सिर्फ 20 हजार में शुरू करें रानी मधुमक्खियों का कारोबार

सुनने में यह बात थोड़ी अजीब लगे कि एक शख्‍स ने 500-500 रुपए में एक-एक ‘रानी’ बेचकर करोड़ों रुपए का कारोबार खड़ा कर दिया। न तो अब राजा-रानी का दौर है, न ही कभी रानियां बिकती थींं, तो यह शख्‍स किस रानी का बिजनेस कर रहा है।

हकीकत यह है कि जिस एक रानी की बिक्री 500 रुपए में हो रही है वह मधुमक्खियों की रानी ‘क्‍वीन बी’ है और इनका बिजनेस करने वाला व्‍यक्ति है पंजाब के कपूरथला निवासी श्रवण सिंह चांडी। देश में शहद का सालाना कारोबार करीब 80 हजार टन का है।

ऐसे में आपके पास भी यह मौका है कि कम पैसे और थोड़ी जानकारी लेकर आप ‘रानी’ मधुमक्‍खी का व्‍यापार आप भी कर सकते हैं। आइए जानते हैं क्‍वीन-बी से जुड़े बिजनेस और इससे जुड़ी कुछ रोचक बातें…

45 दिन में तैयार होती है रानी

  • क्‍वीन-बी तैयार करने के लिए एक विशेष किट की जरूरत होती है, जो ब्रिटेन व यूएसए से इंपोर्ट की जाती है।
  • रानी मक्‍खी तैयार करने के लिए 45 दिन की प्रक्रिया होती है। सारी प्रक्रिया 69 डिग्री सेल्सियश तापमान पर होती है।
  • इस किट की ट्यूब्स में मधुमक्‍खी के छत्‍ते से रानी मक्‍खी का लारवा रखा जाता है।
  • एक दिन बाद इस ट्यूब में बारी-बारी से दस नर मधुमक्‍खी (ड्रोन) से ब्रीडिंग करानी होती है।
  • इस प्रक्रिया के दौरान खास तकनीक, ट्रेनिंग और टूल्‍स की भी आवश्‍यकता होती है, जिससे ब्रीडिंग में नुकसान न हो।
  • 45वें दिन रानी मक्‍खी तैयार हो जाती है। इसके बाद इसे शहद उत्‍पादन करने वालों को बेच दिया जाता है।

500 रुपए में बिकती है एक रानी

  • क्‍वीन-बी ब्रीडर श्रवण सिंह चांडी के अनुसार रानी मधुमक्खी कायापार शहद प्रोडक्शन से कहीं अधिक लाभदायक है।
  • कृत्रिम रूप से तैयार की गई रानी की अलग पहचान होती है इसके सिर पर एक टैग लगा होता है।
  • एक बॉक्स से शहद उत्पादन से एक साल में 2 से 3 हजार रुपए एक साल में कमाए जा सकते हैं लेकिन क्वीन से लाखों।
  • एक ब्रीड बॉक्स में 45 दिनों में 300 रानी मधुमक्खियां बनाई जा सकती हैं। एक मधुमक्खी की कीमत 500 रुपए से भी ज्यादा होती है।
  • केवल 45 दिनों बाद ही एक ब्रीड बॉक्स से 1.5 लाख रुपए तक कमाए जा सकते हैं। जबकि, शहद उत्पादन में ज्यादा वक्त लगता है।
  • शहद की अधिक कीमत के चलते एक मक्खी की कीमत 800 रुपए तक हो जाती है।

एक्‍स्‍पोर्ट भी करते हैं रानी को

  • श्रवण सिंह चांडी देश के सबसे बड़े क्‍वीन-बी ब्रीडर्स हैं। इनका शहर उत्पादन का भी बहुत बड़ा काम है।
  • इन्हें क्वीन ब्रीड उत्पादन के लिए पंजाब और भारत सरकार की ओर से कई अवार्ड भी मिल चुके हैं।
  • चांडी हर साल 5 करोड़ रुपए से अधिक कमाते हैं। घरेलू सप्लाई के अलावा ये रानी मक्ख्यिां एक्सपोर्ट भी करते हैं।
  • वर्तमान में ये प्रोग्रेसिव बी कीपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष हैं और कई जगह ट्रेनिंग सेंटर भी चलाते हैं।

80 हजार मक्खियों पर चलता है राज

  • शहद उत्पादन करने वाले एक बॉक्स या छत्ते में 80 हजार तक मधुमक्खियां होती हैं, इनमें सिर्फ एक रानी मक्खी होती है।
  • छत्ते में एक रानी के अलावा ड्रोन, नर्स और वर्कर होते हैं। जिनका अलग-अलग काम बंंटा हुआ होता है।
  • एक रानी मक्खी की उम्र 5 साल होती है, जबकि वर्कर 45 दिन और ड्रोन मक्खियां 3 महीने तक जीती हैं।
  • रानी मक्खी का काम नर मधुमक्खी के साथ संपर्क में आकर सिर्फ बच्चे पैदा करना होता है।
  • रानी मक्खी के शरीर से एक खास खुशबूदार पदार्थ का रिसाव होता है जिससे उस छत्ते के सभी वर्कर शाम को छत्ते पर वापस आ जाते हैं।
  • छत्ते में एक नर्स मधुमक्खी भी होती है जिसका काम मरी हुई मक्खियों को निकालना और बच्चों को भोजन देना होता है।

20 हजार में शुरू कर सकते हैं काम

  • आप भी रानी मधमक्खियों का कारोबार कर सकते हैं इसके लिए शुरुआत में सिर्फ 20 हजार रुपए की जरूरत होगी।
  • 30 मधुमक्खियों को बनाने के लिए किट सिर्फ 45 डॉलर में इंपोर्ट की जा सकती है।
    इन दिनों किट कई ऑनलार्इन साइट्स पर भी उपलब्ध है, लेकिन इससे पहले आप किसी विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें ले।
  • इसके अलावा पंजाब एग्रीकल्चर युनिवर्सिटी समेत देश के कई युनिवर्सिटी इसकी ट्रेनिंग भी देते हैं।
    3400 करोड़ रुपए का है कारोबाद…
  • भारत में शहद का कारोबार करीब 3400 करोड़ रुपए का है। इसमें रॉ और प्रोसेस हनी शामिल है।
  • देश में करीब 2.5 लाख किसान बी किपिंग यानि मधुमक्खी पालन करते हैं।
  • सबसे ज्यादा मधुमक्खी पालक 33000 पंजाब राज्य में हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र गुजरात आदि राज्य आते हैं।
  • भारत का औसत रॉ शहद उत्पादन 15.32 किलोग्राम प्रतिवर्ष प्रति कॉलोनी या बॉक्स है। जबकि, पंजाब का 35 किलोग्राम है।
  • पुरी दुनिया में औसत उत्पादकता में पंजाब सबसे उपर है, दुनिया का औसत उत्पादन 28 किलोग्राम है।

 

ये है सब्जियों और फलों के ऊपर स्प्रे करने का सबसे बढ़िया यंत्र

जैसे नाम से ही पता चलता है कि मैन्गो मास्टर एक ब्लास्ट स्प्रेयर है जो सब्जियों और फलों के ऊपर स्प्रे करने के लिए इस्तेमाल होता है । इस स्प्रेयर से आप आम, संतरा ,किन्नू और दूसरे जो ऊंचे फलों वाले पेड हैं उनके ऊपर स्प्रे कर सकते हैं ।

मैन्गो मास्टर की खासियत ये है कि ये एक साथ सभी जगह पर एक जैसी स्प्रे करता है । मैन्गो मास्टर को चलने के लिए आप 35 HP से लेकर 55 HP ट्रैक्टर का इस्तेमाल कर सकते हैं । इसकी टंकी की क्षमता 1500 लीटर होती है और यह 60 से 70 फ़ीट ऊँचे पेड़ पर भी स्प्रे कर सकता है ।

मैन्गो मास्टर बड़े बगीचे के लिए ज्यादा कामयाब है , यदि बाग़ बहुत छोटा हो, , तो यह वहां पर इतना कामयाब नहीं है । यह मशीन सभी तरह की बग समस्या निवारण में सक्षम है । इसके प्रयोग से Mites, Wasps जैसे सभी तरह की बग समस्या से निजात पाया जा सकता है ।

इसके Foging से,पौधे के आस पास कोहरे का कवर तैयार हो जाता है. जिससे कीड़ा का खात्मा हो जाता है । इसे सब्जी के बगीचा में पौधे को पोषक तत्व के छिड़काव एवं लॉन में उर्वरक की फाेगींग के लिए कर सकते हैं ।

और जानकारी के लिए वीडियो भी देखें

अगर आप इसे खरीदना चाहते है जा और जानकारी के लिए निचे दिए हुए पते पर संपर्क करें

CALL AT +91 22 6700 0557
EMAIL AT INFO@MITRAWEB.IN

Nashik Address

11, Bhandari Plaza,Mumbai-Agra Highway
Pimpalgaon Baswant ,Tal. Niphad, Dist. Nashik
Maharashtra – 422209

Baramati Address

Indapur Baramati road,Near Mahalaxmi macchi khanawal,
Motibag- Baramati.Tal – Baramati, Dist- Pune
Maharashtra – 413102

सरसों के साग को विदेशों में बेच कर लाखों रुपया कमा रहा है पंजाब का यह किसान

अमृतसर के पास वेरका गांव को फतेहपुर शुकराचक से जोड़ने वाली लिंक रोड पर चलते हुए तकरीबन आधे एकड़ में फैले फ़ूड प्रोसेसिंग की एक इकाई गोल्डन ग्रेन इंक को शायद ही कोई नोटिस कर पाता है लेकिन इसने सरसों की पत्तियों से बनने वाली पंजाब की सुप्रसिद्ध व्यंजन – सरसों दा साग की धमक से पंजाब के बाहर ही नहीं बल्कि भारत के बाहर भी हलचल मचा दी है।

इस गोल्डन ग्रेन इंक यूनिट के लिए कच्ची सामग्री की कोई कमी नहीं है। इसकी खरीद आमतौर पर यहां के इच्छुक किसानों से बाजार की खुदरा कीमतों से भी ज्यादा दर पर की जाती है। हालांकि इसे तैयार करने का कार्य इतना आसान नहीं है जितना कि दिखता है, यही वजह है कि इस यूनिट के मालिक 59 साल के जगमोहन सिंह हर वक्त व्यस्त नजर आते हैं। वह ब्रिटेन के बर्मिंघम विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग और अनाज पिसाई में डिग्री हासिल करने के बाद 1986 में जगमोहन अपने गृह नगर अमृतसर लौटे।

वो मोबाइल फोन पर लगातार किसानों से बात करते रहते हैं जो ज्यादातर गुरदासपुर जिले के आसपास के रहनेवाले हैं। ये किसान उन्हें सरसों के तोड़े जाने की जानकारी देते हैं। इसके बाद उनकी यूनिट में सरसों की पत्तियों की साग तैयार कर, कैन में बंद कर दुबई, इंग्लैंड और यहां तक कि कनाडा और अमेरिका जैसे देशों में भेजा जाता है।

वो अपना कारोबार संपर्क के जरिए करते हैं। वो बताते हैं, ”सरसों पैदा करनेवाले बटाला इलाके के गावों के करीब 30 किसानों से मेरा मौखिक समझौता है। सभी छोटे और सीमांत किसान हैं और उनके पास पांच एकड़ से भी कम जमीन है।”

हिसार किस्म की औसत ऊपज 80 क्विंटल प्रति एकड़ है, जबकि स्थानीय पंजाबी किस्म महज 50 क्विंटल प्रति एकड़ की ऊपज दे पाती है और वो भी दो बार तुड़ाई के बाद। अमृतसर के बाजार में साग की पत्तियों की कीमत घटती-बढ़ती रहती है।

इसलिए अगर अमृतसर के खुदरा बाजार में इसकी औसत दर 7 रुपये प्रति किलो है तो एक एकड़ से किसान को 56,000 रुपये की तक कमाई हो जाती है। लेकिन अगर गोल्डन ग्रेन के लिए दो रुपये ज्यादा मिल रहा है तो कमाई बढ़कर 72,000 रुपये प्रति एकड़ हो जाती है।

प्राथमिक तौर पर साग के प्रसंस्करण का दो हिस्सा होता है, पहला- अलग करना और दूसरा- उबालना जो कि स्टीम बॉयलर में किया जाता है। एक दिन में दो टन साग तैयार किया जाता है। टिन के जार में पैक रेडी टू ईट यानी तैयार साग में किसी प्रिजर्वेटिव या परिरक्षक का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। दूसरे उत्पाद के साथ इन जार को नरैन फूड के ब्रांड नाम(जगमोहन के पिता का नाम नरैन सिंह है) के साथ निर्यात कर दिया जाता है।

मार्ग की कठिनाइयां

उन्हें इस बात का अफसोस है कि अमृतसर से कोई कार्गो या मालवाहक विमान नहीं है और जो यात्री विमान यहां से उड़ान भरते हैं उसमें माल ढुलाई के लिए जगह बहुत सीमित होता है। जगमोहन बताते हैं कि उन्होंने मध्य पूर्व के बाजार का अध्ययन किया है और ये पाया कि “अमृतसर से ताजी तोड़ी गई हरी सब्जियों और फल के निर्यात की बड़ी संभावना है।” ”फ्लाइट से अमृतसर से दुबई का रास्ता महज दो घंटे का है, अगर यहां से प्रतिदिन कार्गो या मालवाहक उड़ान की सेवा मिल जाए तो किसानों, खासकर छोटे और सीमांत किसान की जिंदगी में अच्छा बदलाव आ सकता है।”

ऐसे शुरू करें अपना साबुन बनाने का बिज़नेस

साबुन वह वस्तु है, जो लगभग सभी लोगों द्वारा प्रतिदिन प्रयोग में लाई जाती है. बाज़ार में तरह तरह के साबुन विभिन्न कीमतों पर बेचे जाते हैं. कुछ ब्रांडेड कम्पनियों के साबुन का मूल्य एक आम इस्तेमाल में आने वाले साबुन से बहुत अधिक होता है,

जिनसे इस तरह की कम्पनियों को काफी लाभ प्राप्त होता है. आप भी कम बजट में साबुन की फैक्ट्री स्थापित करके काफी लाभ कमा सकते हैं. इसके पहले हम आपको हैण्ड वाश सोप का व्यापार कैसे शुरू करें  के व्यापार को शुरू करने की सभी प्रक्रियायों का वर्णन दे चुकेहै.

नहाने का साबुन बनाने के व्यापार की शुरुआत कैसे करें

नहाने का साबुन बनाने के लिए आवश्यक कच्चे माल की जानकारी नीचे दी जा रही है.
सोप नूडल्स : सोप नूडल्स पाम आयल अथवा कोकोनट आयल का बना होता है.
स्टोन पाउडर : यह भी आवश्यक सामग्री है.
रंग : आवश्यकता के अनुसार.
परफ्यूम : जिस फ्लेवर का साबुन बनाया जा रहा है.

साबुन बनाने के सामान की कीमत (Toilet soap making raw materials price) :

सोप नूडल्स की कीमत रू 75 प्रति किलोग्राम है. पूरे 50 किलोग्राम के रॉ मटेरियल के साथ साबुन बनाने पर कुल लागत रू 3500 पड़ेगी.
कहाँ से खरीदे : इसे आप होलसेल मार्किट से खरीद सकते हैं. यदि सभी कच्चे पदार्थ को घर बैठे पाना हो, तो यहाँ पर विजिट करें.https://dir.indiamart.com
नहाने का साबुन बनाने के लिए मशीनरी (Toiletries soap making machines)

साबुन बनाने की प्रक्रिया में मूलतः तीन तरह की मशीनों से काम लिया जाता है. इन तीन तरह के मशीन हैं :

  • रॉमटेरियल मिक्सिंग मशीन
  • मिलर मशीन
  • सोप प्रिंटिंग मशीन

कहाँ से ख़रीदें : आप इसे किसी होलसेल हार्डवेयर दूकान से ले सकते हैं. इन सभी मशीनरी को ऑनलाइन निम्न दिए गये लिंक से प्राप्त किया जा सकता है.
https://dir.indiamart.com/impcat/soap-making-machinery.html

कीमत : पूरे मशीनरी की सेटअप की कीमत कम से कम 65,000 रूपये से शुरू होती है.
नहाने का साबुन बनाने की प्रक्रिया (Toiletries soap making process)

साबुन बनाने की प्रक्रिया नीचे दी जा रही है

  • सबसे पहले 50 किलोग्राम सोप नूडल्स को मिक्सर में डाल कर लगभग नूडल को टूटने के लिए छोड़ दें.
  • कुछ समय के बाद इसमें स्टोन पाउडर डालें. ये स्टोन पाउडर नूडल्स की मात्रा पर निर्भर करता है. 50 किलोग्राम नूडल्स में लगभग 1½ किलोग्राम स्टोन पाउडर देना होता है.
  • स्टोन पाउडर देने के बाद साबुन में आवश्यकतानुसार रंग और परफ्यूम डालें. उदाहरणस्वरुप यदि आप चन्दन का साबुन बना रहे हैं, तो चन्दन का रंग और परफ्यूम डालें.
  • 50 किलो में लगभग आधा किलो रंग और परफ्यूम डालना होता है.
  • स्टोन पाउडर और सोप नूडल्स अच्छे से मिल जाने पर इस मिश्रण को मिलर मशीन में डालें.
  • इस मशीन में इस मिश्रण को बारीक किया जाता है. आप अपने प्रोडक्ट को अच्छा बनाने के लिए इस मिश्रण को मशीन से 5 से 6 बार बारीक कर सकते हैं. इस दौरान लगभग आधा लीटर पानी का भी इस्तेमाल करें.
  • पंद्रह मिनट के अंदर 50 किलो रॉमटेरियल की सहायता से 100 ग्राम का 500 पीस साबुन बन कर तैयार हो जाता है.
  • इसके बाद इस मिश्रण को अगली मशीन यानि सोप प्रिंटिंग मशीन से गुज़ारने पर साबुन बन कर तैयार हो जाता है.

कुल लागत : इस व्यापार को स्थापित  करने के लिए लगभग 1.5 से 2 लाख रुपए तक लग जाते हैं. इसी तरह आप कम लागत मे टॉयलेट क्लीनर बनाने का व्यापार शुरू कर सकते है.

नहाने के साबुन की पैकेजिंग (Toiletries soap packaging)

साबुन बेचने के लिए पैकेजिंग का ध्यान रखना अतिआवश्यक है. पैकेजिंग के दौरान रॉ मटेरियल से बने साबुन को सोप प्रिंटिंग मशीन के सहारे अपने ब्रांड का नाम दिया जाता है. इसके बाद काग़ज़ के बने ब्रांड पैकेज में पैक करना होता है. इसी पैकेज को इसके बाद शहर के विभिन्न दुकानों में बेचा जाता है.

नहाने का साबुन बनाने के व्यापार के लिए लाइसेंस (Toiletries soap making business license)

इस व्यापार के लिए आवश्यक लाइसेंस नगरपालिका के व्यापार विभाग से प्राप्त होता है. लाइसेंस प्राप्त हो जाने से कंपनी की आईटी रिटर्न वगैरह में बहुत सहायता मिलती है. लम्बे समय तक व्यापार के लिए या बड़े व्यापार के लिए लाइसेंस का होना ज़रूरी है.

नहाने का साबुन बनाने के व्यापार की मार्केटिंग (Toiletries soap making business marketing)

थोक मे बेचने के लिए शहर के बड़े किराना स्टोर्स से बात करना ज़रूरी होता है. इन दुकानों में साबुन की काफी खपत होती है, क्योंकि इन्ही दुकानों से छोटी छोटी दुकान वाले साबुन खरीदते हैं. आकर्षक पैकेज और लिमिटेड पीरियड ऑफर की सहायता से मार्किट पकड़ने में सहायता मिल सकती है.

सिर्फ 2200 रू की लगत मैं साइकिल को ही बना डाला स्प्रे मशीन, 45 मिनट में ही 1 एकड़ में स्प्रे

जरूरत अविष्कार की जननी है, ये बात सभी मानते हैं। गुजरात में भी एक किसान की जरूरत ने एक नई सस्ती, टिकाऊ और तेजी से काम करने वाली मशीन को जन्म दिया है, जिसका फायदा अब किसानों को खूब हो रहा है।

40 साल के मनसुखभाई जगानी छोटे किसान हैं और गुजरात के अमरेली जिले के रहने वाले हैं। मनसुखभाई प्राथमिक स्तर से आगे नहीं पढ़े हैं। जबरदस्त आर्थिक तंगी के दिनों में मनसुखभाई ने मजदूर के तौर पर भी काम किया है।

22 साल पहले उन्होंने गांव वापस लौटकर मरम्मत और निर्माण का छोटा सा काम शुरु किया और खेती के काम आने वाले औजार बनाने लगे।इस काम में हुनर हासिल करने के बाद अब मनसुखभाई ने फसलों पर स्प्रे करने वाली एक आसान और बेहद सस्ती मशीन बना डाली।इससे ना केवल काम बहुत तेजी से होता है बल्कि लागत भी कई गुना बच जाती है।

मनसुखभाई ने साईकिल में भई स्प्रे मशीन को कुछ इस तरह जोड़ दिया जिससे स्प्रे करने वाले व्यक्ति के शरीर कोई थकावट नहीं होती। साथ ही स्प्रे के दौरान निकलने वाले रासायनिक पदार्थ से शरीर को भी नुकसान का खतरा काफी कम हो जाता है।

मनसुखभाई ने साइकिल के सेंट्रल स्प्रोकेट को पिछले पहिये और पिछले पहिये को सेंट्रल स्प्रोकेट से बदल दिया।उन्होंने पैडल्स को सेंट्रल स्प्रोकेट से हटा दिया। पैडल्स की जगह उन्होंने दोनों तरफ से पिस्टन रॉड लगा दिए। दोनों तरफ से ये पिस्टन रॉड पीतल के कीलेंडर से जुड़े हुए हैं।

30 लीटर का PVC स्टोरेज का एक टैंक उन्होंने साइकिल के कैरियर पर रख दिया, जो कि कीलेंडर पंप से जुड़ा हुआ था। बैलेंस बनाने के लिए उन्होंने साइकिल के कैरियर के दोनों तरफ 4 फुट लंबा छिड़काव करने वाला एक नोज़ल भी लगा दिया।

8 दिनों की मेहनत के बाद मनसुखभाई जबरदस्त ढंग से काम करने वाली स्प्रे मशीन बनाने में सफल हो गए। साईकिल स्प्रे मशीन से 1 एकड़ खेत में छिड़काव करने में 45 मिनट का वक्त लगता है। इसकी लागत 2200 रूपए हैं। इसमें साईकिल की कीमत नहीं जोड़ी गई है।

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ये है खेतीबाड़ी कचरे और गोबर से खाद बनाने वाली मशीन

रैपिड कॉम्पोस्ट एरिएटर (खाद बनाने वाली मशीन) ट्रैक्टर में लगाई जा सकने वाली वो मशीन है, जो कचरे को खाद बनाने का काम करती है। गुरमेल सिंह धोंसी ने 2008 में किसानो की मज़बूरी देख कर यह मशीन त्यार की ,इस से पहले जब कोई किसान कम्पोस्ट खाद बनाता था तो उसे ज्यादा लेबर की जरूरत होती थी

इस लिए किसान को एक किल्लो के मगर 5-6 रुपये तक का खर्चा आता था ।जिस कारण कम्पोस्ट खाद बनाना काफी महंगा और मेहनत भरा काम था । इस मशीन को बनाने से पहले सिर्फ गोबर के इस्तमाल से ही कम्पोस्ट खाद त्यार करते थे । लेकिन अब खेतीबाड़ी कचरे से भी खाद त्यार की जा सकती है ।

इस से पहले जिस बायोमास को कुदरती तरीके से खाद बनने में 90 से 120 दिन लगते हैं, वो काम ये मशीन 25 से 35 दिनों में कर देती है। इस मशीन से एक घंटे में 400 टन तक खाद बनाई जा सकती है। यही वजह है कि गुरमेल सिंह धोंसी को राष्ट्रपति ने सम्मानित किया है।

गुरमेल सिंह धोंसी ने ऑर्गेनिक खाद बनाने वाली इस भारी-भरकम मशीन का ईजाद किया तो उन्हें इस बात की पूरी उम्मीद थी कि धीरे-धीरे ही सही, लोगों को इस मशीन की अहमियत समझ में आने लगेगी। और क्यों न हो? एक ऐसी मशीन जो खेत के कचरे को बेहद कम लागत में खाद में तब्दील कर दे, वो किस किसान के काम नहीं आएगी?

उन्हें 2012 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सम्मानित किया। किसान गुरमेल सिंह धोंसी खेती में अपने नए आइडियाज से मिसाल कायम की। छोटे-से गांव से आए धोंसी ने अब तक 24 ऐसे उपकरण बना दिए जो किसानों के रोजमर्रा काम में आते हैं। जिनकी डिमांड अब पाकिस्तान से भी आती है।

यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

मशीन को खरीदने जा और कोई जानकारी के लिए इस पते पर संपर्क करें

Address (Factory) : H-56, Industrial Area, Padampur,
Dist- Shriganganagar (Raj.)
Tel. No : 01505-223570 , 222570

सिर्फ 800 रुपये में ऐसे त्यार करें जैविक खाद की फैक्टरी

चार साल पहले, तमिलनाडु के इरोड जिले के गोबिचेत्तिपालयम स्थित मृदा कृषि विज्ञान केंद्र से मिली थोड़ी सी कागजी मदद से किसान जी. आर. सक्थिवेल के ऐसे ही एक प्रयास को भारत की किसान बिरादरी ने सराहा। सक्थिवेल ने गोबर से तरल खाद बनाने में सफलता पाई जिसका फसलों की पैदावार बढ़ाने में सफल इस्तेमाल हो रहा है।

उन्होंने एक कंटेनर या डिब्बा खाद फैक्ट्री का विचार दिया। जिसमे न तो कोई सीमेंट का ढांचा खड़ा करना था, ना ही मजदूरी का खर्च था और ना ही कोई निर्माण का खर्च शामिल था। उन्होंने जिस सामान का इस्तेमाल किया वो एक प्लास्टिक का ड्राम (पीपा) था।इस पूरी व्यवस्था पर महज 800 से 1000 रुपये तक का ही खर्च बैठता है।

ड्राम या पीपा व्यवस्था के दो फायदे हैं। पहला और सबसे स्पष्ट फायदा यह है कि यह आसानी से वहन करने योग्य है। दूसरा और समान रुप से अहम बात ये है कि इसे कहीं भी ले जाया जा सकता है। सीमेंट के अचल ढांचे से अलग, पीपे या ड्राम को किसान की जरूरत के हिसाब से खेत में कहीं भी रखा जा सकता है। इसका रख-रखाव भी बेहद आसान है और इसकी सफाई में भी ज्यादा वक्त नहीं लगता है।

इस प्रक्रिया के परिणास्वरुप पोषक तत्वों से भरपूर खाद तैयार हो जाता है। उन्होंने इस खाद को पतला बनाया और ड्रिप लाइन का इस्तेमाल करते हुए गन्ने के खेत में इससे सीधे सिंचाई की। इस तरह से गोबर के अवशेष भी बर्बाद नहीं होते हैं।

खाद बनाने का तरीका

बैरल यानी पीपा में सामने लगाने के लिए दो 3/4 ईंच का गेट वॉल्व चाहिए और पीछे लगाने के लिए एक 1 ईंच का गेट वॉल्व चाहिए। पीछे का गेट वॉल्व बड़ा चाहिए जहां से गोबर के निकलने का रास्ता होगा। इस पीपे में गोबर और मूत्र डालते हैं और उसमे चीनी मिलाते हैं, हालांकि आप चीनी की जगह पपीता भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

इस पीपे में स्थानीय प्रजाति के गाय या दूसरे पशुओं के गोबर का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए क्योंकि दूसरों के मुकाबले इसमे ज्यादा माइक्रोबियल क्रिया होती है। इसके लिए हमें एक किलो गोबर, 5 लीटर मूत्र और चीनी चाहिए। चीनी की जगह गन्ने के अवशेष का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। सभी को अलग-अलग मिलाएं और पीपे में रख दें और पानी से भर दें।

इसे 24 घंटे के लिए छोड़ दें। इससे ठोस अपशिष्ट पदार्थ नीचे बैठ जाता है। एक गेट वॉल्व तलहटी से एक फीट ऊपर होता है, दूसरा सवा एक फीट ऊपर होता है। जब आप सबसे ऊपर का वॉल्व खोलेंगे तो आपको यहां साफ तरल पदार्थ मिलेगा जो आपका तरल खाद है। अब यहां एक अहम सवाल यह उठता है कि हम कैसे और कितनी बार इस इस खाद का इस्तेमाल कर सकते हैं ?

इसका जवाब है कि आप इसका इस्तेमाल प्रति सप्ताह एक बार कर सकते हैं। इसके इस्तेमाल से धीरे-धीरे आपके खेत की मिट्टी की गुणवत्ता में धीरे-धीरे सुधार होने लगेगा। अगर संभव हो तो आपका इसका प्रतिदिन करें। इसका कोई नुकसान नहीं होता है। साथ ही मात्रा को लेकर भी कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि यह जैविक है इसलिए ज्यादा इस्तेमाल से कोई नुकसान नहीं होता है।

यह तरल खाद मिट्टी को सूक्ष्म पोषक तत्वों से भर देता है। इससे पैदावार बढ़ती है जिसका सीधा फायदा किसानों को होता है। इस खाद से पानी की खपत भी कम होती है। पीपे को ढंक कर रखें ताकि कोई कीट इसके भीतर अंडा न दे सकें। पहले गेट के उपर 25 लीटर की क्षमता होती है। पहले और दूसरे वॉल्व के बीच की क्षमता 150 लीटर होती है।

बेकार पत्थर-सी ये चीज आपको बना सकती है करोड़पति , दिखे तो तुरंत उठा लें

दुनिया में ऐसी कई चीजें हैं, जिन्हें बेशकीमती कहा जा सकता है। इनमें से कुछ चीजें जैसे- हीरा और पन्ना तो लोगों के बीच मशहूर है, लेकिन कुछ ऐसी चीजें भी हैं, जिसकी कीमत का अंदाजा पहली नजर में ज्यादा लोग नहीं लगा पाते। आज हम आपको बताने जा रहे हैं ऐसी ही एक चीज के बारे में। अगर समुद्र किनारे घूमते हुए आपकी नजर पत्थर जैसी दिखने वाली इस चीज पर पड़े, तो बिना देर किए इसे उठा लें। आपको बना सकती है करोड़पति

पत्थर जैसी दिखने वाली ये चीज कुछ और नहीं, बल्कि व्हेल मछली की उल्टी है। जी हां, अब आप सोच रहे होंगे कि व्हेल की उल्टी से कोई करोड़पति कैसे बन सकता है? तो आपको बता दें कि ये काफी कीमती होते हैं। व्हेल की उल्टी को एम्बरग्रिस कहते हैं।

वैक्स जैसे स्ट्रक्चर वाली ये चीज समुद्र किनारे जमकर कठोर हो जाती है। तब इसका लुक पत्थर की तरह हो जाता। कई लोग जानकारी के अभाव में इस बेशकीमती चीज को बेकार पत्थर समझ इग्नोर कर देते हैं। लेकिन जिन्हें इसकी कीमत का अंदाजा है, उन्होंने उल्टी के एक टुकड़े से अपनी किस्मत बदल ली है।

कैसे बनता है ये वैक्स?

दरअसल बहुत कीमती वैक्स होती है, जो स्पर्म व्हेल की आंतों से रिसने वाले पदार्थ से बनती है। एम्बरग्रिस व्हेल के पेट के अंदर बनता है। जब व्हेल इन्हें उगल देती हैं, तो ये कई बार समुद्र किनारे जमी हुई मिलती है। इसका इस्तेमाल परफ्यूम बनाने के लिए किया जाता है।

करोड़ों है इसकी कीमत

इस वैक्स की कीमत करीब 16 करोड़, 86 लाख रुपए तक बताई जाती है। दुनियाभर में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें मछुआरों के हाथ लगे वैक्स के एक टुकड़े ने उन्हें करोड़पति बना दिया था।

सिर्फ 10 मुर्राह भैंस से बिज़नेस शुरू कर सिविल इंजीनियर ऐसे बना करोड़पति

 

एक सिविल इंजीनियर सात साल में करोड़पति बन गया। मुर्राह भैंस के दूध की बदौलत। सिर्फ दस मुर्राह भैंसों से कारोबार शुरू करने वाले सिविल इंजीनियर बलजीत सिंह रेढु के पास आज एक हजार से ज्यादा भैंसें हैं।आज सालाना 150 करोड़ टर्नओवर की कंपनी के मालिक हैं।

हरियाणा के जींद जिले में जन्मे 51 वर्षीय बलजीत बताते हैं कि उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई तो की किन्तु लक्ष्य एक सफल कारोबारी के रूप में पहचान बनाना था। इसी विचार के साथ उन्होंने मुर्गी पालन के लिए हैचरी बिज़नेस शुरू किया, फिर 2006 मे ब्लैक गोल्ड के नाम से पंजाब और हरियाणा में मशहूर 10 मुर्राह भैसों के साथ डेरी कारोबार की शुरुआत की।

बलजीत अपनी सफलता का सारा श्रेय इन मुर्राह भैसों को देते हैं, उनका मानना है कि लोग विदेशी नस्लों को महत्व देकर अपने ही देश की नस्लों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। आज मुर्राह भैंस की कीमत लाखों में है, स्वयं बलजीत ने दो महीने पहले मुर्राह भैंस की कटड़ी 11 लाख रुपए में बेचा। बलजीत इनके संरक्षण के लिए लगातार प्रयासरत है और इसमें सफल भी हुए है।

जमीन से जुड़े बलजीत का उद्देश्य अपने कारोबार में मुनाफा कमाने के साथ-साथ हरियाणा के अधिक से अधिक युवकों को रोज़गार मुहैया कराना है। इसी सोच के साथ उन्होंने जींद में ही एक मिल्क प्लांट लगाया है जिससे 14 हज़ार दूध उत्पादक उनसे जुड़े हैं।

किसानों को आधुनिक टेस्टिंग उपकरण के साथ उत्तम किस्म का चारा भी उपलब्ध कराया जाता है तथा 40-50 लोगों की टीम हर समय उपलब्ध रहती है जो कि हर तरह की जानकारी व सुविधा दूध उत्पादकों तक पहुँचाते हैं।

पूरे हरियाणा मे उनके 120 मिल्क बूथ हैं और 300 से ज्यादा मिल्क कलेक्शन सेंटर। इनके उत्पाद दूध, दही,पनीर,आइसक्रीम, घी, बटर और स्वीट्स बाजार में लक्ष्य फूड ब्रांड के नाम से जाने जाते हैं।

वर्तमान में कंपनी की उत्पादन क्षमता 1.5 लाख लीटर दूध प्रतिदिन की है। अपनी गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए कंपनी ने टेट्रापैक टेक्नोलॉजी से अपने उत्पादों को लैस किया है।

 

अपने कठिन परिश्रम के बल पर आज बलजीत के पास उनकी क्लाइंट लिस्ट मे बड़े-बड़े नाम शामिल हैं उनमे प्रमुख़ है मदर डेरी, गार्डन डेयरीज, ताज ग्रुप, द एरोमा, गोपाल स्वीट्स, सिंधी स्वीट्स और चण्डीगढ़ ग्रुप ऑफ़ कॉलेजेस।

रेढू ग्रुप के अंतर्गत रेढू हैचरीज प्राइवेट लिमिटेड,रेढू फार्म प्राइवेट लिमिटेड और जे एम मिल्स प्राइवेट लिमिटेड भी आते हैं। अपने दूध उत्पादों के अलावा बलजीत ने मुर्राह भैसों एवं होल्सटीन गायों का ब्रीडिंग केंद्र भी खोला है, जहां पर पैदा हुए उन्नत किस्म के कटड़ों एवं बछड़ो को देश भर में बेचा जाता है।

बलजीत का सपना है जिसमे वह काफी हद तक कामयाब भी हुए है, कि वह मुर्राह भैंसो, डेरी फार्मिंग और हरियाणा को विश्व के मानचित्र पर इस प्रकार अंकित करे कि सम्पूर्ण विश्व में हरियाणा की संस्कृति दूध व दही के नाम से पहचानी जाए। कहते है न जब हौसले बुलंद हो तो सफलता को पंख लगते देर नहीं लगती। इसी कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है बलजीत सिंह रेढू ने।

नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2016-17 तक दूध की मांग 15.5 करोड़ टन पहुंचने की उम्मीद है। ऐसे में नए उद्यमियों के लिए इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं है। आशा करते हैं कि बलजीत सिंह जैसे लोगों से सीख लेकर नई पीढ़ी के युवा इस क्षेत्र में सफलता का परचम लहरायेंगे।

कपास की फसल में सफेद मक्खी से निपटने के लिए क्या करें किसान भाई

किसानों से अपील की है कि वे अपने खेत का लगातार निरीक्षण करते रहें। यदि कपास की फसल में प्रति पत्ता सफेद मक्खी के व्यस्क 4-6 के आसपास या इससे अधिक दिखाई दें तो विभिन्न प्रकार के उपाय करके सफेद मक्खी का नियंत्रण किया जा सकता है।

कपास की फसल में पहला छिडक़ाव नीम आधारित कीटनाशक जैसे निम्बीसीडीन 300 पीपीएम या अचूक 1500 पीपीएम की 1.0 लीटर मात्रा को 150-200 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव करें। इसके अतिरिक्त जिन किसानों ने अपनी कपास की फसल में नीम आधारित कीटनाशकों का प्रयोग कर लिया है तथा फिर भी खेत में सफेद मक्खी एवं हरे तेेले का प्रकोप दिखाई दे रहा है तो वे किसान अब फसल में 80 ग्राम प्रति एकड़ की दर से फ्लोनिकामिड उलाला नामक दवा का छिडक़ाव करके सफेद मक्खी पर नियंत्रण कर सकते हैं।

सफेद मक्खी के बच्चों की संख्या प्रति पत्ता 8 से ज्यादा दिखाई दे तो स्पाइरोमेसिफेन (ओबेरोन) 200 मि.ली. या पायरीप्रोक्सीफेन (लेनो) नामक दवा की 400-500 मि.ली. मात्रा को प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव करें। कपास की फसल में नीचे के पत्तों का चिपचिपा होकर काला होना खेत में सफेद मक्खी के बच्चों की संख्या ज्यादा होने को दर्शाता है।

यदि खेतों में सफेद मक्खी के व्यस्क ज्यादा दिखाई दें तो किसान डाईफेन्थाईयूरान (पोलो) नामक दवा की 200 ग्राम मात्रा को प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव करें। पोलो दवा के प्रयोग से पहले व प्रयोग करने के बाद खेत में नमी की मात्रा भरपूर होना आवश्यक है। अधिक जानकारी के लिए किसान केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, क्षेत्रीय स्टेशन या अपने निकटतम कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क कर सकते हैं।

किसान भाई विभाग या अन्य सरकारी संस्थान द्वारा सिफारिश की गई दवाओं को ही खरीदे और इन दवाओं को खरीदते वक्त विक्रेता से बिल जरूरी लें। कपास की फसल में अपने आप से बदल-बदल कर दवाईयों का छिडक़ाव करना नुकसान देह हो सकता है।

किसान कपास की फसल पर प्रति एकड़ एक लीटर नीम के तेल को 200 लीटर पानी में मिलाकर इसका छिडक़ाव करे तो सफेद मक्खी के प्रकोप को समाप्त किया जा सकता है। इसके अलावा, दो किलोग्राम यूरिया में आधा किलोग्राम जिंक (21 प्रतिशत) के साथ इसे 200 लीटर पानी में मिलाकर भी इस बीमारी से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है

सफेद मक्खी छोटा सा तेज उडऩे वाला पीले शरीर और सफेद पंख का कीड़ा है। छोटा एवं हल्के होने के कारण ये कीट हवा द्वारा एक दूसरे से स्थान तक आसानी से चले जाते हैं। इसके अंडाकार शिशु पतों की निचली सतह पर चिपके रहकर रस चूसते रहते हैं। भूरे रंग के शिशु अवस्था पूरी होने के बाद वहीं पर यह प्यूपा में बदल जाते हैं। ग्रसित पौधे पीले व तैलीय दिखाई देते हैं। जिन काली फंफूदी लग जाती है। यह कीड़े न कवेल रस चूसकर फसल को नुकसान करते हैं।