वैज्ञानिकों ने बनाया चलता-फिरता सौर कोल्ड स्टोरेज, अब नहीं खराब होंगी सब्जियां

भंडारण के अभाव में बड़ी मात्रा में फल और सब्जियां समय से पहले खराब हो जाती हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसा कोल्ड स्टोरेज यूनिट बनायी है, जिसे किसान अपने यहां भी लगा सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के कृषि इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिकों ने सौर ऊर्जा से संचालित मोबाइल कोल्ड-स्टोरेज यूनिट बनायी है, जो फल तथा सब्जियों को नष्ट होने से बचाने में मददगार हो सकती है।

इस कोल्ड-स्टोरेज को विकसित करने वाले वैज्ञानिक डॉ. पी.के. शर्मा ने बताते हैं, “सौर ऊर्जा से चलने वाले इस नए कोल्ड-स्टोरेज से बिजली की समस्या से जूझ रहे किसानों को सबसे अधिक राहत मिल सकती है।

बिजली की बचत के साथ-साथ इससे कृषि उत्पादों के खराब होने की समस्या दूर होगी।कोल्ड-स्टोरेज के भीतर निम्न तापमान और उच्च सापेक्ष आर्द्रता के कारण टमाटर जैसे उत्पादों को बीस दिन तक ताजा बनाए रखा जा सकता है। इसके अलावा अन्य सब्जियों और फलों, जैसे- पालक, शिमला मिर्च, ककड़ी, लौकी, तोरई और पपीते को भी बीस दिनों तक सुरक्षित रख सकते हैं।”

न्यूनतम लागत पर फलों और सब्जियों के लंबे समय तक भंडारण के लिए बनाए गए इस कोल्ड-स्टोरेज की भंडारण क्षमता 4.85 घनमीटर है। इसमें 1000 किलोग्राम फल तथा सब्जियों का भंडारण इसमें किया जा सकता है।

इसकी लंबाई 1.83 मीटर, चौड़ाई 1.34 मीटर और ऊंचाई 1.98 मीटर है। इसे गैल्वनी कृत लोहे, पॉली-कार्बोनेट और प्लाईवुड की चादरों और ग्लास-वूल से बनाया गया है। इस कोल्ड-स्टोरेज में 40 क्रेट्स हैं और प्रत्येक क्रेट में 25 किलोग्राम फल और सब्जियां रखे जा सकते हैं।

इस कोल्ड-स्टोरेज में लगे पहियों द्वारा इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से ले जाया जा सकता है। इसमें सौर ऊर्जा चालित 0.8 टन का एक एयर कंडीशनर लगाया गया है, जिससे कोल्ड-स्टोरेज के भीतर का तापमान 9.5 से 11 डिग्री सेल्सियस और आर्द्रता 73 से 92 प्रतिशत तक बनी रहती है।

यह एयरकंडीशनर एक सौर फोटो वोल्टिक सिस्टम द्वारा चलाया जाता है। इस सिस्टम को कुल आठ सौर पैनलों, एक सौर इन्वर्टर और चार बैटरियों वाले एक बैटरी-बैंक को मिलाकर बनाया गया है। इसे इस तरह तैयार किया गया है, जिससे दिन में अधिक से अधिक सौर ऊर्जा का उपयोग किया जा सके।

डॉ. शर्मा के अनुसार, “सौर संचालित शीत कोल्ड-स्टोरेज का निर्माण भारत में अभी प्रयोगात्मक चरण में है। फिलहाल उपलब्ध शीत भंडारण ज्यादातर सुविधाएं बिजली चालित हैं। इनका उपयोग एक निश्चित तापमान पर सीमित उत्पादों जैसे- आलू, संतरा, सेब, अंगूर, अनार, फूलों इत्यादि के भंडारण के लिए ही हो पाता है। इससे फलों व सब्जियों की गुणवत्ता, ताजगी और जीवन अवधि बनाए रखने में मदद मिलेगी। किसानों और छोटे सब्जी तथा फल-विक्रेताओं की आय भी बढ़ेगी।”

भारत विश्व में फल और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। लेकिन, पर्याप्त शीत भंडारण सुविधाएं नहीं होने से 30 से 35 प्रतिशत फल और सब्जियां लोगों तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाती हैं। किसानों को फलों और सब्जियों को तुरंत बाजार ले जाकर बेचने और गुणवत्ता खराब होने का नियमित दबाव बना रहता है।

इस नए कोल्ड-स्टोरेज के उपयोग से किसान उत्तम गुणवत्ता की भंडारण सुविधाओं का लाभ छोटे स्तर पर अपनी आवश्यकतानुसार उठा सकेंगे। अध्ययनकर्ताओं के अनुसार, उनके द्वारा बनाए गए इस कोल्ड स्टोरेज की लागत लगभग 1.72 लाख रुपये तक हो सकती है।

इसमें 1000 किलोग्राम फलों तथा सब्जियों को भंडारित करने की लागत प्रतिदिन 6.07 रुपये आती है। सिर्फ बिजली के खर्च की बचत से ही नौ सालों में इस कोल्ड-स्टोरेज की लागत निकल आती है। अध्ययनकर्ताओं में डॉ. पी.के. शर्मा के अलावाडॉ. एच.एस. अरुण कुमार भी शामिल थे।

देश के इन 7 राज्यों में आज से शुरू हुआ किसान आंदोलन

पंजाब और मध्य प्रदेश समेत देश के 7 राज्यों में आज 1 जून से किसनों के अपनी मांगों को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया है| मध्यप्रदेश में 1 जून से 10 जून तक प्रशासन ने हाई अलर्ट जारी किया है और पुलिसकर्मियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी हैं|

मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों ने रोजमर्या की जरूरतमंद चीजें सब्जियाँ और दूध को शहर से बाहर न भेजने का ऐलान किया है जिससे आम जनता को परेशानी हो सकती है| किसान यूनियनों ने अपनी मांगों को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ 10 दिन का आंदोलन का आह्वान किया है जिसकी शुरुआत आज से हो गयी है|

मध्यप्रदेश 6 जून को राहुल गांधी की रैली है और 1 से 10 जून के बीच किसानों द्वारा आंदोलन की घोषणा की है इसी को देखते हुए पुलिस प्रशासन सतर्क हो गया है।

मध्यप्रदेश के ये जिले हैं सबसे ज्यादा संवेनशील

आगर-मालवा, खंडवा, खरगोन, ग्वालियर, छिंदवाड़ा, देवास, नरसिंहपुर, नीमच, बालाघाट, बुरहानपुर, भोपाल, मंदसौर, मुरैना, रतलाम, राजगढ़, रायसेन, शाजापुर, श्योपुर, सीहोर, हरदा और होशंगाबाद शामिल हैं। मध्यप्रदेश पुलिस ने अंदरूनी रिपोर्ट में किसानों की सक्रियता के बाद इन्हें इस लिस्ट में शामिल किया है।

आम लोगों को हो सकती है परेशानी

किसानों के इस आंदोलन से रोजमर्रा की चीजें शहर में नहीं पहुँच पर रही है जिससे लोगों को मुश्‍किलों का सामना करना पड़ सकता है. पिछले ही साल किसान संगठनों ने मध्य प्रदेश के मंदसौर में अपनी मांगों लेकर आंदोलन किया था, जिसमें राज्य पुलिस की फायरिंग में पांच किसानों की मौत हो गई थी.

आखिर क्यों कर रहे हैं किसान आंदोलन?

भारत के किसान स्वामीनाथन कमीशन को लागू करने और कर्ज माफ़ी को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, किसानों के आंदोलन के कारण 1 तरफ जहाँ आम आदमी को परेशानी उठानी पद रही है तो वहीँ यह आंदोलन केंद्र सरकार के लिये भी चिंता का विषय है| किसान आंदोलन को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए हैं, जिससे पुलिसकर्मी को भी काफी जद्दोजहद करनी पद सकती है|

कांग्रेस प्रेसिडेंट राहुल गाँधी करेंगे मंदसौर का दौरा

कांग्रेस पार्ट्री के प्रेसिडेंट 6 जून को मंदसौर का दौरा करने वाले हैं वे 1 सरकारी स्कूल में जनसभा को संबोधित करेंगे. बीजेपी इस जनसभा को राजनीती से प्रेरित बता रही है|

किसान आंदोलन का कार्यक्रम

  • किसान आंदोलन के पहले चरण में 1 से 4 जून तक गांवों में युवाओं के सांस्कृतिक कार्यक्रम और पुरानी खेल गतिविधियां होंगी।
  • 5 जून को किसान धिक्कार दिवस के रूप में मनायेंगे इसमें सरकार द्वारा किसानों के खिलाफ लिये गए फैसलों के बारे में चर्चा की जाएगी।
  • 6 जून को श्रद्धांजलि के रूप में मनाया जायेगा, 6 जून को ही राहुल गाँधी की मंदसोर में सभा होनी है
  • 8 जून को असहयोग दिवस के रूप में मनाया जाएगा।
  • 10 जून को भारत बंद रहेगा।

किसान आंदोलन पर हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर का अजीब बयान

देश का अन्नदाता कथित किसान विरोधी नीतियों के विरोध में सड़कों पर उतर आया है। शुक्रवार से शुरू हुआ आंदोलन के दूसरे दिन भी जारी है। कर्जमाफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने सहित 32 मांगों के समर्थन में राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में किसानों ने सड़कों पर दूध बहाया और सब्जियां फेंकीं।

इसकी वजह से आने वाले दिनों में शहरों में दूध-सब्जी की कीमतों में तेजी आने की आशंका है। वहीं, किसान आंदोलन पर हरियाणा के मनोहर लाल खट्टर ने बयान देकर इस मामले को और गहरा दिया है। उन्होंने कहा, ‘हड़ताल से किसान अपना ही नुकसान कर रहे हैं। किसानों के पास कोई मुद्दा नहीं है।

उनका मकसद, अनावश्यक ही मीडिया और लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचना है। अगर वे अपने उत्पाद नहीं बेच रहे हैं तो इसमें उन्हीं का नुकसान है।’उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय किसान संघ के बैनर तले 110 और किसान एकता मंच के बैनर तले 62 किसान संगठनों ने सरकारी नीतियों के विरोध में शुक्रवार को 1 से 10 जून तक ‘गांव बंद’ आंदोलन का ऐलान किया था।

महासंघ के अनुसार, किसान सब्जियों के न्यूनतम मूल्य, खाद्यान्न के समर्थन मूल्य और किसानों के लिए न्यूनतम आय समेत कई मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।शुक्रवार को किसानों के आंदोलन के साथ बंद का असर 7 राज्यों में दिखा। हालांकि कोई हिंसक घटना होने की सूचना नहीं मिली। हालांकि कुछ ऐसे संगठन भी इसके पक्ष नहीं हैं।

एआईकेएससीसी के वीएम सिंह ने कहा कि उनका संगठन बंद के पक्ष में नहीं है, क्योंकि इससे किसानों को सीधे तौर पर आर्थिक नुकसान होता है। कई अन्य संगठन भी हड़ताल को समर्थन नहीं दे रहे हैं। यूपी, दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत में हालात सामान्य हैं और महासंघ के आह्वान का कोई असर नहीं है।

दूसरी ओर, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में राज्य सरकारों ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए शहरों में पुलिस की तैनाती कर दी गई। माना जा रहा है कि अगर 10 दिन तक किसानों का यह आंदोलन चलता है तो शहर में सब्जियों और खाद्य पदार्थ को लेकर संकट खड़ा हो सकता है।

आंदोलन के दौरान किसानों ने कोई भी उत्पाद बाजार तक पहुंचाने से मना किया है, चाहे वह सब्जी हो दूध हो या फिर कुछ और। पुणे में किसानों ने खेडशिवापुर टोल प्लाजा पर 40 हजार लीटर दूध बहाया और सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।

पंजाब में कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन किया गया। फरीदकोट में किसानों ने सड़कों पर फल और सब्जियों को फेंककर विरोध जताया। जबकि होशियारपुर में किसानों का जबर्दस्त प्रदर्शन किया। सड़कों पर दूध के टैंकर खाली कर दिए और सब्जियां भी फेंकी। बरनाला में निषेधाज्ञा तोड़कर ट्रैक्टर-ट्रालियों में सवार होकर किसान डीसी कॉम्प्लेक्स पहुंचे।

वहां किसानों की पुलिस मुलाजिमों से धक्कामुक्की हुई। पुलिस ने हल्का बल प्रयोग कर उन्हें खदेड़ दिया। हड़ताल के पहले दिन मंडी में खूब सब्जियां बिकीं। लुधियाना में रोजाना की तुलना में महज चालीस फीसदी ही सब्जियां मंडी में पहुंची। मुक्तसर में किसान आंदोलन फीका रहा।

अर्थशास्त्र के गुरु ने जल प्रबंधन से बंजर भूमि में उगाया सोना

जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से नौ किमी दूर स्थित कंकराड़ी गांव के दलवीर सिंह चौहान ने जल प्रबंधन के बूते अपनी ढलानदार असिंचित भूमि को सोना उगलने वाली बना दिया। टपक खेती व माइक्रो स्प्रिंकलर और मेहनत की तकनीक से वह इस 0.75 हेक्टेयर भूमि पर पिछले 17 साल से सब्जी उत्पादन कर रहे हैं। इससे दलवीर हर वर्ष 3.5 लाख रुपये से अधिक की कमाई कर लेते हैं।

दलवीर सिंह ने वर्ष 1994 में गढ़वाल विवि श्रीनगर से अर्थशास्त्र में एमए करने के बाद वर्ष 1996 में बीएड किया। सामान्य किसान परिवार से ताल्लुक रहने वाले दलवीर पर भाई-बहनों में सबसे बड़ा होने के कारण परिवार चलाने की जिम्मेदारी भी थी। इसलिए उन्होंने गांव के निकट मुस्टिकसौड़ में एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। लेकिन, स्कूल से मिलने वाला मानदेय परिवार चलाने के लिए नाकाफी था।

वर्ष 2001 में उत्तरकाशी के उद्यान अधिकारी कंकराड़ी गांव पहुंचे तो उन्होंने दलवीर को आंगन के आसपास नकदी फसलों के उत्पादन को प्रेरित किया। दलवीर ने डरते हुए पहले वर्ष एक छोटे-से खेत में छप्पन कद्दू लगाए। घर के नल से पानी भर कर एक-एक पौध की सिंचाई की। संयोग देखिए कि तीन माह के अंतराल में उनके 45 हजार रुपये के छप्पन कद्दू बिक गए।

नौकरी छोड़ प्रगतिशील किसान बने

खेती से लाभ होते देख दलवीर ने प्राइवेट स्कूल की नौकरी छोड़कर सब्जी उत्पादन शुरू कर दिया। पानी के इंतजाम के लिए वर्ष 2008 में एक लाख रुपये की विधायक निधि से दो किमी लंबी लाइन मुस्टिकसौड़ के एक स्रोत से जोड़ी। वहां भी पानी कम होने के कारण घर के पास ही एक टैंक बनाया। इसी बीच कृषि विज्ञान केंद्र चिन्यालीसौड़ में दलवीर ने खेती के साथ जल प्रबंधन की तकनीक सीखी।

फिर वर्ष 2008 में ही सिंचाई के लिए टपक खेती अपनाई। इसके लिए सिस्टम लगाने में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने दलवीर की मदद की। सूखी भूमि पर जब लाखों रुपये की आमदनी होने लगी तो दलवीर ने वर्ष 2011 में माइक्रो स्प्रिंकलर की तरकीब सीखी।

इसका उपयोग दलवीर ने गोभी, पालक, राई व बेमौसमी सब्जी उत्पादन के लिए बनाए गए पॉली हाउस में किया। आज इन्हीं तकनीकों और अपनी मेहनत के बूते दलवीर जिले के प्रगतिशील किसानों की सूची में हैं।

घर ही बना बाजार

दलवीर की खेती में खास बात यह है कि सब्जी विक्रेता सब्जी लेने के लिए सीधे उनके गांव कंकराड़ी पहुंचते हैं। इसलिए दलवीर के सामने बाजार का संकट भी नहीं है।

कम पानी में बेहतर उद्यानी का गुर सिखा रहे दलवीर

दलवीर की मेहनत को देखने और कम पानी में अच्छी उद्यानी के गुर सीखने के लिए जिले के 45 गांवों के ग्रामीणों को कृषि विभाग व विभिन्न संस्थाएं कंकराड़ी का भ्रमण करा चुकी हैं। दलवीर जिले के 30 से अधिक गांवों में कम पानी से अच्छी उद्यानी का प्रशिक्षण भी दे चुके हैं। इसी काबिलियत के बूते दलवीर को ‘कृषि पंडित’, ‘प्रगतिशील किसान’ सहित कई राज्यस्तरीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

ऐसी होती है टपक खेती

कम पानी से अच्छी किसानी करने का वैज्ञानिक तरीका टपक खेती है। इसमें पानी का 90 फीसद उपयोग पौधों की सिंचाई में होता है। इसके तहत पानी के टैंक से एक पाइप को खेतों में जोड़ा जाता है। उस पाइप पर हर 60 सेमी की दूरी पर बारीक-बारीकछेद होते हैं। जिनसे पौधों की जड़ के पास ही पानी की बूंदें टपकती हैं। इस तकनीक को ड्रॉप सिस्टम भी कहते हैं।

70 फीसद पानी का उपयोग

माइक्रो स्प्रिंकलर एक फव्वारे का तरह काम करता है। इसके लिए टपक की तुलना में टैंकों में कुछ अधिक पानी की जरूरत होती हैं। इस तकनीक से खेती करने में 70 फीसद पानी का उपयोग होता है। जबकि, नहरों व गूल के जरिये सिंचाई करने में 75 फीसद पानी बरबाद हो जाता है।

दलवीर की बागवानी

ब्रोकली, टमाटर, आलू, छप्पन कद्दू, शिमला मिर्च, पत्ता गोभी, बैंगन, फ्रासबीन, फूल गोभी, राई, पालक, खीरा, ककड़ी के अलावा आडू़, अखरोट, खुबानी, कागजी नींबू आदि।

बेलों को बांधने के लिए बहुत ही उपयोगी है यह यंत्र ,यहाँ से खरीदें

फल जैसे अंगूर और ज्यादतर सब्जियां बेल पर ही उगती है । लेकिन पहले की तरह अब खेती करने का तरीका बदल गया है । पहले सब्जी की बेलों को जमीन पर ही बढ़ने दिया जाता था जिस से पैदावार कम होती थी और साथ में जो फल पैदा होता था वो जल्दी ख़राब हो जाता था ।

लेकिन अब इन बेलों को एक डंडे के साथ बांध दिया जाता है जिस से वो बहुत तेज़ी से बढ़ती है और साथ में उनका फल भी ख़राब नहीं होता । इस तकनीक से फल और सब्जी का आकार भी बड़ा होता है और उसे तोड़ने में भी कोई समस्या नहीं आती ।

लेकिन बांधने का काम बहुत मुश्किल भरा और मेहनत वाला होता है । लेकिन अब एक ऐसा यंत्र (Plant Tying Tapetool Tapener Machine) आ गया है जो बेलों को छड़ी के साथ बांधने का काम मिंटो में कर देता है । सिर्फ इतना ही नहीं अगर आप बाग़ बगीचे का शौंक रखते है तो भी यह यंत्र आपके लिए बहुत काम की चीज़ है । इस से आप फूलों की शाखाओं को बांध सकते है ।

इस यंत्र को आप ऑनलाइन खरीद सकते है । इस यंत्र के लिए जरूरी टेप भी आप ऑनलाइन खरीद सकते है । इस यंत्र को खरीदने के लिए निचे दिए हुए लिंक पर क्लिक करें । इस मशीन की कीमत 2400 रुपये है ।

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यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें

यह बकरी देती है गाय के बराबर दूध,जाने इस बकरी की पूरी जानकारी

अल्पाइन नस्ल माध्यम से बड़े आकार की बकरी है । अल्पाइन बकरी इसकी बहुत अच्छा दूध देने की क्षमता के लिए जाना जाता है। उनके पास सींग, सीधी प्रोफ़ाइल और कान खड़े हैं।

ਗਾਂ ਤੋਂ ਵੀ ਜ਼ਿਆਦਾ ਦੁੱਧ ਦਿੰਦੀ ਹੈ ਬੱਕਰੀ ਦੀ ਇਹ "ਅਲਪਾਇਨ" ਨਸਲ

Posted by ਪਸ਼ੂ ਪਾਲਣ ਅਤੇ ਸਹਾਇਕ ਧੰਦੇ on Friday, May 25, 2018

यह मुख्या रूप में फ्रांस की नस्ल है । इसका वजन लगभग 61 किलोग्राम (135 एलबीएस) होता है, और कंधे पर लगभग 76 सेमी (30 इंच) लंबा होता है।

अल्पाइन बकरियां सफेद या भूरे से भूरा और काले रंग तक हो सकती हैं। अल्पाइन बकरियां भारी मात्रा में दूध देती हैं। दूध को मक्खन , पनीर , आइसक्रीम या गाय के दूध से बने किसी अन्य डेयरी उत्पाद में बनाया जा सकता है ।

माल्टीज़ एक मूल्यवान दूध देने वाली नस्ल है; दूध में अत्यधिक “बकरी” गंध बिना सुखद स्वाद वाला होता है।यह नसल एक दिन में 5 से 10 लीटर से भी ज्यादा दूध दे सकती है । यह नसल अभी भारत में उपलब्ध नहीं है । लेकिन अगर इस नसल को भारत में लाया जाये तो यह भारत के किसानो के लिए वरदान साबित होगी ।

खेती से हर महीने 1.5 लाख कमाता है रमेश

एक ओर जहां युवा इंजीनियरिंग, मेडिकल और मैनेजमेंट में अपना करियर बनाने पर जोर दे रहे हैं। वहीं कुछ ऐसे भी नौजवान हैं जो खेती-बाड़ी में हाथ आजमा रहे हैं। इस क्षेत्र में वो न सिर्फ अपना करियर बना रहे हैं, बल्कि अच्छी-खासी कमाई भी कर रहे हैं।

महाराष्ट्र के पुणे के रहने वाले रमेश खलदकर ऐसे ही युवा हैं जो खेती से जुड़कर हर महीने लाखों में कमाई कर रहे हैं। साथ ही किसानों को खेती के गुर सिखाने के साथ उनका मार्गदर्शन भी कर रहे हैं। आइए जानते हैं कैसे यह शख्स कर रहा है कमाई…

नौकरी छोड़ शुरू किया बिजनेस

पुणे के खलदकर गांव के रहने वाले रमेश खलदकर ने मनी भास्कर को बताया कि उसने फॉरेस्ट्री में बीएससी किया है। बीएससी करने के बाद उन्होंने एक आयुर्वेदिक कंपनी में 3 महीने तक नौकरी। यहां से नौकरी छोड़ने के बाद उनको सरकार के टूरिज्म डिपार्टमेंट में नौकरी लगी।

नौकरी के दौरान उनको काफी कुछ सीखने को मिला। उसके बाद उन्होंने खुद का बिजनेस शुरू का मन बनाया और 2014-15 में अपनी कंपनी शुरू की। जिसका सालाना टर्नओवर आज 2 करोड़ रुपए हो गया है।

2 महीने के कोर्स ने बदली जिंदगी

रमेश का कहना है कि नीम गुणों से भरा पौधा है। नीम को कीटनाशक के रूप में इस्तेमाल करने से मिट्टी की सेहत भी अच्छी रहती है। साथी ही कीड़े-मकौड़े भी खत्म हो जाते हैं। नीम के इसी गुण ने उनको प्रेरित किया।

इसके बारे में और जानकारी लेने के लिए उन्होंने एग्री क्लिनिक एंड एग्री बिजनेस सेंटर्स द्वारा चलाए जा रहे 2 महीने का कोर्स ज्वाइन किया। ट्रेनिंग के दौरान उनको नीम केक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का दौरा करने का मौका मिला और यहां से मिली जानकारी से उनकी जिंदगी बदल गई।

48 लाख लगाकर शुरू किया बिजनेस

ट्रेनिंग पूरी होने के बाद रमेश ने अपने परिवार वाले से 48 लाख रुपए लेकर बिजनेस की शुरुआत की। नीम ऑयल औऱ नीम सीड केक बनाने की यूनिट शुरू करने के बाद लोकल स्तर पर कंपनी का प्रचार किया और फिर उनको तीन ऑर्गेनिक कंपनियों से लोकल किसानों के लिए कुछ टन का ऑर्डर मिला।

पहले लॉट में उन्होंने 300 एमटी नीम केक मैन्योर और 500 लीटर नीम ऑयल का प्रोडक्शन किया। सारे खर्चे काटकर उन्होंने 22 लाख रुपए का प्रॉफिट कमाया। इससे उनको प्रोत्साहन मिला और नीम से अन्य प्रोडक्ट भी बनाने लगे। आज उनके पास 21 ऑर्गेनिक प्रोडक्ट हैं।

कंसल्टिंग के काम पर ज्यादा है जोर

इसके अलावा रमेश वर्मी कम्पोस्ट और कीटनाशक बनाने का भी काम कर रहे हैं। बिजनेस के विस्तार के लिए अब वो एग्री कंसल्टिंग पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। उनका कहना है कि एग्री सेक्टर की कंपनियों को कंसल्टेंट की जरूरत होती है और उनके पास इस क्षेत्र में अनुभव भी अच्छा हो गया जिसका फायदा कंपनियों के साथ मैं भी उठाना चाहता हूं।

कंपनियों के लिए मैं मार्केटिंग स्ट्रैटजी बनाता हूं। इस काम में मुझे अच्छी कमाई हो जाती है। प्लांट, कंसल्टिंग और डेवलपमेंट के लिए रमेश ने अलग से आरके एग्री बिजनेस कॉरपोरेशन की शुरुआत की है। वो अपने बिजनेस सालाना 16 लाख रुपए तक की कमाई कर रहे हैं।

‘लाल सोना’ से एक साल में ये गांव कमाता है एक अरब

सबसे मजेदार और प्रेरक दास्तान उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के गांव सलारपुर खालसा की है, जहां के लोग मिलकर टमाटर की खेती से एक साल में एक अरब रुपए की कमाई कर लेते हैं। यहां के लोग टमाटर को ‘लाल सोना’ कहते हैं। यहां के पहलवान दो दशक पहले कुश्ती-पहलवानी छोडकर टमाटर खेती में कुछ इस कदर जुटे कि उनकी खेतीबाड़ी की पूरी दुनिया में चर्चा होने लगी। इस गांव की आबादी करीब साढ़े तीन हजार है।

इस गांव में पिछले करीब बीस वर्षों से बड़े पैमाने पर टमाटर की खेती हो रही है। उसका क्षेत्रफल फैलता ही जा रहा है। आसपास के जमापुर, सूदनपुर तथा अंबेडकरनगर गांवों में भी देखादेखी टमाटर की खेती होने लगी है।

देश के कोने-कोने में इस गांव ने अपने झंडे गाड़ दिए हैं। देश का शायद ही कोई कोना होगा, जहां पर सलारपुर खालसा की जमीन पर पैदा हुआ टमाटर न जाता हो। यह गांव निकट अतीत में पांच माह के भीतर टमाटर से 60 करोड़ का कारोबार कर चुका है। यहां टमाटर की खेती की शुरुआत 1998 से हुई थी। उस समय अमरोहा निवासी अब्दुल रऊफ ने सबसे पहले टमाटर की खेती की थी।

उसके बाद टमाटर बीज और कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों ने इस गांव की ओर रुख किया। कंपनी के अधिकारियों ने किसानों की ललक देखी तो उन्हें टमाटर की खेती के लिए प्रोत्साहित करने लगे। इसके बाद कंपनियों ने कुछ किसानों को राजस्थान और बेंगलुरू में ट्रेनिंग के लिए भेजा। बस उसके बाद से किसान टमाटर की खेती के बदौलत नाम और पैसा दोनों कमाने लगे।

अमरोहा जिले में करीब बारह सौ हेक्टेयर में टमाटर की खेती होती है। सलारपुर खालसा और इसके आसपास बसे तीन अन्य गांव जमापुर, सूदनपुर, अंबेडकरनगर में ही अकेले एक हजार हेक्टेयर में टमाटर की खेती हो रही है। यहां के किसान केवल टमाटर ही नहीं, बीज बेचकर भी कमाते हैं। जब पूरे उत्तर प्रदेश में डेढ़ क्विंटल टमाटर बीज की बिक्री हुई तो, उसमें अकेले सलारपुर खालसा में से ही 80 किलो बीज बिका।

टमाटर की खेती करने वाले किसान जुल्फकार खां बताते हैं कि गांव में जब पहलवानी से भला नहीं हुआ और रोजी रोटी का संकट गहरा गया तो ग्रामीणों ने टमाटर की खेती शुरू की थी। आज गांव में चारों ओर खुशहाली है। आज गांव का हर घर पक्का है और एक साल में एक बीघे जमीन से एक लाख रूपये की बचत आसानी हो जाती है।

कारोबार के लिहाज से सलारपुर खालसा गांव तेजी से तरक्की कर रहा है। जब टमाटर की फसल पक कर तैयार हो जाती है और इसकी बिक्री शुरू होती है, तो जिले के 30 गांवों के लोग यहां काम करने दौड़ पड़ते हैं। दिहाड़ी पर काम करने वाला किसान, एक दिन में तीन-चार सौ रुपए की मजदूरी कर लेते हैं। बड़े ही नहीं, गांव के बच्चे और बुजुर्ग भी इसी काम में जुट जाते हैं। गौरतलब है कि भारत सब्जी उत्पादन में चीन के बाद दूसरे नंबर पर आता है। हमारे देश में करीब 15 लाख हेक्टेयर भूमि पर टमाटर की खेती की जाती है। सलारपुर खालसा के अलावा देश के अन्य क्षेत्रों में भी बड़े पैमाने पर टमाटर की खेती हो रही है।

जब-तब टमाटर के भाव आसमान छूने लगते हैं, सलारपुर खालसा की कमाई एक अरब रुपए तक पहुंच जाती है। ऐसा पिछले साल भी हो चुका है। वर्ष 2017 में दिल्ली के खुदरा बाजार में जब टमाटर का दाम 80 रुपये प्रति किलोग्राम की ऊंचाई पर पहुंच गया था, इस गांव की बांछें खिल उठी थीं। उस वक्त प्रमुख टमाटर उत्पादक राज्य कर्नाटक के बेंगलुरु में टमाटर का खुदरा दाम 45 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया था और मिजोरम के एजल में 95 से 100 रुपये किलो बिक रहा था, इस गांव के टमाटर की बेतहाशा मांग ने हर घर को अचानक अमीर बना दिया।

पिछले साल सितंबर में जब पाकिस्तान अपने घरेलू बाजार में टमाटर की किल्लत झेल रहा था, उस समय भी इस गांव पर देश के कारोबारियों की निगाहें टिक गई थीं। उस समय इस पड़ोसी मुल्क में तीन सौ रुपए प्रति किलो टमाटर बिका था।

18000 रूपये की यह मशीन करती है अकेले 100 मजदूरों का काम…

जब बात प्याज की बुआई की आती है, तो यह काफी थका देने वाला काम होता है. बड़ी जोत वाले किसानों के लिए यह काफी दिक्कत का काम हो जाता है. सबसे बड़ा कारन यह भी है कि प्याज की बुआई किसी मशीन से न होकर हांथों से की जाती है, जिसमे काफी मेहनत लगती है और अधिक समय बर्बाद होता है.

इस तरह की समस्या से निपटने के लिए पी एस मोरे नामक एक किसान ने सस्ती और अर्ध स्वचालित मशीन बनायीं है, जिसकी मदद से आप कम समय में प्याज की बुआई कर सकतें हैं.

पी एस मोरे ने किसानों की भलाई के लिए इस मशीन का पेटेंट नही करवाया साथ ही साथ सभी को इसे बनाने और बेचने की अनुमति दे दी, जिससे किसान भाई इसे सस्ती कीमत पर खरीद सके.नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ने भविष्य में इस टेक्नॉलोजी का गलत इस्तेमाल करने से रोकने के लिए 2008 में इसका पेटेंट करा लिया।

4 मजदूरों और 1 ड्राइवर की मदद से ये मशीन प्रतिदिन 2.5 एकड़ में प्याज की बुआई कर देती है। जबकि इस मशीन के बिना पारंपरिक तरीक से बुआई करने पर करीब 100 मजूदरों की जरूरत पड़ती है। यानी मशीन की लागत का पूरा पैसा 1 या 2 दिन की बुआई से ही वसूला जा सकता है। इसके बाद आप इस मशीन को दूसरों को भी किराए पर देकर अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं।

इस मशीन के जरिए यांत्रिक निराई भी की जा सकती है, जिससे निराई पर खर्च की बचत होती है।उर्वरक ड्रील के साथ इस मशीन की कीमत 30 हजार रूपये है जबकि बगैर इस ड्रील के ये 18 हजार रूपये तक के खर्च में तैयार हो जाती है।

इस मशीन को 22-35 HP यानी हार्सपावर (Horsepower) के ट्रैक्टर में लगे 3 प्वाइंट के जरिए जोड़ा जा सकता है। खेतों में ट्रेक्टर की गति 1 से 1.5 किलोमीटर प्रति घंटे की रखी जाती है। जब ट्रैक्टर आगे बढ़ता है तो स्कैल सिस्टम (Scale System) यानी मापक प्रणाली के जरीए फर्टीलाइजर को ट्यूब में भेजती है।

इस मशीन में एक जुताई का फ्रेम, फर्टीलाइज़र बॉक्स, उर्वरकों के बहने के लिए नलियां, बीज पौधों को रखने के लिए ट्रे, दो पहिए, खांचा खींचने वाला, बीज पौधों को नीचे ले जाने के लिए फिसलन प्रणाली और चार लोगों तक के बैठने की जगह होती है। मशीन से पौधारोपण करने से पहले खेत की जुताई जरूरी होती है।

एक क्यारी से दूसरी क्यारी के बीच की दूरी 7 इंच की होनी चाहिए। जबकि 2 पौधों के बीच की दूरी 3.5 इंच की दूरी होनी चाहिए।

मशरूम मैन से जानिए मुनाफा डबल करने का तरीका …

मुंबई में नौकरी करने वाले यूपी के जिला जौनपुर के रामचंद्र दुबे को अचानक मशरूम की खेती करने का विचार किया। दरअसल वह कृषि विज्ञान केंद्र बक्शा, जौनपुर में मशरूम खेती के बारे में सुनकर बहुत ही प्रभावित हुए जिससे वह आज जिले में एक सफल मशरूम किसान बन गए हैं। आज उन्हें मशरूम मैन कहा जाने लगा है।

कृषि विज्ञान केंद्र की सहायता से मशरूम के बीज व खेती की सलाह लेकर उन्होंने खेती की शुरुआत की। उनका मानना है कि मशरूम की खेती के लिए कोई बहुत ज्यादा मेहनत की देखभाल करने की जरूरत नहीं है। इसे आप सिर्फ देखभाल करके भी अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

कम लागत में अच्छी खेती

रामचंद्र का मानना है कि इसकी खेती कम लागत में की जा सकती है। इसे आप बंद कमरे में भी कर सकते हैं। भूसे में इसकी खेती की जा सकती है। यदि आपने इसकी खेती में एक रुपया की लागत लगाई तो तीन महीने के अंदर आपकी दो रुपया जरूर आमदनी होगी।

औषधीय गुणों से भरपूर

वह बताते हैं कि मशरूम औषधीय गुणों से भरपूर है। साथ ही विटामिन आदि अच्छी मात्रा में होता है। किसानों को यह अन्य बाजारों में महंगा मिलता है। अगर वह इसका उत्पादन करेंगे तो उन्हें भोजन में खाने के लिए तो मिलेगा ही बल्कि वह इसकी बिक्री कर अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं।

वह स्वयं का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि उन्होंने ओयस्टर मशरूम उगाया था जिसका पाउडर का सेवन करने से उन्हें बहुत फायदा हुआ। कमर का दर्द गायब हो गया। उनके मुताबिक रोगों के निवारण में मशरूम का बहुत बड़ा योगदान है।

महिलाओं के लिए अच्छा अवसर

मशरूम की खेती महिलाओं के लिए अच्छा अवसर है। जो महिलाएं घर पर बेरोजगार हैं वह इसकी खेती से अच्छा लाभ कमा सकती है। क्योंकि यह तापमान पर निर्भर है। इसकी देखभाल करने की जरूरत होती है।

जिले भर में मशरूम की खेती

वह बताते हैं कि आज जौनपुर में मशरूम की खेती करने की मुहिम शुरु की जाएगी। जो लोग रोजगार की तलाश में है वह मशरूम की खेती कर सकते हैं। अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। यदि मशरूम की खेती में एक रुपया का निवेश किया गया है तो दो रुपया वापसी जरूर देगी। यानिकि आय दोगुनी करने के लिए मशरूम की खेती एक अच्छा कदम है।

अन्नपूर्णा ग्राम उद्दोग संस्था

इस संस्था के माध्यम से किसानों को मशरूम की खेती के लिए प्रेरित किया जाता है। संस्था किसानों को जोड़ती है और उन्हें उन्नत बीज उपलब्ध कराती है। साथ ही समय-समय पर उन्हें प्रशिक्षण के लिए देती है।

उनका कहना है कि आज दो से तीन ब्लाक में मशरूम की खेती इसके जरिए प्रचलित की जा चुकी है। उनके मुताबिक मुक्तिगंज व धर्मापुर ब्लाक में मशरूम की खेती बड़े स्तर पर पहुंच चुकी है। संस्था के जरिए मशरूम किसानों के उत्पाद को बाजार तक भी पहुंचाया जाता है। महीने में दो बार भुगतान की व्यव्स्था है। आने वाले समय में भुगतान की व्यव्स्था बैंक के माध्यम से कर दी जाएगी।

रामचंद्र दुबे, जौनपुर (मो.- 8169083775)