खेतों में 19 फीट का गन्ना उगाता है ये किसान , लेता है 1000 कुंटल तक गन्ने की पैदावार

भारत के किसान हमेशा से ही अपनी फसल को लेकर चिंतित रहते हैं और चिंतित हों भी क्यों न! कभी उनकी फसल बर्बाद हो जाती है तो कभी उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।

खासतौर गन्ना किसान अपनी फसल का उचित मूल्य न मिल पाने के कारण ज्यादा तकलीफ में रहते हैं।  वह हर वक्त यही सोचता रहता है कि काश इस बार की फसल से वो इतना कमा सके कि पिछली फसल के लिए लिया गया कर्ज वापिस कर सके।

लेकिन मुंबई से करीब 400 किलोमीटर दूर सांगली जिले की तहसील वाल्वा में कारनबाड़ी के सुरेश की कहानी कुछ और है।

गन्ने की पैदावार कर सबको कर दिया चकिंत 

यह किसान अन्य किसानों की तुलना में ज्यादा पैसा कमा रहा है और वो भी महज अपने खेतों में थोड़ा सा बदलाव करने के बाद। इन्होंने अपने खेत में बदलाव किया और फिर पहले से ज्यादा खेती से मुनाफा होने लगा। आज आलम यह है कि यह किसान अब करोड़ों रूपये कमा रहा है।

सुरेश अपने खेतों में ऐसा करिश्मा कर रहे हैं कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, यूपी तक के किसान उनका अनुसरण करते हैं। उनकी ईजाद तकनीकी का इस्तेमाल करने वालों में पाकिस्तान के भी कई किसान शामिल हैं।

करोड़ों में कर रहे है कमाई

सुरेश गन्ने से सलाना 50-70 लाख की कमाई करते हैं, जबकि हल्दी और केले को मिलाकर वो साल में एक करोड़ से ज्यादा का काम करते हैं। पिछले वर्ष उन्होंने एक एकड़ गन्ना बीज के लिए 2 लाख 80 हजार में बेचा था। 2016 में एक एकड गन्ने का बीज वो 3 लाख 20 हजार में भी बेच चुके हैं। लेकिन कुछ साल पहले तक वो भी उन्हीं पऱेशान किसानों में शामिल थे जो भरपूर पैसे लगाने के बावजूद बेहतर उत्पादन नहीं ले पाते थे।

खेती में किए कुछ बदलाव

सुरेश नौंवी पास हैं लेकिन खेती को किसी वैज्ञानिक की तरह करते हैं। अच्छी वैरायटी (किस्म) के गन्ने की बुआई के लिए वो अप्रैल-मई से लेकर जुलाई तक खेत तैयार करते हैं। 15 अगस्त से ट्रे में बड (अंकुर) उगाना शुरु कर देते हैं, जिसके बाद 15 सितंबर से खेत में निश्चित दूरी प्लांटेशन कर देते हैं। “अब मैं टिशू कल्चर से भी गन्ना उगाने लगाने लगा हूं। मेरे एरिया में केले का टिशू कल्चर बनाने वाले वाली फर्म है मैं उससे अपने खेत में सबसे बढ़िया एक गन्ने से टिशू बनवाना हूं, जिससे तीन साल तक फसल लेता हूं।”

वो बताते हैं किसी भी फसल के लिए जमीन और अच्छा बीज होने बहुत अहम होते हैं, “मैं इन दोनों को काफी अहमियत देता हूं। मैं अपने बीज खुद तैयार करता हूं, बेहतर तरीके से खेतों की जुताई, खाद पानी का इंतजाम करता हूं।” सुरेश बीज के लिए खेत में 9-11 महीने फसल रखते हैं तो मिल के लिए 18 महीने तक गन्ना खेत में रखते हैं। वो कहते हैं किसान को पेड़ी का गन्ना नहीं बोना चाहिए। महाराष्ट्र में तमाम किसान उनकी तकनीकि अपना रहे हैं।

पूरे खेत से चुने हुए 100 गन्नों में से एक से बनता है टिशु कल्चर

टिशु कल्चर यानि एक किसी पौधे के ऊतक अथवा कोशिशाएं प्रयोगशाला की विशेष परिस्थितियों में रखी जाती हैं, जिनमें खुद रोग रहित बढ़ने और अपने समान दूसरे पौधे पैदा करने की क्षमता होती है। सुरेश अपने पूरे खेत से 100 अच्छे (मोटे, लंबे और रोगरहित) गन्ने चुनते हैं, उनमें 10 वो स्थानीय लैब ले जाते हैं, जहां वैज्ञानिक एक गन्ना चुनते हैं और उससे एक साल में टिशु बनाकर देते हैं।

सुरेश बताते हैं, इसके लिए करीब 8 हजार रुपये मैं लेब को देता हूं, वो जो पौधे बनाकर देते हैं, जिसे एफ 1 कहा जाता है से पहले साल में कम उत्पादन होता है लेकिन दूसरे साल के एफ-2 पीरियड और तीसरे एफ-3 में बहुत अच्छा उत्पादन होता है। इसके बाद मैं उस गन्ने को दोबारा बीज नहीं बनाता। टिशू कल्चर से उगाए गए गन्ने की पेड़ी में खरपतवार नहीं होता है।

मजदूरी पर होने वाले खर्च को आधा कर देगी यह पावर टिलर मशीन

पावर टिलर खेतीबारी की एक ऐसी मशीन है, जिस का इस्तेमाल खेत की जुताई से ले कर फसल की कटाई तक किया जाता है। इस के इस्तेमाल से खेतीबारी के अनेक काम आसानी से किए जा सकते हैं।

तकनीक

इस मशीन से खरपतवार का निबटान, सिंचाई, फसल की कटाई, मड़ाई और ढुलाई का काम भी लिया जाता है। इस के अलावा इस मशीन का बोआई और उस के बाद के कामों में भी खासा इस्तेमाल होता है।

इस तरह के कामों के लिए पहले कई मजदूर खेत में लगाने पड़ते थे, लेकिन पावर टिलर के प्रयोग से कम लागत और कम समय में सभी काम आसानी से खत्म हो जाते हैं।

आज किसान पावर टिलर के साथ अन्य यंत्रों को जोड़ कर खेती के कई काम आसानी से कर रहे?हैं। यह एक ऐसी खास मशीन है, जिस से अन्य यंत्रों को जोड़ कर खेती के तमाम काम लिए जा सकते हैं।

खासतौर से पहाड़ी इलाकों में खेती के काम के लिए यह मशीन काफी कारगर है।आज अनेक कंपनियां पावर टिलर बना रही?हैं। उन्हीं में से एक इटैलियन पावर टिलर के बारे में जानकारी दी जा रही है :

इटैलियन पावर टिलर

यह बीसीएस इंडिया प्रा। लि। द्वारा बनाया गया पावर टिलर है। इस से खेतों, बागानों व लाइनों में होने वाली फसलों की गुड़ाई आदि की जाती?है। यह पहाड़ी इलाकों में खेतों की जुताई करने वाला खास यंत्र है।

खासीयत : यह काफी हलका और चेनरहित होता है। यह चलने में बेहद आसान है। यह 4 मौडलों (एमसी 720, एमसी 730, एमसी 740, एमसी 750) में उपलब्ध है। इस के 2 मौडल पेट्रोल और डीजल दोनों से चलते हैं।

730 मॉडल की कीमत 165000 के करीब है इसके बाकि मॉडल की कीमत मॉडल के हिसाब से कम जा ज्यादा हो सकती है । इसके इलावा अगर आप किसी इंडियन कंपनी का बना हुआ मॉडल लेंगे तो उसकी कीमत और भी कम होगी ।

बीसीएस पावर टिलर की  अधिक जानकारी के लिए फोन नंबर : 0161-2848597 और मोबाइल नंबरों 08427755743 व 08427800753 पर बात कर सकते हैं।

यह पावर टिलर कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

अपनी गिरवी जमीन को ही कांट्रैक्‍ट पर लेकर बन गया लखपति ये किसान

बिहार के एक छोटे से किसान की कहानी जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। एक सोच ने उसकी लाइफ बदल दी। अपनी गिरवी जमीन को ही कांट्रैक्‍ट पर लिया और उसमें पपीते की फसल लगा दी। महज 7 महीने में ही न सिर्फ अपनी जमीन मुक्‍त करा ली बल्कि 5 लाख का मुनाफा भी कमया।

भागलपुर जिले के रंगराचैक ब्‍लॉक के गांव चापर निवासी परशुराम दास की आर्थिक स्‍थिति ठीक न होने के कारण उन्‍होंने 10वीं में ही पढ़ाई छोड़ दी थी। जल्‍द शादी हो गई और इसके बाद बच्‍चे। सबका गुजारा करने को केवल 5 बीघा जमीन थी। लेकिन कुछ समय बाद जब गुजारा नहीं चला तो परशुराम को यह जमीन भी गिरवी रखनी पड़ गई।

उसके बाद परशुराम को जब कोई रास्‍ता न सूझा तो पड़ोस के मित्र ने उन्‍हें पपीते की खेती के बारे में बताया। 2011 में परशुराम ने अपनी गिरवी जमीन को ही किराए पर लिया और पपीते की फसल लगा दी।उन्‍होंने कुछ उन्नत किस्म के पपीते जैसे पूसा नन्हा, चड्ढा सिलेक्शन, रेड लेडी व अन्य की खेती शुरू कर दी। पहली बार फसल खराब हो गई मगर उसके बाद बंपर फसल हुई।

पपीते की फसल की उत्‍तम पैदावार के बाद उसकी बिक्री हुई तो परशुराम ने सब खर्च निकालकर जब मुनाफा जोड़ा तो 5 लाख रुपए हुआ। परशुराम ने तत्‍काल अपनी जमीन मुक्‍त कराई। अब परशुराम 5 साल से यही पपीते की खेती कर रहे हैं।

पपीते की फसल को साल में 3 बार फरवरी-मार्च, मानसून सीजन और नवंबर-दिसंबर में लगाया जा सकता है। रोपे जाने के बाद पपीता का पेड़ लगभग 3 से 4 साल तक लगभग 75 से 100 टन प्रति हेक्‍टेयर की पैदावार होती है।भारत के लगभग सभी राज्‍यों में पपीते की फसल होती है और लगभग सभी मंडियों में इसकी मांग है।भारत से हर साल लाखों टन पपीता एक्‍सपोर्ट भी किया जाता है।

सहजन की खेती से 10 महीने में कमायें एक लाख

सहजन की खेती लगाने के 10 महीने बाद एक एकड़ में किसान एक लाख रुपए कमा सकते हैं। कम लागत में तैयार होने वाली इस फसल की खासियत ये है कि इसकी एक बार बुवाई के बाद चार साल तक बुवाई नहीं करनी पड़ती है। साथ ही सहजन एक औषधीय फसल है।

गुजरात के मोरबी जिले से पूरब दिशा से 30 किलोमीटर दूर चूपनी गाँव में किसान प्रतिवर्ष 200 से 250 एकड़ खेत में सहजन की खेती करते हैं। यहां के किसान पिछले छह वर्षों से सहजन की खेती कर रहे हैं। उन्होंने इसकी शुरुआत एक एकड़ खेत से की थी और इसके बढ़ते मुनाफे को देखकर अब 250 एकड़ में सहजन की खेती की जा रही है। सहजन कमाई के साथ ही 300 रोगों की रोकथाम कर सकता है।

चूपनी गाँव में रहने वाले किसान रवि सारदीय (42 वर्ष) बताते हैं, “मैं पिछले तीन साल से सहजन की खेती कर रहा हूं। इसके एक एकड़ में खेती से किसान एक लाख से ज्यादा मुनाफा सिर्फ 10 महीने में कमा सकते हैं।” रवि सारदीय ने सहजन की एक नई प्रजाति की खोज की है, जिसका नाम है “ज्योति-1” है। इस प्रजाति को लगाने से एक पौधे में 700 फलियां लगती हैं, जबकि दूसरी प्रजाति में सिर्फ 250 ही फलियां लगती हैं।

रवि सारदीय आगे बताते हैं, “एक एकड़ खेत में सहजन के 250 ग्राम बीज की जरूरत होती है, लाइन से लाइन की दूरी 12 फिट और प्लांट से प्लांट की दूरी 7 फिट रखी जाती है, एक एकड़ खेत में 518 पौधे लगाए जाते हैं। अप्रैल महीने में बुवाई के बाद सितम्बर महीने में फलियां बाजार में बिकनी शुरू हो जाती हैं।” गर्मी के मौसम में 10 रुपए किलो और सर्दियों के मौसम में 40 रुपए किलो के हिसाब से बिकती हैं। बारिश के मौसम को छोड़कर सहजन के पेड़ में दो बार फलियां लगती हैं।

पशुओं के चारे के रूप में उपयोगी

चारे के रूप में इसकी पत्तियों के प्रयोग से पशुओं के दूध में डेढ़ गुना और वजन में एक तिहाई से अधिक की वृद्धि की रिपोर्ट है। कुपोषण, एनीमिया (खून की कमी) में सहजन फायेदमंद होता है।

औषधीय गुणों से भरपूर

डॉ. रजनीश मिश्र ने बताया कि सहजन को अंग्रेजी में ड्रमस्टिक कहा जाता है। इसका वनस्पति नाम मोरिंगा ओलिफेरा है। फिलीपीन्स, मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में भी सहजन का उपयोग बहुत अधिक किया जाता है। दक्षिण भारत में व्यंजनों में इसका उपयोग खूब किया जाता है। सेंजन, मुनगा या सहजन आदि नामों से जाना जाने वाला सहजन औषधीय गुणों से भरपूर है। इसके अलग-अलग हिस्सों में 300 से अधिक रोगों के रोकथाम के गुण हैं। इसमें 92 तरह के मल्टीविटामिन्स, 46 तरह के एंटी आक्सीडेंट गुण, 36 तरह के दर्द निवारक और 18 तरह के एमिनो एसिड मिलते हैं।

गर्मी में भी बंपर उत्पादन देगी गेहूं की यह नई किस्म

करनाल: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (PUSA) ने गेहूं की पांच व जौ की तीन किस्में रिलीज की हैं। इसमें गेहूं की डीबीडब्ल्यू-173 गर्मी में भी बंपर उत्पादन देगी। शोध में एक हेक्टेयर में इसका उत्पादन 70 क्विंटल तक आया है। इस किस्म के लिए हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के ऊना जिला अनुकूल है।

इन क्षेत्रों में किए गए शोध के बाद आए सफल परिणाम के बाद इस वेरायटी को रिलीज कर दिया गया है। इसके अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा व असम के क्षेत्र के लिए एचआइ-1612, डीबीडब्ल्यू-168, यूएएस-375 और एचआइ-8777 को रिलीज किया गया है। इसके अलावा जौ की डीडब्ल्यूआरबी-137, आरडी-2899 और आरडी-2907 की किस्म रिलीज की गई है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

संस्थान के निदेशक डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि इन वेरायटी के रिलीज होने के बाद इनका सीड तैयार किया जाएगा। उसके बाद यह मार्केट में उपलब्ध होगी। किसी भी वेरायटी को रिलीज करने के बाद पूर्ण रूप से किसानों तक लाने के लिए करीब दो साल लग जाते हैं, क्योंकि किसानों की डिमांड के अनुसार बीज तैयार किया जाता है। डीबीडब्ल्यू 173 की बिजाई नवंबर के आखिरी सप्ताह से लेकर दिसंबर के दूसरे सप्ताह तक की जा सकती है। यह फसल 118 से 120 दिन में तैयार हो जाती है।

पर्यावरण के गर्म मिजाज से लड़ेगी नई किस्म

कई वेरायटी में यह देखने में आया है कि मार्च माह में जब तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है तो दाना पिचकना शुरू हो जाता है, लेकिन डीबीडब्ल्यू 173 में ऐसा नहीं होगा। यह किस्म दो से चार डिग्री सेल्सियस अधिक तापमान को भी सहन कर सकेगी। इसके अलावा इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अन्य किस्मों से ज्यादा है। इसमें आयरन की मात्र 41 पीपीएम यानि पार्ट्स पर मिलियन है।

(दैनिक जागरण से साभार)

मुफत में अपने फ़ोन पर SMS के जरिए मौसम की जानकारी लेने के लिए ऐसे करें रजिस्टर

मौसम की सूचना देने वाले देश के भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने लोगों के लिए एक एसएमएस अलर्ट की सेवा शुरू की है। इससे न केवल मौसम के बारे में अलर्ट मिलेंगे, बल्कि चक्रवात, बाढ़ और भारी बारिश के बारे में भी पता चल सकेगा।

इस सेवा के तहत आईएमडी हर उस व्यक्ति को मौसम के बारे में एसएमएस भेजेगा, जो भी इसके साथ रजिस्टर होंगे। इसके रजिस्ट्रेशन के लिए आपको आईएमडी की वेबसाइट http://imdagrimet.gov.in/  पर जाना पड़ेगा और खुद को रजिस्टर करना पड़ेगा।

इसके जरिए सरकारी विभागों और लोगों को न केवल प्राकृतिक आपदाओं के बारे में बताया जाएगा, बल्कि यह भी बताया जाएगा कि उससे कैसे निपटा जा सकता है। यह सुविधा इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी की ‘मोबाइल सेवा’ का इस्तेमाल करके लोगों तक पहुंचाई जाएगी।

ऐसे करें रजिस्टर

इस सुविधा का फ़ायदा लेने के लिए सबसे पहले इस लिंक http://imdagrimet.gov.in/farmer/Form_Hindi.php पर क्लिक करें । उसके बाद एक (ऊपर दी हुई फोटो जैसा) फार्म खुलेगा जिसमे आप को अपना फ़ोन नंबर , अपना स्टेट ,अपना जिला ,और फसल के सम्बंधित बाकि जानकारी भरनी होगी एक बार सारी जानकारी भरने के बाद इस फार्म को सबमिट करें । उसके बाद आपके फ़ोन पर SMS सेवा शुरू कर दी जाएगी और आप को मौसम की जानकारी फ़ोन के जरिए मिलनी शुरू हो जयेगी ।

इस जरूरी जानकारी को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि बाकि किसान भी इसका फ़ायदा उठा सकें ।