इसे नवंबर में बाेया जाता है और अप्रैल में इसकी कंबाइन से कटाई करते हैं

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के करनाल स्थित रीजनल सेंटर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र लाठर के अनुसार हरियाणा चना नंबर 5 (HC-5) किसानों के लिए वरदान बन सकता है। इसे गेहूं की तरह ही नवंबर में बाेया जाता है और अप्रैल के प्रथम सप्ताह में इसकी कंबाइन से कटाई कर सकते हैं। क्योंकि चने की फसल की लंबाई गेहूं की फसल की तरह होती है।

ऐसे में कंबाइन से कटाई में किसी तरह की दिक्कत नहीं होती। वैज्ञानिक के अनुसार नवंबर में बिजाई के दौरान प्रति एकड़ 20 किलोग्राम बीज की दरकार होती है। उत्पादन 9 से 10 क्विंटल तक होता है। चना 4500 से 5000 रुपए प्रति क्विंटल बाजार में आसानी से बिक जाता है। 100 चनों का वजन 16 ग्राम होता है। लंबाई गेहूं की फसल की तरह 85 सेंटीमीटर तक होती है।

परंपरागतखेती करने के वाले किसानों को कुछ अलग करने की जरुरत है, नहीं तो खेती घाटे का सौदा बनकर रह जाएगी। करनाल जिला के रंबा गांव में किसान ने 15 एकड़ में चने की फसल उगाई है। वे कंबाइन से चने की कटाई कराएंगे। चने की फसल लेते ही वे समर मूंग उगाएंगे। पंजाब के कपूरथला के किसानों का कहना है कि वे चने की बिजाई से खेत में खाद डालने की जरुरत नहीं पड़ती। यही नहीं जमीन की उपजाऊ शक्ति भी बेहतर बनी रहती है।

उत्पादन भी बेहतर मिलता है और बाजार में मांग के अनुसार ही वे चना उगा रहे हैं। कई ग्राहक तो ऐसे हैं जो खेत से ही चना खरीदकर ले जाते हैं। किसान का कहना है कि परंपरागत खेती करते रहे तो एक दिन खेती छोड़ने को मजबूर होना पड़ सकता है। इसलिए हर किसान को कुछ अलग करने की जरुरत है। यदि यह भी हो तो कम से कम दलहनी खेती कर भी खासा मुनाफा लिया जा सकता है।

रंबा गांव के प्रगतिशील किसान रघबिंद्र सिंह के अनुसार उन्होंने पहली बार 15 एकड़ में चना उगाया है। फसल बहुत अच्छी है। कुछ व्यापारी इसे कच्चा ही खरीदने आए थे, लेकिन उन्होंने नहीं दिया। चने में सबसे खास बात यह है कि इसकी ब्रांच नीचे की ओर नहीं होती। गेहूं की फसल की तरह कंबाइन इसे काट सकती है। कंबाइन सिस्टम में बदलाव की जरुरत नहीं।

जाने प्रतीक की सफलता की पूरी कहानी

कई बार किस्मत ऐसे रंग दिखाती है इंसान को खुद भी यकीन नहीं होता ऐसा ही कुश हुआ उन्नीस वर्षीय प्रतीक के साथ । उत्तर प्रदेश स्थित बरेली के एक प्रॉपर्टी डीलर का बेटा प्रतीक बजाज, चार्टड अकाउंटेट बनकर अपने पिता के व्यापार में हाथ बंटाने के रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे लेकिन नियति ने उनके लिए कोई और रास्ता चुना था।

साल 2015 की बात है प्रतीक न केवल अपनी पढ़ाई में अच्छा कर रहे थे बल्कि सीपीटी परीक्षा पास कर सीए में जाने की तैयारी भी कर रहे थे। हाल ही डेयरी फार्म की शुरूआत करने वाले उनके बड़े भाई इससे जुड़े प्रशिक्षण के लिए इज्जतनगर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र जा रहे थे। प्रतीक उस वक्त खाली थे लिहाजा प्रशिक्षण के लिए जा रहे अपने बड़े भाई के साथ वह भी हो लिए जहां उन्हें वर्मीन कंपोस्ट के बारे में बुनियादी बातों की जानकारी मिली। उन्हें ये जानकारी इतनी रोचक लगी कि उन्होंने ये प्रशिक्षण पूरा करने का तय किया।

इस शुरूआती जानकारी के बाद प्रतीक को इस बात का आश्चर्य हुआ कि उनके भाई की डेयरी में गाय का गोबर और गौ मूत्र तो बर्बाद ही चला जाता है जबकि इनका बेहतरीन इस्तेमाल कंपोस्ट बनाने के लिए किया जा सकता है। उन्होंने इज्जतनगर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र जाना जारी रखा और अपने हाथों से कंपोस्ट बनाने की विधि सिखने लगे।

छह महीने के बाद प्रतीक ने अपने अभिभावकों से सीए की पढ़ाई छोड़ने और वर्मीन कंपोस्ट बनाने की अपनी इच्छा जताई। आश्चर्य की बात नहीं थी कि उनके पिता ने उनकी इस इच्छा को स्वीकार नहीं किया। लेकिन प्रतीक ने जब पहली बार वर्मीन कंपोस्ट बनाया और उसको बेचा तब उनके पिता को अपने बेटे की इस जुनून को स्वीकार करना ही पड़ा।

प्रतीक अपने इस फैसले के बारे में कहते हैं, “मैं दस घंटे की पढ़ाई करके सीए तो बना जाता लेकिन उसमें मुझे खुशी नहीं मिलती। यहां मैं अपनी इकाई में खुशी-खुशी 24 घंटे काम करता हूं और काम से ब्रेक भी नहीं लेता। आपको जीवन में एक जुनून पैदा करना पड़ता है और अगर आप उस जुनून को ही अपना कैरियर बना लेते हैं तब आपका काम आपको आनंद देता है”।

प्रतीक के इस नए जुनून पर परिवार की सहमति मिलने के बाद परधोली गांव में उन्होंने सात बीघे जमीन खरीदी और जून 2015 में उन्होंने वर्मीनकंपोस्ट की अपनी इकाई की शुरूआत की। तब से लेकर अब तक उन्होंने पीछे मुढ़ कर नहीं देखा। अपने इस काम को शुरू करने वक्त प्रतीक के दिल में देश की अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या को हल करने के साथ साथ किसानों की मदद करने का जज्बा था।

उन्होंने कंपोस्ट निर्माण की तकनीक के साथ ढेरों प्रयोग किए और मंदिरों से निकलने वाले फुलों के कचरे, सब्जियों के थोक बाजार से निकलने वाले कचरे या चीनी मिल से निकलने वाले कचरों का अपने कंपोस्ट निर्माण के लिए इस्तेमाल किया। अपने वर्मीन कंपोस्ट में उन्होंने रोग प्रतिरोधक गुणों से युक्त नीम लेपन भी किया।

जल्द ही प्रतीक ने कुछ और जमीन खरीदा और अपने बनाए वर्मीन कंपोस्ट, मैन्योर और रासायन मुक्त कीटनाशकों की मदद से जैविक खेती की शुरूआत की। अपने इस खेती के दौरान उन्होंने पाया कि अगर कुछ निश्चित मात्रा में गौ मूत्र और नीम का इस्तेमाल किया जाए तो उत्पादन को प्रभावित किए बगैर खेतों के कंपोस्ट की जरूरत आधी रह जाती है।

यही नहीं इस प्रक्रिया से खेतों में कीड़ों और कीटों का हमला भी कम तुलनात्मक रूप से कम हो जाता है जिससे उपज की गुणवत्ता ज्यादा बेहतर हो पाती है। अपने परीक्षण में उन्होंने ये भी पाया कि इस कंपोस्ट का इस्तेमाल करने पर जमीन अधिक उपजाऊ होती है।यही नहीं प्रतीक किसानों को वर्मीन कंपोस्ट का प्रशिक्षण भी मुफ्त उपलब्ध कराते हैं।

प्रतीक का दावा है कि रासायनिक उर्वरकों में प्रति एकड़ किसानों को 4500 रुपये खर्च करने पड़ते हैं जबकि उनके जैविक खाद और कंपोस्ट खेतों को इतना उपजाऊ बना देते हैं कि किसानों को यूरिया या अन्य रासायनिक खाद या कीटनाशक कभी खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

किसानों को कंपोस्ट और जैविक खाद बनाने में प्रति एकड़ सिर्फ 1000 रूपये खर्च करने पड़ते हैं जिससे अंतत उनकी आमदनी में ही इजाफा होता है। इससे भी बड़ी बात ये कि जैविक रूप से उपजाए उत्पाद की बाजार में उंची कीमत मिलती है। प्रतीक कहते हैं, “मैं अपने जैविक गेंहू की फसल को सामान्य गेंहू की तुलना में दुगुनी कीमत पर बाजार में बेचता हूं। इससे एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट है कि अगर आप जैविक रूप से उपजाते हैं तो आपकी लागत तो न्यूनतम होगी ही आपको मुनाफा अधिकतम होगा”।

बाइस वर्षीय प्रतीक अब अपने नोएडा, गाजियाबाद, बरेली, शाहजहांपुर और उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के इसी तरह के कई अन्य शहरों में स्थित बड़े बड़े नर्सरी को अपने कंपोस्ट बेचते हैं। आस पास के शहरों में वो घर-घर जाकर भी अपने कंपोस्ट की ‘ये लो खाद’ ब्रांड नाम से बिक्री करते हैं।वर्मी कंपोस्ट की आपूर्ति कर उनकी कंपनी सालाना 12 लाख रुपये की आमदनी हासिल कर रही है।

कंपोस्ट की विधि के बारे में जानने के लिए आप भी प्रतीक बजाज से उनके इस मेल आईडी sehyogibiotech@gmail.com के लिए संपर्क कर सकते हैं।

5 लाख रुपए में शुरू की बिना मिट्टी के खेती, सिर्फ दो साल में कमा लिए 4 करोड़

बहुत से लोग सोचते है खेती घाटे का काम है और बहुत से युवा लोग खेती करने से कतराते है । लेकिन बहुत से ऐसे लोग है जिसने यह धरना को गलत साबित क्या है । चेन्नई के रहने वाले एक शख्स को मिट्टी के बिना खेती का तरीका इतना भाया कि अब उसे अपनी रोजी-रोटी का जरिया बना लिया। इस शख्स ने बिना मिट्टी के खेती करने वाले एक स्टार्ट अप की शुरुआत की और उनका टर्नओवर 2 करोड़ तक पहुंच चुका है। यह शख्स हैं चेन्नई के रहने वाले श्रीराम गोपाल।

श्रीराम गोपाल ने कहा कि 5 साल पहले उनके एक दोस्त ने एक वीडियो दिखाया, जिसमें बिना मिट्टी के खेती का तरीका बताया गया था। मैं इससे काफी प्रभावित हुआ। इस तकनीक में खेत की आवश्यकता नहीं है। बिना मिट्टी के खेती करने वाले इस तरीके का नाम है- हाइड्रोपोनिक्स। इसकी शुरुआत मैंने पिताजी की फैक्टरी से की।

मिट्टी के बिना छत पर खेती

  • हाइड्रोपोनिक्स तकनीक में हर्ब्स बिना मिट्टी की मदद से उगाई जाती हैं। इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है।
  • पौधे एक मल्टी लेयर फ्रेम के सहारे टिके पाइप में उगते हैं और इनकी जड़ें पाइप के अंदर पोषक तत्वों से भरे पानी में छोड़ दी जाती हैं।
  • मिट्टी न होने की वजह से न छतों पर भार बढ़ता है। वहीं बिल्कुल अलग सिस्टम होने की वजह से छत में कोई बदलाव भी नहीं करने पड़ते।

 5 लाख रुपए में शुरू हुआ कारोबार

श्रीराम ने बताया कि उन्होंने सिर्फ 5 लाख रुपए में तीन दोस्तों के साथ मिलकर फ्यूचर फॉर्म्स की शुरुआत की। उनके पिता की पुरानी फैक्ट्री में काफी जगह पड़ी हुई थी। वहां उन्होंने हाइड्रोपोनिक तकनीक से खेती करने की सोची।

उनके पिता की फैक्ट्री में फोटो फिल्म डेवलप करने का काम होता था, लेकिन डिजिटल फोटोग्राफी आने से फैक्ट्री बंद हो गई। यहीं से फ्यूचर फार्म्स की शुरुआत हुई। अब उनकी कंपनी का टर्नओवर 8 करोड़ रुपए सालाना तक पहुंचने की उम्मीद है।

हाइड्रोपोनिक खेती को दे रहे हैं बढ़ावा

श्रीराम कहते हैं कि बिना मिट्टी की खेती में सामान्य खेती के मुकाबले 90 फीसदी कम पानी लगता है। फिलहाल, हमारी कंपनी हाइड्रोपोनिक किट्स बेचती है। किट्स की शुरुआती कीम 999 रुपए से है। एरिया के हिसाब और जरूरत के मुताबिक किट्स की कीमत तय होती है। इस तकनीक को एक एकड़ में लगाने का खर्च 50 लाख रुपए आएगा। वहीं अगर अपने घर में यदि 80 स्क्वॉयर फुट में इस तकनीक को बिठाने का खर्च 40 हजार से 45 हजार रुपए बैठता है। इसमें 160 पौधे लगाए जा सकते हैं।

300 फीसदी सालाना दर से बढ़ा

श्रीराम बताते हैं कि 2015-16 में कंपनी का टर्नओवर सिर्फ 38 लाख रुपए था, लेकिन एक साल में ही यह बढ़कर 2 करोड़ रुपए हो गया। हमारा कारोबार 300 फीसदी सालाना दर से बढ़ रहा है। मौजूदा फाइनेंशियल ईयर के पहले क्वार्टर में टर्नओवर 2 करोड़ रुपए रहा। उम्मीद है इस साल हमारा टर्नओवर 6 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।

ट्रांसपरेंसी मार्केट रिसर्च के मुताबिक, ग्लोबल हाइड्रोपोनिक्स मार्केट 2016 में 693.46 करोड़ डॉलर (45,000 करोड़ रुपए) का है और 2025 में इसके 1,210.65 करोड़ डॉलर (78500 करोड़ रुपए) तक पहुंचने की उम्मीद है।

राजस्थान के किसानो का इतना कर्जा होगा माफ़

राजस्थान में किसानों ने सरकार को झुकनें पर मजबूर कर दिया. राजस्थान सरकार ने राज्य के किसानों के 50 हजार तक के कर्ज माफी के लिए तैयार हो गई है. 13 दिन,13 घंटे के आंदोलन के बाद सरकार से अपनी 11 मांगों पर सहमति के बाद किसानों ने आधी रात को आन्दोलन खत्म किया.

11 मांगों को लेकर बनी सहमति

किसानों और सरकार के बीच 11 मांगों को लेकर बुधवार देर रात सहमति बनी. तीन दिन के चक्का जाम के बाद मंत्री समूह और किसान नेताओं के बीच जयपुर में हुई वार्ता में मंत्रियों ने रात करीब 12.30 बजे कर्ज माफी सहित 11 मांगों पर सहमति जताई.

गठित की जाएगी कमेटी

50 हजार रुपए तक का कर्ज माफ करने के निर्णय के लिए अन्य राज्यों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया का अध्ययन के लिए कमेटी गठित की जाएगी. यह कमेटी एक महीने में रिपोर्ट पेश करेगी.

चक्काजाम हुआ खत्म

मांगों पर सरकार से सहमति बनने के बाद किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमराराम ने रात 12.50 बजे किसान कमेटियों से चक्का जाम खोलने का आह्वान किया. आंदोलन खत्म करने की घोषणा अमराराम साढ़े दस बजे सभा स्थल पर जाकर सीकर में की. इस बीच किसानों और पुलिस ने भी रोडसे बेरिकेड्स हटा लिए. इसके अलावा जिले सहित प्रदेशभर में हाईवे से किसानों ने चक्काजाम हटाना शुरू कर दिया. इसी के साथ 13 दिन से चल रहे किसान आंदोलन का भी समापन हो गया.

1 सिंतबर को हुआ था शुरु

उल्लेखनीय है कि कर्ज माफी सहित विभिन्न मागों को लेकर अखिल भारतीय किसान सभा द्वारा कृषि उपज मंडी में एक सितंबर को महापड़ाव शुरू किया गया था. किसानों के साथ दोपहर बुधवार 1.15 बजे से लेकर रात करीब 12.30 बजे तक वार्ता के चार दौर चले.

हरियाणा में इस कीमत पर बिक रहा है बासमती 1509 धान

हरियाणा की निसिंग मंडी में किसानों का बासमती किस्म का 1509 धान पहुंचे रहा है। मंगलवार को मंडी मे धान की आवक एक हजार क्विंटल तक पहुंच गई है। व्यापारियों द्वारा जिसे 2200 रुपए प्रति क्विंटल से लेकर 2310 तक खरीद किया जा रहा है।

पूर्व मंडी प्रधान धर्मपाल सिंगला लाला रतन लाल गोयल ने बताया कि श्राद्ध पक्ष के चलते अधिकतर व्यापारियों ने मंडी में धान की खरीद शुरू नहीं की है। इस कारण मंडी में गिने चुने व्यापारी ही धान की खरीद कर रहे हैं।

इस बार पंजाब में बासमती की खेती बहुत कम क्षेत्र में हुई है । तो मांग ज्यादा होने के कारण और पूर्ति कम होने के कारण इस बार बासमती के बढ़ने के अनुमान है ।

लेकिन इस बार एक समस्या यह है के भारत के बासमती चावल निर्यात को प्रतिस्पर्धा में पाकिस्तान से नुकसान झेलना पड़ सकता है क्योंकि ईरान ने अपना इंपोर्ट प्राइस 850 डॉलर प्रति टन फिक्स कर दिया है, जो ज्यादा ढुलाई लागत के कारण इंडियन सप्लायर्स के लिए व्यावहारिक नहीं है।

ईरान बासमती के इंपोर्ट के लिए दोबारा परमिट जारी करने वाला है, लेकिन भारतीय व्यापारी और अधिकारी इसको लेकर चिंतित हैं। गौरतलब है कि ईरान भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा आयातक देश है।

 

अब भारत की देसी गाय भी देंगी एक दिन में 80 लीटर दूध

पशुपालन के क्षेत्र में सरकार को एक बड़ी कामयाबी मिली है। अब तक भारतीय पशुपालक का देसी नस्ल की गायों की ओर रूझान इसलिए कम था कि उनकी दूध उत्पादन क्षमता कम थी।

सरकार ने पशुपालकों की समस्या को समझा और भारतीय नस्ल की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए अनेक कदम उठाएं हैं। इसी के अंतर्गत, देसी गायों की नस्ल सुधार के लिए अब सॉटेंड सेक्सड सीमन तकनीक का उपयोग मध्यप्रदेश में किया जाएगा।

इससे जहां दुधारू गाय की नस्ल में सुधार होगा तो वहीं उसका दूध उत्पादन भी बढ़ेगा।जिस से आप की देसी गाय भी 80 लीटर तक दूध दे सकेगी । देसी नस्ल की गायों में इस तकनीक के प्रयोग से केंद्र सरकार मादा अथवा नर बछड़े पैदा करने को लेकर अनुसंधान (रिसर्च) करवा रही है।

इसी क्रम में, मध्यप्रदेश में ज्यादा दूध देने वाली गायों की संख्या बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम ने ब्राजील से गिर और जर्सी नस्ल के सांडों के आठ हजार सीमन डोज मंगवाए हैं।

पशुपालन विभाग की माने तो ब्राजील में गिर और जर्सी नस्ल की गाय 35-40 लीटर दूध एक समय में देती है। जबकि भारत में इन नस्लों की गायों से एक समय में अधिकतम पांच लीटर दूध ही मिलता है। राज्यों की गायों में दुग्ध उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के लिए गिर और जर्सी नस्ल की सांड के आठ हजार सीमन डोज ब्राजील से मंगवाए हैं।

सरकार द्वारा ब्राजील नस्ल के सांड का सीमन सैंपल लेकर उसे देसी गाय में प्रत्यारोपित कराया गया है, जिसके बहुत अच्छे परिणाम आ रहे हैं। अब यह गाय प्रतिदिन एक समय में अधिकतम 40 लीटर दूध देगी। इस कार्यक्रम का लक्ष्य 2022 तक किसान की आमदनी को दुगुना करना है।

पशुपालन विभाग के डॉक्टरों की माने तो सीमन से अधिक पशुओं का गर्भाधान कराया जा सकता है। इसकी लागत भी अधिक नहीं आती है। यही कारण है कि सरकार ने सीमन लाने का फैसला किया है।

इस सीमन का उपयोग पशु चिकित्सालयों और कृत्रिम गर्भाधान क्लीनिकों द्वारा अधिक दूध देने वाली अच्छी गायों के गर्भाशय में स्थापित कर भ्रूण तैयार किए जाएंगे ताकि गायों में नस्ल सुधार किया जा सके। इसके बाद इन भ्रूणों को सामान्य गाय के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाएंगा। इससे गाय में नस्ल सुधार के साथ-साथ दूध उत्पादन भी बढ़ेगा।

 

 

एक लाख रु से शुरू की नर्सरी, पौध बेच कर अब कमा रहा है 3 करोड़

खेती इतनी भी बुरी नहीं है कि जितना इसका नाम खराब कर दिया है। दरअसल, जो भी व्यक्ति थोड़ी बहुत समझ बूझ से और धैर्य से खेती करे, तो हरियाणा के हरबीर सिंह की तरह करोड़ों में कमाई कर सकता है।

हरियाणा में खेती से मुनाफा कमाना चौखी कमाई का जरिया बनता जा रहा है। हम आपको कुरुक्षेत्र जिले के एक ऐसे ही किसान से रूबरू करा रहे हैं, जो महज कुछ एकड़ में खेती कर सालाना करोड़ों रुपए की कमाई कर रहा है।

हम बात कर रहे हैं कुरुक्षेत्र जिले के गांव शाहाबाद में रहने वाले किसान हरबीर सिंह की। हरबीर ने मास्टर डिग्री लेने के बाद नौकरी नहीं की और खेती में ज्यादा रूचि दिखाई। इसी का नतीजा है कि आज वे करोड़पति किसान हैं।

 

2005 में हरबीर ने सिर्फ 2 कनाल क्षेत्र (जमीन का एकड़ से भी छोटा हिस्सा) में 1 लाख रूपए की लागत से सब्जियों की नर्सरी लगाई। इससे उन्हें अच्छा-खासा फायदा होने लगा। उन्होंने इसके बाद और जमीन खरीदी। अब 2015 में 11 एकड़ खेत में हरबीर सिंह की नर्सरी है, जिससे सालाना लगभग 3 करोड़ का लाभ होता है।

हरबीर सिंह के मुताबिक उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से खेती शुरु की थी।उन्होंने टमाटर, गोभी, हरी मिर्च, प्याज, शिमला मिर्च, बैंगन सहित अन्य पौध तैयार की।पौध अच्छी निकली तो यूपी, हिमाचल, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों के किसान पौध खरीदने के लिए आने लगे।

अब उनकी मिर्च की पौध इटली जाती है। पिछले दो साल से लगभग 20 हजार पौधे इटली भेजते हैं।उन्होंने अपनी नर्सरी को बिल्कुल हाईटेक बना दिया है। उनका दावा है कि उनकी 16 एकड़ की नर्सरी में एक भी पौधा बीमारी वाला नहीं है। पौध की कीमत 45 पै. प्रति पौधा से लेकर 1.50 पै. प्रति पौधा वैरायटी के साथ तय की गई है।

इंटरनेशनल बी-रिसर्च एसोसिएशन के वो सदस्य भी हैं। साल 2004 में एसोसिएशन की ओर से हरबीर सिंह इंग्लैंड दौरे पर गए थे। नर्सरी के अलावा बहरबीर ने साल 1996 में 5 बॉक्स से मुधमक्खी पालन का काम शुरू किया था। अब वो 470 बॉक्स मधुमक्खी पालन करते हैं।

एडवांस बुकिंग पर ही मिलती है पौध

क्षेत्र में हरबीर की नर्सरी बहुत मशहूर है। यही वजह है कि एडवांस बुकिंग के बिना हरबीर की नर्सरी से तुरंत पौधा मिल पाना बहुत मुश्किल है। पौध को खरीदने से पहले कम से कम 3 दिन पहले एडवांस बुक करवाना पड़ता है।

3 दिन के बाद ही पौध मिल पाता है। इस वजह से हरबीर सिंह के फार्म हाउस पर लोगों की भीड़ लगी रहती है। लेकिन इसी वजह से उनको करोड़ों की कमाई भी होती है।

हरबीर सिंह ने बताया कि इस बार उन्होंने ताइवान से पपीते का बीज मंगाया और यहां 50 हजार पौधे तैयार किए हैं। इन पौधों को वे खुद भी एक एकड़ में लगाएंगे, ताकि पौध लेने आने वाले किसानों को सैंपल दिखा सकें।  इसके अलावा इस महीने के अंत में गोभी की पौध भी तैयार करेंगे। उन्होंने बताया कि मुख्य सीजन अक्टूबर से मार्च तक होता है।

सैंकड़ों लोगों को दे रहे रोजगार

हरबीर सिंह की नर्सरी में एक-दो नहीं बल्कि 121 महिला- पुरूष काम पर लगे हुए हैं। पिछले साल उन्होंने 4 करोड़ पौध बेचे थे, जबकि इस बार ये लक्ष्य 10 करोड़ पौधे बेचने का है।

ऐसे बनाएं घर पर साइलेज,पुरे साल के लिए हरे चारे की टेंशन ख़तम

अपने दुधारु पशुओं को पूरे साल हरा चारा उपलब्ध करा पाना पशुपालकों के लिए एक बड़ी चुनोती बनता जा रहा है। ऐसे में पशुपालक घर पर ही साइलेज बनाकर अपने पशुओं को पूरे साल हरा चारा उपलब्ध करा सकते है। इसके लिए सरकारी मदद भी मिलती है।साइलेज से पशुओं के दुग्ध उत्पादन भी अच्छा होता है।इसमें ज्यादा लागत भी नहीं आती है।

शुरुआत में पशु साइलेज ज्यादा नहीं खा पाता है लेकिन बार-बार देने से वह उसे चाव से खाने लगता है। जब चारे की कमी हो तो साइलेज खिलाकर पशुओं का दूध उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। पशु को साइलेज खिलाने के बाद बचे हुए हिस्से को भी हटा देना चाहिए। अगर भूसा दे रहे हो तो उस हिस्से को उस में मिलाकर दें।

अच्छे दुग्ध उत्पादन के लिए दुधारु पशुओं के लिए पौष्टिक दाने और चारे के साथ हरा चारा खिलाना बहुत जरुरी है। हरे चारा पशुओं के अंदर पोषक तत्वों की कमी को पूरा करता है। एक दुधारू पशु जिस का औसत वजन 550 किलोग्राम हो, उसे 25 किलोग्राम की मात्रा में साइलेज खिलाया जा सकता है। भेड़-बकरियों को खिलाई जाने वाली मात्रा 5 किलोग्राम तक रखी जाती है।

साइलेज बनाने के लिए सरकार द्वारा यूरिया ट्रीटमेंट किट और साइलेज बनाने के लिए किट दी जाती है। अगर कोई पशुपालक साइलेज बनाना चाहता है तो उसका प्रशिक्षण भी ले सकता है। साइजेल बनाने लिए कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK Center) में भी प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

पशुपालक इस तरह बना सकते है साइलेज

साइलेज बनाने के लिए जिस भी हरे चारे का इस्तेमाल आप कर रहे हो उसको 2 से 5 सेन्टीमीटर के टुकड़ों में काट कर कुटटी बना लेना चाहिए। ताकि ज्यादा से ज्यादा चारा साइलो पिट में दबा कर भरा जा सके। अब उस कुट्टी किए हुए चारे को दबा-दबा भर दें।

ताकि बरसात का पानी अंदर न जा सके। फिर इसके ऊपर पोलीथीन की शीट बिछाकर ऊपर से 18-20 सेमी मोटी मिट्टी की पर्त बिछा देनी चाहिए। इस परत को गोबर व चिकनी मिट्टी से लीप दिया जाता है और दरारें पड़ जाने पर उन्हें मिट्टी से बन्द करते रहना चाहिए ताकि हवा व पानी गड्ढे में न पहुंच सके।

लगभग 50 से 60 दिनों में यह साइलेज बनकर तैयार हो जाता है। गड्ढे को एक तरफ से खोलकर मिट्टी और पोलोथीन शीट हटाकर आवश्यकतानुसार पशु को खिलाया जा सकता है। साइलेज को निकालकर गड्ढे को फिर से पोलीथीन शीट और मिटटी से ढ़क देना चाहिए और धीरे-धीरे पशुओं केा इसका स्वाद लग जाने पर इसकी मात्रा 20-30 किलो ग्राम पति पशु तक बढ़ायी जा सकती है ।

किन-किन फसलों से बना सकते है साइलेज

साइलेज बनाने के लिए सभी घासों से या जिन फसलों में घुलनशील कार्बोहार्इडे्रटस अधिक मात्रा में होती हैं जैसे ज्वार मक्की, गिन्नी घास नेपियर सिटीरिया आदि से तैयार किया जा सकता है। साइलेज बनाते समय चारे में नमी की मात्रा 55 प्रतिशत तक होनी चाहिए।

साइलेज जिन गड्ढ़ों में भरा जाता है। उन गड्ढ़ों को साइलोपिटस कहते है। गड्ढा (साइलो) ऊंचा होना चाहिए और इसे काफी सख्त बना लेना चाहिए। साइलो के फर्श और दीवारें पक्की बनानी चाहिए और अगर पशुपालक पक्की नहीं कर सकता तो लिपाई भी कर सकता है।

इन बातों को रखें ध्यान

  • साइलेज बनाने के लिए जो यूरिया है उसको साफ पानी में और सही मात्रा के साथ बनाना चाहिए।
  • घोल में यूरिया पूरी तरह से घुल जाना चाहिए।
  • पूरी तरह जब तैयार हो जाए तभी पशुओं को साइलेज खिलाएं।
  • यूरिया के घोल का चारे के ऊपर समान रूप से छिड़काव करना चाहिए।

गरीब किसानो के लिए एटीएम की तरह है बकरी पालन ,बेहद कम निवेश में ऐसे करें शुरुआत

बकरी पालन गरीबों के लिए, यह एक एटीएम की तरह है। इसके लिए बेहद कम निवेश की जरूरत पड़ती है। आप एक नर और मादा बकरी का बच्चा पांच हजार से भी कम में खरीद सकते हैं और शुरुआत कर सकते हैं। इसके लिए आपको एक छोटा और अच्छी तरह से ढंके कमरा की जरूरत पड़ेगी। बकरियां खुले में चर सकती हैं, फसल कटे खेतों में और पेड़ की पत्तियां भी खा सकती हैं।’

एक औसत बकरी एक साल से भी कम समय में दो बच्चे को जन्म देती है और इस तरह बकरी का व्यवसाय चल निकलता है। बकरी को पालने के लिए अलग से किसी आश्रय स्थल की आश्यकता नहीं पड़ती। उन्हें अपने घर पर ही रखते हैं। बड़े पैमाने पर यदि बकरी पालन का कार्य किया जाए, तब उसके लिए अलग से बाड़ा बनाने की आवश्यकता पड़ती है।

यह उल्लेखनीय है कि देशी बकरियों के अलावा यदि बरबरी, जमुनापारी इत्यादि नस्ल की बकरियां होंगी तो उनके लिए दाना, भूसी, चारा की व्यवस्था करनी पड़ती है, पर वह भी सस्ते में हो जाता है। दो से पांच बकरी तक एक परिवार बिना किसी अतिरिक्त व्यवस्था के आसानी से पाल लेता है। घर की महिलाएं बकरी की देख-रेख करती हैं और खाने के बाद बचे जूठन से इनके भूसा की सानी कर दी जाती है। ऊपर से थोड़ा बेझर का दाना मिलाने से इनका खाना स्वादिष्ट हो जाता है। बकरियों के रहने के लिए साफ-सुथरी एवं सूखी जगह की आवश्यकता होती है।

एक सफल किसान की कहानी से जाने बकरी पालन का फ़ायदा

ये कहानी पंजाब के एक किसान की है जो किसी भी दूसरे चरवाहे या गड़ेरिए की तरह सड़क पर चलते हुए दिखते हैं। 32 साल के सुखचैन सिंह दूसरे चरवाहे की तरह दिखते हैं, लेकिन वो इन सबसे अलग हैं जिस तरह पंजाब में अधिकांश चरवाहे हैं।

दो एकड़ जमीन पर बकरी पालन का धंधा करने वाले वो एक छोटे किसान हैं, जिनके पास दो गांवों में बने दो शेड में 70 बकरियों का झुंड है। उनका मानना है कि, बकरियों को संभालना कठिन काम है, लेकिन साथ ही यह भी मानते हैं कि कोई भी धंधा बिना चुनौतियों के नहीं होता है ।

उनका बकरी पालन का धंधा बहुत अच्छी तरह चल रहा है। मोटी-तगड़ी बकरियों से उन्हें अच्छी कमाई हो जाती है। वो बताते हैं,’पिछली बिक्री में चापड़ मंडी में सबसे अच्छी बकरी से मुझे 60 हजार रुपये की कमाई हुई थी। आमतौर पर साधारण बकरियों से औसत कमाई 10 हजार से 35 हजार के बीच होती है, और बकरियों के बच्चे एक हजार से ढाई हजार में बिक जाती हैं। हम बकरियों की दूध की भी 30 से 40 रुपये प्रति लीटर की दर से बिक्री करते हैं।’

सुखचैन ने बतया के जब मैंने काम शुरू किया, तब मैंने बेचे हुए घर के पैसे से बकरियां और भेड़ें खरीदी। जब मेरे पास 105 पशुओं का झुंड हो गया, तब मैंने महसूस किया कि बकरियां और भेड़ें एक साथ अच्छी तरह से नहीं पाली जा सकती हैं, और यह बात मात्रा को लेकर नहीं थी बल्कि गुणवत्ता को लेकर थी। उसके बाद मैंने भेड़ें बेच दी और अच्छी गुणवत्ता वाली बकरियां पालने पर ध्यान केंद्रित किया। इसके लिए बेहतर जानकारी और अनुभव की जरूरत होती है लेकिन बदले में बहुत अच्छा रिटर्न भी मिलता है।’

दूध ही सफलता की चाबी

सुखचैन के मुताबिक, बकरियों से नियमित आमदनी मुख्यतौर पर दूध से होती है। बकरियों से हम रोज दो बार दूध ले सकते हैं, और 70 बकरियों से करीब 50 से 60 लीटर तक दूध रोज हो सकता है। वो इसे गांव के सरकारी संग्रहण केंद्रों पर 30 से 40 रुपये प्रति लीटर की दर से बेच देते हैं। हालांकि यह दूध साल में सिर्फ छह महीने के लिए ही बेचा जाता है, और इससे जो कमाई होती है उसका आधा फिर इसी व्यवसाय में लगा दिया जाता है।

एक बकरी एक साल में औसतन एक से दो बच्चे देती है, उनमे से बचे 50 से 60 बच्चों को बाद में एक से ढाई हजार रुपये में बेच दिया जाता है जिससे अतिरिक्त आमदनी हो जाती है।

खरगोश पालने के शौक ने बदली किस्मत ,अब रेबिट फार्मिंग से सालाना कमाता है 10 लाख रुपये

जींद के संजय कुमार देशभर के पेट शॉप्स में रैबिट सप्लाई करते हैं। उनके इस प्रोफेशन की कामयाब कहानी के पीछे बड़ी दिलचस्प कहानी है। संजय को बचपन से रैबिट पालने का शौक था और घरवाले इससे नाराज थे।

बावजूद इसके उन्होंने अपने शौक को जिंदा रखने के लिए इंटरनेट से जानकारी जुटाने के बाद ट्रेनिंग ली और 9 साल में शौक इतना बड़ा प्रोफेशन बन गया। अपने रैबिट फार्म से संजय कुमार लगभग 10 लाख सालाना कमा रहे हैं।

घरवालों ने कर दिया था पैसे देने से इनकार…

  • शहर के रोहतक रोड बाईपास पर आधा एकड़ जमीन पर बना उनका रैबिट फार्म प्रदेश में सबसे बड़ा रैबिट फार्म है। इन दिनों इस फार्म में 6 नस्लों के 500 से ज्यादा खरगोश हैं।
  • संजय कुमार बताते हैं कि वर्ष 2008 में सिर्फ 100 खरगोश से व्यवसाय शुरू किया था। इसके बाद धीरे-धीरे खरगोशों की संख्या बढ़ाई।
  • दूर-दूर से लोग उनसे रैबिट फार्मिंग के बारे में जानकारी लेने के लिए आते हैं। रैबिट फार्मिंग के इस कारोबार से संजय कुमार को आय भी अच्छी-खासी प्राप्त हो रही है।
  • संजय की मानें तो उनके यहां से हर महीने हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार समेत दूसरी यूनिवर्सिटी में रिसर्च के लिए खरगोश भेजे जाते हैं। वहीं, देश-विदेश के खरगोश पालने का शौक रखने वाले लोग भी यहीं से लेकर जाते हैं।
  • देशभर की पेट शॉप में उनके फार्म से खरगोश की सप्लाई होती है। साथ ही, अपने व्यवसाय के सिद्धांत के बारे में संजय बताते हैं कि वह मीट के लिए रैबिट की सप्लाई नहीं करते।

पहले इंटरनेट से जानकारी ली, फिर ट्रेनिंग

संजय कुमार के मुताबिक, उन्हें बचपन में ही खरगोश पालने का शौक था, लेकिन घरवाले इससे सख्त नाराज थे। बावजूद इसके उन्होंने जिद पाल ली कि वह एक दिन प्रदेश का सबसे बड़ा रैबिट फार्म बनाएंगे। एक-दो बार ऐसा भी हुआ, जब घरवालों ने खरगोश खरीदने के लिए उसे पैसे नहीं दिए तो चोरी-छुपे पैसे निकालकर खरगोश खरीद लाए।

फिर मैट्रिक करने के बाद संजय ने कुछ दिन गुड़गांव में ठेकेदारी की। इसी दौरान उन्होंने गूगल पर रैबिट फार्मिंग की जानकारी ली। इसके बाद वह राजस्थान के अविकानगर में भारत सरकार के ट्रेनिंग सेंटर से एक सप्ताह की ट्रेनिंग लेकर आए। शुरुआत में कर्नाटक से 100 रैबिट अपने फार्म पर रखे।

रैबिट फार्मिंग में देखभाल जरूरी, खर्च काफी कम

  • रैबिट फार्मिंग शुरू करने के इच्छुक किसानों के लिए संजय कुमार का कहना है कि शुरुआत में शेड तैयार करने, खरगोश खरीदने पर पैसा खर्च होता है, लेकिन उसके बाद खर्च काफी कम है।
  • पोल्ट्री व्यवसाय से काफी कम खर्च व कम जोखिम का यह कारोबार है। रैबिट फार्म से न कोई बदबू आती और न ही किसी प्रकार कोई और पॉल्यूशन होता है। बस रैबिट की देखभाल पर ध्यान देना काफी जरूरी है। एक खरगोश के लिए दिनभर में एक मुट्ठी फीड, एक मुट्ठी चारा और दो-तीन कटोरी पानी पीता है।
  • चार महीने में खरगोश दो किलो वजन से ज्यादा का हो जाता है और फिर 350 से लेकर 500 रुपए तक में बिक जाता है। रैबिट फार्मिंग के लिए सरकार द्वारा 25 से 30 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है।

जींद के ही एक और खरगोश पालक राजेश कुमार से जाने खरगोश पालने की जानकारी (वीडियो)