20 राज्यों में अलर्ट, अगले 96 घंटे आंधी-तूफान से लेकर भारी बारिश का अलर्ट

मौसम विभाग ने अगले 96 घंटे के लिए देशभर के 20 से ज्यादा राज्यों में मौसम को लेकर अलर्ट जारी किया है। अगले 96 घंटे देशभर में आंधी-तूफान, ओला गिरने से लेकर भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। यह अलर्ट 6 मई से लेकर 10 मई तक के लिए जारी हुआ है। मौसम विभाग के अनुसार मौसम की गतिविधियों से देशभर के 20 से ज्यादा राज्य प्रभावित होंगे।

6 मई के लिए अलर्ट

मौसम विभाग के मुताबिक 6 मई को आसाम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और केरल राज्य के इलाकों में भारी बारिश की चेतावनी है। वहीं, दिल्ली, हरियाणा, पश्चिमी यूपी, बिहार, झारखंड, ओडिशा, कर्नाटक और केरल में बिजली कड़कने के साथ धूलभरी आंधी की आशंका है। जम्मू एंड कश्‍मीर, पंजाब, वेस्ट बंगाल, सिक्किम और नॉर्थ ईस्ट के दूसरे इलाकों में ओला गिरने की भी आशंका जताई गई है।

7 मई के लिए अलर्ट

मौसम विभाग के मुताबिक 6 मई को आसाम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में भारी बारिश की चेतावनी है। जम्मू एंड कश्‍मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में आंधी-तूफान के साथ ओलावृष्टि की आशंका है। वहीं, हरियाणा, दिल्ली के इलाकों में तेज आंधी आ सकती है। जबकि राजस्थान के कुछ इलाकों में धूलभरी आंधी की आशंका है।

8 मई के लिए अलर्ट

मौसम विभाग ने 8 मई के जो अलर्ट जारी किया है, उस हिसाब से कर्नाटक और केरल में भारी बारिश हो सकती है। पंजाब, पूर्वी यूपी, बिहार, वेस्ट बंगाल, तमिलनाड़, कर्नाटक और केरल सहित नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में तेज हवा के साथ बिजली कड़कने की चेतावनी जारी हुई है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और जम्मू-कश्मीर में तूफान और आंधी की चेतावनी है। पश्चिमी राजस्थान में धूल का तूफान आने की चेतावनी भी जारी की गई है।

9 मई के लिए अलर्ट

पूर्वी यूपी, वेस्ट बंगाल, सिक्किम, तमिलनाडु, केरल सहित दक्षिण भारत के कुछ अलाकों में बिजली कड़कने के साथ तेज हवाएं चल सकती हैं। इसका असर 10 मई को भी दिख सकता है।

पालीहाउस तकनीक से मिलता है दोगुने से भी ज्यादा प्राफिट

किसान अब खेती में नई-नई टेक्नीक का इस्तेमाल करके अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। महासमुंद जिले के छपोराडीह गांव के 39 वर्षीय किसान गजानंद पटेल ही पॉली हाउस की खेती से काफी मुनाफा बढ़ा चुके हैं। इन्होंने फल और सब्जी की खेती से 4 एकड़ जमीन पर 40 लाख रुपए तक की सालाना कमाई की।

जबकि पहले ये महज 80 हजार रुपए सालाना कमा पाते थे। यह फायदा उन्हें पॉलीहाउस के कारण मिला। हम एग्रीकल्चर में आ रही नई टेक्नोलॉजी की सीरीज चला रहे हैं। इसमें हम नई-नई टेक्नोलॉजी की जानकारी आपको देंगे। आज जानिए पॉलीहाउस क्या होता है? और इसे आप कैसे कर सकते हैं?

क्या है पॉलीहाउस खेती

यह जैविक खेती का ही हिस्सा है। पॉलीहाउस में स्टील, लकड़ी, बांस या एल्युमीनियम की फ्रेम का स्ट्रेक्चर बनाया जाता है। खेती वाली जमीन को घर जैसे आकर में पारदर्शी पॉलीमर से ढक दिया जाता है। पॉलीहाउस के अंदर न बाहर की हवा जा सकती है न पानी। इस कारण कीड़े-मकोड़े का असर नहीं होता। टेंपरेचर भी जरूरत के मुताबिक कम-ज्यादा किया जाता है।

इस तरह मौसम पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाती है। कीटनाशक, खाद, सिंचाई ये सभी काम पॉलीहाउस के अंदर होते हैं। जो जितना जरूरी हो उतना ही डाला जाता है। सबकुछ नपा-तुला मिलने के कारण यह भी तय हो जाता है कि किस तारीख को कितनी फसल मिलेगी।

क्या है पॉलीहाउस खेती की खासियत

  •  पॉलीहाउस खेती में बिना मौसम की सब्जियां, फूल और फल उगाए जा सकते हैं।
  • इसमें पानी ड्रिप सिस्टम द्वारा दिया जाता है। इससे पारंपरिक खेती के मुकाबले पानी बहुत कम लगता है।
  • पारंपरिक खेती के बजाए इसमें लॉन्ग ड्यूरेशन तक फसल ली जा सकती है।
  • फसलों की गुणवत्ता भी अच्छी होती है।

कैसे कर सकते हैं पॉलीहाउस खेती

  • गवर्नमेंट पॉलीहाउस खेती करने पर सब्सिडी दे रही है।
  • आपको अपने जिले के कृषि विभाग में इसके लिए अप्लाई करना होगा।
  •  कृषि विभाग से अप्रूवल मिलने के बाद विभाग ही पॉलीहाउस के लिए नियुक्त कंपनी को किसान के पास भेजता है। (राज्यों के हिसाब से स्कीम अलग-अलग)

गवर्नमेंट देती है सब्सिडी

  • कंपनी पॉलीहाउस तैयार करती है। इसका 85 परसेंट बर्डन गवर्नमेंट और 15 परसेंट किसान को उठाना होता है।
  • पॉलीहाउस में टमाटर, ककड़ी, शिमला मिर्च, गोभी जैसी सब्जियां उगाई जा सकती हैं।

यहां 10 दिन का गाय का बच्चा दे रहा दूध

आपने गाय अथवा भैंस द्वारा एक से अधिक बच्चों को जन्म देने के वाकये तो खूब देखे और सुने होंगे। साथ ही ऐसे किस्से भी सुने होंगे कि महिला ने भी एक साथ कई बच्चों को जन्म दिया। लेकिन हम आपको एक ऐसी हकीकत से रूबरू कराने जा रहे हैं, जिसे सुनकर आप चौंक जाएंगे। हो सकता है एक बार आपको यकीन भी न हो पर जब आप आंखों से देखेंगे तो आपको विश्वास करना पड़ेगा।

जी हां शामली जनपद में एक नवजात गाय का बच्चा आजकल लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। दरअसल मामला यह है कि यह गाय का बच्चा पैदा होते ही दूध दे रहा है। जानकारी के मुताबिक गाय के मालिक सुबह-शाम बछिया का दूध निकाल रहे हैं।

इस उम्र में पशुओं के बच्चे ढंग से दूध पी भी नहीं पी पाते, उसी उम्र में गाय का यह बच्चा दूध दे रहा है। दूध देने वाला यह बच्चा क्षेत्र के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ। शामली जिले और आसपास के इलाकों लोग इसे देखने के लिए आ रहे हैं। लेकिन डॉक्टरों ने अब बच्चे का दूध निकालने के लिए मना कर दिया है। उसके बावजुद भी ये बच्चा खूब सुर्खियां बटोर रहा है।

दरअसल शामली के कस्बा ऊन में किसान धर्म सिंह के घर गांव में एक गाय ने बच्चे को जन्म दिया। चमत्कार तब हुआ जब बच्चे के थनों में दूध उतर आया। मालिक ने उसका दूध निकाला तो गाय के बच्चे ने दूध देना शुरू कर दिया।आज इस बच्चे को पैदा हुए सात दिन हो गए है, जो अभी तक लगातार दूध दे रहा है।

हालांकि डॉक्टरों ने अब इसका दूध निकालने से मना कर दिया। डॉक्टरों का कहना है कि अगर इसका दूध इसी तरह से निकलता रहा तो एक दिन गाय का ये बच्चा मर जाएगा। वहीं कस्बे में गाय का ये बच्चा सुर्खियों में है और कस्बेवासी इसे भगवान का चमत्कार मान रहे हैं, जिसे दूर-दूर से लोग देखने के लिए आ रहे हैं और गाय का यह बच्चा लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

राजस्थान में होगी नारियल की खेती

कृषि के क्षेत्र में राजस्थान अपनी तकदीर और तस्वीर बदलने की कवायद कर रहा है. मरुभूमि राजस्थान में अब नारियल और सुपारी की भी खेती होगी. राज्य सरकार ने ना केवल इसकी तैयारी कर ली है बल्कि केरल से नारियल के 400 पौधे भी मंगवाये जा चुके हैं.

कृषि के क्षेत्र में राजस्थान एक और बड़ा नवाचार करने जा रहा है. आम तौर पर दक्षिण भारत के नम भूमि इलाके में पैदा होने वाले नारियल और सुपारी अब मरुभूमि राजस्थान में भी पैदा होंगे. प्रदेश की विषम परिस्थितियों के बावजूद में यह बड़ी पहल होने जा रही है. नारियल और सुपारी की खेती की तकनीक जानने के लिये पिछले दिनों अधिकारियों का एक दल केरल गया था जो वहां से प्रशिक्षण हासिल कर लौटा है.

केरल स्थित आईसीएआर के रिसर्च सेंटर से नारियल के 400 पौधे मंगलवार को ही राजस्थान लाये जा चुके हैं जिन्हें टोंक के थड़ोली स्थित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस पर रोपा जाएगा. सुपारी के भी 400 पौधे करीब एक महीने बाद राजस्थान लाये जायेंगे.

कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी का कहना है कि शुरुआत में दो-दो हैक्टेयर क्षेत्र में नारियल और सुपारी की पैदावार की जायेगी. इसके लिये राजस्व विभाग द्वारा बीसलपुर के तल क्षेत्र टोंक के थलोड़ी में जमीन आवंटित की गई है. इस जमीन की चारदीवारी करवाई जाकर ट्यूबवेल, सोलर पम्प और ऑफिस आदि की स्वीकृतियां जारी कर दी गई है. इस नवाचार के लिये राज्य सरकार द्वारा 10 करोड़ का बजट उपलब्ध करवाया गया है.

ऐसे करें गूंद कतीरा लेप से धान की खेती, आधे खर्च और आधे पानी की पडेगी जरूरत

खाद-लागत में पक गया धान, कोई अजूबा नहीं, परंतु सच्चाई है। जो संभव हुआ डॉ. वीरेंद्र सिंह लाठर, प्रधान वैज्ञानिक भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान,क्षेत्रीय स्टेशन करनाल द्वारा विकसित हर्बल हाइड्रोजेल गूंद कतीरा लेप बीज तकनीक को सीधी बिजाई धान में अपनाने से। यह सेक्टर -2 शहर करनाल में पांच एकड़ और हरियाणा पंजाब में सैकड़ों एकड़ खेतों पर तैयार की गई है।

तकनीक से धान की फसल सिर्फ 5-6 सिंचाई, 50 किलो डीएपी और 60-70 किलो यूरिया प्रति एकड़ से तैयार हो गई और अब तक सिर्फ 6000 रुपए प्रति एकड़ की लागत आई है। जबकि परंपरागत रोपाई धान पद्धति में 20-25 सिंचाई की जरूरत होती है और रोपाई तक की लागत ही 6000 रुपए प्रति एकड़ से ज्यादा हो जाती है और इतनी ही लागत रोपाई के बाद भी करनी पड़ती है।

नई तकनीक में रोपाई के लिए मजदूरों पर निर्भरता से किसानों को राहत मिलती है। क्योंकि धान की सीधी बिजाई, गेहूं दूसरी फसलों की तरह, खेत में पलेवा कर के बीज ड्रिल से की जाती है। उससे भी बड़ा फायदा, नयी तकनीक धान ग्रीन हाउस गैस (मीथेन वगैरह) पर्यावरण में कम छोड़ कर, पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ा फायदा करती है। किसानों को इस तकनीक को अपनाना चाहिए, इससे काफी हद तक पानी की बचत की जा सकती है।

मशीन से मिलाकर सुखाएं: नईबीज लेपित तकनीक के उपयोग में आने वाली सारी सामग्री (गूंद-कतीरा, गुड़, कीकर-बबूल की गूंद) इंसानों के खाद्य पदार्थ है जो गावो, शहरों की दुकानों पर सस्ते भाव (250 रुपए प्रति किलो) में आसानी से मिल जाते हैं।

नई बीज तकनीक हर्बल हाइड्रोजल पर आधारित है जिसमे गूंद कतीरा लेपित बीज की बिजाई की जाती है जिससे सभी फसलों के पौधों जड़ें में जल्दी सूखा नहीं आता और सिंचाई की जरूरत कम रह जाती है फसलोंमें खरपतवार अन्य बीमारियां-कीड़े भी कम आते हैं और यह संभव हुआ,

पहली सिचाई देर से लगने लगाने पर, जो खरीफ फसलों(धान वगैरह) में बिजाई के 15-20 दिनों रबी फसलों (गेहूं वगैरह) में 40-50 दिनों की बाद की जाती है और बिजाई के तुरंत बाद एक लीटर प्रति एकड़ की दर से पेंडामेथलींन / स्टोम्प 200 लीटर पानी में छिड़काव करने के कारण से, सीधी बिजाई धान में बिजाई के बाद की सिंचाई 12-15 दिनों के अंतर पर और वर्षा गीला-सूखा चक्कर के आधार पर करनी होती है।

नई तकनीक मे 50 किलो बीज के लिए, एक लीटर उबलते पानी मे 250 ग्राम गुड़ और 100 ग्राम बबूल की गोंद डाल कर, एक तार की चासनी बनाये।

फिर इस चासनी को ठंडा छान कर, बीजों पर छिड़क कर हाथ से बीजों को चिपचिपा बनाएं।

तब चिपचिपे बीजों पर 10 प्रतिशत(10 किलो बीज पर एक किलो गूंद कतीरे पाउडर-चूरा ग्रेड/पशुओं वाला) छिड़क कर हाथ घुमाने वाली

कोटा के किसान ने विकसित की आम की नई प्रजाति

फलों के राजा कहे जाने वाले आम का नाता हमारी सभ्यता से शुरू से ही रहा है। अमूमन गर्मी के सीजन में ही आम का उत्पादन होता है। लेकिन अब दिन-प्रतिदिन विज्ञान के बढ़ते कदम की वजह से आम का उत्पादन अन्य सीजनों में भी होने लगा है।

भारत में इस समय 1500 से अधिक आम की किस्में पाई जाती हैं। सभी किस्म अपने आप में अच्छा खासा महत्व रखती है। ऐसी ही एक किस्म खोज निकाली है कोटा के एक किसान ने। इन्होंने ऐसी प्रजाति विकसित की है जिसका साल के तीनों सीजन में उत्पादन होता है। यानी पूरे साल भर ये प्रजाति फल देती है, इसीलिए इसका नाम रखा गया है ‘सदाबहार।’

कोटा में बागवानी करने वाले गिरधरपुरा गांव के किसान किशन सुमन की बाग से उत्पादित होने वाला सदाबहार आम की कुछ खूबी अल्फांसो आम की तरह हैं। अल्फांसो भारत का सब से खास किस्म का आम है। इसे आम का सरताज कहा जाता है। बस इसी सरताज से मिलती जुलती चीजों जैसा सदाबहार आम है। आम की ये प्रजाति अपने आप में अलग तरीके की है।

गुलाब की खेती से किया परिवर्तन

किशन सुमन ने 1995 में गुलाब, मोगरा और मयूरपंखी (थूजा) की खेती शुरू की और तीन वर्षों तक फूलों की खेती करते रहे। इसी दौरान उन्होंने गुलाब के ऐसी किस्म को विकसित किया जिसमें एक ही पौधे मं सात रंग के फूल लगते हैं। उनके द्वारा उत्पादित इस किस्म का उन्हें अच्छा रिटर्न मिला। इसके बाद उन्होंने अन्य फसलों पर भी काम करना शुरू किया।

सुमन बताते हैं कि “मैंने सोचा है कि अगर मैं गुलाब की किस्म में परिवर्तन कर सकता हूं तो फिर आमों के साथ क्यों नहीं। मैंने विभिन्न किस्मों के आमों को इकठ‍्ठा किया और उन्हें पोषित किया। जब पौधे पर्याप्त बड़े हो गए, तो मैंने उन्हें रूटस्टॉक पर तैयार किया। इसके बाद फिर काफी हद तक परिवर्तन आया।

2000 में पहचान में आई किस्म

गुलाब किशन को कामयाबी 2000 में मिलती दिखी। उन्होंने अपने बगीचे में एक आम के पेड़ की पहचान की, जो तीन मौसमों में खिल गया था। जनवरी-फरवरी, जून-जुलाई और सितंबर-अक्टूबर। उन्होंने पांच पेड़ों को एक प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल किया।

इस पेड़ की अच्छी विकास आदत थी और इसमें गहरे हरे पत्ते थे। इन पेड़ों की एक खास बात यह भी थी कि इन पौधों में किसी भी प्रकार की बीमारी नहीं थी। धीरे-धीरे वे अपने क्षेत्र में प्रसिद्ध होते गए। हनी बी नेटवर्क के एक स्वयंसेवक सुंदरम वर्मा ने सुमन के नवाचार के बारे में जमीनी तकनीकी नवाचारियों और उत्कृष्ट पारंपरिक ज्ञान के लिए संस्थागत अंतरिक्ष, नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन (एनआईएफ) को सूचित किया।

इसके बाद एनआईएफ ने सदाबहार पौधे बेचने या उपहार देने के लिए कहा, मैंने उन्हें पौधे दिए। एनआईएफ ने मुझे ये सलाह दी कि अपनी किस्म को सत्यापित कराएं। वे कहते हैं कि उनकी सलाह मानते हुए अपनी किस्म को प्रमाणित करने के लिए मैंने 11 वर्षों तक देश के विभिन्न स्थानों पर जाकर अपनी किस्म के पौधे लगाए। वह कहते है कि एनआईएफ को “मैंने 2012 में 20 पौधों का उपहार दिया था। अब पेड़ फल दे रहा है और जब फल पकता है, त्वचा नारंगी रंग प्राप्त करती है, जबकि अंदरूनी फल गेरुआ रंग का होता है।

इन पुरस्कारों से किया जा चुका है सम्मानित

खास प्रकार की किस्म को विकसित करने वाले किशन सुमन को अब तक कई अवार्ड भी दिए जा चुके हैं। मार्च 2017 में सुमन को 9वीं द्विवार्षिक ग्रासरूट इनोवेशन और राष्ट्रपति भवन में आयोजित उत्कृष्ट पारंपरिक ज्ञान के दौरान फार्म इनोवेशन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था।

इनके फलों की तारीफ करते हुए हरदेव चौधरी कहते हैं कि सदाबाहर पूरे वर्ष खिलते हैं। फल का स्वाद मीठा होता है और एक बौने विविधता के रूप में विकसित होते हैं। वे कहते हैं कि आम की इस नस्ल को किचन ग्रार्डन में बर्तन में रखकर कुछ समय बाद उत्पादित किया जा सकता है।

वे कहते हैं कि मौजूदा किस्मों की स्थिति को देखते हुए इसकी क्षमता बड़ी है। ऑक्सीजन की अत्याधिक उपलब्धता होने के कारण ये उत्पादकों के लिए भी बेहद फायदेमंद हो सकता है। वे कहते हैं कि ये किस्म देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का एकमात्र हाईब्रिड आम है जो कि साल में तीन बार फल देता है।

राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन की शान बने है सदाबहार

किशन सुमन द्वारा उत्पादित की जा रही आम की ये किस्म अब राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन की शान बन चुके हैं। सदाबार आम किस्म के यहां पर चार पौधे लगाए गए है। किशन के अनुसार उनके चार बीघा खेत में आम के 22 मदर प्लांट्स और 300 ग्राफ्टेड प्लांट्स लगे हुए हैं।

सदाबहार नाम की आम की यह किस्म रोग प्रतिरोधी है। बौनी किस्म होने से इसे गमले में भी लगाया जा सकता है। इसमें वर्ष भर नियमित रूप से फल आते हैं और ये सघन रोपण के लिए भी उपयुक्त है। जब से राष्ट्रपति भवन में सुमन के आमों को लगाया गया था, तब से उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई है।

सुमन ने दिल्ली, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तेलंगाना में नर्सरी और व्यक्तियों को 800 रुपये से अधिक, 800 रुपये के लिए उपलब्ध कराया है। सुमन ने कहा, “मुझे नाइजीरिया, पाकिस्तान, कुवैत, इराक, यूके और संयुक्त राज्य अमेरिका से भी लोग कॉल करके सदाबहार के बारे में पूछ रहे हैं।

सुमन के अनुसार एक पौधा लगभग 5 साल बाद फल देता है। मेरे लिए एक अच्छी बात यह है कि उत्पादक लंबे समय तक का इंतजार करते हैं लेकिन वे शिकायत नहीं करते हैं। ये सदाबार अन्य किस्मों से बहुत अलग है।

आप भी कर सकते है वनीला की खेती ,बाजार में एक किलो की कीमत है 40000 रुपये

आप वनीला की खेती करके अच्छी कमाई कर सकते हैं। इस फल की कई देशों में काफी डिमांड है। भारतीय मसाला बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी दुनिया में जितनी भी आइस्क्रीम बनती है, उसमें से 40% वनीला फ्लेवर की होती हैं।

सिर्फ आइस्क्रीम ही नहीं बल्कि केक, कोल्ड ड्रिंक, परफ्यूम और दूसरे ब्यूटी प्रोडक्ट्स में भी इसका काफी यूज होता है। भारत में वनीला 3500 रुपए किलो तक बिका है। हालांकि इसकी डिमांड भारत के बजाए विदेशों में ज्यादा है। इसलिए माल विदेश भेजने पर बड़ा मुनाफा होता है। इंडिया में इसकी कीमत ऊपर-नीचे होती रहती है। आज हम बता रहे हैं आप कैसे वनीला की खेती कर कमाई कर सकते हैं।

40 हजार रुपए तक देना पड़ सकते हैं

भारत में 1 किलो वनीला खरीदने पर आपको 40 हजार रुपए तक देना पड़ सकते हैं। ब्रिटेन बाजार में 600 डॉलर प्रति किलो तक पहुंच गया है। भारत में इस समय चांदी 43,200 रुपए प्रति किलो की रेट से बिक रहा है तो ब्रिटेन के मार्केट में चांदी 530 डॉलर (35,500 रुपए) प्रति किलो के भाव से बिक रहा है।

फल से मिलते हैं बीज

मसाला बोर्ड के मुताबिक, वनीला आर्किड परिवार का मेम्बर है। यह एक बेल पौधा है, जिसका तना लंबा और बेलनकार होता है। इसके सुगंधित और कैप्सूल के जैसे होते हैं। फूल सुखाने पर खुशबूदार हो जाते हैं और एक फल से कई सारे बीज मिलते हैं।

खेती के लिए क्या हैं जरूरी बातें

  • वनीला की फसल को ह्यूमिडिटी, छाया और मध्यम तापमान की जरूरत होती है।
  • आप ऐसा वातावरण बना सकते हैं। शेड हाउस बनाकर फव्वारा विधि से ऐसा किया जा सकता है।
  • तापमान 25 से 35 C तक होना पैदावार के लिए सबसे अच्छा माना जाता है।
  • पेड़ों से छनकर जो रोशनी आती है वो वनीला की फसल के लिए ज्यादा अच्छी मानी जाती है।
  • आपके खेत में बहुत सारे पेड़ या बाग है तो आप इंटरकोर्प की तरह इसकी खेती आसानी से कर सकते हैं।
  • वनीला की फसल 3 साल बाद पैदावार देना शुरू करती है

कैसी होना चाहिए मिट्टी

  • वनीला की खेती के लिए मिट्टी भुरभुरी और जैविक पदार्थों से भरपूर होना चाहिए। आप एक्सपर्ट से जांच करवाकर यह पता कर सकते हैं कि आप जिस क्षेत्र वनीला लगाने जा रहे हैं, वहां की मिट्टी की क्वालिटी कैसी है।
  • वनीला की खेती में पानी का ठहराव नहीं होना चाहिए।
  • जमीन की ph 6.5 से 7.5 तक होनी चाहिए। इससे पहले मिट्टी की जांच करवानी चाहिए।
  • जांच में अगर जैविक पदार्थों की कमी पता चले तो गली सड़ी गोबर की खाद, केंचुए की खाद यहां डाली जा सकती है।

लगाने की क्या है प्रॉसेस

  • वनीला की बेल लगाने के लिए कटिंग या बीज दोनों का इस्तेमाल किया जा सकता है हालांकि बीज का इस्तेमाल ज्यादा नहीं किया जाता क्योंकि इसके दाने छोटे होते हैं और उगने में बहुत ज्यादा समय लगता है।
  • बेल लगाने के लिए मजबूत और स्वस्थ कटिंग को चुना जाता है।
  • जब वातावरण में नमी हो तब आप इसकी कटिंग को लगा सकते हैं। लगाने से पहले गड्ढे बनाकर उनमें पूरी तरह से गली सड़ी खाद डाली जाती है। कटिंग को मिट्टी में दबाने की जरूरत नहीं होती। सतह के ऊपर बस थोड़ी सी खाद और पत्तों से ढक दिया जाता है, कटिंग की दूरी 8 फिट रखी जाती है।
  • सहारे के लिए पेड़ या 7 फिट लम्बे लकड़ी या सीमेंट के पिलर लगाए जाते हैं। बेल को फैलने के लिए तार बांधी जाती है। खेत में लगा रहे हैं तो एक एकड़ में 2400 से 2500 बेल होना चाहिए।

फसल लगाने के बाद क्या करें

  • खेत में गोबर से तैयार खाद, केंचुए की खाद, नीम कके आदि डालते रहना चाहिए।
  • 2 दिन के अंतर से फव्वारा विधि या टपका विधि से पानी देना चाहिए।
  • खेत में एफवायएम, गोबर की खाद, केंचुए की खाद आदि डालते रहना चाहिए।
  • 1 किलो एनपीके को 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करना चाहिए।
  • बैल को तारों के ऊपर फैलाया जाता है। इसी ऊंचाई 150 सेमी से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
  • फूल से लेकर फलियां पकने तक में 9 से 10 माह का समय लग जाता है।
  • वनिला को पूरी तरह पकाने के लिए क्युरिंग, स्वेटिंग, ड्राइंग और कंडिशनिंग की प्रॉसेस से निकलना होता है। इसके बाद वनीला तैयार होता है।

जीरो बजट खेती का कमाल, गेहूं उत्पादन से प्रति एकड हो रहा 46000 रु. का मुनाफा

राजस्थान की सीमा से सटे भिवानी के रेतीले इलाके में अब की बार प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को रसायनिक खेती से कहीं ज्यादा फायदा मिला है। किसानों का कहना है कि अबकी बार उन्हें पुरानी देसी गेहूं की किस्म 306 के उत्पादन में प्रति एकड़ रसायनिक फसल के मुकाबले 5 से 6 हजार रुपए का फायदा होगा।

यही नहीं कुछ के यहां तो प्रति एकड़ 20 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन हुआ है। इसके दाम भी 4 से 5 हजार रुपए प्रति क्विंटल आसानी से मिल रहे हैं, जबकि रसायनिक उर्वरकों पर आधारित गेहूं के दाम केवल 1735 रुपए प्रति क्विंटल हैं। इसी प्रकार प्राकृतिक खाद द्वारा उगाए गए आलू भी 40 से 50 रुपए प्रति किलोग्राम मिल रहा है, जबकि साधारण आलू 15 से 20 रुपए किलो मिल रहा है।

आचार्य देवव्रत व सुभाष पालेकर की प्रेरणा से हो रही खेती

महाराष्ट्र में जीरो बजट खेती के जनक सुभाष पालेकर से प्रेरणा लेकर लाखों किसानों ने प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल किया है। वहीं हरियाणा में हजारों किसानों ने राज्यपाल आचार्य देवव्रत के आह्वान पर जीरो बजट खेती शुरू की है। हाल ही में रोहतक व जींद की जेल में आचार्य देवव्रत ने प्राकृतिक खाद के जरिए दर्जनों एकड़ में खेती की शुरूआत करवाई थी।

राज्यपाल द्वारा ही रोहतक के प्राचीन वैश्य गोशाला व भिवानी की पतराम गेट स्थित गोशाला में भी प्राकृतिक खाद का उत्पादन शुरू करवाया गया। इसके अलावा प्रदेश में एक दर्जन जगहों पर प्राकृतिक खाद तैयार किया जा रहा है। रोहतक स्थित एमडीयू में आने वाले दिनों में सैकंडों एकड़ भूमि पर प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल कर सब्जियां व अनाज उगाने की योजना तैयार की गई है। ये सब्जियां व अनाज न केवल विश्वविद्यालय कैम्पस में रहने वाले स्टाफ को रियायती दरों में दी जाएंगी और प्रयोग यहां रहने वाले छात्र करेंगे।

भिवानी महापंचायत कर रही घनामृत खाद का उत्पादन

भिवानी महापंचायत की देखरेख में स्थानीय पतराम गेट स्थित गोशाला में अब तक 3 हजार से अधिक किसानों को प्राकृतिक खाद यानी घनामृत मुफ्त वितरीत किया जा चुका है। महापंचायत के संरक्षक बृजलाल सर्राफ का कहना है कि जहर मुक्त व जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने के लिए महापंचायत हर प्रकार के सहयोग के लिए तैयार है।

दो गुना तक फायदा

सामान्य गेहूं की खेती के लिए प्रति एकड़ कुल खर्च करीब 9850 रु. आता है। उत्पादन 20 क्विंटल होता है जिससे करीब 35000 रु. मिलते हैं और इस प्रकार एक किसान को प्रति एकड़ लगभग 25 हजार रु. की बचत होती है। वहीं एक एकड़ में प्राकृतिक रूप से देसी गेहूं के उत्पाद पर कुल खर्च करीब 9300 रु. आता है। एक एकड़ में उत्पादन 14 क्विंटल का होता है और लगभग मूल्य 4000 हजार रु. प्रति क्विंटल के हिसाब से कीमत 56000 रु. मिलती है। यानी लगभग 46 हजार रु. की बचत होती है।

एप्पल से उलट है एप्पल वुड यानी बेल की खेती

इंग्लिश में एप्पलवुड के नाम से मशहूर बिल की खेती के लिए एप्पल की खेती से उल्ट मौसम चाहिए। यानी सेब की फसल तभी होती है जब माइनस में टेंपरेचर हो आैर बेल जितनी गर्मी पड़ेगी उतना ही मीठा होगा।

सनौर इलाके के कई किसानों ने बिल के पेड़ लगा रखे हैं जो इनसे बिना किसी लागत मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। इसकी खेती पूरे उतर भारत में की जाती है क्योंकि यह हर तरह की मिट्‌टी में पैदा हो जाता है।

किसान बिक्रमजीत सिंह ने बताया कि इसकी खेती ज्यादातर दोमट मिट्टी में की जाती है। इसके लिए पीएच मान 8.00 से 8.50 के बीच होना चाहिए। किसानों ने बताया की वह काफी समय से बिल की खेती करते आ रहे हैं और यह सर्दी-गर्मी दोनों मौसम में हो सकता है।

बेल से ऐसे बढ़ाइए पैसों की बेल

किस्में…बेल की दो किस्में हैं। एक हाईब्रिड और दूसरी देशी। देशी किस्म को देर होने में लंबा समय लगता है मगर हाईब्रिड तीन साल में तैयार हो जाती है। पके हुए बेल के बीज से भी पौध तैयार की जा सकती है। किसान ओमप्रकाश ने बताया की यह नर्सरी में मिल जाता है। बेल की बिजाई बारिश के दिनों में की जानी चाहिए।

बीमारियां…गांव मसीगन के ओम प्रकाश और बिक्रमजीत ने बताया कि वह लंबे समय से बेल की खेती करते आ रहे हैं। बेल में लैमन वटर फ्लाई, कीट, लीफ माईनर तथा तना सड़न गमोसिया आदी रोग लगते हैं।

औषधीय गुण…बेल के सेवन से बवासीर, दस्त खत्म होते हैं, भूख बढ़ती है। यह कब्ज की समस्या भी दूर करता है। बिल का शरबत नियमित रूप से रात को सेवन करना चाहिए इससे पेट की सभी समस्याएं दूर होती हैं। शुगर की समस्या में पत्तों का चूर्ण सेवन किया जाए तो लाभदायक होता है।

फल व फूल… बेल लगाने के बाद एक वर्ष के बाद अप्रैल-मई में फूल आते हैं। पर फल लगना काफी देर बाद शुरू होता है। बिल की खासियत यह है कि यह तुड़ाई के दो महीने तक खराब नहीं होता। तुड़ाई के बाद भी फल लगते रहते हैं।

They also have dialects that are various and will result from a range of backgrounds.

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