आलू-टमाटर 4 रु और प्याज-गोभी 5 रु. किलो से कम बिके तो सरकार करेगी भरपाई

हरियणा में शनिवार से भावांतर भरपाई योजना की शुरुआत हो गई। इसके तहत राज्य सरकार ने पहले चरण में आलू-टमाटर के लिए 400 रु. प्रति क्विंटल (4 रु. किलो), फूलगोभी-प्याज के लिए 500 रु. प्रति क्विंटल (5 रु. किलो) न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय किया है। अगर किसान की फसल तय एमएसपी से कम दाम पर बिकती है तो उसकी भरपाई राज्य सरकार करेगी।

इसके लिए अलग से फंड तैयार किया जाएगा। करनाल के गांव गांगर में सीएम मनोहर लाल ने भावांतर भरपाई ई-पोस्टल लॉन्च किया। सीएम ने कहा कि सरकार चाहती है कि किसान को प्रति एकड़ सालाना एक लाख रुपए तक आय हो। सरकार इस ओर आगे बढ़ रही है। कांग्रेस ने 4-5 रु. किलो के रेट नाकाफी बताए।

पंजीकरण (रजिस्टर) होने पर कर सकेंगे अपील

आलू की फसल के लिए के लिए 15 जनवरी तक, प्याज की फसल के लिए 25 मार्च तक, टमाटर की फसल के लिए 25 मार्च और फूलगोभी की फसल के लिए 25 जनवरी तक अपील की जा सकेगी।

किसान को फसल जे-फार्म के जरिए बेचनी होगी। बिक्री का विवरण बीबीवाई पोर्टल पर अपलोड करना होगा। इसकी सुविधा सभी मार्केटिंग कमेटी में होगी। बिक्री के तय समय में किसान को तय रेट से कम भाव मिलता है तो वह भरपाई के लिए पात्र होगा। भरपाई की राशि किसान के खाते में 15 दिन में जमा कर दी जाएगी।

औसत दैनिक थोक मूल्य मंडी बोर्ड की ओर से निर्धारित मंडियों के दैनिक भाव के आधार पर तय किया जाएगा। किसान को यदि भाव एमएसपी से अधिक भी मिलता है तो भी मंडी के अधिकारी से जे-फार्म चढ़वाना होगा, अन्यथा किसान को अगले वर्ष पंजीकृत नहीं किया जाएगा।

किसान को योजना का लाभ लेने के लिए बिजाई के समय ही मार्केटिंग बोर्ड की वेबसाइट पर बागवानी भावांतर योजना पोर्टल के माध्यम से पंजीकरण कराना होगा। उद्यान विभाग का अधिकारी किसान का क्षेत्र देखेंगे। हर जिले में डीसी के नेतृत्व में गठित कमेटी किसान की फसल का मूल्यांकन करेगी। इसके बाद किसान के पास एसएमएस भेजा जाएगा। पंजीकरण निशुल्क होगा। पंजीकरण किए जाने की शिकायत किसान कर सकेगा।

योजना का उद्देश्य मंडी में सब्जी फल की कम कीमत के दौरान निर्धारित सरंक्षित मूल्य द्वारा जोखिम को कम करना है। किसान को फसल का इतना भाव तो मिलना ही चाहिए, जितना खर्च आया है। इन चार फसलों के 400 से 500 रुपए जो भाव तय किए हैं, उसके अनुसार किसान को प्रति एकड़ 48 से 56 हजार रुपए मिल जाएंगे।

इस खेती के दौरान पत्नी से अलग सोते है किसान ,नहीं तो हो जाता है नुकसान

क्या गृहस्थ और ब्रह्मचर्य जीवन का कोई मेल है? इस सवाल का सहज सा जवाब होगा नहीं. मगर झारखंड के पूर्वी सिंहभूम ज़िले के गुड़ाबांदा प्रखंड के सैकड़ों किसान पीढ़ियों से ऐसी दोनों तरह की ज़िंदगी के साथ तालमेल बिठा कर जीवन-बसर करते आ रहे हैं.

इस नक्सल प्रभावित इलाके के तसर (रेशम) कीट का पालन करने वाले शादीशुदा किसान साल में दो बार करीब दो-दो महीने के लिए ब्रह्मचर्यों जैसी ज़िंदगी गुज़ारते हैं. इस दौरान ये मुख्य रूप से अर्जुन और आसन के पेड़ों पर पल रहे तसर के कीड़ों को चींटियों, तसर के कीटों को खाने वाले दूसरे कीड़ों और पक्षियों से बचाते हैं.

गुड़ाबांदा प्रखंड के अर्जुनबेड़ा गांव के करीब पचास साल के सुरेश महतो के मौसमी ब्रह्मचर्य के दिन अब खत्म होने को हैं.

वो बताते हैं, ”तसर की खेती के समय हम लोग बीवी के साथ नहीं सोते हैं. वो हमें छुएगी नहीं, वो भी अलग रहेगी और हम लोग भी अलग रहेंगे. तब उसके हाथ का बना खाना भी नहीं खाते हैं.”

इसके पीछे की वजह सुरेश ये बताते हैं, ”हम लोग जो खेती करती हैं उसमें अगर उसके (पत्नी के) साथ सो जाएंगे तो इधर खेती में बीमारी लग जाएगी. यही नियम है इसका.”

‘नियम’ और भी हैं

ब्रह्मचर्य के अलावा भी ये किसान कुछ और ‘नियमों’ का पालन करते हैं. जैसा कि अर्जुनबेड़ा गांव के ही नित्यानंद महतो बताते हैं, ”कीड़ों की रखवाली करने स्नान करके जाते हैं. रखवाली के दौरान किसी को शौच लगा तो वह शौच के बाद फिर से नहाता है. कीड़े बीमार पड़ जाएं तो पूजा-पाठ करते हैं और फल (कोनून) तैयार होने के बाद बकरे की बलि देते हैं.”

डेढ़ लाख की मशीन से किसान घर पर त्यार कर सकते है फीड (पशु आहार)

खेती बाड़ी के साथ-साथ किसान पशुपालन से अपनी आय को बढ़ाने का प्रयास करता है। पशुओं को खिलाने के लिए किसान बाजार से पशु आहार खरीदता है। जो उसे काफी महंगा पड़ता है। एक तरीके से किसान पशु आहार पर होने वाला खर्च बचा सकता है साथ ही मुनाफा भी कमा सकता है।

किसानों को पशु आहार पर होने वाले खर्च को बचाने के साथ ही किसानों की आय में अतिरिक्त वद्धि कैसे हो इस बारे में केंद्रीय बकरी अनुसंधान केंद्र मथुरा (सीआईआरजी) के बकरी पोषण विभाग के वैज्ञानिक डॉ. रवींद्र कुमार बता रहे हैं।

डॉ. रवींद्र कुमार बताते हैं, “पशु आहार पशुओं के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। ज्यादातर किसान पशु आहार बाजार से लाते हैं जो काफी महंगा पड़ता है। किसान फीड प्लेटिंग मशीन लगाकर घर पर पैलेट फीड (पशु आहार) बना सकते हैं और बाजार में बेच कर मुनाफा भी कमा सकते हैं।”

डॉ. रवींद्र कुमार आगे बताते हैं, “गाँव में किसान एक समूह बना कर फीड प्लेटिंग मशीन लगा सकते हैं। फीड प्लेटिंग मशीन एक दिन में 10 कुंतल पैलेट फीड तैयार करता है। किसानों का समूह पैलेट फीड को अपने पशुओं को खिलाने में प्रयोग करने के साथ-साथ बेच भी सकते हैं। जिससे अलग से मुनाफा कमा सकते हैं।

फीड प्लेटिंग मशीन लगभग डेढ़ लाख की आती है इसलिए किसानों का एक समूह इसे ले सकता है। जिससे एक किसान पर भार भी नहीं पड़ता है। फीड प्लेटिंग मशीन का रख रखाव भी बड़ा सरल है। इस मशीन की डाइ 10 वर्ष एक बार बदलवानी पड़ती है। ये मशीन किसान पंजाब, इंदौर में आसानी से मिलती है।”

एक घंटे में एक कुंतल पैलेट फीड का होता है प्रोडक्शन

फीड प्लेटिंग मशीन को एक दिन में 10 घंटे चलाया जा सकता है। प्रतिघंटे यह मशीन एक कुंतल पैलेट फीड का प्रोडक्शन करती है। यानी एक दिन में 10 कुंतल पैलेट फीड का उत्पादन होता है।

इस तरह से बनता है पैलेट फीड

फीड प्लेटिंग मशीन से पैलेट फीड बनाने में 40 प्रतिशत दाना (मक्का, खली, चोकर, चूनी, नमक, मिनरल मिक्चर) और बाकी का 60 प्रतिशत सूखा चारा (भूसा, पैरा, सूखी पत्ती) होता है। दाने में 57 प्रतिशत मक्का, 20 प्रतिशत मूंगफली की खली, 20 प्रतिशत चोकर, 2 प्रतिशत मिनरल मिक्चर, 1 प्रतिशत नमक होना चाहिए। सूखे चारे में गेहूं का भूसा, सूखी पत्ती, धान का भूसा, उरद कर भूसा या अरहर का भूसा होना चाहिए।

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इस डॉक्टर ने किया होम्योपैथिक दवा का इस्तेमाल,आए चौंकाने वाले नतीज़े

यूपी के पीलीभीत ज़िले के रहने वाले एक होम्योपैथिक के डॉक्टर ने अपने अमरूद के पेड़ों पर एक नए तरह का प्रयोग किया है। पीलीभीत के होम्योपैथिक डॉक्टर विकास वर्मा ने राजस्थान यूनिवर्सिटी से होम्योपैथिक में डिग्री हासिल की और करीब 18 वर्ष से बरेली में होम्योपैथिक विधि से मरीजों का इलाज कर रहे हैं।

डॉ. विकास वर्मा ने बताया, “यह 2003 की बात है। मैंने अपने घर के अहाते में लगे नींबू के पेड़ पर देखा कि उसमें फूल तो आते हैं लेकिन फल नहीं आते तो मैंने उस नींबू के पौधे पर होम्योपैथिक दवाइयों का प्रयोग किया। जिसका आश्चर्यजनक रिजल्ट सामने आया और कुछ ही समय में पेड़ों की रंगत बदलने लगी। फिर कुछ ही समय में जिस नींबू के पेड़ पर फल नहीं आ रहे थे। उन पर भारी मात्रा में फल आने लगे।” यहीं से उनके दिमाग में एक विचार आया कि फसलों पर होम्योपैथिक की दवाई के प्रयोग से आश्चर्यजनक परिवर्तन किए जा सकते हैं।”

इसके बाद उन्होंने गेहूं, धान, दलहन, तिलहन, फल और फुलवारी पर होम्योपैथिक दवाइयों का सफल प्रयोग किया। आज स्थिति यह है कि इनकी अमरूद के बाग में आधा किलो से लेकर सात-आठ सौ ग्राम और एक से डेढ़ किलो तक वजन के अमरुद की फसल होती है।

उन्होंने अपने इस प्रयोग को जनपद के किसानों के अतिरिक्त बरेली के किसानों को भी होम्योपैथिक दवाइयों के प्रयोग के लिए प्रेरित किया। लेकिन इसका रिजल्ट शून्य रहा। क्योंकि किसानों के गले से यह बात नहीं उतरी कि होम्योपैथिक दवा भी खेतों में कुछ चमत्कार कर सकती है। फिर उन्होंने बड़ी मुश्किल से अखा गाँव के किसान ऋषि पाल को इस बात के लिए तैयार किया कि एक बीघा खेत उन्हें प्रयोग के लिए दे दिया जाए।

यदि खेत में होम्योपैथिक दवाओं के प्रयोग से फायदा होता है तो फायदे में वह कोई हिस्सेदारी नहीं लेंगे। लेकिन यदि नुकसान होता है तो नुकसान की सारी भरपाई वह स्वयं करेंगे। इस पर ऋषि पाल ने उनकी बात मान ली और डॉक्टर विकास ने धान की फसल पर जैविक खाद और होम्योपैथिक दवाई का प्रयोग किया,

जिससे धान की फसल अच्छी पैदा हुई। इससे किसान ऋषि पाल को भी अच्छा मुनाफा हुआ। इसके बाद क्षेत्र के कई किसान डॉ. विकास के इस प्रयोग पर विश्वास करने लगे और उन्होंने अपनी मर्जी से अपने खेतों को डॉक्टर विकास को उनके प्रयोग हेतु देने लगे।

मज़बूत होता है पौधों का इम्यून सिस्टम

होम्योपैथिक दवाओं के प्रयोग के बारे में डॉक्टर विकास बताते हैं कि “उनका यह प्रयोग पौधों की इम्यून सिस्टम को मजबूत करने पर टिका है। इसके लिए पहले वह जैविक खाद से जमीन तैयार करते हैं। उसके बाद फिर पौधा लगाने के बाद जड़ों में होम्योपैथिक की दवा का प्रयोग करते हैं।

इसमें एक बड़े ड्रम में पानी भरकर आवश्यकतानुसार दवा की मात्रा डालकर अधिकतर वह ड्रिप इरीगेशन विधि से बूंद-बूंद कर सिंचाई करते हैं। इस तरह पौधों को एक मजबूत आधार मिलता है। यदि पौधों को आगे चलकर जरूरत पड़ती है तो दवा बदलते हैं या डोज़ बढ़ा देते हैं। उन्होंने बताया कि कीटनाशक तैयार करने के लिए गौमूत्र में लहसुन, हरी मिर्च मिलाते हैं।

सीधे फल विक्रेताओं को बेचते हैं अमरूद

डॉक्टर विकास से उनके अमरूदों की बिक्री के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि “मैं अपने फार्म पर तैयार की गई अमरूद की बिक्री सीधे फल विक्रेताओं को करता हूं। इसके अलावा टेलीफोन पर ही मेरे द्वारा तैयार किए गए जैविक अमरूदों का आर्डर मिल जाता है। मैं प्रतिदिन डेढ़ से दो कुंटल अमरुद का आर्डर फोन पर ऑर्डर बुककर होम डिलीवरी पहुंचा देता हूं। एक किलो अमरूद की कीमत 100-120 प्रति किलो है।”

एप्पल बेर बेंच लखपति बन गया ये शख्स, इस ट्रिक ने यूं बदली किस्मत

पंजाब के मालवा में धान, गेहूं और कपास को छोड़कर किसान अब दूसरी फसलों और बागबानी की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। ऐसे ही एक किसान हैं फाजिल्का के चक्क बनवाला के महिंदर प्रताप धींगड़ा। उन्होंने पिछले साल अपनी साढ़े 6 एकड़ जमीन में थाई एप्पल बेर का बाग लगाया है। पहले साल उन्हें इससे 50 हजार रुपए प्रति एकड़ कमाई हुई जिसके इस साल बढ़कर प्रति एकड़ एक लाख रुपए से ज्यादा पहुंच जाने का अनुमान है।.

पश्चिम बंगाल से लाई थाई एप्पल बेर की पनीरी…

पूरी तरह जैविक खेती करने वाले महिंदर प्रताप धींगड़ा थाई एप्पल बेर की पनीरी पश्चिम बंगाल से लेकर आए थे। वह बताते हैं, बाग लगाने से पहले और बाद में मेरे मन में कई तरह के सवाल थे। पहली फसल देखकर थोड़ी तसल्ली हुई। इस बार फल और अच्छे नजर रहे हैं। भाव भी 30 से 35 रुपए प्रतिकिलो मिल रहा है।

इसकी अधिकांश खरीददार निजी कंपनियां है जो इसे विदेश भेजती हैं। अब हालांकि आकर्षक रूप और स्वाद के कारण स्थानीय बाजारों में भी इसकी मांग बढ़ रही हैं। उनके बाग का फल दिल्ली के अलावा लुधियाना, मोगा, जालंधर भी जाता है।

थाई एप्पल लॉन्ग टाइम इन्वेस्टमेंट…

महिंदर प्रताप धींगड़ा के अनुसार, उनके आसपास के कई गांवों के किसान थाई एप्पल बेर को देखने के लिए उनके बाग में रहे हैं। हाल ही में फाजिल्का जिले के ही झुमियांवाली गांव में भी एक किसान ने 12 एकड़ में इसका बाग लगाया है।

जिस तरह किसान रुचि दिखा रहे हैं, उससे लगता है कि अगले कुछ बरसों के दौरान इसका रकबा और बढ़ेगा। धींगड़ा कहते हैं, थाई एप्पल लॉन्ग टाइम इन्वेस्टमेंट है। एक बार इसका बाग लगाने के बाद 15 साल तक फसल ले सकते हैं।

थाईलैंड में इसे जुजुबी भी कहा जाता है…

थाई एप्पल का नाम आते ही जेहन में सेब का ख्याल आता है लेकिन यह बेर की एक किस्म है जो थाईलैंड में होती है। वहां इसे जुजुबी भी कहा जाता है। इसका स्वाद बेर जैसा ही होता है। थाईलैंड से ही यह किस्म भारत आई।

सेब जैसा दिखने वाला इसका फल 30 से 50 ग्राम तक का हो सकता है जबकि दूसरी किस्मों में बेर का वजन 5 से 10 ग्राम होता है। इसके एक पेड़ पर 40 से 50 किलो तक बेर लगते हैं। यह क्षारीय, अम्लीय और शुष्क, सभी तरह की मिट्टी में हो जाता है। फाजिल्का जिले की मिट्टी और जलवायु इसके लिए सबसे मुफीद है।

कपास लेकर आई किसानो के चहरे पर रौनक, इतने रुपए बड़े भाव

कपास की कीमत में वृद्धि होने के कारण किसानों के चेहरों पर रौनक फिर से लौट आई है। जानकारी मुताबिक कपास के मूल्य में 5 हज़ार रुपए प्रति क्विंटल वृद्धि हुर्इ है, जिस कारण के किसान काफी खुश दिखाई दे रहे हैं।

हरियाणा में गुरुवार को मिले 5152 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से बढ़कर शुक्रवार को भाव 5300 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंचे। निरंतर बढ़ रहे भाव से किसानों को छह हजार का आंकड़ा छूने की उम्मीद हो गई है। तीन दिनों में भाव 291 रुपए प्रति क्विंटल तक बढ़े। टॉप क्वालिटी की कपास का भाव 5300 रुपए प्रति क्विंटल तक रहा।

उत्तरी भारत कपास एसोसिएशन के पूर्व चेयरमैन अशोक कपूर के मुताबिक इंडियन काटन प्रोडक्शन ने 4 करोड़ कपास के बंडल का अंदाज़ा लगाया था लेकिन भारत में 3.5 करोड़ बंडल ही तैयार किए जा सके। उन्होंने कहा कि कि कपास के भाव में और उछाल आ सकता है।

कपास के मूल्य में वृद्धि का कारण महाराष्ट्र, गुजरात और आंध्रा प्रदेश में कपास की फ़सल का ख़राब हो जाना है। सबसे अधिक नुक्सान गुजरात के किसानों का हुआ जहां मक्खी की मार और बाढ़ की वजह से किसानों की तरफ से बीजी कपास की फ़सल पूरी तरह बर्बाद हो गई। जिस कारण कपास 5 हज़ार रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से ख़रीदी जा रही है।

मटर के साथ ऐसे कर सकते है गेहूं की खेती ,दोगुना होगा मुनाफा

उत्तर प्रदेश के सैकड़ों किसान सहफसली खेती करके लाभ कमा रहे हैं। इससे फसलों की संख्या बढ़ जाती है। लागत भी कम आ रही है। इस दौरान कई क्षेत्रों में मटर के साथ गेहूं खूब देखा जा सकता है।

कन्नौज से करीब आठ किमी दूर मानीमऊ निवासी 18 वर्षीय शैलेंद्र कुमार बताते हैं, ‘‘मटर के साथ गेहूं किया है। मटर उखड़ने को है। गेहूं 20 दिन का हो चुका है। साथ में फसल करने से पानी बचता है। खेत खाली नहीं रहता। जुतौनी व खाद का खर्च भी बच जाता है।’’

एक तरीके से यह लाभकारी है। मटर की 60-65 दिन में तुड़ाई षुरू हो जाती है। 100-110 दिन में खत्म हो जाती है।मटर जब बोया जाता है तो पहला पानी लगाने के दौरान गेहूं छिड़क दिया जाता है।मटर के दौरान ही साथ में गेहूं करने से बुवाई बचती है। खेत तैयार करने, सिंचाई और लेवर खर्च बच जाता है।

लेकिन मटर के बाद गेहूं बोने से विलम्ब हो जाता है। जिसके कारण गेहूं की उतनी पैदावार भी नहीं हो पाती है और साथ में 20-25 फीसदी उत्पादन कम होता है।

समय रहते बुवाई से एक हेक्टेयर में 35-36 क्विंटल गेहूं निकलता है। नही तो 30-35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होगा। मटर के बाद जनवरी में गेहूं करने से उत्पादन कम मिलेगा। खाली गेहूं समय से करने पर 40-45 क्विंटल गेहूं निकलता है। मटर में उर्वरक ज्यादा पड़ता है, इसलिए सहफसल में नहीं पडे़गा।

लो टनल में ऐसे करें बे-मौसम सब्ज़ियों की खेती, कमाएं अधिक मुनाफा

बहुत कम लोग लो टनल  में खेती करने के बारे में जानते होंगे। यह खेती की एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा किसान बे-मौसम सब्जियों की खेती कर सकते हैं, जिससे वो अधिक कमाई कर सकते हैं।

”इस तकनीक के जरिए किसान बे-मौसमी सब्जियां पैदा कर सकते हैं। इसमें सब्जियां उगाने पर सर्दी-गर्मी और बीमारियों का प्रभाव न के बराबर हो जाता है जिससे पैदावार भी काफी अच्छी होती है।” उद्यान विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने लो पॉली टनल विधि के बारे में बताया, ”बागवानी विभाग इस तकनीक को अपनाने वाले किसानों को प्रोत्साहित कर रहा है और लो पॉली-टनल बनाने पर सब्सिडी दे रहा है।”

उद्यान विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 में 27937 किसानों को लो पॉली टनल विधि के लिए सब्सिड़ी दी गई थी।

उन्होंने बताया, ”इस विधि से जब किसान सब्ज़ियों की खेती करते हैं बीजों का जमाव अच्छे से हो जाता है और एक महीने पहले सब्जिया आनी शुरू हो जाती हैं। इससे किसान को सब्ज़ियों के काफी अच्छे रेट मिल जाते हैं।” इसका लाभ यूपी के हर जिले के किसान ले सकते हैं।

पॉलीटनल तकनीक क्या हैं?

इस तकनीक में एक तरह से टनल (सुरंग) में सब्जियां पैदा की जाती हैं। लोहे के सरिये और पॉलीथिन शीट से छोटी व लंबी टनल बनाई जाती हैं। इन टनल में सब्जियों को बोने के बाद ड्रिप सिस्टम से सिंचाई की जाती है। टनल की मदद से सब्जी की फसल को ज्यादा गर्मी और सर्दी से बचाया जा सकता है। मौसम फसल के अनुकूल होने के बाद टनल को हटा दिया जाता है। इस तरह से किसान पॉली-टनल में अगेती फसल पैदा कर सकते हैं।

पॉलीटनल तकनीक से लाभ

  • पॉलीटनल तकनीक से वर्ष के किसी भी मौसम में चाहे अधिक गर्मी एवं ठंड हो उस समय भी सब्जियों की पौध सफलतापूर्वक तैयार की जा सकती है।
  • इस विधि से पौधे तैयार करने पर बीज का जमाव लगभग शत्-प्रतिषत होता है। जमाव के बाद पौधों का विकास समुचित ढंग से होता है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पॉलीटनल के अन्दर का तापमान बीज के जमाव एवं पौधों के बढ़वार के लिए आदर्श होता है।
  • पॉलीटनल में पौध उगाने से बीज जमाव के बाद दिन में धूप के समय पॉलीथीन को हटा देते हैं, जिससे पौधों का धूप के सम्पर्क में आने से उनका कठोरीकरण होता है ऐसे पौधों को खेत में रोपाई करने से उनकी मृत्यु दर नहीं के बराबर होती है।
  • बीज का जमाव शीघ्र होने और पौधों का समुचित बढवार से पौध तेयार करने में समय कम लगता है।
  • पॉलीटनल तकनीक से पौध उगाने पर कीटों व बीमारियों का प्रकोप भी अपेक्षाकृत कम होता है।

एक जनवरी से पूरे देश में किसानों के सीधे खाते में जाएगी खाद सब्सिडी

एक जनवरी से पूरे देश में किसानों के सीधे खाते में जाएगी खाद सब्सिडीएक जनवरी से पूरे देश में किसानों के सीधे खाते में जाएगी खाद सब्सिडीनये वर्ष में किसानों को खाद की सब्सिडी अब सीधे उनके खाते में जमा होगी। सभी राज्यों में इसकी तैयारियां अंतिम चरण में हैं।

नये वर्ष में किसानों को खाद की सब्सिडी अब सीधे उनके खाते में जमा होगी। सभी राज्यों में इसकी तैयारियां अंतिम चरण में हैं। केंद्र सरकार पिछले सालभर से राज्यों के सहयोग से इसे पूरा करने की कवायद में जुटी है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत सभी खाद्यान्न उत्पादक राज्यों में इसे लागू करने के लिए पहले ही टाइम टेबल जारी कर दिया गया था। फर्टिलाइजर पर किसानों को मिलने वाली सब्सिडी में चोरी को लेकर लगातार सवाल खड़े होते रहे हैं।

इससे निपटने के लिए सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग का फैसला लेते हुए पहले चरण में 14 राज्यों के 17 जिलों में इसे लागू किया था। उसके उत्साहजनक नतीजों के मद्देनजर सरकार अब पूरे देश में इसे लागू करने का फैसला किया है। विभिन्न राज्यों में यह व्यवस्था लागू करने के लिए किसानों के बैंक खाते, उनकी जमीन का ब्यौरा और उनके आधार से जोड़ने का काम पूरा हो चुका है।

  • सभी राज्यों में तैयारियां पूरी, यूपी व बिहार में एक जनवरी से चालू
  • फर्टिलाइजर की दुकानों से अंगुली निशान से मिलेगी खाद
  • पायलट परियोजना की सफलता के बाद पूरे देश में लागू होगी योजना

मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक समूचे देश में इसे व्यापकता से लागू करने के लिए राज्यों के सहयोग से प्वाइंट आफ सेल ( पॉस ) मशीनें लगाई जाने लगी हैं। इन मशीनों को फर्टिलाइजर ( खाद ) की दुकानों पर लगाने का काम संबंधित फर्टिलाइजर कंपनियां कर रही हैं।

देश में खाद बेचने वाली दुकानों पर कुल ढाई लाख पॉस मशीनों की जरुरत है। इसमें से अब तक कुल लगभग डेढ़ लाख दुकानों पर मशीनें लगाई जा चुकी हैं। विभिन्न राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में एक सितंबर 2017 से इस दिशा में डीबीटी योजना चालू कर दी गई है।फर्टिलाइजर मंत्रालय ने इस योजना को प्रारंभ करने के लिए हर राज्य को उसकी सुविधा के अनुसार तिथि का निर्धारण कर दिया है।

डीबीटी की शुरुआत दिल्ली प्रदेश में एक सितंबर 2017 को चालू कर दी गई थी, जबकि मिजोरम, दमन व दीव, दादरा नगर हवेली, मणिपुर, नागालैंड, गोवा व पुडुचेरी में यह योजना एक अक्तूबर को प्रारंभ हो गई। राजस्थान, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, अंडमान व निकोबार, असम और त्रिपुरा में योजना को एक नवंबर से शुरु किया गया है।

देश की खाद्य सुरक्षा में अहम भूमिका निभाने वाली राज्य आंध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में खाद की सब्सिडी सीधे खाते में जमा कराने की योजना एक दिसंबर 2017 को चालू हो गई है। जबकि गेहूं का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और तमिलनाडु में एक जनवरी 2018 को यह योजना शुरु की जाएगी। इसी तरह गुजरात व हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने की वजह से यहां तैयारियां हो जाने के बावजूद इसे एक जनवरी से शुरु किया जाएगा।

डीजल नहीं हवा से चलता है ये इंजन, अनपढ़ दोस्तों ने 11 साल में किया तैयार

गाड़ियों के टायरों में हवा भरने वाले दो अनपढ़ दोस्तों ने कुछ अलग करने की ठानी तो हवा से चलने वाला इंजन ही बना दिया। 80 फीट की गहराई से इसी हवा के इंजन से पानी तक खींचा जाता है। 11 साल की मेहनत के बाद यह इंजन बनकर तैयार हुआ है। अब वे बाइक को हवा से चलाने के लिए एक प्रोजेक्ट बना रहे हैं।

दरअसल, राजस्थान के भरतपुर जिले में रूपवास के खेड़िया विल्लोज के रहने वाले अर्जुन कुशवाह और मिस्त्री त्रिलोकीचंद गांव में ही एक दुकान पर मोटर गाड़ियों के टायरों में हवा भरने का काम करते थे।

करीब 11 साल पहले जून में एक दिन ट्रक के टायरों की हवा जांच रहे थे तो उनका इंजन खराब हो गया। उसे सही कराने तक के लिए जेब में पैसे नहीं थे। इतने में ही इंजन का वॉल खुल गया और टैंक में भरी हवा बाहर आने लगी। इंजन का पहिया दवाब के कारण उल्टा चलने लगा। फिर यहीं से दोनों ने शुरू की हवा से इंजन चलाने के आविष्कार की कोशिश की। साल 2014 में वे इसमें सफल भी हो गए। आज वे इसी हवा के इंजन से खेतों की सिंचाई करते हैं।

11 साल में साढ़े तीन लाख रुपए किए खर्च

  • त्रिलोकीचंद ने बताया कि 11 साल से वे लगातार हवा के इंजन पर ही शोध कर रहे हैं। अब तक बहुत कुछ सीख चुके हैं ।
  •  इसे बनाने में करीब 3.5 लाख रुपए के उपकरण सामान ला चुके हैं। अब दुपहिया चौपहिया वाहनों को हवा से चलाने की योजना बना रहे हैं।

ऐसे बनाया 8 हॉर्स पावर का इंजन

अर्जुन कुशवाह ने बताया, ”चमड़े के दो फेफड़े बनाए। इसमें एक छह फुट और दूसरा ढाई फुट का। इसमें से एक बड़े फेफड़े इंजन के ऊपर लगाया। जबकि इंजन के एक पहिए में गाड़ी के तीन पटा दूसरे बड़े पहिए में पांच पटा लगाकर इस तरह सेट किया कि वह थोड़ा से धक्का देने पर भार के कारण फिरते ही रहें। पिस्टन वॉल तो लगाई ही नहीं है।

जब इंजन के पहिए को थोड़ा सा घुमाते हैं तो वह बड़े फेफड़े में हवा देता है। इससे छोटे फेफड़े में हवा पहुंचती है और इंजन धीरे-धीरे स्पीड पकड़ने लगता है। इससे इंजन से पानी खिंचता है। बंद करने के लिए पहिए को ही फिरने से रोकते हैं। हवा से चल नहीं जाए, इसके लिए लोहे की रॉड फंसाते हैं।

”इसे बनाने में करीब 3.5 लाख रुपए के उपकरण सामान ला चुके हैं।आज वे इसी हवा के इंजन से खेतों की सिंचाई करते हैं।