अब हवा में भी उगेगा आलू

शिमला स्थित केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने हवा में आलू उगाने का कारनामा कर दिखाया है। संस्थान द्वारा बीते तीन सालों से किया जा रहा प्रयोग सफल साबित हुआ है।जिसके बाद संस्थान को यह आविष्कार करने में सफलता हाथ लगी है। संस्थान एरोपोनिक नामक नई तकनीक से बिना मिट्टी के हवा में आलू उगाने की यह विधि ईजाद की है।

आमतौर पर आलू जमीन के नीचे उगाया जाता है। एरोपोनिक नाम की नई तकनीक में आलू बिना मिट्टी के हवा में उगाया जाएगा, यानी कि एक थर्मोकोल लगे बॉक्स में छेद करके आलू के पौधे को डाला गया है। पौधे को इस तरह से बॉक्स में डाला गया है कि उसकी जड़े नीचे हवा में हो।

जडों पर न्यूट्रिन अमीडिया नामक छिड़काव किया गया है। विभिन्न तापमान के अनुरूप इन पौधों की जांच की गई। इस आलू को उगाने के लिए मिट्टी का प्रयोग नहीं किया गया। इसमें कीटनाशकों का प्रयोग न के बराबर हुआ है।

ऐरोपोनिक पद्धति से मिट्टी के बिना बीज आलू पैदा करने की तकनीक पर आधारित एरोपोनिक सुविधाओं से आलू की रोग रहित नई किस्में तैयार करने की तकनीक पर आधारित एरोपोनिक सुविधाओं से आलू को किसानों तक कम समय में पहुंचाने में मदद मिलेगी।

आमतौर पर जिस आलू के एक पौधे से सिर्फ पांच और 10 आलू पैदा होते थे, इस तकनीक की मदद से आलू के एक पौधे से 70 आलू का उत्पादन हो सकेगा। ऐसे में सात गुना ज्यादा आलू का उत्पादन संभव होगा । इस प्रकार इस तरिके से आलू का उत्पादन 7 गुना बढ़ जाता है । बहुत जल्द ये तकनीक किसानो के पास पहुंच जाएगी

तीन एकड़ में बुल्गारिया गुलाब की खेती कर किसान कमा रहा है 10 लाख सालाना

जिला कैथल के गांव बरोला का प्रगतिशील किसान कुशलपाल सिरोही तीन एकड़ में बुल्गारिया गुलाब की खेती कर दस लाख रुपए सालाना कमा रहा है। पहले छह एकड़ गुलाब की खेती करते थे, लेकिन अब तीन एकड़ में कर रहे हैं। कुशलपाल सिरोही पिछले करीब 15 सालों से बुल्गारिया गुलाब की खेती कर रहा है।

वैसे तो गुलाब की हजारों किस्म होती हैं, लेकिन इत्र बुल्गारिया गुलाब से ही निकलता है। वैसे इस किस्म का नाम दमस्त है। लेकिन बुल्गारिया देश में ज्यादा होने के कारण इसका नाम बुल्गारिया ही पड़ गया। नवंबर व दिसंबर में इसकी कलम लगाई जाती है।

प्रैल माह में यह तैयार हो जाता है। एक बार लगाने के बाद 15 साल तक दोबारा लगाने की जरुरत नहीं पड़ती। अप्रैल माह में जितनी ज्यादा गर्मी पड़ेगी, उतनी ही ज्यादा पैदावार होगी। गर्मी ज्यादा पड़ने से बुल्गारिया गुलाब ज्यादा खिलता है।

कैसे बनाते हैं इत्र…

  • कुशलपाल सिरोही के अनुसार तांबे के बड़े बर्तन में पानी और गुलाब के फूल डाल दिए जाते हैं।
  • इसके बाद ऊपर से मिट्टी का लेप कर बर्तनों के नीचे आग जलाई जाती है।
  • भाप के रूप में गुलाब जल व गुलाब इत्र एक बर्तन में एकत्रित हो जाते हैं, जिस बर्तन में भाप बनकर इत्र जाता है, उसे पानी में डाल दिया जाता है।
  • गुलाब का इत्र केवल तांबे के बर्तन में निकाला जाता है। कई जगह कंडेंसिंग विधि से भी अर्क निकाला जाता है।
  • लेकिन आसवन विधि ज्यादा कारगर है। एक क्विंटल फूलों में मात्र 20 ग्राम इत्र निकलता है।
  • इंटरनेशनल मार्केट में एक किलोग्राम इत्र का मूल्य करीब सात से आठ लाख रुपए है।

इंटरनेट के माध्यम से बेचते हैं विदेशों में

गुलाब के इत्र की अमेरिका सहित अरब के देशों में डिमांड है। किसान ने बताया कि भारत में इसकी कोई मार्केट नहीं है। इसलिए बाहर इंटरनेट के माध्यम से बेचना पड़ता है। साऊदी अरब में सबसे ज्यादा डिमांड है। प्रति एकड़ 400 से 500 ग्राम निकलता है। अंतरराष्ट्रीय मार्केट में इत्र 7 से 8 लाख रुपए प्रति एक किलोग्राम के हिसाब से बिकता है।

प्रति एकड़ खेती पर चार हजार रुपए आता है खर्च

नवंबर व दिसंबर में गुलाब के पौधों की कटाई व छंटाई होती है। इसी दौरान नई कलमें भी लगाई जा सकती हैं। कुशपाल के मुताबिक, एक एकड़ में बुल्गारिया गुलाब लगाने में चार हजार रुपए के करीब खर्च आता है। एक एकड़ में करीब दो हजार कलम लगाई जा सकती हैं। यह तीन माह में तैयार हो जाता है। एक बार लगाया गुलाब 15 साल तक फूल देने के काम आता है।

कुछ खास नहीं बस बदला खेती करने का तरीका और अब होती है 30 लाख की कमाई

परंपरागत खेती छोटे किसानों के लिए तो घाटे का सौदा थी ही लेकिन बड़े किसान भी सदैव कर्ज में डूबे रहते थे। मो. बड़ोदिया ब्लाक के गांव मोरटा मलोथर के 40 बीघा जमीन के बड़े किसान ओमप्रकाश पंवार ने परंपरागत खेती में कुछ इसी तरह महसूस किया।

कर्ज से तंग आकर इस किसान ने उद्यानिकी के साथ मिश्रित खेती को अपनाया और देखते ही देखते खेती को लाभ का धंधा बनाकर दिखा दिया। पिछले पांच सालों से यह किसान अपनी 40 बीघा जमीन में मिश्रित खेती कर सालाना 30 लाख से भी अधिक की कमाई कर पा रहे हैं।

किसान ने इस बार भी गेहूं, चना, मसूर, मेथी, रायड़ा, कलौंजी, चंद्रसुर, संतरा, आलू, प्याज, लहसुन, नीबू, मूंग, उड़द, मक्का व हरी सब्जी के साथ दर्जनभर से अधिक तरह की फसल उगाई है। इसके अलावा पूरी जमीन में रासायनिक खाद की जगह जैविक खाद का उपयोग किया गया है।

मोरटा मलोथर के किसान ओमप्रकाश पंवार ने 6 बीघा जमीन में संतरा व औषधि फसल चंद्रसुर की एक साथ पैदावारी ली। रबी की फसल की बोवनी के समय के पूर्व किसान ने संतरे के बगीचे में एक किलो प्रति बीघा के हिसाब से खेत में 6 किलो चंद्रसुर की बोवनी कर दी। कम सिंचाई व 1300 रुपए प्रति बीघा की लागत लगाकर किसान ने इस जमीन से 4 क्विंटल प्रति बीघा के मान से 24 क्विंटल चंद्रसुर की पैदावारी ली है।

वर्तमान बाजार भाव के हिसाब से जिसकी कीमत सवा लाख रुपए के करीब है। इसी खेत में लगे संतरे के पेड़ भी संतरे के फलों से लदालद हो रहे हैं। करीब 150 क्विंटल से अधिक संतरे की फसल की पैदावारी आने का अनुमान है। संतरे की फसल से भी किसान को लगभग साढ़े 7 लाख रुपए से अधिक की कमाई होगी। इस तरह किसान को 6 बीघा जमीन की एक साथ की गई दोनों फसलों से 9 लाख रुपए की आमदनी होगी।

ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी, मो. बड़ोदिया बीसी सौराष्ट्रीय का कहना है मो. बड़ोदिया विकासखंड में 5 वर्ष पहले कुछ चुनिंदा किसान ही 5 हेक्टेयर जमीन के रकबे में उद्यानिकी व औषधी खेती करते थे, लेकिन अब विकासखंड में 150 किसान 55 से 60 हेक्टेयर जमीन में उद्यानिकी के साथ तुलसी, अश्वगंधा, इसबगोल, चंद्रसुर, कालमेद, सफेद मूसली, एपल बैर, पुष्प व सीताफल के साथ कई प्रकार की औषधीय खेती कर रहे हैं।

विकासखंड में पांच सालों में उद्यानिकी व औषधि खेती का रकबा 10 गुना से भी अधिक बढ़ गया है। इसी बीच इस विकासखंड में नेट हाउस की संख्या भी बढ़कर 15 हो गई है।

महिला किसानों ने बनाया देसी कोल्ड स्टोर, ऐसे करता है काम

आलू-टमाटर जैसी सब्जियों को सड़क पर फेंकने को मजबूर किसानों के लिए बांस से बना देसी कोल्ड स्टोरेज किसी राहत से कम नहीं है। यह कोल्ड स्टोरेज हजारीबाग के टाटीझरिया प्रखंड की महिलाओं की देन है।

झारखंड के लगभग हर इलाके में कोल्ड स्टोरेज की समस्या आम है, देश के बाकी हिस्सों में भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। फेडरेशन ऑफ कोल्ड स्टोरेज एसोसिएशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक कोल्ड स्टोरेज की उचित व्यवस्था नहीं होने से देश में 40 प्रतिशत फसल, सब्जियां, फल-फूल, दूध-मछली व अन्य उत्पाद बर्बाद हो जाते हैं।

टाटीझरिया प्रखंड के गांवों की महिलाओं ने बांस के बेंत से देसी कोल्ड स्टोरेज तैयार कर इस समस्या का हल ढूंढ लिया है। पहली बार बनाए गए इस तरह के कोल्ड स्टोरेज क्षेत्र के दर्जनों गांवों में खुशहाली का मंत्र लेकर आए हैं।

हजारीबाग का यह इलाका महिला समूहों द्वारा की जा रही सामूहिक खेती के कारण भी जाना जाता है। ऐसे में किसान महिलाओं द्वारा देसी कोल्ड स्टोरेज तैयार करना उनकी दोहरी उपलब्धि है।

खराब नहीं होगा आलू-प्याज

बांस के बेत से बने इस कोल्ड स्टोरेज की खासियत यह है कि इसमें पूरे एक सीजन तक आलू, प्याज, लहसुन आदि को सुरक्षित रख सकते हैं।

कम लागत में उत्पादों की बर्बादी रोककर बेहतर मुनाफा दिलाने वाला यह देसी कोल्ड स्टोरेज स्थानीय किसानों में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। टाटीझरिया प्रखंड के एक दर्जन गांवों में अब घर-घर ऐसे कोल्ड स्टोरेज बनाए जा रहे हैं। आलू-प्याज के इस सीजन में इसकी मांग भी खासी है।

देसी कोल्ड स्टोरेज की खासियत

  • यह पूरी तरह से सुरक्षित है। यह किसी भी हवादार कमरे में तैयार किया जा सकता है।
  • यह आलू-प्याज को नमी से बचाता है।
  • बांस में फंगस नहीं लगता है, यही वजह है कि सब्जियां सड़ती नहीं है।

बदलाव की कहानी लिख रहीं महिलाएं

कोल्ड स्टोरेज के इस देसी स्वरूप का मॉडल डिजिटल ग्रीन संस्था के डॉ. रवि ने तैयार किया है। इसे दिल्ली में भी प्रदर्शित किया गया था। वर्तमान में खैरा,अमनारी, फुरुका, बरकाखुर्द, रतनपुर सहित अन्य गांवों में 100 से अधिक कोल्ड स्टोरेज बन चुके हैं। सृजन फाउंडेशन द्वारा महिला किसानों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।

झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसायटी भी अब इस अभियान से जुड़कर महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रशिक्षण देकर ऐसे मॉडल बनवा रही है। इस मुहिम से जुड़कर ऐसे मॉडल तैयार करनेवाली महिलाएं अच्छी-खासी आमदनी भी पैदा रही हैं।

इस साल मौसम लेकर आएगा किसानों के चेहरों पर रौनक,

देश में खेती किसानी से जुड़े लोगों के लिए राहत की खबर है। मौसम विभाग के अनुसार इस साल मानसून सामान्य रहेगा। जिसके चलते अधिकतर राज्यों में अच्छी वर्षा की संभावना है। इस बार मानसून पर अल नीनो का कोई भी प्रभाव नहीं होगा। मौसम विभाग के मुताबिक इस साल अगस्त तक अल नीनो का असर मानसून पर होते नहीं दिख रहा है।

अल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यीय क्षेत्र की उस समुद्री घटना का नाम है जो दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित इक्वाडोर और पेरू देश के तटीय समुद्री जल में कुछ सालों के अंतराल पर घटित होती है। इसके तहत समुद्र की सतह के तापमान में असामान्‍य तौर पर इजाफा हो जाता है। यह मानसून को कमजोर कर देती है।

मानसून पर किसी भी तरह का कोई नकारात्मक फैक्टर नहीं दिख रहा है

एजेंसी के अधिकारियों ने बताया कि अभी तक अवलोकन के आधार पर मानसून पर किसी भी तरह का कोई नकारात्मक फैक्टर नहीं दिख रहा है। आईएमडी के निदेशक के जे रमेश ने कहा कि, इस समय इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

इस पर हम दो सप्ताह पर ही कुछ कहने की स्थिति में होंगे। मानसून पर पहली मौसम रिपोर्ट मध्य अप्रैल तक आएगी। आपको बता दें कि इससे पहले ला नीना कमजोर रहने के चलते अनुमान जताया जा रहा था कि अल नीनो पहले ही सक्रिय हो सकता है।

अल नीनो का सीधा असर भारत की फसलों पर पड़ता है

निजी अमेरिकी संस्था रेडिएंट सॉल्यूशंस ने अनुमान जताया था कि इस बार अल नीनो की वजह से मानसून कमजोर रह सकता है। अगर मानसून कमजोर रहता है तो इसका सीधा असर भारत में सोयाबीन, मूंगफली और कपास की फसलें पड़ेगा।

आईएमडी की रिपोर्ट में मार्च-मई अवधि के दौरान तापमान में एक उदार ला नीना का भी उल्लेख है। एपिसोड समुद्र तल के नीचे के औसत तापमान का प्रतिनिधित्व करते हैं। ला नीनो प्रभाव अल नीनो के एकदम उलट होता है। ला नीनो सामान्य या उससे अधिक सामान्य वर्षा से संबंधित है।

4 महीनों में साल भर होने वाली बारिश की 70 फीसदी बारिश होती

अमेरिकी राष्ट्रीय महासागर और वायुमंडलीय प्रशासन (एनओएए) की टिप्पणी में शुरुआती मार्च में भारतीय मानसून के लेकर अच्छी खबर दी थी। मानसून सीजन के 4 महीनों में साल भर होने वाली बारिश की 70 फीसदी बारिश होती है। अगर मानसून बेहतर रहता है तो यश्रल एरिया में सरकार अपनी योजनाओं को सही से लागू कराने में भी सफल होगी। वहीं बेहतर मानसून से रूरल इकोनॉमी को बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।

मौसम ने फिर बढ़ाई किसानो की चिंता ,

देश के अनेक राज्यों में आगामी घंटो मै मौसम बदल सकता है. खासतौर पर दिल्ली-एनसीआर में तो बाशि के आसार प्रबल हो गए हैं. मौसम विभाग के मुताबिक, 20 व 21 मार्च को दिल्ली-एनसीआर के शहरों में बारिश का पूर्वानुमान है.

इससे तापमान में गिरावट आएगी. गुजरात में अहमदाबाद समेत उत्तर और मध्य गुजरात में कई स्थानों पर बादलयुक्त मौसम और कुछ स्थानों पर बूंदा-बांदी और हल्की वर्षा के लिए दक्षिणी पाकिस्तान के ऊपर मौजूद एक पश्चिमी विक्षोभ के कारण पैदा हुई चक्रवाती प्रणाली जिम्मेदार है.

स्थानीय मौसम केंद्र के निदेशक तथा वरिष्ठ मौसम विज्ञानी जयंत सरकार ने बताया कि बादल कल तक पूरी तरह छंट जायेंगे. वर्षा की भी ज्यादा संभावना इसलिए नहीं है क्योंकि ऊपरी वातावरण में नमी नहीं है.

ज्ञातव्य है कि मौसम में बदलाव के चलते अहमदाबाद के अलावा उत्तर गुजरात के साबरकांठा, पाटन, अरावल्ली जिलों तथा कुछ अन्य स्थानों पर बादल छा गये. कुछ स्थानों पर बूंदाबांदी अथवा हल्की वर्षा भी हुई. दिल्ली में रविवार को अधिकतम तापमान 32 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य से एक डिग्री अधिक था. न्यूनतम तापमान 14.6 डिग्री दर्ज किया गया.

जो सामान्य से लगभग दो डिग्री कम था. मौसम विभाग के मुताबिक, पश्चिमी विक्षोभ के चलते हिमालयन रेंज के साथ उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में मौसम बदलेगा. पहाड़ों पर बारिश होगी. इसका असर यह होगा कि 20 मार्च यानी मंगलवार को दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान में कहीं-कहीं तो 21 मार्च को इन राज्यों में ज्यादातर हिस्सों में बारिश होगी. इससे तापमान में गिरावट दर्ज की जाएगी.

मौसम विशेषज्ञ महेश पालावत के अनुसार पंजाब और हरियाणा में 21 मार्च को बारिश की गतिविधियां अधिक होंगी। पंजाब के तराई क्षेत्रों में 22 मार्च को भी एक-दो बार बारिश हो सकती है। हरियाणा में 22 मार्च से जबकि पंजाब में 23 मार्च से बादल विदा हो जाएंगे और बारिश बंद हो जाएगी।

कड़कनाथ मुर्गे का मीट मोबाइल एप के माध्यम से सीधे आपके घर

किसान भाइयों आपने कड़कनाथ मुर्गे की खबर जरूर पढ़ी होगी. इस मुर्गे का अंडा व मीट काफी लोकप्रिय है मध्य प्रदेश में मशहूर इस कड़कनाथ मुर्गा अब इतना प्रसिद्ध हो गया कि सरकार ने लोगों को सीधे-सीधे इसे उपलब्ध कराने के लिए एक नया डिजिटल माध्यम अपनाते हुए एक एप्लीकेशन लाँच किया है.

यहाँ मध्य प्रदेश सरकार ने एक नया कदम उठाया है, अब सरकार उन लोगों को जो कड़कनाथ मुर्गा खाना चाहते हैं वह एक ऐप के जरिए कड़कनाथ मुर्गा उपलब्ध कराएगी. इसके लिए मध्य प्रदेश के सहकारिता मंत्री विश्वास नारंग ने एमपी कड़कनाथ ऐप की लाँच किया है जो यह सुविधा लोगों को घर बैठे पहुंचाएगी.

आप को बता दें कि यह कड़कनाथ मुर्गा मध्य प्रदेश में बहुत पाया जाता है बाजार में हजार रुपए किलो तक बिकता है. बाजार में इसकी मांग अधिक रहती है. इसके मीट में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है जबकि कोलेस्ट्राल व वसा काफी कम होता है जिससे यह स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है.

मध्य प्रदेश वासी इस ऐप के जरिए इस मुर्गे की उपलब्धता भी जान सकेंगे. वाकई यह रोचक तथ्य है कि एक नस्ल की कुछ खासियतों ने उसे इतना प्रसिद्ध बना दिया कि लोगों की जुबान पर उसका नाम है साथ ही मीट खाने के लिए लोग उतावले रहते हैं.

इतना ही नहीं आज एक प्रदेश सरकार ने इसका मीट की घर बैठे देने के लिए ऐप तक लाँच कर दिया ऐसे में उन लोगों के लिए यह एक अच्छी खबर है जो इस नस्ल का पालन कर रहें हैं.

ये है सबसे पौष्टिक चारा ,एक बार लगाने पर पांच साल के लिए मिलेगा चारा


पशुपालकों को गर्मियों में हरे चारे की सबसे ज्यादा परेशानी होती है। बरसीम, मक्का, ज्वार जैसी फसलों से तीन-चार महीनों तक ही हरा चारा मिलता है। ऐसे में पशुपालकों को एक बार नेपियर घास लगाने पर चार-पांच साल तक हरा चारा मिल सकता है।

इसमें ज्यादा सिंचाई की जरूरत भी नहीं पड़ती है। गन्ने की तरह दिखने वाली नेपियर घास लगाने के महज 50 दिनों में विकसित होकर अगले चार से पांच साल तक लगातार दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार की जरूरत को पूरा कर सकती है।

पशुपालन विभाग के उप निदेशक वीके सिंह नेपियर घास के बारे में बताते हैं, “प्रोटीन और विटामिन से भरपूर नेपियर घास पशुओं के लिए एक उत्तम आहार की जरूरत को पूरा करती है। दुधारू पशुओं को लगातार यह घास खिलाने से दूध उत्पादन में भी वृद्धि होती है और साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।

हाइब्रिड नेपियर की जड़ को तीन-तीन फीट की दूरी पर रोपित किया जाता है। इससे पहले खेत की जुताई और समतलीकरण करने के बाद घास की रोपायी की जाती है और रोपाई के बाद सिंचाई की जाती है। घास रोपण के मात्र 50 दिनों बाद यह हरे चारे के रूप में विकसित हो जाती है।

एक बार घास के विकसित होने के बाद चार से पांच साल तक इसकी कटाई की जा सकती है और पशुओं के आहार के रूप में प्रयोग की जा सकती है। नेपियर घास का उत्पादन प्रति एकड़ लगभग 300 से 400 कुंतल होता है। इस घास की खासियत यह होती है कि इसे कहीं भी लगाया जा सकता है।

एक बार घास की कटाई करने के बाद उसकी शाखाएं पुनः फैलने लगती हैं और 40 दिन में वह दोबारा पशुओं के खिलाने लायक हो जाती है। प्रत्येक कटाई के बाद घास की जड़ों के आसपास हल्का यूरिया का छिड़काव करने से इसमें तेजी से बढ़ोतरी भी होती है। वैसे इसके बेहतर उत्पादन के लिए गोबर की खाद का छिड़काव भी किया जाना चाहिए।

महिंद्रा ने किसानों के लिए लॉन्च की ‘माई एग्री गुरु’ एप,ऐसे करती है काम

महिंद्रा एंड महिंद्रा की पूर्ण स्वामित्व वाली अनुषंगी कंपनी महिंद्रा एग्री सॉल्यूशंस लिमिटेड (एमएएसएल) ने किसानों के लिए माई एग्री गुरु 2.0 को लॉन्च किए जाने की घोषणा की है। इस एप का नया वर्जन तकनीकी रूप से उन्नत है और किसानों के लिए डिजिटल एडवाइजरी प्लेटफॉर्म के रूप में काम करता है।

एप के नए वर्जन में एडवांस्ड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर पर्सनलाइज्ड यूजर अनुभव देने का प्रयास किया गया है। इसे एक एडवांस्ड सोल्यूशन, जो चैटबॉट का इस्तेमाल करती है, के माध्यम से बढ़ावा दिया गया है। इन विशेषताओं के कारण एग्री गुरु को इसके मूल वर्जन का अपग्रेडेशन कहा जाता है।

महिंद्रा एग्री सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक और सीईओ अशोक शर्मा ने माई एग्री गुरु 2.0 के लांच के अवसर पर कहा, “एग्री गुरु 2.0 फसलों की उत्पादकता में सुधार सुनिश्चित करने के लिए किसानों को निजी सलाह देने वाली सेवा है। माई एग्री गुरु ने अब तक चार लाख से ज्यादा किसानों तक पहुंच बनाई है।

एप के सबसे लोकप्रिय सेक्शन एग्री बज में अब तक 55,000 से अधिक संवाद दर्ज किये गये हैं। इस एप की आवाज को पहचानने और मशीन लर्निग तकनीक की मदद से किसानों के सवालों के जवाब तुरंत मिल जाते हैं। एप से किसानों को मंडी में चल रहे दामों की जानकारी मिलती है, जिससे उन्हें पता चलता है कि किस मंडी में वह अपनी फसल बेचकर ज्यादा से ज्यादा कमाई कर सकते हैं।”

फरवरी 2017 में लांच किया गया माई एग्री गुरु भारत का पहला समग्र डिजिटल ऐडवाइजरी प्लेटफॉर्म हैं, जो किसानों और विशेषज्ञों के बीच दोतरफा संवाद उपलब्ध कराता है। किसी दूसरे ऐप्स की तुलना में माई एग्री गुरु यह सुनिश्चित करता है कि किसानों को उनकी समस्या का सामाधान तुरंत मिल जाए।

माई एग्री गुरु को दूसरे ऐप से अलग करने वाला एक पहलू यह भी है कि इसमें मांग के आधार पर कंटेंट जेनरेट होता है। ऐप यूजर कम्युनिटी के बीच रोजाना होने वाले अनगिनत विचार-विमर्श का विश्लेषण कर दिलचस्पी के विषय तो पहचानता है और किसानों के सामने आने वाली चुनौतियों का समाधान सुनिश्चित करता है। माई एग्री गुरु 2.0 एप एंड्रॉयड फोन पर गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है। इस समय अंग्रेजी और हिंदी में मौजूद यह ऐप जल्द ही मराठी में उपलब्ध होगा।

अब गाय-भैंसों का भी बनेगा ‘आधार कार्ड’, ये है पूरी स्कीम

विशिष्ट पहचान संख्या आधार को लेकर देशभर में बहस जारी है. इस बीच केंद्र सरकार अब दुधारू गाय-भैंसों के लिए भी 12 अंकों की विशिष्ट पहचान संख्या जारी कर रही है. इसके इस्तेमाल से दुधारू गायों और भैंसों की पहचान और दुग्ध उत्पाद को बढ़ावा देने की योजना है.

इस संबंध में 9 करोड़ दुधारू मवेशियों की पहचान करने के लिए 148 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है. कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने सोमवार को लोकसभा में यह जानकारी दी. हिना गावित और पी आर सुंदरम के प्रश्न के लिखित उत्तर में कृषि मंत्री ने कहा कि इससे पशुओं के वैज्ञानिक प्रजनन, रोगों के फैलने पर नियंत्रण और दुग्ध उत्पादों के व्यापार में वृद्धि करने के उद्देश्य की प्राप्ति होगी.

राधा मोहन सिंह ने बताया कि राष्ट्रीय पशु उत्पादकता मिशन के ‘पशु संजीवनी’ घटक के तहत इसे लागू किया जा रहा है. सिंह ने कहा कि इसकी तकनीक के लिहाज से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड पहले ही पशु स्वास्थ्य और उत्पादन संबंधी सूचना नेटवर्क (INAPH) विकसित कर चुका चुका है, जिसे 12 अंकीय विशिष्ट पहचान संख्या वाले पोलीयूरिथिन टैग का प्रयोग करके पशु पहचान संबंधी डाटा अपलोड करने के लिए राष्ट्रीय डाटाबेस के रूप में प्रयोग किया जा रहा है.

कृषि मंत्री ने बताया कि निविदा के आधार पर इस पोलीयूरिथिन टैग की कीमत 8 से 12 रुपये प्रति टैग है. नौ करोड़ दुधारू पशुओं की पहचान करने और उन्हें नकुल स्वास्थ्य पत्र (स्वास्थ्य कार्ड) जारी करने के लिए पशु संजीवनी घटक के तहत 148 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है. इस घटक के कार्यान्वयन के लिए राज्यों को केंद्रीय हिस्से के रूप में 75 करोड़ रुपये की राशि पहले ही जारी की जा चुकी है.