जाने कैसे काम करता है ड्रिप सिंचाई सिस्टम ,और किसानो के लिए क्यों जरूरी है

किसानों को ड्रिप सिंचाई को क्यों अपनाना चाहिए

ड्रिप सिंचाई व्यवस्था सिंचाई की एक उन्नत तकनीक है जो पानी की बचत करता है । इस विधि में पानी बूंद-बूंद करके पौधे या पेड़ की जड़ में सीधा पहुँचाया जाता है जिससे पौधे की जड़े पानी को धीरे-धीरे सोखते रहते है।इस विधि में पानी के साथ उर्वरको को भी सीधा पौध जड़ क्षेत्र में पहुँचाया जाता है जिसे फ्रटीगेसन कहते है ।

फ्रटीगेसन विधि से उर्वरक लगाने में कोई अतिरिक्त मानव श्रम का उपयोग नही होता है।अत% यह एक तकनीक है जिसकी मदद से कृषक पानी व श्रम की बचत तथा उर्वरक उपयोग दक्षता में सुधार कर सकता है।

ड्रिप सिंचाई कम पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों के लिए एक सफल तकनीक है। जिसमे स्थाई या अस्थाई ड्रिपर लाइन जो पौधे की जड़ के पास या निचे स्तिथ होते है ।आज के परिद्रश्य में पानी की कमी से हर देश, हर राज्य, हर क्षेत्र जूझ रहा है तथा समय के साथ यह समस्या विकराल होती जा रही है।

इसलिए जहाँ भी पानी का उपयोग होता है। वहाँ हमे जितना भी संभव हो इसकी बचत करनी चाहिए । पानी का अत्यधिक उपयोग कृषि में ही होता है। इसलिए इसकी सबसे अधिक बचत भी यहीं ही संभव है। और हमें इसे बचाना चाहिए । इस मुहीम में ड्रिप सिंचाई एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है अत% कृषको को इसे बड़े पैमाने पर अपनाना चाहिए।

ड्रिप सिंचाई में स्तेमाल होने वाले उपकरण तथा उनका कार्य

  • पंप:- पानी की आपूर्ति
  •  फिल्टर यूनिट:- पानी को छानने की व्यवस्था। जिससे की ड्रिप सिस्टम के कार्यकलाप में कोई बाधा उत्पन्न न हो । इसमें होते है, वाटर फिल्टर। बालू फिल्टर (बालू अलग करने के लिए) ।
  •  फ्रटीगेसन यूनिट:- सिंचाई वाले पानी में तरल खाद मिलाने की व्यवस्था।
  •  प्रेशर गेज:- ड्रिप सिस्टम में पानी का प्रेशर को इंगित करता है।
  •  मीटर:- ड्रिप सिस्टम में पानी के प्रवाह को इंगित करता है।
  •  मुख्य पाइप लाइन:- लेटरलस में पानी की सप्लाई करती है।
  •  लेटरल्स:- कम मोटाई वाली ट्यूब्स। ड्रीपर्स को पानी की सप्लाई करती है।
  •  ड्रीपर्स:- पानी को पौध जड़ क्षेत्र में बूंद-बूंद सप्लाई करते है।

अनुकूल ड्रिप सिंचाई व्यवस्था को इस्थापित करते वक्त कुछ तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए, जैसे कि। भूमि स्थलाकृति। मिट्टी। पानी। फसल और कृषि जलवायु स्थिति इत्यादि । फव्वारा सिंचाई (स्प्रींल्कर सिंचाई व्यवस्था) व्यवस्था से तुलना करें तो ड्रिप सिंचाई ज्यादा फायदेमंद साबित होगी ।

ड्रिप सिंचाई के फायदे-

  • पानी उपलब्धता की समस्या से जूझ रहे इलाके के लिए फायदेमंद
  • फसल की बंपर पैदावार और वक्त से पहले फसल तैयार होने की संभावना बढ़ जाती है
  • सीमित इस्तेमाल की वजह से खाद और पोषक तत्वों के ह्रास को कम करता है
  • पानी का अधिकतम और बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल
  • अंतरसांस्कृतिक या अंतरफसलीय कार्य को ड्रिप व्यवस्था आसान बनाता है
  • पौधे की जड़ तक पानी का वितरण एक समान और सीधे होता है
  • घास-फूस को बढ़ने और मिट्टी के कटाव को रोकता है
  • असमान आकार की भूमि या खेत में ड्रिप व्यवस्था का बहुत प्रभावकारी तरीके से इस्तेमाल हो सकता है

  • बिना किसी परेशानी के पुनरावर्तित अपशिष्ट पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है
  • दूसरी सिंचाई तरीकों के मुकाबले इसमे मजदूरी का खर्च कम किया जा सकता है
  • पौधे और मिट्टी जनित बीमारियों के खतरे को भी कम करता है
  • इसका संचालन कम दबाव में भी किया जा सकता है जिससे ऊर्जा खपत में होनेवाले खर्च को भी कम किया जा सकता है
  • खेती किये जाने योग्य जमीन को बराबर किये जाने की भी जरूरत नहीं होती है
  • एक समान पानी वितरण होने से पौधे के जड़ क्षेत्र में एकसमान नमी की क्षमता को बनाए रखा जा सकता है
  • खाद या सूक्ष्म पोषक तत्वों को कम से कम क्षति पहुंचाए फर्टीगेशन (ड्रिप व्यवस्था के साथ खाद को सिंचाई वाले पानी के साथ प्रवाहित करना) किया जा सकता है
  • वॉल्व्स और ड्रिपर की सहायता से पानी के कम या ज्यादा प्रवाह को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है
  • ड्रिप व्यवस्था की वजह से सिंचाई की बारंबरता में मिट्टी के प्रकार की भूमिका बिल्कुल नगण्य होती है
  • कुल मिलाकर ड्रिप व्यवस्था वक्त और धन दोनों की बचत करता है

सिर्फ 1000 रुपये खर्च कर उगाएं 400 Kg टमाटर, जानें किसने किया कमाल

गाजीपुर जिले के मिर्जापुर गांव निवासी पार्थ खेती में क्रांति लाने के लिए प्रयासरत हैं। पार्थ ने हाइड्रोपोनिक (बिना मिट्टी के खेती) तकनीक विकसित कर टमाटर की खेती कर मिसाल कायम की है। मौजूदा समय में गाजीपुर जिले में लगभग सभी घरों में उनके मॉडल से टमाटर की खेती हो रही है।

पार्थ को वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विवि में पढ़ाई के दौरान इस तकनीक के बारे में पता चला था। उन्होंने बताया कि विवि के हार्टीकल्चर विभाग के प्रोफेसर डॉ. डीआर सिंह व डॉ. पीयूष कांत सिंह ने उन्हें तकनीक के बारे में जानकारी देते हुए कहा था कि जोधपुर में सेंट्रल एरिड जोन रिसर्च इंस्टीट्यूट (साजरी) में यह तकनीक आई थी। साजरी में यह योजना सफल नहीं हो पाई, लेकिन पार्थ ने इस तकनीक का सफलतापूर्वक उपयोग कर बड़ी उपलब्धि हासिल की है।

राष्ट्रपति पुरस्कार से तीन बार हो चुके हैं सम्मानित

पार्थ को अब तक तीन बार राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। पहली बार 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें बेस्ट एनसीसी कैडेट ऑफ इंडिया के अवार्ड से सम्मानित किया था।

वहीं, दूसरी बार प्रतिभा पाटिल ने स्काउटिंग के लिए 2009 में सम्मानित किया। हाइड्रोपोनिक (बिना मिट्टी के खेती) तकनीक विकसित करने के लिए 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी पार्थ को प्रेसिडेंट रोवर अवार्ड से सम्मानित कर चुके हैं।

गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है नाम

गाजीपुर से दिल्ली (राजघाट) तक बिना रुके हुए 167 घंटे तक लगातार चलकर पार्थ अपना नाम गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज करा चुके हैं। पार्थ की इस उपलब्धि पर तत्कालीन थलसेना अध्यक्ष जनरल दलवीर सिंह सुहाग ने उन्हें सम्मानित किया था। पार्थ की टीम में कुल दस युवा शामिल थे, जिन्होंने लगातार छह दिन तक यात्रा की थी।

इस तरह से की जाती है खेती

20-20 मीटर के छह पाइप को एक पिलर पर रख दिया जाता है। पिलर के एक तरफ दस फीट का गड्ढा खोदकर उसमें 100 लीटर का टैंक डाला जाता है। टैंक में न्यूट्रियेंट के 16 तत्वों से युक्त पानी मिलाया जाता है। पौधे को पाइप में लगा दिया जाता है, जहां तक पंप की सहायता से पानी पहुंचाया जाता है। पाइप में एक कीप लगा दी जाती है, जिसके जरिये बचे हुए पानी के वापस टैंक तक ले जाया जाता है। पूरी प्रक्रिया इसी तरह चलती रहती है।

खास बात यह है कि इस तकनीक के जरिये टमाटर का पौधा लौकी के पौधे से भी बड़ा होकर लगभग 60 मीटर तक का हो जाता है। एक हजार रुपये खर्च करके कम से कम चार सौ किलो टमाटर प्राप्त किया जा सकता है।

हाइड्रोपोनिक तकनीक पर लिख चुके हैं 18 किताब

पार्थ अब तक हाइड्रोपोनिक (बिना मिट्टी की खेती) तकनीक पर अठारह किताबों की श्रंखला लिख चुके हैं। खास बात यह है कि सभी किताबों का शीर्षक वेपन अगेंस्ट हंगर (भूख के खिलाफ हथियार) है। शीर्षक का उल्लेख करते हुए पार्थ ने बताया कि आज भी भारत के ग्रामीण इलाकों का गरीब भूखा सोता है।

तकनीक को लेकर आत्मविश्वास भरे लहजे में पार्थ ने बताया कि इसका सही तरीके से क्रियान्वयन होने पर देश में खेती के जरिये ही किसानों की आर्थिक समस्या दूर हो जाएगी और अन्नदाता को भूखे नहीं सोना पड़ेगा।

पानी की कमी से परेशान किसान ने किया केसर की खेती का रुख

क्षेत्र में पानी की कमी से भले ही किसान परेशान हो लेकिन राजस्थान के बसवा तहसील क्षेत्र के गांव झूथाहेड़ा में एक किसान ने इस परेशानी को दूर कर कम पानी व कम खर्च में अच्छा मुनाफा कमाने के लिए केसर की खेती को अपनाया है।

किसान को उम्मीद है कि इस खेती को करने के बाद उसे खर्च से तीन गुना मुनाफा मिलेगा। झूथाहेड़ा गांव निवासी किसान श्री मोहन मीना ने बताया कि उनके गांव सहित आसपास के क्षेत्र में वर्षों से पानी की कमी से किसान परेशान हैं।

फसलों में पानी की अधिकता को लेकर कई किसानों ने तो खेती बाड़ी भी करना बंद कर दिया हैं। ऐसे में उन्होंने जानकारी लेकर अपने आधा बीघा खेत में इस बार केसर की फसल की पैदावार की हैं।

किसान ने बताया कि इस फसल में पानी की आवश्यकता कम है। उनके द्वारा बीज लगाए गए थे जिस पर अब खेत में 720 केसर के पौधे उग आए है ।

उन्होंने बताया कि केसर के पौधों में 15-20 दिन के अंतराल में पानी देना पड़ता हैं। वर्तमान में पौधे बड़े हो गए है तथा उनमें डोडी भी उग आई हैं। 15 दिन बाद इसमें केसर आना शुरु हो जाएगी।

मुनाफा तीन गुना मिलने की उम्मीद

किसान ने बताया कि केसर की खेती में उन्होंने करीब ढाई लाख रुपए का खर्च आया हैं। लेकिन उन्हें उम्मीद है कि केसर को बेचने के दौरान तीन गुना मुनाफा मिलेगा। उन्होंने बताया कि केसर बेचने के लिए उन्होंने जम्मू में केसर का कारोबार करने वाले व्यापारियों से संपर्क किया था।

जहां व्यापारियों ने एक किलो केसर दो लाख रुपए में खरीदने का भरोसा दिलाया है। उन्होंने बताया कि उनको अपने खेत में करीब चार किलो केसर आने की उम्मीद है।

नेट बना सबसे बड़ा सहयोगी

किसान श्री मोहन मीना ने बताया कि पानी की कमी के कारण वह खेती करने को लेकर लंबे समय से परेशान था। एक दिन टेलीविजन पर उन्होंने केसर की खेती के बारे में देखा। इसके बाद उनके मन में केसर की खेती करने को लेकर उम्मीद जगी।

नेट पर केसर की खेती कैसे करते है इस बारे में जानकारी ली। इसके बाद जम्मू से बीज लाकर इस खेती को शुरु कर दिया। उन्होंने बताया कि अभी भी वे इस फसल में किसी प्रकार की परेशानी आने पर नेट पर सर्च कर उस परेशानी को दूर कर देते है।

गेहूं में इसी समय लगती हैं यह बीमारियां, ऐसे सावधानी बरतें किसान

पूरे देश में रबी सीजन की बुवाई के जो सरकारी आंकड़े मिले हैं, उसके मुताबिक गेहूं की बुवाई 283.46 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है। अलग-अलग हिस्सों में गेहूं क्राउन रूट अवस्था में पहली सिंचाई भी शुरू हो चुकी है। गेहूं में इसी समय बीमारियां लगती हैं, ऐसे में किसानों को सिंचाई पर विशेष सावधानी बरतने की सलाह कृषि विभाग की तरफ से दी गई है।

मगर एक बात ध्यान रखें किसान

भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान के कृषि सलाहकार समिति के वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह जारी की है। सलाहकार समित के अध्यक्ष डॉ. आरके शर्मा बताते हैं, ”इस समय सुबह के समय धुंध कम दिखाई दे रही है।

दिन का अधिकतम तापमान सामान्य तौर पर जहां 20.3 डिग्री है, वहीं न्यूनतत तापमान सामान्यतया 7.7 डिग्री सेल्सियस है। ऐसे में किसान अपनी पहली सिंचाई जरूर कर लें, लेकिन ध्यान रहे यह सिंचाई हल्की हो।”

तब पहला खतरा शुरू होता है

डॉ. शर्मा आगे बताते हैं, “जिन गेहूं की बुवाई का 40 दिन हो गया है, उसमें नाइट्रोजन को किसान डालना शुरू कर दें। जिन जगहों पर 45 मिलीमीटर या उससे अधिक बारिश हुई हो, वहां के किसान अभी सिंचाई न करें।“ जिन किसानों ने गेहूं की बुवाई 40 दिन पहले की है उन गेहूं में कल्ले निकलना शुरू हो गया है। यह ही वह समय भी होता है जिसमें गेहूं में बीमारियों का पहला खतरा शुरू होता है।

पत्ती माहूं बीमारी की संभावना ज्यादा

इस बारे में जानकारी देते हुए भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान के कृषि वैज्ञानिक बीएस त्यागी ने बताया, ”तापमान में गिरावट होने से गेहूं में पत्ती माहूं, जिसे चापा भी कहते हैं, इस रोग के आने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए किसानों का सलाह दी जाती है कि इस समय गेहूं की पौधे की जांच नीचे से ऊपर तक अच्छी तरह से करें।”

ये गेहूं के पौधों को पहुंचाते हैं नुकसान

उन्होंने आगे बताया, “इस बीमारी से गेहूं को बचाने के लिए किसान क्यूनालफोस इसी नामक दवा की 400 मिली लीटर मात्रा को 200 से 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ की दर से छिड़ीकाव करें। गेहूं के खेत में यही वह समय होता है,

जब खेत में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार जैसे बथुआ, खरबाथू, जंगली पालक, मैणा, मैथा, हिरनखुरी, कंडाई, कृष्णनील, प्याजी, चटरी और मटरी जैसे खरपतवार पर भी आते हैं। यह गेहूं के पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में गेहूं को इनसे बचाने के लिए किसान कारफेन्ट्राजोन दवा का छिड़काव करें।“

पीला रतुआ रोग हो तो यह दवा करें इस्तेमाल

गेहूं के पौधों में सिंचाई के समय का विशेष ध्यान रखना होता है। अगर सिंचाई के समय में किसान देरी या जल्दी कर देते हैं तो इससे गेहूं की उत्पादकता पर प्रभाव पड्ताक है। गेहूं फसलों के जानकार और कृषि वैज्ञानिक डॉ. अंकित झा बताते हैं,

“गेहूं के बुवाई के 60 से 65 दिन बाद पौधों में गांठे बनना शुरू होती है। इस समय गेहूं में तीसरी सिंचाई करनी चाहिए। पीला रतुआ रोग की भी इसी समय संभावना रहती है। ऐसे में इस समय गेहूं की फसल की विशेष निगरानी की जरुरत पड़ती है। अगर यह रोग किसी पौधे में दिखे तो प्रोपिकोनेजोल नामक दवा को लाकर छिड़काव करें।“

बुवाई कम होना खतरे की घंटी

रबी सीजन में इस बार पिछले साल के मुकाबले कम बुवाई होना कृषि विभाग के लिए खतरे की घंटी है। विभिन्न राज्यों से रबी सीजन की विभिन्न फसलों की बुवाई के जो आंकड़े अभी तक मिले हैं, उसके मुताबिक 586.37 लाख हेक्टेयर भूमि पर रबी की बुवाई की गई, जबकि पिछले वर्ष 2017 में इसी अवधि तक 587.62 लाख हेक्टे यर भूमि पर बुवाई की गई थी।

अब घर बैठे मंगाएं खेती का सामान, इफको ने शुरू की फ्री होम डिलीवरी सेवा

पिज्जा-बर्गर की तर्ज पर अब खेती के लिए खाद-बीज जैसी जरूरी वस्तुएं भी घर बैठे उपलब्ध हो जाएंगी। किसान को खाद या खेती से जुड़ी अन्य जरूरी वस्तुओं के लिए दुकान तक नहीं जाना होगा। ये सभी समान उन्हें घर बैठे ही उपलब्ध कराए जाएंगे।

किसानों के लिए ये शुरुआत की है दुनिया की सबसे बड़ी उर्वरक सहकारी कम्पनी इफको ने। इफको के इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म ने देशभर में कृषि संबंधित अपने इनपुट के लिए मुफ्त डोर-स्टेप डिलीवरी सेवा की शुरुआत की है। जिसके तहत देश के दूर-दराज के हिस्सों के किसानों को बगैर वितरण शुल्क के पांच किलोग्राम तक की पैकेजिंग के कृषिगत इनपुट मिल सकेंगे।

मिलेंगे जरूरी उत्पाद

दुनिया की सबसे बड़ी उर्वरक सहकारी, इफको ने अपने डिजिटल मंच इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म (आईसीडीपी) के माध्यम से अपने कृषिगत इनपुट को घर-घर तक पहुंचाने की सेवा शुरु करने की घोषणा की है। इसका मकसद नवीनतम तकनीकी साधनों से एक सक्षम आपूर्ति श्रृंखला तंत्र की सह-क्रिया द्वारा ग्रामीण भारत तक आधुनिक ई-कॉमर्स के लाभ और अनुभव को पहुंचाना है।

किसानों को अब आवश्यक कृषिगत इनपुट की पूरी श्रृंखला मिलेगी, जैसे पानी में घुलनशील उर्वरक, कृषि-रसायन, जैव-उर्वरक, बीज, पौधों को विकसित करने वाले संरक्षक और अन्य कृषि आधारित उत्पाद। ये उत्पाद पांच किलोग्राम तक की पैकिंग में उपलब्ध होंगे। बगैर किसी अतिरिक्त मूल्य के किसानों तक पहुंचाए जाएंगे।

पारंपरिक उर्वरकों, जैसे यूरिया, डीएपी, एनपीके, इत्यादि ऑनलाइन नहीं बेचे जाएंगे। इस उद्योग-जगत में अपनी तरह की पहली पहल आईसीडीपी ने की है। वह दूर-दराज के उन ग्रामीण क्षेत्रों तक वितरण सेवाएं उपलब्ध कराएगी, जहां ई-कॉमर्स के अग्रणी किरदार मौजूदा परिदृश्य में अपने सामान नहीं पहुंचा पाते हैं।

दूरदराज के किसान होंगे लाभान्वित

इफको के प्रबंध निदेशक डॉक्टर यू एस अवस्थी ने कहा कि इफको में हम लगातार किसानों को सेवायें देने का प्रयास करते हैं। कृषि-वाणिज्य को सरल बनाने के लिए अपने मजबूत ग्रामीण नेटवर्क के जरिये नई व निशुल्क आपूर्ति की सेवा देने की घोषणा कर हम बहुत प्रसन्न हैं। किसान हमारे डिजिटल मंच से कृषिगत इनपुट को सिर्फ एक क्लिक के जरिये खरीद पाएंगे। इस दिशा में आईसीडीपी काम कर रही है। इसका उद्देश्य है कि ज्यादा से ज्यादा किसान डिजिटलीकरण का लाभ उठाएं।

हमने किसानों के बीच प्रशिक्षण और जागरूकता-निर्माण अभियान भी शुरू किया, जहां वे ऑनलाइन व डिजिटल भुगतान गेटवे के उपयोग के बारे में सीख सकते हैं। यहां उन्हें कैशलेस रहने के लाभ की शिक्षा भी मिलेगी। इससे आगे जाते हुए, हमारी योजना यह है कि इस मंच को एक सफल डिजिटल बाजार में बदल दें, जहां किसान और सहकारी समितियां, दोनों अपने उत्पाद ऑनलाइन खरीद-बेच सकें । हमें उम्मीद है कि यह पहल दूर-दराज के किसानों को लाभ पहुंचाएगी और इस क्षेत्र की बाधाओं को स्थायी तौर पर खत्म करेगी।

किसानों की आय दोगुनी करने का हिस्सा

इफको आंवला के मीडिया प्रभारी विनीत शुक्ला ने बताया कि प्रधानमंत्री की डिजिटल पहल और कैशलेस मुहिम के अनुरूप, इफको ने एक नया पोर्टल शुरू किया है- इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म www-iffcobazar-in इस पोर्टल का लक्ष्य किसानों या उपभोक्ताओं और इफको तथा इसकी समूह कंपनियों के बीच संवाद और कारोबार के लिए एक डिजिटल मंच प्रदान करना है।

इफको के इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म (आईसीडीपी) का लक्ष्य एक डिजिटल मंच पर देश की सभी सहकारी समितियों और किसानों को एक साथ लाना और उन्हें आपस में जोड़ना है। यह पोर्टल 13 प्रमुख भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है और इसमें 2.5 करोड़ की मेंबरशिप है।

इफको ग्रामीण..क्षेत्रों में किसानों को बाकी दुनिया से जोड़ने के लिए प्रेरित करने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इंडियन को-ऑपरेटिव डिजिटल प्लेटफॉर्म खेती-किसानी के सभी पहलुओं में किसानों को लाभ पहुंचाने में जुटी है और उन्हें एक अधिक जागरूक जीवन देने में मदद करती है। यह किसानों की आय दोगुना करने के इफको के 2020 दृष्टिकोण का हिस्सा है।

बांस, बल्ली व छप्पर के सहारे मशरूम उगा रहा है किसान, 15 लाख तक होती है कमाई

न तो पॉली हाउस है और न ही अब तक कोई सरकारी सहायता मिली, लेकिन अपने दम पर इस किसान ने बांस-बल्लियों के सहारे तीन मंजिला स्ट्रक्चर खड़ा कर लिया, आज मशरूम की खेती से ये सालाना पंद्रह लाख की कमाई कर रहे हैं, यहीं नहीं अब दूसरे किसान भी इनसे प्रशिक्षण लेने आते हैं।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बख्शी का तालाब तहसील में आने वाला गॉव अजरायलपुर (इटौंजा) जो कि लखनऊ मुख्यालय से 30 किमी की दूरी पर स्थित है। इस गाँव के युवा किसान अजय यादव की वजह से तब चर्चा में आया जब साल 2016-2017 में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक इस गाँव के युवा किसान अजय यादव को मशरूम की खेती के लिए पुरस्कार दिया।

अजय यादव बताते हैं, “जब खेती शुरु की तो इतने पैसे नहीं थे कि पाली हाउस लगा सकूं तो बांस घर के थे बांस से ही पॉलीहाउस की तर्ज पर बांस का तीन मंजिला स्ट्रक्चर बनाया जो जमीन और तीन मंजिला बॉस का स्ट्रक्चर मिलाकर चार लेयर बन गयी इसे ढकने के लिए घास फूस का 70 गुणा 30 फ़ीट का बंगला बना दिया।”

वो आगे बताते हैं, “सिंचाई के लिए देशी तकनीक से स्प्रे मशीन का प्रयोग कर रहा हुं पाली हाउस बनाया नहीं इसलिये सरकारी सहायता भी नही मिली, इस समय दो हिस्से में मशरूम की खेती कर रहा हुं एक बंगला 50 गुणा 30 का है, दूसरा बंगला 50 गुणा 30 का है इन दोनों बंगलों से नबम्बर से अप्रैल तक करीब 85 से 100 कुन्तल मशरूम उत्पादन मिल जाता है, जिसका बाजार मूल्य करीब पंद्रह लाख तक मिल जाता हैं।

मशरूम की खेती के साथ कम्पोस्ट बेचने का भी शुरु किया काम

अजय ने बताया कि पहले गेंहू के भूसे को सड़ाकर कम्पोस्ट बनाते हैं कम्पोस्ट बनने में 28 से 30 दिन का समय लगता है इसमें हम रासायनिक और उर्वरक खादों का प्रयोग करते है। गेंहू के भूसे को भिगोकर 30 से 48 घंटे बाद उसमें यूरिया, डीएपी, पोटाश तीनो चीजों को मिलाकर कम्पोस्ट को ढक देते हैं उसके बाद तीसरे दिन कम्पोस्ट में गेहूं का चोकर डालते है फिर उसके बाद डीएसपी पाउडर, कैलिशयम कार्बोरेट, नीम की खाली, जिप्सम, गुड़ का शिरा, फार्मोलिन, नुआन, आदि सब चीजों को हम मिलाते हैं और छोड़ देते है 28 से 30 दिन में कम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाता है।

अधिक मुनाफा देती है यह प्रजाति

25 अगस्त से काम की शुरुआत होती है सितंबर तक हमारी कम्पोस्ट तैयार हो जाती है फिर एक से पांच अक्टूबर तक इसमे हम स्पानिंग कर देते हैं स्पानिंग करने के बाद लगभग 15 दिन में पूरे भुसे में बीज फैल जाता है।

इसके बाद इसके ऊपर एक से ढेड़ इंच गोबर की खाद डाल देते हैं उसी खाद के ऊपर 11 से 15 दिन के बाद मशरूम दिखने लगता है। तापमान कम होने पर उत्पादन थोड़ा कम रहता है पर 12 से 24 डिग्री सेक्सियस में मशरूम का अच्छा उत्पादन प्राप्त हो जाता है।

वीडिओ देखे :

100 दिन में तैयार होने वाली कपास की नई किस्म विकसित

कपास की खेती के तैयार होने में लगने वाले अधिक समय और पानी की वजह इसकी खेती घट रही है, लेकिन केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर ने कपास की एक ऐसी नई किस्म विकसित की है जो मात्र 200 दिन में तैयार हो जाती है और इसमें बीमारियां भी नहीं लगती हैं।

”युगांक” नामक कपास की इस नई किस्म के बार में जानकारी देते हुए केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर के निदेशक डा. केशव राज क्रांति ने बताया ” हमारे संस्थान के वैज्ञानिकों ने 9 साल की मेहनत के बाद कपास की ऐसी वेराइटी को डेवलप किया है जो मात्र 100 दिन में तैयार हो जाएगी। अभी तक कपास की कपास को तैयार होने में 230 से लेकर 260 दिन लगते है।’’

डा. केशव ने आगे बताया कि मेरे 25 साल के कॉटन वैज्ञानिक के रूप में अभी तक का सबसे महत्वपूर्ण अनुसंधान है। कपास की इस किस्म से सूखे की मार झेल रहे विर्दभ और तेलांगना के किसानों के साथ ही उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में किसान इसकी अच्छी खेती कर पाएंगे।”

डा. केशव राज क्रांति ने बताया कि दुनियाभर में कपास के बड़े उत्पादक देश आस्ट्रेलिया, ब्राजील, चीन और मेक्सिकों जैसे देशों में भी कपास की फसल 150 दिन में तैयार होती है, लेकिन भारत में इसकी खेती में बहुत समय लगता है। ऐसे में कपास की नई किस्म यहां के किसानों के लिए वरदान साबित होगी।

उन्होंने बताया कि केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान के क्राप इंप्रूवमेंट डिपार्टमेंट के वैज्ञानिक संतोष और धारवाड़ के प्रसिद्ध् कपास वैज्ञानिक एस.एस. पाटिल ने कपास की इस नई किस्म को विकसित करने में लगे थे। इसमें कपास किसानों के साथ नेटवर्क बनाकर काम किया गया। जिसका नतीजा है कि कपास की यह किस्म विकसित हो पाई है।

कपास की पूरी दुनिया में बढ़ती खपत के कारण इसे श्वेत स्वर्ण के नाम से जाना जाता है। इस नगदी फसल की खेती करके किसान आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में कपास की खेती लगातार घट रही है। स्थिति यह है कि इस प्रदेश में कभी 5 लाख हेक्टेयर में कपास की खेती होती थी जो घटकर अब मात्र 14 हजार हेक्टेयर ही रह गई है।

उतर प्रदेश में लगभग 5 लाख रूई गांठ की आवश्यकता हर साल होती है। ऐसे में प्रदेश में कपास उत्पादन को बढ़ावा देने की जरूरत है। जिसमं कपास की नई किस्म युगांक उत्तर प्रदेश में कपास की खेती को बढ़ावा देने में काम आ सकती है।

उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में पिछले कई सालों से पड़ता सूखा, गिरता भूमिगत जलस्तर, कपास की खेती को लेकर सरकारी उदासीनता के कारण प्रदेश में कपास की खेती घट गई है। स्थिति यह है प्रदेश के 18 मंडलों में से मात्र अलीगढ़ और आगरा मंडल में ही कपास की खेती हो रही है।

उत्तर प्रदेश के कृषि निदेशक ज्ञान सिंह ने बताया ” प्रदेश में कपास की खेती को बढ़ावा देने के लिए विभाग की तरफ से काम किया जा रहा है। भारत सरकार की तरफ से काटन टेक्नोलाजी मिशन की स्थापना, कपास की अच्छी किस्म और फसल सुरक्षा चक्र को अपनाकर किसान कपास की लाभकारी खेती कर सकते हैं।”

उत्तर प्रदेश में जायद सीजन की फसल कपास की बुआई अप्रैल के पहले सप्ताह से लेकर मई के आखिरी सप्ताह तक की जाती है। उत्तर प्रदेश के जो किसान कपास की खेती इस बार करना चाहते हैं उन्हें अभी से तैयारी करनी चाहिए।

कपास की खेती की जानकारी के लिए किसान केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर के वैज्ञानिकों से संपर्क कर सकते हैं। वैज्ञानिक किसानों को इस फसल से संबंधित सभी प्रकार की जानकारी देंगे, यह कहना है कपास अनुसंधान संस्थान के निदेशक डा. केशव राज क्रांति का।

ताईवानी तकनीक से ऐसे करें सब्जी की खेती 10 गुना अधिक होगा मुनाफा

चंदौली (जितेंद्र उपाध्याय)। सब्जी की आधुनिक खेती देखना है तो आपको बेदहां गांव आना होगा। चंदौली जिले में स्थित इस गांव के सुरेंद्र सिंह ने इस विधा में महारथ हासिल कर ली है। ताइवानी पद्धति से सब्जी उगाकर वे सामान्य की अपेक्षा दस गुना तक अधिक मुनाफा कमा रहे हैं।

पैदावार इतनी है कि हर रोज 20 मजदूर लगाने पड़ते हैं। इससे स्थानीय लोगों को दैनिक रोजगार भी मुहैया हो गया है। बेदहां और मिर्जापुर के मड़िहान में इस पद्धति से की जा रही सब्जी की खेती अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय है।

कैसे करते हैं खेती :

खेत की अच्छी जोताई के बाद गीली भुरभुरी मिट्टी की मेड़ बनाकर उसमें चार-चार इंच की दूरी पर बीज डालते हैं। मेड़ को प्लास्टिक से ढक दिया जाता है। जैसे ही बीज अंकुरित होते हैं, प्लास्टिक में छेद कर पौधे बाहर निकल आते हैं। इस विधि में न तो ज्यादा पानी की जरूरत होती है और न ही ज्यादा लागत आती है। फसल में कीड़े भी नहीं लगते हैं। हां, ऊंचाई वाले खेत पर ही फसल उगाई जा सकती है।

बीज और प्लास्टिक ताइवान के :

हरी मिर्च, शिमला मिर्च, खरबूज, तरबूज, टमाटर, खीरा आदि के बीज वे ताइवान से मंगाते हैं। भारतीय बीजों की तुलना में ताइवान के बीज छह से सात गुना ज्यादा पैदावार देते हैं। एक बार तोड़ाई के बाद भी पौधे खड़े रहते हैं। छह माह की फसल में 12 बार तोड़ाई करते हैं।

एक हेक्टेयर में 50 हजार लागत :

हरी मिर्च को ही लें तो पारंपरिक विधि के मुकाबले इस विधि में इसकी लागत काफी कम आती है। एक हेक्टयर में 50 हजार लागत आती है पर मुनाफा चार लाख रुपये तक मिलता है। सुरेंद्र बताते हैं कि कभी कभी तो इतनी पैदावार हो जाती है कि कई मंडियों में फसल पहुंचानी पड़ती है। हर जिंस में मुनाफा करीब आठ से दस गुना तक होता है।

सिंचाई भी न के बराबर :

इस पद्धति में सिंचाई और उर्वरक की अधिक जरूरत नहीं पड़ती है। पानी में उर्वरक मिलाकर मेड़ों में डाल दिया जाए तो वह हर पौधे की जड़ में पहुंच जाता है। टपक विधि से भी सिंचाई करते हैं। पौधे के ऊपर पानी टपकाकर भी उनकी सिंचाई हो जाती है। प्लास्टिक से ढक दिए जाने के कारण नीचे से उत्पन्न होने वाली वाष्प सहायक साबित होती है।

प्लास्टिक के कई फायदे :

मेड़ों पर बिछाई गई प्लास्टिक से न तो घास पैदा होती है और न ही कीट पतंग फसल को नष्ट कर पाते हैं। घास प्लास्टिक के नीचे ही रहती है और पेड़ों तक नहीं पहुंच पाती। पौधों को बीमारी व कीटों से बचाने के लिए आर्गेनिक दवा का छिड़काव किया जाता है।

फसल से मिला बड़ा फायदा :

सुरेंद्र सिंह कहते हैं कि धान और गेहूं की फसल पैदा करते-करते थक गए थे। छह साल पूर्व किसान कॉल सेंटर, सब्जी अनुसंधान केंद्र व पूसा इंडस्ट्रीज में जाकर सब्जी की खेती की तकनीक देखी। वहां के सदस्य बने और अपने यहां शुरुआत की। उन्हें भरपूर लाभ मिलता है पर मंडियों में दस फीसद आढ़तिया शुल्क अनावश्यक लगता है। यह बंद होना चाहिए।

फसल में नहीं लगेंगे कीट पतंग, इस किसान ने खोजा अनोखा तरीका

अगर आप अपनी फसल में लगने वाले कीट-पतंग से परेशान हैं, तो मध्य प्रदेश के इस किसान से जरूर मिलिए। मध्य प्रदेश का ये किसान फसल में लगने वाले कीट-पतंगों के लिए बाजार नहीं जाता। अर्जुन पाटीदार घर पर ही कुछ देसी कीटनाशक दवाईयां बनाकर अपने फसलों में लगने वाले कीट-पतंग से छुटकारा पा लेते हैं।

“मैं कई वर्षों से बाजार नहीं गया हूँ, फसल में बीज से लेकर खाद, कीटनाशक दवाईयां सबकुछ घर पर ही बना लेता हूँ। मुझे लगता है, अगर किसान हर चीज बाजार से खरीदेगा तो उसकी लागत भी ज्यादा होगी और वो अपनी मिट्टी को भी बर्बाद कर देगा।”

ये कहना है किसान अर्जुन पाटीदार (35 वर्ष) का। वो आगे बताते हैं, “हमारे खेत में लगी कोई भी सब्जी या फल आप बिना धुले बेधड़क खा सकते हैं क्योंकि उसमे जहर नहीं होता है। हम अपने खाने में शुद्ध देसी चीजें खाते हैं जिसमें जहर नहीं होता है।”

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर पूरब दिशा में गुराडिया प्रताप गाँव के प्रगतिशील किसान अर्जुन पाटीदार की तरह कई किसान हैं जो पूरी तरह से जैविक खेती करते हैं। यहां के किसानों का मानना है कि हमें अपनी फसलों की लागत कम करने के लिए और मिट्टी को बर्वाद करने से खुद बचाना है।

अगर हमें स्वस्थ्य रहना है तो खेत में जहर का छिड़काव बंद करना होगा। अर्जुन पाटीदार द्वारा बनाए कुछ देसी तरीके कोई भी किसान अपनी फसल में इस्तेमाल करके अपनी लागत बचा सकता है। अर्जुन जैविक खेती पर किसानों को प्रशिक्षित करने वाले ‘साकेत’ नाम के ग्रुप से जुड़े हुए हैं।

पांच पत्ती काढ़ा बनाने की विधी

किसी भी फसल में अगर कीट-पतंग लगने की शुरूवात हो गयी है तो पहली खुराक के रूप में पांच पत्ती का काढ़ा बनाकर छिड़काव किया जाता है। पांच प्रकार के पत्ते जिसमें नीम, आक, धतूरा, बेसरम, सीताफल की पत्तियों को पांच लीटर देसी गाय के गोमूत्र में भरकर मिट्टी के बर्तन में रख दें। इसे छानकर 200 लीटर पानी में मिलाकर एक एकड़ फसल में इसका छिड़काव करने से फसल में कीट-पतंग नहीं लगेंगे।

लहसुन आधारित जैविक कीटनाशक

लहसुन, अदरक, हींग का छिड़काव करने से कीटपतंग मरते नहीं हैं। इसके छिड़काव के बाद इसकी गंध से फसल में कीट पतंग लगते नहीं हैं।

दशपर्णी अर्क बनाने की विधि

दशपर्णी अर्क का उपयोग फसल में लगने वाले सभी प्रकार के रस चुसक और सभी इल्लियों के नियंत्रण के लिए किया जाता है। 200 लीटर पानी, दो किलो गाय का गोबर, 10 लीटर गोमूत्र, दो किलोग्राम करंज के पत्ते, दो किलोग्राम सीताफल के पत्ते, दो किलोग्राम धतूरा के पत्ते, दो किलोग्राम तुलसी के पत्ते, दो किलोग्राम पपीता के पत्ते, दो किलोग्राम गेंदा के पत्ते, दो किलोग्राम नीम के पत्ते, दो किलोग्राम बेल के पत्ते, दो किलोग्राम कनेर के पत्ते, 500 ग्राम तम्बाकू पीसकर या काटकर, 500 ग्राम लहसुन, 500 ग्राम पीसी हल्दी, 500 ग्राम तीखी हरी मिर्च, 200 ग्राम अदरक या सोंठ।

एक प्लास्टिक के बर्तन में सभी सामग्री मिलाकर जालीदार कपड़े से बांधकर 40 दिन छाया में रख दें। सुई की दिशा में सुबह शाम हिलातें रहें। इसका फसल में छिड़काव करने से रस चुसक और इल्लियाँ नहीं लगेंगी।

नीम आधारित कीटनाशक की निर्माण विधि

नीम आधारित कीटनाशक बनाने के लिए 10 लीटर गोमूत्र में 3 किलोग्राम नीम की पत्ती की चटनी, 2 किलोग्राम आक के पत्तों की चटनी, 2 किलोग्राम सीताफल पत्ते की चटनी, 2 किलोग्राम धतुरा के पत्ते की चटनी, 2 किलोग्राम बेशरम के पत्ते की चटनी को एक मिट्टी के बर्तन में डालकर आग में तबतक उबालें जबतक चार उबाले न आ जाएं।

आग से उतारकर 48 घंटे छाँव में ठंडा होने के लिए रख दें। इसके बाद कपड़े से छानकर 15 लीटर पानी में आधा से एक लीटर तक कीटनाशक मिलाकर स्प्रे करे।तनाछेदक कीटों से बचाव के लिए इसी में आधा किलोग्राम हरी तीखी मिर्च की चटनी और 500 ग्राम देसी लहसुन की चटनी मिलाकर कीटनाशक बनाये।

फफूंदनाशक दवा की निर्माण विधि

खट्टी छाछ में दो दिन के लिए एक तांबे का टुकड़ा डालकर रखा रहने दें, दो दिन बाद इस छाछ की आधा लीटर मात्रा को 15 लीटर पानी में खूब अच्छी तरह मिलाकर फसल में छिड़काव करें। इससे फसल में फफूंदनाशक नहीं लगेगी।

फसल को वायरस से ऐसे बचाएं

पौधों को वायरस के संक्रमण से बचाने के लिए पूरे फसल चक्र में तीन बार एक लीटर देशी गाय के दूध में 15 लीटर पानी, 50 ग्राम हल्दी प्रति टंकी के हिसाब से स्प्रे करें। इसके अलावा पानी में हींग, हल्दी मिलकर फसल की जड़ों में ड्रिन्चिग करने से वायरस नहीं लगेगा।

फेरोमेन ट्रैप और स्ट्रिकी ट्रैप से फसल में नहीं लगते कीट पतंग

प्रभावी कीट नियंत्रण के लिए स्वनिर्मित लाईट ट्रैप, फेरोमेन ट्रैप और स्ट्रिकी ट्रैप का उपयोग करने से फसल में कीट नहीं आते हैं। फेरोमेन ट्रैप में मादा का लेप करने से इसकी गंध से कीट मर जाते हैं। एक एकड़ में 10 फेरोमेन ट्रैप या फिर 10 पीले रंग के स्ट्रिकी ट्रैप में गिरीस का लेप लगाने से कीट उसी स्ट्रिकी ट्रैप में चिपक जायेंगे।

किसान ने तैयार किया कमाल का मिनी ट्रेक्टर, जाने इसमें क्या है खास

एक मिनी ट्रैक्टर जो जापान की नवीनतम तकनीक से काठियावाड़ी पाटीदार निलेशभाई भालाला द्वारा तैयार किया गया है, जिसमें एक आकर्षक डिजाइन है, इस ट्रेक्टर का नाम नैनो प्लस (Neno Plus) है ।

10 HP पावर वाला यह मिनी ट्रेक्टर एक छोटे किसान के सारे काम कर सकता है । ट्रेक्टर से आप जुताई ,बिजाई ,निराई गुड़ाई ,भार ढोना,कीटनाशक सप्रे आदि काम कर सकते है ।जो किसानों का काम आसान बना देती है।यह 2 मॉडल में आता है एक मॉडल में 3 टायर लगे होते है और दूसरे में 4 टायर लगे होते है ।

इसकी अनूठी कॉम्पैक्ट डिजाइन और एडजस्टेबल रियर ट्रैक चौड़ाई इसे दो फसल पंक्तियों के बीच और साथ ही इंटर कल्चर एप्लीकेशनों की किस्म के लिए बगीचों में संचालन के लिए आदर्श बनाता है।

यह किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर कई एप्लीकेशनों के लिए प्रयोग किया जाता है जैसे कल्टीवेशन, बुवाई, थ्रेशिंग, स्प्रिंग संचालन के साथ ही ढुलाई। इसकी एक और खास बात यह है के इसके साथ आप स्कूटर का काम भी ले सकते है

अगर आप इस ट्रेक्टर को खरीदना चाहते है जा कोई और जानकारी लेना चाहते है तो इस नंबर (9979008604) पर संपर्क कर सकते है।

 

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