किसान से बात करने के लिए इस नंबर पर संपर्क करें

हरियाणा के किसान देश और विदेश में अपनी खेती के लिए फेमस है। पलवल जिले के प्रगतिशील किसान बिजेंद्र दलाल उन्हीं में से एक है। वह तकनीक के साथ फूलों की खेती कर लाखों रुपए की आमदनी ले रहे हैं। हरियाणा, पंजाब व उत्तरप्रदेश के किसानों के लिए वे रोल मॉडल से कम नहीं हैं। दूर-दूर से लोग उनसे जानकारी लेने पहुंचते हैं। गुलाब और ब्राॅसिका की करते हैं खेती…

  • 1984 से खेती कर रहे बिजेंद्र दलाल बताते हैं कि शुरुआत में तो उन्होंने परंपरागत खेती की लेकिन धीरे-धीरे जानकारी बढ़ी तो फूलों की खेती शुरू की।
  • आज वह बड़े स्तर पर गुलाबों की खेती कर रहे हैं। उन्होंने नेट हाउस में साढ़े आठ एकड़ जमीन पर 25 से 30 हजार गुलाब के पौधे लगा रखे हैं।
  • इन पर उनकी कोस्ट लगभग 25 लाख रुपए आई। फसल आने के पहले साल 5 लाख रुपए मुनाफा लिया और अगले 4 साल तक 10 लाख रुपए मुनाफा आने का अनुमान है।

जापान से बीज मंगाकर उगाया ब्राॅसिका

  • बिजेंद्र दलाल ने अपने खेतों में ब्राॅसिका का फूल भी उगाया था, जिसका बीज उन्होंने जापान से मंगाया था।
  • फूल की चमक भी मेहमानों को आकर्षित करती है। इसकी खेती करके किसान एक एकड़ भूमि में दस लाख रुपए तक की आमदनी ले सकता है। पौध करीब 10-13 रुपए की लागत आती है, जबकि वह 30 से 35 रुपए प्रति पीस व्यापारी को बेचते हैं।
  • परिवहन व अन्य खर्चों को हटाने के बाद किसान को प्रति एकड़ न्यूनतम 10 लाख रुपए की आय होती है। व्यापारी इन्हें 70 से 150 रुपए प्रति पीस बेचता है। ब्राॅसिका फूल की बड़ी खासियत इसकी महंगी कीमत, मगर उगाने में आसानी है। यह सर्दियों के सीजन में बहुत कम समय में तैयार हो जाता है।

ग्रुप बनाकर करते हैं खेती

बिजेंद्र के पास पारिवारिक जमीन है। वह तीन भाई हैं, लेकिन खेती एक साथ करते हैं। उनका कहना है कि इससे खर्च कम आता है। सामूहिक प्रयास से काम भी बंट जाता है और ज्यादा जमीन में पैदावार भी अधिक आती है।

इसी तरह वह दूसरे किसानों के साथ मिलकर भी खेती कर रहे हैं और अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।
किसान बिजेंद्र दलाल से जानकारी लेने के लिए मोबाइल नंबर 09416103573 पर संपर्क कर सकते हैं।

बासमती 1509 के भाव में आया 300 प्रति क्विंटल तक का उछाल,ये हुआ भाव

हरियाणा की अलेवा अनाज मंडी में पिछले सप्ताह से धान की किस्म 1509 की फसल आवक तेज हो गई है। धान की आवक शुरू होने के साथ ही पिछले सप्ताह के मुकाबले गुरुवार को धान की किस्म 1590 के भाव में प्रति क्विंटल 300 रुपए तक का उछाल आया है। गुरुवार को परचेजरों ने धान की किस्म 1509 की 500 क्विंटल धान की की खरीददारी की गई है।

परचेजरों द्वारा हाथ से कटाई वाली धान की किस्म 1509 को प्रति क्विंटल 2729 रुपए और कंबाइन से काटी गई फसल 2550 प्रति क्विंटल तक खरीद की गई। धान की किस्म 1509 के भाव अच्छे होने से मंडी में फसल बेचने आए विभिन्न गांवों के किसान खुश दिखाई दिए।

अलेवा अनाज मंडी व्यापारी एसोसिएशन के प्रधान रामदिया लोहान ने बताया कि धान की पीआर किस्म की सरकारी खरीद सरकार द्वारा एक अक्टूबर से शुरू करने की हिदायत दी गई है, लेकिन धान की किस्म 1509, बासमती 1121 समेत सभी किस्मों की अनाज मंडी विभिन्न शहरों से आए परचेजरों द्वारा खरीद की जा रही है। धान की किस्म 1509 के भाव पिछले वर्ष की अपेक्षा अधिक मिल रहे है।

हफ्ते भर में ही तैयार हो जाएंगी फसल

बिहार के किसानों के लिए अच्छी खबर है। कृषि विश्वविद्यालय सबौर द्वारा एक ऐसी तकनीक (हाइड्रोपोनिक्स) पर काम चल रहा है, जिससे किसान बिना मिट्टी के खेती कर सकेंगे। बिहार सरकार ने इस तकनीक पर काम करने के लिए विश्वविद्यालय को 1.80 करोड़ रुपये स्वीकृत किया है। फिलहाल सब्जियों एवं हरा चारा की खेती के लिए काम किया जाएगा।

हाइड्रोपोनिक्स विधि को वैज्ञानिकों ने जलकृषि की संज्ञा दी है। जापान, चीन, अमेरिका के बाद भारत में भी इसकी शुरुआत हो चुकी है। बिहार के साथ केरल, गोवा, महाराष्ट्र में इस तकनीक पर काम किया जा रहा है। इसके जरिए हरा चारा के अलावा धनिया, टमाटर, पालक एवं शिमला मिर्च जैसी सब्जियों की खेती की जा सकती है।

कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार ने बताया कि बाढ़-सुखाड़ से परेशान लघु एवं सीमांत किसानों के लिए यह तकनीक वरदान साबित होगी। किसानों को राज्य सरकार की ओर से इस तकनीक को अपनाने की ट्रेनिंग भी दी जाएगी। इस तकनीक में सामान्य खेती की तुलना में पानी की जरूरत सिर्फ 20 फीसद होती है।

बड़े गमलों की तरह की 15 से 20 की संख्या में ट्रे होती है। अंकुरित बीज को ट्रे में रखा जाता है, जिसमें हरा चारा हफ्ते भर में तैयार हो जाता है। इसे चक्रानुक्रम में इस्तेमाल किया जा सकता है। प्रतिदिन 50 किलो हरा चारा उपजाने वाली मशीन की लागत करीब 50 से 60 हजार रुपये हैं। बड़ी मशीन की लागत ज्यादा आती है।

क्या है हाइड्रोपोनिक्स

प्रोजेक्ट इंचार्ज डॉ. संजीव गुप्ता के मुताबिक इस विधि में मिट्टी की जरूरत नहीं पड़ती। पानी में बालू या कंकड़ डालकर बीज उगाया जाता है। सात दिनों में हरा चारा तैयार हो जाता है। पौधों को पोषक तत्व देने के लिए विशेष तरह का घोल डाला जाता है। वह भी महीने में एक-दो बूंद सिर्फ एक बार। घोल में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, मैग्नीशियम, कैल्शियम, सल्फर, जिंक, आयरन को एक खास अनुपात में मिलाया जाता है। ऑक्सीजन को पंपिंग मशीन के जरिए पौधे की जड़ों तक पहुंचाया जाता है।

क्या है लाभ

इस तकनीक की मदद से बेहद कम खर्च में कहीं भी पौधे उगाए जा सकते हैं। आठ से 10 इंच ऊंचाई वाले पौधों के लिए प्रति वर्ष एक रुपये से कम लागत आएगी। फसलों का मिट्टी और जमीन से कोई संपर्क नहीं होने के कारण इनमें बीमारियां कम होती हैं। लिहाजा कीटनाशकों की जरूरत नहीं पड़ती है। घोल में पोषक तत्व डाले जाते हैं। ऐसे में उर्वरकों का इस्तेमाल नहीं होता। यह स्वास्थ्य के लिए बेहतर होता है। इस तकनीक से उगाई गइ सब्जियां और पौधे अधिक पौष्टिक होते हैं।

News Source :दैनिक जागरण

प्रोफेसर का अनोखा जुगाड़, घास काटने वाली मशीन से बना दी धान काटने वाली मशीन

जेरोम सोरेंगे को-ऑपरेटिव कॉलेज और वर्कर्स कॉलेज में मनोविज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं. रिटायरमेंट के बाद उन्होंने बालीगुमा गोड़गोड़ा में फार्म हाउस खोला. यहां वे सूकर, मुर्गी, ऐमु और मछली पालन कर रहे हैं. थोड़ी जमीन पर खेती-बाड़ी भी है. उन्हें खेत में धान काटने-कटवाने में बहुत परेशानी होती थी.

इससे बचने के लिए वह दिमाग लगाते रहते थे. अंतत: उन्होंने धान काटने की मशीन बना डाली. उन्होंने अलग से कुछ किया नहीं. मवेशी को खिलाने के लिए उनके पास पहले से घास मशीन हेच कटर थी. इस मशीन में ही उन्होंने विज्ञान ढूंढ़ निकाला.

तर्क भिड़ाया कि इससे घास कट सकता है तो धान क्यों नहीं. धान तो कट जा रहा था लेकिन इसकी बालियां बिखर जा रही थीं. उनके मुताबिक इस समस्या का हल उनकी बेटी नीरा मृदुला सोरेंग ने ढूंढ़ निकाला. नीरा चिरीमिरी (छत्तीसगढ़) में रहती हैं. वहां से उन्होंने पापा को धान काटने वाली मशीन का फोटो ह्वाट्सएप किया. इससे प्रो सोरेंग को आइडिया मिल गया.

उन्होंने हेच कटर में प्रोटेक्टर की जगह धान की बाली समेटने के लिए प्लास्टिक की पुरानी बाल्टी काटकर लगा दी. हो गयी मशीन तैयार. जेरोम बताते हैं कि तीन मजदूर तीन दिन में जितना काम कर सकता है, उतना काम कुछ घंटे में यह मशीन कर देती है.

मशीन में सिर्फ दो लीटर डीजल खर्च होगा. दो लीटर डीजल की कीमत 120 से 130 रुपये होती है. मान लिया जाये दो घंटे मशीन चलाने के लिए आप एक व्यक्ति को 150 रुपये देते हैं. इस तरह हिसाब लगाया जाये तो कुल खर्च 280 रुपये या अधिक-से-अधिक 300 रुपये होता है.

धान काटने के लिए एक मजदूर की प्रतिदिन की मजदूरी 150 रुपये होती है. तो तीन मजदूर की तीन दिनों की मजदूरी 1350 रुपये होती है. इस तरह समय के साथ-साथ एक हजार रुपये से अधिक की बचत भी हो रही है.इनके इस प्रयोग के बाद बहुत सारी कंपनी यह मशीन बनाने लगी है .जिनमे बाल्टी की जगह पर धातु लगाई जाती है .और ब्लेड भी बदल दिया है . जिससे अब यह मशीन पूरी तरह से कामयाब बन गई है

इसी सिद्धांत पर बनी मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

पराली से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने खोजी दो तकनीक

राजधानी दिल्ली सहित आस-पास के शहरों को जल्द ही पराली के जानलेवा धुएं से मुक्ति मिल सकती है। वैज्ञानिकों से लंबे शोध के बाद इससे निपटने का रास्ता खोज निकालने में सफलता मिलने लगी है। अब पराली को खेतों में नहीं जलाया जाएगा। इससे अब ईंट के भट्ठों या होटल के तंदूर के लिए धुएं से मुक्त ईंधन (ब्रिक्स) तैयार होगा। इससे किसानों की कमाई भी होगी।

सस्ती होने के चलते किसान इसे आसानी से अपना भी सकेंगे। इसके साथ ही वैज्ञानिकों से जो दूसरा रास्ता खोजा है, उनमें किसानों का एक पैसा भी नहीं लगेगा, उल्टा उनका खेत आने वाले कुछ सालों में और ज्यादा उपजाऊ जरुर हो जाएगा। यानि तकनीक की मदद से जानलेवा पराली खेतों में ही कम्पोस्ट (खाद) में तब्दील होगी।

वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के अधीन काम करने वाली संस्था केंद्रीय यांत्रिक अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (सीएमईआरआई) ने फिलहाल इन दोनों तकनीक को जल्द से जल्द पूरा करने में जुटी है। इसमें से पराली से जलाऊ ईंधन (ब्रिक्स) तैयार करने का प्रोजेक्ट लगभग पूरा हो गया है। इसके लिए मशीन तैयार हो गई है। इन दिनों लुधियाना के सेंटर पर ट्रायल चल रहा है। इस मशीन के निर्माण पर करीब डेढ़ लाख रुपए की लागत आई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि मशीन के व्यावसायिक निर्माण शुरू होते ही इसकी लागत में कम हो जाएगी।

मौजूदा समय में ईंट के भट्ठों और होटलों के तंदूर में कोयला इस्तेमाल होता है, जो काफी मंहगा होने के साथ ही हानिकारक धुंआ भी छोड़ता है। अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ अश्विनी कुमार के मुताबिक, इसके साथ ही हाल ही में हमने एक पराली को लेकर एक नए प्रोजेक्ट पर भी काम शुरू किया है, जिसमें फसल की कटाई के दौरान ही पराली को खेतों में ही छोटे-छोटे टुकड़ों में तब्दील करके जुताई कर दी जाएगी। यह सब हार्वेस्टिंग के दौरान ही हो जाएगा।

इसके लिए मौजूदा हार्वेस्टिंग मशीन के लिए अलग से एक नई मशीन तैयार की जा रही है, जो एक समय पर एक साथ काम करेगी। यानि खेतों की पराली हार्वेसटिंग के दौरान ही खेतों में नष्ट हो जाएगी, जो खेतों में पानी के पड़ते ही तुरंत सड़कर मिट्टी में मिल जाएगी। इस मशीन को तैयार करने को लेकर अभी काम चल रहा है। माना जा रहा है कि अभी इसको तैयार में थोड़ा समय लग सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि ऐसी तकनीक है, जिसमें किसानों का अलग से एक भी पैसा नहीं लगेगा, जिसमें हार्वेस्टिंग के खर्च में पराली भी खत्म हो जाएगी।

मौजूदा समय में राजधानी दिल्ली सहित आसपास के शहरों के लिए पराली इसलिए एक बड़ी समस्या बनी हुई है, क्योंकि किसान इसे अभी फसल की कटाई के बाद खेतों में ही जला देते है। इसकी मुख्य वजह किसानों की दूसरी फसल के बुआई की जल्दबाजी रहती है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों के ऐसा करने से खेतों की उर्वरा शक्ति नष्ट हो जाती है।

News Sourc :दैनिक जागरण

पाना है ज्यादा फायदा तो ऐसे करें मटर की अगेती खेती

मटर की सब्जियों के रूप में हर साल बड़ी मांग रहती है, जिसको देखते हुए रबी सीजन की मुख्य दलहनी फसल मटर की अगेती प्रजातियों को सितंबर में बुवाई के लिए विकसित किया गया है। भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक बिजेन्द्र सिंह ने बताया ” दलहनी सब्जियों में मटर लोगों की पहली पसंद है, इससे जहां भोजन में प्रोटीन की जरूरत पूरी होती है वहीं इसकी खेती से भूमि की उर्वरा शक्ति में पर्याप्त वृद्धि होती है। किसान कम अवधि में तैयार होने वाली मटर की प्रजातियों की बुवाई सितंबर से अंतिम सप्ताह से लेकर अक्टूबर के मध्य तक कर सकते हैं। ”

उन्होंने बताया कि किसान मटर की अगेती किस्मों की खेती करके जहां सब्जियों में मटर की बढ़ी हुई मांग को पूरा कर सकते हैं वहीं इससे अपनी आमदनी भी बढ़ा सकते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान ने मटर की अगेती प्रजाति की कई किस्मों को विकसित किया है।

जिसमें आजाद मटर-3, काशी नंदिनी, काशी मुक्ति, काशी उदय और काशी अगेती प्रमुख हैं। मटर की इन प्रजातियों की सबसे खास बात यह है कि यह 50 से लेकर 60 दिन में तैयार हो जाती है, जिससे खेत जल्दी खाली हो जाता और किसान दूसरी फसलों की बुवाई भी कर सकते हैं।

मटर की खेती के लिए दोमट और हल्की दोमट मिट्टी दोनों उपयुक्त हेाती है। मटर की बुवाई से पहले खेती की तैयारी के बारे में जानकारी देते हुए कृषि वैज्ञानिक डॉ. आर.के. सिंह ने बताया कि पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए और उसके बाद दो से लेकर तीन जुताई कल्टीवेटर से करनी चाहिए। बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर 80 से लेकर 100 किलोग्राम बीज की जरूतर पड़‍ती है बुवाई से पहले बीजोपचार करना जरूरी होता है।

मटर को बीज जनित रोगों से बचाव के लिए थीरम 2 ग्राम या मैकोंजेब 3 ग्राम को प्रति किलो बीज की दूर से शोधन करना चाहिए। बुवाई की विधि- सब्जी मटर के लिए अगेती प्रजाजि की मटर की बुवाई से 24 घंटे पहले बीज को पानी में भिगो लें फिर छाया में सुखाकर इसकी बुवाई करें। बुवाई करने में उर्वरक का प्रयोग करने में भी विशेष् ध्यान देना चाहिए। प्रति हेक्टेयर 20 किलोग्राम नाइट्रोजन डालना चाहिए।

क्या है मटर की अगेती प्रजातियों की विशेषता

काशी नंदिनी- इस प्रजाजि को गौतम कुल्लू, एम सिंह की टीम ने साल 2005 में विकसित किया था। जम्मू-कश्मीर, हिमांचल प्रदेश, उत्तरांचल, पंजाब,हरियाणा, उत्तर प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में इसकी खेती की जाती है। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर औसतन 110 से लेकर 120 कुंतल मटर का उत्पादन होता है।

काशी उदय- 2005 में विकसित की गई इस किस्म की यह विशेषता है कि इसकी फली की लंबाई 9 से लेकर 10 सेंटीमीटर होती है। इसकी उपज प्रति हेक्टेयर 105 कुंतल है। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में इसकी अच्छे से खेती हो सकती है।

काशी मुक्ति- यह प्रजाति उत्तर प्रदेश, पंजाब,हरियाणा, बिहार और झारखंड के लिए उपयुक्त है। इसकी पैदावार प्रति हेक्टेयर 115 कुंतल होती है। इसकी फलिया काफी और दाने बड़े होते हैं। विदेशों में भी इसकी भारी मांग है।

काशी अगेती- वर्ष 2015 में राजेश कुमार सिंह, बी सिंह जैसे वैज्ञानिकों ने इस किस्मको विकसित किया था। यह 50 दिन में तैयार हो जाती है। इसकी फलियां सीधी और गहरी होती हैं। पौधे की लंबाई 58 से 61 सेंटीमीटर होती है। एक पौधे में 9 से लेकर 10 फलियां लगती हैं। प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 95 से 100 कुंतल होता है।

पुलिसवाले ने बनाया झूला पंप, अब बिना डीज़ल और बिजली के मुफत में होगी सिंचाई

महँगी होती बिजली रोज़ बढ़ते पेट्रॉल डीजल के दाम और खेती में बढ़ते लागत के बीच फसल की सिचाई करना किसानों की एक बड़ी समस्या है। लेकिन इन सब के बीच सिंचाई के लिए मोटर चलवाने की झंझट, बिजली की टेंशन, डीजल की झंझट, गैस के दाम और भी कई सारे लफड़े। अब सिंचाई को लेकर आप को भी मिल सकती है इन सभी झंझटों से फुर्सत। क्योंकि अब आ गया है झूला पंप, जिसे बनाया है बिहार के पूर्वी चम्पारण जिले के कल्‍याणपुर थाने में पदास्‍थापित जमादार मेंहीलाल यादव ने।

पंप से प्रति घंटे 10 हजार लीटर पानी निकाला जा सकता है। लागत बेहद कम है। इससे पहले गैस सिलेंडर से पानी निकालने की राह मेहीलाल ने निकाली थी। लेकिन, अब सामान्य ढंग से कम खर्च में पानी के इंतजाम का यंत्र तैयार किया है। उनके कार्य की सराहना कई स्तरों पर हुई है।

खगडिय़ा जिले के बापूनगर निवासी मेहीलाल यादव भागलपुर जिला बल में बहाल हुए। वर्ष 2007 में कटिहार जिले में तैनात थे। वहां किसानों को डीजल व पेट्रोल के लिए गैलन लेकर भटकते देखा। इस स्थिति से निजात दिलाने की सोची। आखिरकार बगैर ईंधन से संचालित झूला पंप का निर्माण किया। फिलहाल मेहसी लीची अनुसंधान केंद्र में एक झूला पंप उपयोग में है।

आती है 25 हजार की लागत

झूला पंप बनाने के लिए चापाकल के हेड, सेक्शन पाइप, साइकिल पाइप, वाशर, रॉड का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें करीब 25 हजार की लागत आती है। यह बगैर ईंधन संचालित होता है। किसी भी भूगर्भीय जलस्रोत से पंप को पाइप के सहारे बिल्कुल पंप सेट की तरह जोड़ झूले पर झूलना आरंभ कर देने पर पानी मिलता है।

इसके लिए दो लोगों की आवश्यकता होती है। लेकिन, एक आदमी है तो दूसरी तरफ ईंट या किसी अन्य वस्तु का भार देकर झूला जा सकता है। जैसा जल स्रोत होगा और जिस स्तर पर झूला चलेगा, उसी हिसाब से पानी निकलेगा।

सरकार के पत्र से बढ़ा उत्साह

सूबे के योजना व विकास विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. अरङ्क्षवद कुमार ने नवंबर 2015 में मेहीलाल को पत्र लिखकर स्टेट इनोवेशन काउंसिल द्वारा मुख्यमंत्री नवप्रवर्तन प्रोत्साहन योजना से वित्तीय सहायता प्रदान करने को कहा है।

इसके पहले केंद्र के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. आर चिदंबरम ने 2007, पूर्णिया के तत्कालीन आयुक्त पंकज कुमार 2013 और कटिहार के तत्कालीन जिलाधिकारी व सांसद ने सम्मानित किया था। दो वर्ष पहले गणतंत्र दिवस की झांकी में झूला पंप हुआ था।

 झूला पंप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

आ गई दाल-बाटी-चूरमा बनाने वाली मशीन, सिर्फ 1 घंटे में 500 लोगों का खाना होता है तैयार

मारवाड़ के पारम्परिक भोजन दाल-बाटी-चूरमा के बारे में कौन नहीं जनता यह राजस्थान के इलवा पुरे भारत में प्रसिद्ध है । लेकिन अब इसे बनाने के लिए अब मेहनत नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि  दाल-बाटी-चूरमा बनाने के लिए अब मशीन भी आ गई है। यह किसी कंपनी ने नहीं बनाई बल्कि खेती के उपकरण रिपेयर करने वाले बैठवासिया निवासी कन्हैयालाल सुथार ने तैयार किया है। वह भी पुराने कल-पुर्जों से।

इस मशीन से दाल-बाटी बनाने में समय की बचत के साथ बड़ी संख्या में लोगों के लिए भोजन बनाया जाना संभव हुआ है। आमतौर पर जागरण,धार्मिक अनुष्ठान और गोठ में यहां यही भोजन बनाने की परंपरा है लेकिन बाटी कुछ ही लोग बना पाते हैं। धीरे-धीरे लोगों का रुझान दाल बाटी चूरमा से हटने लगा है। भोजन-महाप्रसादी में दूसरे व्यंजन बनाने लग गए हैं। ऐसे में यह मशीन इस परंपरा को आगे बढ़ाने में कारगर साबित होगी।

ट्रैक्टर से जोड़ने की भी सुविधा

कन्हैयालाल तिंवरी कस्बे में थ्रेशर मशीनों को ठीक करने का काम करते हैं। कई मशीनें खराब हो जाती है। उसके पार्ट्स को ढेर लग गया था। उनके दिमाग में आया कि क्यों न इन पार्ट्स से कुछ नया किया जाए। फिर क्या वे दाल बाटी चूरमा बनाने की मशीन के नवाचार में जुट गए। मशीन देखने में भारी-भरकम लगती है, लेकिन इसे पहियों पर भी इधर-उधर लाया-ले जाया सकता है। इसे ट्रैक्टर के पीछे जोड़कर लाने ले जाने में भी आसानी रहती है।

कन्हैयालाल बताते हैं कि क्षेत्र के कृषि फार्मों पर होने वाले जागरणों में वे जाते रहते हैं। वहां लोगों को दाल बाटी चूरमा बनाते देखा। एक बार बाटी सेखते हुए एक किसान के हाथ जल गए थे। तब लोगों ने कहा कि सब मशीनें आ गई, बाटी के लिए कोई मशीन नहीं आया। उस वक्त यह मशीन बनाने का आइडिया आया।

बाटी, दाल, चूरमा के लिए चार हिस्से

इस मशीन में चार भाग हैं, जिनमें से एक में सूखा आटा, पानी डाला जाता है। आटा मशीन गूंथ देती है। दूसरे भाग में बॉक्सनुमा ओवन है। इसमें 4 से 6 दराज है। इसमें बाटी भर दी जाती है। सबसे नीचे वाले भाग में कोयले जलाए जाते हैं। 20 मिनट की आंच से बाटी पक-कर तैयार हो जाती है। तीसरे भाग में चूरमा की मशीन है। अगले भाग में गैस भट्टी लगी है।

इस पर दाल बनाई जाती है। दो व्यक्ति 500 लोगों के लिए एक घंटे में दाल बाटी चूरमा तैयार कर सकते हैं। एक बार कोयला डालने के बाद गर्म होने में 10 मिनट लगते हैं। इसके बाद बाटी तैयार होनी शुरू हो जाती है। कोई ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं है। बल्कि कोयले से ही बाटी पकती है। ट्रैक्टर द्वारा चूरमा मशीन चलाकर चूरमा बनाया जाता है।

डेढ़ दर्जन मशीनें लागत मूल्य पर दी

इन्होंने लगभग 15 धर्मस्थानों व संतों के यहां पर यह मशीन लागत कीमत पर बनाकर दी है।

News Source : दैनिक भास्कर

जाने भारत में खेत नापने के लिए प्रयोग होने वाले खेती के नाप

भारत के अधिकांश भागो में खेती के नाप के लिए गज, हाथ,गट्ठा, जरीब, बिस्‍सा, बिस्‍वॉनसी, उनवांनसी, कचवानसी,बीधा, किल्‍ला, एकड, हेक्‍टेअर, मरला, कनाल आदि मात्रकों का प्रयोग होता हैं।

नापने का पैमाना सम्‍बधित जानकारी-

 1 Gaz (एक गज)

= 1 Yard (एक यार्ड)
= 0.91 Meters (0.91 मीटर)
= 36 Inch (36 इंच)
= 3×3 Feet (9 वर्ग फीट)

1 Hath (एक हाथ)

=½ Yards (आधा गज)
= 18 Inch (18 इंच)

1 Gattha (एक गट्ठा)

= 5 ½ Hath (साढे पांच हाथ)
= 2.75 Yards (पौने तीन गज)
= 99 Inch (99 इंच)

 

1 furlong(फर्लांग)

=220 Yards (गज)
=660 Feet (फुट)

1 Jareeb (जरीब)

= 55 Yards (55 गज) (जरीब आमतौर पर 10 करमों की होती
है पर 66 इंच करम वाली जरीब में 8 कड़ियां होती हैं)

1 Karm (एक करम)(करम को कहीं-कहीं
सरसाही भी कहते हैं)

= साढ़े 5 फुट गुना साढ़े 5 फुट (5′.6″ X 5′.6″)
= 30.25 वर्गफुट
= 1.6764 मीटर

= दो कदम

= देश के अलग-अलग हिस्सों में करम का साइज़
भी अलग है, एक करम 57.157, 57.5, 60 और
66 इंच का माना गया है यहाँ सारी गणना 66 इंच
मान कर की गयी हैI

1 Marala (एक मरला)

= साढ़े 16 फुट गुना साढ़े 16 फुट (16′.6″ X 16′.6″)
= 272.25 वर्गफुट
= 9 करम= 25.2929 वर्ग मीटर

क्षेत्रफल मापने के मात्रक

1 Unwansi (एक उनवांसी)

=24.5025 Sq Inch (24.5025वर्ग इंच)

1 Kachwansi (एक कचवांसी)

=20 Unwansi (20 उनवांसी)

1 Biswansi ( एक बिसवांसी)

=20 Kachwansi (20 कचवांसी)
= 1 Sq. Gattha (एक वर्ग गट्ठा)
= 7.5625 Sq.Yard (7.5625 वर्ग गज)
= 9801 Sq Inch (9801 वर्ग इंच)

1 Bissa (एक बिस्‍सा)

=20 Biswansi (20 बिस्‍वांसी)
= 20 Sq.Gattha (20 वर्ग गट्ठा)

1 Kaccha Bigha (एक कच्‍चा बीघा)

= 6 2/3 Bissa (6 2/3 बिस्‍से)
= 1008 Sq.Yard and 3Sq Feet (1008 वर्ग गज और 3वर्गफुट)
= 843 Sq. Meters (843 वर्ग मीटर)

1 Pakka Bigha (एक पक्‍का बीघा)

= 1 sq. Jareeb (एक वर्ग जरीब)
= 3 Kaccha Bigha (तीन कच्‍चे बीघे)
=20 Bissa (20 बिस्‍सें)
= 3025 Sq. Yard (3025 वर्ग गज)
= 2529 Sq. Meters 2529 वर्ग मीटर)
= 27225 Sq. Feet (27225 वर्ग फुट)
=165×165 Feet
=55×55 यार्ड
= 0.625 Acre (0.625 एकड)
= 0.253 Hectare (0.253हेक्‍टेअर)
= 5 कनाल (एक कनाल में 20 मरला)
= 100 मरला

1 Acre (एक एकड)

= 4840 Sq. Yard (4840 वर्ग गज)
= 4046.8 Sq.Meters (4046.8वर्ग मीटर)
= 43560 Sq. Feet (43560 वर्ग फुट)
= 0.4047 Hectare (0.4047हेक्‍टेअर)
= 1.6 बीघा
= 8 कनाल
= 160 मरला

1 Hectare (एकहेक्‍टेअर)

= 2.4711 Acre (2.4711 एकड)
= 3.95 बीघा
= 11960 यार्ड
= 10000 Sq meters ( 10000वर्ग मीटर)

क्यों करोड़ों का बिजनेस छोड़ किसानो को जैविक खेती सिखा रहा है ये इंजीनियर?

मुंबई के श्यामलाल कॉलेज से बीटेक और कैलिफोर्निया की सैन जॉस यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रोनिक्स में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद श्रीगंगानगर के रणदीप सिंह कंग ने बिजनेस को चुना। क्यों गांव वालों को खेती सिखा रहा एक इंजीनियर…

  •  2006 में वहां पहला डिपार्टमेंटल स्टोर खोला। फिर एक-एक कर तीन खोल लिए।
  • सालाना करीब चार करोड़ रुपए का मुनाफा दे रहे थे। लेकिन एक बात रणदीप को परेशान करती रहती।
  • गांव से या रिश्तेदारी से जब कभी मौत की खबर आती, कारण एक ही रहता, कैंसर।
  • वे इसके कारणों के पीछे गए तो पता चला खेतों में अंधाधुंध पेस्टीसाइड्स का इस्तेमाल खेतों और फसलों को जहरीला बना रहा है।
  • जमीन की प्राकृतिक उर्वरता खत्म हो रही है। रणदीप के अनुसार बरसों से लोग खेतों में पेस्टीसाइड और खाद के नाम पर जहर डाल रहे थे।

गांव लौटे, किसानों को प्रैक्टिकल फायदे दिखाए

पढ़ाई और बिजनेस के बाद रणदीप ने गांव के किसानों के लिए काम करने की ठान ली। 2012 में बिजनेस समेटकर श्रीगंगानगर आ गए। श्रीकरणपुर के अपने 100 बीघा के खेत को प्रयोगशाला बनाया। गोमूत्र इकठ्ठा करते। उसमें आक, नीम, तूंबा, लहसुन उबाल कर बोतलों में भरते और किसानों को समझाने निकल पड़ते। किसानों ने फायदे देखे तो रणदीप की बात को मान गए।

कंपनियां प्रॉडक्ट खरीदने को बेताब

रणदीप कहते हैं- किसानों तक मैंने गोमूत्र उर्वरक पहुंचाया है। उन्होंने उपयोग किया है और नतीजे सामने आ रहे हैं। यह बात पेस्टीसाइड व उर्वरक कंपनियों तक पहुंचनी ही थी। फिर क्या, कंपनियों ने उनसे संपर्क करना शुरू किया। कंपनियां 50 रुपए प्रति लीटर तक के मुनाफे पर उनका पेस्टीसाइड खरीदने को तैयार हैं लेकिन रणदीप कहते हैं- मेरा उद्देश्य कुछ और है। पैसा तो मैं अमेरिका में इससे कहीं ज्यादा कमा ही रहा था।

अब उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ अपने देश के किसानों के लिए खुशहाली लाना है और मैं इस पर ध्यान दे रहा हूं। गोमूत्र में 16 पाेषण पर पौधों को चाहिए सिर्फ 14 रणदीप के अनुसार गोमूत्र में 16 प्रकार के न्यूट्रशंस होते हैं जबकि पौधों को 14 प्रकार के ही चाहिए होते हैं। गोमूत्र फंगस और दीमक को खत्म करता है और पोषण बढ़ाता है। इसके बाद किसी प्रकार की खाद की जरूरत नहीं होती।

फिर, कृत्रिम पेस्टीसाइड्स डाले गए खेत में जहां 2-3 दिन में पानी देने की जरूरत होती है वहीं गोमूत्र पेस्टीसाइड्स वाले खेत में 7-8 दिन से पानी देना पड़ता है। इस कसरत का एक पहलू और है। रणदीप अब एक गौशाला से प्रतिदिन 500 लीटर गोमूत्र 5 रुपए लीटर के भाव से खरीद रहे हैं। इससे उस गौशाला को दान पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं रही।

अगर आप रणदीप सिंह कंग से संपर्क करना चाहते है तो 95095-24124 ,94130-44000 नंबर पर कर सकते है ।