1000 रुपए प्रति किल्लो वाली पिस्ता की खेती कैसे करें

पिस्ता सबसे ज्यादा पसंद क्या जाना वाला ड्राई फ्रूट है इसकी इतनी ज्यादा मांग है की मांग के मुकाबले इसकी पूर्ति बहुत कम है इस लिए इसके इतने ज्यादा दाम है और ये हमेशा ऐसे ही रहेंगे आज हम इस महंगे ड्राई फ्रूट की खेती के बारे मैं आप को बताएंगे

मिट्टी

पिस्ता की खेती कई तरह की मिट्टी में हो सकती है। हालांकि इसके लिए अच्छी तरह से सूखी गहरी चिकनी बलुई मिट्टी उपयुक्त मिट्टी है। ऐसे पेड़ सूखे का आसानी से सामना करने में सक्षम हैं लेकिन जहां ज्यादा आर्द्रता होती है वहां अच्छा नहीं कर पाते हैं।

बड़े पैमाने पर पिस्ता की खेती करने के लिए मिट्टी की जांच कराना काफी लाभदायक साबित होगा। जिस मिट्टी में पीएच की मात्रा 7.0 से 7.8 है वहां पिस्ता का पेड़ अच्छी किस्म का और ज्यादा मात्रा में पैदा होता है। ये पेड़ थोड़े कठोर जरूर होते हैं लेकिन उच्च क्षारीयता को काफी हद तक बर्दाश्त भी करते हैं।

जमीन की तैयारी

पिस्ता की खेती के लिए जमीन की तैयारी में भी दूसरे नट या बादाम जैसी स्थिति होती है। जमीन की अच्छी तरह से जुताई, कटाई और लाइन खींची होनी चाहिए ताकि अच्छी जुताई की स्थिति हासिल की जा सके।

अगर मिट्टी में 6-7 फीट की लंबाई में कोई कठोर चीज है तो उसे तोड़ देना चाहिए। क्योंकि पिस्ता की जड़ें गहरे तक जाती है और पानी के जमाव से प्रभावित होती है।

आवश्यक जलवायु

पिस्ता की फसल के लिए मौसम की स्थिति बेहद अहम तत्व है। पिस्ता के बादाम को दिन का तापमान 36 डिग्री सेटीग्रेड से ज्यादा चाहिए। वहीं, ठंड के महीने में 7 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उनके शिथिल अवधि के लिए पर्याप्त है। इसके पेड़ ज्यादा ऊंचाई वाली जगहों पर ठंडे तापमान की वजह से अच्छी तरह बढ़ नहीं पाते हैं।

खेती में प्रसारण 

सामान्यतौर पर पिस्ता के पेड़ को लगाने के लिए अनुकूल पिस्ता रुटस्टॉक के जरिए पौधारोपन किया जाता है। इस रुट स्टॉक या पौधे को नर्सरी में भी उगाया जा सकता है। सामान्यतौर पर पौधारोपन नीचे स्तर पर किया जाता है और अंकुरित पेड़ को उसी साल या अगले साल लगा दिया जाता है। यह सब कुछ रुट स्टॉक (पौधे) के आकार को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।

 पौधों के बीच दूरियां

पौधारोपन के लिए बड़ा और पर्याप्त गड्ढा खोदा जाना चाहिए ताकि इसकी जड़ें अच्छी तरह इसमे समा सके। सामान्यतौर पर नर्सरी या डिब्बे के मुकाबले पिस्ता के पौधे को एक इंच नीचे लगाना चाहिए। और जब बात पौधों के बीच दूरियों की आती है तो वह सिंचाई पर निर्भर करता है। अगर सिंचिंत बाग है तो ग्रिड पैटर्न के लिए 6 मीटर गुणा 6 मीटर की दूरी रखी जानी चाहिए।

वैसे इलाके जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं है वहां पौधों के बीच दूरी 8मीटर गुणा 10 मीटर होनी चाहिए। पिस्ता के बादाम(नट) के लिए नर और मादा पेड़ को लगाना चाहिए और इसका अनुपात1:8(एक नर और आठ मादा पेड़) से 1:10(एक नर और 10 मादा पेड़) का होना चाहिए।

सिंचाई

वैसे तो पिस्ता का पेड़ सूखे को बर्दाश्त कर लेता है लेकिन उनकी देखभाल पर्याप्त नमी के साथ होनी चाहिए(जब उन्हें इसकी आवश्यकता हो)। पानी हासिल करने के लिए गीले घास का इस्तेमाल एक बेहतर तरीका हो सकता है। पानी का अच्छी तरह से उपयोग हो सके इसके लिए ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल किया जा सकता है। यहां पानी के जमाव से भी बचना चाहिए। बारिश के मौसम में सिंचाई की जरूरत नहीं होती है। पिस्ता के लिए खाद और

ऊर्वरक 

दूसरे बादाम(नट) पेड़ की तरह ही पिस्ता को भी नाइट्रोजन की जरूरत होती है, क्योंकि बादाम जैसी फसल के लिए नाइट्रोजन एक महत्वपूर्ण ऊर्वरक माना जाता है। हालांकि पौधे में पहले साल ऊर्वरक का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए लेकिन उसके बाद अगले साल से की जा सकती है।

आने वाले मौसम के दौरान प्रत्येक पिस्ता के पौधे में 450 ग्राम अमोनियम सल्फेट की मात्रा दो भाग में डाली जानी चाहिए। बाद के वर्षों में प्रति एकड़ 45 से 65 किलो वास्तविक नाइट्रोजन (एन) प्रयोग करना चाहिए। आनेवाले मौसम के दौरान नाइट्रोजन को दो भागों में बांटकर इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

पिस्ते की खेती में कार्यप्रणाली-

पिस्ता के पेड़ को इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता जाए और उसका ओपन-वेस शेप में विकास हो। पेड़ के मध्य भाग को इस तरह खुला रखना चाहिए कि वो सूर्य की रोशनी को ग्रहण कर सके ताकि अच्छी तरह से फूल खिल सके और बेहतर फल लग सके। ऐसी जरूररत चौथे या पांचवें शीत ऋतु में पड़ सकती है। पेड़ों को पतला ऱखने के लिए दूसरे दर्जे की या कम महत्वपूर्ण शाखाओं की छंटाई कर देनी चाहिए।

एक बार जब पेड़ का ढांचा अच्छी तरह शक्ल ले ले तब हल्की-फुल्की कटाई-छटाई की ही जरूरत पड़ेगी। पेड़ के स्वस्थ विकास और अच्छी किस्म के बादाम(नट) के लिए खर-पतवार का नियंत्रण दूसरा कार्य है। इस बात को सुनिश्चित करें कि पेड़ों के बीच अच्छी तरह सफाई रहे, नहीं तो जंगली घास पोषक तत्वों को हासिल करने के लिए संघर्ष करना शुरू कर देते हैं। बर्म्स(berms) के लिए तृणनाशक प्रक्रिया या जंगली घास(पहले उगनेवाले या बाद में उगनेवाले घास के लिए) को खत्म करने की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए।

पिस्ता की फसल की कटाई-

पिस्ता का पेड़ बादाम या नट के उत्पादन के लिए काफी लंबा समय लेता है। इसके अंकुरित पेड़ अगले पांच साल तक फल देने के लिए तैयार हो जाते हैं और पौधारोपन के 12 साल के बाद से पर्याप्त फल देना शुरू कर देते हैं। (अंकुरण के पांच साल बाद पिस्ता का पेड़ फल देने लगता है। जब तक सातवां या आठवां सीजन नहीं हो जाता है तब तक इस फसल की कटाई नहीं की जाती है। पहला पूरी तरह से फल उत्पादन 12वें साल के आसपास शुरू होता है)।

जब इसके गोला से छिलका उतरने लगता है तब समझ लेना चाहिए कि फल पूरी तरह तैयार हो गया है। आमतौर पर ये अवधि 6 से 10 दिनों तक बढ़ सकती है। कटाई के दौरान सावधान रहने की जरूरत है और अविकसित केरनेल से बचना चाहिए। पिस्ता की पैदावार- पिस्ता बादाम (नट) की पैदावार मौसम, किस्में और फसल प्रबंधन के तौर-तरीके पर निर्भर करता है। पौधारोपन के 10 से 12 साल बाद पिस्ता का पौधा करीब 8 से 10 किलो का उत्पादन करता है।

किसान ने बनाई छोटे किसानो के लिए फसल कटाई मशीन

खेती-बाड़ी में सबसे मेहनत का काम होता है फसल की कटाई करना। इसमें समय के साथ-साथ पैसा भी अधिक लगता है और साथ ही यह डर रहता है कि कहीं ऐसे में अगर बारिश या आंधी-तूफान आ गया तो पूरी फसल बर्बाद हो जाएगी। इन समस्याओं से निबटने के लिए जो मशीनें बनाई गईं वो सिर्फ बड़े किसानों के लिए ही लाभदायक थीं क्योंकि वह काफी महंगी होती हैं। ऐसे में छोटे किसानों की समस्यों को ध्यान में रखते हुए एक किसान ने ऐसा यन्त्र बनाया जिसे छोटे किसान आसानी से खरीद सकते हैं।

”खेत में सबसे ज्यादा समस्या कटाई में आती है। बाकी सभी काम के लिए मशीन हैं, कटाई के हार्वेस्टर (कटाई मशीन) बड़े किसान ही खरीद सकते हैं, इसलिए मुझे छोटे किसानों के लिए रिपर यानी कटाई मशीन मार्केट में लाना था।” मध्य प्रदेश के विदिशा ज़िले के सोजनवाले गाँव के किसान भगवान सिंह डांगी (63 वर्ष) बताते हैं,

”हमारे यहां सोयाबीन की खेती हेती है मैं भी करता हूं। इसकी कटाई करना काफी मुश्किल होता है था, इस लिए मैंने ऐसी मशीन बनाने का फैसला किया और पांच वर्ष पहले यह मशीन बनाई।” भगवान सिंह भले ही सिर्फ आठवी तक पढ़ें हैं, लेकिन मशीनों के प्रति उनका रुझान बचपन से ही था।

उनका रिपर विंडरोअर एक ऐसी मशीन है जो फसल काटती है और कटे अनाज की लाइन को बीच में जमा कर देता है। इस अविष्कार के लिए उन्हें तीन अवार्ड भी मिले, जिसमें उन्हें वर्ष 2013 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

उनके गाँव के आस पास के क्षेत्र में सोयाबीन एक बड़ी फसल है। फसल कटाई के व्यस्त समय में मजदूर की कमी एक बड़ी समस्या है। इसका समाधान निकालने के लिए भगवान सिंह ने एक ऐसी मशीन चाहते थे जो दो मुख्य कार्य कर सके- कटाई और विंड्रोइंग यानी कटी फसलों को एक जगह जमा करना। कटाई में पूरी फसल को व्यवस्थित तरीके से काटना और जबकि विंड्रोइंग का मतलब कटी फसल को एक लाइन में जमा करना ताकि आसानी से पैक किया जा सके और कटाई के बाद की प्रक्रिया को पूरा किया जा सके। इसके बाद उन्होंने इस रिपर को बनाने का फैसला किया।

उन्होंने बताया, ”इस मशीन से सोयाबीन, चना और गेहूं की कटाई की जा सकती है। इससे एक दिन में 10 एकड़ फसल की कटाई आसानी से की जा सकती है और अगर मज़दूरों से फसल की कटाई की जाए तो एक दिन में 20 मज़दूर सिर्फ एकड़ फसल की कटाई कर पाएंगे।”

मशीन को चलाने के लिए सिर्फ एक आदमी की जरूरत पड़ती है और मशीन के पीछे दो लोग चाहिए जो फसल को जमा करने का काम करेंगे। यह छोटे से खेत में, खड़ी फसल को नुकसान पहुंचाए बिना तेज गति से मुड़ने में सक्षम है। परंपरागत रिपर यूनिट में, प्राइमर मूवर तक पहुंचे में कटी फसल सीधे नीचे गिर जाती है जिससे अनाज का नुकसान होता है।

नई खोज में विंड्रोइंग अटैचमेंट में नयापन डिजाइन और स्थानिक उपायों में मौजूद होती है, इससे अनाज नुकसान बहुत कम होता है। जमा किया गया अनाज दोनों टायर के बीच साफ-सुथरी लाइन में गिरता है जिससे जमा करने समेत दूसरे कार्य आसानी हो जाता हैं।

वो कहते हैं कि बेहतर प्रगति के लिए खेती के तरीकों में बदलाव किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि आज खेती का ढंग अच्छा नहीं है, हमें तरक्की करने के लिए खेती करने का तरीका बदलना पड़ेगा और वो इस बदलाव में भागीदारी निभाना चाहते हैं जैसे कि, खेती के नए तरीके विकसित करके, कृषि कार्यप्रणाली और बीज की किस्मों में बदलाव कर।

अब पराली से भी होगी कमाई, 6600 के रेट से खरीदेगी ये कंपनी

कृषि‍ अवशेषों को खेतों में जलाने की समस्‍या पर लंबे समय से बहस हो रही है। कि‍सानों को इसके निपटारे का सबसे आसान रास्‍ता यही नजर आता है कि‍ उसे खेत में ही जला दि‍या जाए। इस वजह से दि‍ल्‍ली-एनसीआर में प्रदूषण का लेवल भी बढ़ता है। हालांकि‍ अब अगर कि‍सान खेत में पराली जलाएगा तो समझें कि‍ वह नोट जला रहा है, क्‍योंकि‍ पराली अब बेकार की चीज नहीं रह गई है। इसका एक बड़ा खरीददार आ गया है।

देश में सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे बड़ी बिजली उत्पादक कंपनी नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) अब पराली खरीदेगा। इसकी शुरुआत जल्‍द होने वाली है। फि‍लहाल कंपनी अपने दादरी प्‍लांट के लि‍ए रोजाना 1,000 टन कृषि अवशेष खरीदेगी।

कोई भी आ सकता है आगे कंपनी के एक प्रवक्ता ने बताया कि‍ बायोमास आधारित पैलेट्स की टेस्ट फायरिंग के आरंभिक चरण पूरे होने पर एनटीपीसी ने प्रति दिन 1000 मीट्रिक टन कृषि अवशेष आधारित ईंधन यानी बायोमास (500 मीट्रिक टन प्रतिदिन कृषि अवशेष पैलेट्स और 500 मीट्रिक टन प्रतिदिन टॉरेफाइड कृषि अवशेष पैलेटस या ब्रिकेट्स) की खरीद के लिए निविदा आमंत्रित की है।

उन्‍होंने बताया कि‍ हम चाहते हैं कि‍ इस काम में स्‍टार्टअप भी आगे आएं। एनटीपीसी ने एक्‍सपीरिएंस की कोई शर्त नहीं रखी है। अगर पर्याप्‍त संख्‍या में बोली लगाने वाले मि‍ल गए तो एनटीपीसी अपने सभी प्‍लांट के लि‍ए कृषि‍ अवशेष खरीदेगी।

यह होगी कीमत

एनटीपीसी की विज्ञप्ति के अनुसार, निविदा दो वर्षों के लिए मंगाई गई है, जिसमें रोजाना 1000 टन पराली खरीदी जाएगी। इसमें पैलेट्स की कैपिंग कीमत 5500 रुपये टन तय की गई है और ब्रिकेट्स के लि‍ए यह कीमत 6,600 रुपये प्रति टन निर्धारित की गई है।

गौरतलब है कि‍ बजट भाषण के दौरान वि‍त्‍त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि एनसीआर में प्रदूषण की स्‍थि‍ति को देखते हुए सरकार ऐसे कदम उठाएगी जि‍ससे कि‍सान कृषि अवेशेषों को खेत में ही न जलाएं।

फसल की बीमारी की फोटो खींचे ,यह ऐप एक मिंट में बताएगी ईलाज

अगर आप घर पर तरह तरह के फूलों और बागवानी पौधे उगाना पसंद करते हैं, तो प्लांटिक्स ऐप आपके गार्डेन की और भी अच्छी तरह से देखभाल करने में आपकी मदद कर सकती है।बागवानी फसलों में सबसे अधिक खतरा कीटों का होता है।

फलों व फूलों के पौधों में कई तरह के कीड़े लग जाते हैं, जिनकी पहचान न हो पाने से किसानों को काफी नुकसान सहना पड़ता है। बागवानी फसलों को कीटों के बचाने के लिए प्लांटिक्स ऐप में एक बहुत ही अच्छा फीचर है।

अगर आपके बगीचे या फिर खेत में लगे पौधों में आपको किसी कीट का प्रकोप नज़र आता है, पर आप उसे पहचान नहीं पा रहे हैं, तो आप प्लांटिक्स ऐप पर जाकर उस पौधे के सबसे अधिक प्रकोप वाले हिस्से की तस्वीर खीच लें।

 

खीची गई तस्वीर को ऐप में लगा सेंसर सिस्टम पहचान लेगा और आपको यह बता देगा कि पौधे में कौन सा कीट लगा है। इससे साथ साथ ऐप में उस कीट से पौधे को बचाने का तरीका भी बताया जाता है, जो आपकी फसल में होने वाले नुकसान को कम करने में कारगर साबित होगा।

प्लांटिक्स ऐप में बागवानी और कृषि से संबंधित फसलों की एक ई-लाइब्रेरी का भी ऑप्शन है। आप इसकी मदद से तरह तरह की फसलों में लगने वाले कीट व उनके जैविक व रासायनिक उपचारों की जानकारी भी ले सकते हैं।

कैसे डॉउनलोड करें प्लांटिक्स ऐप

प्लांटिक्स ऐप गूगल प्ले स्टोर पर नि:शुल्क उपलब्ध है, इसे डाउनलोड करने के लिए आप किसी भी एंड्रॉइड फोन में गूगल प्ले स्टोर पर जाकर Plantix – grow smart मोबाइल ऐप को डाउनलोड कर सकते हैं।

यह ऐप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

एक शहर जिसने छत पर सब्ज़ी उगाकर दूर की बेरोज़गारी

दक्षिण अफ्रीका के शहरों में खेती की एक विधा शांति से देश की शहरी गरीबी और बेरोज़गारी से लड़ रही है। दक्षिण अफ्रीका में लोग इसे शहरी खेती कहते हैं। जोहेनसबर्ग जैसे शहरों में 60 प्रतिशत तक सब्जी इसी छत वाली खेती से आती है।

शहरी खेती और कुछ नहीं, बल्कि घरों की छत पर की जाने वाली खेती ही है जिसे शौकिया तौर पर भारत में भी बहुत से शहरी करते हैं। लेकिन बस अंतर तकनीक और फसलों के चुनाव और प्रबंधन का है।

बेरोजगारी मिटाने के लिए एक गंभीर औजार

अफ्रीका में छत पर की जाने वाली या रूफटॉप खेती का शौक नहीं, बल्कि बेराज़गारी मिटाने के एक गंभीर औज़ार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके लिए वहां के प्रशासन और शोधकर्ताओं ने मिलकर ऐसी फसलों और सब्ज़ियों के सुझाव और उन्नत बीज जारी किये जो आसानी से छत पर उगाई जा सकें। इसका असर भी जल्द ही दिखने लगा।

एक छोटी सी सोच ने दिया रोजगार

अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ चैनल अलजज़ीरा के अनुसार, अफ्रीका जैसे देश में जहां हर चार में से एक व्यक्ति बेरोज़गार है, इस छोटी सी सोच ने बहुतों को रोज़गार दिया है। भारत में भी रूफटॉप खेती को लेकर कई प्रयास किये गए। साल 2014-15 में कर्नाटक सरकार ने नागरिकों को बढ़ावा देने के लिए रूफटॉप तकनीक में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं पर छूट की घोषणा की थी।

भारत के लोगों को फिलहाल फायदा नहीं

इसी तरह राजस्थान में भी घर की छत पर सब्ज़ियां उगाने वाले लोगों को सब्सिडी की तोहफा देने की घोषणा की गई थी। हालांकि भारत में ये प्रयास एकीकृत रूप से अभी तक लागू नहीं किये जा सके हैं। संगठित न होने के कारण ही इनसे लोगों और बाज़ार को फायदा नहीं हो पा रहा है

ये हैं भारत की पहली बिना क्लच और गेयर से चलने वाली कंबाइन

भारत में फसल कटाई का काम कंबाइन से किया जाता है । कंबाइन चलाना बहुत ही मुश्किल काम होता है लेकिन अब ये काम बहुत आसान होने वाला है ।भारत में अब ऐसी कंबाइन आ चुकी है जिसे चलाना बहुत ही आसान है।

इस का नाम HARVESTER [ SPLENZO 75 ]  है। यह कंबाइन बिना क्लच के काम करती है इस मे गेयर लिवर नहीं दिया गया। इस मे सभी काम बटन दबाने से होते है। अनाज निकालने के लिए भी ऑटोमैटिक बटन लगा हुआ है।

इस कंबाइन का इंजन 101 hp का है। इस की स्पीड रोड पर 36 hr है। इस कंबाइन को चलाना बहुत ही आसान है। इस को चलाते समय ड्राईवर को थकावट महसूस नहीं होती। इसे कोई भी आदमी भी आसानी से चला सकता है।

यह फसल की कटाई बहुत अच्छी तरह करती है। इस कंबाइन से फसल का नुक्सान नहीं होता। दूसरी कंबाइन के मुकाबले यह कटाई का काम बहुत जल्दी करती है।

अगर आप इस कंबाइन को खरीदना चाहते है तो निचे दिए हुए नंबर पर संपर्क कर सकते है :

  • Address : Near Bus Stand, Sunam State : Punjab Country : India
  • Pin Code : 148028
  • Phone : +91-1676-220280
  • Mobile : +91-9779911580

यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें :

DBT के सहारे कि‍सानों की इनकम दोगुना करेगी सरकार, जाने क्या है ये DBT

बजट 2018 के एलान के मुताबि‍क कि‍सानों को लागत का डेढ़ गुना एमएसपी दि‍लाने के लि‍ए सरकार डायरेक्‍ट बेनेफि‍ट ट्रांसफर का सहारा ले सकती है। इसमें आधार और 38 करोड़ जनधन एकाउंट की बड़ी भूमि‍का होगी। मुमकि‍न है कि‍ मार्च से पहले इसका एलान कर दि‍या जाएगा क्‍योंकि‍ मार्च – अप्रैल में ही रबी की फसलों का प्रोक्‍योरमेंट शुरू हो जाता है।

नीति‍ आयोग के सूत्रों के मुताबि‍क, कि‍सानों को बढ़ी हुई एमएसपी का पूरा लाभ दि‍लाने के लि‍ए सरकार डीबीटी यानी डायरेक्‍ट बेनेफि‍ट ट्रांसफर का सहारा ले सकती है। इसमें होगा ये कि अगर बाजार भाव एमएसपी से कम है तो इस अंतर का भुगतान सरकार डायरेक्‍ट कि‍सान के खाते में करेगी। इसे मध्‍यप्रदेश की भावांतर भुगतान योजना का एक्‍सपेंशन मान सकते हैं। वहां भी सरकार इसी तरह से कि‍सानों को एमएसपी का लाभ देती है।

फि‍लहाल यही ऑप्‍शन नजर आ रहा है

नीति‍ आयोग में लैंड पॉलि‍सी सेल के चेयरमैन डॉक्‍टर टी हक ने बताया कि इसके लि‍ए सरकार के पास फि‍लहाल जो ऑप्‍शन नजर आ रहे हैं उनमें सबसे फिजिबल ये है कि एमएसपी और मार्केट प्राइज के बीच जो अंतर आ रहा है उसका भुगतान सरकार करे। यह भुगतान डायरेक्‍ट कि‍सानों के खाते में कि‍या जा सकता है। फि‍लहाल जो तंत्र है उसमें फसलों का पूरा प्रोक्‍योरमेंट करना आसान नहीं है। इसलि‍ए मध्‍य प्रदेश की भावांतर योजना की तर्ज पर बजट के इस एलान को पूरा कि‍या जा सकता है।

सरकार खुद नहीं खरीद सकती

इसके अलावा दूसरा ऑप्‍शन ये है कि कुछ कमोडि‍टी जैसे दाल व रागी वगैरह को भी सरकार खरीदे और उसे पीडीएस के माध्‍यम से आगे भेजे। कर्नाटक ने इस दि‍शा में काफी काम कि‍या है। लेकि‍न फि‍लहाल ये उतना फि‍जिबल नहीं दि‍ख रहा। बड़े पैमाने पर खरीद करने के लि‍ए तंत्र उतना मजबूत नहीं है। सरकार खरीद भी लेगी तो रखेगी कहां। अभी इतनी स्‍टोरेज कैपेसि‍टी ही नहीं है।

अभी गेहूं और चावल को ही मैनेज करने में दिक्‍कते आ रही हैं। सब कमोडि‍टीज को खरीदना पॉसि‍बल नहीं होगा लेकि‍न दाल कुछ सेलेक्‍टेड कमोडिटीज को तो खरीद सकते हैं। वैसे थोड़ा ही सही मगर सरकार को इनकी दालों व मोटे अनाज की खरीदारी करनी चाहि‍ए। ऐसा करने से मार्केट प्राइस अपने आप ही बढ़ने लगता है, फि‍र एमएसपी के बराबर वैसे ही हो जाएगा।

6 फीसदी कि‍सान ही एमसपी का लाभ ले पाते हैं

एमएसपी तय करने का मकसद यही था कि‍ कि‍सानों को अपनी उपज का वाजि‍ब दाम मि‍ल सके, मगर न तो केंद्र और न ही राज्‍यों का तंत्र इतना दुरुस्‍त है कि सभी कि‍सानों तक इसका लाभ पहुंच सके। सरकारी आंकड़ों के मुताबि‍क, 6 फीसदी से भी कम कि‍सान एमएसपी का लाभ ले पाते हैं। इस तथ्‍य को ध्‍यान में रखते हुए ऐसा होना मुमकि‍न है कि‍ सरकार बाजार भाव और एमएसपी का अंतर सीधे कि‍सानों के खाते में ट्रांसफर करे।

अब किसानों को मुफ्त में मिलेगी बिजली,और साथ में कमाने का भी मौका

आम बजट 2018-19 में हुई तमाम घोषणाओं के बीच एक योजना ऐसी भी है, जो आने वाले दिनों में गेम चेंजर’ साबित हो सकती है। इस योजना के तहत देश में सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले सभी पंपों को सोलर आधारित बनाया जाएगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट पेश करते हुए इसकी घोषणा की।

योजना का नाम होगा किसान ऊर्जा सुरक्षा व उत्थान महाअभियान (कुसुम)। योजना के तहत 2022 तक देश में तीन करोड़ पंपों को बिजली या डीजल की जगह सौर ऊर्जा से चलाया जाएगा। कुसुम योजना पर कुल 1.40 लाख करोड़ रुपये की लागत आएगी।

इसमें केंद्र सरकार 48 हजार करोड़ रुपये योगदान करेगी, जबकि इतनी ही राशि राज्य सरकारें देंगी। किसानों को कुल लागत का सिर्फ 10 फीसद ही उठाना होगा, जबकि लगभग 45 हजार करोड़ रुपये का इंतजाम बैंक लोन से किया जाएगा।

बिजली मंत्री आरके सिंह ने बताया कि योजना का प्रस्ताव कैबिनेट को भेज दिया गया है। पहले चरण में उन पंप को शामिल किया जाएगा जो डीजल से चल रहे हैं। इस तरह के 17.5 लाख सिंचाई पंपों को सौर ऊर्जा से चलाने की व्यवस्था की जाएगी। इससे डीजल की खपत कम होगी।

यह योजना किसानों को दो तरह से फायदा पहुंचाएगी। एक तो उन्हें मुफ्त में सिंचाई के लिए बिजली मिलेगी और दूसरा अगर वह अतिरिक्त बिजली बना कर ग्रिड को भेजते हैं तो उसके बदले कीमत भी मिलेगी। योजना का विस्तृत प्रस्ताव सचिवों की समिति को भेजा गया है। उसके बाद कैबिनेट इसे मंजूरी देगा। इसे आगामी वित्त वर्ष से ही लागू किया जाएगा।

सरकार की योजना कहती है कि अगर देश के सभी सिंचाई पंपों में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल होने लगे तो न सिर्फ मौजूदा बिजली की बचत होगी बल्कि 28 हजार मेगावाट अतिरिक्त बिजली का उत्पादन भी संभव होगा। कुसुम योजना के अगले चरण में सरकार किसानों को उनके खेतों के ऊपर या खेतों की मेड़ों पर सोलर पैनल लगा कर सौर ऊर्जा बनाने की छूट देगी।

यह किसानों को आय का एक अतिरिक्त जरिया देगा। साथ ही इस योजना के पूरी तरह से लागू होने से कृषि क्षेत्र में बिजली देने की मौजूदा सारी दिक्कतें खत्म हो जाएंगी, क्योंकि किसानों को इसकी जरूरत नहीं होगी। इसका एक असर होगा कि किसानों को मुफ्त बिजली दे कर शहरी उपभोक्ताओं से बिजली शुल्क वसूलने की मौजूदा राजनीति का भी समापन हो जाएगा।

एमबीए और इंजीनियरिंग करने के बाद शुरू की खेती, 6 साल में टर्नओवर हो गया 11 करोड़ रूपये …

जहां आज गांव के नौजवान खेती को छोडते जा रहें है वहीं उत्तर प्रदेश के दो भाईयों ने एमबीए और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद खेती-बाड़ी को अपना लिया है. 4 साल की मेहनत के बाद अब इनका 11 करोड़ का सालाना टर्नओवर है.

दोनों भाइयों ने बातचीत में बताया कि 2011 में इन्हें जॉब के लिए 4 लाख का पैकेज मिला था. लेकिन ये बिजनेस करना चाहते थे, इसलिए इन्होंने टेक्नॉलजी के माध्यम से खेती करने की ठान ली.

ऐसे आया खेती करने का ख्याल

लखनऊ के रहने वाले अभिषेक भट्ट कहते हैं, मेरे पिता की इंजीनियरिंग की नौकरी थी. इसलिए हम दोनों भाइयों को भी इसी फील्ड के लिए प्रोत्साहित किया गया. 2011 में मैंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डि‍ग्री हासिल की, जबकि भाई ने एमबीए कम्पलीट किया. पासआउट होते ही मुझे 4 लाख पैकेज की जॉब ऑफर हुई थी, लेकिन मैंने नहीं की. हम सिर्फ जॉब के भरोसे नहीं रहना चाहते थे. कुछ अलग करने की चाह थी.

एक बार मैं बैगलोर अपने अंकल के पास गया. उस वक्त वो किराए पर जमीन लेकर कैप्सकम यानी शि‍मला मिर्च की खेती करते थे. जिससे उनको लाखों की इनकम हो रही थी. वो देख मुझे बड़ा अजीब लगा क्योंकि हमारे यहां लोगों के पास जमीन होने के बावजूद वो खेती नहीं करते.

वहीं से मुझे खेती का ख्याल आया और हम दोनों भाइयों ने एग्रीकल्चर बिजनेस की बारीकियां सीखीं. इसके बाद हम अंकल के साथ महाराष्ट्र गए और वहां के किसानों के खेती करने का तरीका और उससे होने वाले बिजनेस को समझा.

वहां के किसानों की मार्केटिंग देख हमारे अंदर थोड़ा बहुत जो डर था, वो भी खत्म हो गया और हम अपनी तैयारी में जुट गए. मैंने टेक्निकल काम और खेती पर ध्यान दिया. भाई शशांक ने उसकी ब्रांडिग और मार्केटिंग पर काम किया.

बिजनेस पहुंचा सालाना 11 करोड़ टर्नओवर

साल 2011 में हमने ‘एग्रीप्लास्ट’ नाम से फर्म का पंजीकरण कराया. लखनऊ से थोड़ी दूर देवां रोड पर 3 एकड़ जमीन किराए पर ली, जिसका किराया प्रति एकड़ के हिसाब से 1 लाख रुपए सालाना है.

पहले कैप्सिकम की खेती शुरू की, फिर उसके आसपास अन्य सब्जियां उगाने लगे. थोड़े समय में ही छोटे-छोटे व्यापारी हमारे पास सब्ज‍ियां खरीदने आने लगे. 6 महीने में हमारे सेटअप को देखने के लिए आसपास के कई गांवों से लोग आने लगे.

3 साल तक शिमला मिर्च की खेती की. पहले साल 5 लाख रुपए की लागत आई, 8 लाख का टर्नओवर हुआ. 3 लाख का शुद्ध मुनाफा हुआ. दूसरे साल 7 लाख, तीसरे साल 12 लाख का मुनाफा हुआ.

प्रॉफिट से मिले पैसे से हमने और जमीनें किराए पर ली और उनपर भी खेती शुरू कर दी. हम इजराइली टेक्नॉलिजी से विदेशों में डिमांड होने वाले फूल और सब्ज‍ियों की खेती करते हैं. साल 2017-18 में हमारा टर्नओवर 11 करोड़ का रहा. यह दोनों भाई उन युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत है जो कृषि को छोड़कर शहरो का रुख करते हैं .

यह 20 रुपये की शीशी बनाएगी फसलों अवशोष की जैविक खाद ,

किसान अपने खेत में फसल उगाने में कड़ी मेहनत करता है लेकिन जब किसान को किसी समस्या का सामना करना पड़ता है तो उस समय किसानों को बड़ी परेशानी होती है. इस समय एक ऐसी ही समस्या सामने आई है जिससे किसान के साथ आम आदमी भी परेशान नजर आ रहा है. लेकिन आम आदमी से कहीं ज्यादा परेशान किसान है। यह समस्या है फसल के बचे हुए अवशेषों को जलाने की। जिससे कुछ लोगो सांस लेने में परेशानी हो रही है। यह मसला पिछले काफी समय से चला आ रहा है।

सरकार भी इस परेशानी से अच्छी तरह वाकिफ है, लेकिन अभी तक इस समस्या का सटीक समाधान नहीं मिल पाया है, फसल अवशेष जलाने की समस्या सिर्फ एक या दो राज्यों में नही बल्कि देश के कई राज्यों में है सभी जानते हैं कि देश के अलग-अलग राज्यों में कई तरह की फसलें उगाई जाती हैं, लेकिन कुछ फसलों की कटाई के बाद उनके अवशेष को किसान जला देते हैं।

लेकिन अभी किसानो को एक 20 रुपये की शीशी वेस्ट डी कम्पोसर में नई उम्मीद दिख रही है । इसके इस्तेमाल से ना सिर्फ किसानो को फसलों के अवशोष जलाने की जरूरत रहेगी साथ ही खेतों को देसी खाद भी मिलेगी ।

कैसे कर सकते है इस्तेमाल

वेस्ट डीकम्पोसर का इस्तेमाल करने के लिए आपको फसल की कटाई से पहले 200 लीटर वेस्ट डी कम्पोसर सॉल्यूशन को प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें, इसके बाद फसल कटाई के बाद रोटावेटर की सहायता से फसल को मिट्टी में मिला दें। इसके बाद 20-25 दिनों के बाद फसल अवशेष बिना किसी समस्या के खेत में मिल जाता है।

इसके अलावा दूसरा तरीका यह है के फसल कटाई के बाद सिंचाई में पानी के साथ वेस्ट डीकम्पोस्टर साल्यूशन को खेत में मिला देना चाहिए, इसके बाद रोटावेटर की सहायता से फसल को मिट्टी में मिला दें। इसके बाद 20-25 दिनों के बाद फसल अवशेष बिना किसी समस्या के खेत में मिल जाता है।

अगर आप इस जैविक खाद को खरीदना चाहते है तो यह आपको एक छोटी शीशी में मिलेगा। इसको त्यार करने का तरीका भी बहुत आसान है । इसको त्यार करने के लिएवेस्ट डीकम्पोस्टर को 200 लीटर पानी में दो किलो गुड़ डालकर इस विशेष जैविक खाद को उसमें मिला दिया जाता है। इस 200 लीटर घोल में से एक बाल्टी घोल को फिर 200 लीटर पानी में मिला लें।

इस तरह यह घोल बनाते रहें। खेत की सिंचाई करते समय पानी में इस घोल को डालते रहें। ड्रिप सिंचाई के साथ इस घोल का प्रयोग कर सकते हैं, जिससे यह पूरे खेत में यह फैल जाएगा।