ये है हाथ से चलने वाली बिजाई मशीन, यहाँ से खरीदें

आप ने ट्रेक्टर के साथ खेत में बिजाई तो बहुत देखी होगी । लेकिन अभी भी बहुत से लोग है जो बैलों से खेती करते है । ऐसे किसान बीज बोने के लिए हाथ से छींटे दे देते है । जिस से फसल अच्छी नहीं होती । ऐसे किसानो के लिए अब बहुत सी कंपनी बिजाई की मशीन बना रही है जो हाथ से चलती है और जो बहुत अच्छी बिजाई करती है ।

आज  हम आपको जिस कंपनी की मशीन दिखने वाले है उस कंपनी का नाम है “ओम एग्रो वर्ल्ड ” । यह कंपनी ट्रेक्टर के साथ चलने वाली बिजाई मशीन तो बनाती ही है साथ में साथ से चलनी वाली बिजाई मशीन भी बनाती है ।

इस मशीन में एक बार में 4 किल्लो बीज डाला जा सकता है । यह मशीन 1 कतार में बिजाई करती है ।इस मशीन का वजन लगभग 12 किलो होता है । ये मशीन नरम और सख्त दोनों प्रकार की मिट्टी पर आसानी से चलती है इसके हेंडल की उचाई किसान अपने हिसाब से ऊपर निचे कर सकता है । इस मशीन की कीमत 5142 रुपये है ।

यह मशीन कैसे काम करती है इसके लिए यह वीडियो देखें

अगर आप इस मशीन की कीमत और दूसरी कोई जानकारी के बारे में जानना चाहते है तो निचे दिए हुए नंबर पर कांटेक्ट करें फ़ोन – +91 804296 4004 ,+91 98815 10419

इस विधि से खेती करने से नहीं करना पड़ेगा कीटनाशक दवाइओं पर खर्च

किसान खेत की जुताई का काम अक्सर बुवाई के समय करते हैं। जबकि फसल के अच्छे उत्पादन के लिए रबी फसल की कटाई के तुरंत बाद मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई कर ग्रीष्म ऋतू में खेत को खाली रखना बहुत ही ज्यादा लाभप्रद हो सकता हैं।

क्योंकि फसलों में लगने वाले कीट जैसे सफेद लट, कटवा इल्ली, लाल भृंग की इल्ली तथा व्याधियों जैसे उखटा, जड़गलन ककी रोकथाम की दृष्टि से गर्मियों में गहरी जुताई करके खेत खाली छोड़ने से भूमि का तापमान बढ़ जाता हैं जिससे भूमि में मौजूद कीटों के अंडे, प्यूपा, लार्वा और लट ख़त्म हो जाते हैं। जिसके परिणामस्वरूप रबी एवं खरीफ में बोई जाने वाली तिलहनी, दलहनी खाद्दान्न फसलों और सब्जयों में लगने वाले कीटों- रोगों का प्रकोप काम हो जाता हैं।

क्योंकि जुताई के समय भूमि में रहने वाले कीट उनकी अपरिपक्व अवस्था जैसे प्यूपा, लार्वा भूमि की सतह पर आ जाते हैं जिन पर प्रतिकूल वातावरण एवं उनके प्राकृतिक शत्रुओ विशेषकर परभक्षी पक्षियों का आक्रमण सहज हो जाता हैं। अतः गर्मी में गहरी जुताई करने से एक सीमा तक कीड़े एवं बिमारियों से छुटकारा पाया जा सकता हैं। जिस से आपका कीटनाशक का खर्च बिलकुल कम हो जाएगा

जुताई कब करें

गर्मियों की जुताई का उपयुक्त समय यथासंभव रबी की फसल कटते ही आरंभ कर देनी चाहिए क्योंकि फसल कटने के बाद मिट्टी में थोड़ी नमी रहने से जुताई में आसानी रहती हैं तथा मिट्टी के बड़े- बड़े ढेले बनते हैं।

जिसे भूमि में वायु संचार बढ़ता हैं। जुताई के लिए प्रातः काल का समय सबसे अच्छा रहता हैं क्योंकि कीटों के प्राकृतिक शत्रु परभक्षी पक्षियों की सक्रियता इस समय अधिक रहती हैं अतः प्रातः काल के समय में जुताई करना सबसे ज्यादा लाभदायक होता हैं।

गर्मियों की जुताई कैसे करें

गर्मी की जुताई 15 सेमी. गहराई तक किसी भी मिट्टी पलटने वाले हल से ढलान के विपरीत करनी चाहिए। लेकिन बरनी क्षत्रों में किसान ज्यादातर ढलान के साथ- साथ ही जुताई करते हैं जिससे वर्षाजल के साथ मृदा कणों के बहने की क्रिया बढ़ जाती हैं।

अतः खेतों में हल चलाते समय इस बात का ख्याल रखना चाहियें की यदि खेत का ढलान पूर्व से पश्चिम दिशा की तरफ होतो जुताई उतर से दक्षिण की और यानी ढलान के विपरीत ढलान को काटते हुए करनी चाहियें। ऐसा करने से बहुत सारा वर्षा का जल मृदा सोख लेती हैं और पानी जमीन की निचली स्थान तक पहुंच जाता हैं जिससे न केवल मृदा कटाव रुकता हैं बल्कि पोषक तत्व भी बहकर नहीं जा पाएंगे।

परंपरागत खेती छोड़ने से चमकी किसानों की किस्मत

12 साल पहले यहां के किसान कर्ज में डूबे हुए थे। परिवार परंपरागत खेती पर निर्भर था। जिससे गुजारा लायक ही आमदनी होती थी। मात्र 12 साल में सब्जी की खेती में एक ऐसी क्रांित आई कि किसानों की किस्मत चकम उठी। किसान मालामाल तो हुए ही साथ ही विदेशी भी उनके यहां नई तकनीक से रूबरू होने के लिए आने लगे।

बेबीकार्न, स्वीटकार्न ने आठ गांवों के किसानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी। अटेरना गांव के अवार्डी किसान कंवल सिंह चौहान, ताहर सिंह चौहान, सोनू चौहान, मनौली के अरुण चौहान, दिनेश चौहान ने बताया कि 12 साज पहले एक समस था जब खादर के किसान केवल गेहूं व धान पर निर्भर थे। परिवार का गुजारा मुश्किल से चलता था। किसानों के मन में कुछ अलग करने की लालसा हुई।

अटेरना गांव के कंवल सिंह चौहान ने सबसे पहले बेबीकार्न व स्वीटकार्न की खेती को शुरू किया। जब मंडी में भाव अच्छे मिलने लगे तो बाकी किसान भी आकर्षित हुए। आज आठ गांव के किसान पूरी तरह से सब्जी की खेती को बिजनेस के तौर पर कर रहे हैं। पोल हाउस में तैयार सब्जी व मशरूम आजादपुर मंडी में हाथों हाथ बिक रही है।

एक सोच ने बदल दी जिंदगी : अरुण चौहान

मनाैली के किसान ताहर सिंह चौहान ने कहा कि एक सोच ने उनकी जिदंगी बदल दी। पहले वे आढ़ती के सामने कर्ज के लिए हाथ जोड़ते थे। आज आढ़ती उनके पास खेत में ही फसल खरीदने पहुंच रहे हैं। स्वीटकार्न व बेबीकार्न ने किसान की अंधेरी जिदंगी में रोशनी पैदा कर दी है। यहां के किसान संपन्न हो गए हैं।

पहले एक ट्रैक्टर को खरीदना सपना होता था। आज हर दूसरे किसान के पास महंगी कार हैं। किसानों के पास मजदूरी करने के लिए बाहर से लेबर आ रही है। एक समय था जब पूरा परिवार खेत में काम करता और दो जून की रोटी भी मुश्किल से खा पाता था। सब्जी ने उनके गांव की तकदीर बदल दी है।

दो गुना आमदनी ले रहे हैं यहां के किसान

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किसान कंवल िसंह चौहान ने कहा कि धान व गेहूं की फसल से साल भर में किसान को 80 हजार रुपए की आमदनी होती है। किसान बेबीकाॅर्न, स्वीटकाॅर्न व मशरूम से साल में डेढ़ लाख से दो लाख रुपए तक प्रति एकड़ आमदनी ले रहे हैं। सब्जी की फसल में गेहूं व धान से कम खर्च आता है। यहां के आठ गांवों के अधिक्तर किसान जैविक खाद का प्रयोग कर रहे हैं। जिससे यूरिया की लागत कम हो रही है।

बेबीकाॅर्न को देखने आते हैं विदेशी डेलीगेट्स

दिल्ली पुसा संस्थान में जो भी वेज्ञानिक रिसर्च करने के लिए आते हैं, वे फील्ड वीजिट के लिए इन गांवों का दौरा करते हैं। गत दिनों भेटान, जापान, पाकिस्तान, कोरिया, चीन के किसानों का प्रतिनिधि मंडल अटेरना गांव में पहुंचा था। उन्होंने यहां की खेती की नई तकनीक को अपने देश में भी शुरू करने का विचार रखा था। यहां तक कि अटेरना के किसानों को निमंत्रण भी दिया था कि वे उनके देश के किसानों को भी नई तकनीक से अवगत कराए।

पॉली हाउस में उगाते हैं सब्जी

पॉली हाउस की सब्जी की फसल पूरी तरह से प्रदूषण, खरपतवार तथा कीट पतंगों से दूर रहती है। शिमला मिर्च, खीरा, टमाटर, स्ट्राब्रेरी, घीया जैसी फसल पॉली हाउस के अंदर तैयार हो रही हैं। छोटे से गांव में तैयार होने वाली स्वीटकाॅर्न, बेबीकाॅर्न देश व विदेश में काफी डिमांड हैं।

हर पंचायत में होगा कृषि यंत्र बैंक

कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार ने कहा कि अभी पंचायत स्तर पर कृषि यंत्र बैंक स्थापित किए जा रहे हैं। आने वाले दिनों में सभी पंचायतों में कृषि यंत्र बैंक होगा। गांव के किसानों के समूह को सामूहिक कृषि यंत्र बैंक पर 80 प्रतिशत अनुदान का प्रावधान किया गया है।

2022 तक किसानों की आय दोगुना हो जाएगी। बिजली से सिंचाई के लिए अलग फीडर की स्थापना की जा रही है। नवंबर 2017 से इसकी शुरुआत नौबतपुर प्रखंड से हो चुकी है। तीन वर्षों में पूरे राज्य में अगल फीडर होगा।

मंत्री ने कहा किसानों को मौसम, वर्षा आदि की जानकारी के लिए प्रखंड स्तर पर टेलीमेट्रिक वेदर स्टेशन और पंचायत स्तर पर वर्षा मापक यंत्र लगाए जा रहे है। 2017-18 में पायलट प्रोजेक्ट से पूर्वी चंपारण, सुपौल, नालंदा, गया और अरवल में स्थापित किया जा रहा है।

बीएयू के तहत एक कृषि व्यवसाय प्रबंधन कॉलेज, एक कृषि अभियांत्रिकी कॉलेज, एक खाद्य विज्ञान व प्रौद्योगिकी महाविद्यालय और एक जैव प्रौद्योगिकी कॉलेज की स्थापना के लिए आवश्यक राशि का भी प्रावधान किया जा रहा है। गया, मुजफ्फरपुर व पूर्वी चंपारण में कृषि विज्ञान केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं।

कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार ने कहा कि मक्का फसल में दाना नहीं आने की हर शिकायत की जांच होगी और जांच रिपोर्ट के आधार पर सरकार किसानों के नुकसान की भरपाई करेगी। गुरुवार को वे विधानसभा में भाजपा के तारकिशोर प्रसाद के सवाल का जवाब दे रहे थे। उन्होंने कहा कि कृषि वैज्ञानिकों ने कुछ जगहों पर जांच में ये पाया है कि समय पर बुआई नहीं होने के कारण मक्का फसल में दाने नहीं आए हैं।

हालांकि पूरे राज्य में इस तरह की समस्या की बात उठाते हुए विपक्ष ने सदन की कमेटी से जांच करने की मांग की जिसे विधानसभा अध्यक्ष ने खारिज कर दिया। वहीं नगर विकास मंत्री सुरेश शर्मा ने भाजपा के विजय कुमार खेमका के प्रश्न पर कहा कि राज्य में कम लागत, कम खर्च और कम प्रदूषण वाले मात्र 100 किलो लकड़ी से ही शव का संस्कार संपन्न कर देने वाली नई तकनीक के शवदाह गृहों की व्यवस्था की जा रही है।

ये है हाथ से चलने वाली और नदीन निकालने वाली हैरो डिस्क,वीडियो देखें

खेती में नदीन फसल को बहुत नुक्सान पहुंचते है । अगर यह बेकाबू हो जाए तो फसल का उत्पादन आधे से कम रह जाता है ।इस लिए इन्हे शुरुआत में ही काबू करना जरूरी है । लेकिन नदीनों पर काबू करने के लिए नदीननाशक के इलावा यंत्र का भी उपयोग किया जा सकता है ।

नदीननाशक का उपयोग इस लिए कम करना चाहिए क्योंकि इसका असर मुख्या फसल पर भी होता है और धीरे धीरे नदीनों की सहनशीलता बढ़ने लग जाती है और सारी नदीननाशक दवाएं बेअसर हो जाती है । इस लिए सबसे बेहतर यही होता है नदीनों का ख़ात्मा किसी यंत्र की मदद से किया जाए ।

डिस्क हैरो के बारे में हम सब जानते है । इसका इस्तेमाल ट्रेक्टर के साथ खेत में फसल अवशेषों को मिट्टी के अंदर गलाने के लिए किया जाता है । लेकिन अब एक ऐसे हैरो डिस्क आ गए है जिनका इस्तमाल हाथ से किया जाता है और इसके इस्तमाल से हम बड़ी आसानी से नदीनों को साफ़ कर सकते है ।

लेकिन बड़े खेद के बात है यह मशीन भारत में नहीं बनती यह मशीन अमेरिका में बनती है और इसकी कीमत करीब 4900 रुपये (76 $) है ।

लेकिन इसको बनाना कोई मुश्किल नहीं है किसान भाई अपने स्तर पर इसको त्यार कर सकते है वो भी बहुत ही कम कीमत पर ।यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें ।

महाराष्ट्र को सूखा मुक्त करने के लिए आमिर खान ने शुरू की ये मुहीम

गर्मी की दस्तक के साथ ही महाराष्ट्र में पानी का संकट खड़ा हो गया है. महाराष्ट्र का एक बड़ा इलाका हर साल एक बड़े सूखे का सामना करता है. इस बार सूखा से निपटने के लिए कुछ गैर सरकारी संगठन और फिल्मी दुनिया के लोग सामने आए हैं.

सुपरस्टार आमिर खान ने महाराष्ट्र के शहरी क्षेत्रों के विद्यार्थियों एवं नागरिकों से राज्य को सूखा मुक्त बनाने में योगदान का अनुरोध किया. पानी फाउंडेशन के संस्थापक 53 वर्षीय अभिनेता ने पुणे में सिम्बायोसिस विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से बातचीत की और सूखे से निबटने के लिए उनसे जलमित्र बनने एवं इस पहल से जुड़ने की अपील की.

शहर के लोग जलमित्र डॉट पानी फाउंडेशन डॉट इन लिंक पर संपर्क कर एक मई को गांवों में ग्रामीणों के साथ काम करने के लिए पंजीकरण करवा सकते हैं. उस दिन महाराष्ट्र दिवस है. आमिर खान ने कहा, ‘मैं महाराष्ट्र के सभी युवाओं से महाराष्ट्र को सूखा मुक्त करने के इस नेक कार्य से जुड़ने की अपील करना चाहूंगा. महाराष्ट्र दिवस के मौके पर इसे हम महाश्रमदान के रुप में मनाएं तथा ग्रामीण शहरी विभाजन को पाटें.’

उन्होंने कहा, ‘अबतक एक लाख से अधिक लोग जलमित्र ऐप पर पंजीकरण करवा चुके हैं और हम पूरे महाराष्ट्र से और समर्थन की आशा कर रहे हैं. मैं हर व्यक्ति से राज्य को सूखा मुक्त बनाने के लिए श्रमदान करने और इस जनांदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने का अनुरोध करुंगा.’

उन्होंने युवाओं से अपील की है कि महाराष्ट्र को पानीदार बनाने की मुहिम में ज्यादा से ज्यादा लोग जुड़ें और जलमित्र बनें. पानी बचाने के लिए गांवों में रहने वाले लोगों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर श्रमदान करके एक गांव की मदद करें. पानी फाउंडेशन जलसंभरण प्रबंधन कार्यक्रम को राज्य के 24 जिलों के 75 तालुकों तक ले जाने के लक्ष्य के साथ ‘सत्यमेव जयते वाटर कप’ का तीसरा संस्करण शुरु करेगा.

ये है बिजली की तरह चारा काटने वाली मशीन,जाने पूरी जानकारी

हरा चारा काटने वाली मशीने तो आप ने बहुत देखी होंगी लेकिन काटने के बाद चारे का कुतरा(छोटा छोटा काटना ) भी करना पड़ता है । जिस से पशु अच्छी तरह से चारे चारे को खा सकते है । इस लिए आप को पहले चारा काटना पड़ता है फिर कुतरना पड़ता है ।

ये है आधुनिक और छोटी मशीन चारा काटने वाली मशीन ।इसकी खास बात यह है ये मशीन चारा । यह मशीन बिजली की तरह चारा कटती है ।इस लिए यह मशीन डेरी फार्मिंग ,बकरी पालन ,गौशाला आदि जगह पर उपयोग हो सकती है ।

वीडियो देखे

इस मशीन की कीमत 26000 है। यह मशीन मोटर और इंजन दोनों से चलती है। इस मशीन मे 2 Hp की मोटर लगी है इस मशीन का इंजन 5 Hp का है। यह मशीन एक घंटे में 800 KG हरा चारा और 500 KG सूखा चारा काटती है।

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इन आसान तरीकों से मिलेगा मोती की तरह साफ दूध

किसान भाइयों भारत दुनिया का कुल 18.43 फीसदी दुग्ध उत्पादन करता है. ये तो हम सभी लोग जानते है कि दूध में प्रोटीन, वसा व लैक्टोज पाया जाता है जो हमारी सेहत के लिए बहुत लाभदायक होता है. सबसे बड़ी समस्या आती है दूध को खराब होने से बचाना.

ज्यादा दूध उत्पादन के लिए अच्छी नस्ल के पशुओं को पाला जाता है, पर स्वच्छ दूध उत्पादन के बिना ज्यादा दूध देने वाले पशुओं को रखना भी बेकार है.

स्वच्छ दूध हासिल करने के लिए अच्छी नस्ल के पशुओं को रखने के साथ साथ उन को बीमारियों से बचाने और टीकाकरण कराने की जरूरत होती है, जिस से सभी पोषक तत्त्वों वाला दूध मिल सके.

अक्सर देखा जाता है कि कच्चा दूध जल्दी खराब होता है. खराब दूध अनेक तरह की बीमारियां पैदा कर सकता है, इसलिए दूध के उत्पादन, भंडारण व परिवहन में खास सावधानी बरतने की जरूरत होती है.

कच्चे दूध में हवा, दूध दुहने वाले गंदे उपकरणों, खराब चारा, पानी, मिट्टी व घास से पैदा होने वाले कीटाणुओं से खराबी आ सकती है. इस वजह से कम अच्छी क्वालिटी के दूध बाहरी देशों को नहीं बेच पाते हैं जबकि पश्चिमी देशों में इस की मांग बढ़ रही है.

वैसे, दूध में जीवाणुओं की तादाद 50,000 प्रति इक्रोलिटर या उस से कम होने पर दूध को अच्छी क्वालिटी का माना जाता है. दूध इन वजहों से खराब हो सकता है:

  • थनों में इंफैक्शन का होना.
  • पशुओं का बीमार होना.
  • पशुओं में दूध के उत्पादन से संबंधित कोई कमी होना.
  • हार्मोंस की समस्या.
  • पशुओं की साफसफाई न होना.
  • दूध दुहने का गलत तरीका.
  • दूध दुहने का बरतन और उसे धोने का गलत तरीका होना.
  • दूध जमा करने वाले बरतन का गंदा होना.
  • चारे व पानी का खराब होना.
  • थनों का साफ न होना.

स्वच्छ दूध उत्पादन के लिए ये सावधानियां बरतना जरूरी हैं:

  •  पशुओं का बाड़ा या पशुशाला और पशुओं के दुहने की जगह साफ हो. वहां मक्खियां, कीड़े, धूल न हो.
  • बीड़ी सिगरेट पीना सख्त मना हो. शेड पक्के फर्श वाले हों. टूटफूट नहीं होनी चाहिए. गोबर व मूत्र निकासी के लिए सही इंतजाम होना चाहिए. पशुओं को दुहने से पहले शेड को साफ और सूखा रखना चाहिए. शेड में साइलेज और गीली फसल नहीं रखनी चाहिए. इस से दूध में बदबू आ सकती है.
  • पशु को दुहने से पहले उस के थन और आसपास की गंदगी को अच्छी तरह साफ कर लेना चाहिए.
  • शेड में शांत माहौल होना चाहिए. सुबह और शाम गायभैंस के दुहने का तय समय होना चाहिए.
  • दूध दुहने वाला सेहतमंद व साफ सुथरा होना चाहिए. दुहने वाले को अपने हाथ में दस्ताने पहनने की सलाह दी जानी चाहिए. दस्ताने न होने पर हाथों को अच्छी तरह जीवाणुनाशक घोल से साफ करना चाहिए. उस के नाखून व बाल बड़े नहीं होने चाहिए.
  • दूध रखने वाले बरतन एल्युमिनियम, जस्ते या लोहे के बने होने चाहिए. दुधारू पशुओं के थनों को दूध दुहने से पहले व बाद में पोटैशियम परमैगनेट या सोडियम हाइपोक्लोराइड की एक चुटकी को कुनकुने पानी में डाल कर धोया जाना चाहिए और अच्छी तरह सुखाया जाना चाहिए.
  • दूध दूहने से पहले और बाद में दूध की केन को साफ कर लेना चाहिए. इन बरतनों को साफ करने के लिए मिट्टी या राख का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

  • दूध दुहने से पहले थन से दूध की 2-4 बूंदों को बाहर गिरा देना चाहिए क्योंकि इस में बैक्टीरिया की तादाद ज्यादा होती है, जिस से पूरे दूध में इंफैक्शन हो सकता है.
  • दूध दुहते समय हाथ की विधि का इस्तेमाल करना चाहिए. अंगूठा मोड़ कर दूध दुहने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. इस से थन को नुकसान हो सकता है और उन में सूजन आ सकती है.
  • एक पशु का दूध 5-8 मिनट में दुह लेना चाहिए, क्योंकि दूध का स्राव औक्सीटोसिन नामक हार्मोन के असर पर निर्भर करता है. अगर दूध थन में छोड़ दिया जाता है तो यह इंफैक्शन की वजह बन सकता है.
  • दूध दुहने के 2 घंटे के भीतर दूध को घर के रेफ्रिजरेटर, वाटर कूलर या बल्क मिल्क कूलर का इस्तेमाल कर के 5 डिगरी सैल्सियस या इस से नीचे के तापमान में रखना चाहिए.
  • दूध के परिवहन के समय कोल्ड चेन में गिरावट को रोकने के लिए त तापमान बनाए रखा जाना चाहिए.
  • स्वास्थ्य केंद्रों पर पशुओं की नियमित जांच करा कर उन्हें बीमारी से मुक्त रखना चाहिए, वरना पशु के इस दूध से इनसान भी इंफैक्शन का शिकार हो सकता है.
  • पानी को साफ करने के लिए हाइपोक्लोराइड 50 पीपीएम की दर से इस्तेमाल किया जाना चाहिए. फर्श और दीवारों की सतह पर जमे दूध व गंदगी को साफ करते रहना चाहिए.
  • दूध दुहते समय पशुओं को न तो डराएं और न ही उसे गुस्सा दिलाएं.
  • दूध दुहते समय ग्वालों को दूध या पानी न लगाने दें. सूखे हाथों से दूध दुहना चाहिए.
  • एक ही आदमी दूध निकाले. उसे बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

  • दूध की मात्रा बढ़ाने या ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए इस में गैरकानूनी रूप से बैन की गई चीजों को मिलाना व इस की क्वालिटी के साथ छेड़छाड़ करना ही मिलावट कहलाता है. यह मिलावटी दूध सब के लिए नुकसानदायक होता है. पानी, नमक, चीनी, गेहूं, स्टार्च, वाशिंग सोड़ा, यूरिया, हाइड्रोजन पेराक्साइड वगैरह का इस्तेमाल दूध की मात्रा बढ़ाने व उसे खराब होने से बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो गलत है

.दूध की मिलावट का कुछ सामान्य तरीकों से पता किया जा सकता है. जैसे दूध का खोया बना कर, दूध में हाथ डाल कर, जमीन पर गिरा कर, छान कर व चख कर. इस के अलावा वैज्ञानिक तरीके से भी दूध की मिलावट की जांच की जा सकती है.

अमरुद और निम्बू की खेती से बदली किस्मत

तराना के एक किसान ने परम्परागत फसलों से आगे बढ़ बागवानी फसलों को अपनाकर खेती में एक सफल उदहारण प्रस्तुत किया है. उन्होंने अमरुद और निम्बू की फसल में पसीना बहाया और उनकी मेहनत रंग लायी और वे बागवानी फसलों से सालाना करीब 5 लाख रूपये कमा रहे है. उनकी इस मेहनत को सार्वजानिक रूप से भी सम्मानित किया जाएगा.

खंडाखेड़ी निवासी हरिशंकर देवड़ा ने सरकार की फल क्षेत्र विस्तार योजना के अंतर्गत उद्यानिकी विभाग से अमरुद और निम्बू के पौधे प्राप्त कर बगीचा लगाया था. उनकी कड़ी मेहनत से मात्र 10 वर्षों में 6 बीघा जमीन से कुल 250 कुंतल अमरुद और 150 कुंतल नीम्बू की बम्पर उपज से उन्हें सालाना 5 लाख रूपये प्राप्त हो रहा है. हरिशंकर देवड़ा को आत्मा योजना के अंतर्गत 26 जनवरी को श्रेष्ठ उद्यानिकी कृषक का पुरूस्कार राशि 10 हजार रूपये कलेक्टर द्वारा दी जाएगी.

हरिशंकर ने बताया पहले परम्परागत खेती में उन्हें सीमित मुनाफा प्राप्त होता था. उस आय से परिवार का भरण पोषण और बच्चों को शिक्षा दिलाने में काफी कठिनाई होती थी. उद्यनिकि विभाग की सलाह से उन्होंने फलोद्यान लगाया और तब उन्हें बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी कि उद्द्यानिकी फसल से वो अपनी आय को इतना बढ़ा सकतें हैं.

देवड़ा के पास कुल 11 बीघा जमीन है जिनमें वो 4 बीघा में अमरुद और 2 बीघा में निम्बू की फसल व बाकी जमीन पर पारम्परिक फसलों को उगाते हैं. लेकिन उद्यानिकी फसल को उगाने के बाद प्राप्त फायदे को देखकर वो उद्यानिकी फसलों का रकबा बढ़ने की सोच रहे हैं.

हरिशंकर देवड़ा की बहु संगीता महिलाओं के लिए मिसाल बनी हुई है. संगीता ने कठोर परिश्रम से घर में पशुपालन के माध्यम से दूध का व्यवसाय शुरू किया है. उनके यहाँ 7 भैंसे और 2 गाय है जिनसे उन्हें सुबह और शाम 25-25 लीटर दूध प्राप्त होता है. इसके अलावा गोबर से बनी हुई प्राक्रतिक खाद का उपयोग खेतों में किया जाता है. संगीता ने दूध का व्यवसाय शुरू किया जिसके कारण वो भी आत्मनिर्भर हो गई है.

किसान एग्री ऐप पर लाइव कर सकेंगे कृषि वैज्ञानिकों से सवाल

मोबाइल फोन ऐप्लीकेशन का उपयोग कर अब किसान चैटबोट का इस्तेमाल कर अपनी फसलों से संबंधित सवाल सीधा वैज्ञानिकों से पूछ सकेंगे और वैज्ञानिक उनके सवालों का जवाब देने के लिए लाइव उपलब्ध होंगे।

मुंबई के विवेकानंद एजुकेशन सोसायटी के इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के 6 विद्यार्थियों ने 30-31 मार्च को आयोजित हेकाथन में ‘अहम’ नामक मोबाइल ऐप बनाया है।

अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद की ओर से 28 नोडल सेंटर्स पर आयोजित प्रतियोगिता में विद्यार्थियों को उनके दिए गए विषय पर 36 घंटों के भीतर ऐप बनाना था।

इस ऐप टीम की सदस्य दीपा नारायणन बताती हैं, “हमारा ऐप मूल रूप से सुगंधित और औषधीय पौधों की जानकारी देने के लिए है। लोगों को कपास, दलहन जैसी फसलों की जानकारी है, लेकिन सुगंधित और औषधीय पौधों के बारे में उन्हें ज्यादा जानकारी नहीं है।”

ऐप पर खास फसलों के लिए उपयुक्त जमीन के प्रकार, मौसम, जलवायु और समय के बारे में जानकारी है। ऐप पर बाजार की भी जानकारी है, जिससे किसान बीते व आने वाले समय में फसल की मांग के बारे में जान सकते हैं।