कांट्रैक्ट खेती के लिए सरकार ने दी मंजूरी

कसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए सरकार ने एक और कानूनी सुधार की ओर कदम बढ़ाया है। कांट्रैक्ट खेती (ठेके पर खेती कानून) के मॉडल कानून को सरकार ने मंगलवार को हरी झंडी दे दी। राज्यों के कृषि मंत्रियों के राष्ट्रीय सम्मेलन में कांट्रैक्ट खेती के प्रावधानों पर राज्यों ने भी मोटे तौर पर अपनी सहमति दी है।

मॉडल कांट्रैक्ट कृषि कानून में कई अहम प्रावधान हुए हैं, जिसमें किसानों अथवा भूस्वामियों के हितों को सर्वोपरि रखा गया है। सम्मेलन में हुई चर्चा के दौरान कांट्रैक्ट कृषि उपज को कृषि उत्पाद विपणन कानून (मंडी कानून) के दायरे से अलग रखने पर आम राय बनी है। कोई भी थोक खरीद करने वाला उपभोक्ता सीधे खेत पर खरीद कर सकता है।

सम्मेलन में सभी राज्यों को मॉडल कानून सौंप दिया गया है। चर्चा के दौरान राज्यों को अपनी सुविधा के अनुसार प्रावधानों में संशोधन करने की छूट दी गई है, लेकिन कानून में किसानों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। कांट्रैक्ट खेती के उत्पादों के मूल्य निर्धारण में पूर्व, वर्तमान और आगामी पैदावार को करार में शामिल किया जाएगा।

किसान और संबंधित कंपनी के बीच होने वाले करार के बीच प्रशासन तीसरा पक्ष होगा। ठेका खेती में भूमि पर कोई स्थायी निर्माण करना संभव नहीं होगा। छोटे व सीमांत किसानों को एकजुट करने को किसान उत्पादक संगठनों, कंपनियों को प्रोत्साहित किया जाएगा।

ठेका खेती से संबंधित विवादों के त्वरित निपटान के लिए सुगम और सामान्य विवाद निपटान तंत्र का गठन किया जाएगा। ठेका खेती के उत्पादों पर फसल बीमा के प्रावधान लागू किए जाएंगे। सम्मेलन में केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के साथ कृषि राज्यमंत्री कृष्णाराज, गजेंद्र सिंह शेखावत, पुरुषोत्तम रुपाला और नीति आयोग के सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद्र ने हिस्सा लिया।

आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड समेत कई राज्यों के कृषि मंत्रियों ने इसमें हिस्सा लिया।ठेका खेती में मॉडल कानून के लिए पिछले डेढ़ सालों से कवायद चल रही थी। रेनफेड प्राधिकरण के सीईओ डॉ. अशोक दलवई ने कानून का ब्योरा तैयार किया है।

लोगों की राय लेने के बाद इसे संशोधित कर राज्यों के समक्ष पेश किया गया। वैसे ठेका खेती को पहले ही कानूनी मान्यता मिली हुई थी, लेकिन बदली हुई परिस्थितियों में यह कामयाब नहीं है। इसके लागू होने के बाद किसानों को आमदनी बढ़ाने में मदद मिलेगी।

आप भी करें चंदन की खेती, 15 साल में होगी 15 करोड़ की कमाई

चंदन की खेती आपको कम इन्वेस्टमेंट में करोड़पति तक बना सकती है। यह एक लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट है। चंदन के पेड़ या बीज 15 से 20 सालों में तैयार होते हैं। तब इसका रिटर्न मिलता है। इसकी खेती में सरकार या बाकी प्राइवेट स्कीम में मिलने वाले रिटर्न से भी ज्यादा फायदा मिलता है।

पिछले दिनों गुजरात के भरूच के एक किसान ने 10 लाख लगाकर चंदन की खेती स्टार्ट की थी। 15 से 20 साल में इस खेती से उस किसान ने 15 करोड़ की कमाई की थी। यानी इस हिसाब से प्रति 1 लाख रु का इन्वेस्टमेंट करके 1.5 करोड़ रु का रिटर्न मिला। प्रतिशत में ये रिटर्न 1500% का हुआ।

चंदन की लकड़ी 6 से 7 हजार रुपए किलो बिकती है। कई बार इसके 10 हजार रु तक भी मिल जाते हैं। इन सबके बीच आज हम बता रहे हैं चंदन की खेती कैसे की जा सकती है और इससे कितनी कमाई हो सकती है। आप भी चंदन की खेती कर लाखों-करोड़ों रुपए कमा सकते हैं।

कैसे होती है चंदन की खेती

  • नर्सरी से पौधे लाकर या फिर बीज डालकर चंदन की खेती की जा सकती है।
  • चंदन का पेड़ लाल दोमट मिट्टी में अच्छा उगता है। ये पेड़ चट्टानी मैदान, पथरीली मिट्टी, चूनेदार मिट्टी को भी सहन कर सकते हैं। मिनरल्स और गिली मिट्टी में इसकी ग्रोथ तेजी से नहीं हो पाती।

कब होता है बेस्ट टाइम

  • अप्रैल-मई के महीने में बुवाई (Sowing) के लिए जमीन तैयार की जाती है। बुवाई से पहले एक गहरी जुताई (Tillage) करवाना होती है।
  • 2 से 3 बार खेत को जोता जाता है। वहीं क्यारियों के बीच 30 से 40 सेमी की दूरी भी रखनी होती है।
  • मानसून में इसके पेड़ तेजी से ग्रोथ करते हैं, लेकिन गर्मियों में इन्हें इरीगेशन (सिंचाई) की जरूरत होती है।

इरीगेशन कैसे करना चाहिए

  • इसमें ड्रिप प्रॉसेस से इरीगेशन किया जाता है। ताकि पानी भी कम लगे और जरूरत के मुताबिक सिंचाई भी हो सके।
  • हालांकि, सिंचाई मिट्टी में मॉइश्चर होल्ड करने की कैपेसिटी और मौसम पर भी काफी डिपेंड करती है।
  • चंदन के पेड़ को 5 से 50 डिग्री सेल्सियस टेम्प्रेचर वाले इलाके में लगाना सही माना जाता है।
  • इसके लिए 7 से 8.5 पीएच वाली मिट्टी परफेक्ट होती है।
  • एक एकड़ में औसत 400 पेड़ लगाए जा सकते हैं।

कितना करना पड़ेगा इन्वेस्टमेंट

  • इन्वेस्टमेंट की बात करें, तो चंदन का एक पौधा 40-50 रु का पड़ता है। एक एकड़ जमीन में एवरेज 400 पेड़ लगाए जा सकते हैं। यानी 20 हजार का ये खर्चा।
  • 40 से 50 हजार रुपए खाद में भी खर्च होंगे।
  • इसके बाद आपको 40 से 50 हजार रुपए जाली लगाने में खर्च करने होंगे। ताकि चंदन के पौधे सुरक्षित रहें।

  • चंदन के पेड़ों का इंश्योरेंस भी करवाया जाता है, क्योंकि इन पेड़ों के चोरी का डर होता है। चोरी होने पर इंश्योरेंस कंपनी से आप पैसा ले सकेंगे।
  • सिक्योरिटी के लिए गार्ड अपॉइंट करना होगा। या फिर आप खुद भी इसकी देखरेख कर सकते हैं।
  • इन सबके अलावा सिंचाई पर भी खर्च करना होगा।

 कितने समय में बढ़ते हैं पेड़

  • चंदन लगाने के बाद 5वें साल से लकड़ी रसदार बनना शुरू हो जाती है। 12 से 15 साल के बीच यह बिकने के लिए तैयार हो जाता है।
  • चंदन के पेड़ की जड़ से सुगंधित प्रोडक्ट्स बनते हैं। इसलिए पेड़ को काटने के बजाए जड़ से ही उखाड़ा जाता है।
  • उखाड़ने के बाद इसे टुकड़ों में काटा जाता है। ऐसा करके रसदार लकड़ी को कर लिया जाता है।
  • एवरेज कंडीशन में एक चंदन के पेड़ से करीब 40 किलो तक अच्छी लकड़ी निकल जाती है।

10 लाख से बनाए 15 करोड़ रुपए…

  • गुजरात के भरुच के पास अलपा गांव में रहने वाले अल्पेश पटेल ने मीडिया के साथ अपने चंदन की खेती के एक्सपीरियंस को शेयर किया था।
  • 2003 में जब गुजरात सरकार ने राज्य के किसानों को चंदन की खेती की इजाजत दी तो चंदन की खेती का जोखिम उठाने को कोई तैयार नहीं था।
  • अल्पेश ने करीब 5 एकड़ जमीन पर 1 हजार चंदन के पेड़ लगा दिए। शुरुआत में फसल खराब हो गई। हालांकि अल्पेश ने हार नहीं मानी।
  • 10 लाख रुपए के इन्वेस्टमेंट से शुरू हुई उनकी खेती 15 साल बाद करीब 15 करोड़ रुपए तक पहुंच गई। उन्हें चंदन की खेती से 150 गुना तक का फायदा हुआ। उन्हें राज्य में सर्वश्रेष्ठ किसान का अवॉर्ड भी मिल चुका है।

सबसे महंगा तेल बिकता है

  • चंदन के पेड़ में सबसे महंगी चीज इसका तेल होता है। एक पेड़ की जड़ से करीब पौने 3 लीटर तक तेल निकलता है। बाजार में चंदन के तेल का भाव 2 लाख रुपए लीटर तक है।
  • चंदन की खेती को बढ़ावा देने के लिए कई प्रदेशों में यह प्रावधान किया गया है कि अपने खेत में व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए चंदन उगाने वाले किसान उसे काट भी सकेंगे।

कितनी होती है कमाई

  • भारतीय चंदन की खुशबू बाकी देशों के चंदन से 1 से 6 प्रतिशत ज्यादा होती है। इस वजह से भी डिमांड इंटरनेशनल मार्केट में ज्यादा है।
  • रसदार लकड़ी वाला भारतीय चंदन 6 से 7 हजार रुपए प्रति किलो बिकता है। सूखी लकड़ी वाला चंदन 2 से 3 हजार रुपए किलो तक बिकता है।
  • चंदन के 1 पेड़ से लगभग 20 से 40 तक किलो लकड़ी मिल जाती है। बाजार में यह 6 से 7 हजार रुपए किलो तक बिकती है।
  • 7 हजार को हिसाब मानें तो एक पेड़ से पौने तीन लाख रुपए तक की लकड़ी मिल जाती है। एक एकड़ में औसत 400 पेड़ लगते हैं। इस हिसाब से 11 करोड़ रुपए से भी ज्यादा की कमाई इससे की जा सकती है।
  • चंदन के पेड़ में लगभग 2 लीटर तेल निकलता है। तेल के अलावा इसके बीज, सूखी हुई लकड़ी भी महंगे दामों में बिकती हैं।
  • चंदन का इस्तेमाल इत्र, औषधी, धूप, ब्यूटी प्रोडक्ट आदि में किया जाता है।

खेती में पेश की मिसाल, एक एकड़ से कमा रहे तीन लाख

हरियाणा के फरिदाबाद जिले के मनजीत ने खेती में एक सफल उदाहरण पेश किया है। जिले के मानव रचना विश्वविद्दालय से बीटेक करने के बाद इस युवा ने खेती की राह चुनी। पढ़ाई के दौरान उन्हें जौब की इच्छा थी लेकिन उन्होंने खेती करने की अपनी इच्छा जताई।

मनजीत ने मल्टीपल ऑर्गेनिक क्रॉपिंग के माध्यम से खेती शुरु की और एक एकड़ में बेड सिस्टम से आठ अलग-अलग तरह की फसलें उगाईं। वहीं इन आठ किसमों में अमेरिकी केसर की खेती सबसे ज्यादा सफल हुई। अगर इसकी उत्पादन की बात करें तो मनजीत ने केवल एक एकड़ जमीन से ढ़ाई से तीन किलो अमेरिकी केसर उगाया है।

मनजीत का मानना है कि एक एकड़ में अमेरिकन केसर की फसल औसतन ढ़ाई से तीन किलो पैदा होती है और यह दिल्ली के बाजार में 50 से 70 हजार रुपये किलो के हिसाब से बिकती है। इसके अलावा उन्होंने कहा की अभी गन्ना खेत में तैयार है जो मुनाफा को अधिक कर देगी। आगे मनजीत ने बताया की एक एकड़ में वो दाल की भी खेती करेंगे जिससे उनका मुनाफा ज्यादा हो सके।

मनजीत चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्दालय से एमबीए (एग्रीकल्चर) भी कर चुके हैं और यहां से उनकी खेती करने की इच्छा ज्यादा हुई। हालांकी उन्होंने बताया की उनकी खेती करने की इच्छा तो बचपन से ही थी लेकिन विश्वविद्दालय में कई तरह के मिले प्रशिक्षण ने उनकी राह आसान बना दी। वहीं वो मानते हैं कि उनकी नौकरी तो लग जाती लेकिन वो शायद उससे संतुष्ट नहीं होते तो उऩ्होंने ऑर्गेनिक खेती की तरफ कदम बढ़ाया।

खेती के वक्त मनजीत ने रसायनिक दवाओं का प्रयोग करना उचित नहीं समझा और केवल गोबर और अन्य अपशिष्ट पदार्थों से सभी फसलों के बीमीरीयों का निदान किया। मनजीत ने बताया कि उनहोंने एक एकड़ में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर अन्य फसलों को उगाया। एक एकड़ में गन्ने के साथ-साथ अमेरिकी केसर, सरसों, लहसुन, धनिया, मेथी, चना और गेहूं की फसल उगाई।

कम पानी में ज्यादा उत्पादन चाहिए तो लगाएं धान की यह किस्मे

धान की फसल को ज्यादा पानी वाली फसल माना जाता है और यह बिलकुल सच भी है लेकिन कुश ऐसी भी किस्मे है जिनके उपयोग से आप बहुत सारा पानी बचा सकते हो कुछ ऐसी ।

इन किस्मो की खास बात यह है की समय पर अच्छी बरिश न भी हो तो किसानों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। किसान अगर सतर्कता से काम लें तो वह सूखे की स्थिति से निपट सकते हैं।इन किस्मों को सिंचाई की भी काफी कम जरूरत पड़ती है ।

धान की इन किस्मों में पूसा सुगंध-5, पूसा बासमती-1121, पूसा-1612, पूसा बासमती-1509, पूसा-1610 आदि शामिल हैं। धान की यह प्रजातियाँ लगभग चार माह में पैदावार दे देती हैं।

जुलाई माह में भी पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो भी धान की इन किस्मो की पौध जुलाई में तैयार करके अगस्त में रोपाई की जा सकती है।

कम बरसात वाले क्षेत्रों में सरसों की पैदावार लेना भी एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। इसकी फसल को अगस्त और सितम्बर के दौरान लगाकर कम बारिश और सिंचाई की सुविधाओं की कमी के बावजूद अच्छी पैदावार की जा सकती है।

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि किसान विकल्प के तौर पर एक और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। इस प्रौद्योगिकी के अनुसार धान की बुवाई गेहूँ की तरह खेतों में की जा सकती है। पौध तैयार करने की जरूरत नहीं है।

जहाँ सिंचाई सुविधाओं का अभाव है और बरसात भी कम होती हो वहाँ ड्रिप सिंचाई, फव्वारा सिंचाई, पॉली हाउस तथा नेट हाउस जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर कम सिंचाई के बावजूद अच्छी फसलें तैयार की जा सकती हैं। इन तकनीकों के इस्तेमाल के लिये सरकारें भी अनुदान देकर प्रोत्साहित करती हैं।

मणिपुर के एक किसान ने धान की खेती में किया अनोखा कमाल

मणिपुर के एक किसान ने ऐसा कमाल कर दिखाया है। जिसपर यकीन कर पाना आसान नहीं है। 5 साल पहले 63 साल के किसान देवकांत ने इम्फाल के अपने घर में चावल की 4 किस्मों की पैदावार शुरू की थी। और देखते ही देखते जैव विविधता को संजोने के माहिर पोतशंगबम देवकांत ने धान की सौ परंपरागत प्रजातियों की ऑर्गेनिक खेती कर एक नई मिसाल कायम कर ली।

वर्तमान समय में देवकांत सिर्फ धान की दुलर्भ प्रजातियों की ही खेती नहीं करते हैं, बल्कि यह प्रजातियां औषधीय गुणों से भी भरपूर होती हैं। उनमें से सबसे मशहूर है “चखाओ पोरेटन” नाम का काला चावल। इस काले चावल के औषधीय गुणों से वायरल फीवर, नजला, डेंगू, चिकनगुनिया और कैंसर जैसे रोग तक ठीक हो जाते हैं। देवकांत को उनके इस अनोखे काम के लिए 2012 में पीपीवीएफआरए संरक्षण अवार्ड (प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैराइटीज एंड फारमर्स राइट्स एक्ट) भी मिल चुका है।

जुनून और लग्न से हासिल किया मुकाम

मणिपुर के 63 वर्षीय पोतशंगबम देवकांत ने अपने जुनून और लग्न के साथ एक दो नहीं बल्कि 165 तरह के चावलों की किस्मों की खोज कर डाली है। 5 साल पहले पी देवकांत ने इम्फाल के अपने घर में चावल की खेती अपने शौक के लिए शुरु की थी। लेकिन उनका यह जुनून बन गई यह वह खुद भी नहीं जानतें।

देवकांत धान की पारंपरिक किस्मों की तलाश में मणिपुर की पहाड़ियों पर बसे दूरदराज के गांवों की खाक छानते नजर आते हैं। देवकांत को धान की कई किस्मों के बीज मिले, हालांकि कई किस्मों के बीज अब तक वह नहीं जुटा पाए हैं। इस उम्र में भी धान को लेकर देवकांत का जज्बा कम नहीं है और उन्होंने जितनी हो सके, उतनी किस्मों के बीज इकट्ठा करने की ठानी है।

जलवायु नहीं करती सपोर्ट

मणिपुर के पहाड़ी इलाकों की जलवायु एक जैसी नहीं है, हर इलाके की जलवायु अलग किस्म को सपोर्ट करती है। धान की प्रजातियों के लिए मणिपुर बहुत ही समृद्ध राज्य है। अपने हरे-भरे खेतों में देवकांत ने धान की 25 प्रजातियों को उगाया है। हालांकि उन्होंने अब तक सौ देसी प्रजातियों को संरक्षित किया है। आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर इन प्रजातियों को देश भर में उगाया जा सकता है।

इम्फाल के गांव में उनका धान का खेत प्रयोग करने की जगह का रूप ले चुका है। देवकांत को उनके इस अनोखे काम के लिए 2012 में पीपीवीएफआरए संरक्षण अवार्ड (प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैराइटीज एंड फारमर्स राइट्स एक्ट) भी मिल चुका है।

धान की दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण

देवकांत ने पांच बेहद दुलर्भ, आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर और पौष्टिक प्रजातियों को भी संरक्षित किया है, जिसमें चखाओ पोरेटन नाम का काला चावल भी शामिल है। उन्होंने कम पानी में उपजने वाले सफेद चावल के साथ ही भूरे चावल और काले चावल की कई प्रजातियों का प्रचार-प्रसार भी किया है।

यहां से आधे दाम में खरीदें यूज्‍ड ट्रैक्‍टर

अच्‍छे मानसून की बदौलत मार्केट में ट्रैक्‍टर की डि‍मांड लगातार बढ़ रही है। भारतीय ट्रैक्‍टर इंडस्‍ट्री में 2018-19 में 8 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी होगी बाजार में नए ट्रैक्‍टरों के साथ-साथ पुरानों की मांग भी है। एक अनुमान के मुताबि‍क, पुराने ट्रैक्‍टर की इंडस्‍ट्री करीब 5 लाख यूनि‍ट प्रतिवर्ष है। पुराने ट्रैक्‍टरों में सबसे ज्‍यादा मांग 30 से 50 एचपी की रहती है। वैसे भारत में 10एचपी से लेकर 90 एचपी तक के ट्रैक्‍टर बिकते हैं।

हम आपको एक ऐसे प्‍लेटफॉर्म के बारे में बता रहे हैं जहां पुराने ट्रैक्‍टर करीब आधी कीमत में मि‍ल सकते हैं। यहां बि‍कने के लि‍ए उपलब्‍ध ट्रैक्‍टरों की पूरी स्‍पेसिफि‍केशन और उनकी कीमत की रेंज दी गई है। खरीद पर फाइनेंस की सुवि‍धा भी उपलब्‍ध है। जो कि‍सान नया ट्रैक्‍टर अफोर्ड नहीं कर सकते वह पुराने पर वि‍चार कर सकते हैं।

Mahindra – MM 265 DI

  • मॉडल – MM 265 DI
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2010
  • कीमत – 2,60,000 से 3,10,000
  • कहां – tractorbazar.com

Swaraj/PTL – PTL 733

  • मॉडल – PTL 733
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2008
  • कीमत – 225,000 – 275,000 रुपए
  • कहां – tractorbazar.com

Massey/Tafe – MF 1035 DI

  • मॉडल – MF 1035 DI
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2010
  • कीमत – 250,000 – 300,000
  • कहां – tractorbazar.com

Eicher – EIC 380

  • मॉडल – EIC 380
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2011
  • कीमत – 250,000 – 300,000 रुपए
  • कहां – tractorbazar.com

Eicher – EIC 241

  • मॉडल – EIC 241
  • मैन्‍युफैक्‍चरिंग – 2012
  • कीमत – 180,000 – 230,000 रुपए
  • कहां – tractorbazar.com

जापान के इस वैज्ञानिक के फार्मूले से आप कर सकते है सूखे खेत में धान की खेती

अगर आप सोचते है के धान की खेती के लिए बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है तो आप गलत सोच रहे है ।आप सूखे खेत में भी धान की खेती कर सकते है । ऐसा संभव किया था जापान के शिकोकु द्वीप पर रहने वाले मासानोबू फुकुओका (1913-2008) एक किसान और दार्शनिक ने अपने जीवन के अगले पैंसठ सालों तक उन्होंने प्राकृतिक खेती को समृद्ध बनाने में लगा दिए।

वो अपने खेत की जुताई नहीं करते, कोई रासायनिक उर्वरक या खाद का इस्तेमाल नहीं करते, और एशिया के तकरीबन सभी भागों में धान की खेती करने वाले किसानों की तरह वो अपने धान के खेत में पानी भी नहीं भरते और तब भी उनके खेतों का उत्पादन जापान के इसी तरह के अन्य खेतों के उत्पादन से ज्यादा या तकरीबन बराबर होता था।

मासानोबू ने कहते थे की उनके पड़ोसी के खेत में चावल के पौधे की ऊंचाई अगस्त के महीने में उनकी कमर तक या उससे ऊफर तक आ जाती थी। जबकि उनके खुद के खेत में ये ऊंचाई करीब आधी ही रहती थी। लेकिन फिर भी वो खुश रहते थे क्योंकि उनको मालूम होता था कि उनका कम ऊंचाई वाला पौधा बाकियों के बराबर या ज्यादा पैदावार देगा।

मासानोबू के मुताबिक आमतौर पर साइज में बड़े पौधे से अगर 1 हजार किलो पुआल निकलता है तो करीब 500 से 600 किलो चावल का उत्पादन होता है। जबकि मासानोबू की तकनीक में 1 हजार किलो पुआल से 1 हजार किलो ही चावल निकलता है। फसल अच्छी रहने पर ये 1200 किलो तक चला जाता है।

क्या है फार्मूला

  • दरअसल, अगर आप चावल के पौधे को सूखे खेत में उगाते हैं तो ये ज्यादा ऊंचे नहीं हो पाते। कम ऊंचाई का फायदा मिलता है। इससे सूरज की रोशनी पौधे के हर हिस्से पर पड़ती है। पौधे के पत्ते से लेकर जड़ तक सूरज की रोशनी जाती है।
  • 1 वर्ग इंच की पत्ती से 6 दाने पैदा होने की संभावता ज्यादा बन जाती है। जबकि पौधे के सबसे ऊपरी हिस्से पर आने 3-4 वाली पत्तियों से ही करीब 100 दाने आ जाते हैं।
  • मासानोबू बीज को थोड़ी ज्यादा गहराई में बोते थे, जिससे 1 वर्ग गज में करीब 20 से 25 पौधे उगते हैं।
  • इनसे करीब 250 से लेकर 300 तक दानों का उत्पादन हो जाता है।
  • खेत में पानी नहीं भरने से पौधे की जड़ ज्यादा मजबूत होती है। इससे बिमारियों और कीड़ों से लड़ने में पौधे को काफी मदद मिलती है।
  • जून महीने में मासानोबू करीब 1 हफ्ते के लिए खेत में पानी को जाने से रोक देते हैं। इसका फायदा ये मिलता है कि खेत के खतरपतवार पानी की कमी की वजह से जल्दी मर जाते हैं। इसका फायदा ये होता है कि इससे चावल के अंकुर ज्यादा अच्छे से स्थापित हो पाते हैं।
  • मासानोबू, मौसम के शुरु में सिंचाई नहीं करते। अगस्त के महीने में थोड़ा थोड़ा पानी जरूर देते हैं लेकिन उस पानी को वो खेत में रूकने नहीं देते।
  • इस सबसे बावजूद उनकी इस तकनीक से चावल की पैदावार कम नहीं होती।

इस तकनीक से करें धान की खेती और आधे पानी के साथ बचाए 6000 प्रति एकड़

धान में सीधी बुआई (जीरो टिलेज) से कई महत्वपूर्ण फायदे क्षेत्र स्तर पर होते हैं जैसे समय पर धान की बुवाई हो जाती एंव लागत कम हो जाती है। पराम्परागत तरीके से नर्सरी उगाने, कादो करना तथा रोपनी करने पर धान की खेती में लागत बढ़ जाती है। घनहर क्षेत्रों में हमेशा कादो करने से वहाँ की मिट्टी की भैतिक दशा खराब हो जाती है जिससे रबी फसलों की पैदावार में कमी आती है।

फसलों में कम लागत लगाकर अधिक उत्पादन पाने के लिए किसानों को फसल चक्र को समझना एवं समय पर रोपाई या बुवाई के साथ-साथ उत्तम बीज और उर्वरकों की संतुलित मात्रा एवं नई तकनीकों को प्रयोग प्रतिदिन लागत में वृद्धि , समय पर पानी एवं मजदूरों की अनुपलब्धता एवं मृदा स्वास्थ में गिरावट की समस्या के समाधान हेतु धान की सीधी बुआई ही रोपाई का एक सही विकल्प है ।

समय से धान की बोआई से 6-10 प्रतिशत तक उत्पादन में वृद्धि होती है और 15-20 प्रतिशत उत्पादन लागत में में बचत होती है। साथ ही इस तकनीक का प्रयोग करने से समय, श्रम संसाधन एवं लागत की बचत होती है। बाकी बचत के साथ ही अगर आप डीज़ल से पंप चला कर सिंचाई करते है तो कम से कम 6000 प्रति एकड़ तक बचत हो सकती है इन्हीं फायदे के मद्दे नजर किसानों का ज्यादा से ज्यादा रूझान सीधी बुआई की तरफ बढ़ रहा है।

धान की सीधी बुवाई के लिए कौन सी मशीन उपयुक्त है?

धान की सीधी बुवाई के लिए जीरो टिल ड्रिल अथवा मल्टीक्राप प्रयोग में लाया जाता है। जिन खेतों में फसलों के अवशेष हो और जमीन आच्छादित हो वहाॅ पर टरबो हैपी सीडर या रोटरी डिस्क ड्रिल जैसी मशीनों से धान की बुवाई करनी चाहिए। जीरो टिल ड्रिल अथवा मल्टीक्राॅप जीरो टील ड्रील 35-45 हार्स पावर टैªक्टर से चलती है। इस मशीन में मिट्टी चीरने वाले 9 या 11 भालानुमा फार 22 से.मी. की दूरी पर लगे होते है और इसे ट्रैक्टर के पीछे बाॅधकर चलाया जाता है।

नौ कतार वाली जीरो टिल ड्रिल से करीब प्रति घण्टा एक एकड़ में धान की सीधी बुवाई हो जाती है। ध्यान देने की योग्य बात है कि बुआई के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। बिना जुताई किए हुए खेतों में राईस ट्रान्सप्लान्टर द्वारा भी 15 दिन पुराने बिचड़ों की रोपाई की जा सकती है, वशर्तें की भूमि समतल एवं सपाट हो।

सीधी बुवाई का उचित समय:

सामान्यः धान की सीधी बुवाई मानसून आने के करीब एक से दो सप्ताह पूर्व करना अच्छा होता है। देश के मध्य पूर्वोत्तर इलाके में मानसून का आगमन 10-15 जून तक होता है अतः धान की सीधी बुवाई 31 मई तक हो जानी चाहिए। ऊपरी जमीन पर जहा पानी का भराव नहीं होता और अगात प्रजातिया लगाना है वहा पर धान की सीधी बुवाई 15 जुलाई तक कर सकते हैं। धान को सीधी बुवाई का समय इस प्रकार है:

पिछात प्रजातिया: 140-155 दिन, 25 मई से 10 जून

मध्यम प्रजातिया: 130-140 दिन, 10 जून से 25 जून

अगहनी एवं अगेत प्रजातिया: 100-140 दिन, 25 जून से 15 जुलाई

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार:

सीधी बुवाई विधि में जीरो टिल ड्रिल मशीन के द्वारा मोटे आकार के दानो वाले धान की किस्मों के लिए बी की मात्रा 30-35 किलोग्राम, मध्यम धान की 25 से 30 किलोग्राम तथा छोटे महीन दाने वाले धान की 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है।

बुवाई से पूर्व धान के बीजों का उपचार अति आवश्यक है। सबसे पहले बीज को 8-10 घंटे पानी में भींगोकर उसमें से खराब बीज को निकाल देते हैं। इसके बाद एक किलोग्राम बीज की मात्रा के लिए 0.2 ग्राम सटेप्टोसाईकलीन के साथ 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम मिलाकर बीज को दो घंटे छाया में सुखाकर मशीन के द्वारा सीधी बुवाई करनी चाहिए।

धान की बुवाई की तैयारी:

बुवाई से पूर्व धान के खेत को यथासंभव समतल कर लेना चाहिए। यदि आर्थिक रूप से संभव हो तो भूमि को लेजर लेवलर मशीन से समतल कर लें। बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी की मात्रा उपलब्ध होनी चाहिए। जिस खेत में नमी की कमी हो अथवा बहुत ही कम होे वहाॅ पहले खरपतवारनाशी का प्रयोग करना चाहिए इसके एक सप्ताह बाद हल्की सिंचाई कर दें एवं खेत में उचित नमी आने पर मशीन द्वारा बुवाई करना हितकर है।

बुवाई करने से पूर्व जीरो टिल ड्रिल मशीन का अंशशोधन कर लेना चाहिए जिससे बीज एवं खाद निर्धारित मात्रा एक कप से एवं गइराई में पड़े। धान की सीधी बुवाई करते समय बीज को 3-5 से.मी. गहराई पर ही बोना चाहिए। इससे ज्यादा गहरा करने पर अंकुरण कुप्रभावित होता है जिससे धान की पैदावार में कमी आती है। मशीन द्वारा सीधी बुवाई में कतार से कतार की दूरी 20 से.मी. तथा पौधे की दूरी 5-10 से.मी. होती है।

खरपतवार प्रबंधनः

नदीनों की भरमार से बचने के लिए बिजाई से 48 घंटे के अंदर लीटर सटोप प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। धान बिजाई से 20 से 25 दिन बाद 100 मिलीलीटर नोमनीगोल या माचो प्रति एकड़ का छिड़काव 150 लीटर पानी में मिलाकर करना चाहिए। चोड़े पत्ते वाले नदीनों की रोकथाम करने के लिए 16 ग्राम सैगमैट दवाई की स्प्रे प्रति एकड़ करनी चाहिए।

उर्वरक प्रबंधन:

सीधी बुवाई वाली धान में प्रति हेक्टेयर 80-100 कि.ग्रा. नेत्रजन (75-217 कि.ग्रा. यूरिया), 40 किलो फास्फोरस (250 कि.ग्रा. एस.एस.पी) और 20 किलो पोटास (33 किलो म्यूरेट आफ पोटाश) की जरूरत होती है। नेत्रजन की एक तिहाई और फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय प्रयोग करना चाहिए। नेत्रजन की बाकी मात्रा (शेष मात्रा दो बराबर हिस्सों में कल्ले फूटते समय तथा बाली निकलने के समय प्रयो करें।

अगर मिट्टी में गंधक की कमी पाई जाती है तो बुवाई के समय ही 30 कि.ग्रा. गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करना चाहिए एवं धान-गेहूँ फसल चक्र वाले क्षेत्रों में हर दो साल पर 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर जिंक सल्फेट का प्रयोग बुवाई के समय करना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधनः

शोध में यह पाया गया है कि धान की बुवाई सीधी विधि द्वारा करने पर 40 से 60 प्रतिशत पानी की बचत पारंपरिक तरीके द्वारा धान की खेती की अपेक्षा होती है। धान के खेत में लगातार जल भराब की जरूरत नहीं होती । धान की सीधी बुवाई के समय खेत में उचित नमी होना जरूरी है और सूखे बीज का प्रयोग किया गया है तो बुवाई के 12 घंटे के अंदर हल्की सिंचाई देनी चाहिए।

फसल के जमाव एवं 20-25 दिनों तक हल्की सिंचाई के द्वारा खेत में नमी बनाए रखना चाहिए। फूल आने से पहले से फूल आने की अवस्था (लगभग 25-30 दिन तक खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखे। दाना बनने की अवस्था (लगभग एक सप्ताह में पानी की कमी खेत में नहीं होनी चाहिए।

मुख्यतः कल्ला फूटने के समय वाली, गाभा फूटतें समय और दाना बनने वाली अवस्थाओं में धान के खेत में पर्याप्त नमी की कमी नहीं होने देना चाहिए। बिना कादो किए सीधी बुवाई वाले धान के खेत में पानी सूखने पर बड़ी -बड़ी दरारे नहीं पड़ती हैं अतः इन खेतों में महीन दरार आने पर सिंचाई कर देनी चाहिए। कटाई से 15-20 दिन पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए जिससे फसल की कटाई आसानी से हो सके।

धान की सीधी बुवाई (जीरो टिलेज ) तकनीक से लाभः

धान की रोपाई विधि से खेती करने मे जो समस्याए। आती हैं उनका एक ही विकल्प है धान की सीधी बुवाई तकनीक को अपनाना। धान की सीधी बुवाई तकनीक के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैः

  • 20 से 25 प्रतिशत पानी की बचत होती है क्योंकि इस इस विधि से धान की बुवाई करने पर खेत में लगातार पानी रखने की आवश्यकता नही पड़ती है।
  • मजदुरो एवं समय की बचत होती है क्योंकि इस विधि में रोपाई करने की जरूरत नहीं पड़ती है।
  • धान की नर्सरी उगाने, खेत का कादो करने तथा रोपनी का खर्च बच जाता है।
  • रोपाई वाली विधि के तुलना में इस तकनीक में उर्जा व इंधन की बचत होती है।
  • समय से धान की खेती शरू हो जाती है इससे इसकी उपज अधिक मिलने की संभावना होती है।
  • पानी, श्रम एवं इंधन की बचत के कारण सीधी बुवाई में लागत कम आती है
  • लगातार धान की खेती रोपाई विधि से करने पर कादो करने की जरूरत पड़ती है जिससे भूमी को भौतिक दशा पर बुरा असर पड़ता है जबकि लेकिन सीधी बुवाई
  • तकनीक मिट्टी की भौतिक गुणवत्ता को बनाई रखती है।
  • इस विधि से किसान जीरो टिलेज मशीन में खाद व बीज डालकर आसानी से बुवाई कर सकता है एवं कादो तथा रोपाई से निजात पा लेता है।
  • रोपाई विधि के अपेक्षा सीधी बुवाई सामयिक हो जाती है और अधिक पैदावर मिलती है।
  • रोपाई विधि के तुलना मंे सीधी बुवाई विधि से धान की खेती करने में बीज की मात्रा कम लगती है। इस विधि से धान की बुवाई सीधे खेत में 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से की जाती हैं।
  • समय, श्रम, संसाधन एवं लागत की बचत होती है।

सूखे इलाकों में पैसे कमाना है तो करें लेमनग्रास की खेती, खेती और बिक्री की पूरी जानकारी

एंटी आक्सीडेंट का सबसे बेहतर सोर्स लेमनग्रास में विटामिन सी भारी मात्रा में होता है। दुनिया की एक बड़ी आबादी इसकी चाय यानी लेमन-टी पीने लगी है। लेकिन लेमनग्रास ऑयल (तेल) का सबसे ज्यादा इस्तेमाल परफ्यूम और कास्मेटिक उद्योग में होता है। जैसे जैसे ये इंड्रस्ट्री बढ़ रही है लेमनग्रास की भी मांग बढ़ी है।

इसलिए किसानों के लिए ये फायदे का खेती बनती जा रही है। किसानों की आमदनी बढ़ाने की कवायद में जुटी सरकार पूरे देश में एरोमा मिशन के तहत इसकी खेती को बढ़ावा भी दे रही है, लेमनग्रास की खूबी ये है कि इसे सूखा प्रभावित इलाकों में भी लगाया जा सकता है। लेमनग्रास को नींबू घास, मालाबार या कोचिन घास भी कहते हैं। भारत समेत ये उन देशों में पाया जाता है जहां की जलवायु गर्म है।

भारत सालाना करीब 700 टन नींबू घास के तेल का उत्पादन करता है, जिसकी एक बड़ी मात्रा निर्यात की जाती है। भारत का लेमनग्रास तेल किट्रल की उच्च गुणवत्ता के चलते हमेशा मांग में रहता है। 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के वादे को पूरा करने की कवायद में जुटी भारत सरकार ने एरोमा मिशन के तहत जिन औषधीय और सगंध पौधों की खेती का रकबा बढ़ा रही है उसमें एक लेनमग्रास भी है।

लेमनग्रास की खेती सूखा प्रभावित इलाकों जैसे मराठवाड़ा, विदर्भ और बुंदेलखंड तक में की जा रही है। सीमैप के गुणाभाग और शोध के मुताबिक एक हेक्टेयर लेमनग्रास की खेती में शुरु में 30000 से 40000 हजार की लागत आती है।

एक बार फसल लगाने के बाद साल में 3 से 4 कटाई ली जा सकती हैं, जिससे करीब 100-150 किलो तेल निकलता है। इस तरह से एक लाख से एक लाख 60 हजार तक आमदनी हो सकती है, खर्चा निकालने के बाद एक हेक्टेयर में किसान को प्रतिवर्ष 70 हजार से एक लाख 20 हजार तक का शुद्ध मुनाफा हो सकता है।

मेंथा और खस की तरह ही लेमनग्रास की पेराई होती है, और पेराई संयंत्र भी लगभग एक जैसा ही होता है। पत्तियां काटकर उन्हें टंकी में भरकर आसवन किया जाता है।

नर्सरी, रोपाई और निराई-गुड़ाई

लेमनग्रास की जड़ लगाई जाती है, जिसके लिए पहले नर्सरी तैयार की जाए तो लागत कम हो सकती है। अप्रैल से लेकर मई तक इसकी नर्सरी तैयार की जाती है, एक हेक्टेयर की नर्सरी के लिए लेमनग्रास के करीब 10 किलो बीज की आवश्यकता होगी। 55-60 दिन में नर्सरी रोपाई के लिए तैयार हो जाती है।

यानि जुलाई अगस्त में तैयार नर्सरी यानि स्लिप (जड़ समेत एक पत्ती) को कतार में 2-2 फीट की दूरी पर लगाना चाहिए। हर तरह की मिट्टी और जलवायु में पैदा होनी वाली इस फसल में गोबर की खाद और लकड़ी की राख सबसे ज्यादा फायदा करती है। लेमनग्रास को ज्यादा निराई गुड़ाई की जरुरत नहीं होती, साल में दो से तीन निराई गुड़ाई पर्याप्त हैं।

ज्यादा सूखे इलाकों में पूरे साल में 8-10 सिंचाई की जरुरत होगी। उत्तर प्रदेश में ऐसी फसलों पर शोध के लिए कन्नौज में सुगंध एवं सुरस विकास केंद्र (एफएफडीसी) है। यहां के अवर शोधकर्ता कमलेश कुमार ने पिछले दिनों गांव कनेक्शन को इसके फायदे गिनाते हुए बताया, इसकी पत्ती से लेमन-टी यानि नीबू चाय के साथ साबुन, निरमा, डिटर्जेंट, तेल, हेयर आयल, मच्छर लोशन, सिरदर्द की दवा व कास्मेटिक बनाने में भी प्रयोग किया जाता है।”

यूपी में सीतापुर जिले के बंभौरा गांव निवासी प्रगतिशील किसान हर्षचंद वर्मा के मुताबिक इसमें कीट-पतंगे रोग नहीं लगते हैं, लेकिन एक कोई रोक का प्रकोप दिखे तो नीम की पत्तियों को गोमूत्र में मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है।

जानकारों के मुताबिक लेमग्रास का तेल जिस परफ्यूम,डियो या क्रीम आदि में पड़ा होता है उसके उपयोग से लोगों में ताजगी आ जाती है। चीन में कहीं-कहीं पर इसे सिरदर्द ,पेटदर्द में उपयोग करते हैं, इसके कुछ गुण मुंहासे ठीक करने में भी काम आते हैं। भारत में सर्दी जुखाम के दौरान काफी लोग इसका गाढ़ा पीते हैं।

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक समेत कई राज्यों में इसकी बड़े पैमाने पर खेती हो रही है।

लेमनग्रास की खेती में कमाई और मुनाफे का गणित

  • प्रति हेक्टेयर सलाना लागत- 40,000 रुपए (सिंचाई समेत)
  • 30,000 रुपए (बिना सिंचाई)
  • कुल उत्पादन से कमाई- 1,60,000 रुपए (सिंचाई समेत)
  • 1,00,000 रुपए (बिना सिंचाई)
  • शुद्ध मुनाफा (सालाना) 1,20,000 रुपए (सिंचाई समेत)
  • 70.000 रुपए (बिना सिंचाई)

लेमनग्रास के तेल का उपयोग

लेमनग्रास का सबसे ज्यादा उपयोग परफ्यूम उद्योग में होता है। इसके साथ ही, तेल, डिटर्जेट, वांशिग पाउडर, हेयर आयर मच्छर लोशन, कास्मेटिक, सिरदर्द की दवा समेत कई प्रोडक्ट में इस्तेमाल होता है

20 राज्यों में अलर्ट, अगले 96 घंटे आंधी-तूफान से लेकर भारी बारिश का अलर्ट

मौसम विभाग ने अगले 96 घंटे के लिए देशभर के 20 से ज्यादा राज्यों में मौसम को लेकर अलर्ट जारी किया है। अगले 96 घंटे देशभर में आंधी-तूफान, ओला गिरने से लेकर भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। यह अलर्ट 6 मई से लेकर 10 मई तक के लिए जारी हुआ है। मौसम विभाग के अनुसार मौसम की गतिविधियों से देशभर के 20 से ज्यादा राज्य प्रभावित होंगे।

6 मई के लिए अलर्ट

मौसम विभाग के मुताबिक 6 मई को आसाम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और केरल राज्य के इलाकों में भारी बारिश की चेतावनी है। वहीं, दिल्ली, हरियाणा, पश्चिमी यूपी, बिहार, झारखंड, ओडिशा, कर्नाटक और केरल में बिजली कड़कने के साथ धूलभरी आंधी की आशंका है। जम्मू एंड कश्‍मीर, पंजाब, वेस्ट बंगाल, सिक्किम और नॉर्थ ईस्ट के दूसरे इलाकों में ओला गिरने की भी आशंका जताई गई है।

7 मई के लिए अलर्ट

मौसम विभाग के मुताबिक 6 मई को आसाम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में भारी बारिश की चेतावनी है। जम्मू एंड कश्‍मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में आंधी-तूफान के साथ ओलावृष्टि की आशंका है। वहीं, हरियाणा, दिल्ली के इलाकों में तेज आंधी आ सकती है। जबकि राजस्थान के कुछ इलाकों में धूलभरी आंधी की आशंका है।

8 मई के लिए अलर्ट

मौसम विभाग ने 8 मई के जो अलर्ट जारी किया है, उस हिसाब से कर्नाटक और केरल में भारी बारिश हो सकती है। पंजाब, पूर्वी यूपी, बिहार, वेस्ट बंगाल, तमिलनाड़, कर्नाटक और केरल सहित नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में तेज हवा के साथ बिजली कड़कने की चेतावनी जारी हुई है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और जम्मू-कश्मीर में तूफान और आंधी की चेतावनी है। पश्चिमी राजस्थान में धूल का तूफान आने की चेतावनी भी जारी की गई है।

9 मई के लिए अलर्ट

पूर्वी यूपी, वेस्ट बंगाल, सिक्किम, तमिलनाडु, केरल सहित दक्षिण भारत के कुछ अलाकों में बिजली कड़कने के साथ तेज हवाएं चल सकती हैं। इसका असर 10 मई को भी दिख सकता है।