ये है 6 लाख की गाय लक्ष्मी, हर रोज देती है 60 लीटर दूध

भारत दूध उत्पादन में विश्व में दूसरे नंबर पर है। यह इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि लोग डेयरी उद्योग में लगातार प्रयासरत हैं। इसी तरह का एक उदाहरण हरियाणा के करनाल जिले के दादुपुर गांव का है।

यहां एक नेशनल अवार्डी गाय एक दिन में 60 लीटर दूध देती है। औसत निकाला जाए तो हर घंटे में लगभग ढाई लीटर दूध दे रही है।

ब्यूटी में है चैंपियन का जीत चुकी है खिताब

डेयरी चला रहे राजबीर आर्य बताते हैं कि होल्सटीन फ्रिसन नस्ल की इस गाय का नाम लक्ष्मी है। लक्ष्मी दूध देने में तो अव्वल है ही लेकिन इसने अपनी ब्यूटी के लिए भी राष्ट्रीय स्तर के पशु मेलों में इनाम जीते हैं। मुक्तसर पंजाब व राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में ब्यूटी चैंपियन रह चुकी है।

ये है खुराक

लक्ष्मी हर रोज 50 किलोग्राम हरा चारा, 2 किलोग्राम सूखा तूड़ा और 14 किलो दाना खाती है। लक्ष्मी व अन्य पशुओं की देखभाल में 6 आदमी दिन-रात लगे रहते हैं। लक्ष्मी का जन्म राजबीर के घर ही हुआ था, जबकि इसकी मां को वे पंजाब से लेकर आए थे।

5 लाख कीमत लगने पर लक्ष्मी को बेचने को तैयार नहीं है राजबीर

राजबीर बताते हैं कि जनवरी के महीने में बैंगलुरू से गाय खरीदने के लिए उसके फार्म पर लोग आए थे। उन्होंने इसकी कीमत 5 लाख रुपए लगाई थी। इस कीमत पर भी राजबीर ने गाय को नहीं बेचा।

डेयरी उद्योग के 15 लाख रुपए सालाना कमा रहे हैं राजबीर

डेढ़ एकड़ भूमि पर बने राजबीर के फार्म पर फिलहाल 75 गाय हैं। जिनमें से 60 होल्सटीन फ्रिसन, 10 जर्सी और 5 साहिवाल नस्ल की है। इस मौसम में हर रोज 800 लीटर दूध उत्पादन हो रहा है।

जिसमें से कुछ शहर में बेचने जाते हैं, बाकी को अमूल डेयरी भेजा जाता है। वे पिछले 18 वर्ष से डेयरी उद्योग से जुड़े हुए हैं। 1998 में मात्र 5 गाय से शुरूआत की थी। अब वे 15 लाख रुपए सालाना कमा रहे हैं।

जाने दूध में घी(फैट) बढाने का पक्का फार्मूला

गाय या भैंस के दूध की कीमत उसमें पाए जाने वाले घी की मात्रा पर निर्भर करती है। यदि घी अधिक तो दाम चोखा और घी कम तो दाम भी खोटा। ऐसे में पशुपालक अपने दुधारू पशु को हरे चारे और सूखे चारे का संतुलित आहार देकर दूध में घी की मात्रा को बढ़ा सकते हैं।

यूं तो हर पशु के दूध में घी की मात्रा निश्चित होती है। भैंस में 06 से 10 फीसदी और देशी गाय के दूध में 04 से 05 प्रतिशत फैट (वसा) होता है। होलस्टन फ्रीजियन संकर नस्ल की गाय में 3.5 प्रतिशत और जर्सी गाय में 4.2 प्रतिशत फैट होता है।

जाड़े के दिनों में पशु में दूध तो बढ़ जाता है, लेकिन दूध में घी की मात्रा कुछ कम हो जाती है। इसके विपरीत गर्मियों में दूध कुछ कम हो जाता है, पर उसमें घी बढ़ जाता है। पशु विशेषज्ञों को मानना है कि यदि पशुपालक थोड़ी से जागरूकता दिखाएं और कुछ सावधानियां बरतें तो दूध में घी की मात्रा बढ़ायी जा सकती है।


इसमें प्रमुख है पशु को दिया जाने वाला आहार। पशुपालक सोचते हैं कि हरा चारा खिलाने से दूध और उसमें घी की मात्रा बढ़ती है, लेकिन ऐसा नहीं है। हरे चारे से दूध तो बढ़ता है, लेकिन उसमें चर्बी कम हो जाती है।

इसके विपरीत यदि सूखा चारा/ भूसा खिलाया जाए तो दूध की मात्रा घट जाती है। इसलिए दुधारू जानवर को 60 फीसदी हरा चारा और 40 फीसदी सूखा चारा खिलाना चाहिए। इतना ही नहीं, पशु आहार में यकायक बदलाव नहीं करना चाहिए। दूध दोहन के समय भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पूरा दूध निकाल लिया जाए।

बछड़ा/ पड़ा को आखिरी का दूध न पिलाएं, क्योंकि घी की मात्रा आखिरी दूध में सर्वाधिक होती है। दूध और घी की अच्छी मात्रा के लिए बुंदेलखंड के वातावरण में भदावरी प्रजाति की भैंस सर्वाधिक अच्छी मानी गई है। इसके अलावा सुरती प्रजाति का भी पालन किया जा सकता है।

ईरान ने बासमती के निर्यात से प्रतिबंध हटाया,कीमतों में आया जबरदस्त उछाल

बासमती की कीमत पिछले एक सप्ताह में लगभग चार प्रतिशत बढ़ी है। सकारात्मक खबर के कारण इसकी कीमतों में लगातार तेजी आ रही है। बासमती चावल की कीमत सप्ताहभर पहले 7500 (प्रति कुंटल) रुपए के आसपास थी, वो अब 7850 तक पहुंच गयी है।

बासमती को लेकर सकारात्मक खबर ये है कि ईरान इसके निर्यात से प्रतिबंध हटा लिया है। इससे व्यापारियाें आैर कुछ हद तक किसानों को भी लाभ मिलेगा। साथ में अगले के लिए भी किसानो को बासमती का अच्छा दाम मिलने की उम्मीद बढ़ गई है ।

भारतीय बासमती चावल के सबसे बड़े खरीददार ईरान ने इस पर लगाया बैन हटा लिया है। पिछले लगभग पांच माह से ईरान ने भारत से बासमती चावल खरीदने पर प्रतिबंध लगाया हुआ था। प्रतिबंध हटने से भारतीय घरेलू बाजार में बासमती चावल के दाम में बढोतरी होने की संभावना है।

भारत बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक

दुनिया के 70 प्रतिशत बासमती चावल की उपज भारत में ही होती है। भारत के बाद पाकिस्तान का नंबर आता है। भारत ही यूरोपीय संघ और शेष विश्व में बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है। जिसमें प्रमुख रूप से सउदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इराक और कुवैत में बड़ी मात्रा में बासमती चावल गया था।

ईरान ने बासमती से प्रतिबंध हटाने की सैद्धांतिक सहमति आठ जनवरी को ही कर दी थी। अभी तक इस बारे में नोटिफिकेशन जारी नहीं किया गया है। एक्सपोर्टर्स और कंपनियों के पास ईरान से पूछताछ आने लगी हैं। कुछे ने तो कॉन्ट्रैक्ट साइन करना भी शुरू कर दिया है।

ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स के प्रेसिडेंट मोहिंदर पाल जिंदल ने कहा “ईरान से भारत के किसानों के लिए अच्छी खबर आयी है। हालांकि अभी ईरान की तरफ से इंडियन चावल के इंपोर्ट की इजाजत देने वाला नोटिफिकेशन नहीं आया है, लेकिन ये आने वाला है। क्योंकि हमारे पास आॅर्डर आ रहे हैं। ये कारोबारियों और एक्सपोर्टर्स के लिए अच्छी खबर है। मार्केट में बासमती चावल की मांग अब बढ़ेगी।”

ईरान में हर साल तीन मिलियन टन चावल की खपत है, जबकि उसका घरेलू उत्पादन 2.2 मिलियन टन है। कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक ईरान हर साल 10 लाख टन बासमती चावल का आयात (इंपोर्ट) करता है। इसमें से करीब 7 लाख टन बासमती चावल का आयात भारत से होता है। ऑयल इंडिया चावल एसोसिएशन के अध्यक्ष एमपी जिंदल बताते हैं “यह प्रतिबंध अस्थायी होता है। प्रतिबंध लगने सेचावल की कीमतों पर दबाव जरूर बढ़ता है।

हर साल जब फसल बाजार में आने वाली होती है तो ईरान अपने किसानों के फायदे के लिए इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ा देता है और आयात पर बैन लगा देता है। ईरान हर वर्ष इंपोर्ट डयूटी 40-50 फीसदी कर देता है। पिछले साल आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था। अब प्रतिबंध हटने से किसानों को फायदा होगा और बासमती की कीमतों में तेजी आयेगी।

इस किसान ने बिना खर्च किये खोजा अनोखा फार्मूला

15 साल पहले जिस जमीन को बंजर समझा गया, उस जमीन पर एक किसान ने जैविक खेती करके ढाई किलो वजन वाली मौसम्बी पैदा की। यही नहीं किसान ने मेहनत करके जमीन को इस लायक कर दिया, जहां पर अब 20 किलो को कटहल और सवा किलो वजन वाला आम हो रहा है।

उनका प्रयोग रुका नहीं है, बल्कि वे एक ही पेड़ में नींबू, संतरा और मौसम्बी लगाने की कोशिश कर रहे हैं। अब उन्हें एग्रीकल्चर कॉलेज में हॉर्टीकल्चर पर लेक्चर देने के लिए बुलाते हैं।

  • ये किसान हैं प्राण सिंह। ग्वालियर से 25 किमी दूर जहानपुर गांव। आसपास खेत हैं, लेकिन ज्यादातर खेत बंजर पड़े हैं। केवल प्राण सिंह अपने खेत और बगीचे में काम करते नजर आते हैं।
  • वे बताते हैं कि 15 साल पहले जमीन की उर्वरा शक्ति खत्म हो गई, क्योंकि किसानों ने जमकर यूरिया और केमिकल का इस्तेमाल किया। उसके बाद यहां के ज्यादातर किसान ने फसल लगाना बंद कर दी।
  • प्राण सिंह पीछे हटने को तैयार नहीं थे। उन्होंने खुद ही खेत में मेहनत करना शुरू की। यूरिया और केमिकल का उपयोग बंद किया। खेत के आसपास 3 तालाब बनाए, जिसमें बारिश का पानी एकत्र किया।

बंजर जमीन को बनाया उपजाऊ

  • इससे जमीन का वाटर लेबल सही हुआ। फिर उन्होंने गोबर, घास-फूस की खाद का इस्तेमाल किया। वर्मी कंपोस्ट की ट्रेनिंग ली। इसके बाद खेत की उर्वरा शक्ति वापस लौट आई।
  • उन्होंने खेत में नींबू, संतरा और मौसम्बी के पौधे लगाए। इस साइट्रस वैरायटी के पौधों के साथ कई प्रयोग प्राण सिंह ने किए। इसका नतीजा यह निकला कि उनके पेड़ में मौसम्बी का वजन ढाई किलो तक पहुंच गया।

कई नयी वैरायटी विकसित की प्राण सिंह ने

  • यही नहीं उन्होंने कटहल, अमरूद सहित कई पौधों की ग्राफटिंग की, जिससे नयी वैरायटी विकसित हुई। प्राण सिंह बताते हैं कि यह सब प्राकृतिक तरीके से खेती करने का नतीजा है।
  • केमिकल और दूसरी रसायनिक खादों से जमीन और फसल को नुकसान होता है। प्राण सिंह अब कोशिश कर रहे हैं कि एक ही पेड़ में नींबू, संतरा और मौसम्बी की फल लगें। उनके मुताबिक यह संभव है, क्योंकि ये तीनों एक प्रजाति के फल हैं।
  • प्राण सिंह की मेहनत देखकर आसपास बंजर खेतों वाले किसान भी अपनी जमीन में वापस खेती करने के लिए लौट रहे हैं। अब तो एग्रीकल्चर कॉलेज के साथ कृषि विभाग के अफसर प्राण सिंह को जैविक खेती की टिप्स देने के लिए बुलाते हैं।

पंजाब के किसान ने शुरू की ‘ड्रैगन फ्रूट’ की खेती , एक बार की मेहनत-कमाई 15 साल तक

गुजरात के कच्छ जिले में होने वाला ड्रैगन फ्रूट अब प्रदेश के किसानों के लिए आय का अच्छा जरिया बन गया है। बरनाला के गांव ठुल्लेवाल के किसान हरबंत सिंह इसकी खेती से खूब मुनाफा कमा रहे हैं। अब वह दूसरे किसानों को भी इसकी खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

बड़ी बात यह है कि इसकी कलमें एक बार लगाने पर यह 15 साल तक फल देती हैं। यानी एक बार बिजाई के बाद 15 साल कमाई ही कमाई। इसके साथ ही इसे पानी खड़ा होने वाली जमीन के अलावा किसी भी किस्म की मिट्‌टी में लगाया जा सकता है। ड्रैगन फ्रूट की खेती में पानी की भी नाममात्र जरूरत रहती है।

गर्मी के सीजन में 10 दिन में एक बार और सर्दियों में एक महीने में एक बार सिंचाई की आवश्यकता रहती है। किसान इस फ्रूट के साथ धान को छोड़कर कोई भी फसल लगाकर कमाई दोगुनी कर सकते हैं। एक किला जमीन में इसकी 1600 कलमें लगती हैं।

15 साल तक इसमें फ्रूट लगेगा जो तीसरे साल से भरपूर उत्पादन देने लगेगा। मेहनत के बल पर एक एकड़ से 50 क्विंटल फल हो सकते हैं जिसे बेचकर पांच लाख रुपए कमाए जा सकते हैं। अन्य कोई फसल इतनी कमाई नहीं दे पाती।

ड्रैगन फ्रूट के यह फायदे:

सिविल अस्पताल बरनाला के डॉक्टर मनप्रीत सिद्धू ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट शरीर में एंटीऑक्सीडेंट का काम करता है। शरीर में खून, चर्बी, दिल व चमडी में हर तरह की समस्या ऑक्सीडेंट से पैदा होती है। ड्रैगन फ्रूट खून को साफ करने, शरीर की फालतू चर्बी को रिमूव करने, प्लेटनेट सेंल बढाने आदि का काम करता है।

कब लगाएं :

हरबंत सिंह ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट की कलम को दो महीने तक गमले में तैयार की जाती है। अप्रैल से लेकर सिंतबर तक इसे किसी भी समय लगाया जा सकता है। गर्मियां इसके लिए अनुकूल समय है।

अब…दो एकड़ में कलमें लगाने की तैयारी

डेढ़ साल पहले की बात है। मैंने सोशल मीडिया पर ड्रैगन फ्रूट के बारे जाना और कच्छ (गुजरात) से 400 पौधे ले आया। इसकी खेती की जानकारी नहीं थी, लेकिन रिस्क लेकर एक पौधे की 70 रुपए कीमत चुकाई। 28 हजार रुपए खर्च करके 400 पौधे लेकर आया और दो कनाल में इन्हें लगाया।

पहले साल 58 हजार रुपए खर्च करके एक साल तक इन्हें पाला। इससे मुझे 40 हजार के फल प्राप्त हुए। इसके अलावा मैनें करीब 50-60 कलमें भी बेचीं। सफल प्रयोग के बाद अब मैं खुश हूं तथा दो एकड़ में कलमें लगाने की तैयारी कर रहा हूं।’ -हरबंत सिंह, किसान

किसान ने 20 किलो खाद से काम शुरू कर खड़ा किया करोड़ों रुपए का कारोबार

किसान ज्ञासी अहिरवार ने 20 किलो केंचुए से खाद बनाने का कारोबार शुरू किया था, आज इनके पास 50 टन खाद बनकर तैयार है जिसकी कीमत लाखों रुपए है। केंचुआ खाद, वर्मी कम्पोस्ट बनाने के साथ ही ये 20 एकड़ खेत में जैविक ढंग से खेती करते हैं।

इनकी खाद और जैविक सब्जियों की मांग दूसरे जिलों में रहती है जिससे इन्हें अच्छा मुनाफा मिलता है। बुन्देलखण्ड का जैविक खाद का ये सबसे बड़ा प्लांट है, एक साधारण किसान ने जैविक खाद बनाकर करोड़ों का कारोबार खड़ा कर दिया, इनके जज्बे को बुंदेलखंड सलाम करता है।

ललितपुर जिला मुख्यालय से 17 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में आलापुर गांव में मेन रोड पर अम्बेडकर बायो फर्टिलाइजर के नाम से ज्ञासी अहिरवार का कई एकड़ में प्लांट लगा है। एक साधारण किसान ज्ञासी अहिरवार (59 वर्ष) जैविक खाद का कारोबार शुरू करने को लेकर अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं,

“लोगों से जैविक खाद बनाने के बारे में अकसर सुना करता था, मै पढ़ा लिखा नहीं था इसलिए नौकरी की उम्मीद तो बिल्कुल नहीं थी, खेती में ज्यादा पैदा नहीं होता था, केचुआ और वर्मी कम्पोस्ट खाद का कई जगह प्रशिक्षण लिया।” देखिए वीडियो

इस कारोबार को शुरू करने के लिए इनके पास रूपए नहीं थे इनका कहना है, “बैंक से 10 लाख लोन लेकर 12 साल पहले 20 किलो केंचुआ से शुरुआत की थी, शुरुआत में कुछ संस्थाओं ने तीन लाख की खाद खरीद ली, इससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ा तबसे लगातार इसका कारोबार कर रहे हैं, आज हमारे पास पांच करोड़ की खाद इकट्ठा है।”

इनके पास जैविक खाद की मांग मध्यप्रदेश के 14 जनपदों से आती है। अपनी बीस एकड़ खेती में ज्ञासी पुराने अनाज और सब्जियों की खेती जैविक ढंग से करते हैं। दिल्ली और देहरादून में इनकी सब्जियां और देशी अनाज जाते है जिनका इन्हें अच्छा मुनाफा मिलता है।

ज्ञासी अहिरवार पढ़े-लिखे भले ही न हो पर जैविक खाद बनाने को लेकर उनके अनुभव की चर्चा पूरे बुंदेलखंड में है। इनके जज्बे को सरकारी विभाग से लेकर किसान तक सभी सलाम करते हैं। ये इटली, जर्मनी जैसे कई देशों में अपना अनुभव साझा करने के लिए जा चुके हैं।

ज्ञासी अहिरवार का कहना है, “पुराने अनाज कोदो, कुटकी, ज्वार जैसे कई अनाज जो विलुप्त हो चुके हैं उनको पुन: बचाने का प्रयास है, अपनी बीस एकड़ जमीन में सिर्फ देशी अनाज और सब्जियां उगाते हैं।” वो आगे बताते हैं, “बीज, खाद, कीटनाशक दवाइयां कुछ भी बाजार से नहीं खरीदते हैं,

एक किलो केचुआ 610 रुपए किलो में बिकता है, वर्मी कम्पोस्ट के एक किलो के पैकिट 15-20 रुपए में बिक्री हो जाती है, कृषि विभाग से लेकर गैर सरकारी संस्थाएं इन पैकिटों को खरीदती हैं।” गमलों से लेकर अपने किचेन में इस जैविक खाद का लोग प्रयोग करते हैं।

जैविक खाद बनाने से लेकर जैविक खेती करने के अलावा ज्ञासी अहिरवार किसानो को हर महीने की 15 तारीख को नि:शुल्क प्रशिक्षण भी देते हैं। ज्ञासी ने पिछले साल लगभग 50 लाख का कारोबार किया था।

जिन किसानों को इनसे सलाह लेनी होती है वो कभी भी आकर सलाह ले सकते हैं। ज्ञासी अहिरवार इसकी बिक्री कैसे करते हैं इस पर उनका कहना है, “हमे बहार से मांग आती है जो एक बार खाद ले जाता है वो दूसरों को बताते हैं, एक दूसरे से जान पहचान बढ़ी है, 50 टन जो माल रखा है

उसका भाव अभी सही नहीं मिल रहा है जैसे ही भाव मिलेगा इसकी बिक्री कर देंगे, 45दिन में जैविक खाद बनकर तैयार हो जाती है।” जैविक खाद बनाने से लेकर जैविक खेती तक अगर कोई 15 दिन लगातार ट्रेनिंग लेना चाहता है तो उसे 500 रुपए जमा करने होंगे उसे प्रमाणपत्र भी दिया जाएगा।

ज्ञासी अहिरवार की मेहनत और कारोबार की कहानी का देखिए वीडियो

किसान ने जुगाड़ लगाकर देशी हल को ऐसे बना दिया आधुनिक सीड ड्रिल मशीन

बढ़ईगिरी का काम करने वाले 60 वर्षीय गंगा शंकर के पास खुद एक इंच भी जमीन नहीं है, दूसरे के खेत बटाई पर ले कर खेती करते हैं और उनके खेतों में हमेशा नए-नए प्रयोग करते रहते हैं। उन्हीं प्रयोगों का नतीजा है कि उन्होंने कबाड़ में पड़े साइकिल के पहिए और फ्रीव्हील को देशी हल में जोड़कर आधुनिक सीड ड्रिल मशीन में तब्दील कर दिया।

उत्तेर प्रदेश के रायबरेली जिले के बछरावां ब्लॉक से नौ किलोमीटर पश्चिम में एक छोटे से गाँव कुसेली खेड़ा में रहने वाले गंगा शंकर काका इन दिनों क्षेत्रीय ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। शंकर काका बताते हैं, “हमारा पुश्तैनी काम बढ़ई का है,

लेकिन मुझे बचपन से ही खेती किसानी का शौक रहा है। खेती किसानी में रुचि के कारण मैं हमेशा किसान गोष्ठियों में जाया करता हूं। वहीं पर मुझे पता चला की फसल वैज्ञानिक पद्धति से क्रमबद्ध तरीके से बुवाई की जाए तो खाद बीज की लागत कम होगी और फसल की उपज भी बढ़ेगी।

” वह आगे बताते हैं, “मुझे क्रमबद्ध तरीके से फसल की बुवाई करनी थी और उसके लिए सीड ड्रिल मशीन चाहिए थी। पर मशीन खरीदने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे और अगर मशीन खरीद भी ले तो उसे चलाने के लिए ट्रैक्टर कहां से लाऊंगा। इसी उधेड़-बुन में मुझे रात भर ठीक से नींद नहीं आई।

सुबह उठा और मायूस मन से अपने बैलों को चारा पानी देने लगा कि अचानक मेरी निगाहें पास में ही रखे हल पर पड़ी। मुझे मेरे हल में ही सीड ड्रिल मशीन दिखने लगी। मैंने फैसला किया कि मैं अपने देशी हल को आधुनिक सीड ड्रिल मशीन में बदल कर रहूंगा।

” मेरे पास एक फ़र वाला हल था जिस पर मैंने अपना पहला प्रयोग किया। प्रयोग के लिए मैंने कबाड़े में पड़ी साइकिल का पहिया और फ्रीवील निकाली और आटा चक्की पर गेहूं भरने वाले बॉक्स की तरह लकड़ी का एक छोटा सा बॉक्स बनाया।

कुछ महीनों के बाद मेरी देसी सीड ड्रिल मशीन तैयार हो गई और मैंने उसे परखने के लिए खेत में उतारा। पर कुछ समय बाद मुझे महसूस होने लगा कि यह मशीन अभी सही नहीं है। क्योंकि इसमें समय, बीज और मजदूरों की लागत ज्यादा आ रही थी। जिससे मैं संतुष्ट नहीं था।

पहले प्रयोग से संतुष्टि ना मिल पाने के बाद मैंने फैसला किया कि अगर फ़रो की संख्या बढ़ा दी जाए तो समय और मजदूरी दोनों की बचत होगी। मैं बाजार गया और तीन फ़र वाला हल खरीद कर लाया। उसके बाद सब कुछ वैसे ही करना था बस फ्रिवील की संख्या और बॉक्स का आकार बढ़ाना था।

लगभग एक वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद मेरी तीन फ़र वाली सीड ड्रिल मशीन तैयार हो गई। जिसे मैंने अपने ट्रैक्टर रुपी बैलों पर खेत में उतारा। नतीजा संतुष्टि जनक मिला।

अमेरिका में प्‍याज की खेती : न पौध लगाने का झंझट, न खुदाई का चक्‍कर

प्‍याज दुनिया भर में खाया और बोया जाता है। हमारे यहां प्‍याज की खेती को काफी मेहनत की खेती माना जाता है क्‍योंकि इसमें काफी शारीरिक श्रम लगता है।

भारत में प्‍याज की पौध तैयार करने, रोपाई करने, निराई गुड़ाई करने, प्‍याज को उखाड़ने और उसकी छंटाई करने का काम किसान को हाथ से करना होता है। लेकिन अमेरिका में ये सब काम मशीनों से होता है।

190 देशों में उगाया जाता है प्‍याज

विश्‍व के 190 देशों में प्‍याज की खेती होती है। हर साल करीब 9 करोड़ 20 लाख एकड़ जमीन पर प्‍याज उगाया जाता है। अमेरिका में भी हर साल करीब सवा लाख एकड़ भूमि पर प्‍याज की खेती की जाती है। अमेरिका के बीस राज्‍यों में प्‍याज उगाया जाता है। विश्‍व के कुल प्‍याज उत्‍पादन का करीब 4 फीसदी प्‍याज अमेरिका पैदा करता है।

अमेरिका में बीज से ही सीधे प्‍याज पैदा किया जाता है। पहले पौध तैयार करके फिर उसकी रोपाई खेत में बहुत कम ही किसान करते हैं। ज्‍यादातर किसान बीज से सीधे बिजाई करते हैं। प्‍याज को बेड पर बोया जाता है। कुछ किसान नालियों से सिंचाई करते हैं तो कुछ टपका सिंचाई विधि का उपयोग करते हैं।

इस वीडियो में जानिए आप अमेरिका में प्‍याज की खेती 

https://youtu.be/q7Y42IdEhgw

1121 बासमती में तेज़ी का दौर जारी,यह चल रहे है भाव

लगता है अब बासमती के भाव 4000 रुपए क्विंटल पर ही जाकर दम लेंगे। पिछले तीन दिनों में बासमती 1121 के धान 150 रुपए तक चढ चुके हैं। शनिवार को हरियाणा की मंडियों में बासमती धान का ऊपर में भाव 3500 रुपए था जो कि आज बुधवार को 3650 रुपए हो चुका है।

डीपी के भाव भी 100 रुपए चढ़ चुके हैं। पीबी 1 भी पीछे नहीं है। शनिवार को इसका भाव जहां 3000 था वहीं बुधवार को हरियाणा की अधिकतर मंडियों में इसका भाव 3150 रुपए रहा।

हरियाणा बासमती धान भाव, 

बुधवार को टोहाना मंडी में बासमती 1121 3651, पीबी 1 3150, पूसा 1509 3300 और डीपी 1401 3425 रुपए क्विंटल बिका। निशिंग मंडी में बासमती 1121 3600, पूसा 1509 3300, सुगंध 2850, पीबी 1 3050 और बासमती 3700 रुपए क्विंटल बिका। तरावड़ी मंडी में बासमती 3690 और बासमती 1121 3600 रुपए बिका।

कैथल मंडी में आज बासमती 1121 का भाव ऊपर में 3650 रुपए रहा। चीका मंडी में बुधवार को बासमती 1121 धान के रेट 3700 रुपए तक लग गए। यहां आम भाव 3675 रुपए रहा। हांसी मंडी में बासमती 1121 3650, नरवाना में 3671, बरवाला में 3641 और उकलाना में 3650 रुपए क्विंटल का कारोबार रहा।

फतेहाबाद में बासमती 1121 3600, डीपी 1401 3438 और पीबी 1 3182 रुपए बिका। उचाना मंडी में बासमती 1121 का आज भाव 3631 रुपए रहा। उकलाना मंडी में बासमती 1121 3375 से 3630, डीपी 1401 3350 और पीबी 1 3100 रुपए बिका। सिरसा में डीपी 1401 3379 पीबी 1 3110 और 1121 3543 रुपए क्विंटल बिका।

रानियां मंडी में डीपी 1401 3420 रुपए बिका। जींद मंडी में बासमती 1121 3611 रुपए तक बिका। हांसी में 1509 3400 रुपए बिका। कुरुक्षेत्र में बासमती का रेट 3661 रुपए रहा। रतिया मंडी में पीबी 1 3141 और डीपी 1401 3447 रुपए बिका।

पंजाब बासमती धान भाव, 

पंजाब के अमृतसर में बुधवार को बासमती 1121 3490 रुपए बिका। मंडी कोटकपूरा में बासमती 1121 3480 रुपए बिका। यहां पर अब अन्‍य धान की आवक लगभग समाप्‍त हो चुकी है। फरीदकोट में बासमती 1121 का रेट 3490 रुपए रहा।

तरनतारन मंडी में करीब 17 हजार बोरी आवक हुई। यहां कंबाइन से निकाले 1121 धान का भाव 3425 तक और हाथ वाले धन का भाव 3565 रुपए तक रहा। पूसा 1509 3150 रुपए तक बिका। गिद्दड़बाहा में डीपी 1401 कंबाइन से निकाले मीडियम क्‍वालिटी धान का रेट 3200 रुपए रहा।

कोटा, बूंदी और डबरा बासमती धान भाव, 

राजस्‍थान की बूंदी मंडी में पूसा 1121 3525, पूसा 1509 3285, और सुगंध 2850 रुपए बिका। कोटा मंडी में करीब 28000 बोरी धान की आवक बुधवार को हुई। यहां पर पूसा 1121 3483, पूसा 1509 3200, सुगंध 2865 और डीपी 2990 रुपए तक बिका। मध्‍यप्रदेश की डबरा मंडी में पूसा 1121 3500, पूसा 1509 3050, सुगंध 2675 रुपए बिका।

यूपी बासमती धान भाव, 

अलीगढ़ मंडी में पूसा 1121 ऊपर में 3481, सुगंध 2776 और पूसा 1509 3125 रुपए तक बिक गया। यूपी के बुलंदशहर में पूसा 1121 3450, सुगंध 2800 और पूसा 1509 3150 रुपए बिका। मैनपुरी में पूसा 1121 3101, सुगंध 2400, पूसा 1509 2800 हाइब्रिड 1360 रुपए क्विंटल बिका। बबई मंडी में पूसा 1121 3270 तक और पूसा 2780 रुपए तक बिका।

जाने कैसे काम करता है ड्रिप सिंचाई सिस्टम ,और किसानो के लिए क्यों जरूरी है

किसानों को ड्रिप सिंचाई को क्यों अपनाना चाहिए

ड्रिप सिंचाई व्यवस्था सिंचाई की एक उन्नत तकनीक है जो पानी की बचत करता है । इस विधि में पानी बूंद-बूंद करके पौधे या पेड़ की जड़ में सीधा पहुँचाया जाता है जिससे पौधे की जड़े पानी को धीरे-धीरे सोखते रहते है।इस विधि में पानी के साथ उर्वरको को भी सीधा पौध जड़ क्षेत्र में पहुँचाया जाता है जिसे फ्रटीगेसन कहते है ।

फ्रटीगेसन विधि से उर्वरक लगाने में कोई अतिरिक्त मानव श्रम का उपयोग नही होता है।अत% यह एक तकनीक है जिसकी मदद से कृषक पानी व श्रम की बचत तथा उर्वरक उपयोग दक्षता में सुधार कर सकता है।

ड्रिप सिंचाई कम पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों के लिए एक सफल तकनीक है। जिसमे स्थाई या अस्थाई ड्रिपर लाइन जो पौधे की जड़ के पास या निचे स्तिथ होते है ।आज के परिद्रश्य में पानी की कमी से हर देश, हर राज्य, हर क्षेत्र जूझ रहा है तथा समय के साथ यह समस्या विकराल होती जा रही है।

इसलिए जहाँ भी पानी का उपयोग होता है। वहाँ हमे जितना भी संभव हो इसकी बचत करनी चाहिए । पानी का अत्यधिक उपयोग कृषि में ही होता है। इसलिए इसकी सबसे अधिक बचत भी यहीं ही संभव है। और हमें इसे बचाना चाहिए । इस मुहीम में ड्रिप सिंचाई एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है अत% कृषको को इसे बड़े पैमाने पर अपनाना चाहिए।

ड्रिप सिंचाई में स्तेमाल होने वाले उपकरण तथा उनका कार्य

  • पंप:- पानी की आपूर्ति
  •  फिल्टर यूनिट:- पानी को छानने की व्यवस्था। जिससे की ड्रिप सिस्टम के कार्यकलाप में कोई बाधा उत्पन्न न हो । इसमें होते है, वाटर फिल्टर। बालू फिल्टर (बालू अलग करने के लिए) ।
  •  फ्रटीगेसन यूनिट:- सिंचाई वाले पानी में तरल खाद मिलाने की व्यवस्था।
  •  प्रेशर गेज:- ड्रिप सिस्टम में पानी का प्रेशर को इंगित करता है।
  •  मीटर:- ड्रिप सिस्टम में पानी के प्रवाह को इंगित करता है।
  •  मुख्य पाइप लाइन:- लेटरलस में पानी की सप्लाई करती है।
  •  लेटरल्स:- कम मोटाई वाली ट्यूब्स। ड्रीपर्स को पानी की सप्लाई करती है।
  •  ड्रीपर्स:- पानी को पौध जड़ क्षेत्र में बूंद-बूंद सप्लाई करते है।

अनुकूल ड्रिप सिंचाई व्यवस्था को इस्थापित करते वक्त कुछ तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए, जैसे कि। भूमि स्थलाकृति। मिट्टी। पानी। फसल और कृषि जलवायु स्थिति इत्यादि । फव्वारा सिंचाई (स्प्रींल्कर सिंचाई व्यवस्था) व्यवस्था से तुलना करें तो ड्रिप सिंचाई ज्यादा फायदेमंद साबित होगी ।

ड्रिप सिंचाई के फायदे-

  • पानी उपलब्धता की समस्या से जूझ रहे इलाके के लिए फायदेमंद
  • फसल की बंपर पैदावार और वक्त से पहले फसल तैयार होने की संभावना बढ़ जाती है
  • सीमित इस्तेमाल की वजह से खाद और पोषक तत्वों के ह्रास को कम करता है
  • पानी का अधिकतम और बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल
  • अंतरसांस्कृतिक या अंतरफसलीय कार्य को ड्रिप व्यवस्था आसान बनाता है
  • पौधे की जड़ तक पानी का वितरण एक समान और सीधे होता है
  • घास-फूस को बढ़ने और मिट्टी के कटाव को रोकता है
  • असमान आकार की भूमि या खेत में ड्रिप व्यवस्था का बहुत प्रभावकारी तरीके से इस्तेमाल हो सकता है

  • बिना किसी परेशानी के पुनरावर्तित अपशिष्ट पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है
  • दूसरी सिंचाई तरीकों के मुकाबले इसमे मजदूरी का खर्च कम किया जा सकता है
  • पौधे और मिट्टी जनित बीमारियों के खतरे को भी कम करता है
  • इसका संचालन कम दबाव में भी किया जा सकता है जिससे ऊर्जा खपत में होनेवाले खर्च को भी कम किया जा सकता है
  • खेती किये जाने योग्य जमीन को बराबर किये जाने की भी जरूरत नहीं होती है
  • एक समान पानी वितरण होने से पौधे के जड़ क्षेत्र में एकसमान नमी की क्षमता को बनाए रखा जा सकता है
  • खाद या सूक्ष्म पोषक तत्वों को कम से कम क्षति पहुंचाए फर्टीगेशन (ड्रिप व्यवस्था के साथ खाद को सिंचाई वाले पानी के साथ प्रवाहित करना) किया जा सकता है
  • वॉल्व्स और ड्रिपर की सहायता से पानी के कम या ज्यादा प्रवाह को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है
  • ड्रिप व्यवस्था की वजह से सिंचाई की बारंबरता में मिट्टी के प्रकार की भूमिका बिल्कुल नगण्य होती है
  • कुल मिलाकर ड्रिप व्यवस्था वक्त और धन दोनों की बचत करता है