12वीं के स्टूडेंट ने बनाया डिवाइस, किसान घर बैठे ऑपरेट कर सकते हैं खेतों में लगे वाटर पंप

दिल्ली के ईशान मल्होत्रा (17) ने प्लूटो नामक एक ऐसा डिवाइस बनाया है, जिसकी मदद से किसान घर बैठे खेतों में लगे वाटर पंप को ऑपरेट कर सकते हैं। वाटर पंप चालू और बंद करने के लिए उन्हें बार-बार खेतों में नहीं जाना पड़ेगा। डिवाइस की खास बात यह है कि इसे स्मार्टफोन के अलावा सामान्य फोन से भी ऑपरेट किया जा सकता है। तीन साल में 500 डिवाइस बनाकर ईशान 300 डिवाइस किसानों को मुफ्त में बांट चुके हैं।

एक डिवाइस बनाने में खर्चा आता है 700 रुपए

सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने की ख्वाहिश रखने वाले ईशान जयपुर से 12वीं की पढ़ाई कर रहे हैं। एक डिवाइस बनाने में 700 रुपए खर्चा आता है। वह इसे इतने ही रुपए में किसानों को बेच देते हैं। इस डिवाइस को वाटर पंप के अंदर फिट किया जाता है।

इसमें ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिसकी मदद से टेली कम्युनिकेशन के जरिए किसान वाटर पंप चालू या बंद कर सकते हैं। वाटर पंप चालू करने के लिए किसानों को अपने मोबाइल से 1111 और बंद करने के लिए 2222 नंबर डायल करना होगा।

शुरुआत में किसानों ने बनाया मजाक, फिर भी हार नहीं मानी

ईशान ने जून, 2015 में डिवाइस बनाने की शुरुआत की। उस वक्त उनकी उम्र 14 साल थी। जनवरी 2016 में पहला डिवाइस तैयार किया। डिवाइस लेकर जब वह किसानों के बीच पहुंचे तो उनका मजाक बनाया गया। ईशान ने किसानों की बातों को दरकिनार कर 2016-17 के बीच 500 डिवाइस बना डाले। काफी कोशिशों के बाद किसानों को डिवाइस की मदद से जब वाटर पंप ऑपरेट कर दिखाया, तब उन्हें विश्वास हुआ।

किसानों की परेशानी देख आया आइडिया

ईशान बताते हैं कि बचपन में वे किसानों की समस्याएं सुनते थे। किसानों को रोजाना सुबह-शाम घर से चार-पांच किमी पैदल चलकर खेतों में लगे वाटर पंप को चालू करने जाना पड़ता है। कई बार वहां पहुंचने पर लाइट चली जाती है। बारिश के दिनों में स्थिति बदतर हो जाती है और वाटर पंप चालू करने के दौरान किसानों को इलेक्ट्रिक शॉक लग जाता है।

किसानों की परेशानी देख ईशान ने एक ऐसा डिवाइस बनाने का फैसला किया। इसके जरिए वे देश के किसी भी कोने से वाटर पंप चालू कर सकें। डिवाइस बनाने के लिए ईशान ने क्राउड फंडिंग प्लेटफॉर्म इंपैक्ट गुरु के जरिए 1.30 लाख रुपए का फंड जुटाया।

70 साल के किसान ने 3 साल तक तोड़ा पहाड़ और बना डाली नहर, गांव में पानी लाने की ठानी थी

ओडिशा में एक किसान ने अपनी मेहनत से गांव के सैकड़ों लोगों की मुश्किलें दूर कर दीं। 70 साल के दैत्री नायक ने तीन साल कड़ी मेहनत करके गांव में एक किलोमीटर लंबी नहर खोद डाली। वो भी तब जबकि ये इलाका बहुत ही पथरीला था। लिहाजा, पानी की कमी से जूझ रहे गांव के लोगों को नहर बनने के बाद रोजमर्रा के काम और खेती के लिए भरपूर पानी मिल सकेगा।

  • मामला केन्दुझर जिले का है। यहां बांसपाल, तेलकोई और हरिचंदपुर ब्लॉक में सिंचाई के लिए कोई इंतजाम नहीं था। खेती के लिए लोगों को बारिश के पानी पर ही निर्भर रहना पड़ता था। वहीं, रोजमर्रा के काम के लिए भी वो लोग तलाब के गंदे पानी का इस्तेमाल कर रहे थे।

  • प्रशासन ने इस पहाड़ी इलाके में पानी के लिए कोई इंतजाम नहीं कराया था। ऐसे में बैतरणी गांव के दैत्री नायक ने यहां पानी लाने की ठानी। दैत्री ने बताया, ”मैंने अपने परिवार के साथ नहर बनाने का काम शुरू किया। पानी के इंतजाम के लिए मैंने तीन साल तक पहाड़ों को तोड़ा और खुदाई की। मेरे परिवार वालों ने पत्थर हटाने में मेरी मदद की। नहर खुदने के बाद पिछले महीने गांव में पानी लाया जा सका है।”

अब नींद से जागा प्रशासन

केन्दुझर डिवीजन में माइनर इरिगेशन के इंजीनियर सुधाकर बेहरा ने बताया, ”हमें रिपोर्ट्स मिली हैं कि एक शख्स ने कर्नाटक नाला से पानी लाने के लिए नहर खोदी है, ताकि खेती में सुविधा हो सके। हम उस गांव का दौरा करेंगे और वहां सिंचाई की व्यवस्था के लिए जरूरी कदम उठाएंगे।”

किसान बेटे ने की खुदकुशी, अब पोते को पढाने के लिए धो रही है गंदी बोतलें

एक 62 साल की बूढ़ी महिला जिसका नाम बलबीर कौर है, उसके हंसते-खेलते परिवार को बेटे के एक्सीडेंट ने तोड़कर रख दिया। पांच एकड़ जमीन, एक ट्रैक्टर आैर कार की मालकिन के पास आज कुछ भी नहीं है। बेटे के इलाज के लिए कर्ज लिया था, फिर भी वो ठीक नहीं हुआ।

ठीक नहीं होने से तंग आकर 2016 में घर में ही फंदा लगाकर उसने मौत को गले लगा लिया। इतना सब होते हुए भी उसने हौसला रखा आैर सोचा कि कर्ज देने वाले तंग न करें इसलिए जमीन, ट्रैक्टर, कार सब बेच दिया आैर लोगों का कर्ज चुका दिया।

  • घर की खराब आर्थिक हालत को देखते हुए बहू भी 3 जुलाई 2016 को 10 साल के बेटे को छोड़कर चली गई। अब बुजुर्ग बलबीर गंदी बोतलें धोकर जो पैसे मिलते हैं उससे पोते को प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही हैं।
  • उसे उम्मीद है कि पोता पढ़-लिखकर फिर से अच्छे दिन लाएगा, भले ही वो दिन देखने के लिए वह जिंदा रहे या नहीं। पोता भी उम्मीदों पर खरा उतर रहा है। हाल ही में पांचवीं क्लास उसने 97% नंबरों के साथ पास की है आैर दादी के साथ खाली समय में बोतलें भी साफ करवाता है।

गेहूं, धान से भरे रहने वाले बरामदे में आज गंदी बोतलों के क्रेट

  • बुजुर्ग बलबीर कौर ने पुराने दिन याद करते हुए बताया कि उसका हंसता-खेलता परिवार था। बेटा केसर सिंह पिता के साथ अपनी पांच एकड़ जमीन पर आम किसानों तरह खेती करता और खुशहाल जिंदगी व्यतीत कर रहा था। खेती के लिए ट्रैक्टर समेत हर सामान अपना था। घर में कार भी थी। 2011 में परिवार पर मुसीबतों का कहर टूट पड़ा।
  • बेटे केसर का एक्सीडेंट हुआ और कई साल चले इलाज में आमदनी बंद हो गई। उल्टा सिर पर काफी कर्ज चढ़ गया। बेबस होकर बेटे सुसाइड कर लिया। बहू 10 साल का पोता हमारी झोली में डालकर चली गई। कभी घर के इस बरामदे में जहां गेहूं, धान के बोरे और ट्रैक्टर होता था, वहां गंदी बोतलों के ढेर लगे हैं। इतना कहते ही बलबीर कौर की आंखें आंसुओं से भर जाती हैं।

कमाई का नहीं है कोई साधन

  • वे बताती हैं कि कमाई का कोई साधन नहीं है। गंदी बोतलें साफ करने बदले प्रति क्रेट पांच रुपए मिलते हैं। अब काम भी नहीं होता। बहुत कोशिश करने पर कभी 60 तो कभी पोते के हाथ बंटाने से 75 रुपए दिहाड़ी बन जाती है। इसी से परिवार का गुजारा चला रही हूं।
  • मन में दुख है कि किसी सरकार ने परिवार की सुध नहीं ली और न ही किसी योजना के तहत मदद की। आैर कुछ नहीं तो पोते की आगे की पढ़ाई का ही कुछ इंतजाम हो जाए तो सुकून मिल सके। बलबीर कौर के पति अजैब सिंह भी बीमार रहते हैं।

इजरायल की तकनीक से खेती करेंगे यूपी के किसान

प्रदेश में उम्दा किस्म की फल और सब्जियां उगाने के लिए दो सेंटर ऑफ एक्सिलेंस इसी साल जुलाई से शुरू हो जाएंगे। इजरायल के तकनीकी सहयोग से फलों का सेंटर बस्ती में और सब्जियों का कन्नौज में शुरू होने जा रहा है। यहां किसानों को उन्नत किस्म की पौध तैयार करके दी जाएंगी। साथ ही किसानों को सब्जियों और फलों के रख-रखाव की सलाह और प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

भारत में फलों और सब्जियों का उत्पादन तो खूब होता है,लेकिन क्वॉलिटी को लेकर किसान ज्यादा जागरूक नहीं हैं। वे खुद बीज बोते हैं, पौध बनाते हैं। पौध कितनी दूरी पर लगाई जाए, कौन से कीटनाशक डाले जाएं और कैसे तोड़ाई की जाए, इस बारे में भी सभी किसानों को पर्याप्त जानकारी नहीं होती।

विशेषज्ञों का मानना है कि बीज से पौध बनाने के स्तर पर ही इतनी चूक हो जाती है कि अच्छी क्वॉलिटी के पौधे ही तैयार नहीं हो पाते। इन बातों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने इजरायल सरकार के सहयोग से देशभर में फल और सब्जियों के सेंटर ऑफ एक्सिलेंस बनाने का प्रॉजेक्ट शुरू किया था। इसमें यूपी को दो सेंटर ऑफ एक्सिलेंस मिले।

केंद्र और प्रदेश सरकार दे रही आर्थिक सहयोग

उद्यान विभाग के निदेशक आरपी सिंह बताते हैं कि यूपी में दो सेंटर ऑफ एक्सिलेंस बनकर तैयार हो चुके हैं। बस्ती में फलों का सेंटर करीब 7.4 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा है। कन्नौज में सब्जियों का सेंटर 7.6 करोड़ की लागत से तैयार हुआ है।

ये दोनों इस साल जुलाई से शुरू हो जाएंगे। इजरायल की तकनीक आधारित खेती का लाभ लेने के लिए यह योजना शुरू की गई है। इनमें केंद्र और राज्य सरकारें आर्थिक मदद कर रही हैं।

किसान बीज लाएंगे, सेंटर पौध तैयार करके देगा

आरपी सिंह ने बताया कि यहां पर किसानों को सर्विस और प्रशिक्षण दोनों मिलेगा। किसान अपना बीज लेकर यहां संपर्क करेंगे। उससे सेंटर पर पौध तैयार कर किसानों को दी जाएंगी। यह सुविधा नि:शुल्क होगी। इसके अलावा फल और सब्जियों को रोग से बचाव, कीटनाशकों के छिड़काव और अन्य जरूरी सलाह भी किसानों को यहां मिलेगी।

इस किसान की सब्जियां जाती हैं विदेश, सैकड़ों महिलाओं को दे रखा है रोजगार

खेती जिसमें एक किसान और उसके उपभोक्ता बीच अगर हजारों किलोमीटर का लंबा फासला हो, तो ज़ाहिर है इस फासले को पाटने का जज्बा हर किसी के बूते की बात नहीं होगी। यह तो 64 साल के करण वीर सिंह सिद्ध की हिम्मत, संकल्प और उनके पिता के सच्चे किसान का डीएनए ही था जिसकी वजह से वो इस जोखिम भरे माहौल यानी खेती के धंधे में कूद गए।

छोटी आयु में ही सिद्ध के सर से उनके पिता का साया उठ गया। सिद्ध के पिता मानसा जिले में किसान थे। उनके गुजर जाने के बाद, वो और उनकी मां पटियाला चली आईं। सन 1979 में वो राज्य में एक्साइज एंड टैक्सेसन ऑफिसर बन गए लेकिन वो खेती में कुछ रोमांचक करना चाहते थे।

कई सेमिनार और वर्कशॉप में जाने के बाद उन्हें समझ में आया कि विदेशी सब्जियों का बड़ा बाजार ना केवल भारत में है बल्कि विदेशों में भी है। सिद्ध बताते हैं, “खेती मेरे खून में था और मैं कुछ अलग करना चाह रहा था। मैं तीन दोस्तों और दूसरे साझेदारों के साथ मिलकर हमारी कंपनी, पटियाला हॉर्टिकल्चर के लिए शुरुआती पूंजी लगाई।

साल 1996 में मैंने नौकरी से पांच सालों का अध्ययन प्रोत्साहन अवकाश लिया और एक डच कंपनी के लिए तलवंडी साबू में सेम के फली की खेती शुरू कर दी।” पहले ही साल उन्हें बड़ा झटका लगा जब पंजाब सरकार के पैक हाउस ने उस वक्त काम करना बंद कर दिया जब 60 एकड़ में तैयार फसल को निर्यात करने से पहले संरक्षित किया जाना था।

“हमे 15 लाख का सामूहिक नुकसान पहुंचा, यद्यपि हमने सारा बकाया चुका दिया, जिसमे खेत का किराया और तीन गांवों के 40 किसानों पर हुआ लागत खर्च जो हमारे कार्य में जुड़े थे,शामिल था’, उसके बाद हम आगे बढ़ गए’।

बड़े ही शांत तरीके से आपबीती बताने का उनका लहजा आपको ये स्पष्ट कर देता है कि कितने शांत भाव से उन्होंने उन विपरीत परिस्थितियों का सामना किया होगा। बाद में वो अपने इस विचार को तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को समझाने में सफल रहे और 59 लाख रुपये का सॉफ्ट लोन या सुलभ कर्ज भी पाने में सफल हो गए।

इस लोन का उपयोग पटियाला जिले के समाना तहसील के लालगढ़ गांव में पैक हाउस जैसी आधारभूत सुविधाएं तैयार करना था। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। देश के 180 सबसे अच्छे पैक हाउस में से यह एक है। सिद्ध बताते हैं, “साल 2001 से साल दर साल यूरोप और ऑस्ट्रेलिया को सब्जियां निर्यात कर मैंने अच्छी कमाई की है।

साल 2015 को छोड़कर, जब केंद्र ने नियम में बदलाव किया था,तब हमने एक साल का ब्रेक लेने का फैसला किया था ताकि तब तक परिस्थितियां हमारे अनुकूल हो जाए।” सामना, अमलोह और भादसों के 35 किलोमीटर के दायरे में 40 छोटे किसानों ने जिन्होंने हमें संयुक्त पूल के लिए एक से डेढ़ एकड़ जमीन दी वो सभी किसान सिद्ध जितना ही कमाते हैं।

सुगर स्नैप्स और स्नो पी के उत्पादन से सिद्ध की सालाना बिक्री सवा करोड़ से तीन करोड़ के बीच है। साल 2015 में बदले हुए क्वारेंटाइन नॉर्म्स की वजह से सालाना बिक्री घटकर महज 11 लाख रह गई। यहां तक कि उन्हें काफी सारे उत्पादों को छोड़ना भी पड़ा।

जिंदगी में खुशियां भरनेवाली प्याज

सिद्ध अपने प्याज के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं। पिछले दो साल से उन्होंने 50 एकड़ में प्याज की खेती शुरू की है, जो कि राज्य में इस फसल की सबसे बड़ी खेती है। वो बताते हैं, “पंजाब सालाना साढ़े सात लाख टन प्याज की खपत करता है और उत्पादन महज डेढ़ टन ही करता है।

मेरा लक्ष्य किसानों को प्रति एकड़ 50,000 रुपये शुद्ध मुनाफा दिलवाना है, यह एक बड़ी चुनौती है लेकिन मैंने इसे स्वीकर किया है”। सरकार से प्राप्त सब्सिडी की मदद से उन्होंने 50 में से 20 एकड़ क्षेत्र में ड्रिप सिंचाई व्यवस्था लगवा दी है।उनके लिए प्याज की तीन ऋतुएं हैं।

“सबसे अच्छा रबी है, जिसमे मध्य दिसंबर में पौधारोपण होता है और अप्रैल में कटाई। खरीफ फसल में बुआई जुलाई-अगस्त में होती है और कटाई नवंबर महीने में और विलंबित खरीफ फसल का मौसम सितंबर-अक्टूबर में शुरू होता है। विलंबित खरीफ फसल के सामने कई खतरे होते हैं लेकिन हम लोग तीन सीजन पर प्रयोग कर रहे हैं।”

सिद्ध की कंपनी विस्टा फूड के साथ मैकडोनल्ड्स (हैमबर्गर फास्ट फूड रेस्टोरेंट की दुनिया में सबसे बड़ी श्रृंखला) के साथ प्याज की आपूर्ति की बात कर रही है। इसके लिए उन्होंने एकीकृत हाइब्रिड किस्म विकसित की है। अगर करार पर बात बन जाती है तो उन्हें उम्मीद है कि 25 रुपये प्रति किलोग्राम का मूल्य उन्हें मिलेगा।

लहसुन और ऐस्परैगस (एक प्रकार की साग) के साथ प्रयोग

चीन की एक कंपनी के लिए सिद्ध पहली बार पांच एकड़ जमीन में लहसुन की खेती कर रहे हैं, जिसे अमेरिका में बेचा जाएगा। अगर प्रयोग सफल रहा तो वो अमेरिकन कंपनी से सीधा संपर्क करेंगे। एक एकड़ क्षेत्र में वो ऐस्परैगस (एक प्रकार की साग) को उगाने को लेकर भी प्रयोग कर रहे हैं।

फसल तीन साल में पूरी तरह तैयार हो जाएगी, उसके बाद उन्हें उम्मीद है कि उन्हें प्रति किलोग्राम 300 रुपये मिलेंगे और प्रति एकड़ तीन लाख का मुनाफा होगा। यह फसल अगले 20 साल तक उन्हें फल देता रहेगा।

उद्यमी या व्यवसायी गांव के गरीब परिवार के करीब 100 भूमिहीन महिलाओं को मजदूरी पर रखते हैं और उन्हें प्रतिदिन डेढ़ सौ रुपये देते हैं। अधिकांश मामले में एक परिवार की सभी महिलाएं काम पर आती हैं और मिलकर प्रति महीने करीब 20,000 रुपये तक कमा लेती हैं।

नौकरी में घाटा, लेकिन कोई मलाल नहीं

कृषि में सिद्ध की सफलता सरकारी नौकरी में विकास नहीं होने की कीमत देकर चुकानी पड़ी है। वो बताते हैं, ” मैंने सात बार वेतनमान में इजाफा और एक प्रमोशन खो दिया। मेरे जूनियर मुझसे आगे निकल गए। अगर मैं लगातार काम कर रहा होता तो मैं ज्वाइंट कमिश्नर के पद से रिटायर होता।”

उन्होंने यह भी जोड़ा कि, “अगर मैं नौकरी नहीं कर रहा होता तो खेती में और भी अच्छा करता। लेकिन ये भी सच है कि मैंने ईटीओ की नौकरी से कई संपर्क हासिल किया”। किसानों की पटियाला हॉर्टिकल्चर कंपनी तापमान नियंत्रित सब्जियों की खुदरा दुकान खोलने की योजना बना रहा है, जिसकी शुरुआत अप्रैल में पटियाला से दो दुकानों से होने जा रही है।

दो साल में 15 करोड़ के निवेश के साथ फूड पार्क के लिए उन्होंने पंजाब सरकार के साथ एक करार पर हस्ताक्षर किया है। वो बताते हैं, “सब्जी पैदा करनेवाले हमारी पहल या प्रस्ताव की प्रतीक्षा कर रहे हैं।’

कभी ईंट ढोकर चलाते थे घर, अब सालाना कमा रहे 5 लाख रु., इनके संघर्ष पर इंग्लैंड में लिखी जा रही किताब

यह कहानी बिहार के एक किसान मो. इरफान की है। इनके पास पांच एकड़ जमीन थी लेकिन वह उपजाऊ नहीं थी। घर चलाने के लिए ईंट-भट्‌ठा पर मजदूरी करते थे। गाय पालकर व दूध बेचकर किसी तरह परिवार चलाते थे। 2004 में गांव में कुछ वैज्ञानिक आए।

उनसे मो. इरफान ने वर्मी कंपोस्ट बनाने के बारे में जानकर इसपर काम शुरू कर दिया। पहले ही साल उन्होंने 2 लाख रु. कमाए। इसके बाद उन्होंने 5 एकड़ जमीन खरीदी और ऑर्गेनिक खेती शुरू कर दी। अब इरफान सालाना पांच लाख रु. कमा रहे हैं।

इरफान पर बनी फिल्म देख इंग्लैंड से चले आए वैज्ञानिक

अब दूसरे किसानों को जागरूक करने के लिए कृषि विभाग ने इरफान पर शार्ट फिल्म बनाई। इस फिल्म को देखकर इंग्लैंड से वैज्ञानिकों की टीम इनकी खेती का तरीका देखने इनके गांव आ पहुंची। वर्मी कंपोस्ट प्लांट का विजिट किया। अब ये टीम इनकी सफलता की कहानी किताबों के पन्नों पर उतार रही है।

सफलता से हौसला बढ़ा, केले व मक्के की भी शुरू की खेती

मो. इरफान ने बताया, आमदनी नहीं होने के कारण अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा नहीं दे पा रहा था। 2004 में गांव में कुछ वैज्ञानिक आए तो उनसे वर्मी कंपोस्ट बनाना सीखा।

पूरी मेहनत के साथ वर्मी कंपोस्ट बनाना शुरू किया। सफलता मिलने लगी तो हौसला बढ़ा और केले व मक्के की खेती भी शुरू की। आज मेरे बच्चे कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ रहे हैं। पैसे जमा कर पांच एकड़ जमीन खरीदी और ऑर्गेनिक खेती करनी शुरू कर दी। अब तो गांव के कई किसान भी यह खेती शुरू कर चुके हैं।

जैविक खाद बनाने के साथ ही केंचुआ की भी कर रहे मार्केटिंग

  • माे. इरफान वर्मी कंपोस्ट प्लांट लगाने के साथ ही केंचुए की भी मार्केटिंग कर रहे हैं। सूबे के करीब 50 किसानों को केंचुआ मुहैया करा रहे हैं। 12 सदस्यों के समूह को ऑर्गेनिक खेती के लिए जागरूक किया है।
  • हर सदस्य 12 किसानों को यह टेक्निक सिखा रहे हैं। केंचुए से होने वाले फायदे बता रहे हैं। एक माह में 400 केजी तक केंचुआ बेचकर करीब 1 लाख तक कमा लेते हैं।

सिर्फ ढेड़ लीटर डीज़ल में एक एकड़ धान काटने वाली मिनी कम्बाइन

वैसे तो धान की फसल तैयार करना काफी मुश्किल भरा होता है, किसान जी-जान लगा देता है फसल को तैयार करने में, लेकिन इसके बाद भी धान की मड़ाई करना भी काफी मुश्किल भरा काम होता है।

हलांकि जो किसान धान की खेती ज्यादा क्षेत्र में करते हैं वो तो कम्बाइन से अपनी फसल कटवा लेते हैं, लेकिन जो किसान कम क्षेत्र में धान की खेती करते हैं उन किसानों को फसल की मड़ाई करने में काफी मेहनत करनी पड़ीती है, उन्हीं किसानों के लिए ग्रीव्स कंपनी मिनी कम्बाइन ले कर आए है जो छोटे किसानो के बेहद फायदेमंद साबित होगी।

कम क्षेत्र में धान की खेती करने वाले किसानो के लिए यह कम्बाइन बहुत ही उपयोगी है । इस मशीन के इस्तेमाल करने के बहुत से फायदे है जैसे यह बहुत कम जगह लेता है ।

छोटा होने के कारण हर जगह पर पहुँच जाता है । और इस मिनी कम्बाइन से एक एकड़ काटने में बहुत ही कम खर्च आता है यह एक एकड़ काटने में सिर्फ 1.5 से 2 लीटर के लगभग डीज़ल का प्रयोग करती है ।

इसमें 17.2 Hp डीजल इंजन लगा हुआ है इस मॉडल का नाम Model – GS4L-0.5 है । इस मॉडल की कीमत 3 लाख के करीब । यह कम्बाइन दो से ढाई घंटे में एक एकड़ फसल काट देती है।

इस कम्बाइन का एक फ़ायदा यह भी है के यह फसल को सीधे ही बोरे में डाल देती है । सिर्फ धान ही नहीं इस से आप बाकी की अनाज फसलें जैसे गेहूं ,सरसों अदि भी काट सकते है

यह कंबाइन कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें

अगर आप इस कंबाइन को खरीदना चाहते है तो नीचे दिए हुए पते और नंबर पर संपर्क करें

Phone: +91-22-33551700
REGISTERED OFFICE:
Greaves Cotton Limited
3rd Floor Motilal Oswal Tower
Junction of Gokhale & Sayani Road
Prabhadevi Mumbai – 400025

तीन महीने में 1 हेक्टेयर में ढाई से 3 लाख तक कमाई कराती है ये फसल

खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए किसान अब वो फसलें उगाना चाहते हैं, जिनसे ज्यादा मुनाफा हो। फूलों की खेती और सब्जियों के बाद औषधीय फसलें किसानों की पसंद बनी हुई हैं। ऐसी ही एक नकदी फसल ईसबगोल भी है।

किसानों के मुताबिक इसमें एक हेक्टेयर में ही ढाई से 3 लाख की कमाई हो हो सकती है, जबकि खर्चा काफी कम होता है। ईसबगोल एक अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय फसल है। औषधीय फसलों के निर्यात में इसका प्रथम स्थान हैं। ईसबगोल की खेती से 10 से 15000 निवेश करने के बाद तीन से चार महीने में ही 2.5 लाख से 3 लाख रुपए तक किसान कमा रहे हैं।

मेडिसिनल प्लांट फार्मिंग से जुड़े बिजनेस हमेशा से ही एक बेहतरीन मौके रहे हैं जिसमें कम पैसे निवेश करके अधिकतर अधिकतम आय हासिल की जा सकती है और इन्हीं बिजनेस में से जुड़ा है ईसबगोल की खेती और इससे जुड़े व्यापार।

भारत में इसका उत्पादन प्रमुख रूप से गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश में करीब 50 हजार हेक्टयर में हो रहा हैं। मध्य प्रदेश में नीमच, रतलाम, मंदसौर, उज्जैन एवं शाजापुर जिले प्रमुख हैं।

छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव के रहने वाले सत्यनारायण साहू बाताते हैं, “ईसबगोल एक नगदी औषधीय फसल है। इसके लिये ठंडा व शुष्क मौसम अनुकूल रहता है। मैंने अभी कुछ वर्ष पहले ही इसकी खेती शुरू की है। अपने एक हेक्टेयर के खेत में ‘हरियाणा ईसबगोल-5’ ईसबगोल के बीज का प्रयोग कर रहा हूं।

जो यहां की जलवायु के हिसाब से काफी असरदार है।” सत्यनारायण आगे बताते हैं, “खेत में पलेवा के बाद 2 से 4 टन गोबर या अन्य जैविक खाद बुआई के 10 से 15 दिन पूर्व खेत में डालता हूं। उसके बाद बीज की बुवाई करता हूं। ईसबगोल की खेती में कम लागत कम आती है और मुनाफा अच्छा होता है इसलिए मेरी देखा-देखी यहां के कई किसान मुझ से बीज ले जाते हैं और खेती करते हैं।”

हरियाणा के भिवानी जिले के रहने वाले किसान खुशवीर मोठसरा बताते हैं, “ईसबगोल की बुआई छिटकवाँ विधि से करने पर पौधे घने होते हैं जिससे खरपतवारों का प्रकोप कम होता है। बुवाई के 20 से 25 दिन बाद पहली निराई करके खरपतवार उन्मूलन करना चाहिए। फसल अवधि में 2 से 3 निराइयों की आवश्यकता होती है।

ईसबगोल की उन्नत सस्य विधियों से खेती करने पर प्रति हेक्टेयर 10 से 12 क्विंटल बीज प्राप्त होता है। इसके बीजो में भूसी की प्राप्ति 20 से 30 प्रतिशत तक होती है। फसल का बाजार भाव उचित न होने पर इसके बीज व भूसी को नमी सोखने से बचाने के लिए शुष्क स्थान में भंडारण करना चाहिए। नमी के प्रभाव में आने पर भूसी की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ता है जिससे बाजार भाव भी कम हो जाता है।”

80 फीसदी बाजार पर है भारत का कब्जा

ईसबगोल एक मेडिसिनल प्लांट है। इसके बीज तमाम तरह की आयुर्वेदिक और एलोपैथिक दवाओं में इस्तमाल होता है। विश्व के कुल उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत केवल भारत में ही पैदा होता है।

तीन से चार माह में पक जाती है फसल

भारत में करीब तीन तरह की ईसबगोल पैदा की जाती है। इस व्यवसाय से जुड़े विशेषज्ञ बताते हैं की हरियाणा-2 किस्म की ईसबगोल की फसल 9 दिन से लेकर 115 दिनों के अंदर ही पक कर तैयार हो जाती है जिसके बाद इस फसल को काटकर इसके बीजों को अलग कर लिया जाता है तथा बाजार में बेच दिया जाता है।

एक हेक्टेयर में ढाई लाख रुपए तक की हो जाती है कमाई

अगर हम एक हेक्टेयर खेती के आधार पर ही अनुमान लगाएं तो एक हेक्टेयर मैं ईसबगोल की फसल से लगभग 15 क्विंटल बीज प्राप्त होते हैं और अगर मंडी में इसके ताजा दामों को पता करें तो इस समय लगभग 12,500 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है। इस प्रकार से देखा जाए तो केवल बीज ही 1,90,000 रुपए के होते हैं। इसके अलावा सर्दियों में ईसबगोल के दाम बढ़ जाते हैं जिससे आमदनी और ज्यादा हो जाती है।

प्रोसेसिंग के बाद मिलते हैं जबरदस्त फायदे

अगर ईसबगोल के बीजों को प्रोसेस कराया जाए तो और ज्यादा फायदा होता है। हकीकत में प्रोसेस होने के बाद ईसबगोल के बीजों में से लगभग 30 प्रतिशत भूसी निकलती है और यही ईसबगोल की भूसी इसका सबसे महंगा हिस्सा माना जाता है।

भारत के थोक बाजार में इस भूसी का रेट करीब 25,000 प्रति क्विंटल माना जाता है। यानी कि एक हेक्टेयर में पैदा हुई फसल की भूसी का दाम 1.25 लाख पर बैठता है। इसके अलावा ईसबगोल की खेती में से भूसी निकलने के बाद खली, गोली आदि अन्य उत्पाद बचते हैं जो करीब डेढ़ लाख रुपए तक में बिक जाते हैं।

ईसबगोल की खेती करने का तरीका

जलवायु – फसल की अच्छी पैदावार के लिए ठंडा व शुष्क वातावरण तथा पकाव के समय शुष्क मौसम की आवश्यकता रहती है। पकाव के समय वर्षा होने पर बीज झड़ जाता हैतथा छिलका फूल जाता है, इससे बीज की गुणवत्ता व पैदावार दोनों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

भूमि – ईसबगोल की खेती केलिए हल्की दोमट मिट्टी, बलुई मिट्टी जिसमें पानी का निकास अच्छा हो उपयुक्त रहती है। चिकनी हल्की काली व ज्यादा काली मिट्टी जिसमें पानी का निकास अच्छा हो वो भी उपयुक्त रहती है।

भूमि की तैयारी – दो या तीन बार हैरो या देसी हल से जुताई करें। मिट्टी को भुरभुरा बनाकर सुहागा लगा दें। खेत को समतल करें ताकि कहीं भी पानी न खड़ा रह सके।

बिजाई का समय – यह रबी मौसम की फसल है तथा इसकी बिजाई का उपयुक्त समय अक्टूबर से नवंबर माह होता है।

बिजाई का तरीका व बीज की मात्रा – बीज को अच्छी नमी वाले खेत में 1.5 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से छिडक़कर उर्वरक के रूप में हल्का सुहागा का प्रयोग किया जाता है। इसको 22.5 सेमी. यानि 9 इंच के फासले पर लाइनों में भी बोया जाता है। बीज एक से दो सेंटीमीटर से अधिक गहरा नहीं गिरना चाहिए। तीन किलोग्राम बीज प्रति एकड़ में बिजाई के लिए काफी है।

खाद – 18 किलोग्राम नाइट्रोजन व 6 किलोग्राम फासफोरस प्रति एकड़ में पर्याप्त रहता है। नाइट्रोजन दो भागो में डालना चाहिए। प्रथम खेत की तैयारी के समय, दूसरा पहली सिंचाई के बाद। संपूर्ण फासफोरस बिजाई से पहले ही मिट्टी में मिला दें।

सिंचाई – बीज के जमाव के लिए पर्याप्त नमी का होना अत्यंत जरूरी है। अच्छा जमाव पर प्रथम सिंचाई 25-30 दिन बाद करें तथा उसके बाद दो बार सिंचाई क्रमश: एक महीने की अवधि पर करें। इस फसल में तीन बार सिंचाई पर्याप्त रहती है।

निराई व गुड़ाई – फसल की धीमी बढ़वार व कम ऊंचाई होने के कारण प्रारंभिक अवस्था में दो-तीन गुड़ाई अवश्य करें ताकि खरपतवार फसल को नुकसान न पहुंचा सकें।

पौध संरक्षण – कभी कभी जोगिया रोग मतलब डाऊनी मिल्ड्रयू फसल को नुकसान पहुंचा देता है। इसकी रोकथाम के लिए थायरम या सेरेंसान तीन ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करके बिजाई करनी चाहिए। बीमारी आने पर डाईथेन एम 45 या रेडोमिल का 0.2 प्रतिशत का घोल बनाकर 2 से 3 बार 15 दिन के अंतर पर छिडक़ें।

तीन से चार माह में तैयार हो जाती है फसल – ईसबगोल की फसल 100 से 120 दिन में पककर तैयार हो जाती है। पकने पर पत्ते पीले पड़ जाते हैं तथा सिरे भूरे रंग के हो जाते हैं। सिरों को अंगूठे व अंगुलियों से दबाने से बीज बाहर आ जाता है। अच्छी फसल से औसत पैदावार 4 से 5 क्विंटल तक ली जा सकती है।

ईसबगोल की उन्नत किस्में

जवाहर ईसबगोल 4 – यह प्रजाति 1996 में औषधीय एवं सुगन्धित पौध की अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत कैलाश नाथ काटजू उद्यानिकी महाविद्यालय , मंदसौर (राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय,ग्वालियर) द्वारा म.प्र. के लिए अनुमोदित एवं जारी की गई है। इसका उत्पादन 13-15 क्विंटल प्रति हेक्टयर लिया जा सकता है।

गुजरात ईसबगोल 2 – यह प्रजाति 1983 में अखिल भारतीय समन्वित औषधीय एवं सुगन्धित पौध परियोजना, आणंद, गुजरात से विकसित की गई हैं। इसका उत्पादन 9-10 क्विंटल प्रति हेक्टयर लिया जा सकता है।

हरियाणा ईसबगोल 5 – यह प्रजाति अखिल भारतीय समन्वित औषधीय एवं सुगन्धित पौध परियोजना, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा 1989 में निकाली गई हैं। इसका उत्पादन 10-12 क्विंटल प्रति हेक्टयर लिया जा सकता है।

अन्य किस्मों में गुजरात ईसबगोल 1, हरियाणा ईसबगोल-2, निहारिका, ट्राबे सलेक्शन 1 से 10 आदि का चयन कर बुवाई की जा सकती है।

विदेशों में है इसकी भारी मांग

वर्तमान में हमारे देश से प्रतिवर्ष 120 करोड़ के मूल्य का ईसबगोल निर्यात हो रहा है। विश्व में ईसबगोल का सबसे बड़ा उपभोक्ता अमेरिका है। विश्व में इसके प्रमुख उत्पादक देश ईरान, ईराक, अरब अमीरात, भारत, फिलीपीन्स इत्यादि हैं। भारत का स्थान ईसबगोल उत्पादन एवं क्षेत्रफल में प्रथम है।

सिंगापुर से लौटकर शुरू किया बिजनेस, नए आइडिया से हो रही करोड़ों की कमाई

अखबार में एक खबर पढ़कर क्या कोई अपना 30 साल का सुनहरा कैरियर छोड़ सकता है। हां एक इंडियन ने ऐसा ही किया। इस शख्स ने सिंगापुर से भारत के सफर के दौरान एक खबर पढ़ने के बाद सिंगापुर के एक शख्स ने अपना 30 साल का सुनहरा करियर छोड़ दिया और भारत आकर 20 एकड़ के फार्म में डेयरी चलाने लगा।

इस शख्स का नाम है दीपक गुप्ता, जो पंजाब के नाभा में सफलता से हिमालय क्रीमी नाम से डेयरी फार्म चला रहे हैं, जो सालाना करोड़ों रुपए की कमाई कर रही है। इस डेयरी में कई खासियतें भी हैं।

चंडीगढ़ से की थी पढ़ाई

दीपक गुप्ता फिलहाल अपने इस नए कैरियर से काफी खुश हैं। दीपक ने 30 साल सिंगापुर में मल्‍टीनेशनल कंपनी में बिताए, लेकिन देश से जुड़ने की इच्‍छा हरदम बनी रही। उन्‍होंने अपनी पढ़ाई चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज से पूरी की थी और फिर कैरियर बनाने के लिए सिंगापुर चले गए। हालांकि उनके मन में हरदम से था कि एक हाईटेक डेयरी खोली जाए।

सिंगापुर से आते जाते मिला आइडिया

उन्‍होंने बताया कि बिना हाथ लगाए दूध की पैकिंग का आइडिया उन्‍हें सिंगापुर से भारत के सफर के दौरान मिला था। उन्‍होंने बताया कि वह अक्‍सर भारत में अखबारों में मिलावटी दूध के बारे में पढ़ते थे, तभी उनके मन में कुछ नया करने की बात आई।

नौकरी छोड़कर पूरा किया सपना

दीपक दो साल पहले सिंगापुर से लौटे और अपने सपने का पूरा करने में जुट गए। इन दो साल में उन्‍होंने मेहनत की और अब सपना पूरा हो गया है। उन्‍होंने पंजाब में नाभा में हिमालया क्रीमी के नाम से डेयरी की स्थापना की है। नाभा चंडीगढ़ से दो घंटे की ड्राइव पर है। उनके अनुसार उनका सपना भारत में ऐसी डेयरी स्‍थापित करना था, जो बिना हाथ लगाए दूध को पैक करे, जिससे उसकी शुद्धता बनी रहे।

विदेश का करियर छोड़ने का पछतावा नहीं

54 साल के दीपक को कहना है कि उनको अपने विदेश के शानदार कैरियर को छोड़ने का बिल्‍कुल भी पछतावा नहीं है। उन्‍होंने अपनी 20 एकड़ जमीन पर डेयरी तैयार की और जर्सी सहित अच्‍छी नस्‍ल की गायों को यहां पर पाला।

इस वक्‍त इनकी डेयरी में करीब 200 गाय हैं,‍ जिनका दूध मशीनों से निकाला जाता है। उनके अनुसार इस डेयरी में दूध को बिना हाथ लगाए पैक किया जाता है। इससे दूध की शुद्धता बनी रहती है।

प्‍योर दूध उपलब्‍ध कराना ध्‍येय

उनके अनुसार उनका सपना लोगों को प्‍योर दूध उपलब्‍ध कराना था। उनके अनुसार विदेश में बिना हाथ लगाए सामान को डेयरी पर पैक करने का सिस्‍टम आम है, लेकिन भारत में ऐसा नहीं होता है। उन्‍होंने ही यहां इसकी शुरुआत की।

विदेश का अनुभव काम आया

उन्‍होंने बताया कि विदेश में वह ऐसी मल्‍टीनेशनल कंपनी में काम करते थे जो एग्रीकल्‍चर के कारोबार से जुड़ी हुई थी। उनका इस कंपनी में काम करने का अनुभव काम आया। इसके बाद उन्‍होंने सीधे फार्म से पैक दूध लोगों को उपलब्‍ध कराने की योजना पर काम किया और सफलता पाई।

सवाई घास उगाकर करें 1.20 लाख तक की कमाई, सरकार दे रही सब्सिडी

खादी एवं विलेज इंडस्‍ट्री कमीशन लोगों को सवाई घास उगाने और फाइबर बैन (प्‍लाई यार्न) मेकिंग यूनिट लगाने के लिए प्रेरित कर रहा है। इसके लिए कमीशन द्वारा सब्सिडी तक दी जा रही है।ऐसे में, यदि आपके पास जमीन है या आप जमीन किराये पर ले सकते हैं तो आप एक अच्‍छा खासा बिजनेस शुरू कर सकते हैं। इसके लिए केवीआईसी द्वारा लोन दिया जाता है और लोन पर सब्सिडी दी जाती है।

आज हम आपको बताएंगे कि कैसे आप यह बिजनेस शुरू कर सकते हैं। सबसे पहले जानिए, सवाई घास क्‍या होती है?

क्‍या है सवाई घास

सवाई घास उन इलाकों में उगती है, जहां का सालाना रैन फाल 30 से 60 इंच होती है। यह घास मिट्टी के क्षरण को रोकती है। इस घास को नवंबर में काटा जाता है, जब यह काफी लम्‍बी हो जाती है।

इस घास का इस्‍तेमाल रस्‍सी बनाने के लिए होता है। रस्‍सी इतनी मजबूत होती है कि इससे झूला और पुल तक बनाए जाते हैं। इसके अलावा इससे मेट, सोल, अपर्स के अलावा कई तरह की सजावटी और दैनिक रोजमर्रा की चीजें बनती हैं।

क्‍या है प्रोजेक्‍ट कॉस्‍ट

खादी एंड विलेज इंडस्‍ट्रीज कमीशन द्वारा ग्रामोद्योग रोजगार योजना के लिए तैयार किए प्रोजेक्‍ट प्रोफाइल के मुताबिक, आपके इस प्रोजेक्‍ट की कॉस्‍ट लगभग 80 हजार रुपए है। अगर आपके पास जमीन है तो आप मात्र 250 वर्ग फुट का कच्‍चा शेड बना सकते हैं।

इसके अलावा आपको बैन मेकिंग मशीन, हैमर और टूल्‍स लेने होंगे। इस पर लगभग 45 हजार रुपए खर्च होंगे, जबकि एक महीने की वर्किंग कैपिटल 35000 रुपए होगी। यानी कि प्रोजेक्‍ट कॉस्‍ट 80 हजार रुपए होगी।

कितना मिलेगा लोन

अगर आप इस प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट के आधार पर प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत लोन के लिए अप्‍लाई करते हैं तो आपको लगभग 72 हजार रुपए का लोन मिल सकता है।

यानी कि आपको केवल 10 फीसदी यानी 8000 रुपए लगाने होंगे। इस पर आपको 15 से 25 फीसदी तक सब्सिडी मिल जाएगी।

क्‍या होगी कमाई

खादी विलेज इंडस्‍ट्री कमीशन द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट के मुताबिक, आपका कुल कॉस्‍ट ऑफ प्रोडक्‍शन लगभग 1 लाख 78 हजार रुपए आएगा और अगर आपके द्वारा उगाई गई घास पूरी बिक जाती है तो आपकी प्रोजेक्‍टेड सेल्‍स 3 लाख रुपए होगी। यानी कि आपका ग्रोस सरप्‍लस 1 लाख 21 हजार रहेगी और आपकी नेक्‍ट इनकम 1 लाख 18 हजार रुपए हो सकती है।