सालों पुराने पेड़ों को उखाड़कर दूसरे जगह रोपता है ये मशीन, इन खास तकनीक से है लैस

अब भारत के बड़े बड़े शहरों में कम से कम उन पेड़ों को काटने की जरूरत नहीं रह गई, जो 20 साल तक पुराने हैं, या जिनकी जड़े 6-7 फुट गहराई तक ही गई हैं। अलग-अलग प्रोजेक्ट में रुकावट बन रहे पेड़ों को काटना नहीं पड़ेगा।

बल्कि जर्मनी की एक मशीन के जरिए इन्हें उखाड़कर दूसरी जगह लगा दिया सकते है। दिलचस्प बात ये है कि जिन पेड़ों का पता बदला है, उसमें से 99 फीसदी लहलहा रहे हैं। लगाए जाने के बाद हल्की बारिश ने इन पेड़ों में फिर से जान फूंक दी है।

जर्मनी तकनीक से है लैस

जर्मनी से आयातित इस मशीन को ट्री ट्रांसप्लांटर मशीन कहते है । भारत में यह मशीन जर्मनी से मंगवाई है। खास किस्म के बुलडोजर जैसी दिखने वाली एक मशीन 1.75 करोड़ रुपए की है। दरअसल पूरा सिस्टम एक भारी वाहन के रूप में असेंबल्ड है। एक्सपर्ट ने बताया कि सिर्फ 10 लीटर डीजल में यह मशीन एक घंटे में एक पेड़ उखाड़कर इसे दूसरी जगह लगा देती है।

 फीट मोटे पेड़ पर सफल

ट्री ट्रांसप्लांटर मशीन से 36 इंच (तीन फीट चौड़ाई ) वाले पेड़ को आसानी से उखाड़ा जा सकता है। मशीन को आपरेट करने वाले इश्तियाक अहमद ने बताया कि इससे 15-20 साल पुराने पेड़ को आसानी से उखाड़कर शिफ्ट किया जा सकता है। ऐसा हर पेड़ इस मशीन की जद में है, जिसकी जड़ें 6-7 फीट गहराई तक हों।

यह है चौरस गड्डा खोदने वाली मशीन ,ज्यादा जानकारी के लिए वीडियो पर क्लिक करें

गड्ढा खुदाई यंत्र (post hole digger) :- यह एक औगर (auger) युकत यंत्र है, जिसका प्रयोग पौधा लगाने हेतु गड्ढा खोदने में किया जाता है | यह ट्रैक्टर के पी.टी.ओ. द्वारा संचालित एवं उसके थ्री प्वाईंट लिंकेज द्वारा जुड़ा एक अटैचमेन्ट है |

औगर एसेम्बली को बदलकर गड्ढे के ब्यास एवं उसकी गहराई को परिवर्तित किया जा सकता है | मशीन का वजन 150 – 240 कि.ग्रा. होता है एवं इसे 35 एच.पी. ट्रैक्टर से चलाया जा सकता है | मशीन के गड्ढा बनाने की क्षमता 90 गडढे प्रति घंटा होती है |

ज्यादातर होल डिगर गोल गड्डा खोदते है लेकिन अब एक ऐसा होल डिगर (गड्डा खोदने वाला) आ गया है जिस से आप चौरस आकार का गड्डा खोद सकते है |

इसका फ़ायदा ये होता है जब हम कोई दीवार के लिए पिलर त्यार करना होता है जा फिर ऐसे ही पिलर बनाना होता है तो उसका आकार चौरस ही होता है ऐसे में इस मशीन की सहयता से हम बड़ी आसानी से गड्डा खोद सकते है

वीडियो देखे :

एलोवेरा की खेती से 50 हजार इन्वेस्ट कर 10 लाख तक कमाने का मौका

एलोवेरा के नाम और इसके गुणों से आज लगभग हर कोई वाकिफ हो चुका है। देश के लघु उद्योगों व कंपनियों से लेकर बड़ी-बड़ी मल्टिनेशनल कंपनियां इसके नाम से प्रोडक्‍ट बेचकर करोड़ों कमा रही हैं। ऐसे में भी एलोवेरा के बिजनेस से 8 से 10 लाख रुपए की कमाई कर सकते हैं। इसके अलावा आप कमाई को 20 लाख रुपए से 1 करोड़ रुपए तक भी ले जा सकते हैं।

2 तरह से कर सकते हैं एलोवेरा का बिजनेस

एलोवेरा का बिजनेस दो तरीकों से किया जा सकता है। शुरूआत आप खेती से कर सकते हैं इस‍के लिए 1 हेक्‍टेयर जमीन में केवल 50 हजार रुपए खर्च कर आप 5 साल तक हर साल 8 से 10 लाख रुपए कमा सकते हैं। दूसरा एलोवेरा की प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर जूस बेचकर मोटी कमाई कर सकते हैं। इसके लिए 6 से 7 लाख रुपए इन्‍वेस्‍टमेंट करना होगा और कमाई 20 लाख रुपए से 1 करोड़ रुपए तक हो सकती है।

एलोवेरा की खेती के एक हेक्‍टेयर खेत के मानक को समझा जा सकता है। खेत में एक बार प्‍लांटेशन करने के बाद आप 3 साल तक इसकी फसल ले सकते हैं। वर्तमान में आईसी111271, आईसी111269 और एएल-1 हाईब्रिड प्रजाति के एलोवेरा को देश के हर क्षेत्र में उगाया जा सकता है। इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्‍चर रिसर्च (आईसीएआर) के अनुसार एक हेक्‍टेयर में प्‍लांटेशन का खर्च लगभग 27500 रुपए आता है। जबकि, मजदूरी, खेत तैयारी, खाद आदि जोड़कर पहले साल यह खर्च 50000 रुपए पहुंच जाता है।

पहले ही साल होगी 10 लाख रुपए तक की कमाई…

एलोवेरा की एक हेक्‍टेयर में खेती से लगभग 40 से 45 टन मोटी पत्तियां प्राप्त होती हैं। मोटी पत्तियों की देश की विभिन्‍न मंडियों में कीमत लगभग 15000 से 25000 रुपए प्रति टन होती है।

इस हिसाब से यदि आप अपनी फसल को बेचते हैं तो आप आराम से 8 से 10 लाख रुपए कमा सकते हैं। इसके अलावा दूसरे और तीसरे साल में पत्तियां 60 टन तक हो जाती हैं। जबकि, चौथे और पांचवे साल में प्रोडक्‍टशन में लगभग 20 से 25 फीसदी की गिरावट आ जाती है।

जूस बनाकर कमाई को कर सकते हैं कई गुना ...

एलोवेरा की पत्तियां या तो आयुर्वेदिक कंपनियां खरीदती हैं या फिर देश की कृषि मंडियों में भी इसे बेचा जा सकता है। लेकिन, अगर आप खुद का जूस बिजनेस शुरू करना चाहते हैं तो आप 7 से 8 लाख रुपए के इन्‍वेस्‍टमेंट से इसे शुरू कर सकते हैं।

प्रतिदिन 150 लीटर जूस तैयार करने की क्षमता की मशीन की बाजार में कीमत लगभग 7 लाख रुपए है। एक लीटर जूस बनाने में लगभग 40 रुपए का खर्च आता है। यदि इस जूस को सीधे बिना किसी ब्रांड नेम के कंपनियों को सप्‍लाई करें तो इसका दाम 150 रुपए प्रति लीटर मिलता है। ऐसे में आप प्रतिदिन 22500 रुपए का जूस तैयार कर सकते हैं।

कौन खरीदेगा फसल 

एलोवेरा और तुलसी जैसी औषिधीय फसलों की कांट्रेक्‍ट फार्मिंग और प्री-ऑर्डर फार्मिंग निश्चित इनकम का साधन हो सकता है। आज के समय में हर्बल प्रोडक्‍ट बनाने वाली कई कंपनियां (पतंजलि, हिमालया, इपगा लैब आदि ) और थर्ड पार्टी फर्म बाय बैक गारंटी के साथ कांट्रेक्‍ट फार्मिंग करा रही हैं। इससे किसान को फसल के बिकने की चिंता तो होती ही नहीं है साथ ही साथ वह इन कंपनियों की ट्रेनिंग से बेहतर पैदावार भी ले सकते हैं।

राजस्‍थान की एक कंपनी ग्रो फरदर एक ऐसी कंपनी है जो देशभर के किसानों के साथ (जो इच्‍छुक हों) कांट्रेक्‍ट फार्मिंग कर रही है।

वर्तमान में कई वेबसाइट्स ऐसी हैं जिन पर बॉयर्स अपनी डिमांड भेजते हैं। इनमें एक्‍सपोर्ट इंडिया डॉट कॉम, ई-वर्ल्‍ड ट्रेड फेयर डॉट कॉम, गो फोर,अली बाबा,  वर्ल्‍ड बिजनेस आदि वेबसाइट्स हैं जिन पर विभिन्‍न औषिधीय फसलों की बॉयर्स की डिमांड हर समय रहती है।

एक करोड़ रुपए तक ऐसे करें कमाई…

इतना जूस बनाने आपको आधा टन पत्तियों की जरूरत होती है। यानी आप अपने एक हेक्‍टेयर के माल से 90 दिनों तक माल तैयार कर सकते हैं और आराम से 20 लाख रुपए कमा सकते हैं। इसके अलावा आप आसपास के किसानो से भी एलोवेरा पत्तियां खरीदकर जूस तैयार कर सकते हैं। इस तरह आप कमाई को 20 लाख रुपए तक ही सीमित न करके इसे 50 लाख या 1 करोड़ रुपए भी कर सकते हैं।

90 फीसदी तक मिलता है लोन

एलोवेरा जूस बनाने के प्‍लांट एसएमई श्रेणी में आता है। सरकार की तमाम योजनाओं में इसके बिजनेस के लिए सरकार 90 फीसदी तक लोन देती है। खादी ग्रामोद्योग लोन देने के बाद इस पर लगभग 25 फीसदी की सब्सिडी देता है। इसके अलावा 3 साल तक रक ब्‍याज मुक्‍त होती है।

ऐसे करें काजू की खेती , एक पेड़ से एक बार में होगी 12000 रु की फसल

काजू का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है ।काजू को ड्राई फ्रूट्स का राजा कहा जाए तो गलत नहीं होगा ।काजू बहुत तेजी से बढ़ने वाला पेड़ है इसमे पौधारोपन के तीन साल बाद फूल आने लगते हैं और उसके दो महीने के भीतर पककर तैयार हो जाता है। काजू की उत्पत्ति ब्राजील से हुआ है। हालांकि आजकल इसकी खेती दुनिया के अधिकाश देशों में की जाती है। सामान्य तौर पर काजू का पेड़ 13 से 14 मीटर तक बढ़ता है। हालांकि काजू की बौना कल्टीवर प्रजाति जो 6 मीटर की ऊंचाई तक बढ़ता है, जल्दी तैयार होने और ज्यादा उपज देने की वजह से बहुत फायदेमंद व्यावसायिक उत्पादकों के लिए साबित हो सकती है ।

काजू कुछ मशहूर किस्में-

काजू की कई उन्नत और हाइब्रिड या वर्णसंकर किस्मे उपलब्ध हैं। अपने क्षेत्र के स्थानीय कृषि, बागबानी या वन विभाग से काजू की उपयुक्त किस्मों का चुनाव करें।

Kaju4वेनगुर्ला- 1 एम वेनगुर्ला- 2, वेनगुर्ला-3, वेनगुर्ला-4, वेनगुर्ला-5, वृर्धाचलम-1, वृर्धाचलम-2, चिंतामणि-1,एनआरसीसी-1, एनआरसीसी-2, उलाल-1, उलाल-2, उलाल-3, उलाल-4, यूएन-50, वृद्धाचलम-3, वीआआई(सीडब्लू) एचवन, बीपीपी-1, अक्षय(एच-7-6),अमृता(एच-1597), अन्घा(एच-8-1), अनाक्कयाम-1 (बीएलए-139), धना(एच 1608), धाराश्री(एच-3-17), बीपीपी-2, बीपीपी-3, बीपीपीपी-4, बीपीपीपी-5, बीपीपीपी-6,बीपीपीपी-8,(एच2/16).

काजू की खेती के लिए आवश्यक जलवायु-

काजू मुख्यत: उष्णकटिबंधीय फसल है और उच्च तापमान में भी अच्छी तरह बढ़ता है। इसका नया या छोटा पौधा तेज ठंड या पाला के सामने बेहद संवेदनशील होता है। समुद्र तल से 750 मीटर की ऊंचाई तक काजू की खेती जा सकती है। काजू की खेती के लिए आदर्श तापमान 20 से 35 डिग्री के बीच होता है। इसकी वृद्धि के लिए सालाना 1000 से 2000 मिमी की बारिश आदर्श मानी जाती है। अच्छी पैदावार के लिए काजू को तीन से चार महीने तक पूरी तरह शुष्क मौसम चाहिए। फूल आने और फल के विकसित होने के दौरान अगर तापमान 36 डिग्री सेंटीग्रेड के उपर रहा तो इससे पैदावार प्रभावित होती है।

मिट्टी की किस्में-

काजू की खेती कई तरह की मिट्टी में हो सकती है क्योंकि यह अलग-अलग प्रकार की मिट्टी में खुद को समायोजित कर लेती है और वो भी बिना पैदावार को प्रभावित किये। हालांकि काजू की खेती के लिए लाल बलुई दोमट (चिकनी बलुई मिट्टी) मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। मैदानी इलाके के साथ-साथ600 से 750 मीटर ऊंचाई वाले ढलवां पहाड़ी इलाके भी इसकी खेती के लिए अनुकूल है।

काजू की खेती के लिए कार्बनिक पदार्थ से भरपूर गहरी और अच्छी सूखी हुई मिट्टी चाहिए। व्यावसायिक उत्पादकों को काजू की खेती के लिए उर्वरता का पता लगाने के लिए मिट्टी की जांच करानी चाहिए। मिट्टी में किसी पोषक अथवा सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर की जानी चाहिए। 5.0 से 6.5 तक के पीएच वाली बलुई मिट्टी काजू की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

काजू के पौधारोपन का मौसम-

जून से दिसंबर तक दक्षिण एशियाई क्षेत्र में इसकी खेती सबसे ज्यादा होती है। हालांकि, अच्छी सिंचाई की व्यवस्था होने पर इसकी खेती पूरे साल भर की जा सकती है।

जमीन की तैयारी और पौधारोपन-

जमीन की अच्छी तरह जुताई कर उसे बराबर कर देना चाहिए और समान ऊंचाई में क्यारियां खोदनी चाहिए। मृत पेड़, घास-फूस और सूखी टहनियों को हटा दें। सामान्य पौधारोपन पद्धति में प्रति हेक्टेयर 200 पौधे और सघन घनत्व में प्रति हेक्टेयर 500 पौधे (5मीटर गुना 4 मीटर की दूरी) लगाए जाने चाहिए। एक ही क्षेत्र में उच्च घनत्व पौधारोपन में ज्यादा पौधे की वजह से ज्यादा पैदावार होती है।

खेत की तैयारी और पौधों के बीच दूरी क्या हो ?

सबसे पहले 45 सेमी गुना 45 सेमी गुना 45 सेमी की ऊंचाई, लंबाई और गहराई वाले गड्ढे खोदें और इन गड्ढों को 8 से 10 किलो के अपघटित (अच्छी तरह से घुला हुआ) फार्म यार्ड खाद और एक किलो नीम केक से मिली मिट्टी के मिश्रण से भर दें। यहां 7 से 8 मीटर की दूरी भी अपनाई जाती है।

काजू खेती के लिए सिंचाई के तरीके-

आमतौर पर काजू की फसल वर्षा आधारित मजबूत फसल है। हालांकि, किसी भी फसल में वक्त पर सिंचाई से अच्छा उत्पादन होता है। पौधारोपन के शुरुआती एक दो साल में मिट्टी में अच्छी तरह से जड़ जमाने तक सिंचाई की जरूरत पड़ती है। फल के गिरने को रोकने के लिए सिंचाई का अगला चरण पल्लवन और फल लगने के दौरान चलाया जाता है।

काजू की खेती में अंतर फसल-

काजू की खेती में अंतर फसल के द्वारा किसान अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं। अंतर फसल मिट्टी की ऊर्वरता को भी बढ़ाता है। ऐसा शुरुआती सालों में ही संभव है जब तक कि काजू के पौधे का छत्र कोने तक न पहुंच जाए और पूरी तरह छा न जाए। बरसात के मौसम में अंदर की जगह की अच्छी तरह जुताई कर देनी चाहिए और मूंगफली, दाल या फलियां या जौ-बाजरा या सामान्य रक्ताम्र (कोकुम) जैसी अंतर फसलों को लगाना चाहिए।

प्रशिक्षण और कटाई-छंटाई-

काजू के पेड़ को अच्छी तरह से लगाने या स्थापित करने के लिए लिए ट्रेनिंग के साथ-साथ पेड़ की कटाई-छंटाई की जरूरत होती है। पेड़ के तने को एक मीटर तक विकसित करने के लिए नीचे वाली शाखाओं या टहनियों को हटा दें। जरूरत के हिसाब से सूखी और मृत टहनियों और शाखाओं को हटा देना चाहिए।

जंगली घास-फूस पर निंयत्रण का तरीका-

काजू के पौधे की अच्छी बढ़त और अच्छी फसल के लिए घास-फूस पर नियंत्रण करना बागबानी प्रबंधन के कार्य का ही एक हिस्सा है। ऊर्वरक और खाद की पहली मात्रा डालने से पहले घास-फूस को निकालने की पहली प्रक्रिया जरूर पूरी कर लें। घास-फूस निकालने की दूसरी प्रक्रिया मॉनसून के मौसम के बाद की जानी चाहिए। दूसरे तृणनाशक तरीकों में मल्चिंग यानी पलवार घास-फूस पर नियंत्रण करने का अगला तरीका है।

काजू उत्पादन की मात्रा

फसल की पैदावार कई तत्वों, जैसे कि बीज के प्रकार, पेड़ की उम्र, बागबानी प्रबंध के तौर-तरीके, पौधारोपन के तरीके, मिट्टी के प्रकार और जलवायु की स्थिति पर निर्भर करता है। हालांकि कोई भी एक पेड़ से औसतन 8 से 10 किलो काजू के पैदावार की उम्मीद कर सकता है। हाइब्रिड या संकर और उच्च घनत्व वाले पौधारोपन की स्थिति में और भी ज्यादा पैदावार की संभावना होती है।एक पौधे से 10 किल्लो की फसल होती है तो 1000-1200 रु किल्लो के हिसाब से एक पौधे से एक बार में 12000 रुपये की फसल होगी ।

आ गई ऐसी मशीन जो फसल काटने के साथ फसल का बंडल भी बना देगी

अब किसानों को मजदूर ढूंढ़ने में दिक्कत नहीं होगी। क्योंकि अब फसल के बण्डल बनाने के लिए लेबर की जरूरत नहीं रहेगी । फसल काटने के लिए पहले ही मशीन उपलब्ध थी लेकिन अब ऐसी भी मशीन आ गई है जो गेहूं के फसल का बंडल भी बना देगी।

BCS कंपनी की मशीन आ गई है जो गेहूं की फसल काटने के बाद उसका बंडल बांधने का काम भी करती है। इस मशीन के आ जाने से किसानो काफी परेशानियों का समाधान हो जायगा । क्योंकि पहले कंबाइन के काटने से जब वह गेहूं को बिलकुल जड़ के पास से काटती तो थी लेकिन उससे भूसा नहीं मिलता था और किसानो के सामने पशुओं के चारे की समस्या उत्पन्न हो जा रही थी।

अब इस मशीन के आ जाने से कटे हुए गेहूं से पर्याप्त मात्रा में भूसा भी बना सकते है । साथ ही मजदूर खोजने की परेशानी से भी मुक्ति मिल जाएगी। सिर्फ गेहूं ही नहीं यह मशीन गेहूँ , धान ,सोयाबीन ,धनिया, मूंग ,तिल्ली ,चना, मसूर, अलसी, सरसो और हर प्रकार के चारे की फसल काट सकते है ।

इस मशीन की कीमत बाजार में करीब ढाई लाख रुपये है। इसे ट्रैक्टर के बिना चलाया जा सकता है। मशीन में 10.2 हार्सपावर का इंजन बंधा हुआ है। मशीन एक घंटे में करीब एक एकड़ फसल काटकर उसके गट्ठर बांध देती है। जिसके लिए यह सिर्फ 1 लीटर डीज़ल का प्रयोग करती है । इसके 5 गेअर होते है जिसमे 4 आगे के और एक पीछे का होता है ।

अगर आप इसको खरीदना चाहते है तो BCS कंपनी के डीलर से संपर्क कर सकते है ।इसके डीलर भारत के सभी छोटे बड़े शहरों में है और ज्यादा जानकारी के लिए आप इनके हेड ऑफिस जो लुधिआना (पंजाब) में है संपर्क कर सकते है जिनके नंबर नीचे दिए है

Mr. S. K. Bansal + 91 98728 – 74743
Mr. Malkeet Singh Babrah (Head Production & Purchase)
+ 91 98728 – 74745

यह कैसे काम करते है देखने के लिए यह वीडियो देखें

बहुत कमाल की है यह गन्ना काटने वाली मशीन,जाने पूरी जानकारी

भारत में गन्ने की फसल मुख्या फसलों में से एक है इस लिए देश के बहुत सारे किसान गन्ने की खेती पर निर्भर है । लेकिन सब से मुश्किल काम गन्ने की कटाई का होता है। अगर इसको हाथ से करें तो बहुत वक़्त और मेहनत लगती है इस लिए अब एक ऐसी मशीन आ गई है जिस से गन्ने को काटने का काम बहुत आसानी से किया जा सकता है ।

यह मशीन एक घंटे में 900 से 1000 क्विंटल की कटाई कर देती है । यहाँ लेबर का खर्चा प्रति क्विंटल आता है वहीँ इस मशीन से इसका खर्चा सिर्फ 6 रुपये आता है । इस मशीन के साथ सिर्फ ट्रिंच विधि से ही गन्ने की कटाई की जा सकती है । आम तरिके से लगाए गए खेतों में इस मशीन को नहीं चलाया जा सकता ।

शक्तिमान कंपनी द्वारा गन्ना काटने वाली मशीन त्यार की गई है जो गन्ना काटने का काम बहुत तेज़ी से कर सकती है । इस मशीन का इंजन बहुत ही ताकतवर है इसमें 6 सिलिंडर वाला 173 हॉर्स पॉवर का इंजन लगा है ।यह मशीन पूरी तरह से आटोमेटिक है इसके केबिन में डिस्प्ले लगा हुआ है जिस पर हम मशीन की सारी गतिविधि देख सकते है ।

इस मशीन को चलना बहुत ही आसान है । केबिन में AC भी लगा होता है पूरी मशीन को सिर्फ एक लिवर (जॉय स्टिक) से चल्या जाता है ।अगर आप इस मशीन की कीमत जा फिर कोई और जानकारी चाहते है तो निचे दिए नंबर और पते पर संपर्क कर सकते है ।

  • TIRTH AGRO TECHNOLOGY PVT. LTD.
    Dist.: Rajkot.State: Gujarat- INDIA
    Pincode-360311.
  • +91 (2827) 661637 (30 Lines) / +91 (2827) 270 537
  • SMS +91 9925250169 /
  • mail– info@shaktimanagro.com

यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

किसान नेता बोले, नाकाफी है एमएसपी में बढ़ोतरी, किसान अब भी घाटे में

बुधवार को मोदी सरकार ने अपने वादे के मुताबिक, खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढोतरी की है। इस फैसले के बाद गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने उम्मीद जताई कि सरकार के इस निर्णय से जहां किसानों को अपनी फसलों का लाभकारी मूल्य मिलेगा वहीं इसका सकारात्मक प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

उन्होंने बताया कि एमएसपी बढ़ाने से सरकार के खजाने पर 15,000 करोड़ का बोझ आएगा। केंद्र ने सबसे अधिक रागी की एमएसपी में 52 फीसदी की बढ़ोतरी की है, वहीं धान के समर्थन मूल्य में 200 रुपये का इजाफा किया है। लेकिन देश के किसान नेता सरकार के इस फैसले से बहुत ज्यादा खुश नहीं दिखाई देते हैं। देश के मशहूर सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव इसे किसान आंदोलन की छोटी जीत बताते हैं। उनका कहना है,

“किसानों के ऐतिहासिक संघर्ष ने इस किसान विरोधी सरकार को मजबूर किया कि वो चुनावी वर्ष में अपने पिछले चुनावी वादे को आंशिक रूप से लागू करे।” इसके साथ ही योगेंद्र यह भी याद दिलाते हैं कि सरकार ने जिस एमएसपी का ऐलान किया है यह वह डेढ़ गुना दाम नहीं है जो किसान आंदोलन ने मांगा था और न ही वह है जिसका वादा नरेंद्र मोदी ने किया था।

यह महज ऐसा वादा है जो सरकारी खरीद पर निर्भर है। यह अस्थाई है। वह कहते हैं, “किसान को संपूर्ण लागत पर ड्योढ़ा दाम की गारंटी चाहिए।”

आम किसान यूनियन के नेता और किसान मुद्दों पर खुलकर बोलने वाले केदार सिरोही ने एमएसपी व्यवस्था पर चुटकी लेते हुए ट्वीट किया है, “उन सभी 6% किसान जिनको समर्थन मूल्य का लाभ मिलता है सभी को बधाई।

” कृषि जानकार कहते रहे हैं कि महज 6 फीसदी किसान ही अपनी उपज एमएसपी पर बेच पाते हैं, बाकी किसानों तक सरकारी एजेंसियों की पहुंच ही नहीं है। अपने अगले ट्वीट में केदार पूछते हैं,

“मूल्य वृद्धि में सरकार द्वारा मजबूती दिखाई है मगर फिर प्रश्न वही कि इनकी खरीदने की व्यवस्था कैसे होगी। उन सभी फसलों के मूल्य में बड़ी वृद्धि की गई जो 1 % से कम खरीदी जाती हैं बाकी फसलों के दाम कम बढ़े हैं।

सरकार द्वारा यह सुनिश्चित होना चाहिए कि कोई भी व्यापारी MSP से नीचे न खरीदे तो बात बन सकती है।” कृषि अर्थशास्त्री और किसान मुद्दों पर मुखर रहने वाले भगवान मीना का मानना है कि सरकार ने किसानों को धोखा दिया है। उनका ट्वीट है :

इसी तरह किसान मामलों के जानकार रमनदीप सिंह मान कहते हैं, ” मोदी जी जिस स्वामीनाथन रिपोर्ट का हवाला देकर प्रधानमंत्री बने थे उस हिसाब से धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2226रुपए प्रति क्विंटल होना चाहिए था, सरकार ने जो एमएसपी का ऐलान किया है वह 2014 की गणना के हिसाब से है जब बीजेपी सरकार को किसानों ने वोट दिया था।

गेहूं और धान के बीच के समय लगाए यह फसल , एक एकड़ से होगी 35 हजार की फसल

तलवंडी साबो ब्लॉक के अधीन पड़ते गांव गोलेवाला का किसान निर्मल सिंह गेहूं की कटाई करने के बाद सट्‌ठी मूंगी की बिजाई करके अपनी आमदनी में मुनाफा कर रहा है। फसल से होने वाले शानदार मुनाफे को देखते हुए इस साल उसने 10 एकड़ में मूंग फसल की बिजाई की है।

निर्मल सिंह धान व बासमती से पहले सट्‌ठी मूंगी की काश्त करता है, इससे जहां एक अतिरिक्त फसल के जरिए ज्यादा आमदनी होती है, वहीं मूंगी की फसल अपनी जड़ों के प्राकृतिक गुण के कारण जमीन में नाइट्रोजन फिक्सेशन के जरिए जमीन में नाइट्रोजन खाद की मात्रा बढ़ाती है। इस तरह से अगली फसल को कम यूरिया खाद डालने की जरूरत पड़ती है।

जमीन की सेहत में हुआ सुधार

निर्मल सिंह बताया कि फसली चक्कर का हिस्सा बनाने से उसकी जमीन की सेहत में सुधार हुआ है। उन्होंने बताया कि जिस खेत में मूंगी की फसल की बिजाई की जाती है, उस खेत में बासमती धान लगभग 20 जुलाई के बाद ही लगाया जाता है। इससे जहां पानी की बचत होती है, वहीं बिजली की भी बचत होती है तथा यह धान परमल धान जोकि 20 जून को बताया जाता है, के बराबर ही पक कर तैयार हो जाता है।

मुख्य खेतीबाड़ी अफसर डॉ. गुरदित्ता सिंह सिधू ने बताया कि जिले में लगभग 2500 एकड़ से ज्यादा क्षेत्रफल में सट्‌ठी मूंगी की बिजाई करके खेतीबाड़ी विभाग जिले में फसल विभिन्नता को प्रोत्साहित कर रहा है। इससे मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर उसे और उपजाऊ बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि सट्‌ठी मूंगी 60 दिन की फसल जोकि गेहूं व धान की दरम्यान खाली समय में बिजाई की जाती है और किसानों को अच्छा फायदा देती है। इस किस्म का औसतन झाड़ 4 से 5 क्विंटल प्रति एकड़ है। उन्होंने बताया कि सट्‌ठी मूंगी का बीज 10 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से बरता जाता है।

गेहूं काटने के बाद गर्मी के मौसम की मूंगी बिना खेत में हल चलाए ही बिजाई की जा सकती है। अगर खेत में गेहूं का नाड़ नहीं है तो मूंगी जीरो टिल ड्रिल के जरिए बिजाई की जाए। उन्होंने बताया कि विभाग की ओर से किसानों को सट्‌ठी मूंगी के बीज की फ्री आफ कास्ट मिनी किट बांटी जाती हैं। मूंगी की फसल 20 मार्च से अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक बिजाई की जाती है।

बहुत ही कम ख़र्चे में फसल काटती है यह मिनी कंबाइन,वीडियो देखें

चावल जा दूसरी फसलें काटने का काम हाथ से ही होता है क्योंकि भारत में किसानो के पास जमीन बहुत ही कम है और वो बड़ी कंबाइन से फसल कटवाने का खर्च नहीं उठा सकते इस लिए अब एक ऐसी कंबाइन आ गई है जो बहुत कम खर्च में फसल काटती है ।

साथ ही अब बारिश से ख़राब हुई फसल वाले किसानो को घबरने की जरूरत नहीं क्योंकि अब आ गई है मिनी कंबाइन Multi Crop हार्वेस्टर यह कंबाइन छोटे किसानो के लिए बहुत फयदेमंद है इस मशीन से कटाई करने से बहुत कम खर्च आता है और फसल के नुकसान भी नहीं होता।

बड़ी कंबाइन से फसल का बहुत ही नुकसान होता है । लेकिन इस मशीन के इस्तेमाल करने के बहुत से फायदे है जैसे यह बहुत कम जगह लेता है ।साथ में इस कंबाइन से आप गिरी हुई फसल भी फसल को नुकसान पहुंचाए बिना अच्छे तरीके से काट सकते है ।

यह कंबाइन कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो देखें

अगर जमीन गीली भी है तो भी हल्का होने के कारण यह कंबाइन गीली जमीन पर आसानी से चलती है ज़मीन में धस्ती नहीं । छोटा होने के कारण हर जगह पर पहुँच जाता है ।

यह मशीन 1 घंटे मे 1 बीघा फसल की कटाई करती है और इसमें अनाज का नुकसान भी बहुत कम होता है।इस से आप बाकी की अनाज फसलें जैसे गेहूं ,धान,मक्का अदि भी काट सकते है ।

22 एकड़ में आमों का बाग़ लगा कर यह किसान ले रहा प्रति एकड़ 1.75 लाख का मुनाफा

प्रगतिशील किसान बलजिंदर सिंह आम रिवायती खेती से हटकर आम के बाग लगाकर इलाके में काफी पहचान बना चुके हैं और काफी आमदन कमा रहे हैं। रणजीत बाग के रहने वाले किसान बलजिंदर सिंह ने बताया कि बागबानी विभाग के सहयोग से इस क्षेत्र में काफी तरक्की हासिल की है।

उन्होंने बताया कि शुरू में 10-12 एकड़ से शुरू किए इस व्यवसाय को बलजिंदर सिंह ने 22 एकड़ मे तबदील किया और अपनी मेहनत और विभाग के सहयोग से अब वार्षिक एक एकड़ में से 1 लाख 75 हजार रुपए की आमदन प्राप्त कर रहा है। उन्होंने बताया कि बाग लगाकर शुरुआत के दौर में बाग में से आमदन एक पेंशन के रूप में मिलनी शुरू हो जाती है। इसलिए पानी और दवाइयों की अधिक जरूरत नहीं पड़ती है।

उन्होंने बताया कि समय-समय पर विभाग की ओर से दवाइयां आदि उपलब्ध करवाई जाती हैं। वहीं, एक एकड़ बाग लगाने पर राष्ट्रीय बागबानी मिशन के तहत बागबानी विभाग की ओर से 75 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है, जबकि स्प्रे पंप पर 50 प्रतिशत।

वहीं, बागबानी विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बलविंदर सिंह व बागवानी अधिकारी प्रितपाल सिंह ने बताया कि किसानों को रिवायती फसलों के चक्कर से बाहर निकालने के लिए फसली विभिन्नता से जोड़ा जा रहा है। दिनों-दिन घटते पानी के स्तर के चलते किसानों को सहायक व्यवसाय अपनाने चाहिए। उन्होंने सलाह दी कि फसली विभिन्नता संबंधी किसी प्रकार की जानकारी के लिए बागबानी दफ्तर गुरदासपुर संपर्क किया जा सकता है।