आप भी ऐसे कर सकते हैं चंदन की खेती, एक किलो लकड़ी की कीमत है 6000 रुपए

चंदन की खेती आपको शेयर मार्केट या मच्यूल फंड से भी ज्यादा इनकम दे सकती है वो भी गारंटी आैर बिना रिस्क के। इसके लिए कम से कम 20 साल जमीन बाउंड करके चलना पड़ेगा क्योंकि सागवान की तरह ही चंदन के पेड़ को तैयार होने में 15 से 20 साल लग जाते हैं।

कर्नाटक में तो इसके भरपूर जंगल हैं लेकिन धीरे-धीरे इसे आैर किसान भी उगाने लगे हैं। गुजरात के भरूच के एक किसान ने 10 लाख लगाकर चंदन की खेती स्टार्ट की थी। 15 से 20 साल में उसने 15 करोड़ की कमाई की थी।

यानी इस हिसाब से प्रति 1 लाख रु का इन्वेस्टमेंट करके 1.5 करोड़ रु का रिटर्न मिला। इसकी लकड़ी 6000 रुपए किलो तक बिक जाती है। आप भी चंदन की खेती कर लाखों-करोड़ों रुपए कमा सकते हैं। यह सामान्य तापमान में पैदा हो सकता है।

चंदन 6000 रुपए किलो बिकता है यानी आम लकड़ी से 15000% ज्यादा

खेती – नर्सरी से पौधे लाकर या फिर बीज डालकर चंदन की खेती की जा सकती है। चंदन का पेड़ लाल दोमट मिट्टी में अच्छा उगता है। यह चट्टानी मैदान, पथरीली मिट्टी में भी हो सकता हैं। गिली मिट्टी में इसकी ग्रोथ कम होती है।

बुवाई- मानसून में इसके पेड़ तेजी से ग्रोथ करते हैं, लेकिन गर्मियों में इन्हें इरीगेशन (सिंचाई) की जरूरत होती है।

सिंचाई – इसमें ड्रिप प्रॉसेस से इरीगेशन किया जाता है। चंदन के पेड़ को 5 से 50 डिग्री सेल्सियस टेम्प्रेचर वाले इलाके में लगाना सही माना जाता है। इसके लिए 7 से 8.5 पीएच वाली मिट्टी परफेक्ट होती है। यानी पंजाब में किसान इसकी खेती का एक्सपेरिमेंट कर सकते हैं। एक एकड़ में औसत 400 पेड़ लगाए जा सकते हैं।

एक पेड़ की जड़ से 3 लीटर तक निकलता है तेल

कितने समय में बढ़ते हैं पेड़-चंदन लगाने के बाद 5वें साल से लकड़ी रसदार बनना शुरू हो जाती है। 12 से 15 साल के बीच यह बिकने के लिए तैयार हो जाता है। चंदन के पेड़ की जड़ से सुगंधित प्रोडक्ट्स बनते हैं। इसलिए पेड़ को काटने के बजाए जड़ से ही उखाड़ा जाता है।

उखाड़ने के बाद इसे टुकड़ों में काटा जाता है। ऐसा करके रसदार लकड़ी को कर लिया जाता है। एवरेज कंडीशन में एक चंदन के पेड़ से करीब 40 किलो तक अच्छी लकड़ी निकल जाती है। चंदन के पेड़ में सबसे महंगी चीज इसका तेल होता है।

एक पेड़ की जड़ से करीब पौने 3 लीटर तक तेल निकलता है। चंदन की खेती को बढ़ावा देने के लिए कई प्रदेशों में यह प्रावधान किया गया है कि चंदन उगाने वाले किसान उसे काट सकेंगे लेकिन इसकी परमिशन लेनी जरूरी होगी।

इन्वेस्टमेंट – एक पौधा 40-50 रुपए में मिलता है। एक एकड़ में 400 पेड़ पर 20 हजार खर्च होंगे। चंदन के पेड़ों का इंश्योरेंस भी करवाया जाता है, क्योंकि इन पेड़ों के चोरी का डर होता है। आप खुद भी इसकी देखरेख कर सकते हैं। इन सबके अलावा सिंचाई पर भी खर्च करना होगा।

आ गया मोटरसाइकिल से चलने वाला स्प्रे पंप

जरूरत अविष्कार की जननी है, ये बात सभी मानते हैं। महाराष्ट्र में भी एक किसान की जरूरत ने एक , टिकाऊ और तेजी से काम करने वाली मशीन को जन्म दिया है, जिसका फायदा अब किसानों को खूब हो रहा है।

ये स्प्रे पंप एक ऐसा पंप है जिससे आप बहुत कम ईधन खर्चे से बड़ी आसानी से अपनी फसलों पर छिड़काव कर सकते है । यह पंप एक किसान द्वारा त्यार किया गया है ।

इस पंप से आप सब्जिओं ,फूलों ,अनाज आदि फसलों पर बड़ी आसानी से छिड़काव कर सकते है । इस पंप से स्प्रे करने का सबसे बढ़िया फ़ायदा यह है की इसके साथ छिड़काव करने के लिए आप को टंकी को कंधे पर नहीं उठाना पड़ता ।

कैसे काम करता है पंप

मोटरसाइकिल पर स्प्रे पम्प फिट किया गया है। सबसे पहले मोटरसाइकिल के पीछे वाले चक्के को हटा कर दो चक्के फिट किए गए है और इसके ऊपर अलग इंजन रखा जाता है।इसके ऊपर एक ड्रम्म रख जाता है।

छिड़काव करते समय पाइप पकड़ने की जरूरत नहीं होती। इस पंप से बहुत बढिया छिड़काव हो जाता है साथ ही इसका प्रेशर भी कम जा ज्यादा किया जा सकता है । इस पम्प की कीमत 55000 है ।

अगर आप इस पम्प को तैयार करवाना चाहते है तो नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क करे।

मछिन्द्र पटेल ,महाराष्ट्र +919921109926

यह पंप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखे

देश के इन हिस्सों में भारी बारिश की चेतावनी, आंधी-तूफान का भी अलर्ट

मौसम विभाग ने दिल्ली-एनसीआर समेत देश के कई राज्यों में भारी बारिश और आंधी-तूफान की चेतावनी जारी की है। मौसम विभाग के मुताबिक, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक, कोंकण समेत आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में भी भारी बारिश का अनुमान है।

बात सिर्फ उत्तर प्रदेश की करें तो अगले तीन घटों में भारी बारिश और आंधी-तूफान की चेतावनी जारी की है। मौसम विभाग के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के मेरठ, बागपत, हापुड़, बुलंदशहर और अमरोहा जिले से सटे इलाकों में भारी बारिश होगी। साथ ही बारिश के साथ थंडरस्टॉर्म की भी संभावना व्यक्त की गई है।

मौसम विभाग ने के मुताबिक, आज यानी 22 जुलाई को उत्तराखंड में भारी बारिश होने की आशंका है। मौसम विभाग के मुताबिक आज पंजाब, हिमाचल प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, विदर्श, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक और केरल के भी तमाम इलाकों में बारिश हो सकती है। वहीं मौसम विभाग का कहना है कि 23 जुलाई को भी उत्तराखंड, पश्चिमी मध्य प्रदेश, मध्य महाराष्ट्र, कोंकण, गोवा, कर्नाटक और केरल में बारिश होने की संभावना है।

इसके अलावा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मराठवाड़ा के तमाम इलाकों में भी बारिश होने की उम्मीद है। 24 और 25 जुलाई को भी उत्तराखंड, गोवा, कोंकण, कर्नाटक, केरल, जम्मू-कश्मीर और गुजरात के कुछ इलाकों में बारिश हो सकती है।

आपको बता दें कि आज शनिवार को दिल्ली एनसीआर में जमकर बारिश हुई। शनिवार को हुई भारी बारिश से लोगों को तेज गर्मी और उमस से राहत मिल गई है। तापमान में भी गिरावट आई है। गौरतलब है कि पिछले सप्ताह मुंबई में भी भारी बारिश देखने को मिली थी।

गोबर भी बन सकता है आपकी कमाई का जरिया, जानिए कैसे ?

गोबर से खाद और बायो गैस बनने के बारे में तो सभी ने सुना होगा, लेकिन आज हम आपको गोबर से बने गमले और अगरबत्ती के बारे में बताएंगे, कि कैसे गोबर आपकी कमाई का बेहतर जरिया बन सकता है। इलाहाबाद जिले के कौड़िहार ब्लॉक के श्रींगवेरपुर में स्थित बायोवेद कृषि प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान शोध संस्थान में गोबर से बने उत्पादों को बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। उत्तर प्रदेश ही नहीं दूसरे प्रदेशों के भी कई लोग इसका प्रशिक्षण ले चुके हैं।

प्रबंध निदेशक डॉ. हिमांशू द्विवेदी बताते हैं, “हमारे यहां गोबर की लकड़ी भी बनाई जाती है, इसका हम प्रशिक्षण भी देते हैं, इसे गोकाष्ठ कहते हैं। इसमें लैकमड मिलाया गया है, इससे ये ज्यादा समय तक जलती है, गोकाष्ठ के बाद अब गोबर का गमला भी काफी लोकप्रिय हो रहा है। गोबर से गमला बनने के बाद उसपर लाख की कोटिंग की जाती है। ये काफी प्रभावशाली है।”

जब कोई पौधा नर्सरी से लाते हैं तो वह प्लास्टिक की थैली में दिया जाता है और थैली हटाने में थोड़ी भी लापरवाही की जाए तो पौधे की जड़ें खराब हो जाती हैं और मिट्टी में लगाने पर पौधा पनप नहीं पाता। इस स्थिति से बचने के लिए गोबर का गमला काफी उपयोगी है। गमले को मशीन से तैयार किया जाता है।

इसमें मिट्टी भरकर पौधा लगाइए और जब इस पौधे को जमीन की मिट्टी में लगाना हो तो गड्ढा कर इस गमले को ही मिट्टी में दबा दीजिए। इससे पौधा खराब नहीं होगा और पौधे को गोबर की खाद भी मिल जाएगी। पौधा आसानी से पनप जाएगा।

संस्थान में केले के तने का भी अच्छा प्रयोग किया जा रहा है, प्रबंध निदेशक डॉ. हिमांशू द्विवेदी बताते हैं, “केले के तने से साड़ियां भी बनती हैं, इसी तरह से गोबर से एनर्जी केक बनाया जाता है, जो अंगीठी में तीन-चार घंटे तक आसानी से जल जाता है। ये गैस की तरह ही जलाया जाता है। इसी तरह स्टिकलेस अगरबत्ती भी बनाई जाती है।”

बायोवेद शोध संस्थान लाख के कई तरह के के मूल्यवर्धित वस्तुओं के निर्माण का प्रशिक्षण देकर कई हजार परिवारों को रोजगार के साथ अतिरिक्त आय का साधन उपलब्ध करा रहा है। संस्थान के निदेशक डॉ. बी.के. द्विवेदी बताते हैं, “जानवरों के गोबर, मूत्र में लाख के प्रयोग से कई मूल्यवर्धित वस्तुएं बनाई जा रही हैं।

गोबर का गमला, लक्ष्मी-गणेश, कलमदान, कूड़ादान, मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती, जैव रसायनों का निर्माण, मोमबत्ती एवं अगरबत्ती स्टैण्ड व पुरस्कार में दी जाने वाली ट्रॉफियों का निर्माण आदि शामिल हैं। इन सभी वस्तुओं का निर्माण बायोवेद शोध संस्थान करा रहा है।”

सिर्फ 2200 रू की लगत मैं साइकिल को ही बना डाला स्प्रे मशीन, 45 मिनट में ही 1 एकड़ में स्प्रे

जरूरत अविष्कार की जननी है, ये बात सभी मानते हैं। गुजरात में भी एक किसान की जरूरत ने एक नई सस्ती, टिकाऊ और तेजी से काम करने वाली मशीन को जन्म दिया है, जिसका फायदा अब किसानों को खूब हो रहा है।

40 साल के मनसुखभाई जगानी छोटे किसान हैं और गुजरात के अमरेली जिले के रहने वाले हैं। मनसुखभाई प्राथमिक स्तर से आगे नहीं पढ़े हैं। जबरदस्त आर्थिक तंगी के दिनों में मनसुखभाई ने मजदूर के तौर पर भी काम किया है।

22 साल पहले उन्होंने गांव वापस लौटकर मरम्मत और निर्माण का छोटा सा काम शुरु किया और खेती के काम आने वाले औजार बनाने लगे।इस काम में हुनर हासिल करने के बाद अब मनसुखभाई ने फसलों पर स्प्रे करने वाली एक आसान और बेहद सस्ती मशीन बना डाली।इससे ना केवल काम बहुत तेजी से होता है बल्कि लागत भी कई गुना बच जाती है।

मनसुखभाई ने साईकिल में भई स्प्रे मशीन को कुछ इस तरह जोड़ दिया जिससे स्प्रे करने वाले व्यक्ति के शरीर कोई थकावट नहीं होती। साथ ही स्प्रे के दौरान निकलने वाले रासायनिक पदार्थ से शरीर को भी नुकसान का खतरा काफी कम हो जाता है।

मनसुखभाई ने साइकिल के सेंट्रल स्प्रोकेट को पिछले पहिये और पिछले पहिये को सेंट्रल स्प्रोकेट से बदल दिया।उन्होंने पैडल्स को सेंट्रल स्प्रोकेट से हटा दिया। पैडल्स की जगह उन्होंने दोनों तरफ से पिस्टन रॉड लगा दिए। दोनों तरफ से ये पिस्टन रॉड पीतल के कीलेंडर से जुड़े हुए हैं।

30 लीटर का PVC स्टोरेज का एक टैंक उन्होंने साइकिल के कैरियर पर रख दिया, जो कि कीलेंडर पंप से जुड़ा हुआ था। बैलेंस बनाने के लिए उन्होंने साइकिल के कैरियर के दोनों तरफ 4 फुट लंबा छिड़काव करने वाला एक नोज़ल भी लगा दिया।

8 दिनों की मेहनत के बाद मनसुखभाई जबरदस्त ढंग से काम करने वाली स्प्रे मशीन बनाने में सफल हो गए। साईकिल स्प्रे मशीन से 1 एकड़ खेत में छिड़काव करने में 45 मिनट का वक्त लगता है। इसकी लागत 2200 रूपए हैं। इसमें साईकिल की कीमत नहीं जोड़ी गई है।

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सोने से भी महंगी है हिमालय की वायग्रा, एक किलो की कीमत 60 लाख रुपए से ज्‍यादा

यारसागुम्‍बा यानी गर्मी की घास। यह एक तरह की फफूंंद है। यह सोने से भी महंगी है। 1 किलो यारसागुम्‍बा की कीमत लगभग 1 लाख डॉलर यानी लगभग 65 लाख रुपए है। इसे हिमालय की वायग्रा भी कहा जाता है। लोगों का मानना है कि इससे अस्‍थमा कैंसर और खास तौर पर मर्दाना कमजोरी में फायदा होता है।

यारसागुम्‍बा सिर्फ हिमालय और तिब्‍बती पठार पर 3000 से 5000 मीटर की ऊंचाई पर मिलता है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल मई से जून के माह में नेपाल के हजारों लोग पहाड़ की ओर चले जाते हैं। ये लोग यारसागुम्‍बा की तलाश में जाते हैं। ये लोग तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर कैंप करके रहते हैं। पांच साल से यारसागुम्बा का व्यापार कर रहे कर्मा लांबा कहते हैं कि दूर दराज से गोरखा, धाधिंग, लामजुंग जि‍ले से लोग यहां यारसागुम्बा की तलाश में आते हैं।

मुश्किल जिंदगी जीते हैं यारसागुम्‍बा तलाशने वाले लोग

यारसागुम्‍बा की तलाश में आए लोग दो महीने तक बहुत मुश्किल जिंदगी जीते हैं। ये टेंट में रहते हैं। एक युवा दंपत्ति यहां तीन साल से आ रहा है। उनका कहना है कि पहले साल हमें एक भी यारसागुम्‍बा नहीं मिला था। फिर हमने उसकी डंठल को पहचानना सीखा। अब हम आसानी से रोज 10 से 20 यारसागुम्‍बा तलाश लेते हैं।

सुशीला और उनके पति की मई और जून के महीने में हर दिन यही दिनचर्या रहती है। यारसामगुम्बा के बदले जो पैसा उन्हें मिलता है उससे वो आसानी से आधा साल काट लेते हैं। पिछले साल उन्होंने दो हजार डॉलर कमाए थे। इस तरह से वे 2 माह में उतना कमा लेते हैं जितना वे छह माह में दूसरा काम करके कमाते।

यारसागुम्‍बा की उपलब्‍धता में आ रही है कमी

बढ़ती मांग और जलवायु परिवर्तन के असर की वजह से यारसागुम्‍बा की उपलब्‍धता में कमी आ रही है। नेपाल के मनांग क्षेत्र में 15 सालों से यारसागुम्बा तलाश रही सीता गुरुंग का कहना है कि पहले मैं हर दिन सौ यारसागुम्बा तक तलाश लेती थी लेकिन अब दिन भर में मुश्किल से दस-बीस ही मिल पाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ज्‍यादा मांग और जलवायु परिवर्तन की वजह से यारसागुम्बा की उपलब्धता में गिरावट आ रही है। सीता कहती हैं कि जब मुझे रोजाना सौ यारसागुम्बा मिलते थे तब कीमतें बहुत कम थीं। अब जब कीमतें बढ़ गई हैं तो बहुत कम यारसागुम्बा मिलते हैं।

यारसागुम्‍बा पर सरकार को रॉयल्‍टी चुकाते हैं लोग

नेपाल सेंट्रल बैंक के एक शोध के मुताबिक, जो लोग यारसागुम्बा तलाशते हैं उनकी सालाना आय का 56 फीसदी इसी से आता है। यारसागुम्बा की फसल काटने वाले सभी लोग सरकार को रॉयल्टी चुकाते हैं। साल 2014 में किए गए एक शोध के मुताबिक, यारसागुम्बा के कारोबार से नेपाल की अर्थव्यवस्था को 51 लाख रुपए की आमदनी हुई।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस कैटरपिलर फफूंदी की तस्करी अन्य देशों में भी की जा रही है। 18 सालों से यारसागुम्बा का व्यापार कर रहे नागेंद्र बुद्धा थोकी कहते हैं कि इस व्यापार को इस तरह से रेगुलेट नहीं किया गया है जैसे इसे किया जाना चाहिए था। इसलिए यारसागुम्बा तलाशने वालों और सरकार की वास्तविक आय का पता करना मुश्किल हो जाता है।

बहुत ही कम ख़र्चे में फसल काटती है यह मिनी कंबाइन ,जाने पूरी जानकारी

भारत में अब भी गेहूं जा दूसरी फसलें काटने का काम हाथ से ही होता है क्योंकि भारत में किसानो के पास जमीन बहुत ही कम है और वो बड़ी कंबाइन से फसल कटवाने का खर्च नहीं उठा सकते इस लिए अब एक ऐसी कंबाइन आ गई है जो बहुत कम खर्च में फसल काटती है ।

साथ ही अब बारिश से ख़राब हुई फसल वाले किसानो को घबरने की जरूरत नहीं क्योंकि अब आ गई है मिनी कंबाइन Multi Crop हार्वेस्टर यह कंबाइन छोटे किसानो के लिए बहुत फयदेमंद है इस मशीन से कटाई करने से बहुत कम खर्च आता है और फसल के नुकसान भी नहीं होता।

बड़ी कंबाइन से फसल का बहुत ही नुकसान होता है । लेकिन इस मशीन के इस्तेमाल करने के बहुत से फायदे है जैसे यह बहुत कम जगह लेता है ।साथ में इस कंबाइन से आप गिरी हुई फसल भी फसल को नुकसान पहुंचाए बिना अच्छे तरीके से काट सकते है ।

अगर जमीन गीली भी है तो भी हल्का होने के कारण यह कंबाइन गीली जमीन पर आसानी से चलती है ज़मीन में धस्ती नहीं । छोटा होने के कारण हर जगह पर पहुँच जाता है । यह मशीन 1 घंटे मे 2 एकड़ फसल की कटाई करती है ,यह मशीन एक दिन मे 14 एकड़ तक फसल की कटाई करती हैऔर इसमें अनाज का नुकसान भी बहुत कम होता है।इस से आप बाकी की अनाज फसलें जैसे गेहूं ,धान,मक्का अदि भी काट सकते है ।

यह कंबाइन कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें

अगर आप इस कंबाइन को खरीदना चाहते है तो नीचे दिए हुए पते और नंबर पर संपर्क करें

Address–  Karnal -132001 (Haryana), India
phone -+91 184 2221571 / 72 / 73
+91 11 48042089
Email-exports@fieldking.com

किसान के बेटे ने बाइक के इंजन से बनाई फ्लाइंग मशीन

यदि हौंसला हो तो सपनों की उड़ान भरने के लिए पंख अपने आप लग जाते हैं. फिर उसके सामने बड़ी से बड़ी बाधा बहुत छोटी नजर आती हैं. ऐसा ही उदाहरण पेश किया है हिसार जिले के आदमपुर हल्के के गांव ढाणी मोहब्बतपुर निवासी बीटेक के छात्र कुलदीप टाक ने.

23 वर्षीय कुलदीप ने देसी जुगाड़ से उडऩे वाली अनोखी फ्लाइंग मशीन तैयार की है. ये मशीन 1 लीटर पेट्रोल में करीब 12 मिनट तक आसमान में उड़ती है. इसे पैराग्लाइडिंग फ्लाइंग मशीन या मिनी हैलीकॉप्टर का नाम दिया गया है.

कुलदीप ने 3 साल की कड़ी मेहनत के बाद पैराग्लाइडिंग फ्लाइंग मशीन को आसमान में उड़ाने में सफलता पाई है. मशीन दिखने में भले ही साधारण लगती हो, लेकिन ये उड़ान गजब की भरती है. ढाणी मोहब्बतपुर निवासी कुलदीप के पिता प्रहलाद सिंह टाक गांव में खेतीबाड़ी करते हैं. चंडीगढ़ से बीटेक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अब कुलदीप इसी प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहा है. फ्लाइंग मशीन को बनाने में गांव आर्यनगर निवासी सतीश कुमार का भी योगदान रहा.

टंकी फुल हो तो 1 घंटे की उड़ान

कुलदीप ने बताया कि मशीन को तैयार करने में करीब ढाई लाख रुपये का खर्च आया है. इस फ्लाइंग मशीन से किसी को खतरा नहीं है. मशीन में बाइक का 200CC इंजन लगाया गया है. इसके अलावा लकड़ी का पंखा लगा हैं, साथ ही साथ छोटे टायर लगाए हैं.

इसके ऊपर पैराग्लाइडर लगाया गया है जो उड़ान भरने और सेफ्टी के साथ लैंडिंग करवाने में सहायक है.फिलहाल इस मशीन में केवल 1 ही व्यक्ति बैठ सकता है, लेकिन कुलदीप ने दावा किया है कि कुछ ही माह में ये मशीन 2 लोगों को लेकर उड़ेगी, जिसमें सबसे पहले वो अपने पिता को बैठाएगा.

2 हजार फीट तक भरी उड़ान

यह मशीन 10 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरने में सक्षम है. गांव चौधरीवाली से आसपास के गांवों में कुलदीप ने अब तक करीब 2 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरी है. ये मशीन पेट्रोल से उड़ती है जिसमें 5-6 लीटर का टैंक है. पूरी फ्लाइंग मशीन में स्थानीय स्तर के सामान का प्रयोग किया गया है. यानी कुल मिलाकर इस मशीन की टंकी फुल होने के बाद आप 1 घंटे तक आसमान में उड़ सकते हैं.

पितो बोले, रातभर लगा रहता था बेटा

कुलदीप ने बताया कि उसके इस सपने को साकार करने में उसके परिवार का सबसे बड़ा योगदान है. उसके पिता प्रहलाद सिंह टाक और सहयोगी सतीश आर्यनगर ने भी उसकी मेहनत को हौसला दिया. पिता प्रहलाद सिंह खेत में रहते हैं. कुलदीप के पिता प्रहलाद सिंह टाक ने बताया कि उसका बेटा देर रात इस मशीन को बनाता रहता था.

उसके मना करने के बावजूद कुलदीप मशीन को पूरा करने में लगा रहा. करीब 6 माह पहले गोवा में पायलट की 3 माह ट्रेनिंग की थी. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद भी कुलदीप का फ्लाइंग मशीन बनाने का जुनून कम नहीं हुआ. वहीं कुलदीप के सहयोगी सतीश आर्यनगर ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास था कि कुलदीप उन्हें हवा में जरूर सैर कराएगा.कुलदीप की मां कमला ने बताया कि बेटे को हवा में उड़ता देखकर बहुत खुशी हो रही है बेटे ने बड़े साल मेहनत की आखिर अब जा कर इसका फायदा मिला है.

पहले भी बनाया था एयरक्राफ्ट जो हो गया था क्षतिग्रस्त

सहयोगी सतीश ने बताया हालांकि इससे पहले भी उसने एक एयरक्राफ्ट तैयार किया था, लेकिन वो ट्रायल के दौरान पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया. इसके बावजूद भी उसने हिम्मत नहीं हारी. फिर से पैराग्लाडिंग फ्लाइंग मशीन बनाने का निर्णय लिया और आज वो इसमें कामयाब हो ही गया.

ऐसे निकालें इंटरनेट से खसरा खतौनी

अगर आप को अपनी जमीन से संबंधित कोई कागजात चाहिए, जैसे खतरा खतौनी और नक्शा आदि तो तहसील कचहेरी जाना पड़ता है। लेकिन अगर आप इसमें लगने वाले समय और पैसे को बचाना चाहते हैं तो आपके पास दो विकल्प है।

पहला अपने घर के पास के जनसुविधा केंद्र में जाकर कुछ पैसे देकर इसे निकलवा सकते हैं, दूसरा की आप खुद भी इंटरनेट पर अपने राज्य की राजस्व विभाग संबंधी वेबसाइट पर जाकर खसरा-खतौनी निकाल सकते हैं। आज कल जमीन की रजिस्ट्री करानी हो या उस पर किसान क्रेडिट कार्ड बनवाना हो, या फिर कोई सरकारी योजना का लाभ लेना हो खसरा-खतौनी जरुरी है।

ये जमीन के वो कागज़ हैं जो न सिर्फ कई योजनाओं का लाभ दिलाने में मदद करते हैं बल्कि जमीन पर आप के मालिकाना हक का भी सबूत होती हैं। लेकिन इन्हें लेने के लिए लोगों को अक्सर बहुत परेशान होना पड़ता है। इंटरनेट से भूलेख निकलवाने की सुुविधा की राज्यों में है लेकिन कई लोगों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि ज़मीन के कागजा़त यानि भूलेख हासिल करने की प्रक्रिया अब बहुत आसान हो चुकी है।

इंटरनेट पर ही अब ये सारी जानकारियां मौजूद हैं। लोग इस तरह से अपना काफी समय और पैसा बचा सकते हैं,  देशभर में पढ़े जाने वाले सेक्शन ‘बात पते की’ में समझिए पूरा तरीका। (ये तरीके नीचे वीडियो में दिया गया है।)

कैसे मिलेगी जानकारी

  • उदाहरण के लिए अगर आपको उत्तर प्रदेश में जमीन से संबंधित कागज चाहिए तो सबसे पहले यूपी सरकार की वेबसाइट भूलेख http://upbhulekh.gov.in/ पर जाएं।
  • वेबसाइट के बाईं तरफ से चौथे ऑप्सन “खतौनी (अधिकार अभिलेख) की नकल देखें” पर क्लिक करें।
  • फिर आपके सामने एक छोटा से बॉक्स दिखेगा जिसमें आपको बांए तरफ एक छोटे से बॉक्स में दिए गए कोड को दाएं तरफ खाली बॉक्स में भरें। बॉक्स में दिए गए कोड को भरने के बाद ‘सबमिट’ बटन पर क्लिक करें।
  • अब आपके सामने एक नया पेज खुलकर आ जाएगा जिसमें जिलों के नाम लिखे होंगे।
  • अब आपको कॉलम में दिए गए जिलों में अपने जिले के नाम पर क्लिक करें।

  • जिले की सूची के बाद बनी तहसीलों की सूची से अपनी तहसील के नाम पर क्लिक करें।
  • इसके बाद सबसे दाईं ओर बनी सूची में अपने गाँव के नाम पर क्लिक करें और फिर उसके ठीक ऊपर लिखे आगे पर क्लिक करें।
  • अब एक नया पेज खुलेगा। अपनी खसरा खतौनी या खाता संख्या याद हो तो इस पेज पर इनके आगे बने गोलाकार बिंदुओं पर क्लिक करके खोजें पर क्लिक करें, आप चाहें तो अपने नाम से भी अपने भूलेख का खोज सकते हैं। खसरा संख्या और खाता संख्या के लिये दी गई जगह पर लिखने के लिए नीचे दिए गए अंकों वाले बॉक्स पर क्लिक करें और नाम से खोजने के लिये नीचे दिये गये अक्षरों पर क्लिक करके अपना नाम लिखें।
  • आपकी ज़मीन के भूलेख अब आपके सामने हैं। आप इसका प्रिंट आउट भी ले सकते हैं।

नोट : खसरा खतौनी निकालने का यह उदाहरण उत्तर प्रदेश भूलेख के लिए है। ऐसे ही आप भारत के किसी भी राज्य के भूलेख में जाकर अपने जमीन संबंधित कागजात डाउनलोड कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए नीचे तीन राज्यों का का लिंक है.

हरियाणा से संबंधित जमीन के कागजात के लिए वहां की वेबसाइट हलरिस  हरियाणा  http://jamabandi.nic.in/land records/querylink.aspx पर क्लिक करें..

मध्य प्रदेश में जमीन, नक्शा और दूसरे कागजातों के लिए ये आयुक्त- भू-अभिलेख एवं बंदोबस्त, मध्य प्रदेश की वेबसाइट https://mpbhulekh.gov.in/Login.do# पर क्लिक करें..

बिहार के लोग जमीन संबंधित जानकारी के लिए यहां क्लिक करें.. http://164.100.150.10/biharbhumi/

ये है ट्रेक्टर चलित राइस मिल जो 1 घंटे में निकालती है 1200 किलो चावल

किसान धान उगता है और बाजार में बहुत कम भाव में बेच देता है । व्यापारी द्वारा उसका आर्थिक शोषण होता है । जहाँ तक की अगर उसे खुद खाने के लिए चावल की जरूरत होती है तो उसे अपने खाने के लिए चावल बाजार से खरीदना पड़ता है क्योंकि उसके द्वारा पैदा की हुई धान पर छिलका लगा होता जिसको खाने से पहले उतरना पड़ता है । इन दोनों बातों का हल अब निकल आया है ।

अब बाजार में ऐसी ट्रेक्टर से चलने वाली राइस मिल आ गई है जिस से आप चावल का छिलका आसानी से उतार सकते है । जिस से किसान चावल को सीधे बाजार में बेच सकता है । और अपने खाने के लिए भी रख सकता है । सीधे बाजार में बेचने से किसानो को दोगुना लाभ हो सकता है । इस मशीन को चलने के लिए ट्रेक्टर की पावर 34 से 50 H.P. तक होनी चाहिए । यह मिल एक घंटे में 1000-1200 किलो चावल साफ़ कर देती है ।

इस मिल की मुख्य विशेषता यह है, कि इसमें एक ही बार में धान की डिहस्किंग एवं पॉलिशिंग होती है तथा चावल भी कम टूटता है एवं ऊर्जा की खपत भी कम होती है। इस मिल को आसानी से ट्रेक्टर से एक गांव से दूसरे गांव ले जाया जा सकता है। इसके परिणाम अत्यंत उत्साह जनक पाए गए हैं, जिसके कारण कृषकों में इसकी मांग बढ़ रही है।

ये मिल कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

इस मिल की पूरी जानकारी के लिए आप निचे दिए हुए नंबर पर संपर्क कर सकते है ।

पूर्वांचल कृषि यन्त्र उद्योग
Village– Mubarakpur, Tanda, Distt:-Ambedkar Nagar, Uttar Pradesh,
Phone : +917210113837