डीजल नहीं हवा से चलता है ये इंजन, अनपढ़ दोस्तों ने 11 साल में किया तैयार

गाड़ियों के टायरों में हवा भरने वाले दो अनपढ़ दोस्तों ने कुछ अलग करने की ठानी तो हवा से चलने वाला इंजन ही बना दिया। 80 फीट की गहराई से इसी हवा के इंजन से पानी तक खींचा जाता है। 11 साल की मेहनत के बाद यह इंजन बनकर तैयार हुआ है। अब वे बाइक को हवा से चलाने के लिए एक प्रोजेक्ट बना रहे हैं।

दरअसल, राजस्थान के भरतपुर जिले में रूपवास के खेड़िया विल्लोज के रहने वाले अर्जुन कुशवाह और मिस्त्री त्रिलोकीचंद गांव में ही एक दुकान पर मोटर गाड़ियों के टायरों में हवा भरने का काम करते थे।

करीब 11 साल पहले जून में एक दिन ट्रक के टायरों की हवा जांच रहे थे तो उनका इंजन खराब हो गया। उसे सही कराने तक के लिए जेब में पैसे नहीं थे। इतने में ही इंजन का वॉल खुल गया और टैंक में भरी हवा बाहर आने लगी। इंजन का पहिया दवाब के कारण उल्टा चलने लगा। फिर यहीं से दोनों ने शुरू की हवा से इंजन चलाने के आविष्कार की कोशिश की। साल 2014 में वे इसमें सफल भी हो गए। आज वे इसी हवा के इंजन से खेतों की सिंचाई करते हैं।

11 साल में साढ़े तीन लाख रुपए किए खर्च

  • त्रिलोकीचंद ने बताया कि 11 साल से वे लगातार हवा के इंजन पर ही शोध कर रहे हैं। अब तक बहुत कुछ सीख चुके हैं ।
  •  इसे बनाने में करीब 3.5 लाख रुपए के उपकरण सामान ला चुके हैं। अब दुपहिया चौपहिया वाहनों को हवा से चलाने की योजना बना रहे हैं।

ऐसे बनाया 8 हॉर्स पावर का इंजन

अर्जुन कुशवाह ने बताया, ”चमड़े के दो फेफड़े बनाए। इसमें एक छह फुट और दूसरा ढाई फुट का। इसमें से एक बड़े फेफड़े इंजन के ऊपर लगाया। जबकि इंजन के एक पहिए में गाड़ी के तीन पटा दूसरे बड़े पहिए में पांच पटा लगाकर इस तरह सेट किया कि वह थोड़ा से धक्का देने पर भार के कारण फिरते ही रहें। पिस्टन वॉल तो लगाई ही नहीं है।

जब इंजन के पहिए को थोड़ा सा घुमाते हैं तो वह बड़े फेफड़े में हवा देता है। इससे छोटे फेफड़े में हवा पहुंचती है और इंजन धीरे-धीरे स्पीड पकड़ने लगता है। इससे इंजन से पानी खिंचता है। बंद करने के लिए पहिए को ही फिरने से रोकते हैं। हवा से चल नहीं जाए, इसके लिए लोहे की रॉड फंसाते हैं।

”इसे बनाने में करीब 3.5 लाख रुपए के उपकरण सामान ला चुके हैं।आज वे इसी हवा के इंजन से खेतों की सिंचाई करते हैं।

गर्मी में बिना AC नहीं सोती यह डेढ़ करोड़ की गोड़ी,जाने इसकी खुराक और बाकि जानकारी

बड़वानी और महाराष्ट्र बॉर्डर के खेतिया-सारंगखेड़ा में अश्व मेले में आई करीब पांच साल की घोड़ी पद्मा लोगों के दिलों पर छा गई है। इंदौर के दतोदा की घोड़ी पद्मा के मालिक बालकृष्ण चंदेल ने बताया वे पद्मा को रोजाना 10 लीटर दूध, मिनरल पानी, 2 किलो चना, 5 किलो गेहूं की चापड़ व स्वाद अनुसार हरी घास खिलाते हैं। हर दिन उसे शैम्पू से नहलाया जाता है। गर्मियों में अगर AC कमरे में नहीं सुलाओ तो बैचेन रहती है।

दतोदा में रहने वाले बालकृष्ण चंदेल की घोड़ी पद्मा पुष्कर मेले में छाई हुई थी। इस घोड़ी ने तो सीएम वसुंधरा राजे सिंधिया को भी दिल जीत लिया था। पद्मा को खरीदने के लिए एक शख्स ने 72 लाख की बोली लगा दी थी, हालांकि उस समय चंदेल अपनी इस लाड़ली घोड़ी को 1.5 करोड़ से कम में बेचने के लिए तैयार नहीं थे।

घोड़ी मालिक का दावा है कि पद्मा की कीमत 2 करोड़ तक लग चुकी है, लेकिन वे इसे 10 करोड़ में भी बेचना नहीं चाहते हैं। उनके अनुसार अब तक कई ईनाम अपने नाम कर चुकी पद्मा की कद-काठी व नस्ल महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की वंशज जैसी मानी जाती है।

छह फ़ीट ऊंची है पद्मा

करीब पांच साल की पद्मा का कद लगभग 6 फ़ीट है। चंदेल ने चार साल पहले आगरा के एक किसान से पद्मा को छह लाख रुपए में खरीदा था। चंदेल का पूरा परिवार पद्मा की देखरेख करता है। पद्मा को रोज़ 10 लीटर गाय का दूध पिलाते हैं। रोज उसको आधा किलो काजू और बादाम भी खिलाते हैं। चंदेल के मुताबिक़ पद्मा को नहाने का बहुत शौक है। जब तक उसे शैंपू से नहलाया ना जाए, तब तक वह सवारी के लिए तैयार नहीं होती।

वसुंधरा ने पहनाई थी माला, खरीदना चाहती थी पद्मा को

चंदेल बताते हैं कि पुष्कर मेले में पद्मा सबके आकर्षण का केंद्र थी। मेले का निरीक्षण करने आईं राजस्थान की सीएम वसुंधरा भी उसे देख काफी खुश हुईं। वसुंधरा जी का कहना था कि यदि पद्मा का रंग ब्राउन होता तो वे उसे तुरंत खरीद लेती। चंदेल बताते हैं कि एक ग्राहक तो पद्मा को खरीदने के लिए 72 लाख रुपए लेकर आ भी आ गया था, लेकिन  हम पद्मा को बेचना नहीं चाहते थे, इसलिए हमने उसकी कीमत डेढ़ करोड़ रखी थी।

ये है पद्मा की खुराक…

  • 10 लीटर दूध रोज
  • 05 किलो गेहूं चापड़ी
  • 02 किलो चना
  • 4.6 वर्ष आयु
  • 70 इंच ऊंचाई
  • 850 किलो वजन

मेले में खास

सारंगखेड़ा में एकमुखी गुरुदत्त भगवान का मंदिर है। इस मंदिर के पास ही अश्व मेला लगा है। इसमें 80 गांव के लोग आ रहे हैं। मेले में बड़ी-बड़ी पालकियां, सर्कस, पार्क, बच्चाें व ग्रामीणों के मनोरंजन के साधन हैं।

ये है अरहर का पेड़,एक पेड़ से मिलती है 12 किल्लो तक दाल

सरकार का प्रयास है कि देश के हर व्यक्ति की थाली में दाल हो और इसके लिए कई स्तरों पर प्रयास भी हो रहे हैं। इसी बीच अगर दाल की एक ऐसी प्रजाति जिससे दाल के उत्पादन को कई गुना बढ़ाया जा सके, और वो प्रजाति अगर अरहर की हो तो ये काफी अच्छी ख़बर हो सकती है।

अरहर की दाल की खपत देश में सबसे ज़्यादा है और इस दाल में प्रोटीन की मात्रा भी काफी अधिक होती है। आमतौर पर अरहर के लगभग 4 – 5 फीट के झाड़ जैसे दिखने वाले पौधे होते हैं और हर पौधे में लगभग 5-6 शाखाएं होती हैं लेकिन क्या आपने ऐसा अरहर का पौधा देखा है जो पेड़ जैसा दिखता हो। जी हां, अरहर का पेड़।

ये है खासियत

अरहर के इस पौधे का तना कुछ मोटा होता है और एक पेड़ में लगभग 60 शाखाएं होती हैं। इन शाखाओं पर फलियों के गुच्छे होते हैं जिनमें अधिक संख्या में फलिया होती हैं। कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के प्रोफेसर डॉ. गजेंद्र सिंह तोमर बताते हैं, ”छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर के गाँव गगोली में कई खेतों की मेढ़ों पर इस अरहर के पेड़ देखने को मिल जाते हैं।

” वह बताते हैं कि अरहर के इस पौधे में 8 से 12 किलोग्राम दाना निकल आता है। इसका दाना कुछ मोटा, बड़ा और चमकीला होता है। इसकी फलियां 2 – 3 बार तोड़ी जा सकती हैं। फसल के परिपक्व होने का समय जनवरी से अप्रैल के बीच का होता है।

है बहुवर्षीय फसल

डॉ. तोमर बताते हैं कि यह अरहर की बहुवर्षीय फसल होती है। जुलाई-अगस्त में खरीफ की फसल की बुवाई के समय इसका बीज डाल देना चाहिए। पौधे से पौधे की दूरी लगभग 2 से 3 मीटर होनी चाहिए। फसल 6 महीने में तैयार हो जाती है।

एक पेड़ से दो से तीन बार फलियों को तोड़ा जा सकता है। गर्मी तेज़ होने पर यह पौधा सूखने लगता है। उस वक्त इसके तने को ज़मीन से 4 से 5 इंच छोड़कर काट देना चाहिए और समय – समय पर एक-दो गिलास पानी डालते रहना चाहिए जिससे ये सूखे नहीं।

सघनीकरण विधि से अरहर की खेती करने से ज्यादा पैदावार होगी

जब बारिश होती है तो ये पौधा फिर से हरा होने लगता है और फिर धीरे -धीरे बड़ा होकर इसमें फलियां आने लगती हैं। एक पौधे की उम्र लगभग 3 से 4 साल होती है। इसके बाद दोबारा बीज डालकर इसे लगाया जा सकता है। इस फसल में बस 2 से 3 बार कीटनाशकों का छिड़काव करने की ज़रूरत पड़ती है।

अरहर का पौधा बहुवर्षीय होता है या अगर पानी-खाद देते रहे तो चार पांच साल तक चलता रहता है। छत्तीसगढ़ की अरहर की किस्म भी कोई जंगली किस्म होगी जिसे किसानों ने मेड़ों पर अरहर के पौधे लगाए हैं।

डॉ. पुरुषोत्तम, वैज्ञानिक, भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान

अब भारत में करें काले टमाटर की खेती ,शुगर के मरीजों के लिए है रामबाण

आगर आपसे कोई पूछे कि क्या आपने काले टमाटर के बारे में सुना है, तो ज्यादातर लोगों का जवाब नहीं में होगा। अपने आप में खास इस टमाटर को काफी पसंद किया जा रहा है और अब इसके बीज भारत में भी उपलब्ध हैं। अंग्रेजी में इसे इंडि‍गो रोज़ टोमेटो कहा जाता है। पहली बार भारत में काले टमाटर की खेती होने जा रही है।

हिमांचल प्रदेश के सोलन जिले के ठाकुर अर्जुन चौधरी बीज विक्रेता हैं। अर्जुन चौधरी के पास काले टमाटर के बीज उपलब्द हैं। उन्होंने बताया, ”मैने काले टमाटर के बीज ऑस्ट्रेलिया से मंगवाए हैं। इसकी खेती भी लाल टमाटर की तरह ही होती है। इसके लिए कुछ अलग से करने की जरूरत नहीं होगी।” उन्होंने ने बताया, ”अभी तक भारत में काले टमाटर की खेती नहीं की जाती है, इस वर्ष पहली बार इसकी खेती की जाएगी।” काले टमाटर के बीज का एक पैकेट जिसमें 130 बीज होते हैं 110 रुपए का मिलता है।

यह टमाटर भारत में पहली बार उगया जाएगा।

काला टमाटर की नर्सरी सबसे पहले ब्रिटेन में तैयार की गई थी, लेकिन आब इसके बीज भारत में भी उपल्बध हैं। किसान इसके बीज ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं।

अर्जुन चौधरी ने इसकी खासियत बताते हुए कहा, ”इसकी खास बात यह है कि इसकों शुगर और दिल के मरीज भी खा सकते हैं।” यह बाहर से काला और अंदर से लाल होता है। इसको कच्‍चा खाने में न ज्यादा खट्टा है न ज्यादा मीठा, इसका स्वाद नमकीन जैसा है।

यह बाहर से काला और अंदर से लाल होता है।

”यह टमाटर गर्म क्षेत्रों के लिए अच्छे से उगाया जा सकता है। ठंढे क्षेत्रों में इसे पकने में दिक्कत होती है,” अर्जुन चौधरी बताते हैं, ”क्योंकि यह टमाटर भारत में पहली बार उगया जा रहा है इस लिए इसके रेट भी अच्छे मिलेंगे।”

इसको पकने में करीब चार महीने का समय लगता है।

उन्होंने बताया कि जनवरी महीने में इसकी नर्सरी की बुवाई की जा सकती है और मार्च के अंत तक इसकी नर्सरी की रोपाई की जा सकती है। यहा टमाटर लाल टमाटर के मुकाबले थोड़ा देर से होता है। लाल टमाटर करीब तीन महीने में पक कर निकलना शुरू हो जाता है और इसको पकने में करीब चार महीने का समय लगता है।

शुगर के मरीजों के लिए है रामबाण

अगर आप शुगर से लड़कर थक चुके हैं तो काला टमाटर आपके लिए रामबाण साबित हो सकता है। इस टमाटर को जेनेटिक म्यूटेशन के द्वारा बनाया गया है। काले टमाटर में फ्री रेडिकल्स से लड़ने की क्षमता होती है। फ्री रेडिकल्स बहुत ज्यादा सक्रिय सेल्स होते हैं जो स्वस्थ सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं। इस तरह ये टमाटर कैंसर से रोकथाम करने में सक्षम है।

ये टमाटर आंखों के लिए भी बहुत फायदेमंद हैं। ये शरीर की विटामिन ए और विटामिन सी की जरुरत को पूरा करता है। विटामिन ए आंखों के लिए बहुत फायदेमंद होता है।अगर आप नियमित रूप से काले टमाटरों का सेवन करते हैं तो आप दिल से जुड़ी बीमारियों से भी बचे रह सकते हैं। इसमें पाया जाने वाले एंथोसाइनिन आपको हार्ट अटैक से बचाता है और आपके दिल को सुरक्षा प्रदान करता है।

गाय भैंस का दूध बढाने का रामबाण घरेलु उपाय

जो लोग गाय भैंस का अधिक दूध लेने के लिए उनको टीके लगाते हैं वो मानवता के सबसे बड़े दुश्मन हैं. वो कभी सुखी नहीं रह पाएंगे. वो दुसरो को ज़हर देते हैं तो भगवान् उनके घर भी कभी अमृत से नहीं भरेगा. वो ज़हर एक दिन उनको ले डूबेगा.

आज हम आपको बताने जा रहें हैं गाय भैंस का दूध बढाने के रामबाण घरेलु उपाय. ये उपाय बिलकुल सरल है और आपको बहुत जल्दी ही इसके नतीजे भी मिलेंगे. ज़रूर जाने और अपनाएं.

सामग्री :-

  • 250 ग्राम गेहू दलिया,
  • 100 ग्राम गुड सर्बत(आवटी),
  • 50ग्राम मैथी ,
  • 1 कच्चा नारियल ,
  • 25-25 ग्राम जीरा व अजवाईन.

उपयोग:-

  • सबसे पहले दलिये ,मैथी व गुड को पका ले बाद मे उसमे नारियल को पिसकर डाल दे.ठण्डा होने पर खिलाये.
  • ये सामग्री 2 महीने तक केवल सुबह खाली पेट ही खिलाये.
  • इसे गाये को बच्चा देने से एक महीने पहले शूरू करना और बच्चा देने के एक महीने बाद तक देना.
  •  नोट :- 25-25 ग्राम अजवाईन व जीरा गाये के ब्याने के बाद केवल 3 दिन ही देना. बहुत अच्छा परिणाम ले सकते हे.
  • ब्याने के 21 दिन तक गाये को सामान्य खाना ही दे.
  •  गाये का बच्चा जब 3 महीने का हो जाये या जब गाये का दूध कम हो जाये तो उसे 30 gm/दिन जवस औषधि खिलाये दूध कम नही होगा।

काले गेहूं की खेती होती है, लेकिन बाकी सच्चाई भी जान लीजिए

पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया में काले गेहूं को लेकर लगातार ख़बरें शेयर हो रही हैं। जिसमें ये कहा जा रहा है भारत में पहली बार काले गेहूं की खेती हो रही है और ये सामान्य गेहूं के मुकाबले न सिर्फ कई गुना महंगा बिकता है बल्कि इसमें कैंसर और डायबिटीज समेत कई बीमारियों से लड़ने की क्षमता होती है।

लेकिन यह पूरा सच नहीं है। आज आप को बताते हैं, ये गेहूं कहां पैदा होता है, इसका रंग काला क्यों होता है, क्या काले रंग के अलावा भी किसी रंग का गेहूं होता है और इसके चिकित्सकीय गुण क्या हैं ?

सोशल मीडिया में वायरल होने वाली इस पोस्ट में दावा किया गया था कि, सात बरसों के रिसर्च के बाद गेहूं की इस नई किस्म को पंजाब के मोहाली स्थित नैशनल एग्री फूड बायोटेक्नॉलजी इंस्टीट्यूट या नाबी ने विकसित किया है। नाबी के पास इसका पेटेंट भी है।

इस गेहूं की खास बात यह है कि इसका रंग काला है। वायरल हो रही पोस्ट में कहा गया है कि काले गेहूं में कैंसर, डायबिटीज, तनाव, दिल की बीमारी और मोटापे जैसी बीमारियों की रोकथाम करने की क्षमता है।

इस दावे की जांच के लिए जब न्यूज चैनल एबीपी के प्रतिनिधि मोहाली स्थित नाबी पहुंचे तो वहां उन्होंने इस गेहूं की फसल देखी। उन्होंने पाया कि शुरू में इसकी बालियां भी आम गेहूं जैसी हरी होती हैं, पकने पर दानों का रंग काला हो जाता है।

ज्यादा जानकारी के लिए जब नाबी की साइंटिस्ट और काले गेहूं की प्रोजेक्ट हेड डॉ. मोनिका गर्ग से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि नाबी ने काले के अलावा नीले और जामुनी रंग के गेहूं की किस्म भी विकसित की है।

काले रंग की वजह एंथोसाएनिन

इस गेहूं के अनोखे रंग के बारे में पूछने पर डॉ. गर्ग ने बताया कि फलों, सब्जियों और अनाजों के रंग उनमें मौजूद प्लांट पिगमेंट या रंजक कणों की मात्रा पर निर्भर होते हैं। काले गेहूं में एंथोसाएनिन नाम के पिगमेंट होते हैं।

एंथोसाएनिन की अधिकता से फलों, सब्जियों, अनाजों का रंग नीला, बैंगनी या काला हो जाता है। एंथोसाएनिन नेचुरल एंटीऑक्सीडेंट भी है। इसी वजह से यह सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है। आम गेहूं में एंथोसाएनिन महज 5पीपीएम होता है, लेकिन काले गेहूं में यह 100 से 200 पीपीएम के आसपास होता है।

एंथोसाएनिन के अलावा काले गेहूं में जिंक और आयरन की मात्रा में भी अंतर होता है। काले गेहूं में आम गेहूं की तुलना में 60 फीसदी आयरन ज्यादा होता है। हालांकि, प्रोटीन, स्टार्च और दूसरे पोषक तत्व समान मात्रा में होते हैं।

सेहत के लिए है फायदेमंद

तब क्या काला गेहूं खाने से कैंसर, डायबिटीज जैसी बीमारियां नहीं होतीं। इस पर डॉ. गर्ग का कहना है, चूहों पर किए गए प्रयोगों में देखा गया कि ब्लड कॉलस्ट्रॉल और शुगर कम हुआ, वजन भी कम हुआ लेकिन इंसानों पर भी यह इतना ही कारगर होगा यह नहीं कहा जा सकता।

पर यह तो तय है कि अपनी एंटीऑक्सीडेंट खूबियों की वजह से इंसानों के लिए भी यह फायदेमंद साबित होगा। नाबी इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए कंपनियों से करार कर रहा है।

कुछ वेबसाइट बेच रही हैं काले गेहूं का आटा

देखने में आया है कि कुछ ई कॉमर्स वेबसाइट काले गेहूं का आटा बेच रही हैं। इसकी कीमत साइट पर 2 हजार रुपये प्रति किलो से 4 हजार रुपये प्रति किलो तक बताई गई है। साथ ही इनमें बीमारियां दूर करने वाले वे सभी दावे भी किए गए हैं जो सोशल मीडिया में वायरल हो रहे हैं।

काला चावल भी होता है

गेहूं ही नहीं काला चावल भी होता है। इंडोनेशिअन ब्लैक राइस और थाई जैसमिन ब्लैक राइस इसकी दो जानीमानी वैरायटी हैं। म्यामांर और मणिपुर के बॉर्डर पर भी ब्लैक राइस या काला चावल उगाया जाता है। इसका नाम है चाक-हाओ। इसमें भी एंथोसाएनिन की मात्रा ज्यादा होती है।

इस शख्स को टमाटर ने बना दिया करोड़पति

शहडोल। बढ़ता कैरियर अब लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण लक्ष्य बन गया है। कैरियर बनाना एक बहुत बड़ी यात्रा है और आपको इसे सही बनाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। तेजी से आगे बढ़ने की होड़ में लोग नौकरी से ज्यादा स्वयं के रोजगार को करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। अगर आप भी इसी राह में आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपके पास भी कई ऑप्शन मौजूद हैं।

आप भी अपना व्यवसाय शुरू करके घर बैठे लाखों रुपए कमा सकते हैं। इसी राह में एक शख्स टमाटर की खेती करके 3 से 4 करोड़ रुपए सालाना टर्न ओवर कर रहा है। 10 एकड़ की जमीन से सब्जी उत्पादन के व्यवसाय की शुरुआत करने वाले पुरानी बस्ती निवासी किसान पवन मिश्रा बीते कई सालों से ये काम कर रहे हैं।

देश भर में पहुंचाए जा रहे टमाटर

आपको बता दें बउमरिया जिले के घुनघुटी में लगभग 125 एकड़ क्षेत्र में मां कंकाली कृषि समूह के आठ किसानों ने सब्जी की खेती कर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। किसानों द्वारा उत्पादित सब्जी उत्पादों ने शहडोल संभाग ही नहीं देश के दिल्ली, बैंगलोर, रीवा, सतना, जबलपुर, रायपुर आदि महानगरों के बाजार में अपनी पहचान बनाई है। इन किसानों के द्वारा उत्पादित टमाटर और अन्य सब्जियां ट्रकों में भरकर दिल्ली, बैंगलोर और देश के अन्य बड़े बाजारों में पहुंचाई जा रही है, जिससे किसानों को सीधा लाभ हो रहा है।

बैंक ने दिए 5 लाख रुपए

अपने रोजगार में सफल होने वाले किसान पवन मिश्रा ने बताया कि उन्होंने टमाटर की खेती की शुरूआत सबसे पहले विचारपुर और सिंदुरी क्षेत्र से की थी। यहां पर सफल होने के बाद उद्यानिकी विभागों के अधिकारियों से सलाह लेने के बाद उन्होंने आज से दस साल पहले उन्होंने ग्राम सिंदुरी और विचारपुर में 10 एकड़ भूमि पर टमाटर के खेती की शुरूआत की।

इस काम को करने के लिए कृषि विभाग के अधिकारियों ने अपनी सलाह के साथ ही ड्रिप एरीकेशन के लिए 5 लाख रुपए भी बैंक के माध्यम से दिए गए। इस खेती को शुरू करने के बाद लगातार पवन मिश्रा को इससे लाभ हुआ है। उनका कहना है कि टमाटर की खेती से बहुत लाभ हो रहा है। जिस कारण उन्होंने बाद में टमाटर के साथ मिर्ची, लौकी, खीरा, बरबटी, आलू, लहसुन और प्याज की खेती शुरू की। उन्होंने बताया कि सब्जियों की खेती करने से उन्हें काफी लाभ हुआ जिसके कारण उन्होने अन्य किसानों को भी समूह बनाकर सब्जी की खेती करने की सलाह दी।

लोगों को दिया रोजगार

टमाटर की खेती से लाभ होने के बाद उमरिया जिले के लगभग 8 किसानों द्वारा मां कंकाली कृषि समूह का निर्माण किया गया साथ ही लगभग 125 एकड़ भूमि पर सब्जी की उन्नत खेती करने की कार्य योजना बनाई। पवन मिश्रा ने बताया कि लगातार सजगता एवं कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के कारण संभाग के ग्राम पंचायत सिंदुरी, विचारपुर और घुनघुटी में सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किए हैं।

सब्जी उत्पादन का वार्षिक टर्नओवर लगभग 3 से 4 करोड़ रुपए है। क्षेत्र के लगभग 200 लोगों को रोजगार मिला है। उन्होंने बताया कि संभाग के टमाटर की बहुत ज्यादा मांग है। सब्जी व्यापारियों के ट्रक खेतों में पहुंचकर सब्जियों का उठाव करते हैं। उन्होंने बताया कि संभाग के अन्य किसान भी सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में आगे आ रहे हैं। इससे सभी को लाभ हो रहा है।

सिर्फ एक केंचुआ एक किसान के बचा देता है 4800 रू,जाने कैसे

केंचुए मिट्टी को नरम बनाते है पोला बनाते है उपजाऊ बनाते हैं केंचुए का कम क्या है ?? ऊपर से नीचे जाना ,नीचे से ऊपर आना पूरे दिनमे तीन चार चक्कर वो ऊपर से नीचे ,नीचे से ऊपर लगा देता है ! अब जब केंचुआ नीचे जाता तो एक रास्ता बनाते हुए जाता है और जब फिर ऊपर आता है तो फिर एक रास्ता बनाते हुए ऊपर आता है ! तो इसका परिणाम ये होता है की ये छोटे छोटे छिद्र जब केंचुआ तैयार कर देता है तो बारिश का पानी एक एक बूंद इन छिद्रो से होते हुए तल मे जमा हो जाता है !

साथ ही अगर एक केंचुआ साल भर जिंदा रहे तो एक वर्ष मे 36 मीट्रिक टन मिट्टी को उल्ट पलटकर देता है और उतनी ही मिट्टी को ट्रैक्टर से उल्ट पलट करना पड़े तो सौ लीटर डीजललग जाता है 100 लीटर डीजल 4800 का है ! मतलब एक केंचुआ एक किसान का 4800 रूपये बचा रहा है ऐसे करोड़ो केंचुए है सोचो कितना लाभ हो रहा है इस देश को !

गोबर खाद डालने से फाइदा क्या होता है ?

रसायनिक खाद डालो केंचुआ मर जाताहै गोबर का खाद डालो केंचुआ ज़िंदा हो जाता है क्योंकि गोबर केंचुए का भोजन है केंचुए को भोजन मिले वह अपनी जन संख्या बढ़ाता है और इतनी तेज बढ़ाता है की कोई नहीं बढ़ा सकता भारत सरकार कहती है हम दो हमारे दो ! केंचुआ नहीं मानता इसको !एक एक केंचुआ 50 50 हजार बच्चे पैदा करके मरता है एक प्रजाति का केंचुआ तो 1 लाख बच्चे पैदा करता है ! तो वो एक ज़िंदा है तो उसने एक लाख पैदा कर दिये अब वो एक एक लाख आगे एक एक लाख पैदा करेंगे करोड़ो केंचुए हो जाएंगे अगर गोबर डालना शुरू किया !!

ज्यादा केंचुआ होंगे तो ज्यादा मिट्टी उलट पलट होगी तो फिर छिद्र भी ज्यादा होंगे तो बारिश का सारा पानी मिट्टी मे धरती मे चला जाएगा ! पानी मिट्टी मे चला गया तो फालतू पानी नदियो मे नहीं जाएगा ,नदियो मे फालतू पानी नहीं गया तो बाढ़ नहीं आएगी तो समुद्र मे फालतू पानी नहीं जाएगा इस देश का करोड़ो करोड़ो रूपये का फाइदा हो जाएगा !! इसलिए आप किसानो को समझाओ की भाई गोबर की खाद डालो एक ग्राम भी उत्पादन कम नहीं हो

दरअसल गोबर जो है वो बहुत तरह केजीव जन्तुओ का भोजन है और यूरिया भोजन नहीं जहर है आपके खेत मे एक जीव होता है जिसे केंचुआ कहते हैं केंचुआ को कभी पकड़ना और उसके ऊपर थोड़ा यूरिया डाल देना आप देखोगे केंचुआ तरफना शुरू हो जाएगा और तुरंत मर जाएगा ! जब हम टनों टन यूरिया खेत मे डालते है करोड़ो केंचुए मार डाले हमने यूरिया डाल डाल के !!

जिस किसान के खेत मे यूरिया डालेगा तो केंचुआ मर जाएगा केंचुआ मर गया तो मिट्टी मे ऊपर नीचे कोई जाएगा नहीं तो मिट्टी कठोर होती जाएगी कड़क होती जाएगी मिट्टी और रोटी के बारे एक बात कही जाती है की इन्हे फेरतेरहो नहीं तो खत्म हो जाती है रोटी को फेरना बंद किया तो जल जाती है मिट्टी को फेरना बंद करो पत्थर जैसी हो जाती है !मिट्टी को फेरने का मतलब समझते है ?? ऊपर की मिट्टी नीचे ! नीचे की ऊपर !ऊपर की नीचे ,नीचे की ऊपर ये केंचुआ ही करता है ! केंचुआ किसान का सबसे बड़ा दोस्त है

ये शख्स नौ वर्षों से छत पर उगा रहा है सब्जिया

पिछले नौ वर्षों से महेंद्र सचान ने बाजार से कोई सब्जी नहीं खरीदी, क्योंकि वो घर की छत पर ही जैविक सब्जियों को उगाकर उसका उपयोग करते है। लखनऊ के मुंशीपुलिया इलाके में रहने वाले महेंद्र ने 600 स्कवायर फीट की छत पर सेम, पालक, लौकी, बैंगन, पत्तागोभी, मूली समेत कई सब्जियां लगा रखी है। महेंद्र बताते हैं, “वर्ष 2008 में मैंने छत पर बागवानी शुरु की थी। पहले कुछ ही सब्जियां थी। धीरे-धीरे मौसम के हिसाब सब्जियां उगाने लगे। आज हम 20 वैराइटी की सब्जियां उगा रहे हैं।”

किचन के वेस्ट मटेरियल से तैयार करते है खाद।

महेंद्र की छत पर लगी सब्जियों में कोई मंहगी चीज़ों का प्रयोग नहीं हुआ है। डिब्बें, टोकरियों बड़े गमलों में उन्होंने सब्जियों को लगा रखा है। छत पर बागवानी के फायदे के बारे में महेंद्र बताते हैं, “आजकल बाजारों में जैविक सब्जियों के दाम दिन पर दिन बढ़ते जा रहे है। घर में सब्जियां उगाने से पैसे की तो बचत होती है साथ ही शुद् सब्जी मिलती है।”

महेंद्र ने अपनी छत पर बैंगन, पत्तागोभी, मूलीसमेत कई सब्जियां लगा रखी है।महेंद्र ने अपनी छत पर बैंगन, पत्तागोभी, मूलीसमेत कई सब्जियां लगा रखी है।

खेतों में सब्जियों की पैदावार में किए जाने वाले रासायनिक खाद और कीटनाशकों के प्रयोग से कई तरह की बीमरियां हो रही है। ऐसे में किचन गार्डन का चलन बढ़ है। कई लोग ऐसे है जो घर पर ही जैविक सब्जियां उगा रहे हैं और खुद की जरुरते पूरी कर रहे हैं। इसके लिए अब कई ऐसी कंपनी भी आ गई जो घर-घर जाकर पूरा सेटअप करती है।

दिन प्रतिदिन बढ़ रही मंहगाई को देखते हुए घर की छतों पर लोग सब्जियां उगाने में रुचि लेने लगे हैं। घर-घर में किचन गार्डन, हर्बल गार्डन व और्नामेंटल गार्डन को सेटअप करने के लिए काम कर रही वेगे फ्लोरा इंटरनेशनल कंपनी के सलाहकार एच. के प्रसाद बताते हैं, “लखनऊ शहर में मैंने अभी तक 45 घरों में किचन गार्डन हर्बल गार्डन व और्नामेंटल गार्डन को सेटअप किया है। साथ ही छतों पर बागवानी कैसे की जाए इसकी पूरी जानकारी दी जाती है।”

अपनी बात को जारी रखते हुए प्रसाद आगे बताते हैं, “जहां-जहां कृषि मेला लगता है। हम वहां-वहां अपना स्टॉल लगाते है। अभी हमारे पास सब्जियों और फलों की 100 तरह की वैराइटी हमारे पास है। शहरी लोग इसको लगातार अपना रहे हैं।

आप भी शुरू कर सकते हैं छत पर बागवानी

  • घर के पिछले हिस्से में ऐसी जगह का चुनाव करें जहां सूरज की रोशनी पहुंचती हो। क्योंकि सूरज की रोशनी से ही पौधे का विकास संभव है। पौधों को रोज 5-6 घंटे सूरज की रोशनी मिलना बहुत जरूरी होता है। इसलिए अपना गार्डन छांव वाले जगह पर न बनाएं।
  • यह जान ले कि किचन गार्डन की मिट्टी में पानी की पर्याप्त मात्रा है। साथ ही नियमित रूप से पानी निकास की भी व्यवस्था है क्योंकि बहुत ज्यादा या बहुत कम पानी पौधों के लिए नुकसानदायक होता है।
  • मिट्टी को अच्छे से तैयार कर लें। मिट्टी में अगर पत्थर हो तो उसे हटा लें। साथ ही मिट्टी में खाद आदि भी मिलाएं।
  • ऐसे फलों और सब्जियों का चुनाव करें जिसे आप सबसे पहले उगाना चाहते हैं। पौधे का चुनाव करते समय मिट्टी, जलवायु और उनके प्रतिदिन की जरूरतों का ध्यान जरूर रखें।
  • पौधो को देखते हुए ही गार्डन तैयार करे। इसे आपके गार्डन का रखरखाव भी आसान होगा और गार्डन व्यवस्थित दिखेगा।
  • आपके पौधों को शुरुआती दौर में बहुत अधिक पालन-पोषण की जरूरत पड़ेगी। आपको पौधे के अनुसार ही उन्हें पोषक तत्व देना चाहिए।
  • पौधों को नियमित पानी देना बेहद जरूरी है। खासकर पौधा जब छोटा होता है तो उसे पानी की की खास जरूरत होती है, क्योंकि उनकी जड़ें इतनी गहरी नहीं होती है कि मिट्टी से पानी सोख सकें।

3 महीने में 1.5 लाख की कमाई कराएगी इस प्‍लांट की खेती

बिजनेस करने के लिए आप अगर किसी आइडिया की तलाश में है तो मेडिसिनल प्‍लांट फार्मिंग से जुड़ा बिजनेस भी आपके लिए अच्‍छा मौका हो सकता है। इन्‍हीं में से एक है इसबगोल खेती और इससे जुड़ा बिजनेस।

इसमें आप शुरुआत में 10 से 15 हजार रुपए इन्‍वेस्‍टमेंट करने पर आप केवल तीन महीने 1.5 लाख रुपए तक कमा सकते हैं। इसके लिए आपके पास एक हेक्टेयर जमीन होना जरूरी है। यदि आप ज्‍यादा खेती कर सकते हैं या प्रोसेसिंग कर सकते हैं तो इतनी ही खेती पर करीब 2.5 लाख रुपए कमा सकते हैं।

80 फीसदी बाजार पर है भारत का कब्‍जा ईसबगोल एक मेडिसिनल प्‍लांट है। इसके बीज तमाम तरह की आयुर्वेदिक और एलोपैथिक दवाओं में इस्‍तमाल होता है। विश्‍व के कुल उत्‍पादन का लगभग 80 फीसदी सिर्फ भारत में ही पैदा होता है।

इसकी खेती शुरूआत में राजस्‍थान और गुजरात में होती थी। लेकिन, अब उत्‍तर भारत के राज्‍यों हरियाणा, उत्‍तर प्रदेश, पंजाब और उत्‍तराखंड में ही यह बड़ी मात्रा में पैदा किया जाता है। भारत में करीब 3 तरह की ईसबगोल पैदा की जाती है। हरियाणा -2 किस्‍म की फसल 100 से 115 दिनों के भीतर पक कर तैयार हो जाती है। इसके बाद इसे काटकर इसके बीजों को बाजार में बेचा जाता है।

2.5 लाख रुपए तक की हो जाती है उपज

यदि एक हेक्‍टेयर में खेती के आधार पर गणना करें तो एक हेक्‍टेयर से लगभग 15 क्विंटल बीज उत्‍पादित होते हैं। उंझा मंडी में ताजा दामों को लें तो इस वक्‍त लगभग 10700 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है। इस लिहाज से केवल बीज ही 160500 रुपए के हो जाते हैं। सर्दियों में प्राइस बढ़ने पर यह आमदनी और अधिक हो सकती है। प्रोसेसिंग के बाद बढ़ जाता है फायदा। ईसबगोल के बीज को प्रोसेस कराने पर और ज्‍यादा फायदा हो सकता है।

दरअलस, प्रोसेस के बाद इसके बीज में लगभग 30 फीसदी भूसी निकलती है और यही भूसी इसका सबसे महंगा हिस्‍सा है। भारतीय बाजार में भूसी का थोक भाव 25 हजार रुपए प्रति क्विंटल है। यानी एक हेक्‍टेयर में उत्‍पादित फसल की भू‍सी का दाम 1.25 लाख रुपए बैठता है। इसके अलावा इसमें अन्‍य खली, गोली आदि बचती है जो करीब डेढ़ लाख रुपए की बिक जाती है।