सिर्फ 10 मुर्राह भैंस से बिज़नेस शुरू कर सिविल इंजीनियर ऐसे बना करोड़पति

 

एक सिविल इंजीनियर सात साल में करोड़पति बन गया। मुर्राह भैंस के दूध की बदौलत। सिर्फ दस मुर्राह भैंसों से कारोबार शुरू करने वाले सिविल इंजीनियर बलजीत सिंह रेढु के पास आज एक हजार से ज्यादा भैंसें हैं।आज सालाना 150 करोड़ टर्नओवर की कंपनी के मालिक हैं।

हरियाणा के जींद जिले में जन्मे 51 वर्षीय बलजीत बताते हैं कि उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई तो की किन्तु लक्ष्य एक सफल कारोबारी के रूप में पहचान बनाना था। इसी विचार के साथ उन्होंने मुर्गी पालन के लिए हैचरी बिज़नेस शुरू किया, फिर 2006 मे ब्लैक गोल्ड के नाम से पंजाब और हरियाणा में मशहूर 10 मुर्राह भैसों के साथ डेरी कारोबार की शुरुआत की।

बलजीत अपनी सफलता का सारा श्रेय इन मुर्राह भैसों को देते हैं, उनका मानना है कि लोग विदेशी नस्लों को महत्व देकर अपने ही देश की नस्लों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। आज मुर्राह भैंस की कीमत लाखों में है, स्वयं बलजीत ने दो महीने पहले मुर्राह भैंस की कटड़ी 11 लाख रुपए में बेचा। बलजीत इनके संरक्षण के लिए लगातार प्रयासरत है और इसमें सफल भी हुए है।

जमीन से जुड़े बलजीत का उद्देश्य अपने कारोबार में मुनाफा कमाने के साथ-साथ हरियाणा के अधिक से अधिक युवकों को रोज़गार मुहैया कराना है। इसी सोच के साथ उन्होंने जींद में ही एक मिल्क प्लांट लगाया है जिससे 14 हज़ार दूध उत्पादक उनसे जुड़े हैं।

किसानों को आधुनिक टेस्टिंग उपकरण के साथ उत्तम किस्म का चारा भी उपलब्ध कराया जाता है तथा 40-50 लोगों की टीम हर समय उपलब्ध रहती है जो कि हर तरह की जानकारी व सुविधा दूध उत्पादकों तक पहुँचाते हैं।

पूरे हरियाणा मे उनके 120 मिल्क बूथ हैं और 300 से ज्यादा मिल्क कलेक्शन सेंटर। इनके उत्पाद दूध, दही,पनीर,आइसक्रीम, घी, बटर और स्वीट्स बाजार में लक्ष्य फूड ब्रांड के नाम से जाने जाते हैं।

वर्तमान में कंपनी की उत्पादन क्षमता 1.5 लाख लीटर दूध प्रतिदिन की है। अपनी गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए कंपनी ने टेट्रापैक टेक्नोलॉजी से अपने उत्पादों को लैस किया है।

 

अपने कठिन परिश्रम के बल पर आज बलजीत के पास उनकी क्लाइंट लिस्ट मे बड़े-बड़े नाम शामिल हैं उनमे प्रमुख़ है मदर डेरी, गार्डन डेयरीज, ताज ग्रुप, द एरोमा, गोपाल स्वीट्स, सिंधी स्वीट्स और चण्डीगढ़ ग्रुप ऑफ़ कॉलेजेस।

रेढू ग्रुप के अंतर्गत रेढू हैचरीज प्राइवेट लिमिटेड,रेढू फार्म प्राइवेट लिमिटेड और जे एम मिल्स प्राइवेट लिमिटेड भी आते हैं। अपने दूध उत्पादों के अलावा बलजीत ने मुर्राह भैसों एवं होल्सटीन गायों का ब्रीडिंग केंद्र भी खोला है, जहां पर पैदा हुए उन्नत किस्म के कटड़ों एवं बछड़ो को देश भर में बेचा जाता है।

बलजीत का सपना है जिसमे वह काफी हद तक कामयाब भी हुए है, कि वह मुर्राह भैंसो, डेरी फार्मिंग और हरियाणा को विश्व के मानचित्र पर इस प्रकार अंकित करे कि सम्पूर्ण विश्व में हरियाणा की संस्कृति दूध व दही के नाम से पहचानी जाए। कहते है न जब हौसले बुलंद हो तो सफलता को पंख लगते देर नहीं लगती। इसी कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है बलजीत सिंह रेढू ने।

नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2016-17 तक दूध की मांग 15.5 करोड़ टन पहुंचने की उम्मीद है। ऐसे में नए उद्यमियों के लिए इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं है। आशा करते हैं कि बलजीत सिंह जैसे लोगों से सीख लेकर नई पीढ़ी के युवा इस क्षेत्र में सफलता का परचम लहरायेंगे।

कपास की फसल में सफेद मक्खी से निपटने के लिए क्या करें किसान भाई

किसानों से अपील की है कि वे अपने खेत का लगातार निरीक्षण करते रहें। यदि कपास की फसल में प्रति पत्ता सफेद मक्खी के व्यस्क 4-6 के आसपास या इससे अधिक दिखाई दें तो विभिन्न प्रकार के उपाय करके सफेद मक्खी का नियंत्रण किया जा सकता है।

कपास की फसल में पहला छिडक़ाव नीम आधारित कीटनाशक जैसे निम्बीसीडीन 300 पीपीएम या अचूक 1500 पीपीएम की 1.0 लीटर मात्रा को 150-200 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव करें। इसके अतिरिक्त जिन किसानों ने अपनी कपास की फसल में नीम आधारित कीटनाशकों का प्रयोग कर लिया है तथा फिर भी खेत में सफेद मक्खी एवं हरे तेेले का प्रकोप दिखाई दे रहा है तो वे किसान अब फसल में 80 ग्राम प्रति एकड़ की दर से फ्लोनिकामिड उलाला नामक दवा का छिडक़ाव करके सफेद मक्खी पर नियंत्रण कर सकते हैं।

सफेद मक्खी के बच्चों की संख्या प्रति पत्ता 8 से ज्यादा दिखाई दे तो स्पाइरोमेसिफेन (ओबेरोन) 200 मि.ली. या पायरीप्रोक्सीफेन (लेनो) नामक दवा की 400-500 मि.ली. मात्रा को प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव करें। कपास की फसल में नीचे के पत्तों का चिपचिपा होकर काला होना खेत में सफेद मक्खी के बच्चों की संख्या ज्यादा होने को दर्शाता है।

यदि खेतों में सफेद मक्खी के व्यस्क ज्यादा दिखाई दें तो किसान डाईफेन्थाईयूरान (पोलो) नामक दवा की 200 ग्राम मात्रा को प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव करें। पोलो दवा के प्रयोग से पहले व प्रयोग करने के बाद खेत में नमी की मात्रा भरपूर होना आवश्यक है। अधिक जानकारी के लिए किसान केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, क्षेत्रीय स्टेशन या अपने निकटतम कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क कर सकते हैं।

किसान भाई विभाग या अन्य सरकारी संस्थान द्वारा सिफारिश की गई दवाओं को ही खरीदे और इन दवाओं को खरीदते वक्त विक्रेता से बिल जरूरी लें। कपास की फसल में अपने आप से बदल-बदल कर दवाईयों का छिडक़ाव करना नुकसान देह हो सकता है।

किसान कपास की फसल पर प्रति एकड़ एक लीटर नीम के तेल को 200 लीटर पानी में मिलाकर इसका छिडक़ाव करे तो सफेद मक्खी के प्रकोप को समाप्त किया जा सकता है। इसके अलावा, दो किलोग्राम यूरिया में आधा किलोग्राम जिंक (21 प्रतिशत) के साथ इसे 200 लीटर पानी में मिलाकर भी इस बीमारी से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है

सफेद मक्खी छोटा सा तेज उडऩे वाला पीले शरीर और सफेद पंख का कीड़ा है। छोटा एवं हल्के होने के कारण ये कीट हवा द्वारा एक दूसरे से स्थान तक आसानी से चले जाते हैं। इसके अंडाकार शिशु पतों की निचली सतह पर चिपके रहकर रस चूसते रहते हैं। भूरे रंग के शिशु अवस्था पूरी होने के बाद वहीं पर यह प्यूपा में बदल जाते हैं। ग्रसित पौधे पीले व तैलीय दिखाई देते हैं। जिन काली फंफूदी लग जाती है। यह कीड़े न कवेल रस चूसकर फसल को नुकसान करते हैं।

अक्टूबर में लहसुन की खेती करें किसान

 

खेती को अगर बिजनेस मानकर किया जाए तो यह अधिकतम रिटर्न देने वाला साबित हो सकता है। यही कारण है कि इन दिनों युवाओं का रूझान भी खेती की ओर हो रहा है। बस जरूरत है फसलों के सही चुनाव की।

आज इसी तरह की एक फसल की जानकारी दे रहे हैं जिसकी खेती आपको महज 6 महीने में लाखों की इनकम करा सकती है।किसानों के लिए अक्टूबर का महीना लहसुन की खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। इस मौसम में लहसुन का कंद निर्माण बेहतर होता है।

इसकी खेती के लिए दोमट भूमि अच्छी रहती है।लहसुन जितना आपके खाने को लजीज बनाता है उतनी ही इसकी खेती आपकी जेब को भी मजबूत कर सकती है। इसकी खेती पर महज 50 हजार रुपए खर्च कर आप इससे 8 से 12 लाख रुपए तक कमा सकते हैं। आइए आपको बताते हैं लहसुन की आधुनिक खेती और इससे होने वाले लाभ को….

लहसुन की विभिन्न किस्में

इन दिनों लहसुन की जी-1 और जी-17 प्रजाति प्रमुख हैं। जी-17 का प्रयोग ज्‍यादातर हरियाणा और उत्‍तर प्रदेश के किसान कर रहे हैं। यह दोनों प्रजातियां ही 160 से 180 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं। इसके बाद अप्रैल-मई महीने में इसकी खुदाई होती है। एक हेक्‍टेयर में लगभग 8 से 9 टन पैदावार आसानी से हो जाती है।इसके इलावा प्रमुख किस्मे निचे दी हुई है

टाइप 56-4:लहसुन की इस किस्म का विकास पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की ओर से किया गया है। इसमें लहसुन की गांठे छोटी होती हैं और सफेद होती हैं। प्रत्येक गांठ में 25 से 34 पुत्तियां होती हैं। इस किस्म से किसान को प्रति हेक्टेयर 15 से 20 टन तक उपज मिलती है।

आईसी 49381:इस किस्म का विकास भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की ओर से किया गया है। इस किस्म से लहसुन की फसल 160 से 180 दिनों में तैयार हो जाती है। इस किस्म से किसानों को अधिक उपज मिलती है।

सोलन:लहसुन की इस किस्म का विकास हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय की ओर से किया गया है। इस किस्म में पौधों की पत्तियां काफी चौड़ी व लंबी होती हैं और रंग गहरा होता है। इसमें प्रत्येक गांठ में चार ही पुत्तियां होती हैं और काफी मोटी होती हैं। अन्य किस्मों की तुलना में यह अधिक उपज देने वाली किस्म है।

एग्री फाउंड व्हाईट (41 जी):लहसुन की इस किस्म में भी फसल 150 से 160 दिनों में तैयार हो जाती है। इस किस्म से लहसुन की उपज 130 से 140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। यह किस्म गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि प्रदेशों के लिए अखिल भारतीय समन्वित सब्जी सुधार परियोजना के द्वारा संस्तुति की जा चुकी है।

यमुना (-1 जी) सफेद: लहसुन की यह किस्म संपूर्ण भारत में उगाने के लिए अखिल भारतीय सब्जी सुधार परियोजना के द्वारा संस्तुति की जा चुकी है। इस किस्म में फसल से 150 से 160 दिनों में तैयार हो जाती है और प्रति हेक्टेयर उपज 150 से 175 क्विंटल होती है।

यमुना सफेद 2 (जी 50): यह किस्म मध्य प्रदेश के लिए उत्तम पाई जाती है। इस किस्म में 160 से 170 दिन फसल तैयार हो जाती है और प्रति हेक्टेयर उपज 150 से 155 क्विंटल तक होती है। यह किस्म बैंगनी धब्बा और झुलसा रोग के प्रति सहनशील होती है।

जी 282:इस किस्म में शल्क कंद सफेद और बड़े आकार के होते हैं। इसके साथ ही 140 से 150 दिनों में फसल तैयार हो जाती है। इस किस्म में किसान को 175 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिल जाती है।

आईसी 42891:लहसुन की इस किस्म का विकास भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान, नई दिल्ली की ओर से किया गया है। यह किस्म किसानों को अधिक उपज देती है और फसल 160-180 दिन में तैयार हो जाती है।

मिट्टी और जलवायु

जैसा कि आपको पहले बताया जा चुका है कि लहसुन की खेती के लिए मध्यम ठंडी जलवायु उपयुक्त होती है। इसके साथ ही दोमट मिट्टी, जिसमें जैविक पदार्थों की मात्रा अधिक हो, लहसुन की खेती के लिए सबसे अच्छी है।

खेती की तैयारी

खेत में दो या तीन गहरी जुताई करें। इसके बाद खेत को समतल कर क्यारियां और सिचांई की नालियां बना लें। बता दें कि लहसुन की अधिक उपज के लिए डेढ़ से दो क्विंटल स्वस्थ कलियां प्रति एकड़ लगती हैं।

ऐसे करें बुवाई और सिंचाई

अधिक उपज के लिए किसानों को बुवाई के लिए डबलिंग विधि का उपयोग करना चाहिए। क्यारी में कतारों की दूरी 15 सेंटीमीटर तक होनी चाहिए। वहीं, दो पौधों के बीच की दूरी 7.5 सेंटीमीटर होनी चाहिए। वहीं किसानों को बोने की गहराई 5 सेंटीमीटर तक रखनी चाहिए। जबकि सिंचाई के लिए लहसुन की गांठों के अच्छे विकास के लिए 10 से 15 दिनों का अंतर होना चाहिए।

कितना आता है खर्च

एक हेक्‍टेयर में लगता है 12 हजार रुपए का बीज लहसुन की खेती के लिए नवंबर महीना मुफीद रहता है। इसकी खेती भारत के लगभग हर हिस्‍से में की जाती है.लेकिन, इसके लिए उत्‍तर प्रदेश, उत्‍तराखंड, हरियाणा, पंजाब और मध्‍य प्रदेश का मौसम बहुत ही उपयुक्‍त माना जाता है। एक एकड़ खेती में लगभग 5 हजार रुपए का बीज (लहसुन की गांठ) लगता है।

जबकि, एक हेक्‍टेयर को अगर मॉडल मानकर चलें तो 12 हजार से 13 हजार रुपए का बीज पर्याप्‍त होता है। छह महीने में खाद, पानी, मजदूरी आदि कुल सब मिलाकर 50 से 60 हजार रुपए खर्च आ जाता है।

7 से 8 लाख रुपए होती है इनकम

लहसुन का प्रयोग ज्‍यादातर मसालों और आयुर्वेदिक दवाओं में होता है। ऐसे में इसकी ज्‍यादा मांग रहती है। वर्तमान में दिल्‍ली आजादपुर मंडी.की ही अगर बात करें तो इसके दाम 120 से 150 रुपए प्रति किलोग्राम तक चल रहे हैं।

इस तरह अगर आप एक हेक्‍टेयर में 8 टन यानि 8000 किलोग्राम लहसुन भी मानकर चलें तो आपको मंडी से 100 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से भी 8 लाख रुपए प्राप्‍त होंगे। इसमें से अगर आप पैदावार, खुदाई और ढुलाई का खर्च एक लाख रुपए भी निकाल लें तो 7 लाख रुपए की बचत होती है। पिछले दिनों लहसुन प्रमुख बाजारों में 450 रुपए प्रति किलोग्राम तक भी बिका है।

प्रोसेस कर बेच सकते हैं

लहसुन इसमें अगर आप इनकम को बढ़ाना चाहते हैं तो इसे प्रोसेस कर भी बेच सकते हैं। शुरुआत में आप महज 10 फीसदी उत्‍पादन को ही प्रोसस कर बेचे तो आपको कुल उत्‍पादन के लाभ का 50 फीसदी तक प्राप्‍त हो सकता है। बिजनौर उत्‍तर प्रदेश के नीरज अहलावत ने पिछले दिनों सिर्फ 1 क्विंटल गार्लिक को प्रोसस (पेस्‍ट और मसाला तैयार करना) 1.5 लाख रुपए में बेचा है।

यह मशीन जो जमीन समतल करने के साथ फालतू मिट्टी भरे सीधा ट्रॉली में

अच्छी खेती के लिए जरूरत होती है उबड़-खाबड़ रहित यानी समतल जमीन की। कुदरती तौर पर समतल जमीन का मिलना लगभग असंभव है, ऐसे में इस तरह की जमीन हासिल करना कृषकों के लिए बेहद कड़ी चुनौती होती है।

इसी चुनौती को आसान बनाने में अहम योगदान दिया है किसान रेशम सिंह और कुलदीप सिंह ने जिन्होंने लैंड लेवलर कम लोडर मशीन यानी जमीन को समतल करने सह लोड करनेवाली मशीन बनाई जो ट्रैक्टर संचालित मशीन है।

लैंड लेवलर कम लोडर मशीन

  • स्क्रैपर ब्लेड की मदद से मिट्टी की कटाई, कनवेयर की मदद से मिट्टी या बालू को जमा कर ट्रैक्टर में रखना
  • कनवेयर की मदद से मिट्टी या बालू को जमा कर ट्रैक्टर में जमा करना
  • यह एक वक्त में 3 ईंच तक गहरी खुदाई कर सकता है
  • यह एक मिनट में 11गुना 6 गुना 2.25 फीट आकार के ट्रेलर को भर सकता है(मिट्टी कम कड़ा होने पर एक मिनट से कम वक्त लगता है)-(मिट्टी कम कड़ा होने पर एक मिनट से कम वक्त लगता है)
  • 50 एचपी या अधिक क्षमता वाले ट्रैक्टर में काम कर सकता ह – इसे भी किसी ट्रैक्टर से जोड़ा जा सकता है
  • एक घंटा में पांच से सात लीटर डीजल की खपत
  • मशीन से 4 फीट की चौड़ाई में खुदाई, साढ़े आठ फीट की ऊंचाई से मिट्टी गिराना
  • नोट- यह दावा किया जाता है कि दोनों मशीन से औसतन एक दिन में एक बीघा (5 एकड़) जमीन को समतल किया जा सकता है।

मशीन की तकनीक-

  • संवाहक पट्टिका (कनवेयर) में एक जोड़ा चेन होता है, यह एक वक्त में चार ईंच गहरी कटाई कर सकता है और 11 गुना, 6 गुना और 2.25 फीट के आकार के ट्रेलर को महज दो मिनट में भर सकता है।
  • इस मशीन का इस्तेमाल करने के दौरान ट्रैक्टर प्रति घंटा पांच से छह लीटर डीजल की खपत करता है।
  • मशीन में 4 ईंच तक की गहराई तक काटने की क्षमता और साढ़े आठ फीट की ऊंचाई से बालू गिराने की क्षमता है।

मशीन से जुड़ी मुख्य बातें-

  • कुछ क्षेत्रों में इस मशीन से बड़ी संभावनाएं हैं जैसे कि कनाल के पानी के लिए मिट्टी की कटाई, साथ ही सड़क और आवास निर्माण।
  • एक अनुमान के मुताबिक यह मशीन एक दिन में एक बीघा (5 से 8 एकड़) जमीन से 150 ट्रेलर बालू हटा कर समतल कर सकता है।
  • इसे किराये पर भी लगाया जा सकता है, इसके लिए दो वर्ग फीट गहरी खुदाई प्रति दो रुपये के हिसाब से दर तय की जा सकती है। जो बालू काट कर निकाला गया है उसे प्रति ट्रेलर 250 से 300 रुपये की दर से बेचा जा सकता है।
  • मशीन की कीमत- 1,50,000 रुपये (एक्स-फैक्ट्री, पैकेजिंग)। कीमत में परिवहन खर्च और कर इत्यादि शामिल नहीं।

यह मशीन कैसे काम करती है इसकी वीडियो देखें

और जानकारी के लिए इन से संपर्क करें

Resham Singh Virdi
Address -Jaideep Agriculture Works, Sangriya Road,
Bus Stand, Satipura, Hanumangarh,Rajsthan
Mobile: 09414535570

Kuldeep Singh
S/o Navrang Singh,Kanluall Chehllan,
Tehsil:Budhlada,Dis:Mansa,Punjab
Mobile: 9417629090, 9501286161

कम पैसे में ऐसे करें अनार की खेती, हर साल होगी लाखों में कमाई

कम समय और पैसों में ज्‍यादा कमाई का सपना हर किसी का होता है। लेकिन देश में किसानों की बात करें तो पहली नजर में ऐसा मुश्किल नजर आता है।

ऐसे में जरूरी यह है कि ऐसी फसल या बिजनेस पर ध्‍यान दिया जाए, जिसमें खर्च कम हो और लंबे समय तक के लिए कमाई सुनिश्चित हो सके। अनार की खेती ऐसा ही काम है।अनार की खेती से लाखों तक की कमाई हो रही है। दिलचस्‍प बात यह है कि इसके लिए ज्‍यादा खर्च भी नहीं करने की जरूरत है।

मार्केट में अनार की है डिमांड

भारतीय मार्केट में अनार की अहमियत और कीमत से हर कोई वाकिफ है। ऊंची कीमत होने के बावजूद बीमारी से लेकर त्‍योहार तक में अनार का इस्‍तेमाल होता है। वहीं जूस मार्केट में करीब अनार का 70 फीसदी तक इस्‍तेमाल हो रहा है।

अनार की खेती को एक एकड़ खेत के मानक से समझा जा सकता है। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) के मुताबिक 1 एकड़ यानी कुल 43,560 वर्ग फुट जमीन पर अनार की खेती में कुल खर्च करीब 1,75,000 रुपए होते हैं। इसमें मजदूरी, खेत तैयारी, खाद आदि शामिल है।

कितना होगा कुल खर्च प्रति एकड़

खेती पर खर्च – 32000 रुपए ,सिंचाई पर खर्च –45000 रुपए, छिड़काव पर खर्च –20000 रुपए इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर –45000 रुपए ,लैंड डेवलेपमेंट –33600 रुपए , कुल – 1,75,000 रुपए

कब और कितने समय तक देगा फल

अनार का पौधा तीन-चार साल में पेड़ बनकर फल देने लगता है और एक पेड़ करीब 25 साल तक फल देता है। एक अनुमान के मुताबिक अगर अच्‍छी खेती की गई है, तो पौधा लगाने के 5वें साल में प्रति टन 4 टन प्रति एकड़ की पैदावार होती है, जबकि 8वें साल में 7 टन प्रति एकड़ तक की पैदावार हो जाती है ।

अनार की उन्नत किस्मे

कंधारी:इसका फल बड़ा और अधिक रसीला होता है,लेकिन बीज थोड़ा सा सख्त होता है। देखने में खूबसूरत होने के कारण इसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में व्यावसायिक तौर पर उगाने के कारण इसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में व्यावसायिक तौर पर उगाने के लिए उपयुक्त माना जाता है।

भगवा: यह निचले क्षेत्रों के लिए अधिक उपयुक्त है और देश में पैदा होने वाले अनार का 90 फीसदी यही किस्म उगाई जा रही है। इसके फल केसरी रंग और साइज में छोटे होते हैं, बीज नर्म होते हैं व खाने में सबसे बढ़िया माने जाते हैं।

गणेश: इसका फल पीला और थोड़ा पिंक होता है बीज नर्म होता है। इसके अलावा जी-137, मृदुला, जेलोर सेलेक्षन व चावला किस्में भी अनार की अच्छी फसल देने वाली हैं।

कैसे मिलता है फ़ायदा

फल की उत्पादकता बढ़ाने के लिए दो पौधों के बीच की दूरी को कम किया जा सकता है। इसके जरिए उत्पादन करीब डेढ़ गुना हो जाता है।

एक सीजन में अनार के पौधे से लगभग 80 किलो फल निकलते हैं। इस हिसाब से यदि आप अपनी फसल को बेचते हैं तो आराम से 8 से 10 लाख रुपए कमा सकते । इस तरह लागत निकलने के बाद भी अच्छी खासी कमाई हो सकती है

कहाँ बेचें फसल

अनार की फसल को आप देश की अलग – अलग फल मंडियों में इसे बेच सकते हैं। इसके अलावा जूस का कारोबार भी कर सकते हैं। जूस के कारोबार के लिए ज्‍यादा खर्च की जरूरत भी नहीं पड़ती है। यह मशीन आपको अच्‍छी क्‍वालिटी में ऑनलाइन 25 से 30 हजार रुपए में मिल जाएगी।

इसके जरिए आप जूस की दुकान भी कर सकते हैं। सेहत के लिहाज से भी यह परफेक्‍ट फसल है। यही नहीं, कई आयुर्वेदिक कंपनियां भी अनार और खरीदती हैं। अनार की खेती और उसके कारोबार से संबंधित जानकारी http://www.pomegranates.org की वेबसाइट सेमिल सकती है।

ऑनलाइन गाय का गोबर भी बिक रहा है 100 रु किल्लो ,आप भी कर सकते है यह बिज़नेस

गोबर से बने उपलों का उपयोग विभिन्न मांगलिक कार्यों में किया जाता है. यही वजह है कि ऑनलाइन बाजार में इसकी खासी मांग बढ़ी है.

गाय के गोबर से लेकर उससे बना उपला, जिसे गोइठा और कंडा भी कहते हैं, ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स पर अपनी जगह बना चुका है. ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स इन कंडों को भी शानदार पैकिंग में होम डिलीवरी कर रही हैं. ईबे, शॉपक्लूज, वेदिक गिफ्ट शॉप, अमेजन आदि कई साइट्स पर कंडे बिक रहे हैं,

जहां ऑर्डर करने पर कुछ ही दिनों में उसकी डिलीवरी हो जायेगी. यही नहीं, ग्राहकों की सहूलियत के लिए कई साइट्स पर इन उपलों के आकार और वजन का भी ब्यौरा मौजूद है़ इन साइट्स पर एक दर्जन उपलों का मूल्य एक सौ रुपये से लेकर तीन सौ रुपये तक है.

दो दर्जन मंगवाने पर इन पर डिस्काउंट भी दिया जा रहा है. त्यौहारी मौसम में इन उपलों पर कई डिस्काउंट ऑफर भी दिये जाते हैं. यहां आपको उपलों की कीमत भले ही थोड़ी ज्यादा लगे, लेकिन इसके आध्यात्मिक इस्तेमाल को देखते हुए यह कीमत कुछ भी नहीं.

धार्मिक कार्यों में गाय के गोबर से स्थान को पवित्र किया जाता है. गाय के गोबर से बने उपले से हवन कुंड की अग्नि जलायी जाती है. आज भी गांवों में महिलाएं सुबह उठ कर गाय के गोबर से घर के मुख्य द्वार को लीपती हैं.

इंटरनेट पर आपको ऐसी कई वेबसाइट्स मिल जायेंगी, जो सिर्फ गौ-उत्पाद आपके द्वार तक पहुंचाने की सुविधा देती हैं. इन्हीं में से एक है ‘गौक्रांति डॉट ओआरजी’ इस साइट पर आपको गाय का गाेबर और उससे बने उपले, साबुन, भगवान की मूर्तियां, ऑर्गैनिक पेंट, हवन के लिए धूप के अलावा परिष्कृत गौमूत्र भी उपलब्ध है. यह कंपनी अपना कच्चा माल गुजरात से लेकर भोपाल तक की लगभग 15 गौशालाओं से मंगवाती है़

गाय के गोबर के उपलों का व्यापार अब वैश्विक आकार ले चुका है और खुदरा विक्रेताओं के पास इसकी डिलीवरी के लिए बड़े पैमाने पर ऑर्डर आ रहे हैं. तेजी से शहरी होती जा रही देश की आबादी के लिए अब यह सब दुर्लभ होता जा रहा है. यही वजह है कि देश और देश के बाहर खास अवसरों पर इन उपलों की मांग बढ़ रही है.

इस लिए आप भी इसका बिज़नेस शुरू कर सकते है . अगर आप गांव में रहते है तो आप को गोबर भी आसानी से मिल जएगा. गोबर को ऑनलाइन बेचने के लिए आप या तो अपनी खुद की वेबसाइट जैसे “गौक्रांति डॉट ओआरजी” बना सकते है . जा फिर जो पॉपुलर वेबसाइट जैसे ईबे, शॉपक्लूज, वेदिक गिफ्ट शॉप, अमेजन आदि है वहां पर सेलर बन कर बेच सकते है .सेलेर बनने के लिए हर वेबसाइट की अलग अलग डिमांड्स है . जिसे आप आसानी से पूरा कर सकते है .

यह बात अलग है कि ये उपले बाजार में या आपके पड़ोस में ग्वाले से मिलने वाले उपलों से महंगी कीमत पर मिलेंगे. अपनी असली कीमत से करीब पांच गुना ज्यादा दाम पर मिलने वाले ऑनलाइन गोबर के कंडे ग्राहकों से ज्यादा ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट के लिए फायदे का सौदा हैं. इनसे आप को काफी मुनाफा हो सकता है.

यह चारा लगायें एक बार लगाने के बाद 5 साल हरा चारा पाएं

पशुपालकों को गर्मियों में हरे चारे की सबसे ज्यादा परेशानी होती है। बरसीम, मक्का, ज्वार जैसी फसलों से तीन-चार महीनों तक ही हरा चारा मिलता है। ऐसे में पशुपालकों को एक बार नेपियर घास लगाने पर चार-पांच साल तक हरा चारा मिल सकता है।

इसमें ज्यादा सिंचाई की जरूरत भी नहीं पड़ती है। गन्ने की तरह दिखने वाली नेपियर घास लगाने के महज 50 दिनों में विकसित होकर अगले चार से पांच साल तक लगातार दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार की जरूरत को पूरा कर सकती है।

पशुपालन विभाग के उप निदेशक वीके सिंह नेपियर घास के बारे में बताते हैं, “प्रोटीन और विटामिन से भरपूर नेपियर घास पशुओं के लिए एक उत्तम आहार की जरूरत को पूरा करती है। दुधारू पशुओं को लगातार यह घास खिलाने से दूध उत्पादन में भी वृद्धि होती है और साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।

हाइब्रिड नेपियर की जड़ को तीन-तीन फीट की दूरी पर रोपित किया जाता है। इससे पहले खेत की जुताई और समतलीकरण करने के बाद घास की रोपायी की जाती है और रोपाई के बाद सिंचाई की जाती है।

घास रोपण के मात्र 50 दिनों बाद यह हरे चारे के रूप में विकसित हो जाती है। एक बार घास के विकसित होने के बाद चार से पांच साल तक इसकी कटाई की जा सकती है और पशुओं के आहार के रूप में प्रयोग की जा सकती है।

नेपियर घास का उत्पादन प्रति एकड़ लगभग 300 से 400 कुंतल होता है। इस घास की खासियत यह होती है कि इसे कहीं भी लगाया जा सकता है। एक बार घास की कटाई करने के बाद उसकी शाखाएं पुनः फैलने लगती हैं और 40 दिन में वह दोबारा पशुओं के खिलाने लायक हो जाती है।

प्रत्येक कटाई के बाद घास की जड़ों के आसपास हल्का यूरिया का छिड़काव करने से इसमें तेजी से बढ़ोतरी भी होती है। वैसे इसके बेहतर उत्पादन के लिए गोबर की खाद का छिड़काव भी किया जाना चाहिए।

ऐसे शुरू करें आइसक्रीम कोन बिजनेस, हर साल 11 लाख हो सकती है इनकम

आइसक्रीम कोन की मार्केट में बहुत डिमांड है। इसकी वजह यह है कि ज्‍यादातर लोग कोन में आइसक्रीम खाना बहुत पसंद करते हैं। ऐसा मेट्रो सिटीज ही नहीं, बल्कि रूरल एरिया में भी होता है। यही वजह है कि कोन बनाने का बिजनेस भी खूब फलफूल रहा है।

यूनियन मिनिस्‍ट्री ऑफ एमएसएमई के डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट (एमएसएमईडीआई) द्वारा इस बिजनेस में संभावनाओं को लेकर एक स्‍टडी की गई और पाया गया कि इस बिजनेस में काफी संभावना है। गर्मियों के सीजन में तो कोन की डिमांड होती है, लेकिन अब तो पूरे साल भर आइसक्रीम की सेल्‍स होने के कारण कोन की डिमांड भी बनी रहती है।

इसी स्‍टडी के दौरान एमएसएमईडीआई ने आइसक्रीम कोन बनाने वाली यूनिट की प्रोजेक्‍ट प्रोफाइल रिपोर्ट तैयार की। आइए जानते हैं कि अगर आप आइसक्रीम कोन बनाने की यूनिट लगाना चाहते हैं तो आपको क्‍या करना होगा।

कितने इन्‍वेस्‍टमेंट की होगी जरूरत

एमएसएमई डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट की स्‍टडी के मुता‍बिक, अगर आप बड़े स्‍तर पर आइसक्रीम कोन बनाने की यूनिट लगाना चाहते हैं तो भी आपको ज्‍यादा इन्‍वेस्‍टमेंट की जरूरत नहीं पड़ेगी। आपको लगभग 200 वर्ग मीटर का ऐसा स्‍पेस ढूंढ़ना होगा, जो लगभग 100 वर्ग मीटर कवर्ड हो।

आप इसे किराये पर भी ले सकते हैं । इसके बाद आपको ऑटोमेटिक आइसक्रीम कोन मैन्‍युफैक्‍चरिंग मशीन, जिसमें सिफ्टर, डॉफ निडर, कोन मैकिंग मशीन आटोमेटिक, वैइंग स्‍केल, जिसकी कीमत लगभग 6.50 लाख रुपए है लेनी होगी। इसके अलावा लैब इक्विपमेंट, फर्नीचर आदि पर लगभग 1 लाख रुपए खर्च करने होंगे।

कितनी वर्किंग कैपिटल की होगी जरूरत

रिपोर्ट के मुताबिक, आपको प्रोडक्‍शन शुरू करने के लिए लगभग 2 लाख 57 हजार रुपए का रॉ-मटेरियल की जरूरत होगी,जिसमें गेहूं का आटा, मक्‍के ( कॉर्न) का आटा, चीनी, साल्‍ट, फैट, बैकिंग पाउडर, कलर्स एंड फ्लेवर आदि शामिल हैं।

यूनिट को चलाने और सेल्‍स के लिए 5 लोगों की जरूरत पड़ेगी, जिन्‍हें 60 से 70 हजार रुपए तक देने पड़ सकते हैं। इसके अलावा किराया, स्‍टेशनरी, पैकिंग, ट्रासंपोर्टेशन आदि पर 50 हजार रुपए आदि का खर्च होगा।

यानी कि एक माह का वर्किंग कैपेटिल एक माह का 3 लाख 70 हजार और दो माह का वर्किंग कैपिटल 7.40 लाख रुपए तक पहुंच जाएगी।

कितनी होगी कमाई

एमएसएमई डीआई की स्‍टडी रिपोर्ट के मुतातिक लगभग 15 लाख रुपए के इन्‍वेस्‍टमेंट से शुरू होने वाले आइसक्रीम कोन यूनिट में आठ घंटे में लगभग 48 हजार कोन तैयार की जा सकती हैं। यदि साल में 300 दिन काम होता है तो लगभग 1 करोड़ 44 लाख पैकेट्स तैयार किए जा सकते हैं।

जिनकी वेल्‍यू 40 रुपए प्रति पैकेट के हिसाब से लगभग 57 लाख 60 हजार रुपए की होगी। जबकि आपका साल भर का खर्च लगभग 46 लाख रुपए आएगा। इस तरह आपको साल भर में 11 लाख 40 हजार रुपए की इनकम होगी। इस खर्च में 14 फीसदी ब्‍याज भी शामिल है, यदि आप किसी बैंक से लोन लेते हैं।

12 लाख तक ले सकते हैं लोन

अगर यह यूनिट लगाना चाहते हैं और आप के पास पूरा पैसा नहीं हैं तो आप किसी भी बैंक से लोन ले सकते हैं।बैंक आपको 80 फीसदी तक लोन दे सकता है। इसके लिए आपको कोई खास काम भी नहीं करना होगा। आप एमएसएमई डीआई की स्‍टडी रिपोर्ट के मुताबिक अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार कर सकते हैं।

आप की फसल में है किस पोषक तत्व की कमी, ऐसे पहचान करें

अधिक उत्पादन के लिए पोषक तत्वों की कमी को पहचान कर उन्हें सही करना प्रत्येक किसान का कर्तव्य होता है। किसान फसल के पौधों को देखकर कैसे पहचान सकते हैं कि फसल में किस पोषक तत्व की कमी है, जिससे किसान समय पर उसका उपचार कर सकें।

बोरान

बोरान की कमी से पौधे के सबसे ऊपर की पत्तियां पीली हो जाती हैं। कलियां सफेद या हल्के भूरे मृत ऊतक की तरह दिखाई देती हैं।

गंधक

गंधक की कमी से पत्तियां, शिराओं सहित गहरे हरे से पीले रंग में बदल जाती हैं तथा बाद में सफेद हो जाती हैं। इसकी कमी से सबसे पहले नई पत्तियां प्रभावित होती हैं।

मैगनीज

इसकी कमी से पत्तियों का रंग पीला-धूसर या लाल-धूसर हो जाता है तथा शिराएं हरी होती हैं। पत्तियों का किनारा और शिराओं का मध्य भाग पीला हो जाता है। पीली पत्तियां अपने सामान्य आकार में रहती हैं।

जस्ता

जस्ता की कमी से सामान्य तौर पर पत्तियों के शिराओं के मध्य पीले पन के लक्षण दिखाई देते हैं और पत्तियों का रंग कॉसा की तरह हो जाता है।

मैग्नीशियम

इसकी कमी से पत्तियों के आगे का हिस्सा गहरा हरा होकर शिराओं का मध्यभाग सुनहरा पीला हो जाता है और फिर किनारे से अन्दर की ओर लाल-बैंगनी रंग के धब्बे बन जाते हैं।

फास्फोरस

फास्फोरस की कमी से पौधों की पत्तियां छोटी रह जाती हैं और पौधों का रंग गुलाबी होकर गहरा हरा हो जाता है।

कैल्शियम

कैल्शियम की कमी से पौधे के सबसे ऊपर की पत्तियां प्रभावित होती हैं तथा देर से निकलती हैं। ऊपर की कलियां खराब हो जाती हैं। मक्के की नोचे चिपक जाती हैं।

लोहा

नई पत्तियों में तने के ऊपरी भाग पर सबसे पहले पिलेपन के लक्षण दिखाई देते हैं। शिराओं को छोड़कर पत्तियों का रंग एक साथ पीला हो जाता हैं। ये कमी होने पर भूरे रंग का धब्बा या मृत उतक के लक्षण प्रकट होते हैं।

तांबा

इसकी कमी से नई पत्तियां एक साथ गहरी पीले रंग की हो जती हैं तथा सूख कर गिरने लगती हैं। खाद्यान वाली फसलों में गुच्छों में वृद्धि होती है तथा शीर्ष में दाने नहीं होते हैं।

मालिब्डेनम

इसकी कमी से नई पत्तियां सूख जाती हैं, हल्के हरे रंग की हो जीती हैं, मध्य शिराओं को छोड़ कर पूरी पत्तियों पर सूखे धब्बे दिखाई देते हैं। नाईट्रोजन के उचिट ढंग से उपयोग न होने के कारण पुरानी पत्तियां पीली होने लगती हैं।

पोटैशियम

पोटैशियम की कमी से पुरानी पत्तियों का रंग पीला/भूरा हो जाता है और बाहरी किनारे कट-फट जाते हैं। मौटे आनाज जैसे – मक्का और ज्वार में ये लक्षण पत्तियों के आगे के हिस्से से शुरू होते हैं।

नाइट्रोजन

नाइट्रोजन की कमी से पौधे हल्के हरे रंग के या हल्के पीले रंग के होकर बौने रह जाते हैं। पुराई पत्तियां पहले पीली हो जाती हैं। मोटे अनाज वाली फसलों में पत्तियों का पीलापन आगे के हिस्से से शुरू होकर बीच के हिस्से तक फैल जाता है।

 

आप भी एक एकड़ में 1000 कुंतल उगाना चाहते हैं गन्ना तो अपनाएं ये तरीका

भारत के किसान हमेशा से ही अपनी फसल को लेकर चिंतित रहते हैं क्योंकि कभी उनकी फसल बर्बाद हो जाती है तो कभी उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। खासकर गन्ना किसानों को फसल का उचित मूल्य न मिल पाने के कारण ज्यादा तकलीफ में रहते हैं।

महाराष्ट्र के एक किसान सुरेश कबाडे (48 वर्ष) इन्हीं सब तकलीफों से दूर रहते हैं क्योंकि वे अनोखी विधि से एक एकड़ में एक हजार कुंतल गन्ने की पैदावार करते हैं साथ ही उनके उगाए हुए गन्ने की लम्बाई 19 फीट होती है। नौवीं पास सुरेश कबाडे अपने अनुभव और तकनीकी के सहारे खेती से साल में करोड़ों रुपये की कमाई भी करते हैं।

मुंबई से करीब 400 किलोमीटर दूर सांगली जिले की तहसील वाल्वा में कारनबाड़ी के सुरेश कबाडे (48 वर्ष) अपने खेतों में ऐसा करिश्मा कर रहे हैं कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, यूपी तक के किसान उनका अनुसरण करते हैं। उनकी ईजाद तकनीकी का इस्तेमाल करने वालों में पाकिस्तान के भी कई किसान शामिल हैं। (देखिए वीडियो)

निकाल देते हैं गन्ने में निकलने वाला पहला पौधा

सुरेश कबाडे बताते हैं, “गन्ने के टीलस (पहला पौधा) एक एकड़ में 40 हजार से अधिक होने चाहिए। गन्ने के टीलस उगने के बाद हम लोग एक अनोखा तरीका अपनाते हैं। गन्ना खेतों में बोने के बाद उसमें निकलने वाला पहला टीलस हम तोड़कर निकाल देते हैं।”

सुरेश कबाडे आगे बताते हैं, “मदर टीलस निकालने से उसके साइड के टीलस अच्छे हो जाते हैं साथ ही उनकी लम्बाई में काफी वृद्धि होती है। एक एकड़ में एक हजार कुंतल गन्ने की पैदावार का लक्ष्य होता है। हमारे गन्ने की लंबाई 18 से 19 फीट तक होती है। जैविक तरीके से उगाए गए हमारे एक गन्ने में 44 से 54 कांडी (आंख) होती हैं। जिनके बीच की दूरी कम से कम छह इंच और अधिक से अधिक नौ इंच तक होती है।

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NEWS SOURCE – Gaonconnection News