नौकरी छोड़ बंजर जमीन पर शुरू की कीवी की खेती , ऑनलाइन बिक्री से कमा रहे लाखों

हिमाचल के जिला सोलन के शिल्ली गांव में तैयार कीवी का स्वाद पूरे देश को लुभा रहा है। हिमाचल से एक्सपोर्ट क्वालिटी की कीवी तैयार कर देशभर में मिसाल बन रहे मनदीप वर्मा की करामात कई युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है।

खाने में लजीज और पाचन तंत्र समेत शारीरिक ऊर्जा देने वाले फल को अपनी सफलता का नया आधार बनाने वाले मनदीप एमबीए करने के बाद विप्रो कंपनी में मैनेजर पद पर कार्यरत थे।

नौकरी छोड़ बंजर जमीन पर कीवी की पैदावार में जुट गए। परिवार सदस्यों और बागवानी विशेषज्ञों के सहयोग से आज मनदीप वेबसाइट से देशभर में कीवी बेच रहे हैं।

14 लाख से बंजर जमीन पर तैयार किया बगीचा

उनकी पत्नी सुचेता वर्मा कंपनी सचिव हैं। साढ़े सात वर्ष पहले उन्होंने घर के पास बंजर जमीन पर बागवानी का विचार किया। इसके लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ी और गांव लौट आए। उनके पिता राजेंद्र वर्मा, माता राधा वर्मा ने कीवी की खेती में उनका पूरा सहयोग दिया।

सोलन के बागवानी विभाग और डा. यशवंत सिंह परमार यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों से बात करने के बाद उन्होंने विशेषज्ञों की सलाह पर मध्यपर्वतीय क्षेत्र में कीवी का बाग तैयार करने का मन बना लिया। उन्होंने 14 बीघा जमीन पर कीवी का बगीचा लगाया।

कीवी की उन्नत किस्में एलिसन और हैबर्ड के पौधे ही लगाए। करीब 14 लाख रुपये से बगीचा तैयार करने के बाद मनदीप ने वेबसाइट बनाई। मनदीप के मुताबिक बाग से उत्पाद सीधे उपभोक्ता तक पहुंचाने की उनकी कोशिश कारगर साबित हुई।

350 रुपये प्रति बॉक्स बिक रहा कीवी

कीवी की सप्लाई वेबसाइट पर ऑनलाइन बुकिंग के बाद की जाती है। कीवी ऑनलाइन हैदराबाद, बंगलूरू, दिल्ली, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में बेचा जा रहा है।

डिब्बे पर कब फल टूटा, कब डिब्बा पैक हुआ सारी डिटेल दी जा रही है। एक डिब्बे में एक किलो किवी पैक होती है और इसके दाम 350 रुपये प्रति बॉक्स है। जबकि सोलन में कीवी 150 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहा है।

हिमाचल में है कीवी की अपार संभावना

डा. वाईएस परमार यूनिवर्सिटी नौणी में कीवी पर दशकों से काम कर रहे विशेषज्ञ डा. विशाल राणा ने बताया कि शिल्ली गांव के मनदीप वर्मा कीवी की ऑनलाइन बिक्री कर रहे हैं। उनकी पैकिंग और ग्रेडिंग भी एक्सपोर्ट क्वालिटी की है।

उन्होंने कहा कि देश में कीवी की शुरुआत हिमाचल प्रदेश से हुई है। आज देश के कुल कीवी उत्पादन का 60 फीसदी कीवी अरुणाचल प्रदेश तैयार कर रहा है।

सिक्किम, मेघालय में भी कीवी की बागवानी की जा रही है। हिमाचल में कीवी उत्पादन की अपार संभावना है। सरकार कीवी को बढ़ावा देने के लिए 50 फीसदी सब्सिडी दे रही है। हिमाचल में अभी करीब 150 हेक्टेयर भूमि पर ही कीवी उगाई जा रही है।

अब आपके गांव के सरपंच नहीं कर सकेंगे गोलमाल

आज हम आप को एक  ऐसी सरकारी वेबसाइट (gov.in)  का लिंक बताने जा रहे है , जिसका उपयोग कर के आप अपने गांव , अपने मोहले और अपने देश के विकाश में मत्वपूर्ण  योगदान कर सकते है , यह पर आप देख सकते है की भररत सरकार  ने आप के गांव के निर्माण कार्यों के लिए कितना पैसा दिया है ( यह डाटा पूरी तरह से ऑथेंटिकेट है ), अगर आप को कोई अनियमितता लगती है तो इसकी शिकायत आप जनसुनवाई में सीधे कर सकते है

Step 1 .  सर्वप्रथम नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

http://www.planningonline.gov.in/ReportData.do?ReportMethod=getAnnualPlanReport

Step 2  .आप होनी सुबिधा के अनुसार अपनी भाषा चुन सकते है , अभी यहाँ पर इंग्लिश,हिंदी और पंजाबी का ऑप्शन है। …इमेज देखें

Step 3  .यहाँ पर आप अपना योजना बर्ष और अपने राज्य  का नाम चुन कर GET REPORT पर क्लिक करें , इसके  बाद आप से योजना इकाई के बारे में पूछेगा , For Example अगर आप को ये देखना है की आप के गांव  में इस बर्ष कितना पैसा सरकार  की तरफ से आया है तो आप GRAM PANCHYAT का ऑप्शन चुनेँगे

Step 4 . उसके बाद आप से ये पूछा जायेगा की आप किस जिला पंचायत में रहते है, आप अपने जिले का नाम सेलेक्ट कर लेंगे

Step 5  . जिला पंचायत सेलेक्ट करने के बाद आप अपने जनपद पंचायत  या ब्लॉक का नाम सेलेक्ट कर लेंगे, For Example – अगर मुझे ये देखना है की 2017-2018 में मेरे गांव में किस मद में सरकार ने  कितना पैसा दिया है ,

Step 6  .जनपद पंचायत के बाद आप से ग्राम PANCHYAT का नाम पुछा  जायेगा , उसके बाद आप GET REPORT पर क्लिक करेंगे।

यहाँ पर आप के सामने आप के गाँव / मोहल्ले / बार्ड में अभी तक कितना पैसा आया है  और आप के मुखिया( ग्राम PANCHYAT प्रद्यान), आप के बार्ड के मेंबर ने कितना काम किया है और सरकार से कितना पैसा लिया है, इसकी पूरी जानकारी ले सकते है, यदि आप को कुछ ऐसा डेटा मिलता  है जो आप को सही नहीं लगता है तो इसकी शिकायत आप जनसुनवाई पर जा कर कर सकते है , जहा पर आप के शिकायत पर सीधे मुखयमंती की सीधे नजर रहेगी

अब हमको जागरूक होने की जरूरत है। सभी जानकारियां सरकार ने ऑनलाइन वेबसाइट पे उपलब्ध करा दी है बस हमें उन्हें जानने की जरूरत है, यदि हर गांव के सिर्फ 2-3 युवा ही इस जानकारी को अपने गांव के लोगो को बताने लगे, समझ लो 50% भ्रष्टाचार तो ऐसे ही कम हो जाएगा।

इसलिए आपसे गुजारिश है कि आप अपने गांव में वर्ष 2016-17 मे हुए कार्यो को जरूर देखें और इस लिंक को देश के हर गांव तक भेजने की कोशिश करे ताकि गांव के लोग अपना अधिकार पा सके।

ईरान ने चावल आयात पर लगी रोक हटाई, 1121 धान में 200 रुपए तक आया उछाल

ईरान ने चावल आयात पर लगी रोक हटा दी है। इससे 1121 धान के रेट में 200 रुपए तक का उछाल आया है। इसका सीधा फायदा चावल निर्यातकों किसानों को होगा। ईरान सीजन में आयात पर अस्थाई रोक लगा देता है, ताकि लोकल किसानों का धान खरीदा जा सके। इस बार वहां लोकल पैदावार कम है और डिमांड ज्यादा है। इसलिए रोक हटा दी गई है।

ईरान ने 22 नवंबर से 22 जुलाई 2018 तक चावल निर्यात खोल दिया है। ईरान में हर साल तीन मिलियन टन चावल की खपत है, जबकि उसका घरेलू उत्पादन 2.2 मिलियन टन है। इसलिए उसे 8 से 10 लाख टन का आयात करना पड़ता है। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स के पूर्व प्रधान विजय सेतिया ने बताया कि देश के लिए यह अच्छी खबर है। इसका राइस एक्सपोर्टर्स को फायदा होगा। एक्सपोर्टर्स को परमिट देना शुरू कर दिया है।

एक लाख टन चावल ईरान के पोर्ट पर पड़ा है, यह भी अब जल्द उठ जाएगा। सेतिया ने बताया कि भारत से 40 लाख टन चावल का निर्यात होता है। इसमें से 25 प्रतिशत निर्यात ईरान में होता है। इस बार चावल निर्यातकों ने महंगे दाम पर धान खरीदी हुई है, अब चावल बाहर जाने से निर्यातकों को फायदा होगा। अगले कुछ दिनों मेें इसका और किसान दोनों को फायदा होगा। पूसा-1121 का चावल ईरान में सबसे ज्यादा जाता है। अरब के देशों में ज्यादातर 1121 की खपत है। यूरोप में सुपर बासमती चावल की डिमांड ज्यादा होती है।

1121 में ऐसे आया उछाल 

ईरानमें चावल का निर्यात खुलते ही 1121 जीरी के भाव में 200 रुपए प्रति क्विंटल का उछाल आया है। पहले 1121 धान 3200 रुपए प्रति क्विंटल तक बिकी थी, लेकिन गुरुवार को नरवाना मंडी में 1121 जीरी 3390 रुपए प्रति क्विंटल, पिल्लूखेड़ा 3379, जींद 3380, निसिंग 3400, हांसी 3351, चीका मंडी 3350 , कलायत 3411, खन्ना मंडी 3470, अमृतसर 3485, करनाल 3370, कैथल 3380 रुपए प्रति क्विंटल बिकी। बासमती जीरी में 30 से 40 रुपए प्रति क्विंटल का उछाल आया है।

 

किसानों को मिला अच्छा भाव 

इसबार किसानों को धान का भाव सीजन की शुरुआत से ही अच्छा मिल रहा है। पीआर धान समर्थन मूल्य से ज्यादा भाव में बिकी। 1509 किस्म का भाव 2300 रुपए से लेकर 2600 रुपए प्रति क्विंटल मिला। डुप्लीकेट बासमती भी 2800 रुपए, 1121 का रेट 2800 से 3300 रुपए, परंपरागत बासमती का रेट 3500 रुपए से लेकर 4000 रुपए प्रति क्विंटल मिल रहा है। विदेशों में ज्यादा सौदे होते हैं तो रेटों में उछाल सकता है।

वाह ! खेती से हर महीने कैसे कमाए जाएं लाखों रुपए, पूर्वांचल के इस किसान से सीखिए

खेती में लागत कम करे कोई कैसे लाखों रुपए कमा सकता है और खेती को फायदे का सौदा बना सकत है, पूर्वांचल के नागेंद्र पांडेय से सीखिए। अपने खेत, गाय-भैंस, गोबर और ज्ञान का उपयोग कर वो देश के चुनिंदा जैविक खेती और कंपोस्ट खाद बनाकर लाखों रुपए की कमाई करने वाले किसान और ट्रेनर बन गए हैं।

उत्तर प्रदेश के ज़िला महाराजगंज मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर अंजना गाँव के किसान नागेंद्र पाण्डेय ने न सिर्फ खेती की विधि में सुधार किया बल्कि आस-पास के कई परिवारों को रोज़गार भी उपलब्ध कराया।

नागेंद्र ने कृषि विषय में स्नातक किया और फिर नौकरी की तलाश शुरू कर दी। 15 साल तक उन्होंने एक अच्छी नौकरी ढूंढी लेकिन उनकी ये तलाश पूरी नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर खेती करना शुरू कर दिया। उन्हें पता था कि सिर्फ सामान्य तरीके से खेती करके इनती कम ज़मीन पर वो इतनी कमाई नहीं कर सकते, इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों न खेती में ही कुछ ऐसा किया जाए कि आमदनी भी अच्छी हो और खेती में नया प्रयोग भी हो।

उन्होंने देखा की अक्सर छोटे जोत के किसान खाद व रसायनों की किल्लत से दो चार हो रहे है। इसके बावजूद महंगी खादों का प्रयोग करने से भी किसानों को अपेक्षित उत्पादन व लाभ नही मिल पा रहा है। नागेंद्र ने इसका भी तोड़ निकाल लिया। उन्होंने फैसला लिया कि वह ज़मीन के कुछ हिस्से पर जैविक खाद तैयार करेंगे और बाकी बचे हिस्से पर जैविक तरीके से खेती करेंगे।

इस तरह की वर्मी कंपोस्ट बनाने की शुरुआत

नागेंद्र बताते हैं कि वर्मी खाद तैयार करने के लिए उन्हें केंचुओं की ज़रूरत थी। इसके लिए उन्होंने कृषि व उद्यान विभाग से संपर्क किया लेकिन उन्हें यहां से केंचुए नहीं मिल पाए। इसके बाद उनके एक दोस्त ने उन्हें लगभग 40-50 केंचुए दिए। नागेंद्र ने इन केचुओं को चारा खिलाने वाली नाद में गोबर व पत्तियों के बीच डाल दिया। 45 दिनों में इनसे लगभग 2 किलो केचुए तैयार हो गए। उन्होंने इसकी शुरुआत साल 2000 में की थी और अब वह 120 फीट जगह में वर्मी कम्पोस्ट तैयार कर रहे हैं। इसमें 750 कुंतल खाद तैयार होती है। इस खाद की पैकेजिंग और मार्केटिंग का काम भी यहीं से होता है। यहां मिलने वाली खाद की 25 किलो की बोरी की कीमत 200 रुपये होती है। इसके अलावा व किसानों को मुफ्त में केंचुआ भी उपलब्ध कराते हैं।

खाद की यूनिट से कई परिवारों को दिया रोजगार

नागेंद्र बताते हैं कि उनके यहां लगभग 35 लोग अलग-अलग काम कर रहे हैं। यहां लोग खाद की छंटाई, बिनाई, ढुलाई जैसे काम करते हैं। कई महिलाएं भी यहां पैकेजिंग का काम करती हैं। यहां इन्हें प्रतिदिन 150 रुपये मजदूरी दी जाती है। इस समय नागेंद्र पूर्वी उत्तर प्रदेश में सबसे बड़े वर्मी खाद उत्पादक हैं। वह महाराजगंज व गोरखपुर ज़िले में वर्मी खाद बनाने की तीन बड़ी यूनिट स्थापित कर चुके हैं।

करवाते हैं खाद की लैब टेस्टिंग

नागेंद्र बताते हैं कि उनके यहां बनाई जाने वाली खाद की यह खास बात है कि वह इसकी गुणवत्ता का पूरा ख्याल रखते हैं। वह समय समय पर खाद की गुणवत्ता की जांच कराने के लिए उसका लैब टेस्ट भी कराते रहते हैं। इस खाद में 1.8 प्रतिशत नाइट्रोजन, 2.5 प्रतिशत फास्फोरस और 3.23 प्रतिशत पोटाश पाया गया है। इसलिए इस खाद से पौधो की बढवार व उपज दोनों अच्छी होती है।

शहतूत की नर्सरी से अच्छी कमाई

वर्मी कम्पोस्ट के अलावा नागेन्द्र पाण्डेय एक एकड़ खेती में शहतूत की नर्सरी भी तैयार करते हैं जिसमें 10 लाख 50 हजार पौधे प्राप्त होते हैं। एस 1 (64) नाम की यह प्रजाति न केवल सामान्य प्रजातियों से अधिक पत्तियों का उत्पादन देती है बल्कि इसको रेशम कीट पालन के लिए सबसे अच्छा भी माना जा सकता है। इस नर्सरी को भी पूरी तरह से जैविक विधि से ही तैयार किया जाता है। यही कारण है कि यहां तैयार पौधे मध्य प्रदेश सरकार 2.5 रुपये प्रति पौधे की दर से खरीद लेती है। इस तरह नागेंद्र 6 महीने में सिर्फ शहतूत की नर्सरी से 26 लाख 25 हजार रुपये की कर लेते हैं। अगर लागत को निकाल दिया जाए तो भी 6 महीने में इनकी औसत आमदनी करीब 15 लाख रुपये हो जाती है।

वाटर हार्वेस्टिंग का नायाब तरीका

किसान नागेन्द्र पाण्डेय ने खेतों की सिंचाई में प्रयोग आने वाले पानी व वर्षा के पानी के लिए एक तालाब खुदवा रखा है। जिसमें खेत से सीधा पाइप लगाकर जोड़ा गया है। वहां से अतिरिक्त पानी पाइप के रास्ते गड्ढे में इकट्ठा हो जाता है। जिसका प्रयोग वह दोबारा वर्मी पिट की नमी बनाने व खेतों की सिंचाई के लिए करते हैं।

आधुनिक विधि से करते हैं खेती

बाकी फसलों में भी नागेन्द्र खेती की आधुनिक विधि का इस्तेमाल करते हैं। वह वह धान को श्री विधि रोपाई कर अधिक आमदनी प्राप्त करते हैं। वहीं गेहू की बुआई सीड ड्रिल से करते हैं जिससे लागत में कमी आती है। वह अपने खेतों में वर्मी खाद व वर्मी वास का ही इस्तेमाल करते हैं।

किस तरह बनता है वर्मीवास

वर्मीवास भी केंचुए से ही बनाया जाता है। इस विधि मेंं मटके में गोबर मिलाकर उसमें केंचुए डालकर उसे ऊपर टांगकर पानी डाल दिया जाता है। जिसमें इन केचुओं के हार्मोनस मिलकर बूंद-बूंद बाहर आता है। जो फसलों में छिड़काव के काम आता है। नागेन्द्र पाण्डेय स्थायी कृषि के लिए जो प्रयास कर रहे हैं उनके बारे में जानकर गोरखपुर जिले के कमिश्नर, उपनिदेशक कृषि, सीडीओ सहित तमाम लोग इनके युनिट का भ्रमण कर चुके है और इनके प्रयासों की सराहना भी की।

(वृहस्पति कुमार पाण्डेय के इनपुट के साथ)

News Source : Gaonconnection News

अब ट्रैक्टर-ट्राली पर भी लगेगा इतना टोल टैक्स

देश भर के किसान अब यदि अपनी ट्रैक्टर ट्राली के साथ किसी भी टोल प्लाजा से गुजरेंगे तो उन्हें ट्रकों के समान टोल देने पड़ेंगे। केंद्र सरकार किसानों के ट्रैक्टर ट्राली को कामर्शियल वाहनों की श्रेणी में डालने जा रही है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की अधिसूचना के ड्राफ्ट रूल में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि ट्रैक्टर अब नान ट्रांसपोर्ट व्हीकल (गैर व्यवसायिक वाहनों) की श्रेणी से बाहर माने जाएंगे।

केंद्र सरकार के इस फैसले का विरोध भी शुरू हो गया है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री देवीलाल जब देश के उप-प्रधानमंत्री बने, तब उन्होंने सड़क एवं परिवहन विभाग, मोटर व्हीकल अधिनियम तथा एनएचएआइ की नियमावली में संशोधन करवाकर ट्रैक्टर-ट्राली को ‘गड्डे’ का दर्जा दिलाया था। यह 1989 की बात है। इसके बाद से ट्रैक्टर ट्रालियों को टोल संग्र्रहण केंद्रों पर टोल टैक्स नहीं देना पड़ता था।

देवीलाल के प्रयासों से मिली राहत का देश भर के किसानों को फायदा हुआ था। लेकिन अब दुबारा ट्रेक्टर ट्राली पर ट्रकों के समान टैक्स लगेगा । केंद्र सरकार लगातार किसान विरोधी फैसले ले रही है। किसानों को उनकी फसल के वाजिब दाम नहीं दिए जा रहे, उल्टे गलत फैसलों से किसानों की कमर तोड़ी जा रही है। किसानों के ट्रैक्टर ट्राली से टोल वसूल किए जाने का फैसला निहायत ही गलत है।

तीन नस्लों के मेल से गाय की नई प्रजाति विकसित, देगी 55 लीटर तक दूध

वैज्ञानिकों ने तीन नस्लों के मेल से गाय की नई प्रजाति विकसित की है। इसे नाम दिया है ‘हरधेनू’। यह 50 से 55 लीटर तक दूध दे सकती है। 48 डिग्री तापमान में सामान्य रहती है। यह 18-19 महीने में प्रजनन करने के लिए सक्षम है। जबकि अन्य नस्ल करीब 30 माह का समय लेती है। ‘हरधेनू’ प्रजाति में 62.5% खून हॉलस्टीन व बाकी हरियाना व शाहीवाल नस्ल का है। यह कमाल किया हिसार के लुवास विवि के अनुवांशिकी एवं प्रजनन विभाग के वैज्ञानिकों ने।

कामधेनू की तर्ज पर नाम :डॉ. बीएल पांडर के अनुसार कामधेनू गाय का शास्त्रों में जिक्र है कि वह कामनाओं को पूर्ण करती है। इसी तर्ज पर ‘हरधेनू’ नाम रखा गया है। नाम के शुरुआत में हर लगने के कारण हरियाना की भी पहचान होगी।

पहले 30 किसानों को दी : वैज्ञानिकों ने पहले करीब 30 किसानों को इस नस्ल की गाय दीं। वैज्ञानिकों ने अब यह नस्ल रिलीज की है। अभी इस नस्ल की 250 गाय फार्म में हैं। कोई भी किसान वहां से इस नस्ल के सांड का सीमन ले सकता है।

जर्सी को पीछे छोड़ा :‘हरधेनू’ ने दूध के मामले में आयरलैंड की नस्ल ‘जर्सी’ को भी पीछे छोड़ दिया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि ‘जर्सी’ नस्ल की गाय आैसत 12 लीटर और अिधकतम 30 लीटर तक दूध दे सकती है। वहीं, ‘हरधेनू’ औसत 16 लीटर और अधिकतम 50 से 55 लीटर दूध दे सकती है।

ऐसे तैयार की नस्ल : हरियाना नस्ल की गाय के अंदर यूएसए व कनाडा की हॉलस्टीन और प्रदेश की शाहीवाल और हरियाना नस्ल का सीमन छोड़ा गया। तीन नस्लों के मेल से तैयार हुए गाय के बच्चे को ‘हरधेनू ‘ नाम दिया गया।

45 साल शोध :1970 में हरियाणा कृषि विवि की स्थापना हुई। तभी गाय की नस्ल सुधार के लिए ‘इवेलेशन ऑफ न्यू ब्रीड थ्रू क्राॅस ब्रीडिंग एंड सिलेक्शन’ को लेकर प्रोजेक्ट शुरू हुआ। 2010 में वेटनरी कॉलेज को अलग कर लुवास विश्वविद्यालय बनाया गया। शंकर नस्ल की गाय की नई प्रजाति ‘हरधेनू ‘ को लेकर चल रही रिसर्च का परिणाम 45 साल बाद अब सामने आया है।

 

पशुओं में आस करवाने के बावजूद भी गर्भ ना ठहरना की समस्या के कारण और इलाज ।

जिस गाभिन में तीन बार आस करवाने के बावजूद भी गर्भ नहीं ठहरता, वह रिपीटर करार दी जाती है। इस समस्या को अक्सर रिपीट ब्रीडर भी कहा जाता है। यह समस्या आजकल बहुत ज्यादा आ रही है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे कि बच्चेदानी में गांठ आदि।

किसान भाई यह नहीं देखते कि आस करवाते समय ताप 22 दिन बाद है या समय से पहले है या बाद में। यदि 17-18वें दिन बोलती है तो बीमारी और है यदि 26-28वें दिन बोलती है तो बीमारी और है। क्या बीमारी मिली।

क्या वैटरनी डॉक्टर आया और टीका लगाकर चला गया, क्या उसने पूछा कि पिछले महीने कब ताप में आई थी। बहुत सारी ऐसी जानकारियां होती हैं जिनका किसान भाइयों को खुद रिकॉर्ड रखना चाहिए जैसे कि ताप में आने का समय, कितने दिन बाद ताप में आई आदि।

बाकी आपको शायद पता ही हो कि तारें सिर्फ शीशे की तरह बनी होनी चाहिए। यदि तारें घुसमैली हों या तारों में छेद हो तो पशु को कभी नए दूध नहीं करवाना चाहिए। बल्कि एक अच्छे माहिर डॉक्टर से बच्चेदानी की जांच करवाके दवाई भरवा देनी चाहिए।

इसके अलावा गाभिनों के बार बार गर्भपात के कुछ अन्य कारण जैसे :

  •  जनन अंगों में जमांदरू नुक्स
  •  कम शारीरिक भार
  •  शरीर में हारमोन का संतुलन बिगड़ जाना
  •  गर्म वातावरण
  •  आस करवाने का प्रबंध
  •  ताप के लक्षणों और आस करवाने के सही समय की कम जानकारी

इलाज :
इस तरह की समस्या के इलाज के लिए कुछ इलाज आपसे शेयर कर रहे हैं जो कि पशु पलन क व्यवसाय में काफी महत्तवपूर्ण हैं।

  •  पहली बात आप पशु को संतुलित डाइट ज़रूर दें। जब आप पशु को क्रॉस करवायें उससे 5 मिनट के अंदर अंदर 125 ग्राम रसौद जो कि पंसारी की दुकान या आयुर्वेदिक सामान वाली दुकान से मिल जाएगी उसे पशु को दें।
  •  यदि तारें साफ आ रही हैं तो एक होमियोपैथिक दवाई को सीरिंज से सीधे मुंह के द्वारा पशु को दिन में तीन टाइम देते रहें।

डेढ़ सौ रुपए का एक अमरूद बेचता है ये किसान,जाने इसके अमरुद में ऐसा क्या है खास

आपने कभी डेढ़ से दो किलो का एक बड़ा अमरूद देखा है ? बहुत कम लोग ऐसे होंगे जिन्होंने देखा होगा। आज हम आपको एक ऐसे ही किसान से मिलवाने जा रहे हैं जो अमरूद की खेती करते हैं और डेढ़ से दो किलो का एक अमरूद पैदा करते हैं, इस एक अमरूद को किसान 80 से 150 रुपए का बेचता है। हालांकि सभी फल इतने बड़े नहीं होते हैं।

मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के किसान सुभाष जैन कई फसलों की खेती करते हैं लेकिन अमरूद की खेती उन्हें दूसरे किसानों से एक अलग पहचान दिलाती है। सुभाष 25 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं, जिसमें से तीन एकड़ जमीन पर अमरूद की खेती करते हैं।


सुभाष बताते हैं, ”चार साल पहले बीएनआर किस्म के अमरूद के पौधे लगाए थे। इसे थाई ग्वावा भी कहते हैं। इसके एक एकड़ में 400 पौधे लगते हैं।” वो बताते हैं, ”एक पेड़ से दूसरे पेड़ के बीच में 12 फुट सामने और आठ फुट की दूरी पर बगल में पौधे लगाने चाहिए। एक एकड़ में पहली बार पौधे लगाने में कुल एक लाख रुपए का खर्च आता है।” एक पेड़ से 25 से 30 किलो ग्राम फसल निकलते हैं जो 80 से 150 रुपए किलो तक बिकता है।

सुभाष आगे बताते हैं, ”पौधों में जब फल आते हैं उस समय देखरेख सबसे ज्यादा करनी होती है। जहां पर एक साथ कई फसल होते हैं उसमें से सिर्फ एक फल ही रखा जाता है बाकी सभी फलों को तोड़ कर फेक दिया जाता है। जब फसल थोड़े बड़े हो जाते हैं तो उनकी बैगिंग करनी होती है, जिसमें हर फल पर 5 से 7 रुपए का खर्च आता है।” सुभाष बताते हैं कि फलों की बैगिंग इस लिए करते है ताकि फलों पर दाग न पड़ें पक्षी नुकसान न पहुंचाए। बैगिंग करने से फल पूरी तरह से सुरक्षित रहता है।


सुभाष बताते हैं, ”फल जब पूरी तरह से पक जाता है उस समय इसका वजह 1700 ग्राम तक हो जाता है। मैं तौल कर देख चुका हूं।” सुभाष का अमरूद दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा समेत कई राज्यों में बिकने के लिए जाता है।80 से 150 रुपए प्रर्ति किलो बिकाता है यह अमरूद।

हल्दी की इस नई किस्म से पूरे साल किसान कर सकते हैं हल्दी की खेती

अभी तक ज्यादातर किसान खरीफ में हल्दी की बुवाई करते हैं, लेकिन अब हल्दी की नई किस्म प्रजाति एनडीएच-98 देश के सभी तरह के जलवायु  में साल भर की जा सकती है।

डॉ. विक्रमा प्रसाद पांडेय बताते हैं, “राजस्थान में आयोजित एक कार्यक्रम में हल्दी की ये किस्म रिलीज की गई थी, ये प्रजाति शोध निदेशालय के अंर्तगत सब्जी विज्ञान विभाग में विकसित की गई है, इस प्रजाति को विकसित किए जाने से तीन साल पहले तक अखिल भारतीय स्तर के प्रोजेक्ट मैनेजर की देखरेख में कई प्रदेशों में इस किस्म पर शोध किया गया है।”

हल्दी की नई किस्म एनडीएच-98 इजाद की गई थी।, ये किस्म सभी तरह की जलवायु में उगायी जा सकती है साथ ही इसकी खेती देश के सभी प्रदेशों में की जा सकती है। यह गुणवत्ता व मात्रा में भी दूसरी किस्मों के मुकाबले ज्यादा बेहतर है।

वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए तरीकों से अगर हल्दी की खेती की जाए तो किसानों को अच्छे फसल की प्राप्ति हो सकती है। वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए तरीकों से अगर हल्दी की खेती की जाए तो किसानों को अच्छे फसल की प्राप्ति हो सकती है।

हल्दी की सफल खेती के लिए उचित फसल चक्र को अपनाना जरूरी होता है। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हल्दी की खेती लगातार उसी जमीन पर न की जाए। क्योंकि यह फसल जमीन से ज्यादा से ज्यादा पोषक तत्वों को खींचती है, जिससे दूसरे साल उसी जमीन में इसकी खेती नहीं करें तो ज्यादा अच्छा होगा।

जिन किसानों के पास सिंचाई की सुविधा है वो अप्रैल के दूसरे पखवाड़े से अगस्त के प्रथम सप्ताह तक हल्दी को लगा सकते हैं। जिनके पास सिंचाई सुविधा का अभाव है वे मानसून की बारिश शुरू होते ही हल्दी लगा सकते हैं। जमीन अच्छी तरह से तैयार करने के बाद पांच-सात मीटर, लंबी तथा दो-तीन मीटर चौड़ी क्यारियां बनाकर 30 से 45 सेमी कतार से कतार और 20-25 सेमी पौध से पौध की दूरी रखते हुए चार-पांच सेमी गहराई पर कंदों को लगाना चाहिए।

देश भर में आसानी से उगाई जा सकती है यह किस्म

डॉ. विक्रमा प्रसाद पांडेय बताते हैं, “शोध में पाया गया है कि ये देशभर में उगाने के सही किस्म है और देश भर में आसानी से उगाई जा सकती है, इसका उत्पादन प्रति हेक्टेयर 300-400 टन आसानी से हो जाता है, ये गुणवत्ता में भी दूसरी किस्मों के मुकाबले बेहतर है।” इस हल्दी की प्रजाति में पीलापन श्रेष्ठ स्तर तक पांच प्रतिशत और लीफ ऑयल की मात्रा एक से दो प्रतिशत मिली। बिहार और नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान केंद्रों के फार्म में इसका उत्पादन भी शुरू किया गया है।

किसान ने निकाली एक ऐसी स्कीम के पैसे भी बच गए और लेबर भी फ्री

यह कहानी सबक देती है कि हमारे पास जितने भी सीमित संसाधन हैं, उन्हीं का सही इस्तेमाल करके हम न केवल कामयाबी हासिल कर सकते हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी मॉडल स्थापित कर सकते हैं। इसके लिए जरूरत होती है सही नेतृत्व और टीम वर्क की।

बेंगलुरु से करीब 100 किलोमीटर दूर एक जगह है मांड‍या। पिछले साल जुलाई की बात है, यहां गन्ने की खेती करने वाले 20 से ज्यादा किसानाें ने मौत को गले लगा लिया। इन किसानों की आत्महत्या की वजह यह नहीं थी कि खेती नहीं हुई, वजह थी वह भारी कर्ज जो उन्होंने कभी लिया था और अब बढ़ते-बढ़ते इतना हो चुका था कि उसे चुकाना उनके वश की बात नहीं रही थी। फसल की सही कीमत न मिलना, भारी स्टॉक और सही सलाह के अभाव में ये किसान हालात के सामने हार चुके थे।

इधर, मांडया से हजारों मील दूर बैठा एक शख्स इन हालात से दुखी था। वह रोजाना मांडया में किसानों की आत्महत्या की खबरें सुनता और मन मसोस कर रह जाता। कैलिफोर्निया में आईटी प्रोफेशनल मधुचंद्रन चिक्कादैवेया मांडया में ही जन्मे थे। उनका संबंध भी किसान परिवार से है, उनका बचपन 300 एकड़ में फैली बेंगलुरु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के प्रांगण में बीता था, उनके पिता यहां वाइस चांसलर थे।

वर्ष 2014 में उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागप्ात्र दे दिया और मांडया लौट आए। मधु कहते हैं- मेरा एक ही मकसद था, मांडया के किसानों को बचाना, उनकी मदद करना। उनके मुताबिक देश के हालात ऐसे हैं कि किसान अपनी खेती को छोड़कर छोटे-मोटे काम-धंधों के लिए शहर की तरफ दौड़ रहे हैं, ऐसा इसलिए है क्योंकि खेती अब फायदे की चीज नहीं रही।

मधु कहते हैं, जब मैं मांडया आया तो मैंने पाया कि यहां किसान आर्गेनिक तरीके से खेती कर रहे हैं, लेकिन समस्या यह थी कि यहां कोई बेहतर मार्केट नहीं थी और न ही किसानों को गाइड करने वाला। तब हमने पहला काम यही किया- मंडया आर्गेनिक फार्मर्स को-ऑपरेटिव सोसायटी स्थापित की।

मधु ने अपने दोस्तों, पूर्व सहयोगियों के साथ मिलकर करीब 1 करोड़ रुपये जुटा कर इस सोसायटी का गठन किया, उन्हें सरकार से मंजूरी लेने और आर्गेनिक मांडया नाम से एक ब्रांड शॉप खोलने में 8 महीने का समय लगा। इस ब्रांड के जरिये किसान अपने आर्गेनिक फल-सब्िजयों को बेचते हैं। मधु के मुताबिक हमने बेंगलुरु-मैसूर हाईवे पर आर्गेनिक मांडया नाम से इस शॉप को स्थापित किया है। मेरा मकसद था कि एक किसान सीधे अपने ग्राहक से बात कर सके, उसकी जरूरत को समझ सके वहीं एक ग्राहक किसान की मेहनत को जान सके। हाईवे पर शॉप स्थापित करने का फायदा यह हुआ कि वहां से गुजरने वाले लोग उन आर्गेनिक फल-सब्जियों को खरीदने लगे। किसानों को वहां से कहीं और नहीं जाना पड़ा। इसकी कामयाबी के बाद एक आर्गेनिक रेस्टोरेंट खोल दिया गया।

क्या है फार्म शेअर (farm share)प्रोग्राम

मधु कहते हैं, लोग आर्गेनिक पदार्थों से जुड़ते हुए हिचकते हैं,हमारे लिए यह बेहद जरूरी था कि हम लोगों को बताएं कि आर्गेनिक खाद्य पदार्थों का सेवन ही क्यों जरूरी है। इसके लिए हमने लोगों को मांडया में बुलाकर उन्हें इस काम से जोड़ने की सोची। जिन लोगों की खेती में रुचि है या जो प्रकृति के साथ रहकर अपना समय बीताना चाहते हैं, उन्हें आमंत्रित किया गया। मधुचंद्रन का यह आइडिया काम कर गया है, चार महीनों के अंदर उनकी सोसायटी ने एक करोड़ रुपये का बिजनेस किया है, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है, वे अपने कर्ज चुका पा रहे हैं, उनकी जिंदगी में बदलाव आ गया है।

इसके लिए उन्होंने “फार्म शेअर” नाम का प्रोग्राम शुरू किआ जिसमे वह शहर में रहने वाले परिवारों को 35000 \ रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन मुहैया करवाते है।यहाँ पर लोग खुद के लिए और परिवार के लिए आधे से 2 एकड़ तक जमीन किराये पर लेते है  ।उनकी मदद के लिए एक गांव का एक किसान हर वक़्त उनके साथ रहता है और खेतीबाड़ी में शहरी परिवार की मदद करता है ।

तीन महीने बाद परिवार की मर्जी हो तो वो उत्पाद बाजार में बेच सकता है और अगर चाहे तो अपने लिए भी रख सकता है । इस प्रोग्राम की खासियत यह है यहाँ पर लोग ख़ुशी -ख़ुशी काम करते है जिस के लिए खेत एक मौजमस्ती और पिकनिक मानाने की जगह बन गया है ।

मधुचंद्रन का यह आइडिया काम कर गया है, चार महीनों के अंदर उनकी सोसायटी ने एक करोड़ रुपये का बिजनेस किया है, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है, वे अपने कर्ज चुका पा रहे हैं, उनकी जिंदगी में बदलाव आ गया है।