जाने बोलापल्ली श्रीकांत की जीरो से हीरो बनने की कहानी

40 वर्षीय बोलापल्ली श्रीकांत का जीवन पूरी तरह से खिले फूलों की तरह है। श्रीकांत जिन्होंने सोलह साल की उम्र में एक फूलों की फार्म में 1000 रूपये महीने की पगार में नौकरी किया, आज भारत में फूलों की खेती करने वालों की सूची में उन्होंने एक खास जगह बनाई है। इस खेल के वह माहिर खिलाड़ी बन गए हैं। आपको यकीन नहीं होगा आज उनका वार्षिक टर्न-ओवर करोड़ो का है।

दसवीं कक्षा की पढ़ाई छोड़कर, श्रीकांत तेलंगाना के निज़ामाबाद जिले में अपने गृहनगर से नालमंगला, जो बंगलुरू के बाहरी इलाके में स्थित है, एक परिचित के फूलों के फार्म में काम करने आ गए थे। उनका परिवार खेती पर निर्भर था और पूरी तरह से कर्ज में डूबा हुआ था। तब उन्होंने यह तय किया कि वह पढ़ाई छोड़ देंगे और नौकरी करेंगे

नालमंगला के फार्म में वह अठारह से बीस घंटे काम करते थे। दो साल तक काम करते हुए उन्होंने फूलों की खेती के बिज़नेस के बारे में पूरा ज्ञान हासिल कर लिया। कल्टीवेशन, हार्ववेस्टिंग, मार्केटिंग और उन्हें निर्यात करना सब में श्रीकांत ने महारथ हासिल कर ली।

जब वह 18 वर्ष के हुए तब उन्होंने 20,000 रुपयों से अपने फूलों के रिटेल का बिज़नेस शुरू किया। शुरुआत में उनके पिता उनके इस काम के लिए अनिच्छुक थे क्योंकि वह चाहते थे कि वह अपने घर की खेती में उनकी मदद करे। लेकिन श्रीकांत ने अपने मन की आवाज़ सुनी और अपनी योजना के साथ आगे बढ़े

1000 रुपये महीना सैलरी पर की माली की नौकरी

22 साल पहले, तेलंगाना के एक छोटे से शहर से ताल्लुक रखने वाले बोलापल्ली श्रीकांत का सपना था कि वह अपनी जमीन पर खेती करें। मगर गरीबी की वजह से घर-परिवार की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह जमीन खरीद सकें। हालात बिगड़ने पर श्रीकांत को अपना शहर निजामाबाद छोड़ना पड़ा और वह वर्ष 1995 में बेंगलुरु अपना करियर बनाने के लिए आ गये। उस समय डोड्डाबल्लापुरा क्षेत्र के पास श्रीकांत को फूलों की खेती से जुड़ी एक कंपनी में नवस्थापित ग्रीन हाउस परियोजना में बतौर पर्यवेक्षक के रूप में काम मिला। उस समय श्रीकांत की सैलरी 1000 रुपये महीना थी।

ऐसे हुई शुरुआत

श्रीकांत ने दो साल तक इस कंपनी में काम किया और फूलों की खेती में वैज्ञानिक खेती के बारे में काफी जानकारी हासिल की। इस बीच श्रीकांत ने अपनी दो साल की सैलरी यानी 20000 हजार रुपये से जब वह 18 वर्ष के हुए तब बैंगलुरु में ही फूलों का छोटा सा व्यापार शुरू किया और विभिन्न कंपनियों, किसानों और वितरकों से संपर्क साधकर फूलों का व्यापार करना शुरू कर दिया।

उन्होंने बेंगलुरू के विल्सन गार्डन में स्थित अपने घर पर ही अपनी फूलों की दुकान खोली। 200 स्क्वायर फ़ीट की जगह पर इन्होंने काम शुरू किया। अपनी शॉप का नाम उन्होंने ओम श्री साई फ्लावर्स रखा। अपने पुराने अनुभव से और संपर्कों की बदौलत इन्होंने दो सालों में ही अपने बिज़नेस को अच्छी जगह पर खड़ा कर दिया। शुरू में तो वे फूल उत्पादकों और थोक डीलर्स से फूल लेकर उन्हें पैक कर खुद ही ग्राहकों तक पहुंचाया करते थे।

दिन-प्रतिदिन उनके ग्राहक बढ़ते चले गए और फिर उनके फूल बड़े-बड़े होटलों, शादी, जन्मदिन और बहुत सारे आयोजनों में जाने लगे।पहले श्रीकांत अकेले ही फूलों को एकत्र करते थे और फिर पैकिंग और पार्सल किया करते थे। मगर मांग बढ़ने पर उन्होंने दो और कर्मचारियों को अपने साथ जोड़ लिया।

वर्ष 2012 में खरीदी जमीन

काफी लंबे समय तक फूलों का व्यापार करने के बाद साल 2012 में श्रीकांत ने डोड्डाबल्लापुरा में ही 10 एकड़ जमीन खरीदी और इस जमीन पर आधुनिक कृषि तकनीक से फूलों की खेती करना शुरू की। मगर आज चार साल बाद श्रीकांत 30 एकड़ जमीन पर फूलों की वैज्ञानिक खेती कर रहे हैं। श्रीकांत ने फूलों की खेती से पिछले साल 9 करोड़ रुपये का बड़ा मुनाफा कमाया और अब इस वर्ष 12 करोड़ लाभ कमाने की अनुमान लगा रहे हैं।

मांग इतनी ज्यादा की विदेशों भी मंगवाते है फूल

उनके खेतों के फूलों से उनके बिज़नेस के लिए केवल 10% तक के फूल हो पाते है बाकि वह ऊटी, कोडाइकनाल से मंगाते हैं। ज्यादा मांग होने पर थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और हॉलैंड से भी फूल आयात किया जाता है। श्रीकांत रेन वाटर हार्वेस्टिंग भी करते हैं अपने फार्म्स में। उनके यहाँ 300 कर्मचारी हैं जो उनके विल्सन गार्डन स्थित फार्म में काम करते हैं। और श्रीकांत 80 कर्मचारियों के रहने-खाने की व्यवस्था भी अपने फार्म में करते हैं।

सिर्फ 2200 रू की लगत मैं साइकिल को ही बना डाला स्प्रे मशीन, 45 मिनट में ही 1 एकड़ में स्प्रे

जरूरत अविष्कार की जननी है, ये बात सभी मानते हैं। गुजरात में भी एक किसान की जरूरत ने एक नई सस्ती, टिकाऊ और तेजी से काम करने वाली मशीन को जन्म दिया है, जिसका फायदा अब किसानों को खूब हो रहा है।

40 साल के मनसुखभाई जगानी छोटे किसान हैं और गुजरात के अमरेली जिले के रहने वाले हैं। मनसुखभाई प्राथमिक स्तर से आगे नहीं पढ़े हैं। जबरदस्त आर्थिक तंगी के दिनों में मनसुखभाई ने मजदूर के तौर पर भी काम किया है।

22 साल पहले उन्होंने गांव वापस लौटकर मरम्मत और निर्माण का छोटा सा काम शुरु किया और खेती के काम आने वाले औजार बनाने लगे।इस काम में हुनर हासिल करने के बाद अब मनसुखभाई ने फसलों पर स्प्रे करने वाली एक आसान और बेहद सस्ती मशीन बना डाली।इससे ना केवल काम बहुत तेजी से होता है बल्कि लागत भी कई गुना बच जाती है।

मनसुखभाई ने साईकिल में भई स्प्रे मशीन को कुछ इस तरह जोड़ दिया जिससे स्प्रे करने वाले व्यक्ति के शरीर कोई थकावट नहीं होती। साथ ही स्प्रे के दौरान निकलने वाले रासायनिक पदार्थ से शरीर को भी नुकसान का खतरा काफी कम हो जाता है।

मनसुखभाई ने साइकिल के सेंट्रल स्प्रोकेट को पिछले पहिये और पिछले पहिये को सेंट्रल स्प्रोकेट से बदल दिया।उन्होंने पैडल्स को सेंट्रल स्प्रोकेट से हटा दिया। पैडल्स की जगह उन्होंने दोनों तरफ से पिस्टन रॉड लगा दिए। दोनों तरफ से ये पिस्टन रॉड पीतल के कीलेंडर से जुड़े हुए हैं।

30 लीटर का PVC स्टोरेज का एक टैंक उन्होंने साइकिल के कैरियर पर रख दिया, जो कि कीलेंडर पंप से जुड़ा हुआ था। बैलेंस बनाने के लिए उन्होंने साइकिल के कैरियर के दोनों तरफ 4 फुट लंबा छिड़काव करने वाला एक नोज़ल भी लगा दिया।

8 दिनों की मेहनत के बाद मनसुखभाई जबरदस्त ढंग से काम करने वाली स्प्रे मशीन बनाने में सफल हो गए। साईकिल स्प्रे मशीन से 1 एकड़ खेत में छिड़काव करने में 45 मिनट का वक्त लगता है। इसकी लागत 2200 रूपए हैं। इसमें साईकिल की कीमत नहीं जोड़ी गई है।

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महिन्द्रा लांच करेगा ट्रैक्टर का तीसरा ब्रांड ‘ट्रेकस्टार’

19 बिलियन अमरीकी डॉलर के महिन्द्रा समूह की कम्पनी महिन्द्रा एंड महिन्द्रा (एमएंडएम) ने आज अपनी सहायक कम्पनी महिन्द्रा गुजरात ट्रैक्टर लिमिटेड (एमजीटीएल) का नया नाम अब ग्रोमेक्स एग्री इक्विपटमेंट लिमिटेड होगा।

ग्रोमेक्टस किसानों को विशेष, बेहतर और किफायती कृषि उपकरण उपलब्ध करवाएगा। ग्रोमेक्स ने ट्रैक्टर के अपने नए ब्रांड ट्रेकस्टार को लांच किए जाने की घोषणा भी की।

यह ब्रांड उन किसानों के लिए होगा, जिन्हें बेहतर क्वालिटी चाहिए और यह उनकी समृद्धि बढ़ाने में उनका सहयोग करेगा। ट्रेकस्टार 30-50 एचपी श्रेणी में पांच एचपी पॉइन्ट्स में उपलब्ध होगा।

इस मौके पर महिन्द्रा एंड महिन्द्रा लिमिटेड के फार्म इक्विपमेंट सैक्टर के प्रेसीडैंट राजेश जेजुरीकर ने कहा कि कृषि यंत्रीकरण में गुणवत्ता बढ़ाकर किसानों की आय दोगुनी करने की हमारी यात्रा में ग्रोमेक्स एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

यह ब्रांड मूल्य बचत को इच्छुक किसानों पर केंद्रित होगा। उसने कहा कि ग्रोमैक्स कृषक समुदाय को किफायती प्रणाली और समाधान मुहैया कराएगी। इस संयुक्त उपक्रम में कंपनी की 60 फीसदी तथा गुजरात सरकार की 40 फीसदी हिस्सेदारी है।

सबसे महंगी कॉफी ऐसे होती है तैयार, जानकर पीना छोड़ देंगे!

अगर आप कॉफी पीने के शौकिन है तो हमारी यह ख़बर आपको निराश कर सकती है। जी हां, दुनिया की सबसे मंहगी कॉफी ‘कोपी लुवाक’ जो पीने में तो बेहद टेस्टी लगती हैं लेकिन इसको बनाने की प्रक्रिया काफी हैरान कर देने वाली है।

कॉफी ‘कोपी लुवाक’ जिसका जायका लेने के लिए लोग दुनिया भर से इंडोनेशिया आते हैं। लोगों की मानें तो इस कॉफी को जो एक बार टेस्ट कर ले फिर उसे कोई और कॉफी रास नहीं आती।
इस कॉफी की कीमत €550 / US$700 प्रति किलोग्राम होती है। यानि के 42000 रूपए प्रति किल्लो ।जो आम कॉफी की तुलना में बहुत ही ज्यादा है ।

आईए अब हम आपको बताते हैं कैसे बनाई जाती है दुनिया की सबसे महंगी कॉफी…

यह कॉफी किसी किसान के द्वारा खेतों में नहीं उगाई जाती बल्कि इस कॉफी का निर्माण जंगली रेड कॉफी बीन्स से होता है जो कि एशियन पाम सिवेट नाम के जानवर की पॉटी से निकलती है।यह जानवर पेड़ पर ही अपना आसियाना टिकाए रहता है। बेर खाने वाला यह जानवर बेर तो ज़रुर खाता है लेकिन यह पचा नहीं पाता।

आप सोच रहे होंगे एशियन पाम सिवेट के पेट में बेर ना पचने से कॉफी के तैयार होने से क्या लेना-देना… अब जो हम बताएंगे आप चौंक जाएंगे… दरअसल एशियन पाम सिवेट पेड़ो पर रहने वाला जानवर होता है जो कि बेरी खाता है लेकिन वो बेरी के बीजों को पचा नहीं पाता है और मल के जरिये उसे पेट से बाहर निकाल देता है जो कि बींस के रूप में वातावरण में आता है और इसी बींस को सुखाकर ‘कोपी लुवाक’ कॉफी बनायी जाती है, जो कि यह बहुत ज्यादा दुर्लभ होती है ।

पहले यह जानवर सिर्फ जंगल में मिलते थे और यह कॉफी बहुत ही दुर्लभ थी । लेकिन अब इसकी फार्मिंग होने लगी है लोग एशियन पाम सिवेट को अपने फार्म में उसका मल लेने के लिए पालते है।क्यों हैरान हो गए ना इस ख़बर को पढ़कर कि जिस कॉफी को सभी राजसी घरानों की पार्टी में शामिल किया जाता है वह ऐसे तैयार होता है।

अब बिना इंटरनेट के भी किसान इस एप से जाने कौन सी फसल में कितनी डालनी है खाद

देशभर के किसान अब अपने मोबाइल फोन पर यह मालूम कर सकेंगे कि उन्हें अपने क्षेत्र में किस फसल के लिए कितनी मात्रा में खाद डालनी है। यह जानकारी उन्हें कृषक एप पर मिलेगी। इसे एक बार डाउनलोड करने के बाद इसके इस्तेमाल के लिए इंटरनेट की कनेक्टिविटी भी जरूरी नहीं है।

इंडो यूराेपियन चेंबर ऑफ काॅमर्स एंड इंडस्ट्रीज (आईईसीसीआई) के एग्रीकल्चर नेटवर्क ने किसानों के लिए हाल ही में यह लाॅन्च किया है। इसमें पूरे देश के क्षेत्रों की मिट्टी का डेटा और 100 से ज्यादा फसलों की रिकमंडेड मेक्रो न्यूट्रिएंट वेल्यू फीड की गई है।

आईईसीसीअाई की डायरेक्टर अनुराधा सिंघई ने बताया कि पिछले साल केंद्र सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया था। इसमें फर्टिलाइजर डीलर की शैक्षणिक योग्यता बीएससी एग्रीकल्चर, डिप्लोमा इन एग्रीकल्चर इनपुट या फिर केमेस्ट्री से एमएससी होने मापदंड तय किया था। इसका उद्देश्य यह था कि किसानों को यह डीलर सही खाद की सही मात्रा फसल और मिट्टी के अनुसार बताएं।

किसान मोबाइल फोन के प्ले स्टोर पर जाएं और krashak टाइप कर इसे इंस्टाल कर लें। फिर ओपन करें। कोई रजिस्ट्रेशन लॉग इन या ओटीपी नहीं। नाम-पता एक्सेस यानी कोई जानकारी नहीं मांगता है। एक बार डाउनलोड कर लिया तो पूरे समय इंटरनेट से कनेक्ट रहने की जरूरत नहीं है। हिंदी और अंग्रेजी दोनों में है।

अगला स्टेप : सबसे पहले फसल की श्रेणी का चयन करें, फिर फसल का चयन करें, आपका खेत एरिया हेक्टेयर या एकड़ में डालें। सॉइल टेस्ट यानी मिट्टी परीक्षा कार्ड है तो कार्ड के अनुसार एनपीके की वेल्यू डालें। नहीं है तो अपना राज्य, जिला और ब्लाक चुनें। इसके बाद सामान्य उर्वरक पर क्लिक करें। खाद के छह सम्मिश्रण उपलब्ध हैं। यह भी कि इन मिश्रणों को कब और कैसे डालना है।

यह होगा फायदा 

  • घर बैठे खाद की सटीक जानकारी फसल के अनुसार किसानों को मिल जाएगी।
  • मिट्टी परीक्षण कार्ड नहीं होने पर भी जानकारी मिल सकेगी।
  • इंटरनेट कनेक्शन नहीं होने पर भी जानकारी ले सकते हैं।
  • कृषि विभाग की बिना सलाह के भी फसल में खाद के बारे में निर्णय ले सकते हैं।

सोनीपत के इंजीनियर ने बनाई ईंट बनाने की मशीन , 120 मज़दूरों का काम करती है अकेले

सोनीपत में 10वीं पास सतीश नाम के युवा ने एक ऐसी मशीन का आविष्कार किया है, जो 120 मज़दूरों का काम अकेले ही कर लेती है। ये ईंट बनाने की मशीन है।

गांव लडरावन निवासी सतीश ने अपने इस आविष्कार से भट्टा उद्योग में एक नयी मिसाल पेश की है। दरअसल, सतीश गांव फिरोजपुर बांगड में लगाए अपने ईंट के भट्टे पर काम करने वाले मज़दूरों से काफी परेशान थे। वो पैसे लेने के बाद भी भट्टे पर काम करने नहीं आते थे। इसी के चलते सतीश के दिमाग में ऐसी मशीन बनाने का आइडिया आया और फिर उस पर सतीश ने काम करना शुरू किया।

सतीश ने साल 2007 में मशीन बनाने के लिए अलग-अलग जगह से पुर्जे और उपकरण लाकर मशीन बनाना शुरू कर दिया। मशीन बनाने में लाखों रुपये लगने के बाद भी सतीश की कोशिशें नाकाम होती रही लेकिन सतीश ने कभी हार नहीं मानी।

सतीश के हौंसलों को देखते हुए उसके चचेरे भाई राजेश, विकास, प्रवेश, राकेश और उसके दोस्तों ने उसका साथ देना शुरू किया। भाई और दोस्तों के सहयोग ने सतीश का मनोबल इतना बढ़ा दिया कि इन सब ने मिलकर ईंट बनाने वाली मशीन का आविष्कार कर डाला।

सतीश मशीन के बारे में बात करते हुए कहते हैं, “ये मशीन ईंट-भट्टे पर एक दिन में काम करने वाले 120 मज़दूरों के बराबर काम करती है। यह मशीन आसानी से ईंटें बना देती है। बी एम एम नाम की यह मशीन एक मिनट में 150 ईंटें बनाती है। दिन भर में इस मशीन से करीब 40000 ईंटें बनाई जाती है।

वहीं इस मॉडल के अलावा बी एम एम-300 मशीन भी तैयार की गई है, जो एक मिनट में 300 ईंटें तैयार करती है। यह मशीन दिनभर में करीब 85000 ईंटें तैयार करती है। इस मशीन से ईंट-भट्टों पर मज़दूरो की आ रही किल्लत को काफी हद तक खत्म कर दिया है।”

मशीन बनाने में सहयोगी इंजीनियर पंकज राणा कहते हैं कि ये मशीन सतीश की 8 सालों की मेहनत का फल है। मशीन पर आने वाली लागत को देखते हुए सतीश ने गांव के अपने मकान और पुश्तैनी जायदाद को दांव पर लगा दिया था।

लेकिन इतने सालों की मेहनत का फल 2013 में तीन मशीनें तैयार कर मिला। मशीन बनाने के हमारे जुनून को देखते हुए सभी लोगों ने हमें पागल कहना शुरू कर दिया था लेकिन अब सब लोग हमारी तारीफ करते नहीं थकते।

सतीश का कहना है कि अब इस मशीन की डिमांड दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। मशीन के आविष्कार का पेटेंट करा लिया गया है। मशीन के पार्ट्स अब जर्मन और इटली से मंगाये जाते हैं। अब तक हम करीब 25 मशीनें बेच चुके हैं। हरियाणा, यूपी, बिहार, तमिलनाडु, राजस्थान, बिहार और कर्नाटक के अलावा पड़ोसी देश नेपाल में भी हम इस मशीन की सप्लाई कर चुके हैं।

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Khasra no:194/217, Village Ferozpur Bangar, Sonepat(HR)
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यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

घर की छत पर करें मोती की खेती, कमा सकते हैं सालाना लाखों रुपये

हिसार.  घाटे का सौदा बन रही परंपरागत खेती के बीच मोती की खेती किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आई है। थोड़ी सी लागत और जगह में काम शुरू करके किसान सालाना 3 से 4 लाख रुपए तक कमा सकते हैं। महाराष्ट्र के किसानों के बाद प्रदेश के किसानों में भी इस खेती प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। महाराष्ट्र के नागपुर में मोती की खेती हर तीसरे घर में की जा रही है। इसे आप अपने घर की छत्त पर भी कर सकते है ।

इस खेती को शिक्षित और तकनीकी रूप से दक्ष युवा पीढ़ी भी इसे अपना रही है। इसे देखते हुए हरियाणा के किसानों में भी मोती की खेती की तरफ रुझान तेजी से बढ़ रहा है। विशेषकर जींद, हिसार, सिरसा, डबवाली, फतेहाबाद और रोहतक के किसानों ने यह खेती शुरू कर दी है।

50 वर्ग फीट में बनाएं तालाब

मोती की खेती के लिए कोई विशेष जमीन की जरूरत नहीं है। इसे घर में बने कमरे, छत से लेकर खेत तक में शुरू किया जा सकता है। इसके लिए 6 फुट गहरा 5 बाई 10 गुना का छोटा तालाब चाहिए। एक हजार सीप से इसकी शुरुआत कर सकते हैं, जिस पर 5 से 10 रुपए प्रति सीप के हिसाब से खर्चा आएगा। माह में एक बार इनको फीड देना पड़ेगा। विशेष ट्रेनिंग की जरूरत भी नहीं है।

ट्रेनर एवं आयुर्वेदाचार्य, डॉ. जगन मस्ताना ने बताया कि एक सीप से न्यूनतम दस माह में दो मोती निकलते हैं। जिसे बाजार में आसानी से बेचा जा सकता है। एक हजार सीप की खेती से सालाना 3 से 4 लाख रुपए की कमाई कर सकता है। नागपुर से सीखने के बाद अब तक 150 से अधिक किसानों को इस खेती की ट्रेनिंग दे चुका है। खुद भी यह खेती कर रहा है।

ऐसे करें काजू की खेती , एक पेड़ से एक बार में होगी 18000 रु की फसल

काजू का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है ।काजू को ड्राई फ्रूट्स का राजा कहा जाए तो गलत नहीं होगा ।काजू बहुत तेजी से बढ़ने वाला पेड़ है इसमे पौधारोपन के तीन साल बाद फूल आने लगते हैं और उसके दो महीने के भीतर पककर तैयार हो जाता है। काजू की उत्पत्ति ब्राजील से हुआ है। हालांकि आजकल इसकी खेती दुनिया के अधिकाश देशों में की जाती है। सामान्य तौर पर काजू का पेड़ 13 से 14 मीटर तक बढ़ता है। हालांकि काजू की बौना कल्टीवर प्रजाति जो 6 मीटर की ऊंचाई तक बढ़ता है, जल्दी तैयार होने और ज्यादा उपज देने की वजह से बहुत फायदेमंद व्यावसायिक उत्पादकों के लिए साबित हो सकती है ।

काजू कुछ मशहूर किस्में-

काजू की कई उन्नत और हाइब्रिड या वर्णसंकर किस्मे उपलब्ध हैं। अपने क्षेत्र के स्थानीय कृषि, बागबानी या वन विभाग से काजू की उपयुक्त किस्मों का चुनाव करें।

Kaju4वेनगुर्ला- 1 एम वेनगुर्ला- 2, वेनगुर्ला-3, वेनगुर्ला-4, वेनगुर्ला-5, वृर्धाचलम-1, वृर्धाचलम-2, चिंतामणि-1,एनआरसीसी-1, एनआरसीसी-2, उलाल-1, उलाल-2, उलाल-3, उलाल-4, यूएन-50, वृद्धाचलम-3, वीआआई(सीडब्लू) एचवन, बीपीपी-1, अक्षय(एच-7-6),अमृता(एच-1597), अन्घा(एच-8-1), अनाक्कयाम-1 (बीएलए-139), धना(एच 1608), धाराश्री(एच-3-17), बीपीपी-2, बीपीपी-3, बीपीपीपी-4, बीपीपीपी-5, बीपीपीपी-6,बीपीपीपी-8,(एच2/16).

काजू की खेती के लिए आवश्यक जलवायु-

काजू मुख्यत: उष्णकटिबंधीय फसल है और उच्च तापमान में भी अच्छी तरह बढ़ता है। इसका नया या छोटा पौधा तेज ठंड या पाला के सामने बेहद संवेदनशील होता है। समुद्र तल से 750 मीटर की ऊंचाई तक काजू की खेती जा सकती है। काजू की खेती के लिए आदर्श तापमान 20 से 35 डिग्री के बीच होता है। इसकी वृद्धि के लिए सालाना 1000 से 2000 मिमी की बारिश आदर्श मानी जाती है। अच्छी पैदावार के लिए काजू को तीन से चार महीने तक पूरी तरह शुष्क मौसम चाहिए। फूल आने और फल के विकसित होने के दौरान अगर तापमान 36 डिग्री सेंटीग्रेड के उपर रहा तो इससे पैदावार प्रभावित होती है।

मिट्टी की किस्में-

काजू की खेती कई तरह की मिट्टी में हो सकती है क्योंकि यह अलग-अलग प्रकार की मिट्टी में खुद को समायोजित कर लेती है और वो भी बिना पैदावार को प्रभावित किये। हालांकि काजू की खेती के लिए लाल बलुई दोमट (चिकनी बलुई मिट्टी) मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। मैदानी इलाके के साथ-साथ600 से 750 मीटर ऊंचाई वाले ढलवां पहाड़ी इलाके भी इसकी खेती के लिए अनुकूल है।

काजू की खेती के लिए कार्बनिक पदार्थ से भरपूर गहरी और अच्छी सूखी हुई मिट्टी चाहिए। व्यावसायिक उत्पादकों को काजू की खेती के लिए उर्वरता का पता लगाने के लिए मिट्टी की जांच करानी चाहिए। मिट्टी में किसी पोषक अथवा सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर की जानी चाहिए। 5.0 से 6.5 तक के पीएच वाली बलुई मिट्टी काजू की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

काजू के पौधारोपन का मौसम-

जून से दिसंबर तक दक्षिण एशियाई क्षेत्र में इसकी खेती सबसे ज्यादा होती है। हालांकि, अच्छी सिंचाई की व्यवस्था होने पर इसकी खेती पूरे साल भर की जा सकती है।

जमीन की तैयारी और पौधारोपन-

जमीन की अच्छी तरह जुताई कर उसे बराबर कर देना चाहिए और समान ऊंचाई में क्यारियां खोदनी चाहिए। मृत पेड़, घास-फूस और सूखी टहनियों को हटा दें। सामान्य पौधारोपन पद्धति में प्रति हेक्टेयर 200 पौधे और सघन घनत्व में प्रति हेक्टेयर 500 पौधे (5मीटर गुना 4 मीटर की दूरी) लगाए जाने चाहिए। एक ही क्षेत्र में उच्च घनत्व पौधारोपन में ज्यादा पौधे की वजह से ज्यादा पैदावार होती है।

खेत की तैयारी और पौधों के बीच दूरी क्या हो ?

सबसे पहले 45 सेमी गुना 45 सेमी गुना 45 सेमी की ऊंचाई, लंबाई और गहराई वाले गड्ढे खोदें और इन गड्ढों को 8 से 10 किलो के अपघटित (अच्छी तरह से घुला हुआ) फार्म यार्ड खाद और एक किलो नीम केक से मिली मिट्टी के मिश्रण से भर दें। यहां 7 से 8 मीटर की दूरी भी अपनाई जाती है।

काजू खेती के लिए सिंचाई के तरीके-

आमतौर पर काजू की फसल वर्षा आधारित मजबूत फसल है। हालांकि, किसी भी फसल में वक्त पर सिंचाई से अच्छा उत्पादन होता है। पौधारोपन के शुरुआती एक दो साल में मिट्टी में अच्छी तरह से जड़ जमाने तक सिंचाई की जरूरत पड़ती है। फल के गिरने को रोकने के लिए सिंचाई का अगला चरण पल्लवन और फल लगने के दौरान चलाया जाता है।

काजू की खेती में अंतर फसल-

Sorting cashew fruit

काजू की खेती में अंतर फसल के द्वारा किसान अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं। अंतर फसल मिट्टी की ऊर्वरता को भी बढ़ाता है। ऐसा शुरुआती सालों में ही संभव है जब तक कि काजू के पौधे का छत्र कोने तक न पहुंच जाए और पूरी तरह छा न जाए। बरसात के मौसम में अंदर की जगह की अच्छी तरह जुताई कर देनी चाहिए और मूंगफली, दाल या फलियां या जौ-बाजरा या सामान्य रक्ताम्र (कोकुम) जैसी अंतर फसलों को लगाना चाहिए।

प्रशिक्षण और कटाई-छंटाई-

काजू के पेड़ को अच्छी तरह से लगाने या स्थापित करने के लिए लिए ट्रेनिंग के साथ-साथ पेड़ की कटाई-छंटाई की जरूरत होती है। पेड़ के तने को एक मीटर तक विकसित करने के लिए नीचे वाली शाखाओं या टहनियों को हटा दें। जरूरत के हिसाब से सूखी और मृत टहनियों और शाखाओं को हटा देना चाहिए।

जंगली घास-फूस पर निंयत्रण का तरीका-

काजू के पौधे की अच्छी बढ़त और अच्छी फसल के लिए घास-फूस पर नियंत्रण करना बागबानी प्रबंधन के कार्य का ही एक हिस्सा है। ऊर्वरक और खाद की पहली मात्रा डालने से पहले घास-फूस को निकालने की पहली प्रक्रिया जरूर पूरी कर लें। घास-फूस निकालने की दूसरी प्रक्रिया मॉनसून के मौसम के बाद की जानी चाहिए। दूसरे तृणनाशक तरीकों में मल्चिंग यानी पलवार घास-फूस पर नियंत्रण करने का अगला तरीका है।

काजू उत्पादन की मात्रा

फसल की पैदावार कई तत्वों, जैसे कि बीज के प्रकार, पेड़ की उम्र, बागबानी प्रबंध के तौर-तरीके, पौधारोपन के तरीके, मिट्टी के प्रकार और जलवायु की स्थिति पर निर्भर करता है। हालांकि कोई भी एक पेड़ से औसतन 8 से 10 किलो काजू के पैदावार की उम्मीद कर सकता है। हाइब्रिड या संकर और उच्च घनत्व वाले पौधारोपन की स्थिति में और भी ज्यादा पैदावार की संभावना होती है।एक पौधे से 10 किल्लो की फसल होती है तो 1800 रु किल्लो के हिसाब से एक पौधे से एक बार में 18000 रुपये की फसल होगी ।

साइकिल के पहिए में से जंगली जानवरों को भागने के लिए किसान ने बनया अनोखा जुगाड़

मध्यप्रदेश समेत देश में नील गाय, जंगली जानवर खेतों में खड़ी फसलों को नष्ट कर देते हैं। किसानों के लिए जंगली जानवर हमेशा चिंता का विषय बना रहता है। ऐसे में प्रदेश सरकार ने सोलर पॉवर फेंसिंग मशीन योजना लेकर आई है,

लेकिन प्रदेश के कुछ किसानों के पास सोलर पॉवर फेंसिंग लगाने के लिए पर्याप्त रुपए नहीं रहते हैं, इस कारण वे इसे लगाने में समर्थ रहते हैं, लेकिन धार जिले के खिलेड़ी गांव के किसान विनोद खोकर ने एक नया नवाचार किया है। उन्होंने एक ऐसा यंत्र बनाया है, जिसकी आवाज से जंगली जानवर भाग जाए।

हवा चलित पंखे लगने के बाद खेत के आसपास अब कोई नहीं आता

किसान विनोद खोखर ने खेत में मक्का लगा रखी है। इसमें अब भुट्‌टे भी आ गए हैं। ऐसे में जंगली जानवर रात और दिन फसल को नुकसान पहुंचाने खेतों में घुस जाते हैं, ये हवा चलित पंखे लगने के बाद खेत के आसपास कोई नहीं आता है।

किसान खोखर ने भंगार को ऐसा निर्मित किया है, जिससे वह उपयोगी यंत्र बन सके। उन्होंने भंगार में रखी साइकिल का पहिया और एक्सल लिया।

पुराने कूलर की पंखुड़ी के ठीक पीछे एक डिब्बा लगाकर उसे नट से पैक कर दिया। जिससे वह चलित हवा पंखा तैयार कर इसे खेत में लगाया। जैसे ही तेज हवा चलती है तो पंखा चलता है तो नट डिब्बे से टकराते रहते हैं और जोर-जोर से आवाज आती है।

आवाज आने से खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले पक्षी और खासकर घोड़ा भाग जाते हैं। यानी भंगार के सामान से तैयार यह पंखे खेत में कांग भगोड़ा की काम कर रहे है।

अनचाही गाजर घास का इस्तेमाल करके अब आप बना सकेंगे खाद

काफी वक्त पहले कांग्रेस की सत्ता में रहते वक्त मैक्सिको से आए गेहूं के बीज के साथ आए गाजर घास के बीज किसानों के लिए आज तक मुसीबत बने हैं। इससे फसलों को काफी नुकसान हो रहा है।

इस घास को खत्म करने के समय—समय पर कई तरीके आए लेकिन सभी इतने कारगर साबित नहीं हुए हैं। इसको देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने इस घास का इस्तेमाल खाद बनाने के लिए करने में सबसे अच्छा बताया है।

रेलवे लाइन के किनारे और खेतों के किनारे निकलने वाली अनचाही गाजर घास उगी रहती है। गाजर घास फसलों के अलावा मनुष्यों और पशुओं के लिए भी गम्भीर समस्या है। इस खरपतवार के सम्पर्क में आने से एग्जिमा, एलर्जी, बुखार, दमा व नजला जैसी बीमारियां हो जाती हैं। इसे खाने से पशुओं में कई रोग हो जाते हैं।अगर गाय या भैंस इसे खा लेती हैं तो उनके थनों में सूजन आ जाती है और पशुओं के मरने का भी खतरा होता है।

जी हाँ आप ने सही पढ़ा अब आप इस घास का इस्तेमाल करके आप खाद बना सकते हैं। इतना ही नहीं यदि आप अपने खेत में गाजर घास से बनी खाद डालते हैं तो आपको दूसरी कोई खाद डालने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वहीं कृषि वैज्ञानिक गाजर घास की खाद को फसलों के लिए फायदेमंद भी बता रहे हैं।

कैसे बनाई जा सकती है खाद

कृषि वैज्ञानिक के अनुसार गाजर घास से खाद बनाने के लिए किसानों को एक गड्ढा खोदना होता है। गड्ढे की लम्बाई 12 फीट, चौड़ाई चार फीट और घहराई पांच फीट होनी चाहिए। इस गड्ढे में नौ इंच चौड़ी की दीवार बनानी होगी। इसे सीधा जोड़ेंगे। जब तीन स्टेप तीन रदृा ईंट रखने के बाद सात इंच चारों ओर जाली बनाई जाएगी। इसी तरह ईंट की जोड़ाई सीधी और जालीदार करते रहेंगे। इसके बाद सूखी गाजर घास को अलग और हरी गाजर घास को अलग रख लेंगे।

छह इंच तक हरा और सूखा वाला डंठल नीचे भर देंगे। इसके बाद 5 किलो गोबर पानी में ढीला घोलकर इसमें डाल देंगे। साथ में 2 इंच मिट्टी भी डालेंगे। भराई करने के बाद उसके उपर से मुलायम वववावला डंठल डाला जाएगा। फिर पांच किलो गोबर पानी के साथ मिक्स करके तर करेंगे। इसी तरह गड्ढे को उपर तक भरना होगा।

खाद बनाने का दूसरा तरीका

गाजर घास से खाद बनाने का दो तरीका है। दूसरा तरीका यह है कि आपको चार गड्ढे खोदने होते हैं। सबकी एक दूसरे से दूरी डेढ़ फीट की होनी चाहिए। खाद बनाने की पहले वाली विधि की ही तरह पहले गड्ढे में घास और गोबर की भराई कर दी जाए। जब मैटेरियल अच्छी तरह सड़ जाए तो पहले वाले गड्डे से मैटेरियल निकाल दूसरे में डाल देना चाहिए।

फिर दूसरे का मैटेरियल निकाल कर तीसरे और पहले इसी तरह चौथे में डाल देना चाहिए। यह प्रक्रिया पहले, दूसरे तीसरे और चौथे गड्ढे में चलेगी और फिर खाद तैयार हो जाएगी। कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. संदीप कन्नोजिया कहते हैं, “गाजर घास से बनी 20 टन खाद एक हेक्टेयर खेत के लिए मुफीद है।