SBI ने मौसम की जानकारी देने के नाम पर ऐसे लुटे देश भर के किसानो के 990 करोड़

बैंकों में जमा राशि अमूमन सुरक्षित मानी जाती है, लेकिन अब यहां भी सेंध लग गई है। देश के सबसे बडे़ सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआइ) ने केसीसी धारक किसानों के खातों से मौसम की जानकारी देने के नाम पर उनकी बिना सहमति के 990 करोड़  काट लिए।

पूरे देश में एक करोड़ एक लाख केसीसी धारक किसानों से 990 करोड़ रुपये काटे गए। इनमें सबसे ज्यादा मप्र के छह लाख किसानों के 60 करोड़ हैं। ये राशि ऐसी सुविधा के नाम पर वसूली गई है, जो केंद्र सरकार टोल-फ्री नंबर के जरिए पहले से ही किसानों को मुफ्त में उपलब्ध करा रही है।

इस गड़बड़झाले का पर्दाफाश तब हुआ, जब विदिशा के नटेरन तहसील के नोराजखेड़ी गांव के किसान हजारीलाल शर्मा के पास बैंक से फोन आया, जिसमें उनके खाते से 990 रुपये की राशि मौसम की जानकारी के नाम पर काटने की जानकारी दी गई।

शर्मा ने लिखित शिकायत की, लेकिन बैंक प्रबंधन ने राशि वापस नहीं की। इस बारे में जब नटेरन एसबीआइ शाखा के मैनेजर बीएस बघेल से बात की गई तब पूरे गोलमाल का पता चला।

ये है 990 करोड़ का गणित एसबीआइ की वेबसाइट के अनुसार देशभर में उसके लगभग एक करोड़ एक लाख केसीसी धारक हैं। यदि एसबीआइ के एक करोड़ ग्राहक भी यह सुविधा हासिल करते हैं तो इसके लिए किसानों से करीब 990 करोड़ रुपये की राशि वसूली गई। आरएमएल के जरिए 500 ब्रांचों में उपलब्ध हो रही सुविधा एसबीआइ ने किसानों को मौसम एवं फसल की जानकारी दिलाने के लिए मुंबई की आरएमएल कंपनी से अनुबंध किया है।

आरएमएल के अनुसार 16 राज्यों में एसबीआइ की करीब 500 ब्रांचों में जुड़े ग्राहकों को कंपनी यह सुविधा दे रही है। अलग-अलग सेवाओं के अलग-अलग रेट तय हैं। इनमें 990 रुपये वार्षिक शुल्क वाली एसएमएस सेवा है।

नीदरलैंड से सीखी थी सेवंती के फूलों की खेती, अब हर साल 2 करोड़ की कमाई

255 घरों और 1173 लोगों की आबादी वाले छोटे से गांव गुनखेड़ के किसान मौसम की मार से बेहाल थे, हर साल खेती बर्बाद हो रही थी। इस बीच गांव के एक किसान को नए तरीके से खेती करने का आईडिया सूझा।

इसे उसने अमली जामा पहनाने के लिए सेवंती के फूलों की खेती शुरू की और देखते-देखते लाखों रुपए कमाने लगा। उसे फायदा हुआ तो दूसरे किसानों ने भी सेवंती के फूलों की खेती शुरू कर दी। अब इस खेती से गांव के किसान करोड़ों रुपए कमा रहे हैं।

असल में, गुनखेड़ गांव परंपरागत किसानी पर निर्भर रहा है। ऐसे में गांव के किसान हनुमंतराव कनाठे ने सेवंती के फूलों की खेती करने की सोची। उससे इससे फायदा मिला। किसान यहीं नहीं रुका, उसने खेती के उन्नत तरीके सीखने लिए नीदरलैंड का दौरा किया था।

नतीजा ये रहा कि किसान हनुमंतराव कनाठे की देखा देखी गांव के दूसरे किसानों ने भी यही खेती शुरू कर दी। गांव में हर साल 70 एकड़ जमीन पर सेवंती के फूलों की खेती हो रही है। इससे हर साल किसानों को दो करोड़ रुपए की आमदनी हो रही है। किसानों के लिए सेवंती के फूलों की खेती वरदान साबित हो रही है।

मेहनत के बाद भी कुछ नहीं मिल रहा था

गुनखेड़ गांव पूरी तरह से खेती पर ही निर्भर रहा है। ऐसे में परंपरागत खेती करते थे और साल मेहनत भी करते थे, लेकिन मौसम की मार से किसानों को कोई फायदा नहीं हो रहा था। गांव के उन्नतशील किसान हनुमंतराव कनाठे ने सेवंती के फूलों की खेती शुरू की, उन्हें इसका जबरदस्त फायदा हुआ। अब वह हर साल 2.5 एकड़ जमीन पर सेवंती के फूलों की खेती करता है।

विदेश से भी सीखी उन्‍नत तकनीक

गुनखेड़ी निवासी हनुमंतराव कनाठे की खेती एवं सामुदायिक विकास में को देखते हुए उद्यानिकी विभाग द्वारा वर्ष 2016-17 में उन्हें हॉलैंड- नीदरलैंड की विदेश यात्रा पर भी भेजा गया, जहां से फूलों की खेती एवं विपणन के नए गुर सीख कर आये हनुमंतराव नई ऊर्जा से फूलों की खेती में लग गए हैं।

एक व्यक्ति से प्रेरणा लेकर पूरे गांव का विकास किस तरह से हो सकता है इसका एक अच्छा उदाहरण बन गए श्री कनाठे का मानना है कि नई पीढ़ी के किसानों को अब व्यवसायिक खेती की ओर जाने का प्रयास करना चाहिए।

पहली बार में ही 55 हजार का फायदा

पहले ही साल में हनुमंतराव की मेहनत रंग लाई और मात्र 3 तीन हजार रुपए खर्च कर 55 हजार रुपए का शुद्ध मुनाफा कमाया। सेवंती के फूलों से हुए इस लाभ से प्रोत्साहित होकर हनुमंतराव ने अगले वर्ष इसके दुगने क्षेत्र में सेवंती के फूलों की खेती की। वर्तमान में लगभग 2.5 एकड़ जमीन में सेवंती, रजनीगंधा, गेंदा, डेजी एवं अन्य फूलों की खेती कर लाभ कमा रहे हैं।

गांव में आ गया व्यापक बदलाव

पिछले 10 सालों में सेवंती की खेती के कारण गुनखेड़ गांव के लोगों के रहन-सहन में भी बहुत सुधार हुआ है। वर्तमान में गांव में लगभग सभी किसानों के पक्के मकान हैं, सभी अपने बच्चों को जिले के निजी स्कूलों में पढ़ाने के लिए भेज रहे हैं, साथ ही सभी आधुनिक सुख-सुविधा के साधन गांव में ही उपलब्ध है।

3500 रुपए में सीखें ऑर्गेनिक फार्म बिजनेस, होगी अच्‍छी कमाई

पिछले कुछ सालों में ऑर्गेनिक प्रोडक्‍ट्स के प्रति भारतीयों का रूझान बढ़ा है, और हर साल ऑर्गेनिक प्रोडक्‍ट्स का बाजार बढ़ता जा रहा है। बल्कि विदेशों में भारतीय ऑर्गेनिक प्रोडक्‍ट्स की डिमांड बढ़ रही है। यही वजह है कि ऑर्गेनिक फार्मिंग का चलन भी बढ़ रहा है।

सरकार भी ऑर्गेनिक फार्मिंग को प्रमोट कर रही है। ऐसे समय में यदि आप भी ऑर्गेनिक फार्म बिजनेस शुरू करते हैं तो आपके लिए यह फायदेमंद हो सकता है। लेकिन आप सोच रहे होंगे कि ऑर्गेनिक फार्मिंग के बारे में जानकारी न होने के कारण कैसे आप यह बिजनेस शुरू कर सकते हैं तो परेशान न हों। आप मात्र 3500 रुपए फीस देकर ऑर्गेनिक फार्मिंग बिजनेस की बेसिक जानकारी ले सकते हैं।

आज हम आपको बताएंगे कि ऑर्गेनिक फार्म बिजनेस क्‍या है और कैसे आप इसकी ट्रेनिंग ले सकते हैं।

क्‍या है ऑर्गेनिक फार्मिंग

ऑर्गेनिक फार्मिंग टॉक्सिक लोड कम करती है। हवा, पानी, मिट्टी से कैमिकल को हटाकर फसल पैदा करने की प्रक्रिया को ऑर्गेनिक फार्मिंग कहा जाता है। जो इन्‍वायरमेंट फ्रेडली होती है, नेचर को नुकसान नहीं पहुंचाती और हमारे शरीर के लिए पूरी तरह फिट होती है।

क्‍यों है फायदेमंद

पिछले कुछ सालों में हमारे देश वासी अपनी हेल्‍थ के प्रति काफी जागरूक हो गए हैं और ऐसे प्रोडक्‍ट्स को अपना रहे हैं, जो उनके शरीर के साथ-साथ इन्‍वायरमेंट को नुकसान नहीं पहुंचाते हों। हालांकि कैमिकल के इस्‍तेमाल से पैदा होने वाले फूड प्रोडक्‍ट्स सस्‍ते होते हैं। बावजूद इसके, जागरूकता के चलते ऑर्गेनिक फार्मिंग से पैदा प्रोडक्‍ट्स की डिमांड बढ़ रही है।

सरकार दे रही है ट्रेनिंग

सरकार ने देश में ऑर्गेनिक फार्मिंग बिजनेस को प्रमोट करने के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार किया है। केंद्र सरकार की मिनिस्‍ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट के अंतर्गत चल रहे इंस्टिट्यूट निसबड ने यह प्रोग्राम तैयार किया है। निसबड द्वारा 28 अप्रैल को इसकी ट्रेनिंग दी जाएगी। जिसकी फीस 3540 रुपए रखी गई है।

क्‍या मिलेगी ट्रेनिंग –

  • ऑर्गेनिक फार्मिंग एंटरप्राइजेज कैसे बनाएं
  • ऑर्गेनिक फूड प्रोडक्‍ट्स के लिए पोटेंशियल मार्केट की पहचान कैसे करें –
  • ऑर्गेनिक फार्मिंग सर्टिफिकेशन कैसे हासिल करें
  • फार्म से रिटेल यूनिट तक सप्‍लाई चेन कैसे बनाएं
  •  अपने प्रोडक्‍ट्स को बेचने के लिए सोशल मीडिया का इस्‍तेमाल कैसे करें
  •  ऑर्गेनिक फूड प्रोडक्‍ट्स के लिए फॉरेन मार्केट तक कैसे पहुंच बनाएं
  •  अपने बिजनेस का बढ़ाने के लिए सरकारी स्‍कीमों का लाभ कैसे लें।

कैसे करें अप्‍लाई

अगर आप इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल होना चाहते हैं तो आप इस लिंक पर क्लिक करके रजिस्‍ट्रेशन संबंधी जानकारी ले सकते हैं या फार्म भर सकते हैं।

https://www.niesbud.nic.in/docs/entrepreneurship-training-in-organic-farming-business-28-apr-2018.pdf

इन देशी नुस्खों द्वारा मिंटो में मरते है कीट

आधुनिक युग में कीटनाशकों का नाम मात्र भी इस्तेमाल न करते हुए खेतीबाड़ी करना थोड़ा कठिन है, लेकिन देशी तरीकों से खेतीबाड़ी में खर्च भी बहुत कम आता है।

यह देशी चीजें आप को आपके इर्द –गिर्द ही मिल जाती हैं, बगैर किसी भाग दौड़ के, चाहे आप की फसल सब्जी की हो या अनाज की फसल हो,बगैर किसी रसायन के तैयार की जा सकती है। जिससे मानव जीवन पर कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होता है, तथा उसकी कीमत भी रासायनिक फसलों से ज़्यादा मिलती है।

देशी नुस्खा (क):- सफ़ेद फिटकरी-

जब भी कोई फसल ऊपर से लेकर नीचे तक सूखने लगती है, तो समझना चाहिए कि इसकी जड़ों पर फफूंद का हमला हो चुका है। इससे बचने के लिए खेत में पानी लगाते समय ट्यूबवेल के गड्ढे में 1 किलो ग्राम सफ़ेद फिटकरी का टुकड़ा रख दें और पानी देना शुरू कर दें। वह फिटकरीयुक्त पानीपौधों कि जड़ों में लग जाएगा तथा पौधे पुनः स्वस्थ हो जाएंगे।

देशी नुस्खा (ख):- उपले कि राख तथा बुझा चूना-

उपले या चूल्हे कि राख तथा बुझा चूना, एक किलो ग्राम प्रति 25 लीटर पानी में डाल कर 5-6 घंटे के लिए रख दें, तद्उपरांत इस घोल को जितनी भी बेल (जायद) प्रजाति कि फसलों जैसे:- कद्दू, खीरा, घिया, तोरी आदि पर, इसका छिड़काव करने से लाल सूड़ी, कीड़े-मकौड़ों से छुटकारा मिल जाएगा।

देशी नुस्खा (ग):- गोमूत्र, जंगली तंबाकू,ऑक, नीम के पत्ते तथा धतूरा:-

किसी भी प्रकार कि फसल के लिए कीटनाशक कि जगह इन पाँच चीजों (प्रति 500 ग्राम) का घोल बनाकर, इन सभी को 15-20 दिन के लिए एक बर्तन में (चाहे प्लास्टिक का टब या मिट्टी का घड़ा) 20-25 लीटर पानी डाल कर रख देतें हैं। बाद में इस घोल को कपड़े से छान कर किसी भी प्रकार कि फसल के लिए कीटनाशक की जगह छिड़काव कर सकतें हैं।

देशी नुस्खा (घ):- खट्टी लस्सी, गलगल और गोबर के उपले:-

खट्टी लस्सी दो किलो, गलगल (नींबू प्रजाति) एक, गोबर के उपले तीन किलो। उपले जीतने पुरानें होंगे उतना ही अच्छा होगा। इन उपलों को 6 दिन के लिए 10-12 लीटर पानी में डाल कर रख देना चाहिए।

उसके बाद इन उपलों को अलग निकाल दें, और उपले वाले पानी में दो किलो खट्टी लस्सी जो कि 15 दिन पुरानी हो तथा एक गलगल पीस कर या निचोड़ कर सारे घोल को कपड़े से छान कर एक घोलक तैयार करके,पीलिया रोग से ग्रसित फसल के ऊपर छिड़काव कर देंगे। कुछ दिनों के बाद फसल का रंग रूप देखने लायक होगा।

गर्मियों में इन बातों का रखे ध्यान, नहीं घटेगा दूध उत्पादन

गर्मियों का मौसम शुरू हो गया है। इस मौसम में ज्यादातर पशुपालक पशुओं के खान-पान पर ज्यादा ध्यान नहीं देते, जिससे दूध उत्पादन घट जाता है। इसलिए इस मौसम में पशुओं की विशेष देखभाल बहुत जरूरी है।

पशुचिकित्सक डॉ रुहेला बताती हैं “पशुओं को दिन में तीन से चार बार पानी पिलायें, उतनी बार ताजा पानी दें। सुबह और शाम नहलाना जरूरी है। गर्मियों में पशुओं का दूध घट जाता है इसलिए इनके खान-पान का विशेष ध्यान दें हरा चारा और मिनिरल मिक्चर दें इससे पशु का दूध उत्पादन नहीं घटेगा। इस मौसम पशुओं को गलाघोटू बीमारी का टीका लगवा लें। यह टीका नजदीकी पशुचिकित्सालय में दो रुपए लगता है।”

गर्मी के मौसम में हवा के गर्म थपेड़ों और बढ़े हुए तापमान से पशुओं में लू लगने का खतरा बढ़ जाता है। अधिक समय तक धूप में रहने पर पशुओं को सनस्ट्रोक बीमारी हो सकती है। इसलिए उन्हें किसी हवादार या छायादार जगह पर बांधे। इस मौसम में नवजात बच्चों की भी देखभाल जरूर करें। अगर पशुपालक उनका ढंग से ख्याल नहीं रखता है तो उसको आगे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

इन बातों का रखें ध्यान

  • सीधे तेज धूप और लू से नवजात पशुओं को बचाने के लिए पशु आवास के सामने की ओर खस या जूट के बोरे का पर्दा लटका देना चाहिए ।
  • नवजात बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उसकी नाक और मुंह से सारा म्यूकस (लेझा बेझा) बाहर निकाल देना चहिए।
  • यदि बच्चे को सांस लेने में ज्यादा दिक्कत हो तो उसके मुंह से मुंह लगा कर सांस प्रक्रिया को ठीक से काम करने देने में सहायता पहुंचानी चहिए।
  • नवजात बछड़े का नाभि उपचार करने के तहत उसकी नाभिनाल को शरीर से आधा इंच छोड़ कर साफ धागे से कस कर बांध देना चहिए।

  • बंधे स्थान के ठीक नीचे नाभिनाल को स्प्रिट से साफ करने के बाद नये और स्प्रिट की मदद से कीटाणु रहित किये हुए ब्लेड की मदद से काट देना चहिए। कटे हुई जगह पर खून बहना रोकने के लिए टिंक्चर आयोडीन दवा लगा देनी चहिए।
  • नवजात बछड़े को जन्म के आधे घंटे के अंदर खीस पिलाना बेहद जरूरी होता है। यह खीस बच्चे के भीतर बीमारियों से लड़ने में मदद करता है।
  • अगर कभी बच्चे को जन्म देने के बाद मां की मृत्यु हो जाती है तो कृत्रिम खीस का प्रयोग भी किया जा सकता है। इसे बनाने के लिए एक अंडे को फेंटने के बाद 300 मिलीलीटर पानी में मिला देते हैं । इस मिश्रण में 1/2 छोटा चम्मच अरेंडी का तेल और 600 मिली लीटर सम्पूर्ण दूध मिला देते हैं। इस मिश्रण को एक दिन में 3 बार 3-4 दिनों तक पिलाना चहिए।इसके बाद यदि संभव हो तो नवजात बछड़े/बछिया का नाप जोख कर लें। साथ ही यह भी ध्यान दें कि कहीं बच्चे में कोई असामान्यता तो नहीं है। इसके बाद बछड़े/बछिया के कान में उसकी पहचान का नंबर डाल दें।

नवजात बछड़े/बछिया का आहार

नवजात बछड़े को दिया जाने वाला सबसे पहला और सबसे जरूरी आहार है मां का पहला दूध यानी खीस। खीस का निर्माण मां के द्वारा बछड़े के जन्म से 3 से 7 दिन बाद तक किया जाता है और यह बछड़े के लिए पोषण और तरल पदार्थ का प्राथमिक स्रोत होता है।

यह बछड़े को आवश्यक प्रतिरोधक क्षमता भी उपलब्ध कराता है जो उसे संक्रामक रोगों और पोषण संबंधी कमियों का सामना करने की क्षमता देता है। यदि खीस उपलब्ध हो तो जन्म के बाद पहले तीन दिनों तक नवजात को खीस पिलाते रहना चाहिए।

जन्म के बाद खीस के अतिरिक्त बछड़े को 3 से 4 सप्ताह तक मां के दूध की आवश्यकता होती है। उसके बाद बछड़ा चारा-भूसा पचाने में सक्षम होता है। आगे भी बछड़े को दूध पिलाना पोषण की दृष्टि से अच्छा है लेकिन यह अनाज खिलाने की तुलना में महंगा होता है।

बछड़े को खिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले बर्तनों को अच्छी तरह साफ रखें। इन्हें और खिलाने में इस्तेमाल होने वाली अन्य वस्तुओं को साफ और सूखे स्थान पर रखें।