ‘चाय-34’ की 22 तरह के स्वाद की अलग-अलग खासियत वाली चाय वो भी कुल्हड़ में. भोपाल के शिवाजी नगर में चलने वाले चाय का ये कैफे मधुर की पहचान बन गई है. अब वो और जगह पर भी अपना कैफे कैफे ‘चाय-34’ खोलने जा रहे है . सिर्फ चाय बेच कर वो अपनी जॉब से ज्यादा कमाई कर रहे है .अभी उनकी सालाना टर्न ओवर लाखों में है लेकिन बहुत जल्द करोड़ों में हो जाएगी

मोदी सरकार के इस स्कीम से कमा सकते हैं 25 हजार रुपए महीना।

70वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले पर तिरंगा फहराया। इसके साथ ही उन्होंने देशवासियों को संबोधित करते हुए कुछ खास योजनाओं का जिक्र किया। इनयोजनाओं से आम लोगों को फायदा हो रहा है। पीएम मोदी ने जिन योजनाओं का जिक्र किया उसमे महत्वाकांक्षी जन औषधि योजना मुख्य रूप से शामिल है।

पीएम मोदी ने बताया इस महत्वाकांक्षी योजना के जरिये शहरों से लेकर गांवों तक लाभ पहुँच रहा है। सरकार इस ख़ास योजना के जरिये आम लोगों को लगातार कमाई का भी मौक़ा दे रही है जिसका फायदा आप भी उठा सकते हैं। इस योजना का लाभ उठाते हुए आप 25 से 30 हजार रूपये तक कमाई कर सकते हैं। ख़ास बात ये है कि इस स्कीम के तहत बिजनेस शुरू करने के लिए सरकार ने पिछले दिनों नियम में कुछ बदलाव किया है।

जनऔषधि सेंटर खोलने के लिए सरकार ने तीन कैटेगरी बनाई है। पहली कैटेगरी में कोई भी व्यक्ति बेरोजगार, फार्मासिस्ट, डॉक्टर, रजिस्टर्ड मेडिकल, प्रैक्टिशनर स्टोर खोल सकेगा। दूसरी कैटेगरी में ट्रस्ट, एनजीओ, प्राइवेट हॉस्पिटल, सोसायटी और सेल्फ हेल्प ग्रुप को स्टोर खोलने का मौका मिलेगा। तीसरी कैटेगरी में राज्य सरकारों द्वारा नॉमिनेट की गई एजेंसी होगी। वहीं, दुकान खोलने के लिए 120 वर्गफुट एरिया में दुकान होनी जरूरी है।

आप अपने सेंटर के जरिए महीने में जितनी दवाएं सेल करेंगे, उन दवाओं का 20 फीसदी आपको कमिशन के रूप में मिल जाएगा। ट्रेड मार्जिन के अलावा सरकार मंथली सेल पर 10 फीसदी इंसेंटिव देगी, जो आपके बैंक अकाउंट में आ जाएगा। इस तरह से दुकानदार को ट्रेड मार्जिन के अलावा इंसेटिव के रूप में डबल मुनाफा होगा।

यानी अगर वह एक महीने में 1 लाख रुपए तक की दवा सेल करते हैं तो 25 से 30 हजार रुपए तक मंथली इनकम होगी। सेंटर शुरू करने पर 1 लाख रुपए की दवाइयां पहले आपको दवा खरीदनी होगी। बाद में सरकार इसे मंथली बेसिस पर रीइंबर्समेंट करेगी।

कैसे करें आवेदन

स्टोर खोलने के लिए आपके पास रिटेल ड्रग सेल करने का लाइसेंस जन औषधि स्टोर के नाम से होना चाहिए। इसके अलावा कम से कम 120 वर्ग फुट का एरिया किराए पर या ओनरशिप में होना जरूरी है।

-जो व्यक्ति या एजेंसी स्टोरी खोलना चाहता है, वह http://janaushadhi.gov.in/ पर जाकर फार्म डाउनलोड कर सकता है। -उसे अपने एप्लीकेशन को 2000 रुपए के डिमांड ड्रॉफ्ट के साथ ब्यूरो ऑफ फॉर्मा पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग ऑफ इंडिया के जनरल मैनेजर(A&F)के नाम से भेजना होगा।

-ब्यूरो ऑफ फॉर्मा पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग ऑफ इंडिया का एड्रेस जनऔषधि की वेबसाइट पर और भी जानकारी उपलब्ध है।