इस ऑटो ड्राइवर ने लगाए आंवले के 60 पौधे और बन गया करोड़पति

अगर सफल होना चाहते हैं तो एक चीज जो आपके पास होनी चाहिए है वह है ‘धैर्य’. मेहनत और सच्ची लगन से किए हुए काम का अच्छा नतीजा तभी मिलता है जब आपके पास धैर्य हो. इसी का जीता-जागता उदाहरण है राजस्थान के किसान अमर सिंह. 57 साल के अमर सिंह सभी किसानों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है, जो खेती-बाड़ी कर पैसा कमाना चाहते है.

दरअसल अमर मूल रूप से किसान नहीं हैं बल्कि ऑटोड्राइवर हैं. इन्होंने सालों पहले महज 1200 रुपये में आंवला के 60 पौधे रोपे थे. 22 साल बाद ये पौधे बड़े हुए. आपको जानकर यकीन नहीं होगा लेकिन मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आज अमर इन्हीं पेड़ों से 26 लाख का टर्नओवर कमा रहे हैं.

इस कारोबार में अमर सिंह की मदद करने वाले ल्यूपिन ह्यूमन वेलफेयर ऐंड रिसर्च फाउंडेशन के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर सीताराम गुप्ता बताते हैं कि उनकी मेहनत के कारण आज कई लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ है. जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं.

ऑटोड्राइवर अमर सिंह ऐसे बने किसान

अमर सिंह का पैतृक पेशा खेती का था. साल 1977 में अमर सिंह के पिता का देहांत हो गया. हालांकि खेती से ही उनका घर चल रहा था. पर उस दौरान खेती से कुछ कमाई नहीं होती थी. घर के हालात ठीक नहीं थे इसलिए अमर ने ऑटो चलाना शुरू कर दिया.

हालांकि इसमें उनका मन नहीं लगा और 1985 में वह अपने ससुराल में, गुजरात, अहमदाबाद पहुंच गए. वहीं रास्ते में सड़क पर उन्हें अखबार का एक टुकड़ा मिला था, जिसमें आंवले की खेती के बारे में जानकारी दी गई थी.

वह उस आर्टिकल से इतने इंप्रेस हुए कि उन्होंने ठान लिया की वह अब आंवले की ही खेती करेंगे. उन्होंने 2 एकड़ जमीन पर आंवले के 60 पौधे बोए. उन्हीं बोए हुए पौधों का नतीजा है कि आज वे करोड़पति किसानों में गिने जाते हैं.

ये उपाय अपनाने से खेत में नहीं दिखेंगे चूहे

चूहों की संख्या मई-जून माह में कम होती है, यही समय चूहा नियंत्रण अभियान के लिए सही समय होता है, यह अभियान सामूहिक रूप में चलाना चाहिए। चूहे खेत खलिहानो, घरों और गोदामों में अनाज खाने के साथ-साथ ही अपने मलमूत्र से अनाज बर्बाद कर देते हैं।

संसारों में चूहे की पांच सौ से भी अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं, एक जोड़ी चूहा एक वर्ष में 800-1000 की संख्या में बढ़ जाते हैं, इसके प्रबंधन के लिए कम से कम तीस-चालीस लोगों की जरूरत होती है।चूहा नियंत्रण दो प्रकार से किया जा सकता

हैप्रथम विधि

हैप्रथम विधि के अन्तर्गत चूहों के आवासीय स्थलों को हटाकर इनका नियत्रण किया जाता है। यह पाया गया है कि चूहे मेढ़ों पर बिल बनाकर रहते है इसलिए खेतों में मेढ़ों कि ऊंचाई तथा चौड़ाई यथा संभव काम रखनी चाहिए,जिससे चूहे उस पर बिल न बना सके।

इसी प्रकार खरपतवार तथा पिछली फसल का कचरा चूहों को आकर्षित करता है व इसमें चूहे ना केवल सुरक्षित रहते हैं, बल्कि मुख्य फसल तैयार होने तक उस पर जीवन यापन करते हैं। इसलिए खरपतवार नियंत्रित कर स्वछ खेती करने से चूहों की संख्या में कमी की जा सकती है।

चूहानाशी विष का प्रयोग

दूसरी विधि है चूहानाशी विष के प्रयोग कीl यह चूहा नियत्रण की सबसे कारगर विधि है जो की सभी फसलों में अपनाई जा सकती हैl फसल में चूहनाशी विष दुबारा नियंत्रण कार्यक्रम काम कम से कम दो बार करना चहिये, प्रथम बार फसल बुवाई से पूर्व तथा पुन: फसल पकते समय व आवश्यकतानुसारl आमतौर पर चूहे शंकालु प्रकृति के होते हैं इसलिए चूहानाशी विष आसानी से नहीं खाते हैंl इसलिये विष को निश्चित मात्र में खाद्य पदार्थों या खाद्यानों मिला कर विष चुग्गा बनाना पड़ता हैl

ज़िंक फॉस्फाइड

ज़िंक फॉस्फाइड एक अत्यंत तेज असरकारक ज़हर होने की वजह इसकी ग्राह्यता व नियंत्रण कार्यक्रम को प्रभावी बनाने के लिय विष चुग्गे से पहले चूहे को सादा चुग्गा खिलाया जाता हैl एक किलो ग्राम सादा चुग्गा बनाने के लिए एक किलो ग्राम अनाज (बाजरा/गेहूँ) में 20 ग्राम खाने का तेल (मूंगफली/सरसों/तिल)मिलाकर चुपड़ ले

ब्रोमेडियोलोन

ब्रोमेडियोलोन विष का एक किलो ग्राम ताजा चुग्गा बनाने के लिए एक किलो ग्राम अनाज में 20 ग्राम खाने का तेल (मूंगफली/सरसो/तिल )चुपड़ कर 20 ग्राम ब्रोमेडियोलोन विष सान्द्र पाउडर (0.25%) अच्छी तरह से मिलाना चाहिए। इस प्रकार ज़िंक फास्फाइड तथा ब्रोमेडियोलोन के क्रमवार प्रयोग से खेतों में चूहों को प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है और फसलों को चूहों से बचाया जा सकता है ।

पहले दिन खेत का सर्वेक्षण किया जाता है, जहां बिल मिले उसे मिट्टी से बंद कर देना चाहिए।दूसरे दिन जो भी बिल खुले हों, वहां पर चावल या फिर चना के दाना रख देना चाहिए, ऐसे दो-तीन दिनों तक दाना रखें और चौथे दिन जहर मिलाकर दाना रखें। पांचवे दिन सुबह मरे हुए चूहों को और बचे हुए दानों को इकट्ठा कर जमीन में गड्ढ़ा खोदकर दबा दें।

बिना जहर के मरने के लिए देसी तरिके

  • चूहे को मीठा पसंद होता है। किसान खेतों में हो या घर पर, अनाज भण्डारण गृह में जलेबी का पाक जो आसानी से मिल जाता है, जलेबी के पाक में रूई की छोटी-छोटी गोली बना कर डूबा दें। जब वो गोलियां पूरी तरह से भीग जाएं तो चूहों के बिल के पास रख दें। चूहा उसे आसानी से खा लेता हैं। वह रूई की गोली चूहे की आँतों में फंस जाती है। कुछ समय के बाद चूहे की मौत हो जाती है।
  • प्याज की खुशबू चूहों से बर्दाश्त नही होतीं। इसलिए उन जगहों पर प्याज के टुकड़े डाल दें, जहां से चूहे आते हैं।
  • लाल मिर्च खाने में प्रयोग होने वाली लाल मिर्च चूहों को भगाने के लिए काफी कारगर है। जहां से चूहें ज्यादा आते हैं, वहां पर लालमिर्च का पाउडर डाल दें।
  • इंसानों के बाल से भी चूहे भागते हैं। क्योंकि इसको निगलने से इनकी मौत हो जाती है इसलिए इसके नजदीक आने से ये काफी डरते हैं।

ऐसे शुरू करें पापड़ बनाने का उद्योग

पापड़ आमतोर पर स्नेक्स के रूप में लिया जाने वाला खाद्य पदार्थ हैं. भारत में पापड़ खाना काफी पसंद किया जाता हैं. इसलिए पापड़ की मांग हमेशा रहती हैं. आम तौर पर लगभग सभी मौकों और त्यौहारों में भोजन के बाद पापड़ परोसा जाता है. अत: इनकी खपत हर देश के हर शहर और गांव के हर घर में होती है यानी इस उद्योग में करियर उज्ज्वल है.

पहले महिलाएं घरों में ही एकत्रित होकर अपने परिवार के लिए पापड़ आदि सामान बना लेती थी लेकिन अब एकल परिवार के चलन के चलते महिलाओं के पास इतना समय ही नहीं बचता कि पापड़ घर पर ही तैयार किये जा सके ऐसे में पापड़ बनाने का उद्योग आपको अपना बिज़नस शुरू करने का एक बेहतर मौका दे सकता हैं.

कितना स्कोप हैं पापड़ बनाने के बिज़नस में

भारत के गाँव व शहरों में पापड़ समान रूप से लोकप्रिय हैं. भारत के अतिरिक्त पापड़ को विदेशों में भी निर्यात किया जाता हैं. ब्रिटेन, अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, नाइजीरिया, ओमान, मलेशिया, कुवैत, कनाडा, बहरीन और ऑस्ट्रेलिया ऐसे कुछ देशों के नाम जहाँ हमारे यहाँ बने पापड़ की अधिक मांग होती हैं. इस लिहाज से देखें तो पापड़ उद्योग अवसरों से भरा हुआ हैं.

साथ ही पापड़ बनाने में किसी एक ब्रांड या कंपनी का नाम नहीं चलता. कुछ कंपनियां पुरे देश में फैली हुई हैं लेकिन 60 प्रतिशत बिज़नस लोकल पापड़ निर्माता द्वारा की किया जाता हैं. अपने बिज़नस को मजबूत आधार देने के लिए पापड़ के ब्रांड के विकास पर ध्यान केंद्रित करना महत्वपूर्ण है.

कैसे करें तैयारी व निवेश

पापड़ बनाने का उद्योग लगाने के लिए आपको लोकल लोगों की पसंद की जानकारी होना आवश्यक हैं. साथ ही आपके रीजन में एक अनुभवी डिस्ट्रीब्यूटर का भी आपको साथ चाहिए. पापड़ उद्योग लघु उद्योगों में गिना जाता हैं इसलिए इसमें बहुत अधिक निवेश की आवश्यकता नहीं होती. और आपको बैंक, ग्राम पंचायत आदि संस्थानों से आसनी से लोन मिल भी सकता हैं.

इसके लिए आप प्राइवेट स्तर पर या सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न स्कीमों के तहत नजदीकी बैंक में आवेदन कर सकते हैं. बैंक से भी आपको लोन इसी शर्त पर मिलेगा जब आपके पास उचित बिज़नस प्लान होगा, जिसमें कि आपकी उत्पादक क्षमता आदि की जानकारी दी गयी हो.

कच्चा माल व मशीनरी

पापड़ बनाने के लिए आवश्यक कच्चा मान अच्छी क्वालिटी का होना आवश्यक है क्यूंकि कच्चे माल की क्वालिटी पर आपके पापड़ की क्वालिटी निर्भर करेगी. पापड़ बनाने के लिए दालों, अट्टों, मसाले पाउडर, मिर्च , सोडियम बाई कार्बोनेट और नमक के मिश्रण का उपयोग किया जाता है, ये सभी सामान कहीं से भी आसानी से मिल सकता हैं.

पापड़ बनाने के लिए अगर आप लघु स्टार पर अपना बिज़नस सेट कर रहे हैं तो आपको बहुत बड़ी मशीनरी की आवश्यकता नहीं होगी.

 

 

  • Grinding Machine
  • Mixing Machine
  • Electric Papad press machine (इस मशीन के माध्यम से पापड़ को आसानी से आकार दिया जा सकता है )
  • Sieve Set (चलनी सेट)
  • Drying Machine with trolley या फिर यदि उद्यमी का बजट कम है तो वह पापड़ को धुप में भी सूखा सकता है |
  • पानी भरने और उसको रखने के लिए टैंक |
  • Packaging के लिए Pouch Sealing Machine
  • इसके अलावा BIS मानकों पर खरा उतरने के लिए कुछ Laboratory equipments की भी आवश्यकता हो सकती है |

ये मशीनें दिल्ली, मुंबई आदि शहरों में मिल जाती हैं. पानी भरने के टैंक की आवश्यकता भी होगी व पापड़ पैक करने के लिए पोलीथीन भी चाहिए. BIS मनको पर खरा उतरने के लिए कीच लैब से जुड़े उपकरण भी जरूरी हैं जो उत्पाद की क्वालिटी चेक कर सकें.

कैसे बनाएं पापड़

सबसे पहले, आप नमक, मसालों और सोडियम बाइकार्बोनेट को दालों के आटे में समान रूप से मिलाएं फिर इस मिश्रण में पर्याप्त मात्रा में पानी मिला कर गूँथ लें. पापड़ विभिन्न दालों से बनाये जा सकते हैं, जैसे अगर आपको उड़द की दाल से पापड़ बनाना हैं तो उसे रात भर भिगों कर रखें व सुबह ग्राइंडर में पिस कर दल की पिट्ठी में सभी मसालें मिलाकर मिश्रण तैयार कर लें.

लगभग 30 मिनट के बाद, छोटी-छोटी आटे की गोली बना लें. फिर इन गोलियों को पापड़ बनाने वाली मशीन में रखना हैं. यहां आप मोल्ड के आकार के अनुसार पपड़े का उत्पादन कर सकते हैं. अब पापड़ को धुप या ड्रायर की सहायता से सुखा लें. सूखने के बाद एक आकर्षक पैकिंग में पापड़ पैक कर लें.

अब आपके पापड़ बिकने के लिए तैयार हैं. लघु स्तर पर आप इस उद्योग से 20 से 25 हजार तक की कमाई कर सकते

आ गई तीन तरफ से पलटने वाली ट्राली

आमतौर पर देखा गया है कि ट्रॉली या तो समान्य होती है या फिर हाइड्रोलिक लिफ्ट वाली होती है जिस से ट्रॉली को पीछे की तरफ पलटा जा सकता है ।लेकिन अब ऐसी ट्राली (3 Way Tipping Trailer) आ चुकी है जो एक नहीं, दो नहीं बल्कि उससे तीन तरफ पलट सकते हैं ।

इस को हम दाएं और बाएं दोनों तरफ पलट सकते हैं । इसका फायदा यह होगा कि हम तीनों तरफ से सामान डाल और उतार सकते हैं ।

 

फील्ड किंग कंपनी द्वारा तैयार की गई यह ट्राली बहुत ही आधुनिक है इसमें जो मॅट्रिअल इस्तेमाल किया गया है वो बहुत ही बढ़िया क्वालिटी का लगा हुआ है ।

 

इसमें सिर्फ एक हाइड्रोलिक लिफ्ट से हम ट्राली को तीन तरफ से उठा सकते हैं । हमने ट्राली को जिस तरफ पलटना है उस हिसाब से ट्राली में थोड़ी सेटिंग्स करनी पड़ती है जो बहुत ही आसानी से हो जाती है ।

फीलड किंग कंपनी इसे तीन साइज में बनाती है ।सबसे का छोटी का जो तीन टन वज़न उठा सकती है उसका आकर है (8X6X2) फ़ीट , उससे बड़ी जो पांच टन वज़न उठा सकती है उसका आकर है (10X6X2) फ़ीट,जो सबसे बड़ी है वो 9 टन वज़न उठा सकती है उसका आकर है (12X6X2) फ़ीट ।

कीमत और बाकी जानकारी के लिए निचे दिए हुए पते और नंबर पर संपर्क कर सकते है

Plot No.235-236 & 238-240, Sec-3, HSIIDC, Karnal -132001
(Haryana), India
+91 184 2221571 / 72 / 73
+91 11 48042089

यह ट्राली कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें

इस इंजीनियर ने छोड़ा 30 लाख का पैकेज, अब चाय बेच कर कमा रहे है उस से भी ज्यादा

जिस जगह मन ना लगे वह काम छोड़ दो और दिल की सुनो. ऐसी ही एक कहानी है मधुर मल्होत्रा की जो पेशे से वैसे इंजीनियर हैं. अगर आपको लाखों का पैकेज मिले तो शायद ही आप उस नौकरी को छोड़ने के बारे में सोचेंगे.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 33 साल के मधुर मल्होत्रा ने अपने जिंदगी को नया मोड़ देते हुए ऑस्ट्रेलिया के 30 लाख के पैकेज की नौकरी को छोड़ भारत लौट आए.

जहां उन्होंने वो काम शुरू किया, जिसकी शायद उन्होंने भी कल्पना नहीं की थी. 2009 में भारत लौटे मधुर ने नौकरी छोड़ चाय की दुकान खोल ली. उनका कहना है कि चाय सदाबहार पेय है. हालांकि सर्दी और बारिश में चाय की चुस्कियों का मजा ही कुछ और होता है.

आईटी और कम्यूनिकेशन में ऑस्ट्रेलिया से ही मास्टर्स कर चुके मधुर की मां एक बार गंभीर रूप से बीमार हो गईं, जिसके बाद उन्हें मां की देखभाल करने के लिए तुरंत ऑस्ट्रेलिया से इंडिया आना पड़ा. वह बताते हैं कि मेरी मां की ओपन हार्ट सर्जरी होनी थी. वह 72 साल की हैं और मेरे पिता 78 साल के.

इंडिया वापस लौटने के बाद मधुर ने फैमिली का कंस्ट्रक्शन बिजनेस शुरू किया, लेकिन पुराना काम होने की वजह से उन्हें मजा नहीं आ रहा था और वह इससे असंतुष्ट हो रहे थे.

एक बार वह अपनी दोस्त के साथ चाय पीने निकले. तब उन्होंने देखा कि चाय बनाने वाले के हाथ साफ नहीं है और वह उन्हीं खुले हाथों से दूध निकालकर चाय बना रहा था. इसके अलावा वहां चाय की दुकान पर अधिकतर लोग सिगरेट फूंकने वाले थे. इसके बाद मधुर ने सोचा कि क्यों न इससे बेहतर कोई चाय की दुकान खोली जाए.

फिर क्या था मधुर और उनके दोस्त ने मिलकर एक छोटा-सा चाय का कैफे खोलने का प्लान बनाया जहां अच्छे माहौल में लोग अपनी फैमिली या दोस्त के साथ सिर्फ चाय पीने आएं. उन्होंने चाय पर काफी रिसर्च की और पाया कि अगर कुल्हड़ में सामान्य चाय को बेहतर बनाकर बेचा जाए तो लोग आकर्षित हो सकते हैं.

फिर क्या था उन्होंने कुल्हड़ वाली चाय को एक अलग अंदाज में पेश किया. साथ ही पाया कि कुल्हड़ पर्यावरण के लिहाज से भी अच्छा विकल्प है. धीरे-धीरे मधुर ने चाय की 22 कैटिगरी बना दीं.सेल इतनी है के उनकी पास 50 लीटर का स्टोरेज है, जो एक ही घंटे में खत्म हो जाता है। इनमें तुलसी-इलाइची, तुलसी-अदरक, मसाला चाय जैसे देसी वैराइटीज के अलावा लेमन-हनी, लेमन-तुलसी और रॉ टी फ्लेवर्स भी शामिल हैं।

कैफे ‘चाय-34’ की 22 तरह के स्वाद की अलग-अलग खासियत वाली चाय वो भी कुल्हड़ में. भोपाल के शिवाजी नगर में चलने वाले चाय का ये कैफे मधुर की पहचान बन गई है. अब वो और जगह पर भी अपना कैफे कैफे ‘चाय-34’ खोलने जा रहे है . सिर्फ चाय बेच कर वो अपनी जॉब से ज्यादा कमाई कर रहे है .अभी उनकी सालाना टर्न ओवर लाखों में है लेकिन बहुत जल्द करोड़ों में हो जाएगी

खेती के लिए बहुत ही उपयोगी है यह 12 प्रकार के जैविक टीके

 

आज कल खेती के लिए ज्यादतर रासयनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग ज्यादा क्या जा रहा है । जो एक बार तो असर करते है लेकिन लम्बे समय तक प्रयोग करने से वो मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को कम कर देते है ।साथ में धीरे धीरे इनका असर भी कम होने लग जाता है ऐसे में अगर आप जैविक टीकों का इस्तेमाल करेंगे तो आप की फसल उत्पादन तो बढ़ेगा ही साथ में इनका असर भी सालों साल चलेगा

नील हरित शैवाल टीका: धान में काफी लाभकारी है। यह नत्रजन के अलावा जैविक कार्बन एवं पादप वृद्धि करने वाले पदार्थ भी उपलब्ध कराता है। एक एकड़ की धान की फसल को उपचारित करने के लिए 500 ग्राम का एक पैकेट टीका काफी है। 20 से 30 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर फसल में लाभ होता है।

अजोला टीका: यह एक आदर्श जैविक प्रणाली है। जो उष्ण दिशाओं में धान के खेत में वायुमंडलीय नत्रजन का जैविक स्थिरीकरण करता है। अजोला 25 से 30 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर प्रति फसल को योगदान करता है।

हरी खाद: साल में एक बार हरी खाद उगाकर खेत में जोतकर कार्बनिक अंश को बनाए रख सकते हैं। हरी खादों में दलहनी फसलों, वृक्षों की पत्तियां खरपतवारों को जोतकर उपयोग किया जाता है। एक दलहनी परिवार की फसल 10-25 टन हरी खाद पैदा करती है। इसके जोतने से 60 से 90 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर की दर से प्राप्त होती है।

ढैंचा: यह फसल 40 से 60 दिनों में जोतने लायक हो जाती है। यह 50 से 60 किलोग्राम नत्रजन की भी प्रति हेक्टेयर आपूर्ति करता है। बुवाई के लिए 30 से 40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर डालें दो से तीन सिंचाई ही करनी पड़ती है। इसके अलावा नील हरित शैवाल टीका, आरबसक्ूयलर माइकोराजा न्यूट्रीलिंक टीका, सूबबूल आदि भी लाभकारी हैं।

कंपोस्ट टीका: इस टीके के प्रयोग से धान के पुआल का 6 से 9 सप्ताह के अंदर बहुत अच्छा कंपोस्ट बन जाता है। एक पैकेट के अंदर 500 ग्राम टीका होता है जो एक टन कृषि अवशेष को तेजी से सड़ाकर कंपोस्ट बनाने के लिए काफी है।

राइजोबियम टीका: राइजोबियम का टीका दलहनी, तिलहनी एवं चारे वाली फसलों में प्रयोग होता है। ये 50 से 100 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर का जैविक स्थिरीकरण कर सकते हैं। इससे 25 से 30 फीसदी फसल उत्पादन बढ़ता है।

एजोटोबैक्टर टीका: यह स्वतंत्र जीवी जीवाणु है। इसका प्रयोेग गेहूं, धान, मक्का, बाजरा आदि, टमाटर, आलू, बैंगन, प्याज, कपास सरसों आदि में करते हैं। 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर की बचत करता है। 10 से 20 प्रतिशत फसल बढ़ती है।

एजोस्पिरिलम टीका: इसका प्रयोग अनाज वाली फसलों में होता है। जैसे ज्वार, बाजरा, रागी, मोटे छोटे अनाजों एवं जई में होता है। चारे वाली फसलों पर भी लाभकारी होता है। 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर बचत करता है। फसल चारा उत्पादन बढ़ता है।

फास्फोरस विलयी जीवाणु टीका: फास्फोरस पौधों के लिए मुख्य पोषक तत्व है। इस टीके के प्रयोग से मृदा में मौजूद अघुलनशील फास्फोरस घुलनशील होकर पौधों को उपलब्ध हो जाता है

धान को रोग, कीटों से बचाने के लिए करें ये उपाय

किसान महंगे बीज, खाद इस्तेमाल कर धान की खेती करता है, ऐसे में सही प्रबंधन न होने से कीट और रोगों से काफी नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए सही समय से ही इनका प्रबंधन कर नुकसान से बचा जा सकता है।

धान की फसल को विभिन्न बीमारियों में जैसे धान का झोंका, भूरा धब्बा, शीथ ब्लाइट, आभासी कंड व जिंक कि कमी आदि की समस्या प्रमुख समस्या होती है। क्षतिकर कीटों जैसे तना छेदक, गुलाबी तना छेदक, पत्ती लपेटक, धान का फूदका और गंधीबग कीटों से नुकसान पहुंचता है।

धान का तना छेदक

इस कीट की सूड़ी अवस्था ही क्षतिकर होती है। सबसे पहले अंडे से निकलने के बाद सूड़ियां मध्य कलिकाओं की पत्तियों में छेदकर अन्दर घुस जाती हैं और अन्दर ही अन्दर तने को खाती हुई गांठ तक चली जाती हैं। पौधों की बढ़वार की अवस्था में प्रकोप होने पर बालियां नहीं निकलती हैं। बाली वाली अवस्था में प्रकोप होने पर बालियां सूखकर सफ़ेद हो जाती हैं और दाने नहीं बनते हैं।

कीट प्रबंध:

फसल की कटाई जमीन की सतह से करनी चाहिए और ठूठों को एकत्रित कर जला देना चाहिए। जिंक सल्फेट+बुझा हुआ चूना (100 ग्राम+ 50 ग्राम) प्रति नाली की दर से 15-20 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। पौध रोपाई के समय पौधों के ऊपरी भाग की पत्तियों को थोड़ा सा काटकर रोपाई करें, जिससे अंडे नष्ट हो जाते हैं। धतूरा के पत्ते नीम के पती तम्बाकू को 20 लीटर पानी में उबालें यह पानी 4-5 लीटर रह जाए तो ठंडा करके 10 लीटर गौमूत्र में मिलाकर छिड़काव करें।

रासायनिक विधि – तना छेदक की रोकथाम के लिए कार्बोफूरान तीन जी 20 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से 3-5 सेमी स्थिर पानी में अथवा कारटाप हाइड्रोेक्लोराइड चार प्रतिशत 18 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 3-5 सेमी स्थिर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

धान का पत्ती लपेटक कीट

मादा कीट धान की पत्तियों के शिराओं के पास समूह में अंडे देती हैं। इन अण्डों से छह-आठ दिनों में सूड़ियां बाहर निकलती हैं। ये सूड़ियां पहले मुलायम पत्तियों को खाती हैं और बाद में अपने लार से रेशमी धागा बनाकर पत्ती को किनारों से मोड़ देती हैं और अन्दर ही अन्दर खुरच कर खाती है।

धान की गंधीबग

वयस्क लम्बा, पतले और हरे-भूरे रंग का उड़ने वाला कीट होता है। इस कीट की पहचान कीट से आने वाली दुर्गन्ध से भी कर सकते हैं। इसके व्यस्क और शिशु दूधिया दानों को चूसकर हानि पहुंचाते हैं, जिससे दानों पर भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं और दाने खोखले रह जाते हैं।

देसी तरिके से –यदि कीट की संख्या एक या एक से अधिक प्रति पौध दिखायी दे तो मालाथियान पांच प्रतिशत विष धूल की 500-600 ग्राम मात्रा प्रति नाली की दर से छिड़काव करें। खेत के मेड़ों पर उगे घास की सफाई करें क्योंकि इन्ही खरपतवारों पर ये कीट पनपते रहते हैं और दुग्धावस्था में फसल पर आक्रमण करते हैं।

रासायनिक विधि –10 प्रतिशत पत्तियां क्षतिग्रस्त होने पर केल्डान 50 प्रतिशत घुलनशील धूल का दो ग्राम/ली. पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें।

भूरी चित्ती रोग

इस रोग के लक्षण मुख्यतया पत्तियों पर छोटे- छोटे भूरे रंग के धब्बे के रूप में दिखाई देतें है। उग्र संक्रमण होने पर ये धब्बे आपस में मिल कर पत्तियों को सूखा देते हैं और बालियां पूर्ण रूप से बाहर नहीं निकलती हैं। इस रोग का प्रकोप धान में कम उर्वरता वाले क्षेत्रों में अधिक दिखाई देता है।

इस रोग के रोकथाम के लिए बुवाई से पहले बीज को ट्राईसाइक्लेजोल दो ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करें। पुष्पन की अवस्था में जरुरत पड़ने पर कार्बेन्डाजिम का छिड़काव करें। रोग के लक्षण दिखाई देने पर 10-20 दिन के अन्तराल पर या बाली निकलते समय दो बार आवश्यकतानुसार

रासायनिक विधि –कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत घुलनशील धूल की 15-20 ग्राम मात्रा को लगभग 15 ली पानी में घोल बनाकर प्रति नाली की दर से छिड़काव करें।

पर्णच्छाद अंगमारी

इस रोग के लक्षण मुख्यत: पत्तियों पर दिखाई देते हैं। संतुलित मात्रा में नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश का प्रयोग करें। बीज को थीरम 2.5 ग्राम/किग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बुवाई करें। जुलाई महीने में रोग के लक्षण दिखाई देने पर मैकोजेब (0.24 प्रतिशत) का छिड़काव करें।

आभासी कंड

यह एक फफूंदीजनित रोग है। रोग के लक्षण पौधों में बालियों के निकलने के बाद ही स्पष्ट होते हैं। रोगग्रस्त दाने पीले से लेकर संतरे के रंग के हो जाते हैं जो बाद में जैतूनी- काले रंग के गोलों में बदल जाते हैं। फसल काटने के बाद अवशेषों को जला दें। खेतों में अधिक जलभराव नहीं होना चाहिए। रोग के लक्षण दिखाई देने पर प्रोपेकोनेजोल 20 मिली. मात्रा को 15-20 ली. पानी में घोल बनाकर प्रति नाली की दर से छिड़काव करें।

अब हर तरह की फसल के अवशेषों को मिट्टी में मिलाने के लिए करें शक्तिमान मल्चर का प्रयोग

शक्तिमान रोटरी मल्चर, बागों और बगीचों, धान, पलवार घास और झाड़ियों को काटने के लिए एक सरल और विश्वसनीय उपकरण है। यह उपकरण मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में भी मदद करता है।

शक्तिमान रोटरी मल्चर एक तरह का कतरनी यंत्र है, यह न्यूनतम 50 हार्स पावर के डबल क्लचर वाले ट्रैक्टर के पीछे लगा कर चलाया जाता है । यह फसल के अवशेषों को बारीकी से काटता है ।

शक्तिमान रोटरी मल्चर को पुआल व डंठलों के बारीक टुकड़े काटने, हरा चारा काटने, केले की फसल को काटने, सब्जियों की फसल के अवशषों को छोटे टुकड़ों में काटने के अलावा ऊंची घास व छोटी झाडि़यों को काटने में भी इस्तेमाल किया जाता है ।

शक्तिमान रोटरी मल्चर में काफी मात्रा में अवशेषों की बारीक कटाई के लिए बड़ा कार्यशील चैंबर होता है । यह मशीन कतरने के लिए बेहद प्रभावशाली व गुणवत्ता वाली मानी जाती है ।

किसान गन्ने के खेत में कटाई के बाद बचे हुए कुड़े धान के बचे हुए अवशेष को खेत में ही जला देते है। जिससे पर्यावरण दूषित होता है मित्र कीट मर जाते है। इसलिए शक्तिमान रोटरी मल्चर के प्रयोग से गन्ने का बचा हुआ कुड़ा सूखी पत्ती धान के बचे हुए अवशेषों को भरभूरा कर जमीन पर सतह बना देता है।

कीमत और दूसरी जानकारी के लिए आप इन नंबर Phone: +91 (2827) 661637, +91 (2827) 270 537 पर सम्पर्क कर सकते है ।

मल्चर कैसे काम करता है इसके लिए वीडियो भी देखें

ऐसे करें नीम का खेती में इस्तेमाल ,महंगे कीटनाशक से मिल जायगा छुटकारा

नीम का वृक्ष प्रकृति का अनुपम उपहार हैं। नीम से तैयार किये गए उत्पादों का कीट नियंत्रण अनोखा हैं, इस कारण नीम से बनाई गई दवा विश्व में सबसे अच्छी कीट नियंत्रण दवा मानी जाती हैं। लेकिन इसके उपयोग को लोग अब भूल रहे हैं। इसका फायदा अब बड़ी-बड़ी कम्पनिया उठा रही हैं ये कम्पनिया इसकी निम्बोलियों व पत्तियों से बनाई गई कीटनाशक दवाये महंगे दामों पर बेचती हैं।

इसकी कड़वी गन्ध से सभी जिव दूर भागते हैं। वे कीट जिनकी सुगंध क्षमता बहुत विकसित हो गयी हैं, वे इसको छोड़कर दूर चले जाते हैं जिन पर नीम के रसायन छिड़के गए हों।

इसके संपर्क में मुलायम त्वचा वाले कीट जैसे चेंपा, तैला, थ्रिप्स, सफेद मक्खी आदि आने पर मर जाते हैं। नीम का मनुष्य जीवन पर जहरीला प्रभाव नहीं पड़ना ही इसको दवाओं के रूप में उच्च स्थान दिलाता हैं। नीम की निम्बोलिया जून से अगस्त तक पक कर गिरती हैं निम्बोली का स्वाद हल्का मीठा होता हैं।

इसकी निम्बोली गिरने पर सड़कर समाप्त हो जाती हैं परन्तु गिरी सफेद गुठली से ढकी होने के कारण लम्बे समय तक सुरक्षित रहती हैं। निम्बोली को तोड़ने पर 55% भाग गुठली के रूप में अलग हो जाता हैं। तथा 45% गिरी के रूप में प्राप्त होता हैं। अच्छे ढंग से संग्रहित की गई गिरी हरे भूरे रंग की होती हैं।

नीम से तैयार दवाइयों के अनेक गुण
• रासायनिक दवाइयों की स्प्रे नीम में मिलाकर करें। इस तरह करने से रासायनिक दवाइयों के प्रयोग में 25-30 प्रतिशत तक कमी आती है।
• नीम की स्प्रे सुबह या शाम के समय करनी चाहिए।
• नीम केक पाउडर डालने से खेत में बहुत तरह के प्रभाव देखे जा सकते हैं जैसे कि इससे पौधे निमाटोड और फंगस से बचे रहते हैं। इस विधि से ज़मीन के तत्व आसानी से पौधे में मिल जाते हैं।
• नीम हानिकारक कीटों के जीवन चक्र को भी प्रभावित करती है, जैसे कि अंडे, लार्वा आदि। इसके अलावा भुंडियों, सुंडियों और टिड्डों आदि पर भी प्रभाव पड़ता है। यह रस चूसने वाले कीटों की ज्यादा रोधक नहीं है।
• यदि नीम का गुद्दा यूरिया के साथ प्रयोग किया जाये, तो खाद का प्रभाव बढ़ जाता है और ज़मीन के अंदरूनी हानिकारक बीमारियों और कीटों से बचाव होता है।
• दीमक से बचाव के लिए 3-5 किलो नीम पाउडर को बिजाई से पहले एक एकड़ मिट्टी में मिलायें।
• मूंगफली में पत्ते के सुरंगी कीट के लिए 1.0 प्रतिशत नीम के बीजों का रस या 2 प्रतिशत नीम के तेल की स्प्रे बिजाई के 35-40 दिनों के बाद करें।
• जड़ों में गांठे बनने की बीमारी की रोकथाम के लिए 50 ग्राम नीम पाउडर को 50 लीटर पानी में पूरी रात डुबोयें और फिर स्प्रे करें

मोदी सरकार के इस स्कीम से कमा सकते हैं 25 हजार रुपए महीना।

70वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले पर तिरंगा फहराया। इसके साथ ही उन्होंने देशवासियों को संबोधित करते हुए कुछ खास योजनाओं का जिक्र किया। इनयोजनाओं से आम लोगों को फायदा हो रहा है। पीएम मोदी ने जिन योजनाओं का जिक्र किया उसमे महत्वाकांक्षी जन औषधि योजना मुख्य रूप से शामिल है।

पीएम मोदी ने बताया इस महत्वाकांक्षी योजना के जरिये शहरों से लेकर गांवों तक लाभ पहुँच रहा है। सरकार इस ख़ास योजना के जरिये आम लोगों को लगातार कमाई का भी मौक़ा दे रही है जिसका फायदा आप भी उठा सकते हैं। इस योजना का लाभ उठाते हुए आप 25 से 30 हजार रूपये तक कमाई कर सकते हैं। ख़ास बात ये है कि इस स्कीम के तहत बिजनेस शुरू करने के लिए सरकार ने पिछले दिनों नियम में कुछ बदलाव किया है।

जनऔषधि सेंटर खोलने के लिए सरकार ने तीन कैटेगरी बनाई है। पहली कैटेगरी में कोई भी व्यक्ति बेरोजगार, फार्मासिस्ट, डॉक्टर, रजिस्टर्ड मेडिकल, प्रैक्टिशनर स्टोर खोल सकेगा। दूसरी कैटेगरी में ट्रस्ट, एनजीओ, प्राइवेट हॉस्पिटल, सोसायटी और सेल्फ हेल्प ग्रुप को स्टोर खोलने का मौका मिलेगा। तीसरी कैटेगरी में राज्य सरकारों द्वारा नॉमिनेट की गई एजेंसी होगी। वहीं, दुकान खोलने के लिए 120 वर्गफुट एरिया में दुकान होनी जरूरी है।

आप अपने सेंटर के जरिए महीने में जितनी दवाएं सेल करेंगे, उन दवाओं का 20 फीसदी आपको कमिशन के रूप में मिल जाएगा। ट्रेड मार्जिन के अलावा सरकार मंथली सेल पर 10 फीसदी इंसेंटिव देगी, जो आपके बैंक अकाउंट में आ जाएगा। इस तरह से दुकानदार को ट्रेड मार्जिन के अलावा इंसेटिव के रूप में डबल मुनाफा होगा।

यानी अगर वह एक महीने में 1 लाख रुपए तक की दवा सेल करते हैं तो 25 से 30 हजार रुपए तक मंथली इनकम होगी। सेंटर शुरू करने पर 1 लाख रुपए की दवाइयां पहले आपको दवा खरीदनी होगी। बाद में सरकार इसे मंथली बेसिस पर रीइंबर्समेंट करेगी।

कैसे करें आवेदन

स्टोर खोलने के लिए आपके पास रिटेल ड्रग सेल करने का लाइसेंस जन औषधि स्टोर के नाम से होना चाहिए। इसके अलावा कम से कम 120 वर्ग फुट का एरिया किराए पर या ओनरशिप में होना जरूरी है।

-जो व्यक्ति या एजेंसी स्टोरी खोलना चाहता है, वह http://janaushadhi.gov.in/ पर जाकर फार्म डाउनलोड कर सकता है। -उसे अपने एप्लीकेशन को 2000 रुपए के डिमांड ड्रॉफ्ट के साथ ब्यूरो ऑफ फॉर्मा पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग ऑफ इंडिया के जनरल मैनेजर(A&F)के नाम से भेजना होगा।

-ब्यूरो ऑफ फॉर्मा पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग ऑफ इंडिया का एड्रेस जनऔषधि की वेबसाइट पर और भी जानकारी उपलब्ध है।