पेड़ों को एक से दूसरी जगह लगा इस शख्स ने खड़ा किया 2.5 करोड़ का बिजनेस

हर दिन तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण में हमारे अंदर अक्सर एक सवाल उठता है कि हम शहर के विकास को प्राथमिकता दें या पेड़ों को बचाएं? क्या विकास और अच्छा पर्यावरण एक साथ नहीं मिल सकता? हैदराबाद के रहने वाले रामचंद्र अप्पारी के पास इस बात का जवाब है। उनका कहना है कि किसी भी अपार्टमेंट या फ्लाइओवर को बनाने के लिए पेड़ को काटने के बजाय उसे बचाया जा सकता है।

38 साल के रामचंद्र ने ग्रीन मॉर्निंग हॉर्टीकल्चर सर्विस प्राइवेट लिमिटेड नाम से एक कंपनी बनाई है जो पेड़ों के ट्रांसलोकेशन यानि एक जगह से हटाकर दूसरी जगह पर लगाने का काम करती है। ट्री ट्रांसलोकेशन एक प्रक्रिया है जिसमें पेड़ को काटने के बजाय उसे जड़ से उखाड़ लिया जाता है और फिर दूसरी जगह पर उसे जैसे का तैसा लगा दिया जाता है।

पुराना है तरीका

ट्री ट्रांसलोकेशन कोई नया तरीका नहीं है। मिस्र में 2000 ईसा पूर्व भी ये तरीका अपनाया जाता था रामचंद्र बताते हैं कि जिन पेड़ों को स्थानांतरित करना होता है उन्हें पहले छांट दिया जाता है। पेड़ की लगभग 80 फीसदी पत्तियां, तना और बाकी हिस्सा काटा जाता है।

इसके बाद पेड़ के चारो ओर एक खाई को खोदा जाता है। इस खाई की गहराई पेड़ की उम्र के हिसाब से तय होती है। इसके बाद पेड़ की जड़ों में कुछ केमिकल्स लगाए जाते हैं और उन्हें टाट के बोरे में लपेटा जाता है। इसके बाद क्रेन से वह पेड़ उठाया जाता है और उसे ट्रेलर पर रख दिया जाता है यहां से वह उस जगह पहुंचाया जाता है जहां उसे दोबारा लगाना हो।

इसके बाद पेड़ को फिर से एक खाई में रखा जाता है और उसमें केमिकल्स डाले जाते हैं। रामचंद्र बताते हैं कि उनकी कंपनी 90 प्रजातियों के 5000 पेड़ों को स्थानांतरित कर चुकी है। हर प्रजाति के लिए उसके बचने के चांसेज बराबर नहीं होते। मुलायम लकड़ी वाले पेड़ जैसे बरगद, पीपल, गुलमोहर आदि के बचने का चांस 90 फीसदी होता है वहीं कठोर लकड़ी वाले पेड़ जैसे नीम, इमली और सागौन आदि के पेड़ों के बचने का चांस 60 से 70 फीसदी तक होता है।

कितना होती है कमाई

कंपनी सरकारी संस्थानों के लिए काम तो करती है अगर कोई व्यक्तिगत रूप से ये काम कराना चाहे तो कंपनी उसके लिए भी तैयार रहती है। व्यक्तिगत रूप से काम कराने वाले ज्यादातर लोग पेड़ों को अपने फार्महाउस में ट्रांसलोकेट कराते हैं। पेड़ को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने और लगाने में क्या खर्च आएगा ये पेड़ के साइज़ पर निर्भर करता है। रामचंद्र बताते हैं कि इसकी शुरुआत 6 हज़ार रुपये से होती है लेकिन हम एक पेड़ के लिए 1.5 लाख रुपये भी चार्ज करते हैं।

ऐसा नहीं है कि ये कंपनी सिर्फ हैदराबाद में ही काम करती है। पेड़ों को ट्रांसलोकेट करने का काम दिल्ली, बेंगलुरू, विशाखापट्टनम और देश के बाकी कई शहरों में भी होता है।2009 में शुरू हुई उनकी कंपनी का बिजनेस अब करोड़ों में हो गया है। पिछले साल कंपनी का टर्न ओवर 2.5 करोड़ रुपए था। रामचंद्र कहते हैं कि टर्नओवर पर 25% तक प्रॉफिट हो जाता है। उनका दावा है कि इस तरह का बिजनेस देश में शुरू करने वाले वो पहले शख्स हैं।

कैसे हुई शुरुआत

रामचंद्र ने एग्रीकल्चर में मास्टर डिग्री ली है और एग्री बिजनेस में एमबीए किया है लेकिन कैंपस प्लेसमेंट में उनकी नौकरी एक प्राइवेट बैंक में लग गई। इस कंपनी में उन्होंने 4 साल काम किया लेकिन उनका मन यहां नहीं लगा। आठ साल तक एग्रीकल्चर की पढ़ाई करने के बाद उससे अलग कुछ करना उन्हें समझ नहीं आ रहा था, इसीलिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी।

2009 में रामचंद्र हैदराबाद से विजयवाड़ा जा रहे थे जब उन्होंने देखा कि एक सड़क का चौड़ीकरण किया जा रहा है, जिसमें कई पेड़ों को काट दिया गया। यहीं से उनके मन में आया कि इन पेड़ों को कटने से बचाने का कोई तो तरीका होगा। इसके बाद उन्होंने ट्रांसलोकेशन के बारे में पढ़ा और अपने ऑस्ट्रेलिया के एक दोस्त से इसके बारे में समझा।

ऐसे आप भी खुद त्यार करें कीटनाशक,दोगनी होगी पैदावार

किसान परंपरागत खेती कर मौसम की मार झेल घाटा सह रहे हैं, लेकिन जिले के कुछ किसान खेती में नए-नए प्रयोग कर अलग किस्म की खाद व कीटनाशक तैयार करने के साथ पैदावार तो बढ़ा ही रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों की मदद से खेती कर खूब मुनाफा भी कमा रहे हैं।

ये किसान खुद के बनाए कीटनाशक अौर खाद खेती में प्रयोग कर रहे हैं और कई प्रदेशों में इसकी सप्लाई भी कर रहे हैं। इनमें से कोई किसान बैंक मैनेजर की नौकरी छोड़कर खेती कर रहा है तो कोई मजदूरी छोड़कर। यही नहीं, वे आस-पास के किसानों को उच्च तकनीक और सरकारी योजनाओं की मदद से खेती करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं

पॉली हाउस या शेड नेट लगाने के लिए एक बार अधिक लागत लगती है, लेकिन बाद में किसान इससे काफी कमाई कर सकते हैं। छोटी जोत वाले किसान भी प्रशिक्षण लेकर परंपरागत खेती छोड़ आधुनिक तरीके से खेती शुरू करे तो आय काफी बढ़ सकती है।

गरीब किसान जो तकनीकी खेती में आने के लिए रुपए नहीं होने से डरते हैं, वे एमपीयूएटी या कृषि विभाग में जाकर सरकार के अनुदान के बारे में जानकारी ले सकते हैं।

कोई बैंक मैनेजर की नौकरी छोड़ कृषि से कर रहा दोगुनी कमाई, कोई बेटे को एग्रीकल्चर में एमबीए करा तकनीकी खेती कर रहा 

3 कहानियां : जो न खुद खेती कर रहे हैं… नई तकनीक बताकर औरों को भी कर रहे प्रेरित

पिता तैयार करते हैं कीटनाशक, बेटा कृषि में एमबीए, अब करते हैं ऑनलाइन व्यापार

बुझड़ा गांव निवासी किसान वरदीचंद पटेल ने कुछ साल पहले एमपीयूएटी में प्रशिक्षण लेकर वर्मीकंपोस्ट खाद बनाना शुरू किया। खुद की खेती में प्रयोग किया व आसपास भी सप्लाई किया।

फिर एग्रीकल्चर में एमबीए बेटा भी इस व्यापार से जुड़ा और ऑनलाइन ऑर्डर लेना शुरू किया। आज एमपी, हिमाचल प्रदेश तक खाद सप्लाई करते हैं। दोनों अन्य किसानों को प्रशिक्षण भी देते हैं। दोनों की सालभर की कमाई 12 लाख से अधिक है।

वर्मीकंपोस्ट खाद

बैंक की नौकरी छोड़ शुरू की खास मिर्च की खेती, नौकरी से दोगुनी कमाई कर रहे

फतहनगर के नारायण सिंह उर्फ राजू पहले बैंक मैनेजर थे। नौकरी के दौरान भीलवाड़ा में एक किसान का मिर्च फार्म देखा। उस किसान ने सालभर में मिर्च बेचकर 13 लाख से अधिक कमाए थे।

इसके बाद राजू ने नौकरी छोड़कर किसान से प्रशिक्षण लिया। फिर गोपालसागर में 85 हजार प्रतिवर्ष किराए पर चार बीघा जमीन ली और मिर्च की खेती शुरू की। पिछले साल डेढ़ लाख लगाकर इजराइली पैटर्न पर मलचिंग स्टाइल में मिर्च लगाई। चार माह में ही साढ़े तीन लाख कमाए।

मजदूरी छोड़ शुरू की खीरे की खेती, पहली फसल में 6-7 लाख का मुनाफा

सलूंबर जैताणा के कांतीलाल मेहता व सराड़ा चावंड के शिवराम जोशी महाराष्ट्र में मजदूरी करते थे। वहीं हाइटेक खेती का प्रशिक्षण लिया और यहां खेती में संभावनाएं तलाशी। फिर मजदूरी छोड़ वापस उदयपुर आए और पॉली हाउस में खेती करने का प्रशिक्षण लिया।

पिछले साल दोनों ने अलग-अलग अनुदान प्राप्त कर 4 हजार वर्ग मीटर का पॉली हाउस लगाया व खीरा-ककड़ी की खेती शुरू की। पहली फसल में ही कांतीलाल को 6 लाख व शिवराम को 7 लाख का मुनाफा हुआ।

लोहे की यह गाय कूड़ा और घास फूस खाकर देगी जैविक खाद

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) बरेली के वैज्ञानिकों ने आईआईटी रुड़की के साथ मिलकर एक मेकेनिकल काउ बनाई है। भले ही यह गाय की तरह न दिखे पर गाय की तरह खरपतवार खाती है और बदले में जैविक खाद देती है।

मशीन की संरचना गाय के पेट से मेल खाती है इसलिए इसका नाम मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन रखा गया है। आईवीआरआई के पशु आनुवांशिकी विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रणवीर सिंह बताते हैं कि उन्होंने जयगोपाल वर्मीकल्चर तकनीक विकसित की थी। स्वदेशी प्रजाति के केंचुए जयगोपाल की मदद से जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया 40 दिन हो गई।

इससे भी तेजी से खाद बनाने के बारे में शोध जारी थी। इस दौरान मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन का विचार आया। इसको लेकर आईआईटी रुड़की की मदद ली गई। मशीन तैयार होने के बाद से अब तक इसमें लगातार बेहतर रिजल्ट के लिए काम जारी है। मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन न्यूनतम सात दिन में यह खाद तैयार कर देती है।

रोज 100 किलो खरपतवार डालेंगे तो अगले सात दिनों के बाद से रोजाना 100 किलो खाद मिलनी शुरू हो जाएगी। 30 दिन में तैयार होते हैं सूक्ष्मजीवी, 7 से 10 दिन में बन जाती है खाद मैकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन से खाद बनाने से पहले सूक्ष्मजीवी विकसित करने में 40 से 50 दिन लगते हैं। रोटरी ड्रम में सूक्ष्मजीवीयों के विकास के बाद इसमें खरपतवार, सब्जियों के कचरे डाले जा सकते हैं।

साथ ही बीच बीच में गोबर, कूड़े, कचरे और पत्तियों को मिक्स कर उसपर सूक्ष्मजीवीयों का घोल डाला जाता है। मशीन के रोटरी ड्रम को दिन में कुछ मिनट के लिए घुमाना पड़ता है ताकि कूड़ा-कचरा आक्सीजन और सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आ जाए। हर दिन 120 किलो कचरा डाला जा सकता है जिससे प्रतिदिन 100 किलो जैविक खाद निकाली जा सकती है।

गाय के पेट में मौजूद सूक्ष्मजीवी, मशीन में भी रहकर बनाते हैं खाद मैकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन का कांसेप्ट बिल्कुल गाय के पाचन तंत्र से मेल खाता है। जिस तरह गाय के पेट में कई भाग होते हैं उसी तरह से मैकेनिकल काऊ कंपोस्टिंग मशीन के रोटरी ड्रम में भी कई चरणों के खाद बनती है। बस मशीन को हर रोज कुछ मिनट के लिए घुमाना पड़ता है। यह मशीन एक कोण पर झुकी होती है।

आगे से खरपतवार डाली जाती है और पीछे से खाद निकलती है। डा. रणवीर बताते हैं कि दिन में एक बार मशीन को तीन मिनट के लिए घुमाते हैं सर्दियों में भी ड्रम का तापमान 70 डिग्री तक होता है रोटरी ड्रम में मौजूद माइक्रोआर्गनिज्म (जीवाणु और सूक्ष्मजीवी) की वजह से सर्दियों में भी जब तापमान छह डिग्री तक पहुंच जाता है, ड्रम के बीच के भाग का तापमान 70 डिग्री होता है।

डॉ. रणवीर कहते हैं कि यह सूक्ष्मजीवीयों की ओर से जारी अपघटन प्रक्रिया के कारण होता है। सबसे खास खाद की क्वालिटी है। इसमें कुल नाइट्रोजन 2.6 फीसदी और फासफोरस 6 ग्राम प्रति किलो होता है। अब किसानों को दी जा रही है ट्रेनिंग डॉ. रणवीर सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है।

जैविक खाद बनाने के लिए किसानों को सब्सिडी भी दी जा रही है। ऐसे में मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन काफी कारगर होगी। यह मशीन 2014 में तैयार की गई थी और तब से इस मशीन को और बेहतर बनाने पर शोध चन रहा है।

अब मशीन रोजाना 100 किलो खाद मिलती है वहीं किसान इसका छोटा प्रतिरुप भी बनवा सकते हैं। जैविक खाद को लेकर किसानों को लगातार जागरुक किया जा रहा है। किसान चाहे तो इसे समूह में मिलकर तैयार करा सकते हैं।

मानसून की यह भविष्यवाणी सुनकर हर किसान का मन झूमने लगेगा

किसानों और खेती से जुड़े लोगों के लिए अच्छी खबर है. इस साल देश में मानसून सामान्य रहेगा. मौसम की जानकारी देने वाली निजी एजेंसी स्काईमेंट ने मॉनसून का पहला अनुमान जारी कर दिया है. स्काईमेट को मुताबिक, इस साल देश में मॉनसून सामान्य रहने की संभावना है.

स्काईमेट के मुताबिक, इस साल जून-सितंबर के बीच 100 फीसदी मॉनसून का अनुमान है. यही नहीं इस बार बारिश की शुरुआत भी समय पर होगी. वहीं, सामान्य से ज्यादा बारिश होने की संभावना 20 फीसदी है. स्काईमेट की वेबसाइट पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक, इस बार सूखा पड़ने की संभावना भी जीरो फीसदी है.

क्या है स्काईमेट की रिपोर्ट में

स्काईमेट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस साल सामान्य से कम बारिश होने की संभावना सिर्फ 20 फीसदी है. वहीं, सामान्य से ज्यादा बारिश होने की संभावना भी 20 फीसदी और भारी बारिश की संभावना 5 फीसदी है. स्काईमेट के मुताबिक इस साल सूखा पड़ने की आशंका नहीं है.

96 फीसदी से 104% बारिश

स्काईमेट के मुताबिक इस साल जून-सितंबर के बीच 100 फीसदी मॉनसून का अनुमान है. पूरे सीजन के लिए 96 से 104 फीसदी बारिश होने की संभावना 55 फीसदी है. रिपोर्ट के अनुसार पूरे सीजन में भारी बारिश की संभावना महज 5 फीसदी है.

उत्तर भारत में कैसी होगी बारिश

उत्तर भारत की बात करें तो वाराणसी, गोरखपुर, लखनऊ, शिमला, मनाली, देहरादून, श्रीनगर सहित पूर्वी यूपी, उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू एंड कश्‍मीर के इलाकों में सामान्य से ज्यादा बारिश की उम्मीद है. यहां भारी बारिश की भी संभावना है. वहीं, दिल्ली, अमृतसर, चंडीगढ़, आगरा, जयपुर और जोधपुर के इलाकों में सामान्य बारिश की ही उम्मीद है.

यहां हो सकती है भारी बारिश

मध्य भारत में मुंबई, पुणे, नागपुर, नासिक, इंदौर, जबलपुर, रायपुर और आस-पास के इलाकों में भारी बारिश की उम्मीद है. वहीं, अहमदाबाद, वडोदरा, राजकोट और सूरत जैसे शहरों में सामान्य बारिश हो सकती है.

दक्षिण भारत में कम होगी बारिश

दक्षिण भारत की बात करें तो चेन्नई, बंग्लुरु, तिरुवनन्तपुरम, कोन्नूर, कोझिकोड, हैदराबाद, कर्नाटक के तटीय इलाकों में विजयवाड़ा, विशाखापत्तनम में इस बार मानसून सामान्य या सामान्य से कुछ कम रह सकता है.

किस महीने कितनी बारिश

  • जून 2018: जून में लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) 111 फीसदी रह सकता है. इस दौरान 164 एमएम बारिश हो सकती है.
  • जुलाई 2018 में लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) 97 फीसदी रह सकता है. इस दौरान 289 एमएम बारिश होने की उम्मीद है.
  • अगस्त 2018 में लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) 96 फीसदी रह सकता है. इस दौरान 261 एमएम बारिश होने की उम्मीद है.
  • सितंबर 2018 में लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) 101 फीसदी रह सकता है. इस दौरान 173 एमएम बारिश होने की उम्मीद है.