सिर्फ 43 रुपए में मिलेगा 1 लीटर पेट्रोल, अगर सरकार उठाए ये कदम

पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं. दिल्ली में गुरुवार को पेट्रोल 70.39 रुपए प्रति लीटर मिल रहा है. वहीं, मुंबई में पेट्रोल की कीमतें 79.50 रुपए प्रति लीटर पहुंच चुकी है. डीजल की स्थ‍िति भी कुछ ऐसी ही है. पेट्रोल-डीजल की कीमतें पिछले तीन सालों में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें घटने के बाद भी देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं घट रही हैं.

अगर केंद्र सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बदलाव के लिए एक कदम उठाए, तो इनकी कीमतें मौजूदा कीमतों से सीधे आधी हो सकती हैं. अगर सरकार ऑयल मिनिस्टर धर्मेंद्र प्रधान की बात मान लेती है, तो 1 लीटर पेट्रोल सिर्फ 43 रुपए में मिलेगा और एक लीटर डीजल महज 41 रुपए में.

दरअसल पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर ऑयल मिनिस्टर धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि कीमतों पर काबू पाने के लिए जीएसटी से ही रास्ता निकल सकता है. उन्होंने बताया कि जीएसटी परिषद से पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने को लेकर विचार करने को कहा है. अगर सरकार इस काम को कर दे, तो आम आदमी को काफी फायदा हो सकता है. हम आपको बता रहे हैं कि अगर पेट्रोल-डीजल नई टैक्स नीति के तहत आते हैं, तो कीमतों में कितना बदलाव आएगा.

अगर पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाया जाता है, तो इस पर ज्यादा से ज्यादा 28 फीसदी टैक्स लगाया जा सकता है. क्योंकि जीएसटी में यही सबसे ज्यादा टैक्स स्लैब है. 28 फीसदी टैक्स वसूले जाने पर एक लीटर पेट्रोल आपको दिल्ली में करीब 43 रुपए में पड़ेगा. जोकि पेट्रोल की मौजूदा कीमतों से लगभग आधा है. आगे समझिए कैसे.

पहले जानें कैसे मौजूदा व्यवस्था में पेट्रोल-डीजल के लिए आपको दिल्ली में 70 रुपए तक भुगतान करना पड़ रहा है और मुंबई में 80 रुपए तक.

पहले बात करते हैं पेट्रोल की. पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के मुताबिक ऑयल कंपनियां 30.42 रुपए में एक लीटर पेट्रोल डीलर्स को बेचती हैं. डीलर इसमें 3.24 रुपए अपना कमीशन जोड़ते हैं. इसके बाद एक लीटर की कीमत 33.66 रुपए हो जाती है. अब इसमें केंद्र 21.48 रुपए एक्साइज ड्यूटी वसूलता है. दिल्ली में 14.48 रुपए वैट लगता है. इस तरह आपको एक लीटर के लिए करीबन 70 रुपए दिल्ली में देने पड़ते हैं.

डीजल की बात करें, तो ऑयल कंपनियां डीलर्स को 1 लीटर पेट्रोल 29.98 रुपए में बेचती हैं. इसमें 2.17 रुपए डीलर का कमीशन जुड़ता है. इस पर अब केंद्र 17.33 रुपए एक्साइज ड्यूटी लगाता है. दिल्ली में 8.58 रुपए का वैट लगता है. इस तरह 1 लीटर डीजल आप तक पहुंचते-पहुंचते 58.06 रुपए (9 सितंबर तक के आंकड़े) पहुंच जाता है.

अगर पेट्रोल जीएसटी के तहत आ जाता है, तो एक्साइज ड्यूटी और राज्यों की तरफ से लगने वाला वैट खत्म हो जाएगा. नई टैक्स नीति के तहत डीलर कमीशन जुड़ने के बाद एक लीटर पेट्रोल की कीमत 33.66 रुपए हो जाती है. इसमें 28 फीसदी जीएसटी जोड़ने पर आपको 9.42 रुपए ओर देने होंगे. इस तरह 1 लीटर पेट्रोल दिल्ली में आपको 43.08 रुपए में मिलेगा.

डीजल की बात करें, तो डीलर कमीशन के जुड़ने के बाद यह 32.15 रुपए हो जाता है. इसमें 28 फीसदी जीएसटी जोड़ा जाए, तो 9.02 रुपए और जुड़ेगा. इस तरह 1 लीटर डीजल आपको महज 41.17 रुपए में पड़ेगा.

हम देख सकते हैं कि अगर पेट्रोल और डीजल जीएसटी के तहत आ जाएंगे, तो उनकी कीमत मौजूदा कीमतों से सीधे आधी हो जाएंगी. इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतों में बदलाव होने पर भी आम आदमी की जेब पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ेगा.

हालांकि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के तहत लाने का फिलहाल सरकार का कोई प्लान नहीं है. धर्मेंद्र प्रधान ने जीएसटी परिषद से जीएसटी के जरिए कोई रास्ता निकालने का सुझाव जरूर दिया है, लेकिन ये जल्द होता नहीं दिख रहा है.

इसे नवंबर में बाेया जाता है और अप्रैल में इसकी कंबाइन से कटाई करते हैं

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के करनाल स्थित रीजनल सेंटर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र लाठर के अनुसार हरियाणा चना नंबर 5 (HC-5) किसानों के लिए वरदान बन सकता है। इसे गेहूं की तरह ही नवंबर में बाेया जाता है और अप्रैल के प्रथम सप्ताह में इसकी कंबाइन से कटाई कर सकते हैं। क्योंकि चने की फसल की लंबाई गेहूं की फसल की तरह होती है।

ऐसे में कंबाइन से कटाई में किसी तरह की दिक्कत नहीं होती। वैज्ञानिक के अनुसार नवंबर में बिजाई के दौरान प्रति एकड़ 20 किलोग्राम बीज की दरकार होती है। उत्पादन 9 से 10 क्विंटल तक होता है। चना 4500 से 5000 रुपए प्रति क्विंटल बाजार में आसानी से बिक जाता है। 100 चनों का वजन 16 ग्राम होता है। लंबाई गेहूं की फसल की तरह 85 सेंटीमीटर तक होती है।

परंपरागतखेती करने के वाले किसानों को कुछ अलग करने की जरुरत है, नहीं तो खेती घाटे का सौदा बनकर रह जाएगी। करनाल जिला के रंबा गांव में किसान ने 15 एकड़ में चने की फसल उगाई है। वे कंबाइन से चने की कटाई कराएंगे। चने की फसल लेते ही वे समर मूंग उगाएंगे। पंजाब के कपूरथला के किसानों का कहना है कि वे चने की बिजाई से खेत में खाद डालने की जरुरत नहीं पड़ती। यही नहीं जमीन की उपजाऊ शक्ति भी बेहतर बनी रहती है।

उत्पादन भी बेहतर मिलता है और बाजार में मांग के अनुसार ही वे चना उगा रहे हैं। कई ग्राहक तो ऐसे हैं जो खेत से ही चना खरीदकर ले जाते हैं। किसान का कहना है कि परंपरागत खेती करते रहे तो एक दिन खेती छोड़ने को मजबूर होना पड़ सकता है। इसलिए हर किसान को कुछ अलग करने की जरुरत है। यदि यह भी हो तो कम से कम दलहनी खेती कर भी खासा मुनाफा लिया जा सकता है।

रंबा गांव के प्रगतिशील किसान रघबिंद्र सिंह के अनुसार उन्होंने पहली बार 15 एकड़ में चना उगाया है। फसल बहुत अच्छी है। कुछ व्यापारी इसे कच्चा ही खरीदने आए थे, लेकिन उन्होंने नहीं दिया। चने में सबसे खास बात यह है कि इसकी ब्रांच नीचे की ओर नहीं होती। गेहूं की फसल की तरह कंबाइन इसे काट सकती है। कंबाइन सिस्टम में बदलाव की जरुरत नहीं।

जाने प्रतीक की सफलता की पूरी कहानी

कई बार किस्मत ऐसे रंग दिखाती है इंसान को खुद भी यकीन नहीं होता ऐसा ही कुश हुआ उन्नीस वर्षीय प्रतीक के साथ । उत्तर प्रदेश स्थित बरेली के एक प्रॉपर्टी डीलर का बेटा प्रतीक बजाज, चार्टड अकाउंटेट बनकर अपने पिता के व्यापार में हाथ बंटाने के रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे लेकिन नियति ने उनके लिए कोई और रास्ता चुना था।

साल 2015 की बात है प्रतीक न केवल अपनी पढ़ाई में अच्छा कर रहे थे बल्कि सीपीटी परीक्षा पास कर सीए में जाने की तैयारी भी कर रहे थे। हाल ही डेयरी फार्म की शुरूआत करने वाले उनके बड़े भाई इससे जुड़े प्रशिक्षण के लिए इज्जतनगर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र जा रहे थे। प्रतीक उस वक्त खाली थे लिहाजा प्रशिक्षण के लिए जा रहे अपने बड़े भाई के साथ वह भी हो लिए जहां उन्हें वर्मीन कंपोस्ट के बारे में बुनियादी बातों की जानकारी मिली। उन्हें ये जानकारी इतनी रोचक लगी कि उन्होंने ये प्रशिक्षण पूरा करने का तय किया।

इस शुरूआती जानकारी के बाद प्रतीक को इस बात का आश्चर्य हुआ कि उनके भाई की डेयरी में गाय का गोबर और गौ मूत्र तो बर्बाद ही चला जाता है जबकि इनका बेहतरीन इस्तेमाल कंपोस्ट बनाने के लिए किया जा सकता है। उन्होंने इज्जतनगर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र जाना जारी रखा और अपने हाथों से कंपोस्ट बनाने की विधि सिखने लगे।

छह महीने के बाद प्रतीक ने अपने अभिभावकों से सीए की पढ़ाई छोड़ने और वर्मीन कंपोस्ट बनाने की अपनी इच्छा जताई। आश्चर्य की बात नहीं थी कि उनके पिता ने उनकी इस इच्छा को स्वीकार नहीं किया। लेकिन प्रतीक ने जब पहली बार वर्मीन कंपोस्ट बनाया और उसको बेचा तब उनके पिता को अपने बेटे की इस जुनून को स्वीकार करना ही पड़ा।

प्रतीक अपने इस फैसले के बारे में कहते हैं, “मैं दस घंटे की पढ़ाई करके सीए तो बना जाता लेकिन उसमें मुझे खुशी नहीं मिलती। यहां मैं अपनी इकाई में खुशी-खुशी 24 घंटे काम करता हूं और काम से ब्रेक भी नहीं लेता। आपको जीवन में एक जुनून पैदा करना पड़ता है और अगर आप उस जुनून को ही अपना कैरियर बना लेते हैं तब आपका काम आपको आनंद देता है”।

प्रतीक के इस नए जुनून पर परिवार की सहमति मिलने के बाद परधोली गांव में उन्होंने सात बीघे जमीन खरीदी और जून 2015 में उन्होंने वर्मीनकंपोस्ट की अपनी इकाई की शुरूआत की। तब से लेकर अब तक उन्होंने पीछे मुढ़ कर नहीं देखा। अपने इस काम को शुरू करने वक्त प्रतीक के दिल में देश की अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या को हल करने के साथ साथ किसानों की मदद करने का जज्बा था।

उन्होंने कंपोस्ट निर्माण की तकनीक के साथ ढेरों प्रयोग किए और मंदिरों से निकलने वाले फुलों के कचरे, सब्जियों के थोक बाजार से निकलने वाले कचरे या चीनी मिल से निकलने वाले कचरों का अपने कंपोस्ट निर्माण के लिए इस्तेमाल किया। अपने वर्मीन कंपोस्ट में उन्होंने रोग प्रतिरोधक गुणों से युक्त नीम लेपन भी किया।

जल्द ही प्रतीक ने कुछ और जमीन खरीदा और अपने बनाए वर्मीन कंपोस्ट, मैन्योर और रासायन मुक्त कीटनाशकों की मदद से जैविक खेती की शुरूआत की। अपने इस खेती के दौरान उन्होंने पाया कि अगर कुछ निश्चित मात्रा में गौ मूत्र और नीम का इस्तेमाल किया जाए तो उत्पादन को प्रभावित किए बगैर खेतों के कंपोस्ट की जरूरत आधी रह जाती है।

यही नहीं इस प्रक्रिया से खेतों में कीड़ों और कीटों का हमला भी कम तुलनात्मक रूप से कम हो जाता है जिससे उपज की गुणवत्ता ज्यादा बेहतर हो पाती है। अपने परीक्षण में उन्होंने ये भी पाया कि इस कंपोस्ट का इस्तेमाल करने पर जमीन अधिक उपजाऊ होती है।यही नहीं प्रतीक किसानों को वर्मीन कंपोस्ट का प्रशिक्षण भी मुफ्त उपलब्ध कराते हैं।

प्रतीक का दावा है कि रासायनिक उर्वरकों में प्रति एकड़ किसानों को 4500 रुपये खर्च करने पड़ते हैं जबकि उनके जैविक खाद और कंपोस्ट खेतों को इतना उपजाऊ बना देते हैं कि किसानों को यूरिया या अन्य रासायनिक खाद या कीटनाशक कभी खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

किसानों को कंपोस्ट और जैविक खाद बनाने में प्रति एकड़ सिर्फ 1000 रूपये खर्च करने पड़ते हैं जिससे अंतत उनकी आमदनी में ही इजाफा होता है। इससे भी बड़ी बात ये कि जैविक रूप से उपजाए उत्पाद की बाजार में उंची कीमत मिलती है। प्रतीक कहते हैं, “मैं अपने जैविक गेंहू की फसल को सामान्य गेंहू की तुलना में दुगुनी कीमत पर बाजार में बेचता हूं। इससे एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट है कि अगर आप जैविक रूप से उपजाते हैं तो आपकी लागत तो न्यूनतम होगी ही आपको मुनाफा अधिकतम होगा”।

बाइस वर्षीय प्रतीक अब अपने नोएडा, गाजियाबाद, बरेली, शाहजहांपुर और उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के इसी तरह के कई अन्य शहरों में स्थित बड़े बड़े नर्सरी को अपने कंपोस्ट बेचते हैं। आस पास के शहरों में वो घर-घर जाकर भी अपने कंपोस्ट की ‘ये लो खाद’ ब्रांड नाम से बिक्री करते हैं।वर्मी कंपोस्ट की आपूर्ति कर उनकी कंपनी सालाना 12 लाख रुपये की आमदनी हासिल कर रही है।

कंपोस्ट की विधि के बारे में जानने के लिए आप भी प्रतीक बजाज से उनके इस मेल आईडी sehyogibiotech@gmail.com के लिए संपर्क कर सकते हैं।

5 लाख रुपए में शुरू की बिना मिट्टी के खेती, सिर्फ दो साल में कमा लिए 4 करोड़

बहुत से लोग सोचते है खेती घाटे का काम है और बहुत से युवा लोग खेती करने से कतराते है । लेकिन बहुत से ऐसे लोग है जिसने यह धरना को गलत साबित क्या है । चेन्नई के रहने वाले एक शख्स को मिट्टी के बिना खेती का तरीका इतना भाया कि अब उसे अपनी रोजी-रोटी का जरिया बना लिया। इस शख्स ने बिना मिट्टी के खेती करने वाले एक स्टार्ट अप की शुरुआत की और उनका टर्नओवर 2 करोड़ तक पहुंच चुका है। यह शख्स हैं चेन्नई के रहने वाले श्रीराम गोपाल।

श्रीराम गोपाल ने कहा कि 5 साल पहले उनके एक दोस्त ने एक वीडियो दिखाया, जिसमें बिना मिट्टी के खेती का तरीका बताया गया था। मैं इससे काफी प्रभावित हुआ। इस तकनीक में खेत की आवश्यकता नहीं है। बिना मिट्टी के खेती करने वाले इस तरीके का नाम है- हाइड्रोपोनिक्स। इसकी शुरुआत मैंने पिताजी की फैक्टरी से की।

मिट्टी के बिना छत पर खेती

  • हाइड्रोपोनिक्स तकनीक में हर्ब्स बिना मिट्टी की मदद से उगाई जाती हैं। इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है।
  • पौधे एक मल्टी लेयर फ्रेम के सहारे टिके पाइप में उगते हैं और इनकी जड़ें पाइप के अंदर पोषक तत्वों से भरे पानी में छोड़ दी जाती हैं।
  • मिट्टी न होने की वजह से न छतों पर भार बढ़ता है। वहीं बिल्कुल अलग सिस्टम होने की वजह से छत में कोई बदलाव भी नहीं करने पड़ते।

 5 लाख रुपए में शुरू हुआ कारोबार

श्रीराम ने बताया कि उन्होंने सिर्फ 5 लाख रुपए में तीन दोस्तों के साथ मिलकर फ्यूचर फॉर्म्स की शुरुआत की। उनके पिता की पुरानी फैक्ट्री में काफी जगह पड़ी हुई थी। वहां उन्होंने हाइड्रोपोनिक तकनीक से खेती करने की सोची।

उनके पिता की फैक्ट्री में फोटो फिल्म डेवलप करने का काम होता था, लेकिन डिजिटल फोटोग्राफी आने से फैक्ट्री बंद हो गई। यहीं से फ्यूचर फार्म्स की शुरुआत हुई। अब उनकी कंपनी का टर्नओवर 8 करोड़ रुपए सालाना तक पहुंचने की उम्मीद है।

हाइड्रोपोनिक खेती को दे रहे हैं बढ़ावा

श्रीराम कहते हैं कि बिना मिट्टी की खेती में सामान्य खेती के मुकाबले 90 फीसदी कम पानी लगता है। फिलहाल, हमारी कंपनी हाइड्रोपोनिक किट्स बेचती है। किट्स की शुरुआती कीम 999 रुपए से है। एरिया के हिसाब और जरूरत के मुताबिक किट्स की कीमत तय होती है। इस तकनीक को एक एकड़ में लगाने का खर्च 50 लाख रुपए आएगा। वहीं अगर अपने घर में यदि 80 स्क्वॉयर फुट में इस तकनीक को बिठाने का खर्च 40 हजार से 45 हजार रुपए बैठता है। इसमें 160 पौधे लगाए जा सकते हैं।

300 फीसदी सालाना दर से बढ़ा

श्रीराम बताते हैं कि 2015-16 में कंपनी का टर्नओवर सिर्फ 38 लाख रुपए था, लेकिन एक साल में ही यह बढ़कर 2 करोड़ रुपए हो गया। हमारा कारोबार 300 फीसदी सालाना दर से बढ़ रहा है। मौजूदा फाइनेंशियल ईयर के पहले क्वार्टर में टर्नओवर 2 करोड़ रुपए रहा। उम्मीद है इस साल हमारा टर्नओवर 6 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।

ट्रांसपरेंसी मार्केट रिसर्च के मुताबिक, ग्लोबल हाइड्रोपोनिक्स मार्केट 2016 में 693.46 करोड़ डॉलर (45,000 करोड़ रुपए) का है और 2025 में इसके 1,210.65 करोड़ डॉलर (78500 करोड़ रुपए) तक पहुंचने की उम्मीद है।

अब बैलों से खेती करने वाले किसानो के लिए आ गई नई बिजाई मशीन

आप ने ट्रेक्टर के साथ खेत में बिजाई तो बहुत देखी होगी । लेकिन अभी भी बहुत से लोग है जो बैलों से खेती करते है । ऐसे किसान बीज बोने के लिए हाथ से छींटे दे देते है । जिस से फसल अच्छी नहीं होती । ऐसे किसानो के लिए अब बहुत सी कंपनी बिजाई की मशीन बना रही है ।

आज  हम आपको जिस कंपनी की मशीन दिखने वाले है उस कंपनी का नाम है “मौसम एग्रो” । यह कंपनी ट्रेक्टर के साथ चलने वाली बिजाई मशीन तो बनती ही है साथ में जानवरों यानि के बेलों के साथ चलनी वाली बिजाई मशीन भी बनती है ।

इस मशीन में एक बार में 14 किल्लो बीज डाला जा सकता है । यह मशीन 5 कतारों में एक साथ बिजाई करती है ।इसके इलावा धरती एग्रो भी ऐसे ही मशीन बनाते है आप वहां से भी इसकी जानकारी ले सकते है

यह मशीन कैसे काम करती है इसके लिए यह वीडियो देखें



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अब गीली और गिरी हुई फसल को बड़ी आसानी से कटेगी यह कंबाइन

वैसे तो धान की फसल तैयार करना काफी मुश्किल भरा होता है, किसान जी-जान लगा देता है फसल को तैयार करने में, लेकिन इसके बाद भी धान की मड़ाई करना भी काफी मुश्किल भरा काम होता है। खास तोर पर जब फसल बिलकुल त्यार हो और आंधी और बारिश से आप की खड़ी फसल फसल गिर जाये ।लेकिन अब बारिश और आंधी से ख़राब हुई फसल वाले किसानो को घबरने की जरूरत नहीं क्योंकि अब आ गई है हाफ फीड कंबाइन (Head Feed Combine Harvester )

आम कंबाइन से गिरी हुई फसल को काट पाना बहुत ही मुश्किल काम है और फसल का बहुत ही नुकसान होता है । लेकिन इस मशीन के इस्तेमाल करने के बहुत से फायदे है जैसे यह बहुत कम जगह लेता है ।साथ में इस कंबाइन से आप गिरी हुई फसल भी फसल को नुकसान पहुंचाए बिना अच्छे तरीके से काट सकते है ।अगर जमीन गीली भी है तो भी हल्का होने के कारण यह कंबाइन गीली जमीन पर आसानी से चलती है ज़मीन में धस्ती नहीं ।

छोटा होने के कारण हर जगह पर पहुँच जाता है । और इस मिनी कम्बाइन से एक एकड़ काटने में बहुत ही कम खर्च आता है।और इसमें ग्रेन लोस्स मतलब अनाज का नुकसान भी बहुत कम होता है।

इसमें 72 Hp का फ़ोर स्ट्रोक डीजल इंजन लगा हुआ है इस मॉडल का नाम Model – Model- 4L 88 है । सिर्फ धान ही नहीं इस से आप बाकी की अनाज फसलें जैसे गेहूं ,धान सरसों अदि भी काट सकते है ।यह कंबाइन भारतीए सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है और इसके ऊपर सब्सिडी भी उपलब्ध है ।

यह कंबाइन कैसे काम करता है और कैसे गिरी हुई फसल उठा सकता है उसके लिए वीडियो देखें

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Khara Kuva, Railway Station Road, Sojitra, Anand, Gujarat, India – 387240

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Email Address : jashodaagroworks@gmail.com
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राजस्थान के किसानो का इतना कर्जा होगा माफ़

राजस्थान में किसानों ने सरकार को झुकनें पर मजबूर कर दिया. राजस्थान सरकार ने राज्य के किसानों के 50 हजार तक के कर्ज माफी के लिए तैयार हो गई है. 13 दिन,13 घंटे के आंदोलन के बाद सरकार से अपनी 11 मांगों पर सहमति के बाद किसानों ने आधी रात को आन्दोलन खत्म किया.

11 मांगों को लेकर बनी सहमति

किसानों और सरकार के बीच 11 मांगों को लेकर बुधवार देर रात सहमति बनी. तीन दिन के चक्का जाम के बाद मंत्री समूह और किसान नेताओं के बीच जयपुर में हुई वार्ता में मंत्रियों ने रात करीब 12.30 बजे कर्ज माफी सहित 11 मांगों पर सहमति जताई.

गठित की जाएगी कमेटी

50 हजार रुपए तक का कर्ज माफ करने के निर्णय के लिए अन्य राज्यों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया का अध्ययन के लिए कमेटी गठित की जाएगी. यह कमेटी एक महीने में रिपोर्ट पेश करेगी.

चक्काजाम हुआ खत्म

मांगों पर सरकार से सहमति बनने के बाद किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमराराम ने रात 12.50 बजे किसान कमेटियों से चक्का जाम खोलने का आह्वान किया. आंदोलन खत्म करने की घोषणा अमराराम साढ़े दस बजे सभा स्थल पर जाकर सीकर में की. इस बीच किसानों और पुलिस ने भी रोडसे बेरिकेड्स हटा लिए. इसके अलावा जिले सहित प्रदेशभर में हाईवे से किसानों ने चक्काजाम हटाना शुरू कर दिया. इसी के साथ 13 दिन से चल रहे किसान आंदोलन का भी समापन हो गया.

1 सिंतबर को हुआ था शुरु

उल्लेखनीय है कि कर्ज माफी सहित विभिन्न मागों को लेकर अखिल भारतीय किसान सभा द्वारा कृषि उपज मंडी में एक सितंबर को महापड़ाव शुरू किया गया था. किसानों के साथ दोपहर बुधवार 1.15 बजे से लेकर रात करीब 12.30 बजे तक वार्ता के चार दौर चले.

हरियाणा में इस कीमत पर बिक रहा है बासमती 1509 धान

हरियाणा की निसिंग मंडी में किसानों का बासमती किस्म का 1509 धान पहुंचे रहा है। मंगलवार को मंडी मे धान की आवक एक हजार क्विंटल तक पहुंच गई है। व्यापारियों द्वारा जिसे 2200 रुपए प्रति क्विंटल से लेकर 2310 तक खरीद किया जा रहा है।

पूर्व मंडी प्रधान धर्मपाल सिंगला लाला रतन लाल गोयल ने बताया कि श्राद्ध पक्ष के चलते अधिकतर व्यापारियों ने मंडी में धान की खरीद शुरू नहीं की है। इस कारण मंडी में गिने चुने व्यापारी ही धान की खरीद कर रहे हैं।

इस बार पंजाब में बासमती की खेती बहुत कम क्षेत्र में हुई है । तो मांग ज्यादा होने के कारण और पूर्ति कम होने के कारण इस बार बासमती के बढ़ने के अनुमान है ।

लेकिन इस बार एक समस्या यह है के भारत के बासमती चावल निर्यात को प्रतिस्पर्धा में पाकिस्तान से नुकसान झेलना पड़ सकता है क्योंकि ईरान ने अपना इंपोर्ट प्राइस 850 डॉलर प्रति टन फिक्स कर दिया है, जो ज्यादा ढुलाई लागत के कारण इंडियन सप्लायर्स के लिए व्यावहारिक नहीं है।

ईरान बासमती के इंपोर्ट के लिए दोबारा परमिट जारी करने वाला है, लेकिन भारतीय व्यापारी और अधिकारी इसको लेकर चिंतित हैं। गौरतलब है कि ईरान भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा आयातक देश है।

 

अब भारत की देसी गाय भी देंगी एक दिन में 80 लीटर दूध

पशुपालन के क्षेत्र में सरकार को एक बड़ी कामयाबी मिली है। अब तक भारतीय पशुपालक का देसी नस्ल की गायों की ओर रूझान इसलिए कम था कि उनकी दूध उत्पादन क्षमता कम थी।

सरकार ने पशुपालकों की समस्या को समझा और भारतीय नस्ल की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए अनेक कदम उठाएं हैं। इसी के अंतर्गत, देसी गायों की नस्ल सुधार के लिए अब सॉटेंड सेक्सड सीमन तकनीक का उपयोग मध्यप्रदेश में किया जाएगा।

इससे जहां दुधारू गाय की नस्ल में सुधार होगा तो वहीं उसका दूध उत्पादन भी बढ़ेगा।जिस से आप की देसी गाय भी 80 लीटर तक दूध दे सकेगी । देसी नस्ल की गायों में इस तकनीक के प्रयोग से केंद्र सरकार मादा अथवा नर बछड़े पैदा करने को लेकर अनुसंधान (रिसर्च) करवा रही है।

इसी क्रम में, मध्यप्रदेश में ज्यादा दूध देने वाली गायों की संख्या बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम ने ब्राजील से गिर और जर्सी नस्ल के सांडों के आठ हजार सीमन डोज मंगवाए हैं।

पशुपालन विभाग की माने तो ब्राजील में गिर और जर्सी नस्ल की गाय 35-40 लीटर दूध एक समय में देती है। जबकि भारत में इन नस्लों की गायों से एक समय में अधिकतम पांच लीटर दूध ही मिलता है। राज्यों की गायों में दुग्ध उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के लिए गिर और जर्सी नस्ल की सांड के आठ हजार सीमन डोज ब्राजील से मंगवाए हैं।

सरकार द्वारा ब्राजील नस्ल के सांड का सीमन सैंपल लेकर उसे देसी गाय में प्रत्यारोपित कराया गया है, जिसके बहुत अच्छे परिणाम आ रहे हैं। अब यह गाय प्रतिदिन एक समय में अधिकतम 40 लीटर दूध देगी। इस कार्यक्रम का लक्ष्य 2022 तक किसान की आमदनी को दुगुना करना है।

पशुपालन विभाग के डॉक्टरों की माने तो सीमन से अधिक पशुओं का गर्भाधान कराया जा सकता है। इसकी लागत भी अधिक नहीं आती है। यही कारण है कि सरकार ने सीमन लाने का फैसला किया है।

इस सीमन का उपयोग पशु चिकित्सालयों और कृत्रिम गर्भाधान क्लीनिकों द्वारा अधिक दूध देने वाली अच्छी गायों के गर्भाशय में स्थापित कर भ्रूण तैयार किए जाएंगे ताकि गायों में नस्ल सुधार किया जा सके। इसके बाद इन भ्रूणों को सामान्य गाय के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाएंगा। इससे गाय में नस्ल सुधार के साथ-साथ दूध उत्पादन भी बढ़ेगा।

 

 

एक लाख रु से शुरू की नर्सरी, पौध बेच कर अब कमा रहा है 3 करोड़

खेती इतनी भी बुरी नहीं है कि जितना इसका नाम खराब कर दिया है। दरअसल, जो भी व्यक्ति थोड़ी बहुत समझ बूझ से और धैर्य से खेती करे, तो हरियाणा के हरबीर सिंह की तरह करोड़ों में कमाई कर सकता है।

हरियाणा में खेती से मुनाफा कमाना चौखी कमाई का जरिया बनता जा रहा है। हम आपको कुरुक्षेत्र जिले के एक ऐसे ही किसान से रूबरू करा रहे हैं, जो महज कुछ एकड़ में खेती कर सालाना करोड़ों रुपए की कमाई कर रहा है।

हम बात कर रहे हैं कुरुक्षेत्र जिले के गांव शाहाबाद में रहने वाले किसान हरबीर सिंह की। हरबीर ने मास्टर डिग्री लेने के बाद नौकरी नहीं की और खेती में ज्यादा रूचि दिखाई। इसी का नतीजा है कि आज वे करोड़पति किसान हैं।

 

2005 में हरबीर ने सिर्फ 2 कनाल क्षेत्र (जमीन का एकड़ से भी छोटा हिस्सा) में 1 लाख रूपए की लागत से सब्जियों की नर्सरी लगाई। इससे उन्हें अच्छा-खासा फायदा होने लगा। उन्होंने इसके बाद और जमीन खरीदी। अब 2015 में 11 एकड़ खेत में हरबीर सिंह की नर्सरी है, जिससे सालाना लगभग 3 करोड़ का लाभ होता है।

हरबीर सिंह के मुताबिक उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से खेती शुरु की थी।उन्होंने टमाटर, गोभी, हरी मिर्च, प्याज, शिमला मिर्च, बैंगन सहित अन्य पौध तैयार की।पौध अच्छी निकली तो यूपी, हिमाचल, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों के किसान पौध खरीदने के लिए आने लगे।

अब उनकी मिर्च की पौध इटली जाती है। पिछले दो साल से लगभग 20 हजार पौधे इटली भेजते हैं।उन्होंने अपनी नर्सरी को बिल्कुल हाईटेक बना दिया है। उनका दावा है कि उनकी 16 एकड़ की नर्सरी में एक भी पौधा बीमारी वाला नहीं है। पौध की कीमत 45 पै. प्रति पौधा से लेकर 1.50 पै. प्रति पौधा वैरायटी के साथ तय की गई है।

इंटरनेशनल बी-रिसर्च एसोसिएशन के वो सदस्य भी हैं। साल 2004 में एसोसिएशन की ओर से हरबीर सिंह इंग्लैंड दौरे पर गए थे। नर्सरी के अलावा बहरबीर ने साल 1996 में 5 बॉक्स से मुधमक्खी पालन का काम शुरू किया था। अब वो 470 बॉक्स मधुमक्खी पालन करते हैं।

एडवांस बुकिंग पर ही मिलती है पौध

क्षेत्र में हरबीर की नर्सरी बहुत मशहूर है। यही वजह है कि एडवांस बुकिंग के बिना हरबीर की नर्सरी से तुरंत पौधा मिल पाना बहुत मुश्किल है। पौध को खरीदने से पहले कम से कम 3 दिन पहले एडवांस बुक करवाना पड़ता है।

3 दिन के बाद ही पौध मिल पाता है। इस वजह से हरबीर सिंह के फार्म हाउस पर लोगों की भीड़ लगी रहती है। लेकिन इसी वजह से उनको करोड़ों की कमाई भी होती है।

हरबीर सिंह ने बताया कि इस बार उन्होंने ताइवान से पपीते का बीज मंगाया और यहां 50 हजार पौधे तैयार किए हैं। इन पौधों को वे खुद भी एक एकड़ में लगाएंगे, ताकि पौध लेने आने वाले किसानों को सैंपल दिखा सकें।  इसके अलावा इस महीने के अंत में गोभी की पौध भी तैयार करेंगे। उन्होंने बताया कि मुख्य सीजन अक्टूबर से मार्च तक होता है।

सैंकड़ों लोगों को दे रहे रोजगार

हरबीर सिंह की नर्सरी में एक-दो नहीं बल्कि 121 महिला- पुरूष काम पर लगे हुए हैं। पिछले साल उन्होंने 4 करोड़ पौध बेचे थे, जबकि इस बार ये लक्ष्य 10 करोड़ पौधे बेचने का है।