2017-18 के लिए पूरी रबी की फसल के लिए एमएसपी की मंजूरी

सरकार ने गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) आज 110 रुपए बढ़ाकर 1,735 रुपए प्रति कुंतल किया। साथ ही चना और मसूर के एमएसपी में भी 200 रुपए प्रति कुंतल की बढ़ोत्तरी की है। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि इन फसलों का उत्पादन बढ़ाने और कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए सरकार ने यह फैसला किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने आज 2017-18 के लिए पूरी रबी की फसल के लिए एमएसपी की मंजूरी दी। एमएसपी वह मूल्य होता है जिस पर सरकार किसानों से खाद्यान्न की खरीद करती है।

सूत्रों के अनुसार मंत्रिमंडल ने गेहूं का एमएसपी 110 रुपए बढ़ाकर 1,735 रुपए प्रति कुंतल किया है। पिछले साल यह 1,625 रुपए प्रति कुंतल था।देखने में यह भाव ठीक लग रहा है लेकिन आज के खेती खर्चे देखें तो उस हिसाब से कम है ।आज के खेतीबाड़ी खर्चों के हिसाब से गेहूं का भाव कम से कम 2300 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए ।

चना और मसूर की खेती को बढावा देने के उद्देश्य से इनके एमएसपी में प्रत्येक में 200 रुपए की बढ़ोत्तरी की गई है और नई कीमत क्रमश: 4,200 और 4,150 रुपए प्रति कुंतल होगी

सूत्रों ने बताया कि तिलहन में रैपसीड, सरसों और सूरजमुखी के बीज के एमएसपी में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। कीमतों में यह वृद्धि कृषि मूल्य एवं लागत आयोग की सिफारिशों के अनुरूप है।

भूलकर भी ना बोए गेहूं की ये नई किसम ,वरना पड़ेगा पछताना

भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (आईआईडब्ल्यूबीआर) की ओर से बनारस में रिलीज की गई गेहूं की नई किस्म डब्ल्यूबी-2 के दावे पर विवाद शुरू हो गया है। इसके खिलाफ करनाल स्थित पूसा (इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट) के क्षेत्रीय संस्थान से रिटायर्ड पौध प्रजनन विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र लाठर ने केंद्रीय कृषि मंत्री से शिकायत करके मामले को वैज्ञानिक धोखाधड़ी करार दिया है और इसकी सीबीआई जांच की मांग की है।

केंद्रीय कृषि मंत्री, कृषि सचिव, आईसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) के महानिदेशक आदि से की गई शिकायत में उन्होंने कहा है कि गेहूं की किस्म डब्ल्यूबी-2 को आईआईडब्ल्यूबीआर ने देश की प्रथम जैव पोषित किस्म करार दिया है।उनके मुताबिक यह दावा गलत है, क्योंकि इससे ज्यादा जैव पोषित गेहूं की किस्म डब्ल्यूएच-306 हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (हकृवि) ने 52 साल पहले वर्ष 1965 में ही बना दी थी। यही नहीं, अपने रिकॉर्ड को तोड़ते हुए हकृवि ने 25 साल पहले वर्ष 1992 में उससे भी पोषित किस्म डब्ल्यूएच-712 बना दी थी।

अपनी शिकायत के साथ उन्होंने आईआईडब्ल्यूबीआर के पूर्व निदेशक एवं पूसा इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक प्रोफेसर एस नागराजन के रिसर्च पेपर की प्रतिलिपि भी लगाई है जिसमें उन्होंने गेहूं की विभिन्न किस्मों के पोषण तत्वों के बारे में भी जानकारी दी है। यहां बता दें कि गेहूं की जिस किस्म को लेकर बवाल शुरू हुआ है, उसके प्रचार के लिए प्रकाशित किए गए पैम्फलेट में केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह की फोटो भी लगाई गई है।

यह है कथित गलत दावे का आधारआईआईडब्ल्यूबीआर ने गेहूं की अपनी नई किस्म डब्ल्यूबी-2 में आयरन की मात्रा 35.4 पीपीएम दशाई है जबकि डॉ. एस नागराजन के रिसर्च पेपर में हकृवि की गेहूं की किस्म सी-306 में यह 70 पीपीएम और डब्ल्यूएच 712 में 85 पीपीएम है। इसी प्रकार डब्ल्यूबी-2 में जिंक की मात्रा 42 पीपीएम दर्शाई गई है जबकि सी-306 में यह 80 व डब्ल्यूएच-712 में 105 है।

 

गुजरात सरकार देगी कपास पर इतने रुपये का बोनस

गुजरात सरकार कपास के किसानों को बोनस देने का फैसला किया है। कॉटन की गिरती कीमतों से किसानों को सपोर्ट के लिए राज्य सरकार ने एमएसपी पर 500 रुपये प्रति क्विंटल बोनस देगी। अगले महीने से राज्य में कपास की सरकारी खरीद भी शुरू हो जाएगी।

आपको बता दें कपास की कीमतें तेजी से नीचे आ रही थीं। ऐसे में किसानों को लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा था। राज्य में नई फसल की आवक शुरू हो गई है और आने वाले दिनों में इसकी आवक और जोर पकड़ सकती है।

गुजरात में जैसे-जैसे चुनाव की तारीखें नजदीक आ रही हैं, किसानों के लिये जैसे सरकारी योजनाओं की बारिश सी होने लगी है. शायद किसानों को पहली बार इन पांच सालों में लग रहा है कि उन्हें किसान होने का कुछ तो फायदा हुआ है. लेकिन किसानों की हालत उस हिरन के जैसी है जिन्हें महसूस हो रहा है कि दूर कहीं पानी है जबकि वह उनका सिर्फ एक भ्रम है.

आप भी सोचते होंगे कि गुजरात में किसान को 3 लाख तक के लोन बिना ब्याज के मिलने वाली सरकार की घोषणा का फायदा तो किसान को ही मिलेगा. लेकिन अर्थशास्त्री हेमंत शाह की मानें तो सरकार के जरीये ये एक व्यूह रचा जा रहा है, जिसके जरिए किसान और शहर में रहने वाले मध्यम वर्ग को एक दूसरे के सामने खड़ा किया जा रहा है. मध्यम वर्ग के लोगों को लगता है कि यहां सबकुछ किसान के लिये ही किया जा रहा है.

जाने किसका दूध है सबसे सेहतमंद – गाय का या भैंस का?

कुछ लोग कहते है कि भैंस का दूध ज्‍यादा लाभदायक होता है जबकि कुछ लोगों का मानना है कि गाय के दूध में ज्‍यादा पोषक तत्‍व होते हैं। हर प्रकार के दूध में पोषक तत्‍वों की भरमार होती है, बस उम्र और शरीर की आवश्‍यकता के हिसाब से इसका उपयोग किया जाता है।

आगे इस बारे में कुछ और कहने से पहले आपको गाय और भैंस के दूध में पोषक तत्‍वों की मात्रा के बारे में बताया जा रहा है, जो प्रति 100 मिली. में होती है:

भैंस:

कैलोरी – 97, प्रोटीन- 3.7 ग्राम, फैट 6.9 ग्राम, पानी- 84 प्रतिशत, लैक्‍टोस 5.2 ग्राम, खनिज लवण- 0.79 ग्राम

अगर आप अपना वजन और मासपेशियां बढाना चाहते हैं, तो भैंस का दूध आपके लिये अच्‍छा है। भैंस के दूध में गाय के मुकाबले अधिक प्रोटीन होता है, जो कि मासपेशियां बढाने में मददगार है। अगर आपको पाचन संबंधित समस्‍या है तो गाय के दूध का सेवन करें।

गाय:

कैलोरी- 61, प्रोटीन- 3.2 ग्राम, फैट 3.4 ग्राम, पानी 90 प्रतिशत, लैक्‍टोस – 4.7 ग्राम, खनिज लवण- 0.72 ग्राम।

अगर आप अपना वजन घटाना चाहते है तो गाय का दूध ज्‍यादा फायदेमंद होता है। इसके 100 मिली. दूध में सिर्फ 61 कैलोरी होती है जबकि भैंस के 100 मिली. में 97 कैलोरी होती है। भैंस के दूध में (6.9 ग्राम वसा) गाय के दूध से (3.4 ग्राम वसा) ज्‍यादा वसा होता है।

सही कारण है कि नवजात बच्‍चों को गाय का दूध दिया जाता है क्‍योंकि यह आसानी से पच जाता है। जबकि भैंस का दूध भारी होता है और पचने में गाय के दूध की अपेक्षा अच्‍छा नहीं होता है क्‍योंकि इसमें पानी की मात्रा कम होती है।

इस सब्जी का दाम सुन लेंगे तो बेशक अपने कानों पर यकीन ही नहीं कर पाएंगे

सब्जी खरीदने जाने वाला हर शख्स इन दिनों एक ही बात कहता मिलता है कि सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं। हां अगर वे दुनिया की सबसे महंगी इस सब्जी का दाम सुन लेंगे तो बेशक अपने कानों पर यकीन ही नहीं कर पाएंगे। अमूमन सब्जियां 50 रुपए किलो तक आ जाती हैं, हालांकि सीजन की शुरुआत में जब कोई नई सब्जी आती है तो उसका दाम 100 रुपए किलो तक हो सकता है, बाद में यह दाम गिर जाते हैं।

दुनिया की सबसे महंगी सब्जी गुच्छी का दाम सुनकर आप चौंक ही जाएंगे। बाजार में गुच्छी की कीमत है 25000 से 30000 रुपए प्रति किलो। यह सब्जी हिमाचल, कश्मीर और हिमालय के ऊंचे हिस्सों में पैदा होती है। यह सब्जी पहाड़ों पर बिजली की गडग़ड़ाहट व चमक से बर्फ से निकलती है।यह दुर्लभ सब्जी पहाड़ों पर साधु-संत ढूंढकर इकट्ठा करते हैं और ठंड के मौसम में इसका उपयोग करते हैं।

इसको बनाने की विधि में ड्रायफ्रूट, सब्जियां, घी इस्तेमाल किया जाता है। लजीज पकवानों में गिनी जाने वाली यह सब्जी औषधीय गुणों से भरपूर होती है और इसका वैज्ञानिक नाम मार्कुला एस्क्यूपलेंटा है। इसे हिंदी में स्पंज मशरूम भी कहा जाता है। प्राकृतिक रूप से जंगलों में उगने वाली गुच्छी फरवरी से अप्रेल के बीच मिलती है। बड़ी बड़ी कंपनियां और होटल इसे हाथोंहाथ खरीद लेते हैं। इस कारण इन इलाकों में रहने वाले लोग सीजन के समय जंगलों में ही डेरा डालकर गुच्छी इकट्ठा करते हैं।

इन लोगों से गुच्छी बड़ी कंपनियां 10 से 15 हजार रुपए प्रति किलो के हिसाब से खरीदते हैं, जबकि बाजार में इसकी कीमत 25 से 30 हजार रुपए प्रति किलो है।गुच्छी की डिमांड भारत में ही नहीं बल्कि अमरीका, यूरोप, फ्रांस, इटली और स्विट्जरलैंड तक भी है। इसमें विटामिन बी और डी के अलावा सी और के प्रचुर मात्रा में होता है। इसे नियमित खाने से दिल की बीमारी नहीं होती।

27 साल की वल्लरी चंद्राकर कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर रह चुकी है

जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर छोटा सा गांव है सिर्री (बागबाहरा) । यहां की बेटी वल्लरी चंद्राकर को अपनी धरती से इस कदर प्रेम हुआ कि वह राजधानी रायपुर के एक प्राख्यात कालेज से नौकरी छोड़कर आ गई ।

धरती का कर्ज चुकाने और ‘अपने लोग-अपनी जहां” का नारा बुलंद करते हुए वल्लरी कहती है कि नौकरी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, खेती से श्रेष्ठ नहीं हो सकती है। खेती में परिश्रम थोड़ा अधिक करना पड़ता है। किंतु, अन्‍नदाता होने का जो सुकून खेती में है, वह भाव किसी भी नौकरी में आ ही नहीं सकता । उन्‍नत तकनीक को अपनाकर खेती किया जाए तो यह घाटे का सौदा नहीं है।

वल्लरी के पिता जल मौसम विज्ञान विभाग रायपुर में उपअभियंता हैं । उनका पैतृक ग्राम सिर्री है। वल्लरी अपनी पुश्तैनी जमीन में खेती को देखने पिता के साथ कभी-कभी रायपुर से बागबाहरा के पास सिर्री गांव आती थी ।अपनी धरती से वल्लरी को इस कदर लगाव हुआ कि वह रायपुर के दुर्गा कालेज में सहायक प्राध्यापक की नौकरी छोड़कर गांव आ गई ।

बीई (आईटी) और एम टेक (कंप्यूटर साइंस) तक उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बावजूद सफ्टवेयर इंजीनियर इस बेटी ने खेती को अपना व्यवसाय बनाकर सबको चौंका दिया है। इतना ही नहीं वल्लरी खुद ट्रैक्टर चलाकर खेती कर लेती है । इन दिनों उनकी बाड़ी में मिर्ची, करेला, बरबट्टी और खीरा आदि की फसल लहलहा रही है।

अपनी शिक्षा का सदुपयोग आधुनिक तकनीक से उन्न्त खेती में करने पर जोर देते हुए वल्लरी कहती हैं कि उनकी प्रतिभा को गांव वालों और समाज के लोगों ने प्रोत्साहित किया, इससे हौसला बढ़ता गया। अब तो जिस धरती पर जन्म ली, वहां खेती करके उन्नतशील कृषक बनना ही उनका सपना है।

वल्लरी बताती हैं कि उनके दादा स्वर्गीय तेजनाथ चंद्राकर राजनांदगांव में प्राचार्य थे। शासकीय सेवा में होने से उनके घर में तीन पीढ़ियों से खेती किसी ने स्वयं नहीं किया । दादा और पिता नौकरीपेशा होने से खेती नौकर भरोसे होती रही । वल्लरी को खेती की प्रेरणा अपने नाना स्वर्गीय पंचराम चंद्राकर से मिली है। वह अपने ननिहाल सिरसा (भिलाई) जाती थी, तो वहां की खेती देखकर व भाव विभोर हो उठती थी । बचपन का उनका खेती के प्रति लगाव उन्हें अपनी धरती पर खेती करने खींच लाया । वल्लरी की छोटी बहन पल्लवी भिलाई के कालेज में सहायक प्राध्यापक हैं।

मां-बाप को है इस बेटी पर गर्व

वल्लरी की मां युवल चंद्राकर गृहणी है । वे कहती हैं कि उनकी दो बेटियां हैं। दोनों ही इस कदर होनहार हैं कि उन्हें कभी बेटे की कमी महसूस नहीं हुई । हमें बेटा और बेटी में कोई फर्क नहीं करना चाहिए । अब जब बड़ी बेटी वल्लरी खुद खेती कर सिर्री के 26 एकड़ और घुंचापाली (तुसदा) के 12 एकड़ खेत में सब्जी-भाजी की उन्नत फसलें ले रही हैं, तब उन्हें और भी ज्यादा गर्व होता है। अब तो समाज में लोग उन्हें वल्लरी की मां के नाम से पहचानते हैं।

खेती के साथ फैला रही ज्ञान का उजियारा

शहर से गांव आई वल्लरी कंप्यूटर की खास जानकार हैं। गांव के गरीब बच्चे आगे बढ़ सकें, सूचना क्रांति के क्षेत्र में उनका नाम हो। इसके लिए वह गांव के दर्जनभर बच्चों को नि:शुल्क कंप्यूटर शिक्षा भी दे रही है। दिनभरखेत में कामकाज और प्रबंधन देखने के बाद देर शाम से रात तक बच्चों को कंप्यूटर की शिक्षा देना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।

सालाना आय करीब 20 लाख रूपए

युवा सोच और ड्रीप ऐरिगेशन (टपक पद्धति से सिंचाई) से सब्जी-भाजी की खेती को वल्लरी ने लाभदायक बनाया है। उनका कहना है कि शुरूआत में प्रति एकड़ करीब डेढ़ लाख स्र्पए खर्च करना पड़ा। इस तरह उनके दो फार्म हाउस में करीब 55 से 60 लाख स्र्पए खर्च हुआ । यह वन टाइम इन्वेस्टमेंट है । इससे फार्म हाउस खेती के लिए पूरी तरह विकसित हो चुका है। सालभर में सभी खर्च काटकर प्रति एकड़ करीब 50 हजार स्र्पए शुद्ध आय हुई। इस तरह उनकी खेती से वार्षिक आय 19 से 20 लाख स्र्पए हो रहा है। वल्लरी का कहना है कि खेती को व्यवसायिक और सामुदायिक सहभागिता से उन्नत बनाने की दिशा में वे प्रयास कर रही हैं।

जाने कैसे करोड़पतियों का गांव बना महराष्ट्र का हिवरे बाजार

इस गांव में न पानी की कमी है, न हरियाली की। ये है हिवरे बाजार गांव। यह महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में आता है। यहां की आबादी 300 लोगों से ज्यादा है, जिसमें से 80 से ज्यादा लोग करोड़पति हैं। महाराष्ट्र फिलहाल सूखे की चपेट में है, पर इस गांव में न पानी की कमी है, न हरियाली की। जानें कैसे

बदली गांव की किस्मत…

  • इस गांव की किस्मत यहां के लोगों ने खुद लिखी है। क्योंकि 1990 में यहां 90 फीसदी     परिवार गरीब थे।
  •  इस बारे में गांव के सरंपच पोपट राव कहते हैं कि हिवरे बाजार 80-90 के दशक में भयंकर   सूखे से जूझा। पीने तक के लिए पानी नहीं बचा।
  •  कुछ लोग अपने परिवारों के साथ दूसरी जगहों पर चले गए। गांव में महज 93 कुएं ही थे।
  •  वाटर लेवल भी 82-110 फीट नीचे पहुंच गया था। लेकिन फिर लोगों ने खुद को बचाने की   कवायद शुरू की।

ऐसे बदली गांव की तस्वीर

  • सूखे से निपटने के लिए 1990 में एक कमेटी, ज्वाइंट फॉरेस्ट मैनेजमेंट कमेटी बनाई गई।   इसके तहत गांव में कुआं खोदने और पेड़ लगाने का काम श्रमदान के जरिए शुरू किया गया।
  • इस काम में, महाराष्ट्र इम्प्लॉयमेंट गारंटी स्कीम के तहत फंड मिला, जिससे काफी मदद     मिली। साल 1994-95 में आदर्श ग्राम योजना आई, जिसने इस काम को और रफ्तार दे दी।
  • फिर कमेटी ने गांव में उन फसलों को बैन कर दिया, जिनमें ज्यादा पानी की जरूरत थी।
  • पोपट राव ने बताया कि अब गांव में 340 कुएं है। ट्यूबवेल खत्म हो गए हैं और जमीन का   वाटर लेवल भी 30-35 फीट पर आ गया है।

गांव में 80 करोड़पति परिवार

  • सरपंच पोपट राव के मुताबिक, गांव के 305 परिवार रहते हैं। इनमें से करीब 80 करोड़पति परिवार हैं।
  •  वे बताते हैं कि यहां सभी लोगों की मुख्य आय खेती से ही होती है। यह लोग सब्जी उगाकर   ज्यादातर कमाई करते हैं।
  •  हर साल इनकी आय बढ़ रही है। खेती के जरिए जहां 80 परिवार करोड़पति के दायरे में आ   गए हैं। वहीं, 50 से अधिक परिवारों की सालाना इनकम 10 लाख रुपए से ज्यादा है।
  •  गांव की प्रति व्यक्ति आय देश के टॉप 10 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों के औसत आय (890 रुपए    प्रति माह) की दोगुनी है। यानी पिछले 15 वर्षों में औसत आय 20 गुनी हो गई है।

पीएम मोदी ने मन की बात में की थी तारीफ…

पीएम नरेंद्र मोदी ने 24 अप्रैल को ‘मन की बात’ में हिवरे बाज़ार की तारीफ करते हुए कहा था कि पानी का मूल्य क्या है, वो तो वही जानते हैं, जिन्होनें पानी की तकलीफ झेली है। और इसलिए ऐसी जगह पर, पानी के संबंध में एक संवेदनशीलता भी होती है और कुछ-न-कुछ करने की सक्रियता भी होती है। महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के हिवरे बाज़ार ग्राम पंचायत पानी की समस्या से निपटने के लिए क्रॉपिंग पैर्टन को बदला और पानी ज्यादा उपयोग करने वाली फसलों को छोड़ने का फैसला लिया। सुनने में बात बहुत सरल लगती है, लेकिन इतनी सरल नहीं है।

पांच साल का प्लान बनाया

  • पोपट राव ने बताया कि गांव को बचाने के लिए यशवंत एग्री वाटर शेड डेवलपर्स एनजीओ के   साथ मिलकर पांच साल का प्लान बनाया गया था।
  •  इसके तहत गांव में कुएं खोदे जाने थे। पेड़ लगाने थे। गांव को 100 फीसदी शौचालय वाले   गांव में शुमार करना था।
  •  उन्होंने बताया कि एक बार लोग जुड़े तो जुनून कुछ ऐसा हो गया कि पांच साल का प्लान 2     साल में ही खत्म हो गया।

 

यह किसान ज़मीन के छोटे से टुकड़े से कमाता है 30 लाख रुपये

क्या आप ने कभी सिर्फ एक कनाल में 30 लाख की कमाई की है ! सुनने में यह बात बड़ी अजीब लग सकती है लेकिन यह बात बिलकुल सच है । घर के पिछले हिस्से में आत्मनिर्भर फूड-चेन और महज ढाई एकड़ जमीन के मालिक दलविंदर सिंह एक बेहद सफल सूअर पालन केंद्र के जरिए सालाना करीब 30 लाख रुपये कमा लेते हैं, जो जमीन के इस छोटे से टुकड़े पर परंपरागत खेती से कभी संभव नहीं है।

किसान दलविंदर सिंह के लिए, जिनके पास पीढ़ियों से बंटती चली आ रही जो थोड़ी बहुत जमीन बची थी, उनके लिए फसल चक्र खेती विकल्प नहीं था। और इस बात को उन्होंने बहुत पहले ही भांप लिया था। इसी लिए साल 1980 में दलविंदर सिंह ने डेयरी व्यवसाय की ओर रुख कर लिया और साल 1990 में उन्हें दूसरा राज्य स्तरीय पुरस्कार भी मिला है ।

कुछ साल पहले पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के वैज्ञानिकों द्वारा सूअर पालन के लिए एक कोशिश किए जाने को लेकर प्रोत्साहित किए जाने के बाद दलविंदर कुछ वक्त तक उलझन में रहे। उस दौर को याद करके दलविंदर बताते हैं, “सूअर को लेकर मेरे भी मन में वैसे ही विचार थे जैसा कि आपके भी मन में भी शायद हो कि वो गंदे होते हैं, गंदगी फैलाते हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि इसे खरीदेगा कौन?”

लेकिन साल 2010 में उस वक्त सब कुछ बदल गया जब दलविंदर ने रूपनगर स्थित किशनपुरा में अपने खेतों के दो कनाल हिस्से में 10 सू्अरों के साथ सूअर पालन का काम शुरू किया। वो बताते हैं, “सूअर बुद्धिमान जानवर होते है, कुत्ते से भी ज्यादा आज्ञाकारी होते हैं। सबसे ज्यादा हैरान करनेवाली बात ये है कि सूअर अपने आस-पास की जगह को साफ-सुथरा रखते हैं।

यहां सबसे अच्छी बात ये है कि दोनों ही तरह के सुअरों, छोटे और पूरी तरह व्यस्क सूअरों के लिए भारत में बड़ा बाजार है। शुरुआत में पंजाब से खरीदने वाले केरल, असम और नागालैंड के सूअर के व्यापारी इन्हें ट्रकों के जरिए ले जाते थे, लेकिन उसके बाद वो एक साथ मिलकर धंधा करने लगे और सूअर को ले जाने के लिए ट्रेन की बुकिंग करने लगे। बाजार में मांग इतनी अधिक है कि व्यापारी खुद सुअर पालकों को खोजते हुए आते हैं, हमें बेचने के लिए एक इंच भी नहीं हिलना पडता है।”

सुअर व्यवसाय का अंक-गणित

दूसरे धंधे के मुकाबले सूअर पालन शुरू करने का अर्थशास्त्र काफी सरल है। एक पूरी तरह व्यस्क सूअर आठ हजार में खरीदा जा सकता है। वो बताते हैं, “कोई भी व्यक्ति इस धंधे को एक नर और मादा सूअर से शुरू कर सकता है। पंजाब सरकार ने एक बड़ा सफेद यॉर्कशायर नस्ल विकसित किया है जिसे सरकारी केंद्रों से खरीदा जा सकता है। एक बार में आधा दर्जन के करीब सूअर के बच्चे पैदा होते हैं इसलिए पहले तीन महीने में ही आपके पास 10 सूअर हो जाएंगें।

सूअर का एक बच्चा करीब ढाई से तीन हजार रुपये में बिक जाता है और उससे थोड़ा और बड़ा सूअर का एक बच्चा 7 से 8 हजार में बिक जाता है। शुरुआत में पानी की आपूर्ति से जुड़े एक छोटे से शेड की जरुरत होती है जिसके लिए सरकार मोटी सब्सिडी देती है। बाद में इस शेड को और विस्तार किया जा सकता है।”

दलविंदर के पास अपने सूअर प्रजनन केंद्र में 50 सूअर है, जहां आधिकांश मादा सूअरों के साथ कुछ नर सूअर भी रखे जाते हैं और सूअर पालन केंद्र को सूअर के बच्चे बेचे जाते हैं। दलविंदर कहते हैं, “हम लोग सूअरों के प्रजनन के लिए प्राकृतिक तरीका अपनाते आये हैं लेकिन अब कृत्रिम गर्भाधान तरीका भी संभव हो गया है। सूअर की प्रजनन वृद्धि दर बहुत तेज है और एक साल में एक मादा सूअर तीन से चार बार बच्चा दे सकती है।” दलविंदर सिंह के फार्म में प्रति साल एक हजार सूअर पैदा हो रहे हैं जिससे वो करीब 28 से 30 लाख रुपये आसानी से कमा लेते हैं।

धंधे की लागत ज्यादा नहीं

सूअर पालन के क्षेत्र में मजदूरी का खर्च ज्यादा नहीं है। पूरे फार्म को दलविंदर अपने बेटे, जो अभी ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे हैं, और एक सहायक की मदद से आसानी से चलाते हैं। वो बताते हैं, “फार्म पर हमेशा एक नौकर रहता है और दिन के वक्त हम लोग साथ रहते हैं। मैं सूअर का वैक्सीनेसन यानी प्रतिरक्षा का टीका खुद लगाते हैं, सहायक और मैं सूअर के होनेवाले बच्चे को संभालने के लिए प्रशिक्षित हैं। जब बच्चे छोटे रहते हैं तब हम उसके बाहरी दांत तोड़ देते हैं ताकि जब वो आपस में लड़ें तो एक-दूसरे को घायल ना कर सकें।

वहीं, सूअर को नहलाने और साफ करने का काम मेरा बेटा खुशी-खुशी कर लेता है”। वो ये भी बताते हैं, “सूअर से मिलनेवाले फायदे के साथ-साथ मैं अपने पास मौजुद पशुओं की संख्या कम करता जा रहा हूं और उसके बाद हम बहुत जल्द पूरी तर से सूअर पालन पर पर शिफ्ट हो जाएगे। और जल्द ही पशुओं को हटाने से खाली हुए जगहों का इस्तेमाल हम वयस्क, विकसित यानी मोटे सूअरों के विकास पर करेंगे”। मोटे और विकसित सूअर को खिलाने-पिलाने कोई परेशानी नहीं होती है और उनका घरेलू जूठन (हाउसहोल्ड वेस्ट) से भी काम चल जाता है।

जब वो पूरी तरह विकसित और बड़े हो जाते हैं तब उन्हें बेच दिया जाता है। वो बताते हैं, “प्रजनन केंद्र चलाने के मुकाबले मोटे सूअरों को पालने का धंधा ज्यादा आसान है और पूरे राज्य में आज इसी तरह का ट्रेंड चल रहा है” पंजाब में आज करीब 60 सूअर फार्म चल रहे हैं जिसके बूते यहां के किसान भव्य और बेहतरीन जिंदगी बिता रहे हैं।

सुनहरा मौका हाथ से न जाने दें

सूअर किसान संघ के सचिव दलविंदर चाहते हैं कि दूसरे सीमांत किसान भी सूअर पालन व्यवसाय की ओर रुख करें। वो बताते हैं, “जितनी जमीन मेरे पास है और उस पर जो कमाई होती उसकी कोई तुलना नहीं हो सकती है। दो एकड़ जमीन पर खेती करने से मैं एक साल में एक लाख रुपये कमा लेता। सूअर पालन को प्रोत्साहित करनेवाले सरकारी कार्यक्रम में जब मैं गया तो मैं अन्य किसानों को बताता हूं कि एक कनाल सूअर फार्मिंग से वो इतना कमा लेंगे जितना कि वो 42 एकड़ जमीन में खेती करने से कमा सकते हैं।”

हालांकि, सूअर पालन के धंधे में उतरनेवाले को दलविंदर सावधान करना नहीं भूलते हैं और कहते हैं कि इस धंधे में उतरने से पहले प्रशिक्षण बेहद जरूरी है। महज दसवीं पास दलविंदर ने खरार में स्थित सरकारी सूअर पालन केंद्र (पीएयू) के साथ-साथ गुवाहाटी और बरेली के संस्थान से प्रशिक्षण लिया है। सूअरों के टीकाकरण के साथ साथ उनके स्वास्थ्य पर लगातार नजर रखने की जरूरत होती है क्योंकि उनके मांस को खाया जाता है। इससे पहले की सुअर मानव खाद्य ऋंखला का हिस्सा बनें मैं ये सुनिश्चित करना चाहता हं कि वो पूरी तरह स्वस्थ हैं। लेकिन वहीं, चिंता की बात ये है कि ऐसे कई किसान हैं जो मोटे-तगड़े यानी वयस्क सूअर का कारोबार कर रहे हैं और वो भी बिना किसी प्रशिक्षण के, जो ठीक नहीं है”।

ये प्रशिक्षण का ही कमाल था कि उन्होंने गाय और जमीन को मिलाकर एक ऐसा फूड चेन तैयार कर लिया जिससे सूअर पालन के धंधे के लागत में भी कमी आई। अपना अनुभव बांटते हुए वो कहते हैं, “मेरे पास जो जमीन है मैं उसमें पशुचारे को पैदा करता हूं। इससे मेरे पास मौजुद 14 गायों की जरूरत पूरी हो जाती है। इनसे मुझे करीब 100 लीटर दूध मिल जाता है जिसे बेचने से इतनी आमदनी हो जाती है कि आसानी से सूअरों का चारा खरीद लेता हूं।

सूअर के अपशिष्ट को वापस खेत में डाल देते हैं जो पशुचारे के लिए ऊर्वरक का काम करता है। यह सब पर्याप्त होता है और मुझे बाजार से ऊर्वरक खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। जो कुछ भी मैं सूअर बेच कर कमाता हूं वो पूरा का पूरा शुद्ध मुनाफा होता है।”

सूअर पालन का अर्थशास्त्र

  • पूरी तरह विकसित सूअर की कीमत 8 हजार रुपये, महज एक नर और एक मादा से कोई भी इस धंधे को शुरु कर सकता है।
  • एक बार में छह या इससे ज्यादा सूअर के बच्चे पैदा होते हैं, इस तरह तीन महीने के अंदर 10 सूअर हो जाता है।
  • सूअर का एक बच्चा करीब ढाई हजार रुपये में बिकता है, पूर्ण विकसित सूअर आठ हजार रुपये में तक बिकता है।
  • दो एकड़ जमीन पर एक बार में 50 सूअर का पालन हो सकता है।
  • एक साल में एक हजार सूअर का उत्पादन कर 30 लाख रुपये कमाई की जा सकती है।

दूसरे से तुलना संभव नहीं

सूअर पालन किसान एसोसिएशन के सचिव दलविंदर सिंह कहते हैं, “सूअर पालन व्यवसाय की तुलना परंपरागत खेती-बाड़ी और उससे हासिल की गई आमदनी से बिल्कुल नहीं की जा सकती है।” वो यह भी बताते हैं, “एक एकड़ क्षेत्र में गेहूं-चावल की सालाना खेती से एक लाख 20 हजार

की आमदनी होती है। वहीं, अगर सूअर पालन का धंधा एक कनाल फार्म में अच्छी तरह से किया जाएगा तो वो 42 एकड़ की खेती के बराबर होता है।”

ऐसे करें तीन माह में 2 लाख कमाई देने वाली तुलसी की खेती

कम लागत, कम मेहनत और मुनाफा कई गुना। सुनने में भले अटपटा लगे लेकिन तुलसी की खेती करने वाले किसान इसकी हकीकत जानते हैं। तुलसी आमतौर पर घरों के आंगन में दिखाई देती है। तुलसी को घर के आंगन में लगाने की परंपरा उसके औषधीय गुणों के कारण है। यह गुण अब किसानों को भी मालामाल कर रहा है।वर्तमान में इसे ओषीधिय खेती के रूप में किया जाने लगा है।यह पुरे भारत में पाया जाता है। इसकी कई प्रकार की जातीया होती है जेसे:- ओसेसिम बेसिलिकम,ग्रेटीसिमम,सेकटम,मिनिमम,अमेरिकेनम।

तुलसी की खेती करने वाले किसानों की मानें तो 10 बीघा जमीन में तीन महीने में 15 हजार रु. की लागत से तैयार तुलसी की खेती से तीन लाख रु. का मुनाफा हो रहा है। तुलसी ने उनके भाग्य बदल दिए हैं।

तुलसी की फसल से दो तरह के प्रॉडक्‍ट प्राप्‍त तोते हैं। पहला बीज और दूसरा पत्तियां। इसके बीज को सीधे मंडी में बेचा जाता है जबकि, पत्तियों से तेल निकालकर कमाई की जाती है। एक हेक्‍टेयर फसल में लगभग 120 से 150 किलोग्राम तक बीज मिल जाता है।

जबकि, अच्‍छी फसल में 170 से 200 किलोग्राम तक पत्तियों से तेल प्राप्‍त किया जा सकता है। नीमच मंडी मध्‍य प्रदेश में बीज की कीमत लगभग 200 रुपए प्रति किलोग्राम के आसपास है। वहीं, तेल कीमत वर्तमान में 700 से 800 रुपए प्रति किलोग्राम है। यदि कम से कम प्रोडक्‍शन और कीमत को आधार बनाएं तो इनसे लगभग 2 से 2.25 लाख रुपए इनकम हो जाती है।

तुलसी लगाने के लिए खेत की तेयारी केसे करे:-

खेत में प्रथम जुताई से पहले 200 से 300 किवंटल अच्छी पक्की हुई खाद को खेत में बिखर दे ताकि वह मिटटी में अच्छी तरहा से गुलमिल जाये। अंतिम जुताई करते वक्त आप रासयनिक खाद जिसमे यूरिया 100kg और 500kg सुपर फास्फ़ेट और 125 kg म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति हेक्टर के हिसाब से एक समान पुरे खेत में बिखेर दे।तुलसी के रुपाई के 20 दिनों के बाद खेत में आवश्यक नमी का ध्यान रखकर 50kg यूरिया देवे। दूसरी और तीसरी कटाई के तुरंत बाद भी 50kg यूरिया फसल को देवे यूरिया देते वक्त ध्यान रखे की यूरिया पोधो के पत्तो पर ना गिरे।

तुलसी को खेत में केसे लगाये:-

नर्सरी में पोधे तेयार कर के

एक हेक्टेयर के लिए अच्छी किस्म का 300 या 400 ग्राम बीज ले फिर नर्सरी लगाने वाली जमीन की अच्छी जुताई और खाद दे कर उसमे 1 मीटर की 8 से 10 क्यारिया 1 हेक्टर के लिए तेयार कर ले। क्यारी को जमीन से 75सेमी ऊपर उठाना चाहिए और क्यारी से क्यारी की दुरी 30सेमी रखे ताकि खतपतवार को आसानी से निकला जा सके। प्रति क्यारी में 15सेमी की दुरी से बिजो को लगाये लगभग 100 बीज एक क्यारी में आ जायेगे।

बीजो को मिटटी में से ढक देने के बाद उसे पर्याप्त पानी छिडकते रहे 8 से 12 दिनों के बाद बीज अंकुरित हो जाते है। फिर समय समय पर निदाई गुड़ाई और सिचाई करते रहे। जब पोधे 12 से 15सेमी की लम्बाई के हो जाये तो उन्हें सावधानी पूर्वक निकाल के खेतो में रोप सकते है।

शाखाओ द्वारा रोपण

तुलसी का प्रसारण बीज के अलावा टहनियों से भी किया जाता है। उसके लिए तुलसी की 10 से 15सेमी की टहनी को काटकर उसे छाया में रखकर सुबह साम हजारे से पानी देते रहे भूमि में एक माह के भीतर उसकी जडे विकसित हो जाती है और नई पत्तिया निकलने लगती है। उसके बाद उसे वहा से निकाल कर खेत में रोप सकते है।

पोधे की रोपाई केसे करे

जब पोधे नर्सरी में तेयार हो जाये तो उनमे से स्वस्थ पोधो को जुलाई के प्रथम सप्ताह में 45×45सेमी की दुरी पर पोधे रोपे। यदि आप आर.आर.ओ.एल.सी.किस्म की तुलसी लगा रहे हो तो 50×50सेमी की दुरी जरुर रखे।

तुलसी की सिचाई केसे करे

पोधे रोपन के बाद हलकी सिचाई की आवश्यकता होती हे।गर्मी के दिनों में 15 दिन के अंतराल में सिचाई करे। पहली फसल कटाई के बाद भी तुरतं बाद सिचाई आवश्यक होती हे। सिचाई से पहले यूरिया उपर लिखे अनुसार देवे। जब भी फसल कटाई हो उसके 10 दिन पहले सिचाई बंद कर देना चाहिए।

खतपतवार नियन्त्रण और खुदाई निदाई

तुलसी के खेत में बहुत प्रकार के खतपतवार उग जाते है जो फसल की पैदावार में दिक्कत करते है और पोषक तत्वों के का नाश करते है इसलिए उन्हें रोपाई के 20 दिन बाद खतपतवार को निकाल लेना चाहिए फिर जब भी खतपतवार उगे तो उन्हें नष्ट करना चाहिए। यदि आप एक से अधिक फसल लेना हो तो 10 दिन के अन्तराल में खतपतवार निकालते रहना चाहिए।

फसल की कटाई

तुलसी की फसल में कटाई का बहुत महत्व होता है क्यों की कटाई का सीधा असर तेल की मात्रा पर पड़ता है। इसलिए जब पोधो की पत्तियों का रंग पूरा हरा हो जाये तो कटाई कर लेना चाहिए। फुल आने के बाद तेल की मात्रा और गुणवक्ता पर असर पड़ता है। कटाई हमेशा ऊपरी भाग में करना चाहिए ताकि फिर से नए शाखाये और पत्ते आ सके।कटाई हमेशा दराती की मदद से काटना चाहिए।

तुलसी की उन्नतशील किस्म जेसे R.R.L.O.P हे जिसकी तिन बार तक कटाई हो सकती है। जिसकी पहली कटाई जून और दूसरी कटाई दिसम्बर और तीसरी नवम्बर में की जाती है। इस किस्म की फसल की कटाई सतह से 30सेमी ऊपर से कटना चाहिए।

तुलसी की आसवन प्रक्रया

इस विधि में फसल से तुलसी का तेल निकाला जाता है जिसका प्रयोग बहुत से माउथ वाश सलाद मुररबा आदि में तुलसी का फेलेवेर लाने के लिए उपयोग होता है।आसवन हमेशा ताज़ा फसल से ही किया जाना चाहिए ताकि तेल और गुणवक्ता अधिक मिले।एक हेक्टर तुलसी की फसल से तकरीबन 170kg तक तेल निकल सकता हे।आसवन विधि से तेल निकलने के बाद बची हुई पत्तियों से खाद और बची हुई लकड़ी जलाने के काम आ जाती हे।

तुलसी का उत्पादन 

तुलसी की खेती करने से प्रथम वर्ष में किसान को 400 किवंटल और उसके बाद वाले वर्षो में लगभग 700 किवंटल शाकीय उत्पादन मिलता है।

ऐसे शुरू करें अपना पोल्ट्री फार्म ,जाने इस बिज़नेस की हर बारीकी को

हमारे देश में पूरे साल अंडों की बहुत मांग रहती है और नेशनल इंस्टीट्यूट आफ न्यूट्रीशन की राय के तहत भी हर इनसान को 1 साल में 180 अंडे और 11 किलोग्राम चिकन मीट खाना चाहिए, जबकि हमारे देश में साल भर में हर इनसान केवल 53 अंडे और 2.5 किलोग्राम चिकन मीट ही खा पाता है. अब आप इस आंकड़े से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे देश में पोल्ट्री इंडस्ट्री के विकास की कितनी गुंजाइश है.

गांव के बहुत से बेरोजगार नौजवान पोल्ट्री बिजनेस शुरू करना चाहते हैं, पर वे जानकारी न होने की वजह से इस कारोबार में हाथ डालने से घबराते हैं. कोई व्यक्ति इस काम में हाथ डाल भी देता है, तो पोल्ट्री बिजनेस की पूरी जानकारी नहीं होने की वजह से उस का पोल्ट्री कारोबार कामयाब नहीं होता. पोल्ट्री का बिजनेस शुरू करने से पहले इस बिजनेस की हर बारीकी को जान लेना चाहिए, जैसे कौन सी नस्ल (स्ट्रेन) को पाल कर कम खर्चे पर ज्यादा अंडे पैदा किए जा सकते हैं.

हमारे देश के गांवों में ज्यादातर किसान बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग कर के अंडे और चिकन मीट पैदा करते हैं, जिस का इस्तेमाल वे अपने परिवार के खाने में ही कर लेते हैं. अगर ये किसान अपनी बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग को कमर्शियल लेयर/ब्रायलर प्रोडक्शन की यूनिट में बदल दें, तो घर के खाने के अलावा कमाई का एक अच्छा जरीया बना सकते हैं.

किसानों के पास खुद की जमीन होती है और शेड बनाने में ज्यादा खर्च भी नहीं होता. अंडा एक बहुत ही पौष्टिक खाना है, सुबह नाश्ते में 1 या 2 अंडे खाए जाएं तो दोपहर तक भूख नहीं लगेगी यानी नुकसानदायक चीजें जैसे परांठे, ब्रेडपकौड़े, समोसे वगैरह खाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि आप को भूख नहीं लगेगी. वैसे भी ब्रेडपकौड़े व समोसे वगैरह हर इनसान को नुकसान पहुंचाते हैं. अगर इस की जगह अंडे खाए जाएं, तो शरीर को जरूरी विटामिन व मिनरल की पूर्ति कम दामों में होगी और सेहत भी अच्छी बनी रहेगी.

हमारे देश में अंडे पैदा करने के लिए बहुत सी मुरगियां यानी स्ट्रेन (ब्रीड) उपलब्ध हैं, पर हमारे देश की आबोहवा ऐसी नहीं है कि कोई भी स्ट्रेन कम खर्च पर ज्यादा अंडे पैदा करने की कूवत रखती हो. इसलिए ऐसी नस्ल का चुनाव करें जो आप के इलाके की आबोहवा में अच्छा उत्पादन कर सके. अंडे पैदा करने के लिए बीवी 300 स्ट्रेन और चिकन मीट पैदा करने के कोब्ब 400 स्ट्रेन बढि़या मानी गई हैं. ये दोनों स्ट्रेन हमारे देश के सभी राज्यों में गरमी, सर्दी व बरसात सभी मौसमों में कम खर्च पर ज्यादा उत्पादन देने की कूवत रखती हैं.

सामान्य मैनेजमेंट पर भी इन दोनों स्ट्रेनों में ज्यादा गरमी, ज्यादा बरसात, ज्यादा ठंड और ज्यादा नमी में मौत दर भी कम है. बीवी 300 मुरगी 18 हफ्ते की होने के बाद अंडे देना शुरू कर देती है और 80 हफ्ते तक 374 अंडे देती है. ये 374 अंडे पैदा करने के लिए (19 से 80 हफ्ते तक) यह मुरगी कुल 46.6 किलोग्राम दाना (फीड) खाती है और पहले दिन से ले कर 18 हफ्ते तक 5.60 किलोग्राम दाना खाती है. यह मुरगी अंडा देना शुरू करने के बाद 80 हफ्ते तक रोजाना औसतन 111 ग्राम दाना खाती है. पहले दिन से ले कर 18 हफ्ते तक डेप्लेशन यानी मोर्टेलिटी व कलिंग 3-4 फीसदी तक ही होती है और 19 हफ्ते से 80 हफ्ते तक डेप्लेशन 7 फीसदी तक होता है.

वेनकोब्ब 400 ब्रायलर दुनिया में जानीमानी कमर्शियल ब्रायलर की उम्दा स्ट्रेन (नस्ल) है. यह हमारे देश के सभी हिस्सों में अच्छे नतीजे देती है. ज्यादा गरमी और ठंड या बरसात के मौसम में इस स्ट्रेन में मोर्टेलिटी बहुत कम होती है और बढ़वार अच्छी होती है. बड़े पैमाने पर ब्रायलर फार्मिंग करने वाले किसान वेनकोब्ब 400 ब्रायलर को ही पालना पसंद करते हैं. वेनकोब्ब 400 ब्रायलर स्ट्रेन 35 दिनों में तकरीबन 3 किलोग्राम फीड खा कर 2 किलोग्राम तक यानी 1900-2000 ग्राम तक वजन हासिल करने की कूवत रखती है. फार्म पर मैनेजमेंट अच्छा हो तो 35 दिनों में केवल 2.75 फीसदी की मौत दर देखी गई है.

कमर्शियल लेयर (अंडे देने वाली मुरगी) को केज और डीपलिटर सिस्टम और कमर्शियल ब्रायलर को केवल डीपलिटर सिस्टम से पालते हैं. मुरगी पालने के शेड हमेशा साइंटिफिक स्टैंडर्ड के मुताबिक ही बनाने चाहिए. अगर आप ने पोल्ट्री शेड गलत दिशा और गलत तरीके से बना दिया है, तो आप का सारा पैसा बरबाद होगा ही और गलत तरीके से बनाए गए शेड में आप मुरगी से उस की कूवत के मुताबिक उत्पादन नहीं ले पाएंगे. गलत बने शेड में मुरगियों की मौतें भी ज्यादा होती हैं. मुरगियों को जंगली जानवरों, कुत्ते व बिल्ली वगैरह से बचाने के लिए शेड की चैन लिंक (जाली) अच्छी क्वालिटी की होनी चाहिए.

सर्दी के मौसम में शेड को गरम रखने और गरमी के मौसम में शेड को ठंडा रखने के लिए कूलर, पंखे, फागर वगैरह का भी इंतजाम रखें. शेड को थोड़ी ऊंचाई पर बनाएं जिस से बरसात का पानी शेड के अंदर नहीं घुसे. शेड के अंदर गरमीसर्दी के असर को कम करने के लिए शेड की छत पर 6 इंच मोटा थैच (घासफूस का छप्पर) डाल देना चाहिए. पर थैच को आग से बचाने के लिए शेड की छत पर स्प्रिंकलर लगा देना चाहिए ताकि जरूरत पड़ने पर उसे चलाया जा सके. शेड की छत पर थैच डालने पर गरमी के मौसम में शेड के अंदर 7-10 डिगरी तापमान कम हो जाता है. सर्दी के मौसम में भी थैच शेड के अंदर का तापमान ज्यादा नीचे तक नहीं जाने देता है.

चिकन मीट और अंडा उत्पादन के कुल खर्च का 60 से 70 फीसदी दाने पर खर्च होता है. इसलिए दाने की क्वालिटी एकदम अच्छी होनी चाहिए. पोल्ट्री फीड उम्र, स्ट्रेन, मौसम, प्रोडक्शन स्टेज, फीडिंग मैनेजमेंट वगैरह के पैमाने पर खरा उतारना चाहिए. पोल्ट्री फीड संतुलित नहीं है तो मुरगी कम अंडे पैदा करेगी और पोषक तत्त्व और विटामिन की कमी से होने वाली बीमारियां भी मुरगियों को होने लगेंगी, जैसे फैटी लिवर सिंड्रोम, पेरोसिस, डर्मेटाइटिस, रिकेट्स, कर्लटाय पेरालिसिस वगैरह. अंडे देने वाली मुरगी को लगातार अंडे देने के लिए 2500 से 2650 किलोग्राम कैलोरी वाले फीड की जरूरत होती है, उम्र और अंडे के वजन के मुताबिक ही फीड की कैलोरी तय की जाती है. 1 से 7 हफ्ते के चूजे को 2900 किलोग्राम कैलोरी का फीड, जबकि ग्रोवर को 2800 किलोग्राम कैलोरी का फीड देना चाहिए.

मुरगी दाने और फीड बनाने वाले इंग्रेडिएंट (मक्का वगैरह) में नमी कभी भी 10-11 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. अगर मक्के में नमी ज्यादा होती है, तो फंगस लग सकता है और फंगस लगा मक्का फीड में इस्तेमाल करने से उस में अफ्लाटाक्सिन (एक प्रकार का जहर) की मात्रा बढ़ जाएगी, जो मुरगी की इम्युनिटी (बीमारी झेलने की कूवत) को कमजोर कर देगी और मुरगी जल्द ही बीमारी की चपेट में आ जाएगी. बेहतर होगा कि पोल्ट्री फीड प्राइवेट कंपनी से खरीदा जाए ताकि फीड से जुड़ी किसी भी तरह की परेशानी से बचा जा सके.

उत्तरा फीड कंपनी देश में बड़े पैमाने पर उम्दा क्वालिटी का पोल्ट्री फीड बेचती है. इस कंपनी की सेल्स टीम से संपर्क कर के फीड खरीदें. मुरगियों के लिए रोशनी सब से खास चीज है. अंडे देने वाली कमर्शियल मुरगी को 16 घंटे लाइट देते हैं और चूजे को ब्रूडिंग के दौरान 24 घंटे, ग्रोवर/पुलेट को 12 घंटे लाइट (नेचुरल लाइट) देते हैं. लाइट मौसम व स्ट्रेन वगैरह पर निर्भर करती है और इसी आधार पर ही लाइट का मैनेजमेंट करते हैं. कमर्शियल लेवल पर पीली, लाल, आरेंज रंग की लाइट से अच्छे नतीजे मिलते हैं. ब्रायलर को 24 घंटे लाइट दी जाती है. लाइट देने में किसी तरह की कोई कंजूसी न करें. लाइट 1 वाट प्रति 4 वर्ग फुट के हिसाब से दें. अपने फार्म की मुरगियों (फ्लाक) को समय पर टीके दें. सामान्य वैक्सीनेशन शिड्यूल इलाके और फार्म के मुताबिक पोल्ट्री चूजा बेचने वाली कंपनी से लें और उसे अपनाएं.

फार्म की मुरगियों से लगातार अच्छे अंडे लेने और उन को बीमारी से बचाने के लिए पानी भी सब से अहम चीज है. फार्म की मुरगियों को हमेशा ताजा व साफ पानी यानी जो इनसानों के लिए भी पीने लायक हो, देना चाहिए. ई कोलाई, साल्मोनेला बैक्टीरिया, पीएच, हार्डनेस, कैल्शियम वगैरह की जांच के लिए पानी की जांच समयसमय पर कराते रहें. अगर जांच में पानी में कोई कमी मिलती है, तो उसे फौरन दुरुस्त करें. सब से अच्छा होगा कि पोल्ट्री फार्म पर आरओ प्लांट लगा कर मुरगियों को उस का पानी दें, इस से मुरगियों की अंडा पैदा करने की कूवत में काफी इजाफा होगा और वे ज्यादा अंडे देंगी और पानी से जुड़ी बीमारियों से भी बची रहेंगी. 3000 लीटर प्रति घंटा आरओ का पानी तैयार करने के लिए आरओ प्लांट पर तकरीबन 5-6 लाख रुपए का खर्च आएगा.

फार्म पर नया फ्लाक डालने से पहले फार्म और शेड की साफसफाई तय मानकों के अनुसार करना जरूरी होता है. शेड के सभी उपकरण (दानेपानी के बरतन, परदे, ब्रूडर, केज) व परदे वगैरह को अच्छी तरह साफ करना चाहिए. पहले फ्लाक के पंख, खाद, फीड बैग वगैरह को जला दें. शेड को साफ पानी से अच्छी तरह धो कर साफ करने के बाद शेड और उपकरणों की सफाई के लिए डिसइन्फेक्टेंट का इस्तेमाल करें. शेड की छत, पिलर वगैरह पर वाइट वाश (चूना) करने के बाद फिर से डिसइन्फेक्टेंट का स्प्रे करें.शेड का फर्श पक्का है तो उसे अच्छी तरह से लोहे के ब्रश से रगड़ कर साफ करें और फिर उस की साफ पानी से अच्छी तरह सफाई कर के उस पर 10 फीसदी वाले फार्मलीन के घोल का छिड़काव करें. खाली शेड में एक्स 185 डिसइन्फेक्टेंट की 4 मिलीलीटर मात्रा 1 लीटर पानी में घोल कर 25 वर्ग फुट रकबे में अच्छी तरह छिड़काव करें. शेड का फर्श कच्चा हो तो शेड के फर्श की 2 इंच तक मिट्टी की परत खरोंच कर निकाल दें और उस जगह पर दूसरे खेत की साफ ताजी मिट्टी डाल दें. अगर पिछले फ्लाक में किसी खास बीमारी का हमला हुआ था, तो पोल्ट्री कंपनी के टेक्निकल डाक्टर से शेड की सफाई का शेड्यूल लें और उसी के अनुसार ही शेड की साफसफाई करें.

फार्म पर बायो सिक्योरिटी अपनाएं मतलब फार्म पर बाहर के किसी भी शख्स को न आने दें.आप के फार्म पर बायोसिक्योरिटी जितनी अच्छी होगी तो फार्म की मुरगियों को बीमारी लगने की संभावना उतनी ही कम होगी. इसलिए बायोसिक्योरिटी बनाए रखने के लिए फार्म के गेट पर फुटबाथ बनाएं. सभी वर्कर, सुपरवाइजर, डाक्टर, विजिटर को नहला कर और फार्म के कपड़े पहना कर ही फार्म में घुसने दें. जंगली पक्षी भी बायोसिक्योरिटी को तोड़ते हैं और फार्म पर बीमारी फैलाने में खास रोल अदा करते हैं. इसलिए फार्म पर लगे पेड़ों पर अगर जंगली पक्षियों का बसेरा है, तो उन को खत्म कर दें. अपने मुरगी फार्म से अच्छा मुनाफा कमाने के लिए सभी मुरगीपालकों को बायोसिक्योरिटी पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. फार्म माइक्रो लेवल पर साइंटिफिक मैनेजमेंट अपनाना जरूरी है, तब जा कर पोल्ट्री फार्म से अच्छे मुनाफेकी उम्मीद की जा सकती है. बीवी 300 और कोब्ब 400 के 1 दिन के चूजे, दाना, दवा, वैक्सीन वगैरह खरीदने के लिए

इन कंपनियों में संपर्क करें :

  •  वैंकीस इंडिया लिमिटेड.
  •  वेंकटेश्वर रिसर्च एंड ब्रीडिंग फार्म प्राइवेट लिमिटेड.
  •  बीवी बायो कार्प प्राइवेट लिमिटेड.
  •  उत्तरा फूड्स एंड फीड प्राइवेट लिमिटेड.

ध्यान देने लायक बातें:

अंडों को लंबे समय तक खाने लायक बनाए रखने के लिए उन्हें फ्रिज में रखें. अंडे से बनी डिश को फौरन खा कर खत्म कर दें. अंडे से बनी डिश को फ्रिज में कतई स्टोर न करें. वर्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन और पान अमेरिका हेल्थ आर्गनाइजेशन की सलाह के मुताबिक अंडे रोज खाने चाहिए. अंडे में सभी जरूरी न्यूट्रिएंट्स जैसे आयरन और जिंक वगैरह अच्छी मात्रा में मौजूद होते हैं.

पोल्ट्री फार्म ऐसे शुरू करें:

पोल्ट्री फार्म खोलने से पहले पोल्ट्री एक्सपर्ट से सलाहमशवरा करें. इस के नफेनुकसान पर गौर करें. तैयार माल को बेचने की पहले से प्लानिंग तैयार करें. पोल्ट्री एक्सपर्ट या पोल्ट्री चूजादाना बेचने वाली कंपनी के टेक्निकल सर्विस के डाक्टर से बात कर के ट्रेनिंग लें और उन्हीं की देखरेख में ब्रायलर फार्म चलाएं. अगर इस काम को बड़े लेवल पर करना हो, तो प्रोजेक्ट बना कर बैंक से लोन ले सकते हैं. प्रोजेक्ट बनाने में पोल्ट्री कंपनी के टेक्निकल डाक्टर और बैंक के एग्रीकल्चर डेवलपमेंट अफसर से मदद लें.
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