चारा मिलाने से डालने तक 4 लोगों का काम अकेले करती है यह मशीन

डेरी फार्मिंग में हर दिन नई से नई मशीन आ रही है जो डेरी के काम को और आसान कर रही है अब सिर्फ 2 -3 आदमी बड़े से बड़ा डेरी फार्म संभाल सकते है ।

आज हम जिस मशीन की बात कर रहे है वो भी 4 काम कर देती है ।इस मशीन का नाम JF Mix 2000 है यह मशीन काटने और मिक्सिंग करने का काम करती है ।

यह मशीन भूसे को फीड के साथ अपने आप ही मिक्स कर देती है और उसके बाद इस मशीन की सहयता से आप पशुओं को चारा सीधे ही उनकी नांद में डाल सकते है ।

यह मशीन वहां पर ज्यादा कामयाब है जहाँ पर काफी ज्यादा पशु होते है और लेबर की कमी हो । इस मशीन को ट्रेक्टर के साथ चलाया जाता है और आप इस मशीन को कहीं भी लेकर जा सकते है । इस मशीन को खरीदने के लिए आप नीचे दी हुए नंबर पर क्लिक करें ।

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आज ही करें यह काम आपका पशु देने लगेगा 10% अधिक दूध

गाय को रहने के लिए साफ-सुथरा स्थान और आराम से बैठने के लिए गद्देदार बिछावन मिलने से वह खुश होती है और दस प्रतिशत अधिक दूध दे सकती है जिससे किसानों की आय काफी बढ़ सकती है।वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि मनुष्य की तरह दुधारू पशु भी सर्दी-गर्मी एवं सुख-दुख का अनुभव करते हैं।

गाय को गद्देदार बिछावन पर आराम करने की सुविधा मिलने पर उसमें दूध उत्पादन की क्षमता दस प्रतिशत तक बढ़ सकती है। रबड़ की सीट या गद्देदार बिछावन मिलने पर गाय अधिक समय तक आराम करती है जिससे उसके शरीर में खून का संचार 25 से 30 प्रतिशत बढ़ जाता है जिसकी वजह से दूध का उत्पादन बढ़ता है।

एक लीटर दूध पैदा करने के लिए लगभग 500 लीटर खून को अयन की दुग्ध ग्रंथियों से गुजरना पड़ता है। एक गाय एक दिन में अपने आराम के लिए 10 से 15 बार बैठती या खड़ी होती है। यदि गाय गद्देदार बिछावन मिलने पर एक बार में एक मिनट ही अधिक आराम करे तो दिन भर में उसे कम से कम दस मिनट अधिक आराम का समय मिल जाता है।

आराम की अवधि के दौरान उसमें खून का दौरा सवा गुणा बढ़ जाता है। इस प्रकार उसे एक साल में 60 घंटे अधिक आराम मिल सकता है। गाय अधिक समय तक आराम करती है जिससे प्रति घंटे 1.7 किलोग्राम अधिक दूध मिल सकता है अर्थात 60 घंटे में 102 किलोग्राम दूध का उत्पादन बढ़ सकता है।

राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल के वरिष्ठ वैज्ञानिक अश्विनी कुमार राय ने अपने अध्ययन में कहा है कि गाय कंक्रीट के बने फर्श पर नहीं बैठना चाहती है। इस पर बैठना उसके लिए कष्टदायक है। वह नर्म मुलायम बिस्तर पर बैठना अधिक पसंद करती है। गाय एक दिन में करीब 12 घंटे बैठना पसंद करती है।

आराम की जगह साफ-सुथरी और सूखी हो तो इससे पशुओं में चर्मरोग नहीं होता है। गाय के बैठने के स्थान पर बालू का प्रयोग किया जा सकता है या फिर धान के पुआल से उसका गद्देदार बिछावन तैयार किया जा सकता है। गाय जितना अधिक समय तक आराम में रहती है उसकी मांसपेशियां स्वस्थ रहती है क्योंकि इस दौरान उसे पर्याप्त मात्रा में रक्त और आवश्यक पोषण मिलता है।

वैज्ञानिक दुधारू पशुओं को अधिक आराम देने के लिए ग्रूमिंग ब्रश के प्रयोग की सलाह देते हैं। ऐसे ब्रश के उपयोग से पशुओं को अधिक आराम मिलता है। रक्त का संचार बढ़ता है। इससे उनमें तनाव नहीं होता है और दूध का उत्पादन बढ़ जाता है। गाय को जब एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है तो सफर के कारण उसमें तनाव हो जाता है जिससे दूध उत्पादन में कमी आती है। दूध दुहने वाले व्यक्ति के बदलने पर भी दूध उत्पादकता में कमी आ सकती है।

कई बार गाय के बछड़े को उससे अलग करने पर वह तनाव में आ जाती है और इससे दूध उत्पादन कम हो सकता है। अच्छी बात यह कि गाय को चराने से उसका व्यायाम हो जाता है जिससे उसमें रक्त संचार बढ़ जाता है। इस दौरान उसे ताजी हवा और धूप मिलती है जिससे उसकी त्वचा साफ और चमकदार बनी रहती है। त्वचा साफ रहने पर परजीवियों का संक्रमण नहीं होता है और वह खुश रहती है जिससे अधिक दूध का उत्पादन हो सकता है ।

बहुत तेज़ी से खरपतवार निकालने के लिए करें इस यंत्र का इस्तेमाल, सिर्फ 600 है कीमत

फसलों मे नदीनो को निकालना बहुत महत्वपूर्ण होता है, खरपतवारों के कारण फसलों का 50% नुक़्सान हो जाता है। खेत में नदीनो को हटाने के लिए ट्रैक्टर का प्रयोग किया जाता है।

ट्रैक्टर के द्वारा नदीनो  को निकालना महंगा पड़ता है। हम हर जगह ट्रैक्टर का उपयोग नहीं कर सकते हैं, इस वजह से फसलों को बहुत नुकसान होता है।

किसान भाई ने एक उपकरण विकसित किया है। इस दुवारा आसानी से सब्जियों, गन्ना, कपास, और खेतों की मेड़ो पर नदीनो को निकाला जा सकता है।

नदीनो को फावड़े से निकालने के दौरान कई बार फसल का नुकसान हो जाता है लेकिन इस यंत्र से फसल नुकसान के बिना नदीनो को निकाला जा सकता है। फावड़े के साथ जो काम पूरे दिन मे होता है, इस यंत्र के साथ 2 घंटे में हो जाता है। इस यंत्र की कीमत 600 रुपए है।

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खरीदने के लिए संपर्क करें
कृषि कार्य
ढिल्लों रोड साहनेवाल जिला लुधियाना
सम्पर्क – 9855491616, 9988061616

कृत्रिम हाईड्रोजैल किसानों से धोखा, हर्बल हाईड्रोजैल कृषि की संजीवनी, हइड्रोजेल की मदद से सिर्फ एक सिंचाई से हो सकती है फसल

वर्षा आधारित कृषि व् गिरते जलस्तर की समस्या से जूझ रहे किसानों को राहत देने के नाम पर, कई प्राइवेट कम्पनियो के कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल(जलशक्ति, जेबा इत्यादि) बाजार में खूब बिक रहे है I इंडियन काउंसलिंग ऑफ एग्रीकल्चर रिर्सच (ICAR) ने भी पूसा हाईड्रोजैल नाम का एक कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल विकसित क़र, पिछले दस वर्ष से, उसे 1200-1500 रूपये प्रति किलो बेच रही हैI कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल के बारे में निम्नलिखित बड़े-2 झूठे दावे भी किये जा रहे है:-

  • एक ग्राम पूसा हाईड्रोजैल 500 ग्राम पानी अवशौषित करता है। इससे सिंचाई में पानी की 40 प्रतिशत तक बचत होती है। जो सिर्फ एक सिंचाई में फसलों को तैयार करेगा और जड़ों के पास पानी को सोखकर लंबे समय तक, पौधों को पानी की कमी भी नहीं होने देगा तथा बारिश व् सिंचाई के पानी को स्टोर करता है
  • पूसा हाईड्रोजैल एक एकड़ खेत में महज 1-2 किलोग्राम पर्याप्त है जो 2-5 वर्षों
    तक काम करता है ।
  • पूसा हाईड्रोजैल के इस्तेमाल से, मक्के, गेहूँ, आलू, सोयाबीन, सरसों, प्याज,
    टमाटर, धान, फूलगोभी, गाजर, गन्ने, हल्दी, जूट समेत अन्य फसलों में उत्पादकता बढ़ती है ।
  • पूसा हाईड्रोजैल, खाद के साथ तालमेल बिठा क़र, जमीन की सेहत सुधारने में भी
    मदद करता है।

अब अगर वैज्ञानिक सोच के साथ, पूसा हाईड्रोजैल और प्राइवेट कम्पनियो के हाईड्रोजैल के बारे में ऊपरलिखित झूठे दावों को परखा जाये, तो निष्कर्ष निकलता है की, कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल किसानों से सरासर धोखा है।

जिसे किसान भाई व् कोई भी वैज्ञानिक सोच का व्यक्ति अपने घर पर आसानी से परख सकता है जैसा की लेखक ने चित्र-1 में दिखाया है बाजार से दस ग्राम, ज़ेबा हाईड्रोजैल, पूसा हाईड्रोजैल और हर्बल हाईड्रोजैल (गूंद कतीरा-Tragacanth Gum) खरीद क़र ले आईये।

घर पर तीन कांच के गिलास ले और उन मे दो-2 ग्राम की दर से,एक गिलास में ज़ेबा हाईड्रोजैल, दूसरे में पूसा हाईड्रोजैल, तीसरे में हर्बल हाईड्रोजैल डाल क़र तीन चौथाई साफ पानी से भर दी जीये। आप देखेंगे की, ज़ेबा हाईड्रोजैल ने पांच मिनट में , पूसा हाईड्रोजैल ने 30 मिनट में, और हर्बल हाईड्रोजैल ने 60 मिनट में गिलास के सारे पानी को सोख कर, जैल में प्रवृतीत कर दिया।

अब सभी गिलास में दो-2 ग्राम की दर से जिप्सम पाऊडर ऊपर से छिड़क दीजिये। आप को जानकर आश्चर्य होगा की जिप्सम पाऊडर की रासायनिक क्रिया से, ज़ेबा जैल एक मिनट में, पूसा जैल 10 मिनट में, दूध की तरह फट कर, पानी में बदल जाता है

जब की हर्बल हाईड्रोजैल पर जिप्सम की रासायनिक क्रिया का कोई असर नहीं होता उसका जैल अपने स्वाभाविक रूप में ही रहता है।

इस साधारण से प्रयोग से ये साबित होता है की कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल कृषि उदेश्यो के लिये उपयुक्त तकनीक नहीं है कियोकि जिप्सम के रसायनिक तत्व लगभग सभी प्रकार की भूमि में मौजूद होते है शुष्क व् रेतली भूमि से तो जिप्सम को

निकाल कर व्यवसायिक व् औधोगिक कार्यो के लिये इस्तेमाल किया ही जाता है जबकि किसान सिचित भूमि में जिप्सम को खाद व् छारीय भूमि मिट्टी संशोधन के लिये वर्षो से  करते रहे है।

जबकि हर्बल हाईड्रोजैल (गूंद कतीरा-Tragacanth Gum) सभी प्रकार की भूमि के लिये उपयुक्त पाया गया है और आर्थिक रूप से सस्ता विकल्प ( सिर्फ दो सो रुपये प्रति किलो ग्राम) होने के साथ, पर्यावरण हितेषी भी है जिससे सिचाई पानी की बचतके साथ फसलों की लागत में भी बचत होती है ।

हरियाणा के रेतीले इलाके के गांव लिसना जिला रेवाड़ी के प्रगतिशील किसान श्री मनोज कुमार ने हर्बल हाईड्रोजैल लेपित बीज तकनीक अपनाकर अपने खेतो पर वर्षा आधारित धान सफलतापूर्वक उगा कर एक नयी मिसाल कायम की है । प्राकृतिक हाईड्रोजैल का प्रयोग सभी सभ्यताओं में आयुर्वेदिक चिकित्सा, कृषि इत्यादि कार्यो में आदि काल से हो रहा है।

कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल का प्रयोग भी लगभग सौ साल से चिकित्सा, प्रसाधन सामग्री, सैनिटरी नेपकिन, कृषि कार्यो के लिये पूरी दुनिया में हो रहा है। इस लिये हाईड्रोजैल कोई नया अविष्कार नहीं है जैसा की कुछ वैज्ञानिक व् प्राइवेट कंपनी अपने हाईड्रोजैल को बेचने के लालच में बढ़ा-चढ़ा क़र प्रसारित कर रही है।

कृषि में कृत्रिम रासायनिक हाईड्रोजैल के प्रयोग को लेकर दुनिया भर के पर्यावरणविद्ध बार-2 चेतावनी जारी करते रहे है कियोकि इस के निर्माण में उपयोग होने वाले पादर्थो से पर्यावरण दूषित होने और जीवो में कैंसर होने का खतरा बना रहता है। इस लिये कृषि कार्य के लिये प्राकृतिक हाईड्रोजैल के उपयोग की सलाह हमेशा दी जाती है ।

जाने 17 रुपये किलो में 19:19:19 स्प्रे को घर पर त्यार करने का तरीका

19:19:19 स्प्रे को पौधों के लिए बहुत ही उपयोगी माना जाता है | इसके इस्तेमाल से फसल की ग्रोथ बढ़िया होती है इस लिए बहुत सारी फसलों में इसका प्रयोग होता है | लेकिन यह उपयोगी उर्वरक बहुत ही महंगा पड़ता है |बाजार में इसकी कीमत 150 रुपये किलो के करीब है | लेकिन आप इसको घर पर सिर्फ 17 रुपये किलो के हिसाब से भी त्यार कर सकते है |

बाजार में किसान की इस 19:19:19 स्प्रे से बहुत लूट की जाती है क्योंकि इसको एक किलो बनाने का खर्च सिर्फ 15-17 के करीब होता है |

कैसे त्यार करें 19:19:19 स्प्रे

इस स्प्रे को बनाने के लिए हमे यूरिया,डी.ऐ,पी और पोटाश चाहिए जो हर किसान के पास आसानी से मिल जाती है | 19:19:19 स्प्रे इन तीनो से मिलकर ही बना होता है बस अब यूरिया,डी.ऐ,पी और पोटाश को एक खास अनुपात में मिलाकर पानी में घोलना होता है और हमारी 19:19:19 स्प्रे त्यार

19:19:19 स्प्रे के लिए हमे चाहिए

  • यूरिया =500 ग्राम
  • डी.ऐ,पी = 1 किलो
  • पोटाश =500 ग्राम

इन तीनो में से डी.ऐ,पी एक दिन पहले पानी में घोल ले क्योंकि यह घुलने में ज्यादा समय लेती है साथ ही इसके घोल को एक बार छान ले क्योंकि यह नोज़ल जाम कर देती है | बाकि दोनों का घोल मौके पर त्यार कर सकते है तीनो का घोल त्यार करके तीनो को मिला सकते है और ऐसे आपका 19:19:19 स्प्रे त्यार हो जयेगा |

अधिक जानकारी के लिए विडियो देखे :

आ गया 6750 रूपए कीमत का नैनो बायोगैस प्लांट

यह नैनो बायोगैस प्लांट (nano bio gas plant)बायोटेक इंडिया जो के केरला में है द्वारा त्यार क्या गया है । इसमें आप पशुओं का गोबर ,गली सड़ी सब्जियां ,या फिर कोई भी जैविक कचरा डाल सकते है ।

बायोटेक इंडिया की तरफ से नैनो बायोगैस प्लांट के दो मॉडल त्यार किए गए है । पहला मॉडल 45 लीटर का है और दूसरा मॉडल 160 लीटर का है । छोटा मॉडल 10 -20 लीटर गैस पैदा करता है जब की बड़ा मॉडल 30 – 50 लीटर बायोगैस पैदा करता है ।

दोनों मॉडल के ऊपर एक फ्लोटिंग टैंक है । जिसमे गैस भर जाने पर वो ऊपर आ जाता है । छोटे मॉडल का मूल्य 6750 रु और बड़े मॉडल का मूल्य 9950 रु है ।यह मॉडल इतने छोटे होते है के आप इन्हे अपनी रसोई में भी रख सकते है इसके इलावा आप इसको एक जगह से दूसरी जगह पर आसानी से ले कर जा सकते है ।

फ़िलहाल इन मॉडल को स्कूल,कॉलेज, यूनिवर्सिटी में बच्चों को जैविक ऊर्जा के बारे में जागरूक करने के लिए इस्तेमाल क्या जा रहा है । लेकिन आप इसे घर पर भी इस्तेमाल कर सकते है ।

इस दोनों नैनो मॉडल के इलावा भी बायोटेक कंपनी कुश बड़े मॉडल भी त्यार करती है जो इस से ज्यादा गैस पैदा कर सकते है और आपको किसी भी तरह की एलपीजी गैस की जरूरत नहीं पड़ती ।

बायोटेक इंडिया सारे भारत में होम डिलीवरी भी करती है जिसका कोई अलग से खर्चा नहीं लिया जाता । हर बायोगैस प्लांट के साथ एक चूल्हा और जरूरी सामान दिए जाता है ।

इस मॉडल और दूसरे मॉडल को आप ऑनलाइन इंटरनेट पर पैसे दे कर ले सकते है ।ज्यादा जानकारी के लिए बायोटेक इंडिया के वेबसाइट(biotech-india.org) पर चेक करें जा फोन 91-471-2331909 पर संपर्क करें ।इसके इलावा भी आप ई कॉमर्स वेब्सीटेस जैसे snapdeal ,Amazon India आदि वेब्सीटेस से भी मंगवा सकते है

ध्यान रहे यह सारी जानकारी इंटरनेट से ली गई है इस लिए कोई भी आर्डर करने से पहले अपनी तरफ से पूरी तसल्ली कर ले ।

नैनो बायोगैस कैसे काम  करता है वीडियो भी देखें 

बेकार प्लास्टिक की बोतल से ऐसे बनायें चूहा पकड़ने का ट्रैप

चूहों की संख्या मई-जून माह में कम होती है, यही समय चूहा नियंत्रण अभियान के लिए सही समय होता है, यह अभियान सामूहिक रूप में चलाना चाहिए। चूहे खेत खलिहानो, घरों और गोदामों में अनाज खाने के साथ-साथ ही अपने मलमूत्र से अनाज बर्बाद कर देते हैं।

एक जोड़ी चूहा एक वर्ष में 800-1000 की संख्या में बढ़ जाते हैं,अगर चूहों के संख्या कम हो तो आप प्लास्टिक की बोतल का ट्रैप बना कर भी चूहों को पकड़ सकते है ।इस तरिके से आप को कोई खर्चा भी नहीं होगा और किसी खतरनाक दवाई की भी जरूरत नहीं पड़ेगी ।

इस तरीके से आप घर पर भी आसानी से चूहों को पकड़ सकते हैं। आज हम आपको बताते है कि कैसे आप घर पर चूहे पकड़ने की मशीन बना सकते है।

जरूरत का सामान

  • प्लास्टिक की बोतल
  • कैंची
  • स्टिकस
  • रबड़ बैंड
  • थ्रेड
  • यू क्लिप

बनाने का तरीका

  1. सबसे पहले प्लास्टिक की बोतल का ऊपरी हिस्सा कैंची से काट लें। ध्यान रखें कि उसे सिर्फ एक ही साइड से काटना है।
  2. अब बोतल के दोनों हिस्सों पर दो इंच के गेप से दाए और बाए साइड होल करके दो स्टिक्स आड़ी फंसा दें।
  3. ध्यान रखें कि ये दोनों स्टिक्स पैरेलर हो। अब इन दोनों स्टिक्स पर रबड़ बैंड दोनों ओर फंसा दें।
  4. अब एक मजबूत धागा लें और बोतल के मुंह में लगाकर ढक्कन बंद कर दें। इस बात का ध्यान रखें कि धागे की लंबाई इतनी होनी चाहिए कि उसेे खिंचने पर बोतल का कटा हिस्सा खुल सकें।
  5. अब यू क्लिप का किनारा सीधा करके उसमें खाने की चीज फंसा दें। इसे बोतल के अंदर हाथ डालकर तली से बाहर निकालें।
  6.  धागे के हिस्से पर नॉट बनाकर इस यू क्लिप के बाहर निकले नुकीले हिस्से पर लटका दें।

इस ट्रैप को कैसे बनाते है इसके लिए वीडियो देखें

बासमती की इस किस्म में नहीं लगेगा रोग, होगा अच्छा उत्पादन

दुनिया भर में बासमती चावल उत्पादन में नंबर एक भारत में पिछले कई वर्षों से बासमती चावल में रसायनों की अधिक मात्रा निर्यात में रोड़ा बन रही है, लेकिन बासमती की ये नई किस्म रोग अवरोधी होने के कारण इसमें रसायन का छिड़काव नहीं करना पड़ेगा।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने पूसा बासमती-1 से नई किस्म पूसा बासमती 1637 विकसित की है। ये किस्म रोग अवरोधी हैं, इनमें गर्दन तोड़ (ब्लास्ट) रोग नहीं लगता है, जिससे इसमें रसायन का स्प्रे नहीं करना पड़ेगा या बहुत कम मात्रा में करना पड़ेगा।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. दीपक सिंह बताते हैं, “इस किस्म को हमने पूसा बासमती-1 से विकसित किया है, जिसमें फंजाई से होने वाला रोग गर्दन तोड़ और ब्लास्ट रोग नहीं लगेगा, जिससे किसानों को फायदा होने वाला है।” वो आगे बताते हैं, “इस किस्म के बीज के लिए किसान पूसा में सम्पर्क कर सकते हैं, जहां से किसानों को सही दाम पर बीज मिल जाएगा।”

किसान व बासमती निर्यातकों को इसका फायदा होने वाला है। दोनों किस्मों के चावल यूरोप में एक्सपोर्ट होते हैं। बीमारी आने पर किसान ज्यादा स्प्रे करते थे, इस कारण जहर की मात्रा चावल में भी बढ़ जाती थी। इससे चावल यूरोप में कई बार रिजेक्ट हो जाता था, लेकिन अब नई किस्म में ऐसा नहीं होगा। इससे किसानों की आय भी बढ़ेगी।

इस किस्म को हमने पूसा बासमती-1 से विकसित किया है, जिसमें फंजाई से होने वाला रोग गर्दन तोड़ और ब्लास्ट रोग नहीं लगेगा, जिससे किसानों को फायदा होने वाला है। डॉ. दीपक सिंह, राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी संस्थान ऑल इंडिया चावल एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अनुसार हर वर्ष देश में लगभग 8773.78 हजार टन बासमती चावल का उत्पादन होता है।

भारत बासमती चावल में विश्व बाज़ार का अग्रणी निर्यातक है। देश ने वर्ष 2016-2017 के दौरान विश्व को 21,604.58 करोड़ रुपए (यानि 3,230.24 अमेरिकी मिलियन डॉलर) मूल्य का 40,00,471.56 मीट्रिक टन बासमती चावल निर्यात किया था जिसमें प्रमुख रूप से सउदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इराक और कुवैत में बड़ी मात्रा में बासमती चावल गया था।

ऐसे में इस सला बासमती धान की खेती और पैदावार घटने से चावल के निर्यात पर असर पड़ेगा। ये भी पढ़ें- फेफड़े व स्तन कैंसर के खात्मे में मददगार छत्तीसगढ़ के ये तीन धान पूसा बासमती 1637 पूसा बासमती-1 का सुधरा हुआ रूप है। पूसा बासमती- 1 में ब्लास्ट (झोंका) रोग आने की संभावना ज्यादा रहती थी, लेकिन 1637 में यह बीमारी नहीं आएगी। इस किस्म में रोग रोधी क्षमता हैं, इसका प्रति एकड़ 22 से 25 कुंतल तक हो सकता है।

इन प्रदेशों में होती है बासमती की खेती

देश में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली में किसान बासमती की खेती करते हैं, जिसमें पंजाब बासमती उत्पादन में अग्रणी राज्य है।

ये हैं बासमती की अन्य किस्में

भारत सरकार के बीज अधिनियम तहत वर्ष 1966 से अभी तक बासमती चावल की 29 किस्में खेती के लिए अधिसूचित की गई हैं, जिनका देश के 7 राज्यों के लगभग 81 जिलों में खेती की जाती है।बासमती चावल की प्रमुख किस्में में बासमती 217, बासमती 370, टाइप 3 (देहरादूनी बासमती) पंजाब बासमती 1 (बउनी बासमती), पूसा बासमती 1, कस्तूरी, हरियाणा बासमती 1, माही सुगंधा, तरोरी बासमती (एच.बी.सी 19/ करनाल लोकल), रणबीर बासमती, बासमती 386,

इम्प्रूव्ड पूसा बासमती 1 (पूसा 1460), पूसा बासमती 1121 (संशोधन के पश्चात्), वल्लभ बासमती 22, पूसा बासमती 6 (पूसा 1401), पंजाब बासमती 2, बासमती सी.एस.आर 30 (संशोधन के पश्चात्), मालविया बासमती धान 10-9 (आई.ई.टी 21669), वल्लभ बासमती 21 (आई.ई.टी 19493), पूसा बासमती 1509 (आई.ई.टी 21960), बासमती 564, वल्लभ बासमती 23, वल्लभ बासमती 24, पूसा बासमती 1609, पंत बासमती 1 (आई.ई.टी 21665), पंत बासमती 2(आई.ई.टी 21953), पंजाब बासमती 3, पूसा बासमती 1637 और पूसा बासमती 1728 जिनकी खेती की जाती है।

नींबू का बाग है फायदे का सौदा, 2 एकड़ में होती है 6 लाख की कमाई

एक किसान अपने पौने दो एकड़ नीबू के बगीचे की लागत से परेशान था, सिर्फ लागत ही लाखों रुपए में पहुंच जाती थी। अभिषेक जैन ने इस बढ़ी लागत को कम करने के लिए बाजार से रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाएं लेनी बंद कर दी। पिछले डेढ़ साल से जैविक तरीके अपनाने से इनकी हजारों रुपए की लागत कम हो गयी है। लागत कम होने से ये नीबू के बगीचे से बाजार भाव के हिसाब से सालाना पांच से छह लाख रुपए बचा लेते हैं।

राजस्थान के भीलवाड़ा जिला मुख्यालय से 80 किलोमीटर दूर संग्रामपुर गाँव के अभिषेक जैन (34 वर्ष) बीकॉम करने के बाद मार्बल के बिजनेस से जुड़ गये। अभिषेक जैन गाँव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, “पिता के देहांत के बाद बिजनेस छोड़कर पुश्तैनी जमीन को सम्भालना पड़ा। खेती करने के दो तीन साल बाद मैंने ये अनुभव किया कि एक तिहाई खर्चा सिर्फ खाद और दवाइयों में निकल जाता है।

इस बढ़ती लागत को कम करने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया था।” वो आगे बताते हैं, “लागत कम करने के लिए पिछले डेढ़ साल पहले साकेत ग्रुप के बारे में पता चला, जो जैविक खेती के लिए किसानों को प्रशिक्षण देता है। इस ग्रुप से जुड़ने के बाद हम पूरी तरह से नीबू के बगीचे को जैविक ढंग से कर रहे हैं, इससे जो लागत 33 प्रतिशत आती थी अब वो 10 प्रतिशत पर आ गयी है।”

इस नीबू के बगीचे से अभिषेक बचा लेते हैं सालाना लाखों रुपए अभिषेक को खेती करने का पहले कोई अनुभव नहीं था। इनकी कुल छह एकड़ सिंचित जमीन है, पौने दो एकड़ जमीन में नीबू की बागवानी और दो एकड़ में अमरुद की बागवानी ये पिछले कई वर्षों से कर रहे हैं। साल 2007 में इनके पिता को हार्ट अटैक से देहांत हो गया।

पुश्तैनी जमीन को करने के लिए इन्होने अपने बिजनेस को बंद किया और 2008 से खेती करने लगे। “खेती को लेकर पहले मेरा कोई अनुभव नहीं था, पर जब खेती करना शुरू किया तो धीरे-धीरे चीजों को सीखने लगा था। हमारे यहाँ नीबू का बगीचा हमेशा से पिता जी खुद करते थे, अमरुद और बाकी की फसलें बटाई पर उठा दी जाती थी।”

अभिषेक बताते हैं, “नीबू की बागवानी में हर साल सात आठ लाख रुपए निकल आते थे लेकिन लागत भी डेढ़ से पौने दो लाख आती थी। इस लागत में सबसे ज्यादा पैसा खाद और कीटनाशक दवाइयों में खर्च हो रहा था। इस लागत को कम करने के लिए जब मैंने बहुत रिसर्च किया तो सोशल साइट के जरिये साकेत पेज पर पहुंचे, जहाँ किसानो को लागत कम करने के तौर तरीके सिखाए जाते थे।”

एक बार नीबू का बगीचा लगाने पर 30 साल तक रहता है जबकि अमरुद का बगीचा 25 साल तक रहता है। अभिषेक के पौने दो एकड़ खेत में नीबू के लगभग 300 पौधे 15 साल पहले से लगे हैं। 25 रुपए एक पौधा पर खर्चा आता है। नीबू के पौधे लगाने के तीन या साढ़े तीन साल बाद से फल निकलने शुरू हो जाते हैं। दो साल तक इसमे कोई भी फसल ले सकते हैं।

अभिषेक बताते हैं, “नीबू के बगीचे में अगर खाद और कीटनाशक दवाएं न डालनी पड़ें तो इसमे ज्यादा कोई खर्चा नहीं होता है। नीबू और गोबर की खाद का ही प्रयोग करें तो सिर्फ मजदूर खर्च ही आता है, बाकी की लागत बच जाती है। एक पौधे का एक साल में देखरेख में सिर्फ 100 रुपए का खर्चा आता है।”

जैविक खेती करने से इनकी लागत सिर्फ 10 प्रतिशत आती है वैसे तो नीबू की पैदावार सालभर होती रहती है। लेकिन सबसे ज्यादा नीबू जुलाई से अक्टूबर में निकलता है। अभिषेक का कहना है, “एक पौधे से एक साल में बाजार भाव के हिसाब से औसतन तीन हजार का प्रोडक्शन निकल आता है, नीबू बाजार भाव के अनुसार 20 रुपए से लेकर 150 रुपए किलो तक रहता है।

पिछले साल आठ लाख रुपए का नीबू बेचा था, इस साल छह साढ़े पांच लाख रुपए का बेच चुका हूँ।” वो आगे बताते हैं, “अमरुद के बगीचे से सालाना छह लाख रुपए निकल आते हैं, नीबू और अमरुद के बगीचे से लागत निकाल कर हर साल 12 से 14 लाख रुपए बच जाते हैं। बगीचे के अलावा मक्का, ज्वार, उड़द, मूंगफली, गेहूँ, जौ, चना सरसों उगाते हैं। सब्जियों में मिर्च, भिन्डी, ग्वारफली, बैंगन, टमाटर, फूलगोभी, पत्तागोभी बोई जाती हैं।”

अभिषेक सभी किसानो को ये सन्देश देते हैं, “अगर खेती में मुनाफा कमाना है तो बाजार पर अपनी निर्भरता को कम करना होगा। जैविक खादें और कीटनाशक दवाइयां घर पर बनानी होंगी, पुराने बीजों को बचा कर रखना होगा। तभी एक आम किसान की लागत कम होगी और बचत ज्यादा होगी।

पिछले डेढ़ साल में सिर्फ जैविक तौर तरीके अपनाकर हमने अपनी लाखों रुपए की लागत कम कर ली है, जबकि नीबू के उत्पादन में कोई असर नहीं पड़ा।” अभिषेक धीरे-धीरे अपनी पूरी खेती को जैविक तरीके से करने लगे हैं क्योंकि इसमे इनकी लागत बहुत कम हो रही है।

ये हैं भारत की पहली बिना क्लच और गेयर से चलने वाली कंबाइन

भारत में फसल कटाई का काम कंबाइन से किया जाता है । कंबाइन चलाना बहुत ही मुश्किल काम होता है लेकिन अब ये काम बहुत आसान होने वाला है ।भारत में अब ऐसी कंबाइन आ चुकी है जिसे चलाना बहुत ही आसान है।

इस का नाम HARVESTER [ SPLENZO 75 ]  है। यह कंबाइन बिना क्लच के काम करती है इस मे गेयर लिवर नहीं दिया गया। इस मे सभी काम बटन दबाने से होते है। अनाज निकालने के लिए भी ऑटोमैटिक बटन लगा हुआ है।

इस कंबाइन का इंजन 101 hp का है। इस की स्पीड रोड पर 36 hr है। इस कंबाइन को चलाना बहुत ही आसान है। इस को चलाते समय ड्राईवर को थकावट महसूस नहीं होती। इसे कोई भी आदमी भी आसानी से चला सकता है।

यह फसल की कटाई बहुत अच्छी तरह करती है। इस कंबाइन से फसल का नुक्सान नहीं होता। दूसरी कंबाइन के मुकाबले यह कटाई का काम बहुत जल्दी करती है।

अगर आप इस कंबाइन को खरीदना चाहते है तो निचे दिए हुए नंबर पर संपर्क कर सकते है :

  • Address : Near Bus Stand, Sunam State : Punjab Country : India
  • Pin Code : 148028
  • Phone : +91-1676-220280
  • Mobile : +91-9779911580

यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो भी देखें :