कमाल की है ये पत्थर इकट्ठा करने वाली मशीन,यहाँ से खरीदें

पत्थर किसी भी खेत के लिए सबसे बड़ी समस्या होती है । पत्थरों की वजह से कई बार उपजाऊ जमीन पर भी फसल नहीं उगती है । इस लिए इन पथरों को खेत से हटाना बहुत ही जरूरी है । लेकिन अगर एक एक पत्थर चुन कर निकलना पड़े तो ये बहुत ही मेहनत वाला नामुनकिन सा काम लगता है।

लेकिन अब एक ऐसी मशीन आ गई है जो इस काम को बड़ी आसानी से कर सकती है और वो भी तेज़ी के साथ । इस मशीन को स्टोन पिकर बोलते है । इस मशीन को धीमान एग्रो इंडस्ट्रीज द्वारा त्यार किया गया है । इस मशीन की कीमत लगभग 1 लाख 95 हज़ार है । इस कंपनी के इलवा भी और बहुत सारी कंपनी है जो इस तरह की मशीन त्यार करती है ।

इस मशीन को खरीदने के लिए जा किसी और जानकारी के लिए आप इन नंबर पर संपर्क कर सकते है।Contact: 9803610000 , +91 8968650085.

ये कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें

पौधों को जल्दी बड़ा करने के लिए ऐसे करें डिस्प्रीन का प्रयोग

दोस्तों आप ने एस्प्रिन का पौधों पर इस्तेमाल सुना ही होगा आज हम आपको बताएँगे की सच्च में एस्प्रिन डालने से पौधे तेज़ी से बढ़ते है जा नहीं। उसके लिए हम एक छोटा सा प्रयोग करेंगे ।

इसमें हम दो गमले लेंगे । एक गमले में हम बीज डिस्प्रीन में भिगो कर लगाएंगे और दूसरी तरफ पानी में भिगो कर लगाएंगे । भारत में एस्प्रिन की टेबलेट अब डिस्प्रीन के नाम से मिलती है ।

डिस्प्रीन को पानी में घोलने के बाद उसमे बीज कुछ घंटो के लिए भिगो कर लगाना है । बीज लगाने के बाद आप देख सकते है की कैसे डिस्प्रीन में भिगो कर लगाने वाले बीज बड़ी तेज़ी से बढ़ते है और दूसरे गमले वाले बीज बहुत धीरे ग्रोथ करते है तो इस से ये साबित होता है की एस्प्रिन पौधों की ग्रोथ के बढ़ाती है ।

वीडियो भी देखें

इसके इलावा कई बार होता है कि हमारे बगीचे के पौधों में फंगस लग जाती है जिसके कारण पौधे मुरझा जाते हैं व उनकी चमक भी खो जाती है । इस कमी को दूर करने के लिए आप एक गैलन पानी में एक डिस्प्रीन मिला दें जिसके कारण पौधों में फंगस नहीं लगेगा और आपके बगीचे की ताजगी बरकरार रहेगी।

जानिए इस समय बढ़ते तापमान के साथ किस फसल की बुवाई की जाए,

किसान भाइयों इस हफ्ते तापमान के आधार पर आपको केंद्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली के सुझाव के अनुसार कुछ फसलों की बुवाई कर देनी चाहिए। इसमें चारा के लिए कुछ प्रमुख फसलें जैसे मक्का सौर्गम, बाजरा लोबिया आदि हैं। लेकिन इनकी बुवाई के लिए पर्याप्त मात्रा में नमी सुनिश्चित कर लेनी चाहिए। बेबीकार्न की संकर किस्म HM-4 की बुवाई के लिए मौसम अनुकूल है।

तो वहीं सब्जी की फसलों में भिंडी की फसल की बुवाई कर सकते हैं जिसके लिए आपको खेत में नमी बरकारार रखनी होगी साथ ही इसकी कुछ किस्में हैं जो कि इस समय की बुवाई के लिए ठीक रहेंगी जैसे- A-4, बरबनी क्रांति, हिसार उनत, पंजाब पद्मिनी, अर्क अनामिका। इस फसल की बुवाई के लिए 8 से 10 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ की दर से बोना चाहिए। बीज बोने से पहले खेत में डीकम्पोज़र एफवाईएम का इस्तेमाल करना चाहिए।

टमाटर की फसल में फल-बेधक के प्रकोप के चलते खराब फल को हाथ से तोड़कर उसे अलग कर देने का सुझाव दिया जाता है साथ ही फेरोमैन ट्रैप 2 से 3 एकड़ की दर से इस्तेमाल कर आप फल-बेधक की पहचान कर सकते हैं। प्याज की समय के अनुरूप की बोई गयी फसल में थ्राइप्स का खतरा बना रहता है जिसके लिए इमिडाक्लोप्रिड की 0.5 मिलीलिटर मात्रा को एक लिटर पानी में 1 ग्राम टाइपोल प्रति लिटर पानी के साथ घोलकर नियंत्रित किया जा सकता है।

आम की फसल में मैंगो मिली बग व आम में लगने वाला फुदका का प्रकोप बढ़ सकता है जिसके नियंत्रण का प्रबंध करना चाहिए। इसके अतिरिक्त काला चना व हरा चने की बुवाई के लिए इस समय का मौसम अनुकूल है जिसके लिए आपको हरा चना के लिए पूसा विसाल, पूसा 9531, पीडीएम-11, एसएमएल- 668 जबकि काला चना के लिए पंत उर्द-19, पंत उर्द-30 व 35 किस्मों की बुवाई का सुझाव दिया गया है।

सब्जी की खेती में बढ़ते तापमान के आधार पर किसान भाइयों को सिंचाईं करने की सलाह है जिसके फलस्वरूप नमी बरकरार रखी जा सके।

यह गन्ना किसान एक एकड़ से कमाता है 2 लाख 80 हज़ार रुपए

 

युवाओं का कृषि के प्रति बढ़ते रुझान की मिसाल उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में रहने वाले किसान अचल मिश्रा ने पेश की है। इन्होंने गन्ने की आधुनिक तरीके से खेती करते हुए कई बार प्रदेश स्तरीय व जिला स्तरीय पुरुस्कार प्राप्त किए हैं। इस वर्ष भी इन्होंने गन्ना के अच्छे उत्पादन के मद्देनज़र जिले में प्रथम पुरुस्कार प्राप्त किया है।

उनका मानना है कि गन्ने की खेती के लिए उन्होंने केंद्रीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ व कोयबंटूर स्थिति अनुसंधान केंद्रों से सफल खेती की जानकारी प्राप्त की है। यदि उनकी शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो वह लखनऊ विश्वविद्दालय से एल.एल.बी की डिग्री हासिल की है।

वर्ष 2005 से खेती प्रारंभ करने वाले अचल ने साल 2007-08 में गन्ना की खेती से सर्वाधिक उत्पादन के पैमानों पर खरा उतरते हुए उत्तर प्रदेश में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इस वर्ष भी उन्होंने गन्ने की COO- 238 किस्म से प्रति बीघे लगभग 250 क्विंटल से ऊपर की उपज प्राप्त की है। जिस दौरान गन्ने की लंबाई लगभग 18.5 फीट प्राप्त की साथ ही वजन भी अच्छा आंका गया।

बताते चलें कि गन्ने की खेती में वह गोबर की खाद,हरी खाद आदि का इस्तेमाल करते हैं। साथ ही कीटनाशकों आदि का इस्तेमाल कम से कम करते हैं। पेड़ी की फसल के दौरान वह गन्ने की पत्ती को सड़ाकर एक बेहतर खाद के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। यूरिया का इस्तेमाल वह स्प्रे के तौर पर करते हैं। जिस दौरान उसकी 2 से 3 किलोग्राम की मात्रा प्रति एकड़ स्प्रे करते हैं। तो वहीं उनका मानना है यह भी है कि गन्ने की खेती विशेषकर पानी पर निर्भर करती है।

उन्होंने 12 बीघे की खेती से यह साबित कर दिया कि कम रकबे में अच्छी खेती के द्वारा अच्छी कमाई की जा सकती है। शुरुआती दौर में उन्होंने खेती की अधिक जानकारी न होने के कारण महाराष्ट्र के किसानों से भी मुलाकात कर जानकारी ली और गन्ने की अच्छी खेती के गुर सीखे। एक एकड़ की खेती से अचल ने अब 2 लाख 80 हजार रुपए की शुद्ध बचत प्राप्त की।

एक किसान ने महीनों की मेहनत से उगाई 400 किलो गोभी को ख़राब कर दिया

हम जिस देश में रहते हैं उसकी पूरी दुनिया में एक प्रधान देश के रूप में पहचान है. और देश में किसान को अन्नदाता भी कहा जाता है. लेकिन सबको भर पेट खाना देने वाला यही किसान जाने कितने सालों से आये दिन भूखा रह जाता है.

कभी सोचा है कि आने वाले समय में देश के इस अन्नदाता का क्या होगा? अब आप सोच रहे होंगे कि हम आपसे ये सवाल क्यों कर रहे हैं… तो इसका जवाब भी हम आपको दे देते हैं. हम ऐसा इसलिए बोल रहे हैं क्योंकि जो किसान पूरे साल मेहनत करके हमारे लिए सैंकड़ों किलो अनाज, फल, सब्ज़ियां उगाता है, उसको उसकी साल भर की मेहनत का इतना फल (पैसा) नहीं मिलता है कि वो एक हफ़्ते भी ठीक से खाना खा सके.

जी हां, ऐसा ही कुछ हुआ है महाराष्ट्र के एक किसान के साथ, जिसने दिन-रात मेहनत करके 400 किलो फूल गोभी का उत्पादन किया पर जब वो मार्केट में उसे बेचने गया तो उसे मात्र 442 रुपये देने की बात की गई. मतलब कि 1 किलो फूल गोभी 1 रुपये और 10 पैसे में.

जबकि मार्केट में जब हम लोग गोभी खरीदने जाते हैं तो 10 रुपये किलो से कम में तो कभी भी नहीं मिलती है. शायद आप भी सहमत होंगे मेरी इस बात से

जो लोग ऑनलाइन फ़्रेश सब्ज़ी खरीदते हैं, ताकि उनको उनके दरवाज़े पर ताज़ी सब्ज़ी मिले, क्या वो जानते हैं कि ये सब्ज़ी किसानों से कितने कम दामों में खरीदी जाती है और ऑनलाइन उसको अच्छी खासी कीमत में बेचा जाता है. बावजूद इसके वो ऐसा करते हैं तो ऐसे लोगों को किसान की दयनीय स्थिति से कोई मतलब नहीं होता है.

लेकिन एक कड़वा सच ये है कि अगर किसान की बात की जाए तो वो महीनों या सालभर मेहनत करके फ़सल उगाता है. इतना ही सालभर फ़सल को कीड़े, या किसी बीमारी से बचाने के लिए तरह-तरह के फ़र्टिलाइज़र्स, पेस्टिसाइड्स आदि को भी समय-समय पर डालता है.

एक बार की फसल के लिए एक किसान अपनी जमा-पूंजी सब कुछ दांव पर लगा देता है और उसके बदले उसको ना के बराबर पैसा मिलता है. अधिकतर मामलों में तो उनको इसके एवज में इतना भी नहीं मिलता, जितना कि उन्होंने उस पर खर्च किया होता है, और इसका नतीजा ये होता है वो क़र्ज़ के दलदल में फंसता चला जाता है, जहां से निकलना उसके लिए नामुमकिन ही होता है.

ऐसी ही कहानी है महाराष्ट्र के एक किसान की जो जलना जिले में रहकर खेती करता है. उसका एक बेहद ही परेशान करने वाला वीडियो ऑनलाइन पोस्ट किया गया है, जिसमें वो अपनी अपनी गोभी की पूरी फसल, जो उनने महीनों की मेहनत करके उगाई थी, को ख़ुद ही बर्बाद कर रहा है.

इस किसान ने ये कठोर कदम इसलिए लिया क्योंकि उसको 400 किलो गोभी के बदले मात्र 442 रुपये देने की बात की गई. 16 मार्च को पूरे महाराष्ट्र में फूलगोभी की कीमत निम्नानुसार है:

  • इस्लामपुर में 90 रुपये प्रति क्विंटल
  • पंढरपुर में 200 रुपये प्रति क्विंटल
  • नासिक में 285 रुपये प्रति क्विंटल
  • कोल्हापुर में 350 रुपये प्रति क्विंटल

सोर ऊर्जा से इस किसान ने कीटों को भगाने के लिए खोजा अनोखा तरीका

पिछले कुछ सालों में कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल से पर्यावरण के लिए कई तरह के खतरे पैदा हो रहे हैं। इससे न सिर्फ अनाज ज़हरीला हो जाता है बल्कि इससे ग्राउंड वॉटर टेबल भी बिगड़ रही है।

आजकल देशभर के हज़ारों किसान इस बात को समझ चुके हैं कि रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के इस्तेमाल से पर्यावरण को कितना नुकसान हो रहा है और हमारी सेहत को भी खतरा है। इसी को देखते हुए वे अब इसके लिए नए और सुरक्षित तरीके खोज रहे हैं।

केरल के पलक्कड़ ज़िले के चित्तूर ब्लॉक में इलापुल्ली गांव के एक किसान ने अपने खेत से कीटों को भगाने का एक अनोखा तरीका खोजा है। चंद्रन नाम के इस किसान ने कीटों से छुटकारा पाने के लिए एक सस्ता और इको फ्रेंडली उपाय खोजा है जो सूर्य की रोशनी से काम करता है।

केरल के एक लोकल न्यूज़ पोर्टल मातृभूमि में छपी ख़बर के मुताबिक, चंद्रन अपने 6 एकड़ के खेत में धान की खेती करते हैं। वह यहां के कृषि विभाग द्वारा बताई जाने वाली तकनीकों के साथ अक्सर नए एक्सपेरिमेंट करते रहते हैं।

उन्होंने एक ऐसा सोलर लाइट ट्रैप बनाया है जो कीटों को मार देता है और किसी रासायनिक कीटनाशकी की ज़रूरत भी नहीं पड़ती। इस उपकरण को बनाने के लिए एक ट्राइपॉड के ऊपर एक कटोरी रखी और उसमें एक एलईडी बल्ब और सोलर पैनल लगाया गया।

इस उपकरण को चलाना बहुत ही आसान है। बल्ब से शाम को 6.30 से 9.30 बजे के बीच नीली रोशनी निकलती है जो कीटों को अपनी ओर आकर्षित करती है। बल्ब के ठीक नीचे एक ज़हर का ट्रैप है जो न सिर्फ इन कीटों को पकड़ लेता है बल्कि वे तुरंत मर भी जाते हैं।

ये मशीन सिर्फ उसी समय काम करती है जब कीटों का हमला खेत में सबसे ज्यादा होता है। 10 बजे के बाद ये मशीन काम नहीं करती ताकि खेत को फायदा पहुंचाने वाले कीटों को नुकसान न पहुंचे।ये मीशन सोलर एनर्जी की मदद से अपने आप काम करती है।

चंद्रन की बनाई इस मशीन से फसल की कीटों से रक्षा भी हो जाती है और वह रासायनिक कीटनाशकों से सुरक्षित भी रहती है। उनकी इस मशीन के फायदों को देखते हुए एलाप्पुल्ली के कई किसानों ने अपने खेतों में ये उपकरण लगाया है।

ये उपकरण पूरी तरह से ऑटोमैटिक है बस कटोरी में रखे पॉइज़न ट्रैप को दो दिनों में बदलने की ज़रूरत होती है। किसान एक खेत में एक से ज्यादा उपकरण लगा सकते हैं और इसकी जगह में भी बदलाव कर सकते हैं। एलाप्पुल्ली के कृषि भवन में फील्ड असिस्टेंट रजिता कहती हैं कि ये ट्रैप इको फ्रेंडली है और रासायनिक कीटनाशकों से अपनी फसल को बचाने का अच्छा उपाय भी।

खेती तो बहुत लोग करते है मगर इस लड़के की तरह करें तो होगी लाखों की कमाई

खेती की ओर लगातार युवाओं का रुझान बढ़ता रहा है. आज ऐसे ही लड़के की कहानी बताने जा रहे हैं. जिन्होंने हाइड्रोपोनिक फार्मिंग करने के लिए अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी को बेच दिया. गोवा में रहने वाले अजय नायक को हमेशा ये बात परेशान करती थी अगर वह खेती करेंगे, तो लोग क्या कहेंगे. लेकिन उन्होंने अपने दिल की सुनी और खेती में करियर बनाया.

ऐसे शुरू किया करियर

अजय कर्नाटक के रहने वाले हैं. इंजीनियरिंग करने के बाद नौकरी की तलाश में वह गोवा पहुंच गए थे. जहां उन्होंने 2011 में अपनी मोबाइल एप्लीकेशन निर्माता कंपनी की शुरुआत की. जिसके बाद उनकी इस कंपनी ने काफी अच्छा बिजनेस किया. लेकिन एक सफल कंपनी के मालिक होने के बावजूद वे हमेशा रासायनिक तरीके से पैदा की गई सब्जियों को लेकर टेंशन में रहते थे. जिसके बाद उन्होंने सोचा कि जैविक विधि से खेती करने के साथ ही क्यों न किसानों को जागरूक भी किया जाए.

जिसके बाद वह खेती से संबंधित चीजों के बारे में पढ़ने लगे. उन्होंने पुणे (महाराष्ट्र) के एक हाइड्रोपोनिक फार्मर से ट्रेनिंग ली. ट्रेनिंग लेने के बाद साल 2016 में उन्होंने अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी कोे खेती के लिए बेच दिया.

क्या है हाइड्रोपोनिक खेती

फसल उगाने की इस तकनीक में मिट्टी की जगह पानी ले लेता है. इसके अलावा इसमें पानी का भी उतना ही इस्तेमाल किया जाता है, जितनी फसल को जरूरत हो. पानी की सही मात्रा और सूरज के प्रकाश से पौधे अपना विकास करते हैं. इसमें अलग-अलग चैनल बना कर पोषक तत्त्वों युक्त पानी पौधों तक पहुंचाया जाता है.

लाखों रुपये में होती है कमाई

अजय को खेती के दौरान काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. लेकिन कृषि फार्म में उन्होंने और उनकी टीम ने दिन-रात मेहनत की. आज अजय और उनकी टीम अपने कृषि फार्म की ऑर्गैनिक सब्जियों से हर महीने लाखों रुपए की कमाई करती है.

आज अजय की टीम हाइड्रोपोनिक फार्मिंग में अच्छे से जुट गई है. इस फार्म में फिलहाल वह सलाद से संबंधित वनस्पति ही उगा रहे हैं. आगे चल कर उसका खीरा, शिमला मिर्च और स्ट्राबेरी उगाने का भी इरादा है. उनके फार्म की सब्जियों की डिमांड राज्य के फाइव स्टार होटलों, सुपर मार्केट और कृषक बाजारों में काफी है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अजय ने बताया कि खेती की इस तकनीक में शुरुआती समय में लागत काफी ज्यादा आती है, लेकिन बाद में फायदा जरूर होता है. उन्होंने कहा देश में खाना सब चाहते हैं, लेकिन उगाना कोई नहीं चाहता.

किसान ने 1.5 लाख रुपए खर्च कर शुरू की केसर की खेती

गुड़गांव के खंड के गांव खंडेवला के युवा जमीदार प्रदीप पुत्र रामकरण कटारिया द्वारा फसल चक्र में किए गए बदलाव के कारण वह चर्चा का विषय बना हुआ है। उसने गेंहू की आगेर्निक खेती को तो बढ़ावा दिया ही साथ में बेस कीमती फसल माने जाने वाली केसर की खेती करके सभी को आश्चर्य में डाल दिया है। केसर की खेती में सफलता मिलने से प्रदीप फूला नहीं समा रहा है।

वह जिले का पहला किसान है जिसने आधा एकड़ भूमि में केसर की खेती की और अपनी मेहनत और सच्ची लगन से केसर की चुटाई का कार्य कर रहा है। उसकी माने तो उसने कम खर्च में ज्यादा कमाई और रातो रात अमीर बनने के सपने को मानों पंख से लग गए है। आधा एकड में अभी तक करीब पांच किलो केसर की चुटाई कर चुका है और 10 से 12 किलों होने की और उम्मीद जताई है। जिसके कारण वह क्षेत्र के लोगों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

प्रदीप कटारिया ने बताया कि उसके पास करीब 17 एकड़ भूमि है। वह हर बार गेंहू, सरसों, और जौ की खेती करता था। वह कृषि विभाग द्वारा चलाए जाने वाले जागरुकता सेमिनार में भाग लेता था । कृषि वैज्ञानिक आगेर्निंक खेती को तो बढ़ावा देने पर बल देते थे।

जिसके चलते पिछले तीन वर्षों में उसने अपने खेतों में डीएपी, यूरिया आदि का प्रयोग नहीं किया और केवल आगेर्निंक खाद का ही प्रयोग किया। जिसके कारण उसकी गेंहू, जौ, सरसों आदि की फसल भी बेहतरीन होने लगी। इसी दौरान एक सेवानिवृत कृषि चिकित्सक ने उसे केसर की खेती करने के लिए सुझाव दिए।

केसर की खेती करने के लिए कैनेडा से अमेरिकन केसर सैफरान का बीज 3 लाख 28 हजार रुपए किलों की दर से आधा किलों मंगवाया और आधा एकड़ भूमि में अक्टूबर माह में एक-एक फीट की दूरी पर बिजाई कर दी।

उसके बाद 20 से 25 दिनों में अन्य फसलों की तरह पानी से सिंचाई करते रहे। उन्होंने बताया कि इस फसल में फंगस का रोग होता है। उसके बचाव के लिए भी देशी उपाय के रुप में उसने नीम के पत्ते, आकडा और धतूरे के पत्तों को पानी में उबाल कर फसल पर छिडकाव और जडों में छोडा जिसके कारण उसकी केसर की फसल सुरक्षित रहीं।

 

इसमें तापमान 8 से 10 डिग्री तक होना चाहिए। इसमें बरसात काफी लाभकारी और तेज हवा और ओलावृष्टी नुकसानदायक है। उसने बताया कि मार्किट में केसर की कीमत ढ़ाई से तीन लाख रुपए किलो बताई जा रही है। इस खेती का सबसे बडा फायदा यह है कि इसके बीज, केसर तो मेहंगे बिकते ही है साथ में फसल के शेष बचे अवशेष भी हवन सामग्री में प्रयोग किए जाते है।

केसर को बेचने के लिए वह राजस्थान या गुजरात के व्यापारियों से सम्र्पक् करेंगे। साथ उसने क्षेत्र के किसानों से भी इस कम लागत वाली व अधिक मुनाफा देने वाली खेती को अपनाने के लिए आवाहन किया है।

उन्होंने बताया कि वह गेंहू, जौ, सरसों की के लिए जो कठिन परिश्रम करके भी नहीं कमा पाए वह मात्र आधा एकड भूमि में केसर की खेती से लाभ कमा चुके है। उन्होंने बताया कि यह खेती कम जमीन वाले किसानों के लिए काफी लाभदायक साबित होगी। मात्र 6 माह में ही लखपति होने का सपना साकार हो सकता है। इसमें सिर्फ मामली देखभल और फिर किसान मालामाल हो जाता है।

सब्जी की खेती ने बदली किस्मत, सालाना 3 फसलें और 3 गुना आमदनी

गांव अभोली के किसान गुरदीप सिंह ने अपने खेतों में उत्तम क्वालिटी का आलू उत्पादन कर न केवल खेती में बड़ा मुकाम हासिल किया है, बल्कि वह पारंपरिक खेती से तीन गुणा आमदनी सब्जियों से लेता है।

उसके खेत में उत्पादित आलू चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार में उत्तम क्वालिटी सब्जी कंपीटीशन में तीन बार प्रथम स्थान रहा है। इसी उपलब्धि पर किसान को बड़े किसान मेले में पांच बार मुख्यातिथि से सम्मान भी मिला है। वहीं गुरदीप सिंह अब दूसरे किसानों को सब्जी की खेती के लिए प्रेरित भी करता है।

किसान गुरदीप सिंह का सब्जी उत्पादन में कोई सानी नहीं है, क्याेंकि उसके खेत में उत्पादित सब्जियां उत्तम क्वालिटी की होती हैं। कृषि विभाग के अधिकारी भी इसकी पुष्टि करते हैं। किसान गुरदीप सिंह ने बताया कि उसके पास 14 एकड़ जमीन है। घाटे का सौदा बनी पारपंरिक खेती से उसके परिवार का गुजारा मुश्किल था, लेकिन 20 साल पहले वह कृषि विशेषज्ञों के संपर्क में आया, तो उसको सब्जियाें की खेती की सलाह मिली।

उसके बाद उसने सब्जियों की खेती करना शुरू कर दिया। सब्जियों के उत्पादन से पारंपरिक खेती के मुकाबले तीन गुणा प्रति एकड़ आमदन होती है, क्योंकि साल में वह तीन सब्जियों की फसलें लेता है। वहीं उसके खेतों में उत्पादित आलू चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार में उत्तम क्वालिटी में प्रथम रहता है। उसको हर साल किसान मेले में मुख्यातिथि की ओर से आलू की उत्तम क्वालिटी पर सम्मान मिलता है।

गांव अभोली के किसान गुरदीप सिंह के खेत में उत्पादित आलू अच्छी क्वालिटी में पांच बार हरियाणा में प्रथम रहा

भिंडी की फसल से खरपतवार की निराई करवाता किसान गुरदीप सिंह।

सब्जियों की खेती से दर्जनों को मिलता है रोजगार:गुरदीप सिंह ने बताया कि सब्जियों के उत्पादन से किसान अपनी आमदनी बढ़ा सकता है। इसके अलावा ग्रामीण स्तर पर लोगों को रोजगार भी मिलता है, क्योंकि वह अपने खेतों में 20 सालों से सब्जी उगाता है।

जहां रोजाना करीब 25 लोगों को रोजगार मिलता है। इसके अलावा उसके खेतों में प्रतिदिन दर्जनों किसान विजिट करने पहुंचते हैं। किसान उनको सब्जी उत्पादन के लिए प्रेरित करता है।

सब्जियों की खेती से किसान ले सकते हैं अच्छी आमदनी

कृषि विज्ञान केंद्र में मृदा विशेषज्ञ डॉ. देवेंद्र जांखड़ ने बताया कि सब्जियों के उत्पादन से जहां किसान अच्छी आमदन ले सकते हैं। वहीं भूमि की उपजाऊ शक्ति में भी इजाफा होता है। इसका उदाहरण गांव अभोली में किसान गुरदीप सिंह सब्जियों के उत्पादन से पारंपरिक खेती के मुकाबले तीन गुणा आमदन खेती से लेता है। यह किसान के खेत में उत्पादिक आलू उत्तम क्वालिटी का भी होता है, क्योंकि यह किसान की मेहनत व लग्न का नतीजा है।

आखिर सरकार ने कर दी वो घोषणा जिसका किसानो को बहुत वक़्त से था इंतज़ार

कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने आज कहा कि खरीफ फसलों के आने के पहले ही किसानों के लिए फसलों की लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित कर दिया जाएगा। सिंह ने फिक्की की ओर से आयोजित मक्का सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि कुछ फसलों पर कृषि लागत का डेढ गुना मूल्य दिया जा रहा है लेकिन कुछ फसलों को यह मूल्य नहीं मिल रहा है।

खरीफ फसल के पहले ही सभी फसलों का बढा हुआ समर्थन मूल्य घोषित कर दिया जाएगा। इस संबंध में नीति आयोग से चर्चा की गई है और राज्यों के साथ भी विचार विमर्श किया जाएगा। उन्होंने कहा कि मक्का का भी मूल्य उत्पादन लागत का डेढ़ गुना नहीं है।

मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य उत्पादन लागत का 37 प्रतिशत ही है। इस समय मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,440 रुपए प्रति क्विंटल है। उन्होंने कहा कि फसलों का मूल्य न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे आता है तो व्यापक पैमाने पर सरकारी स्तर पर उसकी खरीद की जाएगी। इससे राजकोष पर बोझ बढेगा लेकिन लोगों को यह समझना चाहिए कि इस पर पहला अधिकार किसानों और मजदूरों का है।

कृषि मंत्री ने कहा कि बिहार, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान आदि राज्यों में व्यापक पैमाने पर मक्का की खेती की जाती है।उन्होंने विश्व की तुलना में प्रति हेक्टेयर मक्के की कम उत्पादकता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जहां अमेरिका में प्रति हेक्टेयर 9.6 टन प्रति हेक्टेयर से अधिक उत्पादन होता है वहीं भारत में इसका उत्पादन 2.43 टन प्रति हेक्टेयर है। भारत विश्व के 5 प्रमुख मक्का निर्यातक देशों में शामिल है।