अगले 48 घंटे में इन 10 राज्यों में भारी बारिश की चेतावनी, 6 राज्यों में अलर्ट

13 जुलाई यानी शुक्रवार को इंतजार के बाद दिल्ली-एनसीआर और लखनऊ में अच्छी बारिश से मौसम सुहाना हो गया है। IMD की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, अगले 24 घंटों में दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत के कुछ राज्यों में अच्छी बारिश होने के संकेत हैं।

वहीं मौसम विभाग ने अगले 48 घंटों में देशभर के 10 राज्यों में भारी बारिश की चेतावनी दी है। वहीं, 6 राज्यों के अलग-अलग इलाकों में अलर्ट भी जारी किया है।

13 से 14 जुलाई को कैसा रहेगा मानसून

  • 13 से 14 जुलाई के दौरान गुजरात, कोंकण और गोवा में भारी से बहुत भारी बारिश का अनुमान है।
  • उत्तराखंड, पूर्वी राजस्थान, पूर्वी मध्‍य प्रदेश, छत्तीसगढ़, सौराष्‍ट्र, महाराष्‍ट्र, तेलंगाना, कोस्टल कर्नाटक और केरल में भारी से भारी बारिश हो सकती है।
  • हिमांचल, दिल्ली, एनसीआर, चंडीगढ़, पंजरब, हरियाणा और ओडिशा में इन 24 घंटों में अच्छी बारिश होने का अनुमान है।

14 से 15 जुलाई को कैसा रहेगा मानसून

  • 14 से 15 जुलाई के दौरान भी गुजरात, कोंकण और गोवा में भारी से बहुत भारी बारिश का अनुमान है।
  • 14 से 15 जुलाई के दौरान पूर्वी मध्‍य प्रदेश, छत्तीसगढ़, सौराट्र, कच्छ, मध्‍य महाराष्‍ट्र, कोस्टल कनाटक, इंटीरियर कर्नाटक और केरल में भारी से भारी बारिश का अनुमान है।
  • वहीं, उत्तराखंड, ओडिशा, पश्चिमी मध्‍य प्रदेश, विदर्भ और तेलंगाना में भारी बारिश हो सकती है।

इन राज्यों में अलर्ट

मौसम विभाग की वेबसाइट के अनुसार उत्तराखंड, मध्‍य प्रदेश, पूर्वी व उत्तरी गुजरात, केरल, महाराष्‍ट्र, केरल और तेलंगाना में भारी बारिश को लेकर ऑरेंज या रेड अलर्ट जारी किया गया है।

कैंसर व एड्स से लड़ेगा हरियाणा कृषि विवि का उगाया खास शिटाके मशरुम

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (एचएयू) के विशेषज्ञों ने मशरूम की प्रजाति उगाई है जाे कैंसर और एड्स जैैसे भयानक रोगों से लड़ेगा। एचएयू के विशेषज्ञों के साथ मिलकर हरियाणा के किसानों ने इस शिटाके मशरूम का सस्ता उत्पादन शुरू किया है।

यह मशरूम कैंसर की दवा लैंटाइनन का मुख्य स्रोत है। शिटाके रिच एंटीऑक्सीडेंट का स्रोत होने के कारण शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है, जिससे एड्स व कैंसर जैसी बीमारियों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

एचएयू के विज्ञानियों ने इस मशरूम के उत्पादन की सस्ती और आसान तकनीक ईजाद की है ताकि कम आय वाले किसान भी इसका उत्पादन कर न सिर्फ अच्छी कमाई कर सकें और स्वस्थ भारत मुहिम में भी हिस्सेदार बनें। एचएयू के प्रमुख विज्ञानी डॉ. सुरजीत सिंह ने बताया कि आम तौर पर छह से नौ माह में तैयार होने वाले इस शिटाके मशरूम को एचएयू के विज्ञानियों ने महज 90 दिनों में इसके उत्पादन का तरीका ईजाद किया है।

बता दें कि दिल्ली व अन्य बड़े शहरों में इस रोग प्रतिरोधक मशरूम की काफी डिमांड है। फिलहाल शिटाके मशरूम की मांग को कुछ हद तक हिमाचल प्रदेश पूरा कर रहा है। हिमाचल के किसान करीब दो हजार रुपये किलो के दाम में इसे बेचते हैं और इससे यह मध्य वर्ग की पहुंच से दूर हो जाता है।

इस प्रकार उगा सकते हैं यह खास मशरूम

  • इस मशरूम को एक झोपड़ी में भी उगाया जा सकता है। जिस स्थान पर यह मशरूम लगाना है उस कमरे की नमी 90 फीसद होनी चाहिए। इसके लिए कमरे में पानी का छिड़काव किया जा सकता है।
  • सबसे पहले लकड़ी के बुरादे को एक लिफाफे में एकत्रित करना है। उसके बाद आटो क्लेव मशीन से 121 डिग्री तापमान देकर इस बुरादे को रोगाणु रहित किया जाता है। एक घंटे तक इस बुरादे को गर्मी दी जाती है।
  • इसके बाद इस बुरादे को ठंडा करके इसमें शिटाके मशरूम का बीज लगाया जाता है। बीज लगाने के बाद नमी का विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए। 70 से 90 दिन में यह मशरूम तैयार हो जाती है। शिटाके मशरूम का बीज एचएयू में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। विशेषज्ञों की मानें तो एक किलो मशरूम का उत्पादन लागत करीब 150 रुपये आएगी।

मार्केट में आसानी से उपलब्ध है ऑटो क्लेव मशीन

ऑटो क्लेव मशीन मार्केट में आसानी से मिल जाती है। इसकी छोटी मशीन की कीमत डेढ़ लाख से शुरू है। इसी मशीन के जरिये लकड़ी के बुरादे को रोगाणु रहित किया जाता है। यह प्रेशर कुकर की तरह काम करती है।

सर्दी में उगा सकते हैं किसान

डॉ. सुरजीत सिंह ने बताया कि आमतौर पर यह मशरूम ठंडे इलाकों में पैदा होती है। हरियाणा के किसान सर्दियों में इसे लगा सकते हैं। दिसंबर में इसकी खेती शुरू करें तो मार्च तक यह तैयार हो जाती है। अभी बाजार में मशरूम की जो प्रजातियां मौजूद हैं उनकी लागत इस मशरूम से अधिक है।

खेत नहीं, छत पर फसल उगाते दिल्ली के किसान

उत्तरी दिल्ली में स्थित तिब्बती रिफ्यूजी कॉलोनी के पीछे यमुना नदी के किनारे पिछले तीस साल से खेती करने वाले संतोष कहते हैं कि जमीन पर खेती करने के मुकाबले छत पर खेती करना ज्यादा आसान और कम मेहनत वाला है. वह संतोष खेती के परंपरागत तरीके से आगे वैकल्पिक खेती के कौशल प्राप्त कर उत्साहित हैं.

छत पर खेती का विचार अजीब लगता है लेकिन दिल्ली में कई इमारतों की छतों पर इस तरह की खेती हो रही है. अंबेडकर यूनिवर्सिटी में फेलो इन एक्शन रिसर्च, सेंटर फॉर डेवलेपमेंट प्रैक्टिस के निशांत चौधरी के दिमाग में दिल्ली के ऐसे किसानों की मदद करने का ख्याल आया, जिनकी जमीन पर दूषित पानी से खेती होती है और उस पर दिल्ली विकास प्राधिकरण गाहे-बगाहे कार्रवाई करता है. दिल्ली में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने यमुना किनारे खेती और कृषि से जुड़ी अन्य गतिविधियों पर रोक लगा रखी है.

निशांत चौधरी ने डॉयचे वेले को बताया, “दिल्ली में जो किसान यमुना किनारे खेती करते हैं उन पर दिल्ली विकास प्राधिकरण की कार्रवाई का खतरा मंडराता रहता है, क्योंकि यमुना किनारे की जमीन पर केंद्र सरकार दावा करती है.” इसीलिए उन्होंने सोचा, क्यों ना विस्थापित होने वाले किसानों के लिए ऐसा मॉडल तैयार किया जाए जिससे उनकी आजीविका चलती रहे और वे आर्थिक तौर पर कमजोर होने से बचे.

कोकोपीट से खेती

निशांत बताते हैं, “मैंने जमीन की बजाय छत पर खेती के उपायों के बारे में सोचा और रिसर्च के बाद किसानों के साथ मिलकर मॉडल तैयार किया. मैंने इसका नाम क्यारी रखा. ” यह एक तरह का बस्ता होता है जो बहुत ही मजबूत मैटेरियल से बना होता है.

इसमें में नारियल का खोल (सूखा छिलका) मुख्य तौर पर डाला जाता है. छत पर ज्यादा वजन ना पड़े और पानी रिसने की समस्या ना हो इसके लिए मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता है. इस बस्ते में नारियल के खोल के अलावा कुछ मिश्रण और मिलाया जाता है जिससे फसल तेजी से और गुणवत्ता के साथ होती है.

इस खास बस्ते में नारियल के खोल के अलावा कई तरह के जैविक चीजें पड़ती हैं. नारियल का खोल मिट्टी के मुकाबले 10 से 15 गुणा ज्यादा हल्का होता है. इस मिश्रण में 12 और चीजें पड़ती हैं जिसे निशांत ने किसानों की मदद से तैयार किया है.

निशांत कृषि उत्पादों की मात्रा के मुकाबले गुणवत्ता पर ज्यादा जोर देते हैं. वह कहते हैं, “हम क्वालिटी का खास ध्यान रखते हैं. इन क्यारियों में केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता है. हम केमिकल की जगह पारंपरिक कीटनाशक का इस्तेमाल करते हैं जैसे छाछ, नींबू, मिर्ची वगैरह, जो घर पर आसानी से पाई जाती है. इस कारण सब्जी की गुणवत्ता उच्चतम होती है.”

बिना मिट्टी और कम पानी से खेती

निशांत ने रिसर्च कर ऐसा मॉडल तैयार किया जिसमें मिट्टी की खपत नहीं होती और पानी भी कम से कम लगता है. निशांत बताते हैं कि उन्हें इस मॉडल की प्रेरणा केरल से मिली. छत पर खेती करने के लिए निशांत ने ऐसी क्यारी बनाई है जो वॉटर प्रूफ होती है और उससे पानी का छत पर टपकने का खतरा नहीं रहता है.

हर क्यारी में नारियल का खोल, कंपोस्ट और कुछ खास तरह की सामग्री डाली जाती है जिससे फसल अच्छी होती है. नारियल के खोल की वजह से छत पर इस खास बस्ते का वजन नहीं पड़ता है, साथ ही इस बस्ते में पानी भी कम लगता है.

उदाहरण के तौर पर चार फीट के एक बस्ते में गर्मियों के दिनों में 5 लीटर पानी दिन में दो बार लगता है जबकि सर्दियों में दो दिन में एक बार 5 लीटर पानी से काम चल जाता है. जैविक पदार्थ होने की वजह से मेहनत भी कम लगता है.

क्यारी बनाने की ट्रेनिंग लेने वाले और उस पर काम करने वाले किसान संतोष बताते हैं, “इस क्यारी की खास बात ये है कि इसमें गैरजरूरी चीजें नहीं होती, चाहे घास हो या जंगली पेड़, ये काफी हल्का होता जिससे बार-बार खुदाई की जरूरत नहीं होती. जब हम जमीन पर खेती करते हैं तो उसमें मेहनत कई गुना ज्यादा लगती है, पानी का इस्तेमाल भी ज्यादा होता है लेकिन मुझे लगता है कि भविष्य में हमें इस तरह की खेती पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए.”

विदेशों में ऐसे होती है अफीम की खेती ,कंबाइन से कटवाते है फसल

अफीम की खेती करना भारत में गैर क़ानूनी है ।लेकिन मध्य प्रदेश ,राजस्थान और भारत के और कुश राज्यों में इसकी खेती के लिए सरकारी लाइसेंस मिलते है । इस अफीम को दवाई बनाने वाली कंपनी द्वारा इस्तेमाल क्या जाता है । दुनिआ में सबसे ज्यादा अफीम अफगानिस्तान में पैदा की जाती है  । यहाँ पर दुन्या की 90 % अफीम पैदा की जाती है ।अफीम की तासीर बहुत गर्म होती है | इसका अधिक सेवन करने से व्यक्ति का रंग सावंला हो जाता है |

लेकिन अफीम की खेती को चाहे भारत में हो या फिर अफगानिस्तान में अभी भी हजारों साल पुराने तरिके से इसकी खेती की जाती है ।जैसा की हम जानते है की अफीम हमे पोस्त के पौधे से प्राप्त होता है | पोस्त फूल देने वाला एक पौधा होता है | इसमें पहले फूल बनता है और फिर डोडा |भारत के किसान डोडा को चीरा लगा कर अफीम प्राप्त करते है |

लेकिन बहुत से देश ऐसे है जहाँ इसकी खेती बिलकुल नए तरिके से की जाती है ।नीदरलैंड में इसकी खेती बाकी फसलों की तरह ही की जाती है ।जैसे आम फसल बोई जाती है वैसे ही अफीम की फसल बोई जाती है और फिर पोस्त के डोडे को कंबाइन के साथ काट लिए जाता है ।

विदेशो में अफीम की खेती कैसे होती है इसके लिए ये निचे दी हुई वीडियो देखें

आ गया यूरिया कैप्सूल, अब नहीं रहेगी धान में बार बार यूरिया डालने की जरूरत

धान की फसल में यूरिया खाद का इस्तेमाल कम से कम हो, इस तकनीक पर जिला कृषि विज्ञान केद्र के वैज्ञानिक पिछले दो साल से काम कर रहे हैं। यहां के कृषि वैज्ञानिक धान की खेती में यूरिया खाद की जगह यूरिया बैक्वेट नामक कैप्सूल खाद से खेती करने की प्रयोग कर रहे हैं। इसकी खासियत यह है कि फसल में दो- से तीन बार डालने की जरूरत नहीं है।

एक ही बार डालने के बाद फसल तैयार होते तक दोबारा डालना नहीं पड़ता। दूसरा फसल में जल्दी बीमारी नहीं लगती, जिससे बार-बार खाद डालने से बचत और दवाई का खर्च भी आधा हो जाता है। कृषि वैज्ञानिकों का दावा है कि इस तकनीक से खेती करने पर लागत से 20% तक कमी लाई जा सकती है। कृषि विज्ञान केंद्र जांजगीर के प्रभारी और मिट्टी वैज्ञानिक डॉ. केडी महंत यह नवाचार कर रहे हैं।

एक बार कर चुके हैं प्रयोग

पहली बार एक एकड़ की खेती में इसका प्रयोग केवीके में किया जा चुका है जो सफल रहा। इस खरीफ सीजन में फिर से 5 एकड़ में इस तकनीक से खेती करने की तैयारी हो चुकी है। अगले साल और बड़े क्षेत्र में किसानों के खेत में इसकी प्रदर्शनी लगाई जाएगी ताकि जिले के किसानों को इससे जोड़ा जा सके।

जिले में लिए यह क्यों जरूरी

नहरों से 92 % सिंचित होने से किसान धान की ही फसल ले रहे हैं। 60% किसान स्वर्णा धान ही लगाते हैं। यह 140 दिन की लंबी अवधि वाली फसल है जिससे खेत में पानी रखना पड़ता है। पानी और खाद के इस्तेमाल से मिट्टी अम्लीय हो चुकी है । केवीके के वैज्ञानिक मिट्टी की उर्वरा शक्ति बचाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

100 किलो यूरिया खाद डालने पर 46% नाइट्रोजन ही मिलता है फसल को

कृषि विज्ञान केंद्र जांजगीर में यूरिया बैक्वेट कैप्सूल खाद

क्या है यूरिया बैक्वेट

यूरिया बैक्वेट कैप्सूल को यूरिया खाद और कुछ कैमिकल्स से बनाया है पर यूरिया की तुलना में यह 80% अधिक घुलनशील है और जड़ों में चला जाता है और असर फसल तैयार होने तक रहता है। जबकि सामान्य यूरिया खाद खेत में डालते के बाद तीन प्रकार से नष्ट हो जाता है। लिचिंग यानी पानी में बह जाने, उड़ जाने और ठोस होने से। आधा ही खाद पौधों को मिलता है।

कृषि विज्ञान केंद्र जांजगीर के प्रभारी और मिट्टी वैज्ञानिक डॉ. केडी महंत ने बताया कि धान की फसल के लिए नाइट्रोजन सबसे जरूरी पोषक तत्व है। इसकी पूर्ति यूरिया खाद से होती है, लेकिन 100 किलो यूरिया खाद डालने पर मात्र 46% नाइट्रोजन ही मिलता है, किसान को तीन से चार बार तक यूरिया डालना पड़ता है।

यूरिया बैक्वेट से किसान को दो फायदे

20 फीसदी पैसे की बचत

इससे किसान को अधिक खाद खरीदना नहीं पड़ेगा। कृषि वैज्ञानिक अभी दावा कर रहे हैं कि इससे किसान को खाद और दवा में खर्च होने वाले राशि में 20 फीसदी तक ही बचत हो सकती है। एक किलो यूरिया बैक्वेट कैप्सूल में डेढ़ रुपए में तैयार हो जाता है जिससे यह किसानों को अभी मिलने वाले यूरिया खाद की कीमत में ही मिलेगा।

कतार बोनी 

केडी महंत ने बताया कि चार पौधों में बीच में यूरिया बैक्वेट का एक कैप्सूल डाल दिया जाता है। इसके लिए कतार बोनी करनी होती है। धान की फसल लगाने से हफ्ते दिन से 15 दिन के बीच ही यह काम करना होता है। इसके बाद फसल तैयार होने तक यूरिया देने की जरूरत नहीं होती। पिछले साल एक एकड़ में किए प्रयोग में उत्पादन में कहीं कोई कमी नहीं आई। कतार बोनी से किसी प्रकार की बीमारी भी नहीं लगी थी।

जैविक खेती या उत्पाद का प्रमाणपत्र लेने का तरीका, ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट देने वाली एजेंसियां के नाम और नंबर भी जानिए

कैसे जाने की कोई जैविक खाद या कीटनाशक पूर्णता जैविक है और उसकी सत्यता कितनी सत्य है। ऐसे में जैविक खेती के मापदंडों को लागू करवाने के लिए हमारी केंद्र सरकार का विभाग केंद्रीय आयात निर्यात नियंत्रण बोर्ड एपीडा इसके लिए सक्षम एजेंसी है और एपीडा ने भारत भर में 30 एजेंसियों को इसके लिए नियुक्त किया हुआ है।

किसी भी खाद्य पदार्थ या फर्टिलाइजर या कीटनाशी के जैविक होने के लिए इन 30 संस्थाओं में से किसी एक से सर्टिफिकेशन होना जरूरी है तभी उस उत्पाद को जैविक माना जाएगा तो कोई भी किसान भाई कोई भी खाद्य पदार्थ जैविक खाद जैविक कीटनाशक खरीदते समय उस पर इन 30 एजेंसियों में से किसी एक का नाम ,मोनो ,होलोग्राम जरूर देख मैंने मेरे फॉर्म कुशल मंगल जैविक फॉर्म करताज जिला नरसिंहपुर मध्य प्रदेश 487110 मोबाइल 94254 48313 का सर्टिफिकेशन MPSOCA से करवाया हुआ है हम इन सभी 30 एजेंसियों के नाम तथा लोगो आप सभी को बता रहे है।

जिसमें आपको सही जैविक उत्पाद पहचानने में मदद मिले सभी किसान भाइयों के पास हर एक-दो दिन में कोई ना कोई जैविक खाद का दावा करने वाला व्यक्ति पहुंचता है उससे यह जरूर पूछें कि आपका उत्पाद किस सर्टिफिकेशन एजेंसी से सर्टिफाइड है सर्टिफिकेशन और सर्टिफाइड को बेहतर तरीके से समझना बहुत जरूरी है उनकी लिस्ट आपके सामने प्रस्तुत है।

ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट देने वाली एजेंसियां

  • BUREAU VARITAS CERTIFICATION INDIA
  • ECOCERT
  • IMO CONTROL
  • INDOCERT
  • LACON QUALITY CERTIFICATION
  • ONECERT ASIA AGRI CERTIFICATION
  • SGS INDIA
  • CONTROL UNION CERTIFICATION
  • UTTARANCHAL STATE ORGANIC CERTIFICATION AGENCY
  • APOF ORGANIC CERTIFICATION AGENCY

  • RAJASTHAN ORGANIC CERTIFICATION AGENCY
  • VEDIC ORGANIC CERTIFICATION AGENCY
  • INDIAN SOCIETY FOR CERTIFICATION OF ORGANIC
  • PRODUCTS
  • FOODCERT INDIA
  • ADITI ORGANIC CERTIFICATIONS
  • CHHATTISGARH CERTIFICATION SOCIETY
  • TAMIL NADU ORGANIC CERTIFICATION DEPARTMENT
  • INTERTEK INDIA
  • MADHYA PRADESH STATE ORGANIC CERTIFICATION AGENCY

  • ODISHA STATE ORGANIC CERTIFICATION AGENCY
  • NATURAL ORGANIC CERTIFICATION AGRO
  • FAIRCERT CERTIFICATION SERVICES
  • GUJARAT ORGANIC PRODUCTS CERTIFICATION AGENCY
  • UTTAR PRADESH STATE ORGANIC CERTIFICATION AGENCY
  • KARNATAKA STATE ORGANIC CERTIFICATION AGENCY (KSOCA)
  • SIKKIM STATE ORGANIC CERTIFICATION AGENCY (SSOCA)
  • Global Certification Society
  • GREENCERT

बिओसॉलूशन्स साथ में दिए गए फोटो में सभी एजेंसियों के सक्षम अधिकारी के फोन नंबर ईमेल एड्रेस आदि दिए गए हैं आप उनसे भी बात करके प्रोडक्ट आदि की सत्यता की जांच कर सकते हैं ।

इस पोस्ट को डालने का उद्देश्य मात्र यह है कि किसानों को कदम कदम पर बेवकूफ बनाने के लिए गिरोह घूम रहे हैं यदि आप इस दिशा में काम कर रहे हैं तो पूरी जानकारी अपने पास अपने फोन आदि में हमेशा सुरक्षित रखें।

जिससे सही प्रोडक्ट आदि की तकदीर की जा सके, पहला जो प्रथम होलोग्राम है वह एपीडा का है आखरी में एक ही चित्र में जो छोटे-छोटे होलोग्राम बने हुए हैं वह कुछ देसी और कुछ विदेशी सर्टिफिकेशन एजेंसियों के होलोग्राम है जो कि भारत में भी काम कर रहे हैं जिनके प्रोडक्ट और सर्टिफिकेशन भारत में हमें देखने को मिलते हैं।

छत पर खेत बनाकर बस 19 हजार में उगाते हैं 700kg सब्ज़ियां

छत पर खेती का विचार अजीब लगता है, लेकिन दिल्ली समेत कई बड़े शहरों में आजकल इमारतों की छत पर इस तरह की खेती हो रही है. कुछ इसी तरह के आइडिया को आईआईटी ग्रेजुएट कौस्तुभ खरे और साहिल पारिख ने अपनाकर अपना बिजनेस शुरू किया है. उनकी कंपनी खेतीफाई सिर्फ 19 हजार रुपये में 200 वर्ग मीटर की छत को खेत बनाकर 700 किलोग्राम तक सब्जियां उगाती है. आइए जानें उनके बारे में…

बिना मिट्टी और कम पानी से खेती

इन दोनों ने ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसमें मिट्टी की खपत नहीं होती और पानी भी कम से कम लगता है. छत पर खेती करने के लिए ऐसी क्यारी बनाई है जो वॉटर प्रूफ होती है और उससे पानी का छत पर टपकने का खतरा नहीं रहता है.

जैविक सामग्री से लैस इन क्यारियों में भिंडी, टमाटर, बैंगन, मेथी, पालक, चौलाई, पोई साग और मिर्च उगता हैं. पानी मीठा होने की वजह से सब्जियां भी स्वादिष्ट होती हैं.

इसमें में नारियल का खोल (सूखा छिलका) मुख्य तौर पर डाला जाता है. छत पर ज्यादा वजन ना पड़े और पानी रिसने की समस्या ना हो इसके लिए मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता है. इस बस्ते में नारियल के खोल के अलावा कुछ मिश्रण और मिलाया जाता है, जिससे फसल तेजी से और गुणवत्ता के साथ होती है.

आप भी कर सकते हैं ऐसा

जिस तरह से खेती के लिए जमीन कम हो रही हैं, भविष्य में इन क्यारियों की मांग बढ़ेगी, 4 फीट गुणा 4 फीट की चार क्यारियों लगाने पर एक परिवार अपने महीने भर की जरूरत की सब्जी उगा सकता है. एक घंटा इन क्यारियों में समय लगाने से मन लायक सब्जी उगाई जा सकती है.

एक तरीका ये भी हैं

खेतों के घटने और ऑर्गनिक फूड प्रोडक्ट की मांग बढ़ने से अर्बन फार्मिंग में नई और कारगर तकनीकों का चलन बढ़ता जा रहा है. मांग पूरी करने के लिए कारोबारी और शहरी किसान छतों पर, पार्किंग में या फिर कहीं भी उपलब्ध सीमित जगह का इस्तेमाल पैदावार के लिए कर रहे हैं.

इन तकनीकों में फिलहाल जो तकनीक सबसे ज्यादा सफल है उसमें मिट्टी का इस्तेमाल ही नहीं होता. मिट्टी न होने से इसे छतों पर छोटी जगह में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है. ये तकनीक इतनी सफल है कि सही जानकारी, सही सलाह से लगभग 1 लाख रुपए के खर्च से से आप घर बैठे सालाना 2 लाख रुपए तक की सब्जियां उगा सकते हैं.

छत पर खेती

इस तकनीक को हाइड्रोपानिक्स कहा जाता है. इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें मिट्टी का इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं होता है. इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है.

क्या है हाइड्रपानिक्स तकनीक

हाइड्रपॉनिक्स तकनीक में सब्जियां बिना मिट्टी की मदद से उगाई जातीं हैं.इससे पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों को पानी के सहारे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है. पौधे एक मल्टी लेयर फ्रेम के सहारे टिके पाइप में उगते हैं और इनकी जड़े पाइप के अंदर पोषक तत्वों से भरे पानी में छोड़ दी जाती हैं.मिट्टी न होने की वजह से न छतों पर भार बढ़ता है. वहीं, बिल्कुल अलग सिस्टम होने की वजह से छत में कोई बदलाव भी नहीं करने पड़ते.

नई टेक्नोलॉजी

हाइड्रपानिक्स एक पौधों को उगाने का बिल्कुल नया तरीका है और इसे किसान या कारोबारी अलग अलग तरह से इस्तेमाल में ला सकते हैं. वहीं इस क्षेत्र में काम कर रही कई कंपनियां भी आपको शौकिया गार्डन से लेकर कमर्शियल फार्म तक स्थापित करने में मदद कर सकती हैं.

इस बारे में हाइड्रपानिक्स कंपनी ‘हमारी कृषि’ बताती हैं कि उपज के लिए तैयार फ्रेम और टावर गार्डेन ऑनलाइन बेच रही है.कंपनी के 2 मीटर ऊंचे टावर में 40 पौधे लगाने की जगह है. कंपनी के मुताबिक करीब 400 पौधे वाले 10 टावर की लागत 1 लाख के करीब है. इस कीमत में टावर, सिस्टम और जरूरी पोषक तत्व शामिल हैं.

कंपनी के मुताबिक अगर सिस्टम को सही ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो इसके बाद सिर्फ बीज और न्यूट्रिएंट का ही खर्च आता है. ये 10 टावर आपकी छत के 150 से 200 वर्ग फुट एरिया में आसानी से खड़े हो जाएंगे. छोटी जगह पर रखे फ्रेम को नेट शेड और बड़े स्तर पर खेती के लिए पॉली हाउस बनाकर ढकने से मौसम से सुरक्षा मिलती है.

कमाई का बड़ा मौका

  • कंपनी हमारी कृषि के मुताबिक, ये तकनीक लोगों को रोजगार देने का अच्छा जरिये हो सकती है, क्योंकि परंपरागत कृषि के मुकाबले इसके मार्जिन बेहतर हैं.
  • शर्मा के मुताबिक, एक पॉड से साल भर में 5 किलो लेटिस (सलाद पत्ता) की उपज मिल सकी है। ऐसे में 10 टावर यानि 400 पॉड से 2000 किलो सालाना तक उपज मिल सकती है. फिलहाल लेटिस की कीमत भारत में 180 रुपए किलो है, शर्मा के मुताबिक अगर थोक में 100 रुपए किलो भी मिलते हैं तो अच्छी कंडीशन में साल में 2 लाख रुपए की उपज संभव है.
  • वहीं उनके मुताबिक आम स्थितियों में आप आसानी से एक साल में अपना निवेश निकाल सकते हैं. अगले साल रिटर्न ज्यादा होगा क्योकिं आपको सिर्फ रखरखाव, बीज और न्यूट्रिएंट का खर्च ही करना है. यानी आप अपनी छत के सिर्फ 150 से 200 वर्ग फुट के इस्तेमाल से एक साल में ही अपना एक लाख का निवेश निकाल कर प्रॉफिट में आ सकते हैं.

नौकरी नहीं मिली तो शुरू की गुलाब की खेती, हर महीने 50 हजार रु कर रही इनकम, लोन लेकर शुरू किया बिजनेस

इजहार-ए-मोहब्बत का प्रतीक माना जाने वाला गुलाब अपनी विभिन्न रंगों और दिलकश खुशबू के चलते सबके दिलों पर राज करता है। बच्चे से लेकर बूढ़े तक इसके दीवाने हैं। Rose के प्रति दिनोंदिन बढ़ रहे लोगों के प्यार ने महाराष्ट्र के नागपुर के माणेवाडा की रहने वाली प्रणाली शेवाले को इसकी खेती के लिए आकर्षित किया। एग्रीकल्चर में डिप्लोमा करने बाद नौकरी नहीं मिली तो उसने गुलाब की खेती शुरू की और आज वह हर महीने इससे 50 हजार रुपए की इनकम कर रही हैं।

दो महीने की ली ट्रेनिंग

प्रणाली ने मनीभास्कर को बताया कि उन्होंने हॉर्टिकल्चर में डिप्लोमा किया है। डिप्लोमा करने के बाद नौकरी की तलाश की, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली। बचपन से गुलाब के प्रति प्यार के चलते उनको इसमें बिजनेस का मौका दिखा।

उन्होंने देखा कि बाजार में गुलाब की मांग काफी ज्यादा है। जन्मदिन, सालगिरह, वैलेंटाइन डे और मदर्स डे जैसे अवसर पर गुलाब के इस्तेमाल का चलन बढ़ा है। इसलिए उन्होंने नागपुर स्थित एग्री क्लिनिक एंड एग्री बिजनेस सेंटर्स से दो महीने की ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद प्रणाली पॉलीहाउस एंड फ्लोरिकल्चर की शुरुआत की।

13 लाख का लोन ले शुरू की गुलाब की खेती

ट्रेनिंग पूरी करने के बाद प्रणाली ने अपने पिता की मदद से एक एकड़ जमीन लीज पर लेकर गुलाब की खेती के लिए पॉलीहाउस का निर्माण किया। शुरुआत में उनके इस प्रोजेक्ट पर किसी बैंक को भरोसा नहीं होने की वजह से 6 महीने तक लोन मिलने का इंतजार किया।

छह महीने बाद बैंक ऑफ इंडिया से उन्हें 13 लाख रुपए का लोन लिया। 13 लाख का लोन और कुछ जमा पूंजी से 10,000 वर्ग फुट में पॉलीहाउस बनाकर टॉप सीक्रेट वैरायटी के साथ गुलाब की खेती शुरू की। इस प्रोजेक्ट पर उनको कुल 16 लाख रुपए का खर्च आया। उन्होंने नवंबर 2016 में प्रणाली पॉलीहाउस एंड फ्लोरिकल्चर की नींव रखी थी।

सब्सिडी मिलने का इंतजार

प्रणाली कहती हैं कि बैंक लोन पर उनको नाबार्ड से 44 फीसदी की सब्सिडी मिली थी। लेकिन डेढ़ साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद उनको अभी तक सब्सिडी नहीं मिली है। इसलिए लोन का इंटरेस्ट भरना भारी पड़ रहा है।

मंथली 50 हजार हो जाती है इनकम

प्रणाली के मुताबिक, गुलाब की खेती से वह हरेक महीने 50 हजार रुपए की कमाई कर लेती हैं। कभी-कभी कमाई कम भी होती है। पहली बार उनको गुलाब की खेती से 35 हजार रुपए का मुनाफा हुआ था।

बाइक में लगाई सीड ड्रिल मशीन : एक घंटे में कर रहे आधा एकड़ में बोवनी, खर्च सिर्फ 100 रुपए

नगर के एक किसान ने बाइक में शीड्रिल मशीन लगाई। इससे एक घंटे में आधा एकड़ में बोवनी हो रही है। ट्रैक्टर की अपेक्षा बोवनी में खर्च भी काफी कम है। किसान मोहन पाटीदार ने बताया बाइक में सीड ड्रिल मशीन लगाकर यह जुगाड़ तैयार की है।

इससे अब तक 10 एकड़ भूमि में बोवनी कर चुके हैं। एक घंटे में आधा एकड़ भूमि की बोवनी आसानी हो जाती है। जबकि एक घंटे में इस बाइक जुगाड़ में मात्र 100 रुपए का पेट्रोल खर्च होता है। वहीं आधा एकड़ भूमि की ट्रैक्टर से बोवनी करने में करीब 800 रुपए का खर्च आता है। इससे प्रति एकड़ बोवनी करने पर ट्रैक्टर की अपेक्षा 1400 रुपए कम खर्च आता है।

उन्होंने बताया इस बाइक मशीन को तैयार करने में 30 हजार रुपए का खर्च आया है। इससे मक्का, सोयाबीन, चना व गेहूं आदि की बोवनी आसानी से की जा सकती है। अब तक 10 एकड़ भूमि में मक्का की बोवनी कर चुके हैं।

हाइड्रोलिक सिस्टम है

इस जुगाड़ में हाइड्रोलिक सिस्टम भी है। इससे खेत से घर व घर से खेत ले जाते समय हाइड्रोलिक सिस्टम से सीड ड्रिल को जमीन से उठा सकते हैं, ताकि सड़क व खेत के अलावा अन्य स्थान पर बाइक चलाने में सीड ड्रिल जमीन से न टकराए। इसे 15 दिन में तैयार किया है।

रिवर्स गियर की है सुविधा

आम तौर पर बाइक में रिवर्स गियर की सुविधा नहीं होती है लेकिन इस जुगाड़ में रिवर्स गेर की भी सुविधा है। इससे बोवनी करने के दौरान खेत में इसे आसानी से रिवर्स किया जा सकता है। साथ ही बाइक मेंटेनेंस के बराबर ही इसके मेंटेनेंस का खर्च है। सीमित भूमि वाले किसान के लिए यह काफी उपयोगी है।

इस तरह करे धान में सरसों की खली का उपयोग, 7 क्विंटल उत्पादन में होगी बढ़ोतरी

सरसों का तेल निकालने के बाद जो अवशेष प्राप्त होता है उसको खली कहते हैं । इसका प्रयोग धान के साथ साथ अन्य फसलों में करने से काफी मात्रा में तत्वों के प्राप्त होने के साथ ही साथ मृदा में पनपने वाले हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करते हैं । फसल की आवश्यकतानुसार इनका प्रयोग करना चाहिए ।

धान में सरसों की खली का उपयोग बहुत फायदेमंद है। यह एक जैविक तरीका है जिसके साथ हम धान की उपज बढ़ा कर सकते हैं। इसके परिणाम धान के पौधे की ग्रोथ के लिए बहुत अच्छे हैं। 2006 में, बांग्लादेश विश्वविद्यालय ने धान में सरसों की खली के उपयोग के संबंधित एक ट्रायल लगाया था, जिसमें बहुत अच्छे परिणाम आये थे। परीक्षणों के बाद, धान उपज में प्रति हेक्टेयर 7 क्विंटल की पैदावार में बढ़ोतरी हुई थी।

रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है कि सरसों की खली के उपयोग से चावल के अनाज की मोटाई बड़ी है, धान की बाली की संख्या बड़ी है और अनाज के वजन में बढ़ोतरी हुई है। फसल की उत्पादन में भी बढ़ोतरी हुई है, धान उपज बढ़ने का कारण सरसों की खली में पाए गए छह मुख्य तत्व हैं। विशेष रूप से, नाइट्रोजन, पोटेशियम और फास्फोरस के साथ-साथ सल्फर, ज़िंक और ब्रोन भी पाए जाते हैं। इन तत्वों के लिए, हमें खेतों में यूरिया, डीएपी और अन्य की आवश्यकता होती है।

रिपोर्ट के अनुसार, एक एकड़ में 32 किलोग्राम खल का उपयोग किया गया था , लेकिन मिट्टी अच्छी होने के कारण, हम एक एकड़ में केवल 16 किलोग्राम का उपयोग कर सकते हैं।  मिटटी अच्छी नहीं है वहाँ 20 किलोग्राम उपयोग कर सकते हैं। धान में खली का उपयोग करने के दो तरीके हैं। पहली विधि ड्रम में लगातार 5-6 दिनों तक रखे और जब ये पानी मे घुल जाए तब इसे खेत मे पानी लगाते समय डाल दे। दूसरा तरीका है आप इसे सूखा ही खेत मे डाल सकते हैं। जब धान की फसल 15-20 दिन की होती है तो इसका उपयोग करने का सही समय होता है,