अद्भुत हुनरः गेहूं के दानों से बनाया 222 किलो का सिक्का

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में एक किसान के बेटे का अद्भुत हुनर देखने को मिला है। यहां किसान के बेटे ने 222 किलो का गेहूं का सिक्का बनाकर जिले व प्रदेश का नाम रोशन किया है। इस सिक्के को देखने के लिए गांव ही नहीं बल्कि पड़ोसी जनपद के लोगों का हुजूम भी इकठ्ठा हो रहा है।

दरअसल मामला जिले के धरमपुर सराय गांव का है। जहां के रहने वाले शैलेन्द्र कुमार ने 5 फुट उंचाई का 2 क्विंटल, 11 किलो गेहूं के दानों से एक रुपए का सिक्का बनाया है।

यह सिक्का महज 45 दिनों में एक साधारण किसान के बेटे ने बनाकर तैयार किया है। वहीं गांव की युवा पीढ़ी भी शैलेन्द्र के इस कार्यों की प्रशंसा करते हुए गेहूं से तैयार इस एक रुपए के सिक्के को गिनीज बुक में दर्ज कराने की मांग कर रही है।

शैलेन्द्र ने बताया कि एक रुपए के सिक्के में गेहूं की बाली देख कर उसे यह सिक्का बनाने की प्रेरणा मिली। उसका मानना है कि देश में गेहूं नहीं होगा तो किसान खुशहाल नहीं होगा इसीलिए उसने यह सिक्का बनाया है। किसी भी देश की धातुई मुद्रा का गेहूं या अन्य किसी अनाज के दाने से बनाया गया इतना विशाल और अद्भुत प्रतिरूप शायद विश्व में पहली बार बना होगा।

पंजाब में भी किसानो ने शुरू की काले चावल की खेती

भारत में धान की खेती बहुत बड़े क्षेत्र में होती है पर कभी आप ने काले चावल (काले धान) की खेती की है । आपके लिए बेशक यह हैरानी की बात होगी लेकिन आसाम के जिला गोलपुर में यह एक आम बात है यहाँ पर 200 से ज्यादा किसान काले धान की खेती कर लाखों रुपए की कमाई कर रहे है ऐसा इस लिए है जहाँ पर आम चावल की कीमत 15 से 80 रु किल्लो तक होती है वहीँ काले चावल की कीमत 200 से 500 रु किल्लो तक होती है ।

भारत में सब से पहले काले चावल की खेती आसाम के नौजवान किसान उपेन्दर राबा ने 2011 में शुरू की जो की गांव आमगुरीपारा,जिला गोलपुरा ,आसाम का रहने वाला है इस किसान को कृषि विज्ञानं केंदर ने काले चावल की खेती करने के लिए प्रेरित क्या था ।

पर आस पास के किसानो को शुरू में उपेन्दर पर यकीन नहीं था ।लेकिन जब उपेन्दर का प्रयोग पहले ही साल कामयाब रहा तो बाक़ी किसानो ने भी काले चावल की खेती करना शुरू कर दिया क्योंकि इसमें मुनाफा कई गुना ज्यादा था ।

आसाम की सरकार भी किसानो को काले चावल की जैविक खेती करने के लिए उत्शहित कर रही है क्योंकि जहाँ आम साधारण काले चावल की कीमत 200 से 250 रु किल्लो है वहीँ ऑर्गनिक काले चावल की कीमत 500 रु किल्लो है ।

काले चावल की खेती की भारत में अभी तक शुरुआत है उम्मीद है धीरे धीरे यह खेती पुरे भारत में होने लगेगी और बाक़ी किसानो को भी इसका लाभ मिल सकेगा ।अगर आप इसकी खेती करना चाहते है तो इसका बीज ऑनलाइन मिल जाता है । और इसे आप ऑनलाइन ही बेच भी सकते है ।बहुत से व्यापारी इसकी कॉन्ट्रैक्ट खेती भी करवाते है

पंजाब में भी किसानो ने शुरू की काले चावल की खेती

पंजाब के जिला फ़िरोज़पुर के गांव माना सिंह वाला में इस साल पहली बार पंजाब के कुश किसानो ने काले चावल की खेती की ।अभी उनको मार्किट में 500 रुपये किल्लो तक की पेशकश मिल रही है । पंजाब में इस चावल की प्रति एकड़ 15 से 20 कुंतल निकलने की सम्भावना है। पंजाब के तीन किसानो ने मिल कर 35 एकड़ में काले धान की पहली बार खेती की और उन्हें काफी अच्छे नतीजे मिल रहे है ।

किसान जसविंदर सिंह बताते है की वो इसका बीज मिजोरम से लाए है इस बार इस धान की ऊंचाई 7 फ़ीट तक हो गई है और इसके लिए किसी भी तरह की खाद डालने की जरूरत नहीं है ।अभी चावल त्यार भी नहीं हुआ और बहुत से दुकानदार इसका बीज बनाने के लिए किसनो को मुंह मांगी कीमत देने के लिए त्यार है ।

काले चावल का इतिहास

विभिन्न पोषक तत्वों से भरपूर, काले चावल का इतिहास काफी संपन्न और रोमांचक है.एशिया महाद्वीप में चावल प्रमुख रूप से खाया जाता है. पुराने समय में चीन के एक बेहद छोटे हिस्से में काले चावलों की खेती की जाती थी और ये चावल सिर्फ और सिर्फ राजा के लिए हुआ करते थे.

हालांकि आज इस पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है लेकिन फिर भी सफेद और ब्राउन रास की तुलना में इसकी खेती बहुत कम ही होती है. अौर कम ही लोग इसके बारे में जानते हैं. जबकि यह अन्य चावलों की तुलना में ज्यादा सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद होते हैं.

काले चावल खाने के फायदे:

जैसा कि हम आपको पहले ही बता चुके हैं काले चावल को उसके पोषक गुणों के कारण जाना जाता है. काले चावल एंटी-ऑक्सीडेंट के गुणों से भरपूर होते हैं. बता दें कि एंटी-ऑक्सीडेंट्स हमारे शरीर में मौजूद विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में सहायक होते हैं. हालां‍कि कॉफी और चाय में भी एंटी-ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं लेकिन काले चावल में इसकी मात्रा सर्वाधिक होती है. इससे ये बॉडी को डि‍टॉक्स करते हैं जिससे कई तरह की बीमारियां और सेहत संबंधी परेशानि‍यां दूर रहती हैं. इस लिए इसे कैंसर के इलाज के लिए सब से ज्यादा उपयोगी बना जाता है

71 साल के किसान का कमल ,इस नई तकनीक से ऊगा दी सूखे में धान की फसल

छतीसगढ़: ग्राम रेड़ा के 71 वर्षीय ननकी दाऊ साहू द्वारा कृषि में कुछ नया करने की जुनून देखते ही बनता है। इनकी खेती के प्रति वैज्ञानिक सोच और एसआरआई पद्घति से धान की खेती कर रहें हैं। इस पद्घति से की जा रही खेती से सूखा के बाद भी हरियाली नजर आ रही है।

सारंगढ़ एवं बरमकेला अंचल के किसान धान की खेती में सूखे की मार झेल रहे हैं। इन ब्लाकों के तो कई-कई गांव में धान की फसल पुरी तरह से समाप्त हो चुकी है। लेकिन ननकी की धान की फसल लहलहा रही है। जो क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल ननकी दाऊ एसआरआई पद्घति से धान की खेती कर रहें हैं। इस पद्घति से की जा रही खेती से इनकी खेतों में एक अजीब सी हरियाली नजर आ रही हैं।

वहीं इनके एक खेत में लगे मकरंद धान की फसल के खेत के पास से गुजरने में एक भिनी भिनी खुशबू आती है। जिसे देखने के लिए आसपास गंाव के किसान ही नहीं दूर दराज के किसान भी देखने आ रहें हैं। कृषक ननकी दाऊ बताते है कि इस वर्ष जब पुरे देश में कमजोर मानसून होने की आशंका की खबर सुनने के बाद वह अपनी खेतों में एसआरआई पद्घति से धान की फसल लेने का निर्णय लिया।

इस विधि से धान की खेती में कई फायदे हैं। पारंपरिक खेती इसकी खेती बहुत अच्छी है। बीज दर में भी बहुत फर्क है। पारंपरिक खेती में प्रति एकड़ 30 किलो धान बीज लगता है। जबकि इसकी खेती में प्रति एकड़ 2.5 से 3 किलो धान बीज लग रहा है। पारंपरिक खेती में प्रति एकड़ 20 से 21 हजार खर्च आता है।

वर्तमान में इस खेती में अभी तक प्रति एकड़ की खेती में 5 हजार 800 रुपए खर्च आया है। 4 से 5 हजार कटाई के दौरान खर्च आएगा। वहीं रसायनिक खाद के स्थान पर वह केंचुआ डाल रहा है। इससे धान में होने वाले बीमारी एवं कीड़े नहीं हो रहे हैं। जिस कारण कीटनाशक एवं फफूंद नाशक दवाई का उपयोग नहीं हो रहा है। केंचुआ खाद से धान के लिए सभी पोषण तत्व होने से रसायनिक खाद डालने की आवश्यकता नहीं हो रही है।

एसआरआई विधि में कम पानी में अच्छी धान की फसल 

एसआरआई विधि में लगातार खेत में पानी नहीं रखा जाता है जड़ों को आर्द्र रखने लायक पानी दिया जाता है। आमतौर पर पारंपरिक धान की खेती में एक किलो के धान के उत्पादन में करीब 3 हजार 5 सौ लीटर की आवश्यकता होती है। कृषि अधिकारियों द्वारा इस पद्घति में खेती करने से करीब 1 हजार लीटर पानी में ही एक किलो धान उत्पादन बताया जा रहा है।

ननकी को मिल चुके हैं कई सम्मान 

नककी दाऊ को खेती करने का अजीब सा जिद व जुनून सवार रहता है। 71 वर्ष के उम्र में भी रोजाना खेतों में 8 घंटा तक का समय देता है। यही कारण है कि इनकी खेती की चर्चा होनी लगी है। 10 नवम्बर 2014 को भारतीय किसान संघ अधिवेशन नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री व वर्तमान के उपराष्ट्रपति वैंकैया नायडू ने कृषि क्षेत्र में अच्छे कार्य को लेकर सम्मानित हुए। वही जयपुर में 20 फरवरी 2016 आयोजित भारतीय किसान संघ अधिवेशन में भी सम्मान किया गया। सारंगढ़ ब्लाक के ग्राम रेड़ा के कृषक ननकी दाऊ की लहलहा रही है जबकि सारंगढ़ अंचल सूखे के चपेट से जूझ रहा है।

एसआरआई विधि से की गई धान की खेती से बीज दर न्यूनतम मात्रा में आता है। वही कम पानी व कम लागत से अच्छी पैदावार किसान पा सकते है। इस विधि में किस्सों की संख्या 45 से 50 तक जाती है। इससे उत्पादन में फर्क आता है। वहीं इस खेती में देशी खादों का उपयोग होता है। ” जीपी गोस्वामी, वरिष्ठ कृषि अधिकारी, सारंगढ़

8 मीटर की ऊंचाई और 10 मीटर की दुरी तक स्प्रे कर सकता है यह कमाल का मिस्ट स्प्रे पंप

सभी फसलों पर कीट तथा बीमारियों का प्रकोप होता है। कभी-कभी इन बीमारियों के प्रकोप से पूरी फसल नष्ट भी हो जाती है। इसके अतिरिक्त पौधे की वृद्धि को खरपतवार से भी नुकसान होता है। कीट, बीमारियों एवं खरपतवार की रोकथाम के लिए विभिन्न प्रकार की दवाईयों का प्रयोग किया जाता है। ये दवाईयाँ पौध संरक्षण यंत्र जिन्हें स्प्रेयर तथा डस्टर के नाम से जानते हैं, के द्वारा फसलों पर छिड़काव के लिए किया जाता हैं।

पौधे में कीड़े-मकोड़े एवं बीमारी नियंत्रित करने के लिए स्प्रेयर से सूक्ष्म ड्राप स्प्रे की आवश्यकता पड़ती है, तथा खरपतवार नियंत्रित करने के लिए बड़े ड्राप स्प्रे की आवश्यकता पड़ती है। विभिन्न प्रकार के स्प्रेयर भिन्न-भिन्न कार्य करने के लिए उपलब्ध हैं। इनकी उपयोगिता अनेक कारकों पर निर्भर है। जैसे- स्प्रे करने का प्रकार, खेत का आकार, फसल का प्रकार, इत्यादि। यहाँ पर कुछ प्रमुख स्प्रेयरों का वर्णन किया जा रहा हैं, जो सभी राज्यों के लिए उपयोगी हैं।

आज हम जिस स्प्रेयर की बात कर रहे है उसे मिस्ट स्प्रेयर बोला जाता है यह बहुत प्रेशर के साथ स्प्रे करता है बहुत प्रेशर के साथ छोटी छोटी बूंदें बन जाती है जिस से ऐसा लगता है जैसे धुंध हो इस लिए इसे मिस्ट जा फोग स्प्रेयर बोला जाता । इसका इस्तमाल से हम 8 मीटर की ऊंचाई तक स्प्रे कर सकते है जो किसी भी बाग़ में स्प्रे करने के लिए उपुक्त है साथ में इस से हम कम से कम 10 मीटर की दुरी तक स्प्रे कर सकते है । जिस से किसी भी फसल के ऊपर स्प्रे करना बहुत ही आसान हो जाता है ।

यह पेट्रोल के इंजन पर चलता है और एक घंटे में सिर्फ आधा लीटर पेट्रोल का इस्तमाल करता है ।इसका वजन 10 किल्लो के करीब होता है और इसमें आप एक वक़्त पर 11 लीटर तक कीटनाशक भर सकते है वैसे तो मार्किट में बहुत से मिस्ट स्प्रेयर मिल जयँगे लेकिन हम जिसकी बात कर रहे है उसका नाम है किसानक्राफ्ट मिस्ट ब्लोअर इसकी कीमत 5,780 रु है।

किसानक्राफ्ट मिस्ट ब्लोअर खरीदना चाहते है तो इस नंबर पर 91-80-22178200 संपर्क कर सकते है और ज्यादा जानकारी के लिए वीडियो देखें

 

 

 

 

बासमती धान ने खिलाये किसानों के चेहरे। इतने रुपए बढ़े भाव

बासमतीधान ने किसानों के चेहरे को खिला दिया है। पहली ही ढेरी तरावड़ी में 3725 रुपए के भाव में बिकी है। इसका रेट चार हजार रुपए प्रति क्विंटल तक जाने की उम्मीद है। अनाज मंडियां धान से अट चुकी हैं। प्रत्येक वैरायटी के अच्छे भाव से इस बार खेत के ठेके भी बढ़ेंगे और कृषि की तरफ रुझान बढ़ेगा।

जिले में तरावड़ी मंडी में सोमवार को 20 क्विंटल बासमती धान पहुंची। इसका पहला रेट 3725 रुपए लगा। पिछले साल इसका रेट 3100 रुपए तक ही था। इसी तरह 1121 का रेट 3200 और 1509 का रेट 2800 रुपए तक पहुंच गया है। किसानों ने बताया कि इस बार पैदावार भी अच्छी है और भाव में बेहतर मिल रहा है। इस बार की धान पिछले खर्चे भी पूरे करेगी। जिलेभर की मंडियों में धान की आवक जबरदस्त बढ़ रही है।

मंडी में पांव टेकने की जगह नहीं है। लिफ्टिंग की गति तेज की है, ताकि किसानों को धान डालने की जगह मिलती रहे। किसान देसराज, सुरेश कुमार, बलजीत सिंह, सुरेश, मदनलाल, सोमदत्त बताते हैं कि धान फसल ने इस बार खर्चे पूरे कर दिए है। भाव अच्छे मिल रहे हैं। उम्मीद करते हैं बासमती का रेट चार हजार रुपए पार कर जाए। तरावड़ी मंडी धान का कटोरा है। इसी मंडी में सबसे ज्यादा बासमती धान खरीदा जाता है।

बासमती में पैदावार बेहतर होने के कारण उनकी सोमवार को 20 क्विंटल धान 3725 रुपए के भाव लगी है। मंडी में बासमती का आगाज हो गया है। बासमती लेट आने के कारण अब मंडियों में बासमती पर ही फोक्स रहेगा।

^तरावड़ी मंडी में 3725 रुपए के भाव बिकी है। किसानों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं आने दी जाएगी। किसानों को चाहिए कि वह धान को सुखाकर लेकर आए। जल्दबाजी में नमीयुक्त धान कटवाएं। -गौरवआर्य, सेक्रेटरी, अनाज मंडी तरावड़ी।

 

10 लाख में बिकी महज दो साल की कटड़ी

हिसार के नारनौंद का सिंघवा गांव। मुर्राह नस्ल की भैंस के लिए देश ही नहीं, विदेश में भी चर्चित। यहां किसान पशुओं को शाही अंदाज में पालते हैं। पशुपालकों की मेहनत से यहां दूध की नदियां बहती हैं तो यहां भैंस की कीमत लग्जरी कार से भी अधिक आंकी जाती है।

सिंघवा में जसवंत की मुर्राह नस्ल की दो वर्षीय कटड़ी लक्ष्मी इस बार दस लाख रुपये में बिकी है, जो क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। ऐसा पहली बार हुआ है जब कोई दो साल की कटड़ी इतनी महंगी बिकी हो।

सिंघवा निवासी जसवंत पुत्र रणबीर सिंह ने 2012 में महम से 70 हजार रुपये में एक मुर्राह नस्ल की भैंस खरीदी थी और उसका नाम गिन्नी रख दिया था। गिन्नी की देखरेख शाही तरीके से की गई तो गिन्नी ने भी जसवंत को गिन्नियों से मालामाल कर दिया। क्योंकि गिन्नी की कटड़ी लक्ष्मी मात्र दो वर्ष की हुई थी तो लक्ष्मी की सुंदरता को देखकर देश प्रदेश के अनेक व्यापारी उसको खरीदने के इच्छुक थे। आखिरकार लक्ष्मी को पूर्व मुख्यमंत्री के गाव साघी के किसान कृष्ण हुड्डा ने दस लाख रुपये में खरीद लिया। इतनी कीमत में कटड़ी बिकना एक अहम बात है।

व्यावसायिक पहलु : लागत 70 हजार, दो साल में मुनाफा 10 लाख

दुनिया में शायद ही कोई धंधा हो, जिसमें दो साल में 13 गुना मुनाफा होता हो, पर मुर्राह की खेती में ऐसा संभव है। सिंघवा के किसान इसे साबित भी कर रहे हैं। बात गिन्नी की हो या लक्ष्मी, किसानों की मेहनत से यहां भैंस के थन से दूध की धारा के साथ समृद्धि पैदा हो रही है।

लक्ष्मी की मा भी दिखा चुकी है अपना दम

लक्ष्मी की मा गिन्नी ने भी लगातार तीन बार राष्ट्रीय स्तर पर परचम लहराया है। उसने सन 2013 में इडियन नेशनल चैम्पियनशिप दूध प्रतियोगिता जोकि पंजाब के मुक्तसर में आयोजित की गई थी उसमें प्रथम स्थान, सन 2015 में राष्ट्रीय डेयरी मेला करनाल में भी दूध प्रतियोगिता में भी प्रथम, चैम्पियन भैंस मेला हिसार में भी दूध प्रतियोगिता में भी प्रथम स्थान प्राप्त कर आज भी अनेक प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर लाखों रुपए इनाम के जीत रही है।

भैंसों के दम पर है दर्जनों किसान लखपती

गाव सिंघवा में दर्जनों किसान मुर्राह नस्ल की भैंसों को पाल रहे है और उनको बेचकर लाखों रुपये मुनाफा कमा रहे है। सरकार ने इस गाव को आदर्श मुर्राह नस्ल गाव घोषित किया हुआ है। इस गाव के लोगों ने भैंसों के नाम महिलाओं के नाम पर जैसे लक्ष्मी, धन्नो, लाडो, रानी, पूजा, मोहिनी, गंगा, जूना, लखो इत्यादि रखे हुए है और यह भैंस अपना नाम सुनते ही मालिक के पास पहुच जाती है।

अच्छे मुनाफे के लिए इस समय और ऐसे करें टमाटर की खेती

ये मौसम टमाटर की फसल लगाने के लिए सही होता है, वैसे तो टमाटर की खेती साल भर की जाती है, लेकिन इस समय टमाटर की खेती कर किसान अच्छी आमदनी कमा सकते हैं।

कृषि विज्ञान केन्द्र अंबेडकरनगर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ़ रवि प्रकाश मौर्या बताते हैं, “किसान समय से टमाटर की नर्सरी तैयार कर टमाटर की खेती कर सकता है, इस समय ट्रे में नर्सरी तैयार कर सकते हैं, इसमे जल्दी पौध तैयार होती है और पौधे समान्य तरीके से उगाए पौधों से ज्यादा रोग प्रतिरोधी भी होते हैं। इसलिए समय से खेत तैयार कर पौध लगा लें।”

टमाटर का पौधा ज्यादा ठण्ड और उच्च नमी को बर्दाश्त नहीं कर पाता है। विपरीत मौसम की वजह से इसकी खेती बुरी तरह प्रभावित होती है। बीज के विकास, अंकुरण, फूल आना और फल होने के लिए अलग-अलग मौसम की व्यापक विविधता चाहिए। 10 डिग्री सेंटीग्रेड से कम तापमान और 38 डिग्री सेंटीग्रेड से ज्यादा तापमान पौधे के विकास को धीमा कर देते हैं।

टमाटर पौध की तैयारी

पौध की तैयारी के लिए जीवांशयुक्त बलुवर दोमट मिट्टी की जरुरत होती है। स्वस्थ और मजबूत पौध तैयार करने के लिए 10 ग्राम डाई अमोनियम फास्फेट और 1.5-2.0 किग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति वर्ग मीटर की दर से लगाना चाहिए। क्यारियों की लंबाई लगभग तीन मीटर, चौड़ाई लगभग एक औ भूमि की सतह से उचाई कम से कम 25-30 सेमी. रखना उचित होता होता है। इस प्रकार की ऊंची क्यारियों में बीज की बुवाई पंक्तियों में करना चाहिए, जिनकी आपसी दूरी पांच-छह सेमी. रखना चाहिए, जबकि पौध से पौध की दूरी दो-तीन सेमी. रखना चाहिए।

बुवाई के बाद क्यारियों को सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट से ढक दें। इसके बाद फुहारे से हल्की सिचाई करें। अब इन क्यारियों को घास-फूस या सरकंडे के आवरण से ढ़क दें। आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई करते रहें। बुवाई के 20-05 दिनों बाद पौध रोपाई योग्य तैयार हो जाती है।

टमाटर की किस्में

  • सामान्य किस्में: पूसा गौरव, पूसा शीतल, सालेनागोला, साले नबड़ा, वी.एल.टमाटर-1, आजाद टी-2, अर्का विकास, अर्का सौरभ,पंत टी -3
  • संकर किस्में: रुपाली, नवीन, अविनाश-2, पूसा हाइब्रिड-4, मनीशा, विशाली, पूसा हाइब्रिड-2, रक्षिता, डी.आर.एल-304, एन.एस. 852, अर्कारक्षक, अर्का सम्राट, अर्का अनन्या

बीज की मात्रा

  • सामान्य किस्में: 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर

संकर किस्में: 200-250 ग्राम प्रति हेक्टेयर

टमाटर बीज का चयन

बीज उत्पादन के बाद खराब और टूटे बीज छांट लिया जाता है। बुवाई वाली बीज हर तरह से उत्तम किस्म की होनी चहिये| आकार में एक समान, मजबूत और जल्द अंकुरन वाली बीज को बुवाई के लिए चुना जाता है। विपरीत मौसम को भी सहनेवाली एफ-1 जेनरेशन वाली हाइब्रिड बीज जल्दी और अच्छी फसल देती है।

मिट्टी का चयन

खनिजीय मिट्टी और बलुई मिट्टी में टमाटर की खेती अच्छी होती है, लेकिन पौधों के लिए सबसे अच्छी बलुई मिट्टी होती है| अच्छी फसल के लिए मिट्टी की गहराई 15-20 सेमी होनी चाहिए।

टमाटर पौध की रोपाई

जब पौध में चा-छह पत्तियां आ जाए और ऊंचाई लगभग 20-25 सेमी. हो जाए तब पौध रोपाई के लिए तैयार समझना चाहिए। रोपाई के तीन-चा दिन पहले पौधशाला की सिंचाई बन्द कर देनी चाहिए। जाड़े के मौसम पौध को पाला से बचने के लिए क्यारियों को पालीथीन चादर की टनेल बनाकर ऊपर से ढक देना चाहिए।

उर्वरक देने की विधि

नत्रजन की आधी मात्रा तथा फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत की अंतिम जुताई के समय मिलानी चाहिए। गोबर की खाद की संपूर्ण मात्रा रोपाई से 15-20 दिन पहले ही मिलानी चाहिए। नत्रजन की शेष मात्रा सिंचित दशा में खरपतवार नियंत्रण के पश्चात रोपाई के 30-35 दिन बाद देनी चाहिए।

जनवरी से पूरे देश में उर्वरकों पर मिलेगी डायरेक्ट सब्सिडी

सरकार द्वारा उर्वरकों पर दी जाने वाली मदद के सही वितरण के मकसद से सरकार तय समय से 3 महीने पहले ही पूरे देश में डायरैक्ट बैनीफिट ट्रांसफर ऑफ फर्टीलाइजर्स सबसिडी योजना को लागू कर देगी।

सूत्रों के मुताबिक आगामी 1 जनवरी को यह योजना पूरे देश में लागू कर दी जाएगी जबकि इसके लिए मार्च आखिर का समय तय किया गया था।

राजस्थान, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, अंडमान और निकोबार, त्रिपुरा तथा असम में 1 नवम्बर से यह योजना लागू कर दी जाएगी। एक महीने बाद यानी दिसम्बर में इसे हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु में लागू किया जाएगा।

बाकी राज्यों में 1 जनवरी से इसे लागू कर दिया जाएगा। नई योजना के तहत उर्वरक की बिक्री हो जाने के बाद कम्पनी को सबसिडी का पैसा मिलेगा। इसके लिए सरकार ने सभी कम्पनियों से पी.ओ.एस. मशीन लगाने को कहा है।

सबसिडी देने का नया सिस्टम अभी 8 राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में लागू है। इनमें दिल्ली, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, गोवा, पुड्डुचेरी, दमन व दीव और दादर व नागर हवेली शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक इस योजना को तय समय से 3 महीने पहले इसलिए लागू किया जा रहा है ताकि 3 महीने में यह देखा जा सके कि इसमें कहां क्या खामियां रह गई हैं।

110 दिन में तैयार होगी गेहूं की यह प्रजाति

रबी सीजन की फसलों बुवाई हो रही है. ऐसे में गेहूं का उत्पादन करने वाले कई राज्य हैं, जिनसे गेहूं की पैदावार की एक बड़ी हिस्सेदारी इन राज्यों की है. उत्तर प्रदेश गेहूं उत्पादन में एक बड़ा राज्य है इस राज्य के किसान प्रकाश रघुवंशी ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है.

उन्होंने गेहूं की दो देशी किस्मों को विकसित किया है. यह खोज वाराणसी जिले के कुदरत कृषि शोध संस्थान के प्रकाश रघुवंशी ने की है. गेहूं की इस किस्म का नाम कुदरत 8 और कुदरत विश्वनाथ है. यह दोनों बौनी प्रजातियाँ हैं.

इन प्रजातियों की लम्बाई लगभग 90 सेंटीमीटर और इसकी बाली की लम्बाई लगभग 20 सेंटीमीटर होती है. गेहूं की यह प्रजाति 110 दिन में तैयार हो जाती है. इसकी पैदावार 25-30 कुंतल प्रति एकड़ निकलती है. इस प्रजाति का दाना भी मोटा और चमकदार होता है.

इसकी पैदावार और गुणवत्ता को देखते हुए कई राज्यों में इसकी मांग बढ़ी है . गेहूं की यह प्रजाति ओलावृष्टि जैसी समस्याओं को आसानी से झेल सकती है. अभी तक प्रकाश सिंह कृषि फसलों की 300 से अधिक प्रजातियाँ विकसित कर चुके हैं .

किसान ने बनाई ट्रेक्टर के साथ चलने वाली 5 गुना सस्ती कंबाइन मशीन

भारत की कृषिजोत छोटी है और खेतों तक जाने वाले रास्ते संकरे व पेड़ों से घिरे होते हैं. ऐसे में इन खेतों तक बड़े कृषि यंत्रों को ले जाना मुश्किल होता?है. खेती में काम आने वाले जुताई, बोआई, मड़ाई वगैरह के कृषि यंत्र अलगअलग फसलों के लिए अलगअलग तरह के होते हैं.

मड़ाई के कृषि यंत्र फसल के अनुसार अलगअलग तरह के बने होते हैं, जिन के द्वारा गेहूं, धान, राई वगैरह की मड़ाई की जाती है. छोटे किसानों के लिए अपनी फसल की मड़ाई के लिए महंगे व बड़े यंत्र खरीदना मुश्किल होता है. ऐसे में कभीकभी मड़ाई में देरी हो जाती है और देरी की वजह से कई बार बारिश या अन्य वजहों से फसल खराब भी हो जाती है.

किसानों की इन्हीं परेशानियों को देखते हुए उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के विकास खंड कप्तानगंज के गांव खरकादेवरी के रहने वाले 12वीं तक पढ़े नवाचारी किसान आज्ञाराम वर्मा ने एक ऐसी कंबाइन मशीन ईजाद की है, जो कई खूबियों के साथ कम लागत से तैयार की जा सकती है. यह विचार उन के दिमाग में तब आया जब साल 2015 में उन की तैयार गेहूं की फसल बरसात की वजह से कई बार भीग गई और वह अपने गेहूं की फसल की मड़ाई नहीं कर पाए. उन्होंने सोचा क्यों न एक ऐसी गेहूं कटाईमड़ाई की मशीन तैयार की जाए जो कटाई व मड़ाई करने के साथसाथ भूसा भी तैयार कर सके.

आज्ञाराम वर्मा ने इन्हीं परेशानियों को ध्यान में रख कर एक ऐसी कंबाइन मशीन का खाका तैयार किया, जो गेहूं की मड़ाई करने के साथसाथ भूसा भी तैयार कर सकती थी. इस के बाद वे इस मशीन को बनाने में जुट गए. इस के लिए उन्होंने लोहे के तमाम पुर्जे व जरूरी सामान खुले बाजार से खरीद कर अपनी एक वर्कशाप तैयार कर के मशीन बनानी शुरू कर दी. 11 नवंबर 2015 को उन्होंने एक ऐसी कंबाइन मशीन बना कर तैयार की, जो छोटी होने के साथसाथ किसी भी संकरे रास्ते से खेतों में पहुंचाई जा सकती थी.

उन के द्वारा तैयार की गई इस कंबाइन मशीन को बनाने में बहुत ही कम खर्च आया. करीब 2 लाख 75 हजार रुपए में बनी इस कंबाइन मशीन का वजन 18 क्विंटल है. यह अन्य कंबाइन मशीनों से करीब 5 गुना सस्ती है. साथ ही इस की खूबियां इसे और भी बेहतर बनाती हैं. इस मशीन को चलाने के लिए किसी तरह की ट्रेनिंग की जरूरत नहीं होती है और मशीन में आने वाली खराबी को किसान खुद ठीक कर सकता है. इस के लिए अधिक पावर के ट्रैक्टर की भी आवश्यकता नहीं होती है. यह कंबाइन मशीन गेहूं की फसल को जड़ के साथ काटती है.

खूबियां बनाती हैं बेहतर : इस कंबाइन मशीन की खूबियां इसे बेहतर साबित करती हैं. इस मशीन द्वारा 1 घंटे में करीब 1 एकड़ खेत की कटाई की जा सकती है. 7 फुट चौड़े कटर वाली इस मशीन में 9 बेल्टों का प्रयोग किया गया है. इस में इस्तेमाल किए गए सभी कलपुर्जे बाजार में आसानी से मिल जाते हैं और मशीन में किसी तरह की खराबी आ जाने से इस को आसानी से ठीक किया जा सकता है. इस मशीन से एकसाथ गेहूं की कटाई व भूसा बनाने का काम किया जा सकता है. इस के लिए मशीन में अलगअलग 2 भंडारण टैंक लगाए गए हैं. मशीन के बगल में मड़ाई के दौरान गेहूं का भंडारण हो जाता है व मड़ाई से निकलने वाला भूसा मशीन के ऊपर लगे टैंक में चला जाता है.

इस मशीन को ट्रैक्टर के आगे या पीछे जोड़ कर चलाया जा सकता है. ट्रैक्टर के पीछे जोड़ने के लिए 20 हजार रुपए खर्च होते हैं व 20 मिनट का समय लगता है व आगे जोड़ने में 20 हजार रुपए खर्च आता है व 1 घंटे का समय लगता है. फसल की मड़ाई के बाद इस कंबाइन मशीन को ट्रैक्टर से अलग कर के ट्रैक्टर को दूसरे इस्तेमाल में भी लाया जा सकता है.

किसान आज्ञाराम वर्मा द्वारा तैयार की गई मशीन को देखने के लिए दूरदूर से लोग आ रहे हैं और उन के द्वारा तैयार की गई इस मशीन की भारी मांग बनी हुई है. बस्ती जिले के सांसद हरीश द्विवेदी ने किसान आज्ञाराम वर्मा के खेतों में जा कर खुद इस मशीन से गेहूं की मड़ाई कर के इस की खूबियों को जांचापरखा. उन का कहना है कि यह मशीन छोटे किसानों के लिए फायदेमंद साबित होगी.

कृषि विज्ञान केंद्र बस्ती में कृषि अभियंत्रण के वैज्ञानिक इंजीनियर वरुण कुमार का कहना है कि आज भी खेतीकिसानी में काम में आने वाली मशीनें महंगी हैं, जिस की वजह से सभी किसान उन का फायदा नहीं ले पाते हैं. ऐसे में किसान आज्ञाराम वर्मा द्वारा तैयार की गई कंबाइन मशीन छोटे किसानों को आसानी से मिल सकेगी.

इस के पहले भी किसान आज्ञाराम वर्मा ने खेती से जुड़ी कई खोजों की हैं. उन्होंने जहां अधिक चीनी की परते वाली गन्ने की नई प्रजाति कैप्टन बस्ती के नाम से विकसित की है, वहीं गेहूं की नई किस्म एआर 64 भी विकसित की है. वे वर्तमान में खुशबूदार धान की नई किस्म को तैयार करने पर काम कर रहे हैं. आज्ञाराम वर्मा को उन की खोजों की वजह से राष्ट्रीय नव प्रवर्तन संस्थान द्वारा मार्च में 1 हफ्ते के लिए राष्ट्रपति भवन में अपने गन्ने की नई प्रजाति को प्रदर्शित करने का मौका भी दिया गया था. इसी के साथ ही केंद्रीय कृषि मंत्री द्वारा उन्हें नवाचारी किसान के रूप में सम्मानित भी किया गया है.

आज्ञाराम वर्मा का कहना है कि कोई भी किसान चाहे तो खेती में काम आने वाले नए कृषि यंत्रों व बीज वगैरह को ईजाद कर सकता है, क्योंकि वह खेती के दौरान आने वाली तमाम समस्याओं को महसूस करता है. उस दौरान उस के दिमाग में परेशानियों को दूर करने के लिए तमाम ऐसे खयाल आते?हैं, जो किसी भी नई मशीन या बीजों को जन्म दे सकते हैं.

आज्ञाराम वर्मा द्वारा तैयार यह मशीन छोटे किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो रही है. आज्ञाराम ने अपनी इस कंबाइन मशीन का नाम कैप्टन बस्ती रखा है. इस मशीन के बारे में अधिक जानकारी के लिए आज्ञाराम वर्मा के मोबाइल नंबरों 7398349644 व 9721885878 पर संपर्क किया जा सकता है.

यह मशीन कैसे काम करती है जानने के लिए वीडियो देखें