इस तरीक से किसान शुरू करेंगे “महा हड़ताल”

सहकारी बैंकों का कर्ज नहीं चुका पाने पर किसानों पर पंजाब सरकार की ओर से कार्रवाई की बात कही गई है. इसके जवाब में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के किसानों ने 1 से 10 जून तक अपने गांव को सील करने और शहरों में सब्जियां, फल और दूध की सप्लाई रोकने का ऐलान किया है. चंडीगढ़ में बुधवार को जुटे किसान नेताओं ने यह ऐलान किया है. किसानों के इस आंदोल की अगुवाई राष्ट्रीय किसान महासंघ कर रहा है. इस संगठन के अंदर में देशभर के 110 किसान संगठन आते हैं.

इतना ही नहीं किसानों ने ऐलान किया है कि जब तक कोई जरूरी काम नहीं होगा तब तक किसान गांव के बाहर शह नहीं जाएंगे. तीनों राज्यों में गांवों की सीमा को पूरी तरह सील कर दिया जाएगा. किसानों का कहना है कि सरकारें वादाखिलाफी कर रही है. न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को बढ़ाया नहीं जा रहा है, जिसके चलते किसानों को सीधा नुकसान हो रहा है. किसानों के इस आंदोलन को बीजेपी के पूर्व नेता यशवंत सिन्हा का भी समर्थन है.

किसान नेताओं ने बुधवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि हम लंबे समय से स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार बिल्कुल भी ध्यान नहीं दे रही है. सभी राज्य सरकारें अन्य सेक्टर के लोगों पर पैसे खर्च करती है, लेकिन किसानों की बेहतरी पर कोई ध्यान नहीं दे रही है. मजबूर होकर किसानों ने शहरों में सब्जियों, दूध और फल की सप्लाई रोकने का फैसला लिया है.

दिल्ली में आसमान छू सकती है महंगाई

दिल्ली के विभिन्न सब्जी मंडी एसोसिशन से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर किसान ऐसा करते हैं तो इसका सीधा असर पड़ेगा. उनका कहना है कि दिल्ली में करीब 40 फीसदी सब्जी हरियाणा और पंजाब से आते हैं.

पंजाब-हरियाणा की सब्जियां मंडी में नहीं आने पर यूपी पर दबाव बनेगा, जिससे महंगाई बढ़ना तय है. बताया जा रहा है कि गर्मी शुरू होने के चलते पहले ही सब्जियों की आवक कम है और भाव तेज हैं. किसानों के आंदोलन के चलते ये और महंगे हो सकते हैं.

अंडा ट्रे के इस्तेमाल से आप भी ऐसे ले सकते है सड़े हुए प्याज़ से मुनाफा

आपकी जेब ढीली कर देने वाली प्याज कभी-कभी कौड़ियों के दाम पर बिकने को मजबूर हो जाती है जिससे किसानों को काफी सही मुनाफा नहीं मिल पाता। किसानों को उनके प्याज की सही कीमत मिले इसके लिए राजविंदर सिंह राना ने एक नई तकनीक इजाद की है। राजविंदर पंजाब के लुधियाना जिले के मदियानी गांव में रहते हैं।

उन्होंने यह देखा कि कई बार जब प्याज हल्का सड़ने लगता हैं तो किसानों को उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता। राजविंदर ने समस्या का हल निकालने के लिए इस विषय शोध किया। उन्होंने ‘एग ट्रे’ में प्याज रखकर सप्ताह में दो बार पानी का छिड़काव किया। इसके बाद उससे हरी पत्ती वाला प्याज निकलने लगा।

राजविंदर बताते हैं कि एक किलो प्याज में जितने गुण पाए जाते हैं, उतने ही गुण एक हरे पत्ती वाले प्याज में पाए जाते हैं। वैसे तो इस इस तकनीक का इस्तेमाल हम उस समय कर सकते हैं जब हमारे पास मिट्टी का कोई साधन न हो लेकिन अभी मैंने इसका इस्तेमाल अपनी किचेन में किया है।

इस प्याज का इस्तेमाल हम रोजाना कर सकते हैं। ये वर्षों चलने वाली प्रक्रिया है, इससे हमारे घर में हल्का खराब हो रहा प्याज प्रयोग में आ जाएगा। राजविंदर आगे बताते हैं कि इस प्रक्रिया से किसानों के प्याज का उन्हें सही दाम भी मिलेगा। साथ ही अगर कोई इस हरे प्याज एग ट्रे को बाजार में बेचना चाहेगा तो उस समय बाजार भाव के हिसाब से 40-60 रुपए आसानी से कमाए जा सकते हैं।

आप भी अपनी रसोई में खाली एग ट्रे में घर में हल्के खराब हो रहे प्याज को एग ट्रे के खानों में भरकर रख सकते हैं। सप्ताह में दो बार हल्के पानी का इसमें छिड़काव करें। इसमें हर सप्ताह में दो बार पानी डालते रहें जिससे ये हरा बना रहेगा। इस तकनीक से घर में खराब हो रहे प्याज का हम सही से प्रयोग कर सकते हैं।

बेबी कॉर्न एक बार में कमा कर देगा 2 लाख

कम इन्‍वेस्‍टमेंट में अच्‍छी इनकम के लिए खेती को जरिया बनाने वालों के लिए बेबी कॉर्न की खेती भी एक अच्‍छा विकल्‍प हो सकती है। खास बात यह है कि बेबी कॉर्न की पैदावार को पूरे साल में 3 से 4 बार लिया जा सकता है। बड़ी-बड़ी रेस्‍टोरेंट चेन और होटलों में अच्‍छी-खासी डिमांड होने के चलते इसकी कीमत भी अच्‍छी मिलती है।

यदि एक हेक्‍टेयर भूमि में बेबी कॉर्न की खेती का मॉडल समझा जाए तो इससे सालभर में 3 से 4 लाख रुपए की इनकम आसानी से की जा सकती है। जबकि, एक बार में लागत 10 से 15 हजार रुपए प्रति हेक्‍टेयर की आती है। इस हिसाब से देखा जाए तो शुद्ध लाभ 2.5 लाख रुपए से 3.5 लाख रुपए अर्जित किया जा सकता है। आइए जानते हैं कि अच्‍छी इनकम के लिए कब, कैसे और किन किस्‍मों की करें बुआई

अभी है बुआई का अच्‍छा समय

बेबी कॉर्न मक्‍का की एक प्रजाति होती है। या यूं कहें कि यह मक्‍का का प्री-मैच्‍योर भुट्टा होता है। भारत के अधिकतर हिस्‍सों में मक्‍का की बुआई तीनों सीजन (सर्दी, गरमी और बरसात) में की जाती है। उत्‍तर भारत में दिसंबर और जनवरी के महीनों में बुआई ठीक नहीं रहती है। वर्तमान में खरीफ सीजन के लिए बेबी कॉर्न की फसल को बोया जा सकता है।

कितनी लगती है लागत

एक हेक्‍टेयर कृषि भूमि में बेबी कॉर्न पैदा करने के लिए लगभग 15 किलोग्राम बीज की आवश्‍यकता हेाती है। सीड कंपनी के प्रमाणित बीज 200 से 300 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से मिलते हैं। इसके अलावा बीमारियों से बचाने के लिए कीटनाशक व अन्‍य लागत पर 6 से 10 हजार रुपए का खर्च आ जाता है।

इसमें जल्‍दी पैदावार देने वाली (50 से 55 दिनों में) हरियाणा मेज(एचएम)-4, एचक्‍यूपीएम आदि उन्‍नत किस्‍मों को चुना जा सकता है। इन किस्‍मों में बेबी कॉर्न के सभी गुण मौजूद होते हैं। 16 से 20 क्विंटल तक होती है पैदावार एक हेक्‍टेयर बेबी कॉर्न की फसल से लगभग 16 से 20 क्विंटल बेबी भुट्टा (बिना छिलके) के प्राप्‍त होता है।

इसके अलावा 200 से 300 क्विंटल हरा चारा भी प्राप्‍त होता है। गर्मियों के दिनों में बेबी कॉर्न और हरा चारा की बेहद अच्‍छी डिमांड रहती है। बेबी कॉर्न को तोड़ने के बाद नरमंजरी, रेशा, छिलका आदि पोष्टिक चीजें भी मिलती हैं। ये भी बाजार में आसानी से बिक जाती हैं।

एक बार में 1.5 से 2 लाख रुपए की इनकम

बेबी कॉर्न की बिक्री अधिकतर बड़े शहरों में की जाती है। इसकी फुटकर कीमत 70 से 120 रुपए प्रतिकिलो के आसपास होती है। थोक में इसका रेट 4000 से 6000 रुपए प्रति क्विंटल (क्‍वालिटी के अनुसार) होता है। यदि कम से कम दाम 4000 रुपए प्रति क्विंटल को भी आधार बनाया जाए तो सिर्फ बेबी कॉर्न से ही 80000 रुपए इनकम होती है।

इसके अलावा हरा चारा स्‍थानीय बाजारों में लगभग 200 रुपए से 300 रुपए प्रति क्विंटल की दर से बिकता है। इससे 60 हजार रुपए तक इनकम होती है। इस तरह यदि साल में दो बार भी बेबी कॉर्न की फसल ली जाए तो इससे 2.50 रुपए तक कमाए जा सकते हैं। इसके साथ अन्‍य मौसमी फसलें भी ली जा सकती हैं।

ऐसे करें मार्केटिंग

इसकी बिक्री बड़े शहरों (जैसे- दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता आदि) के मंडियों में की जा रही है | विरेंद्र कुमार यादव ने बताया कि कुछ किसान इसकी बिक्री सीधे ही होटल, रेस्तरां, कम्पनियों (रिलायन्स, सफल आदि) को कर रहे हैं | कुछ यूरोपियन देशों तथा अमेरिका में बेबी कॉर्न के आचार एवं कैन्डी की बहुत ही ज्यादा माँग है | हरियाणा राज्य के पानीपत जिला से पचरंगा कम्पनी द्वारा इन देशों में बेबी कॉर्न के आचार का निर्यात किया जा रहा है |

अच्‍छे दामों के लिए करें प्रोसेसिंग

बाजार में बेबी कॉर्न (छिलका उतरा हुआ) को बेचने के लिये छोटे–छोटे पोलिबैग में पैकिंग किया जा सकता है | इसे अधिक समय तक संरक्षित रखने के लिये काँच(शीशा) की पैकिंग सबसे अच्छी होती है | काँच के पैकिंग में 52% बेबी कॉर्न और 48% नमक का घोल होता है | बेबी कॉर्न को डिब्बा में बंद करके दूर के बाजार या अन्तराष्ट्रीय बाज़ारों में बेचा जा सकता है।

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महिंद्रा ने उतारे 50 HP से ज्यादा पावर के दो ट्रेक्टर

देश की सबसे बड़ी ट्रैक्टर निर्माता कंपनी महिंद्रा ऐंड महिंद्रा (Mahindra & Mahindra) ने दो नये ट्रैक्टर बाजार में उतारे हैं।

इनमें 9.99 लाख रुपये कीमत वाला नोवो 65 एचपी (655DI) और 12.5 लाख रुपये मूल्य वाला नोवो 75 एचपी (755DI) शामिल हैं। नोवो 75 एचपी 4X4 (4WD) में भी आता है और 2WD में भी ।

इस से पहले महिंद्रा के ट्रेक्टर 50 HP पावर वाले थे । इन नेक्स्ट जनरेशन ट्रैक्टरों का डिजाइन और विकास कंपनी की चेन्नई में स्थित वैश्विक अनुसंधान एवं विकास सुविधा महिंद्रा रिसर्च वैली में किया गया है।

महिंद्रा नोवो को काफी रिसर्च और 12 राज्यों के किसानों को ध्यान में रख कर तैयार किया गया है। इसके अलावा इस ट्रैक्टर के विकास में एक सीडिंग (बीज बोना) चरण भी शामिल है।

महिंद्रा ने कहा है के वो इन दोनों ट्रेक्टर के ऊपर 3 साल की इंजन की वारंटी देगी । साथ ही महिंद्रा 75hp 4WD के लिए AC केबिन भी देगी । इस सेगमेंट में महिंद्रा का मुकाबला जॉनडिअर और न्यू हॉलैंड ट्रेक्टर से होगा ।

महिंद्रा एंड महिंद्रा ने वित्त वर्ष 2018 में 3 लाख से ज्यादा ट्रैक्टरों की बिक्री का आंकड़ा पार कर लिया है। इसी के साथ कंपनी ने इस साल ट्रैक्टरों की अब तक की सर्वाधिक वार्षिक उपलब्धि हांसिल की है। वित्त वर्ष 2018 में इसके घरेलू बाजार में 22 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

इन 22 राज्यो में बासमती चावल की खेती पर पूरी तरह से पाबंदी

दुनिया में अपनी खुशबू और स्वाद के लिए पहचाने जाने वाले भारतीय बासमती चावल को लेकर बड़ा फैसला हुआ है। खराब क्वालिटी के कारण विदेशों से सप्लाई लौटने पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने 22 राज्यों में बासमती की खेती पर पाबंदी लगा दी है।

अब सिर्फ उत्‍तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में ही बासमती धान की खेती होगी। सबसे ज्यादा उत्पादन लक्ष्य उत्‍तराखंड के तराई क्षेत्र और पंजाब को दिया गया है।खेती के लिए नए किसानों को चिह्नित करने का फैसला हुआ है, जिन्हें प्रशिक्षित कर काबिल बनाया जाएगा। कृषि वैज्ञानिक बासमती धान की खेती में बीज, सिंचाई और उवर्रक डालने तक में प्रशिक्षित करने के साथ ही फसल के दौरान मदद करेंगे।

इसलिए हुआ फैसला

कुछ वर्षों में लगातार रासायनिक खाद के उपयोग से बासमती की क्वालिटी पर खासा प्रभाव पड़ा। बीज भी दोयम दर्जे का डाला गया। इसी के साथ खुशबू और स्वाद में भी कमी आई। सप्लाई लेने वाले देशों ने जब बासमती की जांच कराई तो उसे अपने मानकों पर जहरीला माना। बरेली के कारोबारियों की सप्लाई पिछले कुछ महीने पहले लौटा दी गई।

इन देशों में ज्यादा मांग

कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के माध्यम से भारतीय बासमती का निर्यात ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, हंगरी, नीदरलैंड्स, स्वीडन, इंग्लैंड, डेनमार्क, पोलैंड, पुर्तगाल और स्पेन में सबसे ज्यादा होता है। कुल मिलाकर लगभग सौ देशों को बासमती का निर्यात किया जाता है।

इन राज्यों में खेती पर रोक

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, ओडिशा, केरल, कर्नाटक, गुजरात, तमिलनाडु, त्रिपुरा, नगालैंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, मेघालय, गोवा, छत्तीसगढ़, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, सिक्किम, तेलंगाना पर रोक लगाई है। इन सभी राज्यों में पहले बासमती की खेती होती थी।

अब सिर्फ इन राज्‍यों में होगी बासमती की खेती

अब सिर्फ सात राज्‍यों उत्‍तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में बासमती की खेती होगी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. टी. महापात्रा का कहना है कि इन सात राज्यों की कृषि भूमि बासमती के लिए बेहतर है। अब यहां ही बीज उत्पादन करने के साथ ही खेती की जाएगी।

7 साल से खेती कर रही हैं जूही चावला

अपने जामने की हीट एक्ट्रेस जूही चावला बॉलीवुड की टॉप एक्ट्रेसेस में से एक है। उनकी आवाज और मुस्कान के लोग आज भी दीवाने हैं। भले ही उन्होंने बॉलीवुड फिल्मों से दूरी बना ली हो लेकिन एक्टिंग के बाद आईपीएल में अपनी टीम खरीद ली है, जिसके साथ वह अभी भी जुड़ी हुई है। इसके अलावा एक्ट्रैस जूही चावला सामाजिक कार्यों के लिए सक्रिय रहने के साथ, विभिन्न मुद्दों पर लोगों को जागरूक भी करती रहती हैं।

बॉलीवुड इंडस्ट्री से दूरी बनाने के बाद जूही चावला 7 साल से आर्गेनिक प्रोडक्ट्स को बढ़ावा दे रही है। उनके इस प्रयास को देखते हुए हाल ही में उन्हें पहले वुमेन ऑफ इंडिया आर्गेनिक फेस्टिवल के मुंबई संस्करण का ब्रांड एंबेस्डर भी बनाया गया। जूही का कहना है कि, ‘एक बार आपको आर्गेनिक फल और सब्जियों का मीठा स्वाद मिल जाए तो आप कभी भी बाजार में मौजूद केमिकल्स युक्त प्रोडक्ट्स नहीं खरीदेंगे।’

जूही अपने महाराष्ट्र, वाडा में स्थित अपने फार्म हाउस में आर्गेनिक फूड्स की खेती भी करती हैं। जूही ने बताया कि, ‘वो लम्हा आंख खोल देने वाला था, जब मैंने आमिर खान को इस विषय पर ‘सत्यमेव जयते’ के एक एपिसोड में बोलते हुए सुना। मैं अपने घर पर सिर्फ आर्गेनिक खेती करता हूं। उसके बाद से ही कुछ समय बाद जूही ने भी महाराष्ट्र, वाडा में स्थित अपने फार्महाउस में आर्गेनिक फूड्स उगाना शुरू कर दिया।’

जूही ने कही कि ‘मैं एक किसान हूं। मेरे किसान पिता ने 20 एकड़ ज़मीन वाडा में खरीदी थी। मुझे खेती के बारे में कुछ नहीं पता था। जब उन्होंने खेती योग्य जमीन में इन्वेस्ट किया, तब मैं एक अभिनेत्री के रूप में काफी व्यस्त थी और मेरे पास इस पर ध्यान देने के लिए समय भी नहीं था।

उनकी मृत्यु के बाद मुझे इस सब पर कंट्रोल रखना पड़ा।’ जूही पिछले 7 साल से खेती कर रही है और उनके पास 200 से ज्यादा पेड़ों वाला उद्यान है। उनके इस बगीचे में चीकू, पपीते और अनार के भी कुछ पेड़ हैं।

You know what is growing in my garden? Spinach 😍😀😀😀💪

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इसके अलावा जूही के ओर फार्म भी है, जिसमें वह ऑर्गेनिक सब्जियां भी उगाती हैं। जूही ने मांडवा में 10 एकड़ जमीन खरीदी और जहां वह आर्गेनिक सब्जियां उगाती हैं जूही चावला के पति के रेस्‍टोरेंट में उन्‍हीं की उगाए हुए ऑर्गेनिक फल और सब्जियों का इस्‍तेमाल किया जाता है। जिससे ग्राहकों को वहां एकदम सुरक्षित खाना खाने का मौका मिलता है।

यहां सड़क पर टमाटर फेंकने को मजबूर हुए किसान

क्या किया जाए साहब! मंडी में टमाटर प्रति रुपये किलो बिक रहा है, जबकि उस पर ढुलाई खर्च ही दो रुपया आता है। इसके अलावा पटवन व मेहनताना खर्च अलग से है। दिनोंदिन डीजल व बिजली महंगी होती जा रही है। ऐसी स्थिति में इसे बर्बाद करने के अलावा और कोई दूसरा उपाय भी नहीं बचा है।

कुछ ऐसा ही दर्द रविवार को स्थानीय पोस्ट ऑफिस चौक पर सब्जी उत्पादक किसान टमाटर को नष्ट करते हुए छलका। नोखा के कई किसानों ने आज मंडी लाए गए टमाटर को बेचने के बजाए सड़क पर फेंक कम मूल्य मिलने पर विरोध जताया। कहाकि अगर खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगा होता तो शायद यह दिन उन्हें देखने को नहीं मिलता।

टमाटर का उचित दाम नहीं मिलने से नाराज सदर प्रखंड के आकाशी गांव के एक दर्जन से अधिक सब्जी उत्पादक किसानों ने खेत से तोड़े गए टमाटर को पोस्ट आफिस चौराहे पर गाडिय़ां चला उसे नष्ट करने का काम किया। रास्ते से गुजरने वाले हर कोई किसानों की यह स्थिति देख कुछ समय के लिए चौक पर जरूर ठहर जाते थे।

शिमला मिर्च समेत कई प्रकार की सब्जियों के अच्छे उत्पादक माने जाने वाले किसान अकाशी गांव निवासी मनोज सिंह कहते हैं कि एक किलो टमाटर को तैयार कर उसे मंडी तक पहुंचाने में छह से आठ रुपये खर्च आता है। लेकिन बाजार में कीमत सिर्फ एक रुपया किलो ही मिलता है। ऐसी स्थिति में इसे नष्ट न किए जाए तो और क्या….? कहा कि दिनोंदिन डीजल महंगे हो रहे हैं व बिजली की कीमत भी बढ़ रही रही है।

सरकार सिर्फ किसान हितैषी बता रही है। लेकिन किसानों के हित के लिए की गई घोषणाओं पर अमल नहीं हुआ। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगाने की घोषणा वर्षों पूर्व हुई है। मेगा फूड पार्क का शिलान्यास भी तीन वर्ष पूर्व यहां किया गया। लेकिन निर्माण अबतक नहीं हो पाया। ऐसे में किसानों की आमदनी कैसे बढ़ेगी।

गौरतलब है कि कमोबेश यही स्थित आकाशी ही नहीं मनीपुर, मल्हीपुर, नोखा, बरांव समेत जिले के अन्य गांवों में टमाटर उत्पादन करने वाले किसानों की है। जिन्हें आज खर्च के अनुरूप आमदनी नहीं हो रही है। उनके लिए सब्जी की खेती कमरतोड़ व महंगी साबित होने लगी है। जिसके कारण बच्चों की पढ़ाई- लिखाई से लेकर परिवार का भरण-पोषण का कार्य भी बाधित हो रहा है।

युवा किसान का कमाल 550 रुपये किलो की दर से बेच रहा है अमरूद

अमरूद एक ऐसा फल है जो मात्र दो-तीन दिन तक ही ताज़ा रह सकता है। बासी होने पर खाना तो दूर उसे घर में रखना भी मुश्किल है। ऐसे फल को ऑनलाइन 550 रुपए किलो के हिसाब से बेचकर इंजीनियर से किसानी को अपनाने वाले नीरज ढांडा के बारे में भला कौन नहीं जानना चाहेगा जिन्होंने असंभव काम को संभव कर दिखाया। लेकिन इंजीनियर के करियर को अलविदा कर खेती-किसानी से कामयाबी की कहानी लिखना इतना आसान नहीं था।

नीरज ने इंजीनियरिंग के बाद नौकरी करके कुछ पैसा बचाया और जींद से 7 किलोमीटर आगे संगतपुरा में अपने 7 एकड़ खेतों में चेरी की खेती करने का मन बनाया। पहले प्रयास में असफल होने पर परिवार वालों ने उन्हें नौकरी ही करने की सलाह दी। लेकिन उनके मन में तो कुछ और ही चल रहा था। कुछ समय बाद नीरज ने इलाहाबाद के कायमगंज की नर्सरी से अमरूद के कुछ पौधे खरीदें और अपने खेतों में लगाए। अमरूद की काफी अच्छी फसल हुई।

मंडी में जब वह अपनी फसल लेकर पहुंचे तो सभी बिचौलिये एक हो गए और 7 रुपए किलो का दाम लगाया। नीरज भी अपनी जिद पर अड़ गए उन्होंने गांव की चौपालों और गांव से सटे शहर के चौराहों पर कुल मिलाकर 6 काउंटर बनाए और मंडी से दोगुने दामों में इन अमरूदों को बेचा। काफी थोक विक्रेता भी इन काउंटरों के जरिए नीरज के खेतों तक पहुंचे। अब नीरज को इस बात का अंदाजा हो गया था कि जल्दी खराब होने वाले फल यदि जल्दी नहीं बिके तो लाभ होना बहुत मुश्किल है।

उन्होंने अपने आगे के सफर के लिए छत्तीसगढ़ का रुख किया। वहां एक नर्सरी से थाईलैंड के जम्‍बो ग्‍वावा के कुछ पौधे खरीद कर लाए और उसे अपने खेतों में रोपा। डेढ़ किलो तक के अमरूदों की बंपर फसल का तोहफा नीरज को अपनी मेहनत के रूप में मिला। अपने ही खेतों के वेस्ट से बनी ऑर्गेनिक खाद के कारण अमरूदों में इलाहाबाद के अमरूद जैसी मिठास बनी रही। फिर नीरज ने अपनी कंपनी बनाई और हाईवे बेल्ट पर अमरूदों की ऑनलाइन डिलीवरी की शुरुआत की।

जम्‍बो अमरूद की खास बात यह है कि इनकी ताजगी 10 से 15 दिन तक बनी रहती है। नीरज ने अपनी वेबसाइट पर ऑर्डर देने से डिलीवरी मिलने तक ग्राहकों के लिए ट्रैकिंग की व्यवस्था भी की जिससे वह पता लगा सकते हैं कि अमरूद किस दिन बाग से टूटा और उन तक कब पहुंचा है। इंजीनियर किसान की हाईटैक किसानी के अंतर्गत 36 घंटे की डिलीवरी का टारगेट सेट किया गया है।

आजकल नीरज जिस समस्या से जूझ रहे हैं उसका हल भी उन्‍होंने निकाल लिया है। दरअसल मशहूर होने के कारण दूर-दूर से लोग उनके अमरूद के बाग देखने आ रहे हैं। कुछ किसान यह तकनीक सीखना भी चाहते हैं।

इसके लिए अब उन्होंने एक समय सारणी बनाकर मूल्‍य निर्धारित कर दिया है, जिसे लेकर वह यह तकनीक किसानों को सिखाएंगे। अब पर्यटन खेती के माध्यम से भी नीरज अपनी कमाई में इजाफा करेंगे। इतना ही नहीं भविष्य में नीरज ने ग्रीन टी, आर्गेनिक गुड और शक्‍कर भी ऑनलाइन बेचने की योजना पूरी कर ली है जिसे वह जल्द ही शुरू करने वाले हैं।

इस विधि से खेती करने से नहीं करना पड़ेगा कीटनाशक दवाइओं पर खर्च

किसान खेत की जुताई का काम अक्सर बुवाई के समय करते हैं। जबकि फसल के अच्छे उत्पादन के लिए रबी फसल की कटाई के तुरंत बाद मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई कर ग्रीष्म ऋतू में खेत को खाली रखना बहुत ही ज्यादा लाभप्रद हो सकता हैं।

क्योंकि फसलों में लगने वाले कीट जैसे सफेद लट, कटवा इल्ली, लाल भृंग की इल्ली तथा व्याधियों जैसे उखटा, जड़गलन ककी रोकथाम की दृष्टि से गर्मियों में गहरी जुताई करके खेत खाली छोड़ने से भूमि का तापमान बढ़ जाता हैं जिससे भूमि में मौजूद कीटों के अंडे, प्यूपा, लार्वा और लट ख़त्म हो जाते हैं। जिसके परिणामस्वरूप रबी एवं खरीफ में बोई जाने वाली तिलहनी, दलहनी खाद्दान्न फसलों और सब्जयों में लगने वाले कीटों- रोगों का प्रकोप काम हो जाता हैं।

क्योंकि जुताई के समय भूमि में रहने वाले कीट उनकी अपरिपक्व अवस्था जैसे प्यूपा, लार्वा भूमि की सतह पर आ जाते हैं जिन पर प्रतिकूल वातावरण एवं उनके प्राकृतिक शत्रुओ विशेषकर परभक्षी पक्षियों का आक्रमण सहज हो जाता हैं। अतः गर्मी में गहरी जुताई करने से एक सीमा तक कीड़े एवं बिमारियों से छुटकारा पाया जा सकता हैं। जिस से आपका कीटनाशक का खर्च बिलकुल कम हो जाएगा

जुताई कब करें

गर्मियों की जुताई का उपयुक्त समय यथासंभव रबी की फसल कटते ही आरंभ कर देनी चाहिए क्योंकि फसल कटने के बाद मिट्टी में थोड़ी नमी रहने से जुताई में आसानी रहती हैं तथा मिट्टी के बड़े- बड़े ढेले बनते हैं।

जिसे भूमि में वायु संचार बढ़ता हैं। जुताई के लिए प्रातः काल का समय सबसे अच्छा रहता हैं क्योंकि कीटों के प्राकृतिक शत्रु परभक्षी पक्षियों की सक्रियता इस समय अधिक रहती हैं अतः प्रातः काल के समय में जुताई करना सबसे ज्यादा लाभदायक होता हैं।

गर्मियों की जुताई कैसे करें

गर्मी की जुताई 15 सेमी. गहराई तक किसी भी मिट्टी पलटने वाले हल से ढलान के विपरीत करनी चाहिए। लेकिन बरनी क्षत्रों में किसान ज्यादातर ढलान के साथ- साथ ही जुताई करते हैं जिससे वर्षाजल के साथ मृदा कणों के बहने की क्रिया बढ़ जाती हैं।

अतः खेतों में हल चलाते समय इस बात का ख्याल रखना चाहियें की यदि खेत का ढलान पूर्व से पश्चिम दिशा की तरफ होतो जुताई उतर से दक्षिण की और यानी ढलान के विपरीत ढलान को काटते हुए करनी चाहियें। ऐसा करने से बहुत सारा वर्षा का जल मृदा सोख लेती हैं और पानी जमीन की निचली स्थान तक पहुंच जाता हैं जिससे न केवल मृदा कटाव रुकता हैं बल्कि पोषक तत्व भी बहकर नहीं जा पाएंगे।