भारत का ये शहर, जहां आलू-प्याज से भी सस्ते बिकते हैं काजू !

काजू खाने या खिलाने की बात आते ही आमतौर पर लोग जेब टटोलने लगते हैं. ऐसे में कोई कहे कि काजू की कीमत आलू-प्याज से भी कम है तो आप शायद ही विश्वास करेंगे. यानी अगर आप दिल्ली में 800 रुपए किलो काजू खरीदते हैं तो यहां से 12 सौ किलोमीटर दूर झारखंड में काजू बेहद सस्ते हैं. जामताड़ा जिले में काजू 10 से 20 रुपये प्रति किलो बिकते हैं.

जामताड़ा के नाला में करीब 49 एकड़ इलाके में काजू के बागान हैं. बागान में काम करने वाले बच्चे और महिलाएं काजू को बेहद सस्ते दाम में बेच देते हैं. काजू की फसल में फायदा होने के चलते इलाके के काफी लोगों का रुझान इस ओर हो रहा है. ये बागान जामताड़ा ब्लॉक मुख्यालय से चार किलोमीटर की दूरी हैं.

बागान बनने के पीछे है दिलचस्प कहानी

सबसे दिलचस्प बात यह है कि जामताड़ा में काजू की इतनी बड़ी पैदावार चंद साल की मेहनत के बाद शुरू हुई है. इलाके के लोग बताते हैं जामताड़ा के पूर्व उपायुक्त कृपानंद झा को काजू खाना बेहद पसंद था. इसी वजह वह चाहते थे कि जामताड़ा में काजू के बागान बन जाए तो वे ताजी और सस्ती काजू खा सकेंगे.

इसी वजह से कृपानंद झा ने ओडिशा में काजू की खेती करने वालों से मिले. उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से जामताड़ा की भौगोलिक स्थिति का पता किया. इसके बाद यहां काजू की बागवानी शुरू कराई. देखते ही देखते चंद साल में यहां काजू की बड़े पैमाने पर खेती होने लगी

कृपानंद झा के यहां से जाने के बाद निमाई चन्द्र घोष एंड कंपनी को केवल तीन लाख रुपए भुगतान पर तीन साल के लिए बागान की निगरानी का जिम्मा सौंपा गया. एक अनुमान के मुताबिक बागान में हर साल हजारों क्विंटल काजू फलते हैं. देखरेख के अभाव में स्थानीय लोग और यहां से गुजरने वाले काजू तोड़कर ले जाते हैं.

इस बार बासमती करेगी किसानों के वारे-न्‍यारे

बासमती 1509 ने इस बार किसानों को खूब साथ निभाया है। 1509 का भाव 3100 रुपए तक हो गया है। अभी इसमें और तेजी आने की संभावना जताई जा रही है। वहीं कुछ दिन बाद ही बाजार में आने वाली 1121 वैरायटी के भी भरपूर दाम मिलने की प्रबंल संभावना इस बार नजर आ रही है।

3400 से शुरू हो सकते हैं भाव

बासमती चावल के घरेलू और अंतरराष्‍ट्रीय बाजार पर पैनी नजर रखने वाले अमृतसर के चावल विशेषज्ञ नीरज शर्मा का कहना है कि इस बार बासमती की तेजी हवा हवाई नहीं है। इसके फंडामैंटल मजबूत हैं। नीरज का कहना है कि इस बार बासमती 1121 की नई फसल की शुरूआत 3400 रुपए क्विंटल से हो सकती है।

ऐसा इसलिए है क्‍योंकि इस बार 1121 का कैरी आवर स्‍टॉक नहीं है। दूसरा, 1121 धान की बुआई बहुत कम हुई है। इसलिए मांग ज्‍यादा होगी और आपूर्ति कम। यह स्थिति भाव को बढ़ाएगी। फिलहाल पुराना 1121 धान 3200 रुपए तक बिक रहा है।

नीरज शर्मा ने बताया कि अगर 1509 के दाम अगर अब और बढते हैं तो इसका असर भी 1121 के भाव पर पड़ेगा। अगर 1509 की तेजी बरकरार रही तो 1121 के भावों को भी पंख लग सकते हैं।गौरतलब है कि नीरज शर्मा ने दो सितंबर को दावा किया था कि इस बार 1509 के दाम शुरूआत में 2200-2300 रुपए रहेंगे और ज्‍यों ही आवक बढ़ेगी तो दामों में इजाफा होता जाएगा। नीरज का यह दावा सही साबित हुआ और अब 1509 बासमती 3200 रुपए तक पहुंच चुका है।

आठ फीसदी कम बुआई

भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल बासमती धान की बुआई पिछले साल की तुलना में करीब 8 फीसदी कम हुई है, जबकि धान की कुल बुआई करीब तीन फीसदी कम हुई है। वर्ष 2016 में बसमाती उत्पादक प्रमुख राज्यों में बासमती का कुल रकबा 16.89 लाख हेक्टेयर था जो इस साल यानी 2017 में घटकर 15.55 लाख हेक्टेयर रह गया।

सरकार ने भी माना कम होगा उत्‍पादन

सरकार द्वारा जारी खरीफ फसलों के पहले पूर्वानुमान में कहा गया है कि खरीफ चावल का कुल उत्‍पादन 94.48 मिलियन टन तक अनुमानित है। यह विगत वर्ष के 96.39 मिलियन टन रिकार्ड उत्‍पादन की तुलना में 1.91 मिलियन टन कम है। हालांकि यह आंकड़ा सभी तरह के चावल का है। विशेषज्ञों का मानना है इस 1.91 लाख टन की कमी में बड़ा हिस्‍सा बासमती का है।

ये है टमाटर की नई प्रजाति जो प्रति पौधा देती है 19 किल्लो उपज

टमाटर का इकलौता पौधा 5 किलो से लेकर 10 किलो तक उपज दे सकता है ये भी आपको ज्यादा लग रहा होगा, है न!हम यहां जिस टमाटर के पौधे का जिक्र करने जा रहे हैं, वो कोई मामूली टमाटर के पौधे नहीं है, इसे भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) ने विकसित किया है।

संस्थान ने टमाटर की ये नई किस्म जो विकसित की है, उसके एक पौधे से 19 किलो टमाटर का उत्पादन हुआ है। रिकॉर्ड बनाने वाली टमाटर की इस नई उन्नतशील किस्म का नाम अर्का रक्षक है। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने परिशोधन खेती के तहत उन्नतशील किस्म के इस पौधे से इतना उपज हासिल किया।

इस विधि से टमाटर उत्पादन का ये उच्चतम उपज स्तर है। इस रिकार्ड तोड़ उपज ने टमाटर की खेती करने वाले किसानों के बीच हलचल मचा दी है। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान अर्कावथी नदी के किनारे स्थित है। यही वजह है कि उत्पादन के रिकॉर्ड बनाने वाली टमाटर की इस नई किस्म को अर्का रक्षक के नाम से नवाजा गया है।

इसके बारे में संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक और सब्ज फसल डिवीजन के प्रमुख एटी सदाशिव कहते हैं, “पूरे प्रदेश में टमाटर की ये सर्वाधिक उपज है और वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक टमाटर की ये प्रजाति राज्य में में टमाटर की सबसे ज्यादा उपज देने वाली साबित हुई है”।

इनके मुताबिक टमाटर के संकर प्रजाति की अन्य पौधों में सर्वाधिक उपज 15 किलो तक रिकार्ड की गई है। उन्होंने कहा कि जहां कर्नाटक में टमाटर का प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन 35 टन है, वहीं अर्का रक्षक प्रजाति की टमाटर का उत्पादन प्रति हेक्टेयर 190 टन तक हुआ है।

नई किस्म के टमाटर के पौधे को लेकर किसानों के बीच काफी उत्सुकता है। कई किसान इसकी खेती को लेकर काफी आशान्वित नज़र आ रहे हैं और कुछ किसान इसकी खेती कर रिकार्ड उपज भी पा चुके हैं।

चिक्कबल्लपुर जिले के देवस्थानदा हौसल्ली के एक किसान चंद्रापप्पा ने इस उन्नतशील प्रजाति के 2000 टमाटर के पौधे अपने आधे एकड़ के खेत में लगाकर 38 टन टमाटर की उपज हासिल की जबकि इतनी संख्या मे ही अन्य हाइब्रिड टमाटर के पौधे से20 टन का उत्पादन वो ले पाते थे।

चंद्राप्पा बताते हैं, “नवंबर 2012 से लेकर जनवरी 2013 के बीच मैंने 5 रुपये से ग्यारह रुये प्रति किलो तक इसे बेचकर, 80 हजार रुपये की लागत राशि काटकर पौने तीन लाख रुपये की बचत हासिल की।

डॉ सदाशिव के मुताबिक ये महज उच्च उपज देने वाली प्रजाति ही नहीं है बल्कि टमाटर के पौधों में लगने वाले तीन प्रकार के रोग, पत्तियों में लगने वाले कर्ल वायरस, विल्ट जिवाणु और फसल के शुरूआती दिनों में लगने वाले विल्ट जिवाणु से सफलतपूर्वक लड़ने की भी इनमें प्रतिरोधक क्षमता मौजुद हैं। उनके मानना है कि इससे कवक और कीटनाशकों पर होने वाले खर्च की बचत से टमाटर की खेती की लागत में दस फीसदी तक की कमी आती है।

इसके साथ ही गहरे लाल रंग के इस टमाटर की खेती के कुछ अन्य फायदे भी हैं। मसलन इसके गहरे रंग की वजह से इन टमाटरों को अधिक दूरी तक ट्रांसपोर्ट के जरिए भेजने में आसानी होती है।

अन्य सामान्य प्रजातियों के टमाटरों की उपज के बाद छह दिनों तक रखा जा सकता है, संकर प्रजाति के टमाटर दस दिनों तक जबकि अर्क प्रजाति के टमाटर पंद्रह दिनों तक आसानी से किसी अन्य प्रयास के रखे जा सकते हैं।

कहां और कैसे मि‍लेगा बीज

आप इसे भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) से सीधे मंगा सकते हैं। यहां से आप नकद, बैंक ड्राफ्ट, एनईएफटी व आरटीजीएस के माध्‍यम से पेमेंट कर बीज ले सकते हैं। दूर दराज के इलाकों से पैसे भेजने वालों को बीज भि‍जवा दि‍ए जाते हैं हालांकि‍ उन्‍हें पोस्‍टल चार्जेज अलग से देने होंगे।

यह डायरेक्‍ट लिंक है –http://iihr.res.in/vegetable-seeds

यहां बीज की कीमत, उपलब्‍धता व पेमेंट करने का तरीका वि‍स्‍तार से दि‍या गया है। सिर्फ यही बीज नहीं आप और भी बहुत सी सब्जिओं के बीज यहाँ से आर्डर कर सकते है ।

ई मेल आईडी – seeds@iihr.res.in
Phone: 080-23086100/21/22/23 Etn 285/278

वीडियो भी देखें 

3 गुना उत्पादन लेने के लिए ऐसे करें श्रीविधि से गेहूं की बुआई

 

धान की तर्ज पर गेहूं की खेती भी किसान यदि एसआरआई पद्दति (आम बोलचाल की भाषा में श्रीविधि) से करें तो गेहूं के उत्पादन में ढाई से तीन गुना वृद्धि हो सकती है। इस विधि (System of Rice Intensification) से खेती करने पर गेहूं की खेती में लागत परंपरागत विधि की तुलना में आधी आती है। पूरी जानकारी नीचे ख़बर में है।

खेत की तैयारी

खेत की तैयारी सामान्य गेहूं की भांति ही करते हैं। खरपतवार व फसल अवशेष निकालकर खेत की तीन-चार बार जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा (महीन) कर लें। उसके बाद पाटा चलाकर खेत को समतल कर जलनिकासी का उचित प्रबंन्ध करें। यदि दीमक की समस्या है तो दीमक नाशक दवा का प्रयोग करना चाहिए। खेत में पर्याप्त नमी न होने पर बुवाई के पहले एक बार पलेवा करना चाहिए। किसानों को चाहिए खेत में छोटी-छोटी क्यारियां बना लें। इस तरह से सिंचाई समेत दूसरे कृषि कार्य आसानी से और कम लागत में हो सकेंगे।

बुवाई का समय

गेहूं की फसल से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने में बुवाई का समय महत्वपूर्ण कारक है। समय से बहुत पहले या बहुत बाद में गेहूं की बुवाई करने से उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। नवम्बर-दिसम्बर के मध्य में बुवाई संपन्न कर लेना चाहिए।

उन्नत किस्मों का चयन

गेहूं की अधिक उपज देने वाली किस्मों का चयन स्थानीय कृषि जलवायु एवं भूमि की दशा (सिंचित या असिंचित) के अनुसार करना चाहिए। क्षेत्र विशेष के लिए संस्तुत किस्मों के प्रमाणित बीज का ही प्रयोग करें।

बीज दर एवं बीज शोधन

उन्नत बौनी किस्मों के प्रमाणित बीज का चयन करें। बुआई के लिए प्रति एकड़ 10 किलोग्राम बीज का उपयोग करना चाहिए। सबसे पहले 20 लीटर पानी एक वर्तन (मिट्टी का पात्र-घड़ा, नांद आदि बेहतर) में गर्म (60 डिग्री सें. यानि गुनगुना होने तक) करें। अब चयनित बीजों को इस गर्म पानी में डाल दें। तैरने वाले हल्के बीजों को निकाल दें। अब इस पानी में 3 किलो केचुआ खाद, 2 किलो गुड़ एवं 4 लीटर देशी गौमूत्र मिलाकर बीज के साथ अच्छी प्रकार से मिलाएं। अब इस मिश्रण को 6-8 घंटे के लिए छोड़ दें। बाद में इस मिश्रण को जूट के बोरे में भरें, जिससे मिश्रण का पानी निथर जाए। इस पानी को एकत्रित कर खेत में छिड़कना लाभप्रद रहता है।

अब बीज एवं ठोस पदार्थ कबाविस्टीन 2-3 ग्राम प्रति किग्रा. या ट्राइकोडर्मा 7.5 ग्राम प्रति किग्रा. के साथ पीएसबी कल्चर 6 ग्राम और एजेटोबैक्टर कल्चर 6 ग्राम प्रति किग्रा बीज के हिसाब से उपचारित कर नम जूट बैग के ऊपर छाया में फैला देना चाहिए। लगभग 10-12 घंटों में बीज बुवाई के लिए तैयार हो जाते है।

इस समय तक बीज अंकुरित अवस्था में आ जाते हैं। इसी अंकुरित बीज को बोने के लिए इस्तेमाल करना है। इस प्रकार से बीजोपचार करने से बीज अंकुरण क्षमता और पौधों के बढ़ने की शक्ति बढ़ती है और पौधे तेजी से विकसित होते हैं, इसे प्राइमिंग भी कहते है। बीज उपचार के कारण जड़ में लगने वाले रोग की रोकथाम हो जाती है। नवजात पौधे के लिए गौमूत्र प्राकृतिक खाद का काम करता है।

बुवाई की विधि

जैसा की पहले बताया गया है की बुवाई के समय मृदा में पर्याप्त नमी होना आवश्यक है, क्योंकि बुवाई हेतु अंकुरित बीज का प्रयोग किया जाना है। सूखे खेत में पलेवा देकर ही बुवाई करना चाहिए। बीजों को कतार में 20 सेमी की दूरी में लगाया जाता है। इसके लिए देशी हल या पतली कुदाली की सहायता से 20 सेमी. की दूरी पर 3 से 4 सेमी. गहरी नाली बनाते है और इसमें 20 सेमी. की दूरी पर एक स्थान पर 2 बीज डालते है।

बुवाई के बाद बीज को हल्की मिट्टी से ढक देते हैं। बुवाई के 2-3 दिन में पौधे निकल आते हैं। खाली स्थान पर नया शोधित बीज लगाना अनिवार्य है, जिससे प्रति इकाई वांक्षित पादप संख्या स्थापित हो सके। कतार तथा बीज के मध्य वर्गाकार (20 x 20 सेमी.) की दूरी रखने से प्रत्येक पौधे के लिए पर्याप्त जगह मिलती है, जिससे उनमें आपस में पोषण, नमी व प्रकाश के लिए प्रतियोगिता नहीं होती है।

खाद एवं उर्वरक

बगैर जैविक खाद के लगातार रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करते रहने से खेत की उपजाऊ क्षमता घटती है। इसलिए उर्वरकों के साथ जैविक खादों का समन्वित प्रयोग करना टिकाऊ फसलोत्पादन के लिए आवश्यक रहता है। प्रति एकड़ कम्पोस्ट या गोबर खाद (20 क्विंटल) या केचुआ खाद (4 क्विंटल) में ट्राइकोडर्मा मिलाकर एक दिन के लिए ढककर रखने के पश्चात खेत में मिलाना फायदेमंद रहता है।

आखिरी जुताई के पूर्व 30-40 किग्रा. डाय अमोनियम फास्फेट (डीएपी) और 15-20 किग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश प्रति एकड़ की दर से खेत में छींटकर अच्छी तरह हल से मिट्टी में मिला देंना चाहिए। प्रथम सिंचाई के बाद 25-30 किग्रा. यूरिया एवं 4 क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट को मिलाकर कतारों में देना चाहिए। तीसरी सिंचाई के पश्चात एवं गुड़ाई से पहले 15 किग्रा. यूरिया एवं 10 किग्रा पोटाश उर्वरक प्रति एकड़ की दर से कतारों में देना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधन: पानी का सही इस्तेमाल

बुवाई के समय खेत में अंकुरण के लिए पर्याप्त नमी होना नितांत आवश्यक है क्योंकि इस विधि में अंकुरित बीज लगाया जाता है। बुवाई के 15-20 दिनों बाद गेहूं में प्रथम सिंचाई देना करना जरूरी है क्योंकि इसके बाद से पौधों में नई जड़ें आनी शुरू हो जाती हैं। भूमि में नमी की कमी से पौधों में नई जड़ें विकसित नहीं हो पाती है, जिसके फलस्वरूप पादप बढ़वार रूक सकती है।

बुवाई के 30-35 दिनों बाद दूसरी सिंचाई देना चाहिए, क्योंकि इसके बाद पौधों में नए कल्ले तेजी से आना शुरू होते हैं और नये कल्ले बनाने के लिए पौधों को पर्याप्त नमीं एवं पोषण की आवश्यकता रहती है। बुवाई के 40 से 45 दिनों के बाद तीसरी सिंचाई देना चाहिए, इसके बाद से पौधे तेजी से बड़े होते हैं साथ ही नए कल्ले भी आते रहते है। गेहूं की फसल में अगली सिंचाईयां भूमि एवं जलवायु अनुसार की जानी चाहिए। गेहूं में फूल आने के समय एवं दानों में दूध भरने के समय खेत में नमी की कमी नहीं रहनी चाहिए अन्यथा उपज में काफी कमी हो सकती है।

निराई-गुड़ाई

सिंचित क्षेत्रों में गेहूं के खेत में लगातार नमी रहने के कारण खरपतवारों का अधिक प्रकोप होता है, जिससे उपज में काफी हानि होती है। इसके अलावा सिंचाई करने के पश्चात मृदा की एक कठोर परत निर्मित हो जाती है, जिससे भूमि में हवा का आवागमन तो अवरुद्ध होता ही है, पोषक तत्व व जल अवशोषण भी कम होता है। अतः खेत में सिंचाई उपरांत निंराई-गुड़ाई करना आवश्यक होता है। इसके बाद प्रथम सिंचाई के 2-3 दिन बाद पतली कुदाली या रोटोवीडर से मिट्टी को ढीला करें एवं खरपतवार भी निकालें।

अंतर्कर्षण से जड़ों को आवश्यक हवा, पानी और पोषक तत्व सुगमता से प्राप्त होते रहते हैं, जिससे पौधों का समुचित विकास होता है। दरअसल अंकुरण के बाद गेहूं के पौधों में सेमिनल जड़े निकलती हैं, जो पानी व भोजन की तलाश में मिट्टी में नीचे की ओर तेजी से बढ़ती है, यदि मिट्टी सख्त है तो वे ज्यादा नीचे तक नहीं जा पाती है और उनकी बढ़वार अवरूद्ध हो जाती है।

बुवाई के 20 दिन बाद मिट्टी की सतह के ठीक नीचे क्राउन जडें निकलती है जो पानी एवं भोजन की तलाश में चारों तरफ फैलती है। यदि मिट्टी सख्त है तो वे ज्यादा फैल नहीं सकती है, जिससे नन्हें पौधों को पर्याप्त भोजन व पानी नहीं मिलता है। गेहूं में दूसरी एवं तीसरी गुड़ाई क्रमशः 30-35 व 40-45 दिन पर सिंचाई के 2-3 दिन पश्चात करना चाहिए।

गेहूं की श्री विधि से लाभ

गेहूं सघनीकरण पद्धति (श्री विधि) से खेती करने पर परंपरागत विधि से प्राप्त 10-20 क्विंटल प्रति एकड़ की तुलना में 25 से 50 प्रतिशत अधिक उपज और आमदनी ली जा सकती है। परंपरागत विधि से गेहूं की खेती करने पर सामान्यत: पर किसानों को 40-60 किग्रा. प्रति एकड़ बीज लगता है, जबकि इस विधि में 10-15 किग्रा. प्रति एकड़ ही बीज लगता है। इस विधि में खाद-पानी की भी बचत होती है।

News Source -Gaonconnection News

एक ट्रिक ने बदली नौवीं पास दिव्यांग की किस्मत

पुणे/सोलापुर: कभी दूसरे किसानों के खेतों में मजदूरी करने वाला दिव्यांग लड़का मुनगा की खेती कर अपनी चार साल की मेहनत से करोड़पति बना है। वहीं उसने लाखों किसानों को मार्गदर्शन किया है। उसकी सफलता देख देश भर से लाखों किसान उसके खेत पर पहुंच रहे हैं। वहीं उसके मार्गदर्शन से महाराष्ट्र खासकर सूखा पीड़ित मराठवाड़ा के हजारों किसानों कर्ज से मुक्त हुए हैं। हर साल एेसे कमाता है 15 लाख….

  • सोलापुर के माढा तहसील के तहत उपलाई गांव में रहने वाले किसान बालासाहब पाटिल (30) की माली हालत चार साल पहले ठीक नहीं थी।
  • बालासाहेब अपने अपने भाई के साथ दूसरे किसानों के खेतों में मजदूरी करते थे। सिर्फ नौंवी तक पढ़ाई होने से उन्हें दूसरी जगह कोई काम भी नहीं देता था।
  • घर की हालत इतनी खराब थी कि, घर के लोगों को दिन में सिर्फ एक वक्त का खाना मिलता था। यहां तक उनकी आर्थिक हालत की वजह से लोग उधार भी नहीं देते थे।

एेसे बदली किस्मत

  • एक दिन गांव के किसान गणेश कुलकर्णी ने बालासाहब की हालत देख उन्हें अपने पास बुलाया और मुनगा की खेत करने के लिए प्रोत्साहित किया।
  • बालासाहब के पास मुनगा के बीज के लिए पैसे भी नहीं थे, तो गणेश कुलकर्णी ने उन्हें चार हजार रुपए दिए और यहीं उनकी किस्मत बदली।
  • बालासाहब को पहली बार मुनगा की खेती से 50 हजार का मुनाफा हुआ इसके बाद उन्होंने चार एकड़ में इसकी बुआई की।
  • अब उन्होंने पौधों की नर्सरी भी शुरू की है। यहां से वे किसानों को ज़रुरत के अनुसार पौधों की सप्लाई करते हैं।
  • कभी एक टाइम की रोटी के लिए मोहताज बालासाहब अब इसी खेत से हर साल 15 लाख रुपए कमा रहे हैं।
  • जिस जगह उनकी झोपड़ी थी, उसी जगह पर उन्होंने अच्छा सा बंगला बनवाया है। बंगले पर मुनगा हाथ में लिए किसान का पुतला बनाया है।
  • उनका कहना है कि जिस मुनगा की फसल से मुझे करोड़पति बनाया है, उसे मैं कैसे भूल सकता हूं। बालासाहब आगे भी खेती में और नई टेक्नीक का इस्तेमाल करना चाहते हैं।

हो चुका है सम्मान

  • महाराष्ट्र में मुनगा का खेती करने वाले और भी कई किसान हैं, लेकिन राज्य में कम उम्र में अच्छे मुनाफे की खेती करने का कारनामा बालासाहेब पाटिल ने किया है।
  • उनके इस कारनामे के लिए उन्हें वसंतराव नाईक प्रतिष्ठान के अलावा ड्रीम फाउंडेशन द्वारा पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
  • वहीं महाराष्ट्र में कई जगहों पर वे किसानों को मुनगा खेती से मुनाफा कमाने को लेकर मार्गदर्शन करते रहते हैं।
  • बालासाहब सम्मान को आगे बढ़ने का रास्ता मानते हैं। अब उनसे उन्नत बीज तैयार करने का तरीका सीखने कृषि विशेषज्ञ भी गांव पहुंच रहे हैं।
  • उन्होंने तीन किताबें भी लिखी है, जिसमें करोड़पति बनवेल शेवगा ( करोड़पति बनाएगा मुनगा), अमरुद और सिताफल पर लिखी किताब शामिल है।

News Source: Dainik Bhaskar

छोटे कमरे से शुरू करें मशरूम की खेती

मशरूम का उत्पादन युवाओं के लिए एक अच्छा व्यवसाय साबित हो रहा है। मशरूम सेहत का रखवाला है, इसलिए मांग बढ़ रही है, पर आपूर्ति उतनी नहीं हो रही। ऐसे में यह व्यवसाय फायदे का सौदा है।डॉक्टर और डाइटीशियन मोटापा, हार्ट-डिजीज और डायबिटीज के रोगियों को इसका सेवन करने की सलाह देते हैं। इसका चलन निरंतर बढ़ता जा रहा है।

भारत में मशरूम की मांग में इजाफा हो रहा है। इसे देखते हुए मशरूम के बड़े पैमाने पर उत्पादन की आवश्यकता है। वैसे तो मशरूम के उत्पादन में लगातार इजाफा हो रहा है, लेकिन जितनी मांग है, उसे देखते हुए वह बहुत कम है। हालांकि अब गांव ही नहीं, शहरों में भी शिक्षित युवा मशरूम उत्पादन को करियर के रूप में अपनाने लगे हैं।

मशरूम की खेती को छोटी जगह और कम लागत में शुरू किया जा सकता है और लागत की तुलना में मुनाफा कई गुना ज्यादा होता है। यहाँ तक की इसे आप एक कमरे में भी शुरू कर सकते है ।सालभर में आप सिर्फ एक कमरे में 3 से 4 लाख रुपए की इनकम आसानी से हो सकती है वह भी सिर्फ 50 से 60 हजार रुपए खर्च करने के बाद

मौसम

मशरूम उत्पादन में मौसम का खास महत्व है, इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मशरूम की एक वैराइटी वॉल वैरियल्ला के लिए तापमान 30 से 40 डिग्री सेल्सियस व नमी 80 से ज्यादा होनी चाहिए। इसका उत्पादन अप्रैल से अक्तूबर के बीच किया जाता है। ऑयस्टर मशरूम के लिए तापमान 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तथा नमी 80 फीसदी से अधिक होनी चाहिए। इसके उत्पादन के लिए सितम्बर-अक्तूबर का महीना बेहतर माना जाता है। टेम्परेंट मशरूम के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान व 70 से 90 फीसदी नमी जरूरी है। इसका उत्पादन अक्तूबर से फरवरी के बीच ठीक रहता है।

ओएस्‍टर मशरूम की खेती 

इस मशरूम को उगाने में गेहूं के भूसे और दानों दोनों का इस्‍तेमाल होता है। यह मशरूम 2.5 से 3 महीने में तैयार हो जाता है। ज्‍यादातर इसका उत्‍पादन पंजाब समेत उत्‍तर भारतीय राज्‍यों में होता है। इस मशरूम को सबसे पहले हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर अनंत कुमार ने साल 2013 में उगाया था।  प्रोफेसर अनंत कुमार अपनी इस विधि का अब पेटेंट कराने जा रहे हैं।

100 वर्गफीट के कमरे से 10 क्विंटल मशरूम

प्रो. अनंत कुमार के अनुसार एक किलोग्राम मशरूम को तैयार करने में लगभग 50 रुपए का खर्च(यदि भूसा, गेहूं आदि सब सामान खरीदा जाए) आता है। इसके तहत 15 किलोग्राम मशरूम बनाने के‍ लिए 10 किलोग्राम गेहूं के दानों की आवश्‍यकता होती है। यदि आप एक बार में 10 क्विंटल मशरूम उगा लेते हैं तो आपका कुल खर्च 50 हजार रुपए आता है। इसके लिए आपको 100 वर्गफीट के एक कमरे में रैक जमानी होगी।

10 ग्राम लगता है बीज 

सबसे पहले गेहूं को उबाला जाता है और इस पर मशरूम पाउडर डाला जाता है, जिससे मशरूम का बीज तैयार हो जाता है। इसे तीन महीने के लिए इस बीज को 10 किलोग्राम गेहूं के भूसे में 10 ग्राम बीज के हिसाब से रखा जाता है। 3 महीने बाद गेहूं के ये दाने मशरूम के रूम में अंकुरित होने शुरू हो जाते हैं। इसके बाद इन्‍हें 20 से 25 दिनों के लिए पॉलिथीन में डालकर 25 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान वाले कमरे में रखा जाता है। इसके बाद मशरूम बिकने के लिए तैयार होता है।

 रीटेल स्‍टोर से कर सकते हैं करार

ओइस्‍टर मशरूम की देश में सबसे अधिक मांग है। ब्रांडेड स्‍टोर पर भी सबसे ज्‍यादा ओइस्‍टर मशरूम ही बिकता है। इस मशरूम के दाम कम से कम 150 से 200 रुपए प्रति किलोग्राम मिलते हैं। यदि आप बेहतर मार्केटिंग कर किसी रिटेल स्‍टोर से करार कर सकते हैं तो दाम और भी बेहतर मिल सकते हैं। कम से कम 150 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से 10 क्विंटल मशरूम की कीमत 150000 रुपए होती है। ऐसे में मशरूम साल में दो बार पैदा किया जाए तो यह रकम आसानी से दोगुनी यानी 3 लाख रुपए तक पहुंच जाती है।

सरकारी सहायता

मशरूम उत्पादन स्वरोजगार के लिहाज से अच्छा माना जा रहा है। यह काम कम पूंजी और छोटी जगह पर भी हो सकता है। सरकार कृषि से संबंधित इस क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक योजनाएं चला रही है। मशरूम उत्पादन को स्वरोजगार के रूप में अपनाने वाले उम्मीदवारों को भारत सरकार के कृषि मंत्रालय द्वारा पांच लाख रुपए तक की आर्थिक सहायता की व्यवस्था की जाती है। इसके अलावा एससी/एसटी उम्मीदवारों को सरकारी ऋण में राहत की भी व्यवस्था है।

मशरूम उत्पादन में रुचि लेने वाले उम्मीदवारों के लिए देशभर के विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों व कृषि अनुसंधान केंद्रों में एक से दो हफ्ते और मासिक अवधि के कोर्स संचालित किए जाते हैं।

इन पाठय़क्रमों का उद्देश्य मशरूम उत्पादन की तकनीक व बीजों की अच्छी नस्ल से रू-ब-रू कराना है। मशरूम का उत्पादन शुरू करने से पहले तकनीकी जानकारी हासिल करना बहुत जरूरी है।

बिना सिंचाई अच्छा उत्पादन चाहिए तो करें गेहूं की इस किस्म का प्रयोग

देश में खेती का बहुत बडा रकबा असिंचित है या फिर यहां सिंचाई के पर्याप्त साधन नहीं है। ऎसे क्षेत्रों के किसानों के लिए जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय (जबलपुर) के वैज्ञानिकों ने गेहूं का ऎसा बीज तैयार किया है, जिसके उपयोग से बिना सिंचाई के भी 18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की पैदावार ली जा सकती है। कृषि विश्‍वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ.आर.एस. शुक्ला ने बताया कि करीब तीन साल की मेहनत के बाद जे डब्ल्यू 3211 (J W 3211) किस्म के शरबती गेहूं का बीज ईजाद करने में सफलता प्राप्त की गयी है।

कम पानी में भी अधिक उत्पादन

डॉ. शुक्ला ने बताया कि यह बीज कम पानी से भी अच्छा उत्पादन देने की क्षमता रखता है। इस बीज से एक पानी से प्रति हेक्टेयर करीब 25 से 30 क्विंटल तक उत्पादन हो सकता है। इसी प्रकार यदि दो पानी की व्यवस्था हो तो प्रति हेक्टेयर करीब 35 से 40 क्विंटल तक गेहूं की पैदावार ली जा सकती है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं है उनमें किसान पहले की नमी को बचा कर अच्छी पैदावार ले सकते हैं। इसकी फसल को तैयार होने में करीब 118 से 125 दिन लगते हैं। मध्‍यप्रदेश के अलावा इस बीज की मांग महाराष्ट्र व आस-पास के क्षेत्रों से अघिक हो रही है।

मौसम परिवर्तन का प्रभाव नहीं

डॉ. शुक्ला ने बताया कि मौसम में आए उतार-चढ़ाव या तापमान बढ़ने से गेहूं की फसल प्रभावित हो जाती है, लेकिन अन्य की तुलना में रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता अघिक होने कारण जे डब्ल्यू 3211 गेहूं की फसल पर मौसम परिवर्तन का कोई असर नहीं पड़ता है। इसके दाने चमकदार होते हैं व इसमें 10 से 12 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा होती है। इसके पौधे की लम्बाई 85 से 90 सेंटीमीटर तक होती है।

मिलिए कैथल के ‘डेयरी के सुल्तान’ बलिंदर ढुल से, डेयरी फार्म से हर महीने 1.5 लाख की कमाई

व्यवसायिक डेयरी फार्मिंग एक ऐसा काम है जिसमें लाखों रुपये की कमाई की जा सकती है। कैथल के युवा और प्रगतिशील डेयरी किसान बलिंदर ढुल ने ऐसा कर के दिखाया है। कैथल में अपनी जमीन पर पेशेवर तरीके से डेयरी फार्मिंग कर बलिंदर ना सिर्फ अच्छी-खासी कमाई कर रहे हैं बल्कि इलाके के युवाओं के लिए एक मिसाल भी बन गए हैं। आज डेयरी के सुल्तान में हम हरियाणा के 28 वर्षीय बलिंदर ढुल की सफलता की कहानी लेकर आए हैं, इनकी सफलता से डेयरी व्यवसाय में आने की सोच रहे युवाओं को जरूर प्रेरण मिलेगी।

24 साल की उम्र में 7 भैंस से शुरू किया डेयरी फार्म

बात साल 2012-13 की है जब कैथल जिले के हरसोला गांव के रहने वाले बलिंदर ढुल बीए (इकॉनामिक्स) करने के बाद एमए की पढ़ाई कर रहे थे। उनके सभी दोस्त सरकारी नौकरी की तैयारी में लगे थे लेकिन बलिंदर के मन में कुछ अपना काम करने का विचार चल रहा था। आखिर काफी सोचने के बाद उन्होंने अपने गांव में ही डेयरी फार्मिंग करने की ठानी, क्योंकि उनके घर में हमेशा से पशु पालने की परंपरा थी और उन्होंने इसी बिजनेस में किस्मत आजमाने का फैसला किया।

कैथल से 8 किलोमीटर दूर हरसोला गांव में बलिंदर की 8 एकड़ खेती की जमीन थी, जहां उनके पिता खेती किया करते थे। बस बलिंदर ने इसी जमीन पर डेयरी फार्म खोलने का फैसला कर लिया। बलिंदर ने कैथल के कृषि ज्ञान केंद्र से डेयरी फार्मिंग की ट्रेनिंग ली और फरवरी 2014 में 7 मुर्रा भैंस के साथ एक एकड़ जमीन पर डेयरी फार्म शुरू कर दिया। युवा बलिंदर ने जब डेयरी फार्म खोला तो रिश्तेदार ही नहीं पड़ोसियों ने उसकी काफी आलोचना की, लेकिन इरादे के पक्के बलिंदर ने किसी की नहीं सुनी और पूरी मेहनत के साथ डेयरी फार्म को बढ़ाने में लगे रहे।

आज हैं बलिंदर के फार्म में 80 से ज्यादा गाय और भैंस

युवा बलिंदर की मेहनत का ही नतीजा था कि धीरे-धीरे उनका डेयरी फार्म प्रगति करने लगा और उसके शुद्ध दूध की डिमांड बढ़ने लगी। जैसे-जैसे कमाई बढ़ी बलिंदर का जोश भी बढ़ता गया और उन्होंने पशुओं की संख्या बढ़ाना शुरू कर दिया। आज बलिंदर के फार्म में 30 अच्छी नस्ल की मुर्रा भैंस हैं, जिनमें से बीस भैंस दूध देती हैं, जबकि 30 हॉलिस्टियन फ्रीशियन और साहीवाल नस्ल की गाय हैं, जिनमें से 20 गाय इस वक्त दूध दे रही हैं। बाकी गाय और भैंस अभी ड्राई हैं। इसके साथ ही बलिंदर के डेयरी फार्म में बड़ी संख्या में अच्छी नस्ल की बछड़ियों की भी है, जो कुछ महीनों में तैयार होकर दूध देने लगेंगी।

फार्म में रोजाना होता है 300 लीटर दूध का उत्पादन

बलिंदर के डेयरी फार्म में आज रोजाना 300 लीटर दूध का उत्पादन होता है, जबकि सर्दियों के समय में दूध का उत्पादन 400 लीटर प्रतिदिन तक पहुंच जाता है। डेयरी टुडे से बातचीत में बलिंदर ने बताया कि वो अपने फार्म में पशुओं की काफी देखभाल करते हैं। पशुओं को क्या खिलाना है, कब खिलाना है उसका पूरा ध्यान रखा जाता है। पशुओँ के लिए हरा चारा वो अपने खेत में ही उगाते हैं साथ ही पशुओं के लिए दाना भी खुद तैयार करवाते हैं।

बलिंदर के मुताबिक पशुओं के दाने में सरसों की खली, बिनौला, सोयाबीन, मक्का, गेहूं, मिनरल मिक्सर समेत 17 चीजें मिलाते हैं। इस दाने को खाने से जहां गाय और भैंस सेहतमंद रहते हैं वहीं दुग्ध का उत्पादन भी बढ़ जाता है। बलिंदर ने बताया कि वो पशुओं के स्वास्थ्य की देखभाल पर भी खासा ध्यान देते हैं। सरकारी अस्पताल के चिकित्सक से संपर्क में तो रहते ही हैं साथ ही उन्होंने एक निजी पशु चिकित्सक को भी पशुओं की देखभाल के लिए रखा है, जो रोजाना पशुओं के स्वास्थ्य का चेकअप करता है। पशुओं को रखने के लिए काफी बड़े क्षेत्र में शेड बना हुआ है, उन्होंने बताया कि पशुओं को सिर्फ मिल्किंग और चारा खिलाने के लिए बांधा जाता है बाकी वक्त गाय और भैंस पूरे फार्म में खुले घूमते रहते हैं।

दूध बेचकर हर महीने कमाते हैं 1.5 लाख रुपये

बलिंदर ने बताया कि उनके फार्म में औसतन 300 लीटर दूध का रोजाना उत्पादन होता है। बलिंदर खुद ही दूध की मार्केटिंग करते हैं। इसके लिए उन्होंने कैथल शहर में कई हलवाइयों से कॉट्रैक्ट कर रखा है। बलिंदर ज्यादातर दूध इन्हीं हलवाइयों को बेच देते हैं साथ ही कुछ दूध वो सीधे ग्राहकों को उनके घरों तक पहुंचाते हैं। बलिंदर के डेयरी फार्म में रोजाना भैंस का 130 लीटर और गाय का 170 लीटर दूध होता है।

बाजार में भैंस का दूध 50 रुपये जबकि गाय का 40 रुपये प्रति लीटर बिकता है। बलिंदर के मुताबिक हर महीने करीब दो से ढाई लाख रुपये का खर्चा होता है, इस प्रकार उन्हें करीब डेढ़ लाख रुपये महीने की बचत हो जाती है। बलिंदर ने अपने फार्म पर चार लोगों को नौकरी पर रखा है साथ ही उनका छोटा भाई जसविंदर ढुल भी हर काम में पूरी मदद करता है। डेयरी फार्म में गायों का दूध मशीन से दुहा जाता है जबकि भैंस का दूध हाथ से दुहा जाता है।

News Source – Dairy Today