कुदरत का करिश्मा ! किसान के ट्यूबवेल से पानी की जगह निकल रही है आग

सिंचाई के लिए खेत में बोर खुदवाने वाले एक किसान के सामने समस्या खड़ी हो गई है। उसके बोर में ज्वंलनशील गैस निकल रही है। जब भी वह बोर चालू करता है, उससे आइल, डीजल निकलता है। आग के संपर्क में आने से उसमें आग भी लग जाती है।

पिछले एक माह से किसान परेशान है, उसकी समस्या का कोई समाधान नहीं हो पा रहा है। खेत में खड़ी फसल भी सूखने लगी है। यह हकीकत है मध्य प्रदेश के जिला दमोह की तहसील हटा के भरतलाई निवासी किसान बैजनाथ प्रसाद चौधरी की। जिनके खेत में पानी के लिए खुदवाए गए एक बोरिंग में से पानी के साथ-साथ आग की लपटें निकल रही हैं।

यहां पर बता दें कि बेजनाथ प्रसाद चौधरी ने अपने खेत में छह माह पहले एक बोरिंग खुदावाया था। इस बोरिंग से पिछले एक सप्ताह से लगातार खुद-ब-खुद पानी तो निकल ही रहा है, लेकिन पानी के साथ आइल, डीजल जैसा तरल पदार्थ निकल रहा है, जिसके संपर्क में आग की लपटें भी निकल रही है, जो गांव वालों के लिए एक पहेली बना हुआ है। इसे देखने के लिए आसपास के इलाकों से लोगों का जमावड़ा भी लग रहा है।

बोरिंग से आग की लपटें निकलने के सिलसिला के बीच आज इस घटना को चार दिन हो चुके हैं। पंप से निरंतर गैस निकलने से किसान के खेत में आइल और डीजल एकत्रित हो गया है। किसान का कहना है कि बोरिंग हॉल से गैस का रिसाव अभी भी हो रहा है। इससे बोरिंग वाले क्षेत्र में गैस की बदबू आ रही है। विशेषज्ञों की मानें तो बोरिंग में निकली गैस थोड़ी-सी चिंगारी के संपर्क में आते ही आग में बदल जाती है, इसी कारण ये हो रहा है।

बोरिंग के होल में आग तक लग रही है 

अपने खेत में बोरिंग करवाने वाले किसान का कहना है कि, उसने जून में करीब 385 फीट की खुदाई के बाद पानी आ गया था, लेकिन उसमें पंप नहीं लगवाया था। करीब चार दिन पहले उसने पंप लगवाया है, जब से बोरिंग होल में आग की लपटें निकलने लगी। कुछ ही समय में ये बात पूरे क्षेत्र में फैल गई और मौके पर ग्रामीणों का जमघट लगना शरू हो गया।

किसान ने इसकी सूचना अधिकारियों को दी है। किसान का कहना है कि उसकी 5 एकड़ जमीन है। जिसमें सिंचाई के लिए पानी की जरुरत है, लेकिन अब सिंचाई नहीं हो पा रही है। इस संबंध मंे पीएचई के विशेषज्ञ रवि शाह का कहना है कि कहीं कहीं पर प्राकृतिक गैस के स्रोत मिलते हैं। हटा के कुछ क्षेत्र में ऐसी स्थिति है। ओएनजीसी की टीमें भी सर्चिंग में लगी हुईं हैं। मैं भी एक बार मौके का निरीक्षण करके आता हूं।

एमपी के इस किसान ने 7 हज़ार रुपये लगाकर एक एकड़ गेहूं से कमाए 90 हज़ार

मध्यप्रदेश के 23 वर्षीय एक युवा किसान ने सेल्स ऑफिसर की नौकरी छोड़कर पिछले तीन वर्षों से सात बीघे जैविक खेती करना शुरू किया। इनके खेत में इस वर्ष एक एकड़ ‘बंशी’ गेहूं में लागत सात हजार आयी और मुनाफा 90 हजार हुआ, क्योंकि जैविक ढंग से किया गया बंशी गेहूं तीन गुना अधिक कीमत पर बिका।

इस तरह तैयार की खाद

वो आगे बताते हैं, “पोषक तत्वों से भरपूर बंशी गेहूँ को जैविक ढंग से करने की वजह से खाने के लिए इसे खरीदने वालों ने 5000 कुंतल में खरीदा, अपने खेतों में हमने सिर्फ गाय के गोबर, गोमूत्र, बेसन और गुण के मिश्रण से तैयार खाद का ही प्रयोग किया।” डाक्टर ईश्वर गुर्जरमंदसौर जिले के पहले किसान नहीं हैं जो जैविक ढंग से खेती कर अपनी फसल से अच्छा मुनाफा कमा रहे हों बल्कि मंदसौर जिले के सैकड़ों किसानो का मानना है कि जैविक ढंग से की गयी किसी भी फसल को सामान्य दाम से तीन गुना ज्यादा कीमत पर बेच सकते हैं।

5000 रुपये कुंतल में बिका गेहूं

गेहूं के सही मूल्य के लिए जहां एक ओर किसान आन्दोलन कर रहे हैं वहीं आयुर्वेदिक डॉक्टर ईश्वर गुर्जर अपने खेत के गेहूं को पांच हजार प्रति कुंतल बेच रहे हैं। मध्यप्रदेश शासन के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी पीएस बारचे देशी बीज की महत्ता बताते हैं, “देशी बीज किसी भी फसल का हो उसे संरक्षित करने की जरूरत है, बंशी गेहूं वर्षों पुराना गेहूं है पंजाब और महाराष्ट्र की लैब में इस गेहूं का परिक्षण कराया जिसमे 18 पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जबकि बाकी गेहूं में आठ नौ प्रतिशत ही पोषक तत्व होते हैं।”

उन्होंने आगे बताया, “इस समय देश कुपोषण से गुजर रहा है इसलिए देशी बीजों को बचाना बहुत जरूरी है क्योंकि सबसे ज्यादा पोषक तत्व देशी बीजों में ही पाए जाते हैं, किसान अपने खेतों में देशी बीजों का प्रयोग कर जीरों बजट से खेती करें, जैविक ढंग से की गयी फसलों की मांग देश के साथ-साथ विदेशों में भी बहुत हैं और इन फसलों की कीमत भी सामान्य कीमत से ज्यादा होती है।”

                                                                                                                                                

खेत में नहीं करते कीटनाशक का प्रयोग

ये अपने खेतों में बाजार से खरीदी गयी किसी भी खाद या कीटनाशक का प्रयोग नहीं करते। बोआई से पहले बीज शोधन जरुर करते हैं। भूमि के पोषक तत्व और उपजाऊंपन को बनाये रखने के लिए डॉक्टर गुर्जर जैविक खाद बनाने से लेकर कीटनाशक दवाइयां भी खुद ही बना लेते हैं। उनका मानना है, “अगर हमारे पास अपने देशी बीज संरक्षित हो, खुद की बनाई खाद हो तो हमारी निर्भरता बाजार से कम होगी, देशी बीज और जैविक खेती दोनों ही हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहतर हैं, हमारे भोजन में पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा मिलेगी साथ बाजार भाव भी अच्छा मिलेगा।”

ग्लूकोज की मात्रा होती है कम

महाराष्ट्र के प्रगतिशील किसान पद्मश्री सुभाष पालेकर अपने शिविरों में किसानों को देशी बीज और जीरो बजट खेती करने के लिए प्रेरित करते हैं। बंशी गेहूं के बारे में उनका कहना है कि इस गेहूं को खाने में मधुमेह के रोगियों को लाभ मिलता है, क्योंकि इसमें ग्लूकोज की मात्रा काफी कम रहती है। साथ ही यह अन्य गंभीर बीमारियों में भी गेहूं कारगर है। यह आसानी से पच जाता है।

बीज शोधन के लिए बीजामृत (100 किलो बीज के लिए सामग्री)-

पांच किलो देशी गाय का गोबर, पांच किलो गोमूत्र, 20 लीटर पानी, 50 ग्राम चूना, 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी।

सभी सामग्री को मिलाकर 24 घंटे प्लास्टिक के ड्रम में भरकर रख देते हैं। इसके बाद इस बीजामृत को 100 किलो बीज में मिलाकर फर्श पर कपड़े के ऊपर बिछाकर छांव में एक दिन के लिए सुखा देते हैं, ये बीज शोधन की प्रक्रिया है इसके बड़ा बीज की बोआई करते हैं।

पौधों का भोजन जीवामृत

10 किलो गोबर, 10 किलो गोमूत्र, दो किलो गुड़ या फलों का गूदा, दो किलो बेसन, 200 लीटर पानी, 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी।

सभी सामग्री को मिलाकर 48 घंटे सीमेंट या प्लास्टिक के ड्रम में भरकर रख देते हैं। 48 घंटे बाद फसल की सिंचाई के दौरान इसका प्रयोग करते हैं। जीवामृत बनाने के 15 दिन तक ही इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, किसी भी फसल में 21 दिन बाद इसको पानी के साथ या छिड़काव करके प्रयोग कर सकते हैं। ये फसल में खाद का काम करता है इसका प्रयोग पूरी फसल में तीन से चे बार किया जा सकता है।

100 किलो गाय का गोबर, एक लीटर गोमूत्र, एक किलो गुड़ या फलों का गूदा, दो किलो बेसन(किसी भी डाल का), 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी।सभी सामग्री को एक साथ मिलाकर पालीथिन पर फैला देते हैं, 48 घंटे छायादार जगह पर रखकर जूट के बोरे से ढक देते हैं, इसके बाद 48 घंटे और रखकर इसे सुखाकर इसका भंडारण भी कर सकते हैं, ये खाद एक एकड़ के लिए पर्याप्त है। इससे खेत में पोषण और जीवाणु की पूर्ति होती है।

कीटनाशक और फसल की सुरक्षा के लिए अग्नियास्त्र (तनो के अन्दर कीट, इल्ली सफेद मच्छर, माहू)—

20 लीटर गोमूत्र, पांच किलो नीम के पत्ते, 500 ग्राम तम्बाकू पाउडर, 500 ग्राम हरी तीखी मिर्च, 500 ग्राम लहसुन की चटनी।

सभी सामग्री को मिट्टी के बर्तन में डालकर तीन चार उबाल लगाते हैं, इसके बाद इसे ठंडा होने के लिए 48 घंटे के लिए रख देते हैं। इसके बाद इसे छानकर किसी बर्तन में रख देते हैं। 16 लीटर की टंकी में 250 एमएल अग्नियास्त्र डालते हैं, एक एकड़ में जितनी पानी की टंकी का छिड़काव करेंगे हर टंकी में 250 एमएल अग्नियास्त्र डाल देंगे। इसके छिड़काव से फसल में कोई भी कीट नहीं लगेंगे। तीन महीने तक ही इसका उपयोग कर सकते हैं।

NEWS SOURCE- Gaonconnection News

मैदानी इलाकों में सर्दी में करें स्ट्रॉबेरी की खेती

अभी तक स्ट्रॉबेरी की खेती ठंडे प्रदेशों में की जाती थी, लेकिन हरियाणा के किसान इसके लिए अनुकूल भूमि और वातावरण न होते हुए भी स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। यही नहीं स्ट्राबेरी के साथ मिर्च की भी खेती सहफसल लेकर दोगुना फायदा हो रहा है।

हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जिले के डिंगरोता गाँव के किसान अनिल बलोठिया (35 वर्ष) पिछले दो साल स्ट्राबेरी की खेती कर रहे हैं। दो साल पहले हिसार में उन्होंने स्ट्रॉबेरी की खेती के बारे में जानकारी मिली, उसके बाद इंटरनेट से सारी जानकारी इकट्ठा की।

वहां जाकर उन्होंने इसकी खेती शुरु कर दी। किसान अनिल बलोठिया बताते हैं, “दो साल पहले हिसार में एक किसान को स्ट्रॉबेरी की खेती करते देखा था, फिर वहीं से मैंने भी सोच लिया कि अपने गाँव में जाकर स्ट्राबेरी की खेती करूंगा। इंटरनेट की जानकारी लेने के बाद अपने गाँव में खेती शुरु कर दी है।”

महेन्द्रगढ़ के अलावा हिसार जिला धीरे-धीरे स्ट्रॉबेरी का हब बनता जा रहा है। यहां के कई गाँवों में स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। यहां के किसानों के लिए दूसरी फसलों के मुकाबले यह फायदे की फसल साबित हो रही है। खेती में ज्यादा मुनाफा देख दूसरे जिलों के किसान भी यहां पर जमीन ठेके पर लेकर स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं।

अनिल स्ट्रॉबेरी के साथ ही मिर्च के पौधे भी लगा देते हैं। अनिल बताते हैं, “हम पहले स्ट्रॉबेरी के पौधे लगा देते हैं, जब पौधे पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं तो उसी के साथ ही मिर्च के पौधे लगा देते हैं। स्ट्राबेरी आठ महीने की फसल होती है और मिर्च दस महीने की होती है।”

डेढ़ एकड़ स्ट्रॉबेरी की फसल में चार-पांच लाख की लागत आती है। पैदावार होने के बाद खर्च निकालकर सात-आठ लाख का फायदा हो जाता है। वहीं मिर्च से भी दो-तीन लाख की आमदनी हो जाती है। ऐसे में मिर्च और स्ट्राबेरी दोनों को बेचकर दस लाख तक आमदनी हो जाती है। स्ट्रॉबेरी की फसल खत्म होते होते मिर्च में फल लगने लगते हैं।

यहाँ बिकती है फसल

यहां से तैयार स्ट्रॉबेरी पैक करके दिल्ली भेज देते हैं, दिल्ली में इसकी बहुत बड़ी मार्किट है । इसका इस्तमाल टाफी ,कैंडी और बहुत सी खाने वाली चीजों में होता है । इसके इलवा साउथ इंडिया में भी इसकी मंडी है । अगर आप किसी बड़े शहर में रहते है तो खुद भी पैकेट बना कर सेल कर सकते है जिस से आप का मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है ।अनिल बताते हैं, “स्ट्रॉबेरी पचास रुपए किलो से लेकर छह सौ रुपए किलो तक बिक जाती है। डेढ़ एकड़ में दो किलो वजन की पचास हजार ट्रे पैदा हो जाती है।”

डेढ़ एकड़ में 35 से 40 हजार पौधे लगते हैं, मिर्च में अलग से कोई खर्च नहीं लगता है। इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं, लेकिन अब अनिल नर्सरी यहीं पर तैयार करते हैं। किस्म के हिसाब से प्रति पौधा 10 रुपए से लेकर 30 रुपए तक के बीच पड़ते हैं। रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में यह तैयार होकर फल दे देती है।

कैसे होती है खेती

यह पौधा दोमट मिटटी में ही लगाया जा सकता है। पौध लगाने के बाद 20 दिन तक फव्वारा लगाया जाता है।रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी और फरवरी माह में यह तैयार होकर फल दे देती है।

हिमाचल से आते हैं पौधे

इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं। वैरायटी के अनुसार प्रति पौधा 10 रुपए से लेकर 30 रुपए तक के बीच पड़ता है।स्ट्रॉबेरी में स्वीट चार्ली और विंटर डाउन कीमती वैरायटी में गिनी जाती है।जबकि काडलर, रानिया, मोखरा समेत कई वैरायटियां स्ट्रॉबेरी की होती हैं।

यह मशीन मात्र दो घंटे में करती है 1 एकड़ भूमि में गन्ने की रोपनी

अब गन्ने की खेती और भी आसान हो गई है। पहले गन्ने की खेती करने में जहां गन्ने को खेतों में गिराने, उर्वरक देने, कीटनाशी देने, कुदाल चलाने में अलग-अलग मजदूरों का सहयोग लेना पड़ता था। अब एक एकड़ में मात्र दो मजदूर से ही गन्ने की रोपनी की जा सकती है।

कटर एंड प्लांटर मशीन से यह संभव हो सका है। क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र माधोपुर में इस मशीन से इस वर्ष गन्ने की खेती फार्म में की गई है। खासकर बड़े किसानों व मध्यमवर्गीय किसानों के लिए यह फायदेमंद साबित हो रहा है।

इस मशीन से एक ही बार में गन्ने को बीज के लिए कटिंग संभव है। खेतों में नाली बनाने, बीज का शोधन करने, कीटनाशी व खरपतवारनाशी दवाओं का छिड़काव, जमीन की जुताई से लेकर मिट्टी को बराबर करने का काम भी एक ही साथ में संभव है।

इससे किसानों को समय की भी बचत हो रही है। एक एकड़ भूमि में गन्ने की रोपनी करने में मात्र दो घंटे का ही समय ही लग रहा है। जबकि मात्र दो मजदूर इसके लिए काफी है। जहां साधारण तरीके से गन्ने की खेती करने में प्रति एकड़ 16 क्वटल गन्ने का बीज लगा करते है वही इस मशीन से चार क्वटल गन्ने की बचत किसानों को हो रही है। जिसका सीधा लाभ किसान उठा रहे है।

बहुत सारी कंपनी यह मशीन त्यार करती है लेकिन हम आप को मोगा इंजीनियरिंग वर्क्स कंपनी की इस मशीन के बारे में बातयेंगे । यह मशीन एक साथ 3 कतरों में एक साथ गन्ना बीज सकते है। इस मशीन की और जानकारी के लिए आप इस नंबर 8285325047 पर संपर्क कर सकते है । यह कंपनी मीरुत, उत्तर प्रदेश की है ।

यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें

आ गया मेगा टी अब ट्रेक्टर से पांच गुना कम कीमत पर करें ट्रैक्टर के सारे काम

बहुत से किसान हर साल इस लिए खेती करना छोड़ देते है क्यूंकि उनके पास खेती करने के लिए जरूरी साधन नहीं होते । एक किसान के लिए सबसे जरूरी चीज ट्रेक्टर होता है लेकिन ट्रेक्टर महंगा होने के कारण हर किसान इसे खरीद नहीं पता ।

ऐसे किसानो के लिए किर्लोस्कर कंपनी ने मेगा टी पेश क्या है । जिसकी कीमत तो ट्रेक्टर के मुकाबले कम है लेकिन यह ट्रेक्टर वाले सारे काम कर देता है । इस मशीन से आप जुताई ,बिजाई ,निराई गुड़ाई ,भार ढोना,कीटनाशक सप्रे आदि काम कर सकते है ।जो किसानों का काम आसान बना देती है।इसकी कीमत तकरीबन 1 लाख 40 हजार है।

मशीन की जानकारी

  • मॉडल – मेगा-टी (15 HP) हैंडल स्टार्ट
  • लंबाई – 2950 mm. चौड़ाई – 950 mm. ऊंचाई – 1300 mm.
  • इंजन का वजन – 138 किलोग्राम
  • इंजन की ऑयल कैपेसटी – 3.5 लीटर
  • प्रकार- वाटर कूल्ड डीजल इंजन
  • Rated RPM – 2000
  • ब्लेडों की संख्या – 20
  • गिअर – 6 आगे, 2 रिवर्स

यह मशीन कैसे काम करता है इसके लिए वीडियो भी देखें

कहीं भी उगाएं बटन मशरूम, एक सीजन में 3 लाख तक कमाने का मौका

अगर खेतीबाड़ी के जरि‍ए अच्‍छी कमा ई करने के तरीका खोज रहे हैं तो बटन मशरूम की खेती एक अच्‍छा ऑप्‍शन हो सकता है। यह मशरूम की ही एक कि‍स्‍म होता है, मगर इसमें मि‍नरल्स और वि‍टामि‍न खूब होते हैं। इसकी खासि‍यत ये है कि‍ आप एक झोंपड़ी में भी इसकी फायदेमंद खेती कर सकते हैं। मशरूम अपने हेल्थ बेनेफि‍ट्स की वजह से लगातार पॉपुलर हो रही है। फुटकर में इसका रेट 300 से 350 रुपए कि‍लो है।

बड़े शहरों में तो यह इसी रेट में मि‍लता है। थोक का रेट इससे करीब 40% तक कम होता है। कई लोगों ने पारंपरि‍क खेती को छोड़कर मशरूम उगाना शुरू कर दि‍या है और अब अच्‍छी खासी कमाई कर रहे हैं। जैसे गोरखपुर के कि‍सान राहुल सिंह।

 उपज और मुनाफे का गणि‍त

राहुल हर साल 4 से 5 क्विंटल कंपोस्‍ट बनाकर उसपर बटन मशरूम की खेती करते हैं। इतनी कंपोस्‍ट पर करीब 2000 कि‍लो मशरूम पैदा हो जाता है। एक क्विंटल कम्पोस्ट में डेढ़ किलो बीज लगते हैं। इसकी बाजार में कीमत 200 से 250 रुपए होती है। मशरूम का थोक रेट 150 से 200 रुपए कि‍लो है।

अब 2000 कि‍लो मशरूम अगर 150 रुपए एक कि‍लो के हि‍साब से भी बि‍कती है तो करीब 3 लाख रुपए मि‍लते हैं। इसमें से 50 हजार रुपए लागत के तौर पर नि‍काल दें तो भी ढाई लाख रुपए बचते हैं, हालांकि‍ इसकी लागत 50 हजार से कम ही आती है। प्रति‍ वर्ग मीटर 10 कि‍लोग्राम मशरूम आराम से पैदा हो जाता है।

इस तरह होती है खेती

  • मशरूम अक्‍टूबर-नवंबर में लगाई जाती है और पूरी सर्दी इसका उत्‍पादन होता रहता है।
  • राहुल करीब 40 बाई 30 फुट की झोंपड़ी में खेती करते हैं। इसमें वह तीन तीन फुट चौड़ी रैक बनाकर मशरूम उगाते हैं।
  • इसके लि‍ए आपको कंपोस्‍ट तैयार करना होता है। आप इस काम के लि‍ए धान की पुआल का यूज कर सकते हैं। सबसे पहले धान की पुआल को भि‍गो दें और एक दि‍न बाद इसमें डीएपी, यूरि‍या, पोटाश व गेहूं का चोकर, जि‍प्‍सम, कैल्‍शि‍यम और कार्बो फ्यूराडन मि‍ला कर सड़ने के लि‍ए छोड़ दें।
  • उसे करीब 30 दि‍न के लि‍ए छोड़ दें। हर 4 से 5 दि‍न पर इसे पलटते रहें और आधा महीना हो जाने पर इसमें नीम की खली और गुड़ का पाक या शीरा मि‍ला दें।
  • एक महीना बीत जाने के बाद एक बार फि‍र से बावि‍स्‍टीन और फार्मोलीन छि‍ड़ने के बाद इसे कि‍सी ति‍रपाल से 6 घंटों के ढक दि‍या जाता है। अब आपका कंपोस्‍ट तैयार हो गया।

इस तरह बि‍छाएं कंपोस्‍ट

  • पहले नीचे गोबर की खाद और मि‍ट्टी को बराबर मात्रा में मि‍लाकर करीब डेढ़ इंच मोटी परत बि‍छाई जाती है। इसके ऊपर कंपोस्‍ट की दो से तीन इंच मोची परत चढ़ाएं।
  • इसके ऊपर कंपोस्‍ट की दो तीन इंच मोटी परत चढ़ाएं और उसके ऊपर मशरूम के बीज समान मात्रा में फैला दें। फि‍र इसके ऊपर एक दो इंच मोटी कंपोस्‍ट की परत और चढ़ा दें।
  • झोंपड़ी में नमी का स्‍तर बना रहना चाहि‍ए और स्‍प्रे से मशरूम पर दि‍न में दो से तीन बार छि‍ड़काव होना चाहि‍ए। झोंपड़ी का तापमान 20 डि‍ग्री बना रहे।
  • सभी एग्रीकल्‍चर यूनि‍वर्सि‍टी और कृषि‍ अनुसंधान केंद्रों में मशरूम के खेती की ट्रेनिंग दी जाती है। अगर आप इसी बड़े पैमाने पर खेती करने की योजना बना रहे हैं तो बेहतर होगा एक बार इसकी सही ढंग से ट्रेनिंग जरूर लें।

News Source: Money Bhaskar News

एक-एक मीटर की दूरी पर लगाए अनार, आंधी में भी नहीं गिरे पौधे

डीडीए उद्यानिकी अजय चौहान ने बताया अनार की खेती के लिए हल्की जमीन अत्यंत उपयुक्त होती है। ऐसी जमीन में क्यारी से क्यारी 5 मीटर व पौधे से पौधे की दूरी 3 मीटर रखना चाहिए। एक हेक्टेयर में 667 पौधे लगाए जाते हैं। पौधे लगाने के दूसरे वर्ष में प्रति पौधा 10-15 किलो का उत्पादन शुरू होता है। जो साल-दर-साल बढ़कर 30-35 किलो तक पहुंच जाता है। इस प्रकार एक बार पौधा लगाने के बाद वह आगामी 30 साल तक लगातार उत्पादन देता रहता है।

अनार के पौधे को विशेष काट-छांट की आवश्यकता पड़ती है। वही ड्रिप से पानी देने के कारण उत्पादन लागत भी कम हो जाती है। शासन भी राष्ट्रीय कृषि मिशन के तहत प्रति हेक्टेयर प्रथम वर्ष 45 हजार और दूसरे व तीसरे वर्ष 15-15 हजार रुपए का अनुदान देता है।

यह है हाईडेंसिटी प्लांटेशन तकनीक

अल्टाडेंसिटी प्लांटेशन तकनीक में पौधों को कम दूरी पर लगाया जाता है। ऊंचाई को नियंत्रित रखने के लिए समय-समय पर कटाई-छंटाई करना आवश्यक है। शाखा आने पर उसे ऊपर से काट दें। काटी शाखा में फिर तीन शाखाएं आती है। एक बढ़ने पर इसे फिर काट देते हैं। इस तरह यह पेड़ छतरीनुमा बन जाता है, इसकी ऊंचाई छह फीट रहती है। कृषि कॉलेज में हो रहे अनुसंधान में पौधे से पौधे की दूरी 1 मीटर और कतार से कतार की दूरी 3 मीटर रखी है। इस लिहाज से एक एकड़ में 674 पौधे आते हैं।

इसलिए हवा-आंधी से आड़ी नहीं होती है फसल 

उद्यानिकी विभाग के सेवानिवृत्त उद्यान विकास अधिकारी जवाहरलाल जैन ने बताया अल्ट्रा डेंसिटी प्लांटेशन तकनीक से पौधे रोपने पर तेज हवाओं का असर नहीं होता है। पेड़ अधिक व नुकसान कम होने के कारण चार गुना तक पैदावार में बढ़ोतरी होती है। किसानों की आय में बढ़ोतरी होगी। वहीं, सामान्य पद्धति से रोपे गए पौधे तेज हवा, बेमौसम बारिश होने से आड़े हो जाते हैं, फल झड़ने लगते हैं।