ऐसे शुरू करें आइसक्रीम कोन बिजनेस, हर साल 11 लाख हो सकती है इनकम

आइसक्रीम कोन की मार्केट में बहुत डिमांड है। इसकी वजह यह है कि ज्‍यादातर लोग कोन में आइसक्रीम खाना बहुत पसंद करते हैं। ऐसा मेट्रो सिटीज ही नहीं, बल्कि रूरल एरिया में भी होता है। यही वजह है कि कोन बनाने का बिजनेस भी खूब फलफूल रहा है।

यूनियन मिनिस्‍ट्री ऑफ एमएसएमई के डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट (एमएसएमईडीआई) द्वारा इस बिजनेस में संभावनाओं को लेकर एक स्‍टडी की गई और पाया गया कि इस बिजनेस में काफी संभावना है। गर्मियों के सीजन में तो कोन की डिमांड होती है, लेकिन अब तो पूरे साल भर आइसक्रीम की सेल्‍स होने के कारण कोन की डिमांड भी बनी रहती है।

इसी स्‍टडी के दौरान एमएसएमईडीआई ने आइसक्रीम कोन बनाने वाली यूनिट की प्रोजेक्‍ट प्रोफाइल रिपोर्ट तैयार की। आइए जानते हैं कि अगर आप आइसक्रीम कोन बनाने की यूनिट लगाना चाहते हैं तो आपको क्‍या करना होगा।

कितने इन्‍वेस्‍टमेंट की होगी जरूरत

एमएसएमई डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट की स्‍टडी के मुता‍बिक, अगर आप बड़े स्‍तर पर आइसक्रीम कोन बनाने की यूनिट लगाना चाहते हैं तो भी आपको ज्‍यादा इन्‍वेस्‍टमेंट की जरूरत नहीं पड़ेगी। आपको लगभग 200 वर्ग मीटर का ऐसा स्‍पेस ढूंढ़ना होगा, जो लगभग 100 वर्ग मीटर कवर्ड हो।

आप इसे किराये पर भी ले सकते हैं । इसके बाद आपको ऑटोमेटिक आइसक्रीम कोन मैन्‍युफैक्‍चरिंग मशीन, जिसमें सिफ्टर, डॉफ निडर, कोन मैकिंग मशीन आटोमेटिक, वैइंग स्‍केल, जिसकी कीमत लगभग 6.50 लाख रुपए है लेनी होगी। इसके अलावा लैब इक्विपमेंट, फर्नीचर आदि पर लगभग 1 लाख रुपए खर्च करने होंगे।

कितनी वर्किंग कैपिटल की होगी जरूरत

रिपोर्ट के मुताबिक, आपको प्रोडक्‍शन शुरू करने के लिए लगभग 2 लाख 57 हजार रुपए का रॉ-मटेरियल की जरूरत होगी,जिसमें गेहूं का आटा, मक्‍के ( कॉर्न) का आटा, चीनी, साल्‍ट, फैट, बैकिंग पाउडर, कलर्स एंड फ्लेवर आदि शामिल हैं।

यूनिट को चलाने और सेल्‍स के लिए 5 लोगों की जरूरत पड़ेगी, जिन्‍हें 60 से 70 हजार रुपए तक देने पड़ सकते हैं। इसके अलावा किराया, स्‍टेशनरी, पैकिंग, ट्रासंपोर्टेशन आदि पर 50 हजार रुपए आदि का खर्च होगा।

यानी कि एक माह का वर्किंग कैपेटिल एक माह का 3 लाख 70 हजार और दो माह का वर्किंग कैपिटल 7.40 लाख रुपए तक पहुंच जाएगी।

कितनी होगी कमाई

एमएसएमई डीआई की स्‍टडी रिपोर्ट के मुतातिक लगभग 15 लाख रुपए के इन्‍वेस्‍टमेंट से शुरू होने वाले आइसक्रीम कोन यूनिट में आठ घंटे में लगभग 48 हजार कोन तैयार की जा सकती हैं। यदि साल में 300 दिन काम होता है तो लगभग 1 करोड़ 44 लाख पैकेट्स तैयार किए जा सकते हैं।

जिनकी वेल्‍यू 40 रुपए प्रति पैकेट के हिसाब से लगभग 57 लाख 60 हजार रुपए की होगी। जबकि आपका साल भर का खर्च लगभग 46 लाख रुपए आएगा। इस तरह आपको साल भर में 11 लाख 40 हजार रुपए की इनकम होगी। इस खर्च में 14 फीसदी ब्‍याज भी शामिल है, यदि आप किसी बैंक से लोन लेते हैं।

12 लाख तक ले सकते हैं लोन

अगर यह यूनिट लगाना चाहते हैं और आप के पास पूरा पैसा नहीं हैं तो आप किसी भी बैंक से लोन ले सकते हैं।बैंक आपको 80 फीसदी तक लोन दे सकता है। इसके लिए आपको कोई खास काम भी नहीं करना होगा। आप एमएसएमई डीआई की स्‍टडी रिपोर्ट के मुताबिक अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार कर सकते हैं।

आप की फसल में है किस पोषक तत्व की कमी, ऐसे पहचान करें

अधिक उत्पादन के लिए पोषक तत्वों की कमी को पहचान कर उन्हें सही करना प्रत्येक किसान का कर्तव्य होता है। किसान फसल के पौधों को देखकर कैसे पहचान सकते हैं कि फसल में किस पोषक तत्व की कमी है, जिससे किसान समय पर उसका उपचार कर सकें।

बोरान

बोरान की कमी से पौधे के सबसे ऊपर की पत्तियां पीली हो जाती हैं। कलियां सफेद या हल्के भूरे मृत ऊतक की तरह दिखाई देती हैं।

गंधक

गंधक की कमी से पत्तियां, शिराओं सहित गहरे हरे से पीले रंग में बदल जाती हैं तथा बाद में सफेद हो जाती हैं। इसकी कमी से सबसे पहले नई पत्तियां प्रभावित होती हैं।

मैगनीज

इसकी कमी से पत्तियों का रंग पीला-धूसर या लाल-धूसर हो जाता है तथा शिराएं हरी होती हैं। पत्तियों का किनारा और शिराओं का मध्य भाग पीला हो जाता है। पीली पत्तियां अपने सामान्य आकार में रहती हैं।

जस्ता

जस्ता की कमी से सामान्य तौर पर पत्तियों के शिराओं के मध्य पीले पन के लक्षण दिखाई देते हैं और पत्तियों का रंग कॉसा की तरह हो जाता है।

मैग्नीशियम

इसकी कमी से पत्तियों के आगे का हिस्सा गहरा हरा होकर शिराओं का मध्यभाग सुनहरा पीला हो जाता है और फिर किनारे से अन्दर की ओर लाल-बैंगनी रंग के धब्बे बन जाते हैं।

फास्फोरस

फास्फोरस की कमी से पौधों की पत्तियां छोटी रह जाती हैं और पौधों का रंग गुलाबी होकर गहरा हरा हो जाता है।

कैल्शियम

कैल्शियम की कमी से पौधे के सबसे ऊपर की पत्तियां प्रभावित होती हैं तथा देर से निकलती हैं। ऊपर की कलियां खराब हो जाती हैं। मक्के की नोचे चिपक जाती हैं।

लोहा

नई पत्तियों में तने के ऊपरी भाग पर सबसे पहले पिलेपन के लक्षण दिखाई देते हैं। शिराओं को छोड़कर पत्तियों का रंग एक साथ पीला हो जाता हैं। ये कमी होने पर भूरे रंग का धब्बा या मृत उतक के लक्षण प्रकट होते हैं।

तांबा

इसकी कमी से नई पत्तियां एक साथ गहरी पीले रंग की हो जती हैं तथा सूख कर गिरने लगती हैं। खाद्यान वाली फसलों में गुच्छों में वृद्धि होती है तथा शीर्ष में दाने नहीं होते हैं।

मालिब्डेनम

इसकी कमी से नई पत्तियां सूख जाती हैं, हल्के हरे रंग की हो जीती हैं, मध्य शिराओं को छोड़ कर पूरी पत्तियों पर सूखे धब्बे दिखाई देते हैं। नाईट्रोजन के उचिट ढंग से उपयोग न होने के कारण पुरानी पत्तियां पीली होने लगती हैं।

पोटैशियम

पोटैशियम की कमी से पुरानी पत्तियों का रंग पीला/भूरा हो जाता है और बाहरी किनारे कट-फट जाते हैं। मौटे आनाज जैसे – मक्का और ज्वार में ये लक्षण पत्तियों के आगे के हिस्से से शुरू होते हैं।

नाइट्रोजन

नाइट्रोजन की कमी से पौधे हल्के हरे रंग के या हल्के पीले रंग के होकर बौने रह जाते हैं। पुराई पत्तियां पहले पीली हो जाती हैं। मोटे अनाज वाली फसलों में पत्तियों का पीलापन आगे के हिस्से से शुरू होकर बीच के हिस्से तक फैल जाता है।

 

आप भी एक एकड़ में 1000 कुंतल उगाना चाहते हैं गन्ना तो अपनाएं ये तरीका

भारत के किसान हमेशा से ही अपनी फसल को लेकर चिंतित रहते हैं क्योंकि कभी उनकी फसल बर्बाद हो जाती है तो कभी उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। खासकर गन्ना किसानों को फसल का उचित मूल्य न मिल पाने के कारण ज्यादा तकलीफ में रहते हैं।

महाराष्ट्र के एक किसान सुरेश कबाडे (48 वर्ष) इन्हीं सब तकलीफों से दूर रहते हैं क्योंकि वे अनोखी विधि से एक एकड़ में एक हजार कुंतल गन्ने की पैदावार करते हैं साथ ही उनके उगाए हुए गन्ने की लम्बाई 19 फीट होती है। नौवीं पास सुरेश कबाडे अपने अनुभव और तकनीकी के सहारे खेती से साल में करोड़ों रुपये की कमाई भी करते हैं।

मुंबई से करीब 400 किलोमीटर दूर सांगली जिले की तहसील वाल्वा में कारनबाड़ी के सुरेश कबाडे (48 वर्ष) अपने खेतों में ऐसा करिश्मा कर रहे हैं कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, यूपी तक के किसान उनका अनुसरण करते हैं। उनकी ईजाद तकनीकी का इस्तेमाल करने वालों में पाकिस्तान के भी कई किसान शामिल हैं। (देखिए वीडियो)

निकाल देते हैं गन्ने में निकलने वाला पहला पौधा

सुरेश कबाडे बताते हैं, “गन्ने के टीलस (पहला पौधा) एक एकड़ में 40 हजार से अधिक होने चाहिए। गन्ने के टीलस उगने के बाद हम लोग एक अनोखा तरीका अपनाते हैं। गन्ना खेतों में बोने के बाद उसमें निकलने वाला पहला टीलस हम तोड़कर निकाल देते हैं।”

सुरेश कबाडे आगे बताते हैं, “मदर टीलस निकालने से उसके साइड के टीलस अच्छे हो जाते हैं साथ ही उनकी लम्बाई में काफी वृद्धि होती है। एक एकड़ में एक हजार कुंतल गन्ने की पैदावार का लक्ष्य होता है। हमारे गन्ने की लंबाई 18 से 19 फीट तक होती है। जैविक तरीके से उगाए गए हमारे एक गन्ने में 44 से 54 कांडी (आंख) होती हैं। जिनके बीच की दूरी कम से कम छह इंच और अधिक से अधिक नौ इंच तक होती है।

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NEWS SOURCE – Gaonconnection News