काले गेहूं की खेती होती है, लेकिन बाकी सच्चाई भी जान लीजिए

पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया में काले गेहूं को लेकर लगातार ख़बरें शेयर हो रही हैं। जिसमें ये कहा जा रहा है भारत में पहली बार काले गेहूं की खेती हो रही है और ये सामान्य गेहूं के मुकाबले न सिर्फ कई गुना महंगा बिकता है बल्कि इसमें कैंसर और डायबिटीज समेत कई बीमारियों से लड़ने की क्षमता होती है।

लेकिन यह पूरा सच नहीं है। आज आप को बताते हैं, ये गेहूं कहां पैदा होता है, इसका रंग काला क्यों होता है, क्या काले रंग के अलावा भी किसी रंग का गेहूं होता है और इसके चिकित्सकीय गुण क्या हैं ?

सोशल मीडिया में वायरल होने वाली इस पोस्ट में दावा किया गया था कि, सात बरसों के रिसर्च के बाद गेहूं की इस नई किस्म को पंजाब के मोहाली स्थित नैशनल एग्री फूड बायोटेक्नॉलजी इंस्टीट्यूट या नाबी ने विकसित किया है। नाबी के पास इसका पेटेंट भी है।

इस गेहूं की खास बात यह है कि इसका रंग काला है। वायरल हो रही पोस्ट में कहा गया है कि काले गेहूं में कैंसर, डायबिटीज, तनाव, दिल की बीमारी और मोटापे जैसी बीमारियों की रोकथाम करने की क्षमता है।

इस दावे की जांच के लिए जब न्यूज चैनल एबीपी के प्रतिनिधि मोहाली स्थित नाबी पहुंचे तो वहां उन्होंने इस गेहूं की फसल देखी। उन्होंने पाया कि शुरू में इसकी बालियां भी आम गेहूं जैसी हरी होती हैं, पकने पर दानों का रंग काला हो जाता है।

ज्यादा जानकारी के लिए जब नाबी की साइंटिस्ट और काले गेहूं की प्रोजेक्ट हेड डॉ. मोनिका गर्ग से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि नाबी ने काले के अलावा नीले और जामुनी रंग के गेहूं की किस्म भी विकसित की है।

काले रंग की वजह एंथोसाएनिन

इस गेहूं के अनोखे रंग के बारे में पूछने पर डॉ. गर्ग ने बताया कि फलों, सब्जियों और अनाजों के रंग उनमें मौजूद प्लांट पिगमेंट या रंजक कणों की मात्रा पर निर्भर होते हैं। काले गेहूं में एंथोसाएनिन नाम के पिगमेंट होते हैं।

एंथोसाएनिन की अधिकता से फलों, सब्जियों, अनाजों का रंग नीला, बैंगनी या काला हो जाता है। एंथोसाएनिन नेचुरल एंटीऑक्सीडेंट भी है। इसी वजह से यह सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है। आम गेहूं में एंथोसाएनिन महज 5पीपीएम होता है, लेकिन काले गेहूं में यह 100 से 200 पीपीएम के आसपास होता है।

एंथोसाएनिन के अलावा काले गेहूं में जिंक और आयरन की मात्रा में भी अंतर होता है। काले गेहूं में आम गेहूं की तुलना में 60 फीसदी आयरन ज्यादा होता है। हालांकि, प्रोटीन, स्टार्च और दूसरे पोषक तत्व समान मात्रा में होते हैं।

सेहत के लिए है फायदेमंद

तब क्या काला गेहूं खाने से कैंसर, डायबिटीज जैसी बीमारियां नहीं होतीं। इस पर डॉ. गर्ग का कहना है, चूहों पर किए गए प्रयोगों में देखा गया कि ब्लड कॉलस्ट्रॉल और शुगर कम हुआ, वजन भी कम हुआ लेकिन इंसानों पर भी यह इतना ही कारगर होगा यह नहीं कहा जा सकता।

पर यह तो तय है कि अपनी एंटीऑक्सीडेंट खूबियों की वजह से इंसानों के लिए भी यह फायदेमंद साबित होगा। नाबी इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए कंपनियों से करार कर रहा है।

कुछ वेबसाइट बेच रही हैं काले गेहूं का आटा

देखने में आया है कि कुछ ई कॉमर्स वेबसाइट काले गेहूं का आटा बेच रही हैं। इसकी कीमत साइट पर 2 हजार रुपये प्रति किलो से 4 हजार रुपये प्रति किलो तक बताई गई है। साथ ही इनमें बीमारियां दूर करने वाले वे सभी दावे भी किए गए हैं जो सोशल मीडिया में वायरल हो रहे हैं।

काला चावल भी होता है

गेहूं ही नहीं काला चावल भी होता है। इंडोनेशिअन ब्लैक राइस और थाई जैसमिन ब्लैक राइस इसकी दो जानीमानी वैरायटी हैं। म्यामांर और मणिपुर के बॉर्डर पर भी ब्लैक राइस या काला चावल उगाया जाता है। इसका नाम है चाक-हाओ। इसमें भी एंथोसाएनिन की मात्रा ज्यादा होती है।

इस शख्स को टमाटर ने बना दिया करोड़पति

शहडोल। बढ़ता कैरियर अब लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण लक्ष्य बन गया है। कैरियर बनाना एक बहुत बड़ी यात्रा है और आपको इसे सही बनाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। तेजी से आगे बढ़ने की होड़ में लोग नौकरी से ज्यादा स्वयं के रोजगार को करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। अगर आप भी इसी राह में आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपके पास भी कई ऑप्शन मौजूद हैं।

आप भी अपना व्यवसाय शुरू करके घर बैठे लाखों रुपए कमा सकते हैं। इसी राह में एक शख्स टमाटर की खेती करके 3 से 4 करोड़ रुपए सालाना टर्न ओवर कर रहा है। 10 एकड़ की जमीन से सब्जी उत्पादन के व्यवसाय की शुरुआत करने वाले पुरानी बस्ती निवासी किसान पवन मिश्रा बीते कई सालों से ये काम कर रहे हैं।

देश भर में पहुंचाए जा रहे टमाटर

आपको बता दें बउमरिया जिले के घुनघुटी में लगभग 125 एकड़ क्षेत्र में मां कंकाली कृषि समूह के आठ किसानों ने सब्जी की खेती कर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। किसानों द्वारा उत्पादित सब्जी उत्पादों ने शहडोल संभाग ही नहीं देश के दिल्ली, बैंगलोर, रीवा, सतना, जबलपुर, रायपुर आदि महानगरों के बाजार में अपनी पहचान बनाई है। इन किसानों के द्वारा उत्पादित टमाटर और अन्य सब्जियां ट्रकों में भरकर दिल्ली, बैंगलोर और देश के अन्य बड़े बाजारों में पहुंचाई जा रही है, जिससे किसानों को सीधा लाभ हो रहा है।

बैंक ने दिए 5 लाख रुपए

अपने रोजगार में सफल होने वाले किसान पवन मिश्रा ने बताया कि उन्होंने टमाटर की खेती की शुरूआत सबसे पहले विचारपुर और सिंदुरी क्षेत्र से की थी। यहां पर सफल होने के बाद उद्यानिकी विभागों के अधिकारियों से सलाह लेने के बाद उन्होंने आज से दस साल पहले उन्होंने ग्राम सिंदुरी और विचारपुर में 10 एकड़ भूमि पर टमाटर के खेती की शुरूआत की।

इस काम को करने के लिए कृषि विभाग के अधिकारियों ने अपनी सलाह के साथ ही ड्रिप एरीकेशन के लिए 5 लाख रुपए भी बैंक के माध्यम से दिए गए। इस खेती को शुरू करने के बाद लगातार पवन मिश्रा को इससे लाभ हुआ है। उनका कहना है कि टमाटर की खेती से बहुत लाभ हो रहा है। जिस कारण उन्होंने बाद में टमाटर के साथ मिर्ची, लौकी, खीरा, बरबटी, आलू, लहसुन और प्याज की खेती शुरू की। उन्होंने बताया कि सब्जियों की खेती करने से उन्हें काफी लाभ हुआ जिसके कारण उन्होने अन्य किसानों को भी समूह बनाकर सब्जी की खेती करने की सलाह दी।

लोगों को दिया रोजगार

टमाटर की खेती से लाभ होने के बाद उमरिया जिले के लगभग 8 किसानों द्वारा मां कंकाली कृषि समूह का निर्माण किया गया साथ ही लगभग 125 एकड़ भूमि पर सब्जी की उन्नत खेती करने की कार्य योजना बनाई। पवन मिश्रा ने बताया कि लगातार सजगता एवं कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के कारण संभाग के ग्राम पंचायत सिंदुरी, विचारपुर और घुनघुटी में सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किए हैं।

सब्जी उत्पादन का वार्षिक टर्नओवर लगभग 3 से 4 करोड़ रुपए है। क्षेत्र के लगभग 200 लोगों को रोजगार मिला है। उन्होंने बताया कि संभाग के टमाटर की बहुत ज्यादा मांग है। सब्जी व्यापारियों के ट्रक खेतों में पहुंचकर सब्जियों का उठाव करते हैं। उन्होंने बताया कि संभाग के अन्य किसान भी सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में आगे आ रहे हैं। इससे सभी को लाभ हो रहा है।

सिर्फ एक केंचुआ एक किसान के बचा देता है 4800 रू,जाने कैसे

केंचुए मिट्टी को नरम बनाते है पोला बनाते है उपजाऊ बनाते हैं केंचुए का कम क्या है ?? ऊपर से नीचे जाना ,नीचे से ऊपर आना पूरे दिनमे तीन चार चक्कर वो ऊपर से नीचे ,नीचे से ऊपर लगा देता है ! अब जब केंचुआ नीचे जाता तो एक रास्ता बनाते हुए जाता है और जब फिर ऊपर आता है तो फिर एक रास्ता बनाते हुए ऊपर आता है ! तो इसका परिणाम ये होता है की ये छोटे छोटे छिद्र जब केंचुआ तैयार कर देता है तो बारिश का पानी एक एक बूंद इन छिद्रो से होते हुए तल मे जमा हो जाता है !

साथ ही अगर एक केंचुआ साल भर जिंदा रहे तो एक वर्ष मे 36 मीट्रिक टन मिट्टी को उल्ट पलटकर देता है और उतनी ही मिट्टी को ट्रैक्टर से उल्ट पलट करना पड़े तो सौ लीटर डीजललग जाता है 100 लीटर डीजल 4800 का है ! मतलब एक केंचुआ एक किसान का 4800 रूपये बचा रहा है ऐसे करोड़ो केंचुए है सोचो कितना लाभ हो रहा है इस देश को !

गोबर खाद डालने से फाइदा क्या होता है ?

रसायनिक खाद डालो केंचुआ मर जाताहै गोबर का खाद डालो केंचुआ ज़िंदा हो जाता है क्योंकि गोबर केंचुए का भोजन है केंचुए को भोजन मिले वह अपनी जन संख्या बढ़ाता है और इतनी तेज बढ़ाता है की कोई नहीं बढ़ा सकता भारत सरकार कहती है हम दो हमारे दो ! केंचुआ नहीं मानता इसको !एक एक केंचुआ 50 50 हजार बच्चे पैदा करके मरता है एक प्रजाति का केंचुआ तो 1 लाख बच्चे पैदा करता है ! तो वो एक ज़िंदा है तो उसने एक लाख पैदा कर दिये अब वो एक एक लाख आगे एक एक लाख पैदा करेंगे करोड़ो केंचुए हो जाएंगे अगर गोबर डालना शुरू किया !!

ज्यादा केंचुआ होंगे तो ज्यादा मिट्टी उलट पलट होगी तो फिर छिद्र भी ज्यादा होंगे तो बारिश का सारा पानी मिट्टी मे धरती मे चला जाएगा ! पानी मिट्टी मे चला गया तो फालतू पानी नदियो मे नहीं जाएगा ,नदियो मे फालतू पानी नहीं गया तो बाढ़ नहीं आएगी तो समुद्र मे फालतू पानी नहीं जाएगा इस देश का करोड़ो करोड़ो रूपये का फाइदा हो जाएगा !! इसलिए आप किसानो को समझाओ की भाई गोबर की खाद डालो एक ग्राम भी उत्पादन कम नहीं हो

दरअसल गोबर जो है वो बहुत तरह केजीव जन्तुओ का भोजन है और यूरिया भोजन नहीं जहर है आपके खेत मे एक जीव होता है जिसे केंचुआ कहते हैं केंचुआ को कभी पकड़ना और उसके ऊपर थोड़ा यूरिया डाल देना आप देखोगे केंचुआ तरफना शुरू हो जाएगा और तुरंत मर जाएगा ! जब हम टनों टन यूरिया खेत मे डालते है करोड़ो केंचुए मार डाले हमने यूरिया डाल डाल के !!

जिस किसान के खेत मे यूरिया डालेगा तो केंचुआ मर जाएगा केंचुआ मर गया तो मिट्टी मे ऊपर नीचे कोई जाएगा नहीं तो मिट्टी कठोर होती जाएगी कड़क होती जाएगी मिट्टी और रोटी के बारे एक बात कही जाती है की इन्हे फेरतेरहो नहीं तो खत्म हो जाती है रोटी को फेरना बंद किया तो जल जाती है मिट्टी को फेरना बंद करो पत्थर जैसी हो जाती है !मिट्टी को फेरने का मतलब समझते है ?? ऊपर की मिट्टी नीचे ! नीचे की ऊपर !ऊपर की नीचे ,नीचे की ऊपर ये केंचुआ ही करता है ! केंचुआ किसान का सबसे बड़ा दोस्त है

3 महीने में 1.5 लाख की कमाई कराएगी इस प्‍लांट की खेती

बिजनेस करने के लिए आप अगर किसी आइडिया की तलाश में है तो मेडिसिनल प्‍लांट फार्मिंग से जुड़ा बिजनेस भी आपके लिए अच्‍छा मौका हो सकता है। इन्‍हीं में से एक है इसबगोल खेती और इससे जुड़ा बिजनेस।

इसमें आप शुरुआत में 10 से 15 हजार रुपए इन्‍वेस्‍टमेंट करने पर आप केवल तीन महीने 1.5 लाख रुपए तक कमा सकते हैं। इसके लिए आपके पास एक हेक्टेयर जमीन होना जरूरी है। यदि आप ज्‍यादा खेती कर सकते हैं या प्रोसेसिंग कर सकते हैं तो इतनी ही खेती पर करीब 2.5 लाख रुपए कमा सकते हैं।

80 फीसदी बाजार पर है भारत का कब्‍जा ईसबगोल एक मेडिसिनल प्‍लांट है। इसके बीज तमाम तरह की आयुर्वेदिक और एलोपैथिक दवाओं में इस्‍तमाल होता है। विश्‍व के कुल उत्‍पादन का लगभग 80 फीसदी सिर्फ भारत में ही पैदा होता है।

इसकी खेती शुरूआत में राजस्‍थान और गुजरात में होती थी। लेकिन, अब उत्‍तर भारत के राज्‍यों हरियाणा, उत्‍तर प्रदेश, पंजाब और उत्‍तराखंड में ही यह बड़ी मात्रा में पैदा किया जाता है। भारत में करीब 3 तरह की ईसबगोल पैदा की जाती है। हरियाणा -2 किस्‍म की फसल 100 से 115 दिनों के भीतर पक कर तैयार हो जाती है। इसके बाद इसे काटकर इसके बीजों को बाजार में बेचा जाता है।

2.5 लाख रुपए तक की हो जाती है उपज

यदि एक हेक्‍टेयर में खेती के आधार पर गणना करें तो एक हेक्‍टेयर से लगभग 15 क्विंटल बीज उत्‍पादित होते हैं। उंझा मंडी में ताजा दामों को लें तो इस वक्‍त लगभग 10700 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है। इस लिहाज से केवल बीज ही 160500 रुपए के हो जाते हैं। सर्दियों में प्राइस बढ़ने पर यह आमदनी और अधिक हो सकती है। प्रोसेसिंग के बाद बढ़ जाता है फायदा। ईसबगोल के बीज को प्रोसेस कराने पर और ज्‍यादा फायदा हो सकता है।

दरअलस, प्रोसेस के बाद इसके बीज में लगभग 30 फीसदी भूसी निकलती है और यही भूसी इसका सबसे महंगा हिस्‍सा है। भारतीय बाजार में भूसी का थोक भाव 25 हजार रुपए प्रति क्विंटल है। यानी एक हेक्‍टेयर में उत्‍पादित फसल की भू‍सी का दाम 1.25 लाख रुपए बैठता है। इसके अलावा इसमें अन्‍य खली, गोली आदि बचती है जो करीब डेढ़ लाख रुपए की बिक जाती है।

50 हजार प्रति क्विंटल के भाव से बिकी ये खास सोयाबीन

सोयाबीन की विशेष किस्म ‘करुणे’ यहां 50 हजार रुपए क्विंटल में बिकी। इसे जापान से आए दल ने खरीदा जबकि इन दिनों सामान्य सोयाबीन का भाव 28 सौ से तीन हजार स्र्पए प्रति क्विंटल चल रहा है।

दरअसल इतना अधिक दाम मिलने की वजह इस सोयाबीन का खास होना है। हरी सब्जी के रूप में उपयोग की जाने वाली यह सोयाबीन पचने में आसान होती है और कुपोषण के लिए भी लाभदायक मानी गई है। इस किस्म की विदेशों में अच्छी मांग है और जापान इसका प्रमुख खरीदार है। इसकी पैदावार 5 से 6 क्विंटल बीघा बताई जाती है।

कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक रेखा तिवारी ने बताया कि करुणे नई किस्म की सोयाबीन है, जो हरी सब्जी के रूप में उपयोग होती है। शुरुआत में बिजवार (बीज तैयार करने) के लिए जिले में 10 किसानों को 400 ग्राम से एक किलो तक दिया है और उत्पादन विधि भी बताई है। कम पानी में इसका अधिक उत्पादन लिया जा सकता है।

अक्टूबर अंत में जवाहरलाल नेहरू एवं राजमाता सिंयिा कृषि विवि के संयुक्त तत्वावान में जापानी दल ‘जायका प्रोजेक्ट’ के सिलसिले में उज्जैन आया था। उन्हें जिले के उन्नात कृषक निहालसिंह के खेत में करुणे सोयाबीन का अवलोकन करवाया था। दल को यह काफी पसंद आया, वे एक क्विंटल सोयाबीन खरीदकर ले गए।

80 दिन में होती है तैयार

जिले के ग्राम चिंतामन जवासिया के उन्न्त किसान निहालसिंह आंजना ने तीन साल पहले 400 ग्राम बीज बोकर शुरुआत की थी, जो अब तीन क्विंटल तक पहुंच चुकी है। उन्होंने बताया कि इसे खेतों की मेड़ पर रोपा जाता है। जैविक खाद और दवा का उपयोग किया जाता है।

करीब 60 दिन में हरी फली तैयार हो जाती है, जो हरे मटर की तरह सब्जी में काम आती है। 80 दिन में फसल पककर तैयार हो जाती है। वर्तमान में बिजवार के रूप में यह 500 रुपए किलो तक बिक रहा है। विभिन्न क्षेत्रों के किसान इसे ले जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि जापानी दल ने 50 हजार रुपए में एक क्विंटल सोयाबीन उनसे खरीदा था।

अधिक फाइबर व कम वसा के कारण सुपाच्य

कृषि वैज्ञानिक रेखा तिवारी के अनुसार करुणे सोयाबीन में फाइबर अधिक होता है, इसलिए ये सुपाच्य है। इसमें वसा (फेट ) भी कम होता है। इसके विपरीत पीली सोयाबीन में अपेक्षाकृत वसा अधिक और फाइबर कम होता है। जापानी लोग खाने में सब्जियों का इस्तेमाल अधिक करते हैं। करुणे सोयाबीन भी सब्जी में उपयोग के लिए ही खरीदी है।

बाजार में मिलने वाले नकली दूध की आसानी से ऐसे करें पहचान

आज के समय में बाजारों में नकली चीजों की भरमार है और इन्हीं चीजों के इस्तेमाल से हमारी जिंदगी बीमारियों से घिर गई है. आपको शायद न पता हो, लेकिन इन मिलावट वाली चीजों के इस्तेमाल से कम उम्र में ही जानलेवा बीमारियां पैदा हो जाती हैं.

आज के समय में चाहे आप हरी सब्जियां ले रहे हों, फल खरीद रहे हों या फिर दूध हीं क्यों ना ले रहे हों, कोई भी चीज आपको असली नहीं मिलेगी. लेकिन हमारी मजबूरी है कि हमें ये सारी चीजें खरीदनी पड़ती हैं और इस्तेमाल करनी पड़ती हैं. यूं तो इन चीजों के असली और नकली होने की पहचान करना थोड़ा कठिन होता है, फिर भी हम आपको नकली दूध की पहचान का आसान तरीका बता रहे हैं.

ऐसे जान सकते हैं आप असली और नकली दूध का फर्क

  • नकली दूध की पहचान करने के लिए उसे सूंघें. अगर आपको लगता है कि दूध से साबुन जैसी महक आ रही है, तो दूध सिंथेटिक यानी की नकली है. जबकि असली दूध से ऐसी कोई गंध नहीं आती.
  • आपको बता दें कि दूध असली है तो उसका स्वाद मीठा होगा, लेकिन अगर नकली दूध है तो इसका स्वाद मीठा नहीं बल्कि कड़वा होगा.
  •  दूध में पानी की मिलावट की पहचान आप इस तरह से कर सकते हैं. दूध की कुछ बूंदें फर्श पर गिरा कर देखें, अगर दूध बहने लगता है और सफेद धार का निशान बनता है, तो दूध में पानी की कोई मिलावट नहीं है.

  •  हम आपको ये भी बता दें कि असली दूध को अगर आप अपने हाथों में लेकर रगड़ेंगे तो उसमें कोई चिकनाहट नहीं होगी. लेकिन अगर आपक नकली दूध को रगड़ेंगे तो डिटरजेंट जैसी चिकनाहट महसूस होगी.
  •  असली दूध को जब आप उबालेंगे तो उसका रंग नहीं बदलेगा. जबकि नकली दूध को उबालने पर उसका रंग हल्का पीला पड़ जाता है.

 

आ गया बर्षा पंप, अब सिंचाई के लिए न बिजली की जरूरत और न ही ईंधन की

खेती के लिए सबसे ज्यादा जरूरी क्या है ? आप कुछ देर के लिए सोचेंगे और कहेंगे सिंचाई की सुविधा, क्योंकि इसके बिना सारी तैयारियां अधूरी रह जाती है। और अगर हम आपको कहें कि सिंचाई के लिए हमारे पास एक ऐसा वाटर पंप है जो बिना बिजली और किसी ईंधन के ही चलती है तो क्या कहेंगे?

आज हम इसी खास तकनीक के बारे में बात करने जा रहे हैं जिसका विकास नीदरलैंड में हुआ है और जो हमारे पड़ोसी देश नेपाल में सफलतापूर्वक काम कर रहा है। इस तरह की तकनीक भारत के लिए भी वरदान साबित हो सकती है जहां आज भी चौबीस घंटे बिजली की बात तो छोड़ दीजिए कई जगहों पर तो बिजली पहुंचती भी नहीं है। ऐसे इलाकों के लिए यह तकनीक कृषि के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगी। यह वाटर पंप जिस तकनीक पर काम करता है उसके लिए भारत की परिस्थिति बिल्कुल सही जगह है। तो चलिए अब विस्तार से इस खास तकनीक से लैस पंप के लिए बात करते हैं।

बर्षा पंप से किसानों के खेतों में होगी वर्षा

हाल में नीदरलैंड के शोधकर्ताओं ने खेतों में सिंचाई को बेहद आसान बनाने के लिए एक नया सिंचाई पंप विकसित किया है। यह एक ऐसा बर्षा पंप है, जिसके लिए किसानों को बिजली या ईंधन का खर्च भी नहीं उठाना पड़ेगा।

बस किसानों को इस पंप को नहर या नदी में रखना होगा और इसके सहारे किसान आसानी से अपने आस-पास के खेतों में सिंचाई कर सकेंगे। किसानों के लिए यह एक तरह का बिल्कुल नया उपकरण है, जिसके इस्तेमाल से किसानों को सिंचाई संबंधी एक बड़ी समस्या दूर हो सकेगी।

किसानों के लिए सिंचाई बड़ी समस्या

अपने खेतों में सिंचाई के लिए किसानों को बड़ी मुश्किल उठानी पड़ती है। एक तरफ जहां कुछ किसान आस-पास की नदियों, नालों या नहर में सिंचाई पाइप लगाकर डीजल पंप के जरिये अपने खेतों की सिंचाई करते देखे जा सकते हैं, वहीं दूसरी ओर किसान अन्य जटिल तरीकों से खेतों से सिंचाई की व्यवस्था करते हैं, ताकि अपने खेतों में सही स्थिति और समय पर रोपाई कर सकें।

असल में बर्षा पंप का निर्माण नीदरलैंड की कंपनी क्यूस्टा ने किया है। इस बर्षा पंप के लिए यूरोपीय संस्था क्लाईमेट केवाईसी की ओर से यूरोप की इस साल की सबसे बड़ी तकनीकि खोज का अवॉर्ड दिया गया है।

शोधकर्ताओं की मानें तो यह एक तरह का बिल्कुल नया उपकरण है और विकासशील देशों में यह तकनीक बहुत कारगार साबित होगी। चूंकि पहला बर्षा पंप इस साल नेपाल में लगाया गया है और नेपाल में बारिश को बर्षा कहा जाता है। इसलिए इस पंप का नाम बर्षा रखा गया है।

ऐसे चलता है बर्षा पंप

असल में यह पंप पानी की लहरों से चलता है। लहरों से टकराकर बर्षा पंप का एक बड़ा सा पहिया घूमता है और इससे वायु का दबाव बनता है। इस वायु के दबाव की वजह से ही पानी को एक नली के जरिये किसानों के खेतों तक पहुंचा देता है।

ऐसे में नदी, नहर या नालों में पानी की लहर की गति ही इस पंप के लिए कारगार होती है और जितनी तेज पानी की रफ्तार होगी, उतनी दूर तक किसानों के खेत तक पानी पहुंच सकेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रदूषण न फैलाने की वजह से यह बर्षा पंप पर्यावरण के भी अनुकूल है। अब एशिया में ही नहीं, बल्कि लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में इस बर्षा पंप के निर्माण की तैयारी शुरू की जा रही है।

शोधकर्ताओं की मानें तो इस बर्षा पंप के जरिए फसल का उत्पादन 5 गुना तक बढ़ाया जा सकता है। यह पंप एक लीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से पानी छोड़ता है। पानी की रफ्तार अच्छी होने पर इस पंप के जरिये 82 फीट की ऊंचाई तक भी पानी को पहुंचाया जा सकेगा। सबसे अच्छी बात यह है कि एक साल में ही इस पंप की पूरी लागत वसूल हो जाएगी।

बर्षा पंप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

4 लोग मिलकर निकाल पाते हैं इस गाय का दूध, जानिए क्या है वजह

भारत में गाय की पूजा की जाती है। इसके अलावा गाय भारत की अर्थव्यस्था की रीढ़ भी रही है। इसलिए यह बहुत उपयोगी पशु माना जाता है।बता दें गाय से व्यवसाय आज पूरी दुनिया में फैला है।

शहरीकरण की ओर बढ़ रहे भारत में आज भी गांव में लोग गाय पालना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें इससे शुद्ध दूध तो मिलता ही है साथ ही ये बड़ा आजीविका का साधन भी बन गया है। इसलिए लोग अब गाय खरीदने से पहले ये देखते हैं कि कौनसी नस्ल की गाय सबसे ज्यादा दूध देती है।

आज हम बात करेंगे ऐसी नस्ल वाली गाय की जो इतना दूध देती है कि उसे निकालने के लिए 4 लोगों की जरूरत पड़ती है। भारत की इस अनोखी गाय की नस्ल का नाम है ‘गीर’

एक रिपोर्ट के मुताबिक ये गाय प्रतिदिन 50 से 80 लीटर दूध देती है। इस गाय के नाम के साथ ‘गीर’ इसलिए जुड़ा क्योंकि ये गाय गुजरात के गीर में पाई जाती है। इस गोवंश का मूल स्थान काठियावाड़ बताया जाता है। इसकी दूध देने की क्षमता के कारण ये नस्ल विश्व विख्यात हो चुकी है। इसकी नस्ल आपको विश्व के कई देशों में देखने को मिल जाएगी।

पंजाब में एक ऐसी गाय आ चुकी है, जिसका दूध दोहने के लिए एक नहीं, दो नहीं, बल्कि 4 लोग लगते हैं। जी हां, यह बिल्कुल सच है क्योंकि यह गाय प्रति दिन 61 किलो दूध देती है। सबसे अधिक ब्रासिल और इजरायल के लोग इस नस्ल की गाय को पालना पसंद करते हैं।

बता दें गीर गाय सालाना 2000 से 6000 लीटर दूध देने की क्षमता रखती है। वहीं दूसरे नंबर पर आती है साहिवाल गाय जो 2000 से 4000 लीटर दूध देती है। तीसरे स्थान पर लाल सिंधी गाय है। हालांकि ये गाय भी 2000 से 4000 लीटर दूध देती है लेकिन पशु नस्ल जानने वाले इसे तीसरे स्थान पर ही आंकते हैं। चौथे स्थान पर राठी, पांचवे पर थरपार्कर और छठे स्थान पर कांक्रेज है।

यह मशीन करती है गेहूं की नई तकनीक से बुवाई ,कम पानी में होती है अधिक सिंचाई

समय के साथ-साथ खेती में आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। अभी भी बहुत से किसान गेहूं की बुवाई बीज को हाथों से छिड़क कर ही करते हैं, लेकिन आज के समय ऐसी मशीन आ गई है जिससे किसान गेहूं की बुवाई कर सकते हैं, जिससे न सिर्फ समय की बचत होती है बल्कि इससे कई और फायदे भी होते हैं। आइये हम आपको बताते हैं कि ट्रैक्टर चालित रेज्ड बेड सीड ड्रिल से गेहूं की बुवाई कैसे होती है और इसके क्या फायदे हैं।

ट्रैक्टर चालित रेज्ड बेड सीड ड्रिल मशीन (Raised Bed Seed Drill Machine) मिट्टी उठा कर बुवाई करने की तकनीक पर आधारित है। इसमें मिट्टी उठाने के लिये रिजर तथा बेड बनाने के लिये बेड शेपर लगे होते हैं। रेजर बनने वाली नाली (बरे) की चौड़ाई घटाई-बढ़ाई जा सकती है। मशीन के अगले भाग में लगे रेजर मिट्टी उठाने के लिये का कार्य करते हैं, फरो ओपनर इस उठी हुई मिट्टी पर बुवाई करता हैं, तथा बेड शेपर उस उठी हुई मिट्टी को रूप देते हैं।इस प्लांटर के द्वारा बेड पर दो या तीन लाइन बीज एवं खाद की बुवाई की जाती है।

इस तकनीक से बुवाई करने से फसल वर्षा के पानी का भरपूर उपयोग करती है तथा सिंचाई की स्थिति में काफी कम पानी लगता है तथा कार्य जल्दी पूरा हो जाता है। इस मशीन के द्वारा 25 प्रतिशत खाद एवं बीज की बचत होती है। इस पद्धति से बुवाई करने से 4 एकड़ की सिंचाई करने में जितना पानी लगता है उतने ही पानी से 6 से 8 एकड़ की सिंचाई की जा सकती है।इस प्लांटर के द्वारा बुवाई करने के बाद निकाई गुड़ाई आसानी से की जा सकती है।

साथ ही इस विधि से गेहूं की बुवाई करने से आप ज्यादा उत्पादन ले सकते है और नदीन भी बहुत कम उगते है । रेज्ड बेड सीड ड्रिल से सिर्फ गेहूं ही नहीं और भी बहुत सारी फसलें जैसे मक्का ,सोयबीन,दालें आदि की बुवाई कर सकते है । बहुत सारी कंपनी यह मशीन बनाती है आप किसी भी बुवाई मशीन त्यार करने वाली वर्कशाप पर पता कर सकते है ।

यह मशीन कैसे बिजाई करती है उसके लिए वीडियो देखें

सिर्फ दो सिंचाई में ही तैयार हो जाएगा यह गेहूं, एक हेक्टेयर में देगा 45 क्विंटल उत्पादन

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) इंदौर ने गेहूं की नई वैरायटी ईजाद की है। इसे प्रमाणित करने के लिए सेंट्रल वैरायटी रिलीज कमेटी (सीवीआरसी) में जमा किया गया है। खासियत यह है कि यह दो सिंचाई में पककर तैयार हो जाएगी। गेरुआ और करनाल बंट रोग कभी नहीं आएगा।दूसरा इसमें बीटा कैरोटीन, आयरन, जिंक व प्रोटीन भरपूर मात्रा में है, जो एनिमिया से बचाने के साथ मनुष्यों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।

गेहूं में मुख्य रूप से पीला रतुआ, गेरूआ रोग और काला कंडुआ (खुली कांगियारी) रोग होता है। यह रोग फफूंद के रूप में फैलता है। तापमान में वृद्धि के साथ-साथ गेहूं को पीला रतुआ रोग लग जाता है।यह खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में फैलता है, लेकिन रोकथाम के अभाव में यह मैदानी क्षेत्रों में फैल जाता है। उपज प्रभावित होती है, इससे किसानों को नुकसान होने की आशंका बढ़ जाती है।

यह रोग कृषि वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बन गई है, इससे निपटने के लिए कृषि महाविद्यालय जबलपुर ने गेहूं की ऐसी प्रजाति विकसित की है जो 105 दिन में पककर तैयार हो जाएगी।

आईएआरआई के प्रधान वैज्ञानिक एसवी सांई प्रसाद ने बताया कि इसमें बीटा कैरोटीन, आयरन 48.7 पाट्स पर मिलियन (पीपीपी), जिंक 43.7 पीपीपी व प्रोटीन अधिक मात्रा में है। ये तत्व मानव शरीर के लिए बहुत लाभदायक हैं। बीटा कैरोटीन सन बर्न कम करने और त्वचा को स्वस्थ रखने के लिए लाभदायक है।

इस गेहूं में गेरुआ व करनाल बंट रोग की आशंका भी कम रहती है।आईएआरआई ने वाराणसी वर्कशॉप में एचआई 8777 वैरायटी आइडेंटिफाइड की थी। इसे पूसा बीट 8777 नाम दिया गया। इसे आईएआरआई ने सीवीआरसी को भेजा है। अन्य गेहूं की अपेक्षा यह किस्म चमकदार और आकर्षक है।

वैज्ञानिक एके सिंह ने बताया पूसा 8777 समुद्र तटीय क्षेत्रों जैसे कर्नाटक व महाराष्ट्र में भी अच्छी पैदावार देगी। वहीं मध्यप्रदेश के ऐसे किसान जिनके पास पानी की कमी है वे एक या दो बार की सिंचाई में 40 से 45 क्विंटल पैदावार ले सकते हैं। इस फसल को 105 दिन में काटा जा सकता है।

जेडब्लू (एमपी) 3288 : ये किस्म वर्षा आधारित या सीमित सिंचाई में खेती के लिए उपयुक्त है। दाने बड़े होते है। पौधा झुकता नहीं है तथा इसके दाने छिंटकते नहीं है। कई कल्ले देती है। गेरूआ रोग के प्रतिरोधी तथा 2 सिंचाई मे उपज 45-47 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होता है।

जेडब्लू (एमपी) 3173 : आंशिक सिंचाई मे खेती करने योग्य है। गर्मी के प्रति सहनशील, गेरूआ रोग के प्रतिरोधी, मोटे दानों वाली है। एक-दो सिंचाई में 45-47 क्विंटल उत्पादन होता है। सूखे तथा गेरुआ रोग के प्रति रोधी, चपाटी बनाने के लिए उत्तम है।

जेडब्लू (एमपी) 3211 : सूखे तथा गेरूआ रोग के प्रतिरोधी, चपाती बनाने के लिए उत्तम, एक-दो सिंचाई में पक जाती है। 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होता है।

नर्मदा 4: यह पिसी सरबती किस्म, काला और भूरा गेरूआ निरोधक है। यह असिंचित एवं सीमित सिंचाई क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसके पकने का समय 125 दिन हैं। पैदावार 12-19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। दाना सरबती चमकदार होता है। यह चपाती बनाने के लिए विशेष उपयुक्त है।

एनपी-404 : यह काला और भूरा गेरूआ निरोधक कठिया किस्म असिंचित दशा के लिए उपयुक्त है। यह 135 दिन मे पककर तैयार होती है। पैदावार 10 से 11 क्विंटल प्रति हेक्टयर होती है। दाना बड़ा, कड़ा और सरबती रंग का होता है।

मेघदूत : यह काला और भूरा गेरूआ निरोधक कठिया जाति असिंचित अवस्था के लिए उपयुक्त है। पकने का समय 135 दिन है। पैदावार 11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसका दाना एनपी 404 से कड़ा होता है। हाइब्रिड 65: यह पिसिया किस्म है, जो भूरा गेरूआ निरोधक है। यह 130 दिन में पकती है। इसकी पैदावार असिंचित अवस्था में 13 से 19.क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसका दाना, सरबती, चमकदार, 1000 बीज का भार 42 ग्राम होता है।

मुक्ता: यह पिसिया किस्म है जो भूरा गेरूआ निरोधक है। असिंचित अवस्था के लिये उपयुक्त है। यह 130 दिन में पकती है। इसकी पैदावार 13-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसका दाना सरबती लम्बा और चमकदार होता है।

गेहूं की उन्नत किस्मों की विशेषताएं

ऐसे फैलता है ये रोग

पीला रतुआ, गेरूआ रोग और काला कंडुआ (खुली कांगियारी) गेहूं की फसल में फंफूद के रूप में फैलता है। रोग के प्रकोप से गेहूं की पत्तियों पर छोटे-छोटे अंडाकार फफोलो बन जाते हैं। ये पत्तियों की शिराओं के साथ रेखा सी बनाते हैं। रोगी पत्तियां पीली पड़कर सूख जाती हैं।

यह गेहूं लोगों के लिए भी फायदेमंद

बीटा कैरोटीन एक एंटी ऑक्सीडेंट और इम्यून सिस्टम बूस्टर के रूप में काम करता है। यह शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले मुक्त कणों (फ्री रेडिकल्स) से रक्षा करता है और इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को मजबूत बनाता है। यह विटामिन-ए का अच्छा स्रोत है, जो त्वचा में सूर्य से होने वाले नुकसान को कम करता है। वहीं आयरन की कमी को दूर कर नवजात, किशोरों व गर्भवतियों में होने वाली खून की कमी को दूर करता है।.