क्या अब धान की फसल लेने वाले किसान जाएंगे जेल?

मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार में किसानों के लगातार प्रदर्शन की खबरें तो आपने पढ़ी होंगी लेकिन प्रदेश सरकार अब ऐसा कदम उठाने जा रही है जिससे शिवराज सरकार फिर सुर्खियों में आ सकती है। राज्य प्रशासन ने गर्मी के मौसम में धान की फसल लेने वाले किसानों को उनकी जगह दिखा दी है।

दरअसल शुक्रवार को यहां संभागायुक्त टीसी महावर की अध्यक्षा में जल उपयोगिता समिति की बैठक हुई। जिसमें राज्य शासन के निर्देशों का हवाला देते हुए प्रशासनिक अमले से दो टूक कहा कि जलाशयों में उपलब्ध पानी सबसे पहले उद्योगों को दें। मनाही के बाद भी अगर किसान धान की फसल लेते हैं तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिले में इस बार बहुत कम बारिश के कारण बांधों व जलाशयों में पानी की उपलब्धता बीते वर्ष की तुलना में कम है। राज्य शासन की चिंता इस इस बात को लेकर है कि जिले में संचालित होने वाले उद्योगों को अगले बारिश के मौसम में पानी की आपूर्ति हो पाएगी या नहीं शुक्रवार को बैठक के दौरान राज्य सरकार की चिंता की झलक दिखाई दी।

बैठक के दौरान पूरे समय इसी बात को लेकर चर्चा होती रही कि किस जलाशय में कितना पानी है। जिले में स्थापित उद्योगों को उनकी मांग के अनुसार पूरे गर्मी भर पानी दे पाएंगे या नहीं। जल भराव का आंकलन करने के बाद कमिश्नर ने कहा कि बांधों व जलाशयों में पानी का पहला उपयोग उद्योगों का होगा। इसके बाद पेयजल आपूर्ति के लिए रिजर्व वाटर रखा जाएगा। रिजर्व वाटर के बाद अगर जलाशयों व बांधों में पानी बच पाता है तो रबी फसल के रुप में दलहन व तिलहन की खेती करने वाले किसानों को जल आपूर्ति की जाएगी।

बैठक में कमिश्नर ने साफ कहा कि जल्द ही कृषि, सिंचाई व पीएचई विभाग के अधिकारियों की बैठक कर स्थिति के अनुसार जल भराव क्षेत्र घोषित करने और भूजल स्तर के दोहन को रोकने के लिए कड़े कानून बनाए जाए।

संभाग के चार वृहद जलाशयों मिनीमाता हसदेव बांगों, खारंग जलाशय, मनियारी जलाशय और केलो परियोजना तथा मध्यम जलाशय घोंघा, मांड, केदार, पुटका, किंकारी और ख्महार पाकुट जलाशयों में वर्तमान में 64.23 प्रतिशत जल उपलब्ध है तथा 337 लघु जलाशयों में 25.9 प्रतिशत जल भराव स्थिति है।

ऐसे शुरू करें ड्रैगन फ्रूट की उन्नत खेती

 

एक ड्रैगन फलों के पेड़ मूल रूप से जीसस हीलोसेरियस का कैक्टस बेल है। यह मध्य अमेरिका के मूल निवासी है, लेकिन अब पूरी दुनिया में विशेषकर उष्णकटिबंधीय देशों में उगता है। यह एक बढ़ती हुई बढ़ती हुई बेल है जिसके लिए एक ऊर्ध्वाधर पोल का समर्थन करने के लिए बढ़ने की आवश्यकता होती है और फिर एक छाता जैसा गिरने के लिए एक अंगूठी होती है। इसमें 15-20 साल का जीवन काल है, इसलिए पोल और रिंग का उचित चयन महत्वपूर्ण है।

एक मजबूत और स्थायी समर्थन सुनिश्चित करने के लिए विशेष आरसीसी पोल लगाए गए हैं आमतौर पर चार पोल प्रति पोल को अधिकतम उपज देने के लिए लगाए जाते हैं। कटाई और रखरखाव के काम के दौरान उचित ध्रुव को पोल और पंक्ति अंतर को रोके रखा जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के वृक्षारोपण की मिट्टी और पानी की संपत्ति के अनुसार मूल पोषक तत्व और उर्वरक समय-समय पर लागू होते हैं। धातु तैयार करने से बचा जा सकता है क्योंकि इससे पौधों को धूप / गर्मी जल जाती है।

उष्णकटिबंधीय मौसमों में आम तौर पर उत्तर-दक्षिण पंक्तियों को प्राथमिकता दी जाती है, जहां गर्मियों में तापमान 40 डिग्री से ऊपर होता है। अधिक धूप की गर्मी का कारण सूर्य की रोशनी हो सकती है लेकिन उपचारात्मक कदम आसानी से स्थानीय रूप से उपलब्ध हैं। इस संयंत्र से ज्यादा बीमारी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, आम समस्याओं जैसे जड़ सड़ांध, धूप की कालिमा, पक्षी हमलों आदि का आसानी से ध्यान रखा जा सकता है।

ड्रैगन फलों – पिठया, 21 वीं सदी की ‘आश्चर्यजनक फल’ भारतीय उद्यान परिदृश्य में एक क्रांति में रिंग के लिए सेट है। यह किसानों और उपभोक्ताओं के लिए एक बून है मूल रूप से मध्य अमेरिका से यह सफलतापूर्वक थाईलैंड, मलेशिया, वियतनाम, श्रीलंका, बांग्लादेश में वाणिज्यिक रूप से उगता है और भारत में हमारे दरवाजे पर अब दस्तक दे रहा है।

मुख्य विशेषताएं:

  • किसी भी प्रकार की मिट्टी में बढ़ता है
  • पानी की न्यूनतम आवश्यकता
  • रखरखाव की न्यूनतम आवश्यकता
  • भारतीय जलवायु स्थितियों को सहिष्णु बना सकता है
  • 2 एनडी / 3 आरडी वर्ष में निवेश रिटर्न
  • अधिक प्रसार / पुनर्विक्रय के लिए कटिगों का उपयोग किया जा सकता है
  • स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भारी मांग
  • मूल्य संवर्धन उत्पाद कमांड प्रीमियम दरें

मिट्टी:

ड्रैगन फलों के पौधे किसी भी प्रकार की मिट्टी को बर्दाश्त कर सकते हैं, हालांकि वे अच्छी तरह से मिट्टी में सूखने में अच्छी तरह से बढ़ते हैं। जल को बनाए रखने वाली मिट्टी जड़ सड़ांध का कारण बन सकती है और इस घातक कारक से बचने के लिए, जल निकासी की सुविधा के लिए मिट्टी को रेत या छोटे पत्थर के कंकड़ों से मिलाया जा सकता है।

जलवायु:

भारत एक उष्णकटिबंधीय देश है, जिसमें हर साल मध्यम जलवायु होती है। ड्रैगन फल उष्णकटिबंधीय मौसम के लिए अच्छी तरह से अनुकूल है। चरम भारतीय मौसम के लिए मामूली समायोजन जहां तक ​​जलवायु स्थितियों का संबंध है, सभी बाधाएं दूर कर सकते हैं।

सिंचाई:

अन्य फसलों / फलों की तुलना में कैक्टस होने के कारण ड्रैगन फल को कम पानी की आवश्यकता होती है। यह महीनों के लिए पानी के बिना जीवित रह सकता है सिंचाई का सर्वोत्तम अनुशंसित तरीका ड्रिप सिंचाई है। बाढ़ से सिंचाई की सिफारिश नहीं की जाती क्योंकि यह पानी बर्बाद करता है और फूस का काम बढ़ाता है। प्रति दिन लगभग 1 से 2 लीटर पानी प्रति संयंत्र प्रतिदिन गर्मियों / सूखे दिनों के दौरान पर्याप्त है। आपकी मिट्टी, जलवायु और पौधे स्वास्थ्य के आधार पर जल की आवश्यकता बढ़ सकती है या कम हो सकती है

उपज और अर्थशास्त्र:

पौधरोपण के बाद 18-24 महीनों के बाद ड्रैगन फल सामान्य रूप से फल होता है। यह एक वनस्पति फल पौधे है, जो आम तौर पर मानसून के दौरान या बाद में फलों के फल के साथ होता है। यह एक सीजन के दौरान 3 से 4 तरंगों में फल होता है। प्रत्येक ध्रुव का फल प्रति लहर लगभग 40 से 100 फल होता है। प्रत्येक फल का वजन लगभग 300 से 1000 ग्राम होता है। एक पोल आम तौर पर लगभग 15 से 25 किलोग्राम फल पैदा करता है। (60 / 80kgs प्रति पोल की खेती भारत में दर्ज की गई है) इन फलों को बाजार में 3 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम में बेची जाती है, लेकिन सामान्य फार्म की दर लगभग रु। 125 से 200 रुपये प्रति किलो

वार्षिक आय की एक सामान्य गणना शायद इस प्रकार की गणना की जा सकती है:
एक एकर x 300 पोल एक्स 15 किग्रा (कम) x रु .25 (न्यूनतम) = रु। 5,62,500 = 00 प्रति एकड़ प्रति वर्ष

ध्यान दें:

  • सभी गणना अच्छी तरह से बनाए गए खेत के लिए हैं
  • सभी उपरोक्त गणना सबसे कम ओर हैं
  • एक एकड़ में 400 पोल भी हो सकते हैं
  • उचित खेती के तरीके / पोषक तत्व अधिक पैदावार दे सकते हैं
  • उचित विपणन नेटवर्क या निर्यात बेहतर दरें ला सकते हैं
  • नाइट लाइटिंग पद्धति फ्राईटिंग के अतिरिक्त तरंगों को दे सकती है
  • मूल्य अतिरिक्त उत्पाद उच्च रिटर्न प्राप्त करेंगे

भारत में खेती की स्थिति और मांग:

महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के राज्यों में बहुत कम किसानों ने भारत में दार्गन फलों की खेती की है। ड्रैगन फलों की खेती का कुल अखिल भारतीय क्षेत्र शायद 100 एकड़ से कम हो। भारत में इसके फल, पोषण और औषधीय गुणों के लिए जागरूकता और मांग बहुत बड़ी है। भारत थाईलैंड, मलेशिया, वियतनाम और श्रीलंका से इसकी आवश्यकता का 95% आयात करता है। इस फल में खाड़ी, यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के निर्यात के लिए भी काफी संभावना है।

अब इस मोबाइल ऐप से मिंटों में करें जमीन को नापने का मुश्किल काम

अगर आप अपने खेत ,प्लाट ,दुकान जा किसी और चीज जो नापना चाहते है तो आप सिर्फ एक मोबाइल के साथ कर सकते है और वो भी बहुत आसानी और सटीकता के साथ । बस उसके लिए आपके फ़ोन में मोबाइल इंटरनेट और जीपीएस सिस्टम होना चाहिए । जो की अब लगभग हर मोबाइल फ़ोन में होता ही है । जमीन को नापने के लिए बस आपको एक ऐप अपने फ़ोन पर करनी होगी और उसके बाद जिस जमीन को नापना है । उसके इर्द गिर्द चक्र लगाना है बस बाकि बाकि का काम ऐप ही करेगी ।

सबसे पहले Google Play Store पर जा कर “Distance and area measurement ” ऐप इंसटाल करो इस ऐप की रेटिंग 4.1 है जो काफी अच्छी है । उसके बाद इसका जीपीएस सिस्टम ऑन करें ।अब ऐप को OPEN करें ।

उसके बाद Distance : के लिए मीटर,फ़ीट ,यार्ड आदि में से चुने ,आप फ़ीट चुन सकते है क्यूंकि ज्यादतर हमारे ये ही इस्तेमाल होता है । अब अगर अपने अपने खेत का ज़मीन नापना है तो Area : के लिए acre चुने । एक और ऑप्शन Logging है जिसे Auto पर रहने दे ।

अब इसमें एक स्टार्ट का बटन दिया हुआ है उसको दबा कर जिस जमीन को नापना है उसके इर्द गिर्द पूरा एक चक्र लगायें । ध्यान रहे जिस जगह को नापना है उसके किनारों पर बिलकुल साथ साथ चलें नहीं तो एरिया ज्यादा आ ज्यागा । जहाँ से आप ने चलना शुरू क्या था वहां तक चक्र पूरा करें । बस जैसे ही आप चक्र पूरा करेंगे साथ की साथ आप को पता चल जायगा की टोटल एरिया कितना है ।

वैसे तो यह ऐप बहुत हद तक बिलकुल सही एरिया बताती है लेकिन कभी कभी इंटरनेट ठीक ना चलने के वजह से थोड़ी बहुत गड़बड़ हो जाती है इस लिए इस ऐप का का प्रयोग सिर्फ कच्चा अंदाज़ा लगाने के लिए करें । कल जब आप खेत जायेंगे तो इसका इस्तेमाल कर अपना खेत जरूर नाप के देखना ।

इस किसान से सीखें 2 एकड़ में 30 फसलें उगाने का फार्मूला,एक साल में कमाता है 22 लाख

ऐसे में जब खेती घाटे का सौदा बनकर रह गई है, अगर कोई खेती से एक साल में 22 लाख कमाने का दावा करे तो आसानी से भरोसा नहीं होता, लेकिन यह सच है। कर्नाटक के बेंगलुरु में एक किसान हैं एच. सदानंद, जो ऐसा करके दिखा रहे हैं। उनके पास केवल 2.1 एकड़ या लगभग 5.2 बीघा जमीन है। मतलब जमीन के क्षेत्रफल के लिहाज से उनकी हैसियत एक सीमांत किसान की है, लेकिन वह इतनी जमीन में ही लगभग 30 तरह की फसलें उगाकर सालाना 22 लाख रुपये कमा रहे हैं।

मुनाफे का गणित

वह ऐसा कैसे कर पाते हैं? यह पूछने पर सदानंद कहते हैं, “मेरी पॉलिसी एकदम साफ है। मैं मानकर चलता हूं कि मुझे अपने फॉर्म से हर रोज, हर हफ्ते, हर महीने, हर तीन महीने, हर छह महीने और हर साल आमदनी होनी चाहिए। अपने इसी सूत्र के हिसाब से मैं तय करता हूं कि मुझे अपनी जमीन पर कौन सी खेती करनी है।“ सदानंद आगे कहते हैं, “इसके लिए मैं पॉली हाउस (पॉलिथीन से बना एक किस्म का ग्रीन हाउस) में फल, फूल, देशी-विदेशी सब्जियां उगाता हूं। साथ में गाय-भैसें, सुअर, कुत्ते, मुर्गियां और मछली भी पालता हूं।“

आम के आम गुठलियों के दाम

इस तरह सदानंद की रोजाना आमदनी मुर्गियों और गाय-भैंसों से मिलने वाले अंडे और दूध से होती है, वहीं उन्हें हर हफ्ते फूलों से, हर तीन महीने पर सब्जियों से और हर छह महीने पर फलों से कमाई होती है। लेकिन मुनाफा यहीं नहीं रुकता, मतलब सदानंद आम के आम और गुठलियों के दाम भी वसूलते हैं। वर्मी कंपोस्ट, गोबर और बीट से उन्हें लगभग फ्री में खाद मिल जाती है, साथ में गोबरगैस भी बनती है, इस तरह खेती पर लागत और कम हो जाती है। सदानंद कहते हैं, सबसे अहम बात यह है कि मुझे और मेरे परिवार को शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक भोजन मिलता है।

पहले नौकरी करते थे फिर बने किसान

सदानंद शुरू में 15 सालों तक एक प्राइवेट फैक्ट्री में काम करते रहे। वह कहते हैं, “मैंने देखा कि व्यापारी खेती की जमीन तो खरीदते थे, लेकिन उनकी रुचि खेती में बिल्कुल भी नहीं होती थी। वे केवल निवेश के नजरिए से जमीन में पैसे लगाते थे। वहीं मेरा मन नौकरी की जगह खेती में लगता था। कुछ समय मैंने नौकरी के साथ खेती की पर बाद में नौकरी छोड़कर पूरी तरह किसान बन गया। यह मेरे जीवन का सबसे अच्छा फैसला था।“

ढेरों फसल और नित नए प्रयोग

दरअसल सदानंद की इस कामयाबी का राज है बहुफसली तकनीक। वह आधे एकड़ में टमाटर और सुपारी की खेती करते हैं। टमाटर से उन्हें 2 लाख और सुपारी से 50 हजार की आमदनी होती है। सुपारी के साथ सदानंद ने अदरक उगाने का सफल प्रयोग किया और उनसे एक साल में 70 हजार रुपये कमाए।

पालते हैं गिरिराजा नस्ल की मुर्गियां

अपने फार्म पर सदानंद गिरिराजा नस्ल की 250 मुर्गियां भी पालते हैं। इन मुर्गियों की खासियत है कि इस नस्ल में रोगों से लड़ने की काफी क्षमता होती है। इसके अलावा ये खेतों से निकलने वाले कूड़े-करकट को भी खा जाती हैं। सदानंद मुर्गियों को हर तीसरे महीने बेचकर साल में एक लाख रुपये कमा लेते हैं। इन मुर्गियों से निकली बीट सुपारी के पेड़ों के लिए बेहतरीन खाद भी साबित होती है।

और भी अपना रखे हैं तरीके

इसी छोटे से फार्म पर सदानंद ने गाय-भैसें भी पाल रखी हैं, जिनसे रोजाना 80 से 100 लीटर दूध मिलता है। यहीं एक छोटा सा तालाब है जिसमें रोहू और कतला मछलियां पाली गई हैं। मछलियों को तो बेचा जाता ही है, साथ ही इस तालाब में उगने वाले जलीय पौधे गाय-भैसों के लिए चारे के तौर पर इस्तेमाल होते हैं। इस तालाब से निकलने वाली गंदगी भी बहुत अच्छी खाद होती है। इतना ही नहीं इस फार्म पर सदानंद रॉटवीलर और ग्रेट डेन नस्ल के कुत्ते भी पालते हैं। इन्हें बेचकर उन्हें सालाना 1.2 लाख मिल जाते हैं।

गुलाब और सब्जियों की जुगलबंदी

सदानंद तीन-चौथाई एकड़ में 2 हजार गुलाबों की कलमें लगाते हैं। इनसे हर साल उन्हें 4 लाख रुपये मिल जाते हैं। एक चौथाई एकड़ में सदानंद ने ग्रीनहाउस बना रखा है जिसमें वह छह महीने गुलाब की एक किस्म बटन रोज और बाकी के छह महीने शिमला मिर्च, ब्रॉकली व सलाद पत्ता लगाते हैं। बटन रोज का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि इसमें ज्यादा कांटे नहीं होते और ये ऊंचे दाम पर बिकते हैं। इसके अलावा खाली जगह पर कॉफी, नारियल, कटहल, पपीते, चीकू, और नींबू उगाए गए हैं।

टेक्नोलॉजी ने बनाई राह आसान

जब सदानंद से पूछा गया कि अपने फार्म पर वह 30 तरह की अलग-अलग खेती कैसे कर पाते हैं तो उन्होंने कहा, “तकनीक के इस्तेमाल से।“ वह कहते हैं, “इससे मेरा काम जल्दी और आसानी से हो जाता है, साथ ही ज्यादा लोगों की भी जरूरत नहीं पड़ती। मैं दूध निकालने वाली मशीन, पावर वीडर जैसे यंत्रों के अलावा टपक सिंचाई, स्प्रिंकलर, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग तकनीक का इस्तेमाल करता हूं। सब्जियों को ग्रीन हाउस में उगाता हूं जिससे फसलें तेज हवा, गर्मी व रोगों से बच पाती हैं।

पौधों की नमी बनी रहती है, जिससे कि उनसे मिलने वाली उपज की क्वॉलिटी अच्छी होती है। खुले में खेती करने की जगह ग्रीन हाउस में ज्यादा पैदावार मिलती है।“ ग्रीनहाउस में फसलें उगाने से पहले ही मैं खरीददारों से एग्रीमेंट कर लेता हूं, इसमें पहले से रेट तय कर लिए जाते हैं। सिंचाई बोरवेल से होती है, पानी को स्प्रिंकलर और टपक सिंचाई के जरिए फसलों तक पहुंचाया जाता है जिससे पानी की एक-एक बूंद का सदुपयोग होता है।

सरकार और बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से मिली मदद

अपनी इस अनूठी पहल में सदानंद को सरकार से भी मदद मिली है। उनका ग्रीन हाउस 7 लाख की लागत से बनकर तैयार हुआ, इसमें 3 लाख रुपये सरकारी सब्सिडी के तौर पर मिले हैं। सदानंद समय-समय पर बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से भी सलाह लेते रहते हैं। कृषि मंत्रालय सदानंद को कई बार सम्मानित भी कर चुका है। सदानंद की कामयाबी बताती है कि आज जरूरत है कि सही तकनीक और सूझबूझ से खेती की जाए। सदानंद देश के तमाम युवा और नई सोच वाले युवा किसानों के लिए एक सशक्त उदाहरण हैं।

देश में पहली बार उगेगा काला गेहूं ,दुगनी कीमत पर बिकेगा बाजार में

सात साल की रिसर्च के बाद नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नोलाॅजी इंस्टीट्यूट (एनएबीआई) मोहाली ने ब्लैक व्हीट का पेटेंट करा लिया है। नाम दिया है ‘नाबी एमजी)। काले, नीले और जामुनी रंग में मिलने वाली ये गेहूं आम गेहूं से कहीं ज्यादा पौष्टिक है।

ये कैंसर, डायबिटीज, तनाव, मोटापा और दिल की बीमारियों की रोकथाम में मददगार साबित होगी। रोजाना खा सकते हैं। देश में पहली दफा ये पंजाब में उगाई जाएगी। हालांकि ट्रायल के तौर पर किसानों के जरिए इसका 850 क्विंटल उत्पादन किया जा चुका है। किसानों को भी इसका आम गेहूं के मुकाबिले दोगुना दाम मिलेगा। मोहाली में 2010 से चल रही रिसर्च साइंटिस्ट डाॅ. मोनिका गर्ग के नेतृत्व में की गई है।

शरीर से फ्री रेडिकल्स बाहर करता है

ब्लैक व्हीट में एंथोसाइनिन नामक पिग्मेंट आम गेहूं से काफी ज्यादा होता है। आम गेहूं में जहां एंथोसाइनिन की मात्रा 5 से 15 पास प्रति मिलियन (पीपीएम) होती है, वहीं ब्लैक व्हीट में 40 से 140 पीपीएम पाई जाती है। एंथोसाइनिन ब्लू बेरी जैसे फलों की तरह सेहत लाभ प्रदान करता है। एंथोसाइनिन एक एंटीआॅक्सीडेंट का भी काम करता है। यह शरीर से फ्री रेडिकल्स निकालकर हार्ट, कैंसर, डायबिटीज, मोटापा और अन्य बीमारियों की रोकथाम करता है। इसमें जिंक की मात्रा भी अधिक है।

कंपनियों से होगा करार

एनएबीआई ने ब्लैक व्हीट की मार्केटिंग के लिए बैंकिंग और मिलंग समेत कई बड़ी कंपनियों से करार करने की कार्रवाई शुरू कर दी है। डॉ. मोनिका गर्ग ने बताया, इसे उगाने के इच्छुक किसानों के लिए एनएबीआई जल्द ही वेबसाइट लांच करेगी। इस वेबसाइट पर किसान अप्लाई कर सकेंगे, जिन्हें बीज व अन्य सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। किसानों की फसल भी एनएबीआई ही खरीदेगी।

ट्रायल पर 850 क्विंटल उगाई, किसानों को मिलेगा दोगुना रेट

टल उगाई, किसानों को मिलेगा दोगुना रेटएनएबीआई ने इसका उत्पादन गर्मी और सर्दी दोनों मौसम में किया है। सर्दी में यह फसल मोहाली के खेतों में उगाई गई, जबकि गर्मी में हिमाचल और केलोंग लाहौल स्पिति में। साइंटिस्ट डाॅ. मोनिका गर्ग ने बताया, इस साल विभिन्न किसानों के खेतों में 850 क्विंटल ब्लैक व्हीट उगाई है।

इसकी औसत उपज प्रति एकड़ 13 से 17 क्विंटल रही। सामान्य गेहूं की औसत उपज पंजाब में प्रति एकड़ करीब 18 से 20 क्विंटल है। किसानों को आम गेहूं मंडियों में बेचने पर न्यूनतम समर्थन मूल्य करीब 1625 रुपए प्रति क्विंटल मिलता है। जबकि ब्लैक व्हीट का रेट 3250 रुपए दिया गया है।

राजस्थान के किसान भी करने लगे केसर की खेती ,सरकार से माँगा सहयोग

जम्मू-कश्मीर जैसे ठंडे प्रदेश में पनपने वाली केसर की खेती शेखावाटी के धोरों में भी होने लगी है। केसर का जायका थोड़ा कड़वा जरूर होता है, लेकिन यही केसर शेखावाटी की धरा में नई खुशबू और मिठास घोल रही है। शेखावाटी में केसर की खेती की बात करना मजाक समझा जाता था, लेकिन केसर के जरिए किसानों की जिंदगी में नए रंग घोलने के लिए मोरारका फाउंडेशन आगे आया है।

फाउंडेशन के प्रयासों से आठ किसान प्रायोगिक तौर पर इसकी खेती करने लग गए है और यह खेती कुछ सफल भी होने लगी है। सबसे पहले चेलासी गांव के किसान मुरली धर सैनी ने इसकी खेती कर इसकी संभावना को मजबूती दी है। मोरारका हवेली में भी केसर की क्यारी तैयार की गई है। करीब नौ-दस में फूल भी खिले हैं। इन फूलों से केसर का उत्पादन होगा।

 

मोरारका फाउंडेशन के स्थानीय मैनेजर अनिल सैनी ने बताया कि कश्मीर से लाए प्रमाणित बीज से खेती शुरू की है गई। सर्दी का मौसम केसर की फसल के लिए सबसे उत्तम है। दिन में धूप खिलने और रात को सर्दी पड़ने से फूल ज्यादा आते हैं। केसर के फूलों को रात के अंधेरे में बंद कमरे में सुखाना पड़ता है। सुखाते समय भी फूलों की खास देखभाल करनी पड़ती है।

कृषि विभाग के अधिकारी इस बात का दावा करते हैं कि यहां पैदा होने वाली केसर की गुणवत्ता अच्छी नहीं हो सकती, क्योंकि श्रेष्ठ किस्म के लिए लम्बे समय तक शून्य से कम तापमान चाहिए। अनिल सैनी इस दावे को खारिज करते हैं। फिलहाल मोरारका हवेली, कल्याणपुरा के रामावतार बुगालिया, बलवंतपुरा फाटक के संजू सैनी, बड़ी झीगर के ओमप्रकाश पचार, बसावा के भानाराम सैनी, बलरिया का बास के नेमीचंद धायलों का बास के बलवीर सिंह केसर की खेती कर रहे हैं।

पायलट प्रोजेक्ट बनाकर सरकार के पास भेजा जाएगा

किसान केसर की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार से सहयोग मांग रहे हैं। पायलट प्रोजेक्ट बना सरकार के पास भेजा जाएगा। जैविक खेती करने वाले किसानों को शामिल किया जाएगा। सरकार की ओर से केसर के बीज खाद उपलब्ध कराई जाए तो इसकी खेती को बढ़ावा मिल सकता है।

यूरिया की खपत घटाने के लिए सरकार ने निकाला यह अनोखा जुगाड़

किसान यूरिया का कम उपयोग करें इसके लिए सरकार ने नई तरकीब निकाली है। अब यूरिया 50 किलो के बदले 45 किलो के बैग में मिलेगा। उर्वरक मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी है। अधिकारी ने कहा कि यूरिया के 45 किग्रा के बैग की बिक्री 245 रुपए (टैक्स अलग से) में की जाएगी। ये अभी की 50 किग्रा के यूरिया की कीमत 268 रुपए (टैक्स अलग से) से कम होगी।

कंपनियां तैयार

अधिकारी ने बताया कि योजना तैयार की जा रही है। कंपनियां इस परिवर्तन के लिए तैयार हैं। वे 45 किग्रा बैग होने की छपाई करेंगे। इसे अगले वर्ष से लागू किया जायेगा।उन्होंने कहा कि असल उद्देश्य यूरिया की खपत को कम करना तथा उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना है। चूंकि यूरिया अन्य उर्वरकों से सस्ता है, इसलिए व्यापक तौर पर इसका इस्तेमाल करते हैं। सरकार की ओर से इसको काफी सब्सिडी प्राप्त होती है तथा इसकी अधिकतम खुदरा कीमत अब 5,360 रुपए प्रति टन की है।

खपत कम करेंगे

अधिकारी ने ब्योरा दिया, यूरिया की खपत को घटाने के लिए हमने विभिन्न उपायों के बारे में सोचा। नीम लोपित यूरिया उनमें से एक था। जो हमने लागू किया है। अब हम 45 किग्रा के बैग के बारे में सोच रहे हैं। सामान्य तौर पर किसान प्रत्येक हेक्टेयर भूमि के लिए बैगों की संख्या के हिसाब से यूरिया का इस्तेमाल करते हैं। जब हमने किसानों को 50 किग्रा के बैग की संख्या को कम करने के लिए कहा, उन्होंने नहीं सुना। इसलिए हमने खपत को कम करने के लिए 45 किग्रा के बैग का इस्तेमाल करने का फैसला किया है।

40 हजार करोड़ है सबसिडी

अधिकारी ने कहा कि किसान 45 किग्रा का बैग खरीदेंगे और जितने बैग का वह पहले इस्तेमाल करते थे उतने का ही इस्तेमाल करेंगे। यह अप्रत्यक्ष रूप से खपत में 10 प्रतिशत की कमी करेगा। यूरिया की वार्षिक सब्सिडी करीब 40,000 करोड़ रुपए है। भारत में पिछले वर्ष से करीब 2.4 करोड़ टन यूरिया का उत्पादन हो रहा है जो 2.2 करोड़ टन की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।

आवारा पशुओं को खेतों से दूर रखने के लिए अपनाएं यह 10 तरिके

भारत का हर एक किसान आवारा पशुओं के आतंक से परेशान हैं। हजारों रुपए की लागत और हड्डी तोड़ मेहनत से तैयार होती फसल को छुट्टा जानवर बर्बाद कर देते हैं, किसानों को सबसे अधिक नुकसान नीलगाय करती हैं। कई किसान रात-रात भर जागकर खेतों की रखवाली कर रहे हैं। इन छुट्टा जानवरों का असर खेती पर पड़ रहा है।

नीलगाय के आतंक से परेशान किसानों के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कई घरेलू और परंपरागत नुस्ख़े बताए हैं जिससे काफी कम कीमत में किसानों को ऐसे पशुओं से आजादी मिल सकती है। गोमूत्र, मट्ठा और लालमिर्च समेत कई घरेलू चीजों से तैयार हर्बल घोल इस दिशा में कारगर साबित हो रहा है।

हर्बल घोल की गंध से नीलगाय,गाय और दूसरे जानवर 20-30 दिन तक खेत के आसपास नहीं फटकते हैं। कृषि के जानकार, वैज्ञानिक और केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा संचालित किसान कॉल सेंटर (1800-180-1551) के किसान सलाहकार किसानों को इऩ देसी नुस्ख़ों को आजमाने की सलाह दे रहे हैं।

नीलगाय झुंड में रहती हैं तो जितना ये फसलों को खाकर नुकसान करती हैं उससे ज्यादा इनके पैरों से नुकसान पहुंचता है। सरसों और आलू के पौधे एक बार टूट गए तो निकलना मुश्किल हो जाता है।

परंपरागत तरीके किसानों को जरुर आज़माने चाहिए। हालांकि लंबे समय के लिए ये कारगर नहीं है क्योंकि ये (नीलगाय) बहुत चालाक जानवर हैं तो बाड़ लगवाना सबसे बेहतर रहता है।

नीलगाय,गाय रोकने के लिए इस तरह बनायें हर्बल घोल

  • नीलगाय को खेतों की ओर आने से रोकने के लिए 4 लीटर मट्ठे में आधा किलो छिला हुआ लहसुन पीसकर मिलाकर इसमें 500 ग्राम बालू डालें। इस घोल को पांच दिन बाद छिड़काव करें। इसकी गंध से करीब 20 दिन तक नीलगाय खेतों में नहीं आएगी। इसे 15 लीटर पानी के साथ भी प्रयोग किया जा सकता है।
  • बीस लीटर गोमूत्र, 5 किलोग्राम नीम की पत्ती, 2 किग्रा धतूरा, 2 किग्रा मदार की जड़, फल-फूल, 500 ग्राम तंबाकू की पत्ती, 250 ग्राम लहसुन, 150 लालमिर्च पाउडर को एक डिब्बे में भरकर वायुरोधी बनाकर धूप में 40 दिन के लिए रख दें। इसके बाद एकलीटर दवा 80 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करने से महीना भर तक नीलगाय फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाती है। इससे फसल की कीटों से भी रक्षा होती है
  • खेत के चारों ओर कंटीली तार, बांस की फंटियां या चमकीली बैंड से घेराबंदी करें।
  • खेत की मेड़ों के किनारे पेड़ जैसे करौंदा, जेट्रोफा, तुलसी, खस, जिरेनियम, मेंथा, एलेमन ग्रास, सिट्रोनेला, पामारोजा का रोपण भी नीलगाय से सुरक्षा देंगे।
  • खेत में आदमी के आकार का पुतला बनाकर खड़ा करने से रात में नीलगाय देखकर डर जाती हैं।
  • नीलगाय के गोबर का घोल बनाकर मेड़ से एक मीटर अन्दर फसलों पर छिड़काव करने से अस्थाई रूप से फसलों की सुरक्षा की जा सकती है।
  • एक लीटर पानी में एक ढक्कन फिनाइल के घोल के छिड़काव से फसलों को बचाया जा सकता है।
  • गधों की लीद, पोल्ट्री का कचरा, गोमूत्र, सड़ी सब्जियों की पत्तियों का घोल बनाकर फसलों पर छिड़काव करने से नीलगाय खेतों के पास नहीं फटकती।
  • देशी जीवनाशी मिश्रण बनाकर फसलों पर छिड़काव करने से नीलगाय दूर भागती हैं।
  • कई जगह खेत में रात के वक्त मिट्टी के तेल की डिबरी जलाने से नीलगाय नहीं आती है।

सरकारी नौकरी छोड़ शुरू की एलोवेरा की खेती सिर्फ दो साल में होने लगी करोड़ों की कमाई

ये कहानी बदलते हुए भारत के एक ऐसे किसान की है जो पढ़ा-लिखा है, इंजीनियर है और फर्राटेदार अंग्रेजी भी बोलता है। इतना ही नहीं उन्होंने तो एमबीए की पढ़ाई के लिए दिल्ली के एक कॉलेज में दाख़िला भी लिया था, लेकिन शायद उनकी मंज़िल कहीं और थी। ये कहानी जैसलमेर के हरीश धनदेव की है जिन्होंने 2012 में जयपुर से बीटेक करने के बाद दिल्ली से एमबीए करने के लिए एक कॉलेज में दाख़िला लिया,

लेकिन पढ़ाई के बीच में ही उन्हें 2013 में सरकारी नौकरी मिल गई सो वो दो साल की एमबीए की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। हरीश जैसलमेर की नगरपालिका में जूनियर इंजीनियर के पद पर तैनात हुए। यहां महज दो महीने की नौकरी के बाद उनका मन नौकरी से हट गया।

हरीश दिन-रात इस नौकरी से अलग कुछ करने की सोचने लगे। कुछ अलग करने की चाहत इतनी बढ़ गई थी कि वो नौकरी छोड़कर अपने लिए क्या कर सकते हैं इस पर रिसर्च करना शुरु किया।

वह किसानों के परिवार से ताल्लुक रखता था और कुछ अलग हट कर करना चाहता था। एक बार दिल्ली में आयोजित एक कृषि प्रदर्शनी में उसे जाने का मौका मिला और यहीं से उसका जीवन बदल गया।

उसने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दिया और अपने 120 एकड़ के खेत में एलोवेरा यानि की घृतकुमारी सहित अन्य फसलों की खेती शुरू कर दी। जैसलमेर से 45 किलोमीटर दूर धहीसर में हरीश ने अपनी कंपनी ‘नेचुरलो एग्रो’ की भी शुरूआत की । थार के मरूस्थल में हो रहे इस एलोवेरा को बड़ी मात्रा में पतंजली फूड प्रोडेक्ट्स को भेजा जाता है जहां उससे जूस बनाया जाता है।

इस रेगिस्तानी इलाके में होने वाले एलोवेरा की गुणवत्ता इतनी बेहतरीन है कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में इसकी बेहद मांग है। पतंजली के विशेषज्ञों ने यहां उपजाए जाने वाले एलोवेरा की गुणवत्ता को इतना अच्छा पाया कि उन्होंने इसकी पत्तियों का तुरंत आर्डर दे दिया। नौकरी से त्यागपत्र देकर खेती किसानी शुरू करने के धनदेव के इस साहसिक फैसले का सुखद परिणाम सामने आया।

आमतौर पर रेगिस्तान में बाजरा, गेंहू, मूंग और सरसों उपजाए जाते हैं लेकिन वो कुछ नया उपजाना चाहते थे। उन्होंने अपने 120 एकड़ के खेत में एलोवेरा की बेबी डेनसिस प्रजाति लगायी। एलोवेरा की यह प्रजाति इतनी बेहतरीन है कि ब्राजील, हांगकांग और अमेरिका जैसे देशों में भी इसकी बड़ी मांग है।

शुरूआत में उन्होंने एलोवेरा के 80 हजार पौधे लगाए जो आज बढ़कर तकरीबन सात लाख हो चुके हैं। वो बताते हैं कि पिछले चार महीनों में उन्होंने हरिद्वार के पतंजली फैक्ट्री में 125 से 150 टन तक एलोवेरा के पत्तियों के प्रसंस्कृत गुदे भेजे हैं। धनदेव ये भी बताते हैं कि एलोवेरा के पत्तों का प्रसंस्करण आधुनिकतम प्रणाली के जरिए होता है जिसके लिए उन्होंने एक संयंत्र भी स्थापित किया है।

नौकरी छोड़ बंजर जमीन पर शुरू की कीवी की खेती , ऑनलाइन बिक्री से कमा रहे लाखों

हिमाचल के जिला सोलन के शिल्ली गांव में तैयार कीवी का स्वाद पूरे देश को लुभा रहा है। हिमाचल से एक्सपोर्ट क्वालिटी की कीवी तैयार कर देशभर में मिसाल बन रहे मनदीप वर्मा की करामात कई युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है।

खाने में लजीज और पाचन तंत्र समेत शारीरिक ऊर्जा देने वाले फल को अपनी सफलता का नया आधार बनाने वाले मनदीप एमबीए करने के बाद विप्रो कंपनी में मैनेजर पद पर कार्यरत थे।

नौकरी छोड़ बंजर जमीन पर कीवी की पैदावार में जुट गए। परिवार सदस्यों और बागवानी विशेषज्ञों के सहयोग से आज मनदीप वेबसाइट से देशभर में कीवी बेच रहे हैं।

14 लाख से बंजर जमीन पर तैयार किया बगीचा

उनकी पत्नी सुचेता वर्मा कंपनी सचिव हैं। साढ़े सात वर्ष पहले उन्होंने घर के पास बंजर जमीन पर बागवानी का विचार किया। इसके लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ी और गांव लौट आए। उनके पिता राजेंद्र वर्मा, माता राधा वर्मा ने कीवी की खेती में उनका पूरा सहयोग दिया।

सोलन के बागवानी विभाग और डा. यशवंत सिंह परमार यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों से बात करने के बाद उन्होंने विशेषज्ञों की सलाह पर मध्यपर्वतीय क्षेत्र में कीवी का बाग तैयार करने का मन बना लिया। उन्होंने 14 बीघा जमीन पर कीवी का बगीचा लगाया।

कीवी की उन्नत किस्में एलिसन और हैबर्ड के पौधे ही लगाए। करीब 14 लाख रुपये से बगीचा तैयार करने के बाद मनदीप ने वेबसाइट बनाई। मनदीप के मुताबिक बाग से उत्पाद सीधे उपभोक्ता तक पहुंचाने की उनकी कोशिश कारगर साबित हुई।

350 रुपये प्रति बॉक्स बिक रहा कीवी

कीवी की सप्लाई वेबसाइट पर ऑनलाइन बुकिंग के बाद की जाती है। कीवी ऑनलाइन हैदराबाद, बंगलूरू, दिल्ली, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में बेचा जा रहा है।

डिब्बे पर कब फल टूटा, कब डिब्बा पैक हुआ सारी डिटेल दी जा रही है। एक डिब्बे में एक किलो किवी पैक होती है और इसके दाम 350 रुपये प्रति बॉक्स है। जबकि सोलन में कीवी 150 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहा है।

हिमाचल में है कीवी की अपार संभावना

डा. वाईएस परमार यूनिवर्सिटी नौणी में कीवी पर दशकों से काम कर रहे विशेषज्ञ डा. विशाल राणा ने बताया कि शिल्ली गांव के मनदीप वर्मा कीवी की ऑनलाइन बिक्री कर रहे हैं। उनकी पैकिंग और ग्रेडिंग भी एक्सपोर्ट क्वालिटी की है।

उन्होंने कहा कि देश में कीवी की शुरुआत हिमाचल प्रदेश से हुई है। आज देश के कुल कीवी उत्पादन का 60 फीसदी कीवी अरुणाचल प्रदेश तैयार कर रहा है।

सिक्किम, मेघालय में भी कीवी की बागवानी की जा रही है। हिमाचल में कीवी उत्पादन की अपार संभावना है। सरकार कीवी को बढ़ावा देने के लिए 50 फीसदी सब्सिडी दे रही है। हिमाचल में अभी करीब 150 हेक्टेयर भूमि पर ही कीवी उगाई जा रही है।