खेती के लिए बहुत ही उपयोगी है यह 12 प्रकार के जैविक टीके

 

आज कल खेती के लिए ज्यादतर रासयनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग ज्यादा क्या जा रहा है । जो एक बार तो असर करते है लेकिन लम्बे समय तक प्रयोग करने से वो मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को कम कर देते है ।साथ में धीरे धीरे इनका असर भी कम होने लग जाता है ऐसे में अगर आप जैविक टीकों का इस्तेमाल करेंगे तो आप की फसल उत्पादन तो बढ़ेगा ही साथ में इनका असर भी सालों साल चलेगा

नील हरित शैवाल टीका: धान में काफी लाभकारी है। यह नत्रजन के अलावा जैविक कार्बन एवं पादप वृद्धि करने वाले पदार्थ भी उपलब्ध कराता है। एक एकड़ की धान की फसल को उपचारित करने के लिए 500 ग्राम का एक पैकेट टीका काफी है। 20 से 30 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर फसल में लाभ होता है।

अजोला टीका: यह एक आदर्श जैविक प्रणाली है। जो उष्ण दिशाओं में धान के खेत में वायुमंडलीय नत्रजन का जैविक स्थिरीकरण करता है। अजोला 25 से 30 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर प्रति फसल को योगदान करता है।

हरी खाद: साल में एक बार हरी खाद उगाकर खेत में जोतकर कार्बनिक अंश को बनाए रख सकते हैं। हरी खादों में दलहनी फसलों, वृक्षों की पत्तियां खरपतवारों को जोतकर उपयोग किया जाता है। एक दलहनी परिवार की फसल 10-25 टन हरी खाद पैदा करती है। इसके जोतने से 60 से 90 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर की दर से प्राप्त होती है।

ढैंचा: यह फसल 40 से 60 दिनों में जोतने लायक हो जाती है। यह 50 से 60 किलोग्राम नत्रजन की भी प्रति हेक्टेयर आपूर्ति करता है। बुवाई के लिए 30 से 40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर डालें दो से तीन सिंचाई ही करनी पड़ती है। इसके अलावा नील हरित शैवाल टीका, आरबसक्ूयलर माइकोराजा न्यूट्रीलिंक टीका, सूबबूल आदि भी लाभकारी हैं।

कंपोस्ट टीका: इस टीके के प्रयोग से धान के पुआल का 6 से 9 सप्ताह के अंदर बहुत अच्छा कंपोस्ट बन जाता है। एक पैकेट के अंदर 500 ग्राम टीका होता है जो एक टन कृषि अवशेष को तेजी से सड़ाकर कंपोस्ट बनाने के लिए काफी है।

राइजोबियम टीका: राइजोबियम का टीका दलहनी, तिलहनी एवं चारे वाली फसलों में प्रयोग होता है। ये 50 से 100 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर का जैविक स्थिरीकरण कर सकते हैं। इससे 25 से 30 फीसदी फसल उत्पादन बढ़ता है।

एजोटोबैक्टर टीका: यह स्वतंत्र जीवी जीवाणु है। इसका प्रयोेग गेहूं, धान, मक्का, बाजरा आदि, टमाटर, आलू, बैंगन, प्याज, कपास सरसों आदि में करते हैं। 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर की बचत करता है। 10 से 20 प्रतिशत फसल बढ़ती है।

एजोस्पिरिलम टीका: इसका प्रयोग अनाज वाली फसलों में होता है। जैसे ज्वार, बाजरा, रागी, मोटे छोटे अनाजों एवं जई में होता है। चारे वाली फसलों पर भी लाभकारी होता है। 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर बचत करता है। फसल चारा उत्पादन बढ़ता है।

फास्फोरस विलयी जीवाणु टीका: फास्फोरस पौधों के लिए मुख्य पोषक तत्व है। इस टीके के प्रयोग से मृदा में मौजूद अघुलनशील फास्फोरस घुलनशील होकर पौधों को उपलब्ध हो जाता है

अब प्रिया पावर वीडर पर बैठ कर करें खेत की निराई गुड़ाई

अक्सर आप ने देखा होगा के कपास और दूसरी फसलों में खपतवार बहुत होते है जिनको निकलना बहुत ही जरूरी है अगर इन्हे वक्त पर ना निकला जाये तो सारी फसल ख़राब हो जाती है । बहुत से लोग गुड़ाई के लिए ट्रेक्टर जा फिर बैल का इस्तेमाल करते है  ।

क्योंकि ट्रेक्टर महंगा पड़ता है और बैल से काम बहुत धीरे होता है  । इस लिए दोनों ही विकलप कामयाब नहीं है  । ऐसे किसानो के लिए “प्रिया पावर वीडर” आया है । इसका एक फ़ायदा यह भी है के बाक़ी पावर वीडर की तरह इसे पकड़ कर चलने के जरूरत नहीं होती बल्कि आप इसके ऊपर बैठ कर चला सकते है ।

यह एक आधुनिक पावर मशीन है जो आमतौर पर कपास और गन्ने की फसल में से नदीन निकालने के लिए प्रयोग की जाती है। यह ज़मीन को नर्म करती है और गोडाई का काम भी कम करती है।

यह 2 मॉडल में उपलब्द है एक मॉडल में इसमें पेट्रोल इंजन लगा होता है जिसकी पावर 4.7 HP होती है । दूसरे मॉडल में इसमें डीज़ल इंजन लगा होता है जिसकी पावर 9 HP होती है। अधिक जानकारी के लिए आप निचे दिए हुए नंबर पर संपर्क कर सकते है । कृष्णा गोहिल +91 8347472029, +91 8000935123

इस मशीन की विशेषताएं:

• अंतर फसली उगाने में सहायक मशीन है।
• जोताई के घेरे को आवश्यकतानुसार कम या ज्यादा किया जा सकता है।
• खर्चा कम करती है।
• फसल को बिना कोई नुकसान पहुंचाए गोडाई करती है।
• इसे चलाना इतना आसान है कि महिलायें भी इसे आसानी से चला सकती हैं।

यह मशीन कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें 

धान को रोग, कीटों से बचाने के लिए करें ये उपाय

किसान महंगे बीज, खाद इस्तेमाल कर धान की खेती करता है, ऐसे में सही प्रबंधन न होने से कीट और रोगों से काफी नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए सही समय से ही इनका प्रबंधन कर नुकसान से बचा जा सकता है।

धान की फसल को विभिन्न बीमारियों में जैसे धान का झोंका, भूरा धब्बा, शीथ ब्लाइट, आभासी कंड व जिंक कि कमी आदि की समस्या प्रमुख समस्या होती है। क्षतिकर कीटों जैसे तना छेदक, गुलाबी तना छेदक, पत्ती लपेटक, धान का फूदका और गंधीबग कीटों से नुकसान पहुंचता है।

धान का तना छेदक

इस कीट की सूड़ी अवस्था ही क्षतिकर होती है। सबसे पहले अंडे से निकलने के बाद सूड़ियां मध्य कलिकाओं की पत्तियों में छेदकर अन्दर घुस जाती हैं और अन्दर ही अन्दर तने को खाती हुई गांठ तक चली जाती हैं। पौधों की बढ़वार की अवस्था में प्रकोप होने पर बालियां नहीं निकलती हैं। बाली वाली अवस्था में प्रकोप होने पर बालियां सूखकर सफ़ेद हो जाती हैं और दाने नहीं बनते हैं।

कीट प्रबंध:

फसल की कटाई जमीन की सतह से करनी चाहिए और ठूठों को एकत्रित कर जला देना चाहिए। जिंक सल्फेट+बुझा हुआ चूना (100 ग्राम+ 50 ग्राम) प्रति नाली की दर से 15-20 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। पौध रोपाई के समय पौधों के ऊपरी भाग की पत्तियों को थोड़ा सा काटकर रोपाई करें, जिससे अंडे नष्ट हो जाते हैं। धतूरा के पत्ते नीम के पती तम्बाकू को 20 लीटर पानी में उबालें यह पानी 4-5 लीटर रह जाए तो ठंडा करके 10 लीटर गौमूत्र में मिलाकर छिड़काव करें।

रासायनिक विधि – तना छेदक की रोकथाम के लिए कार्बोफूरान तीन जी 20 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से 3-5 सेमी स्थिर पानी में अथवा कारटाप हाइड्रोेक्लोराइड चार प्रतिशत 18 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 3-5 सेमी स्थिर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

धान का पत्ती लपेटक कीट

मादा कीट धान की पत्तियों के शिराओं के पास समूह में अंडे देती हैं। इन अण्डों से छह-आठ दिनों में सूड़ियां बाहर निकलती हैं। ये सूड़ियां पहले मुलायम पत्तियों को खाती हैं और बाद में अपने लार से रेशमी धागा बनाकर पत्ती को किनारों से मोड़ देती हैं और अन्दर ही अन्दर खुरच कर खाती है।

धान की गंधीबग

वयस्क लम्बा, पतले और हरे-भूरे रंग का उड़ने वाला कीट होता है। इस कीट की पहचान कीट से आने वाली दुर्गन्ध से भी कर सकते हैं। इसके व्यस्क और शिशु दूधिया दानों को चूसकर हानि पहुंचाते हैं, जिससे दानों पर भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं और दाने खोखले रह जाते हैं।

देसी तरिके से –यदि कीट की संख्या एक या एक से अधिक प्रति पौध दिखायी दे तो मालाथियान पांच प्रतिशत विष धूल की 500-600 ग्राम मात्रा प्रति नाली की दर से छिड़काव करें। खेत के मेड़ों पर उगे घास की सफाई करें क्योंकि इन्ही खरपतवारों पर ये कीट पनपते रहते हैं और दुग्धावस्था में फसल पर आक्रमण करते हैं।

रासायनिक विधि –10 प्रतिशत पत्तियां क्षतिग्रस्त होने पर केल्डान 50 प्रतिशत घुलनशील धूल का दो ग्राम/ली. पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें।

भूरी चित्ती रोग

इस रोग के लक्षण मुख्यतया पत्तियों पर छोटे- छोटे भूरे रंग के धब्बे के रूप में दिखाई देतें है। उग्र संक्रमण होने पर ये धब्बे आपस में मिल कर पत्तियों को सूखा देते हैं और बालियां पूर्ण रूप से बाहर नहीं निकलती हैं। इस रोग का प्रकोप धान में कम उर्वरता वाले क्षेत्रों में अधिक दिखाई देता है।

इस रोग के रोकथाम के लिए बुवाई से पहले बीज को ट्राईसाइक्लेजोल दो ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करें। पुष्पन की अवस्था में जरुरत पड़ने पर कार्बेन्डाजिम का छिड़काव करें। रोग के लक्षण दिखाई देने पर 10-20 दिन के अन्तराल पर या बाली निकलते समय दो बार आवश्यकतानुसार

रासायनिक विधि –कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत घुलनशील धूल की 15-20 ग्राम मात्रा को लगभग 15 ली पानी में घोल बनाकर प्रति नाली की दर से छिड़काव करें।

पर्णच्छाद अंगमारी

इस रोग के लक्षण मुख्यत: पत्तियों पर दिखाई देते हैं। संतुलित मात्रा में नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश का प्रयोग करें। बीज को थीरम 2.5 ग्राम/किग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बुवाई करें। जुलाई महीने में रोग के लक्षण दिखाई देने पर मैकोजेब (0.24 प्रतिशत) का छिड़काव करें।

आभासी कंड

यह एक फफूंदीजनित रोग है। रोग के लक्षण पौधों में बालियों के निकलने के बाद ही स्पष्ट होते हैं। रोगग्रस्त दाने पीले से लेकर संतरे के रंग के हो जाते हैं जो बाद में जैतूनी- काले रंग के गोलों में बदल जाते हैं। फसल काटने के बाद अवशेषों को जला दें। खेतों में अधिक जलभराव नहीं होना चाहिए। रोग के लक्षण दिखाई देने पर प्रोपेकोनेजोल 20 मिली. मात्रा को 15-20 ली. पानी में घोल बनाकर प्रति नाली की दर से छिड़काव करें।

किसानो को लखपति बना रही है अमरुद की यह नई किसम VNR BIHI

इन दि‍नों इंसान के सि‍र जि‍तने मोटे अमरूद ने बाजार में काफी हलचल मचा रखी है। एक अमरूद का वजन डेढ़ कि‍लो तक पहुंच जाता है और इसकी पैदावार करने वाले कि‍सानों का माल हाथोंहाथ बि‍क रहा है।

यह भारी भरकम अमरूद न केवल देखने में सुंदर लगता है बल्‍कि इसका टेस्‍ट भी बेहतरीन है। अमरूद की इस कि‍स्‍म का नाम है VNR BIHI जि‍सने कई कि‍सानों को मालामाल कर दि‍या है। जि‍न भी इलाकों में यह पैदा हो रहा है वहां इसकी काफी मांग है। इसकी कीमत 150 रुपए से लेकर 370 रुपए कि‍लो तक है।

प्राइवेट जॉब छोड़ शुरू की खेती

नीरज एक सॉफ्टवेयर इंजीनि‍यर थे मगर अब वह जींद के संगतपुरा गांव में खेतीबाड़ी करते हैं। वह इस अमरूद की बड़े पैमाने पर खेती करते हैं। इन्‍होंने अमरूद के करीब 1600 पेड़ लगाए हैं और साल में दो बार फसल लेते हैं।

एक पेड़ पूरे साल में 75 से 100 कि‍लो अमरूद देता है। नीरज ऑनलाइन इनकी सप्‍लाई करते हैं। वह एक पैकेट 555 रुपए में देते हैं जि‍समें आमतौर पर तीन अमरूद होते हैं, जि‍नका कुल वजन 1600 ग्राम से 1800 ग्राम होता है।

कैसे की जाती है इसकी खेती

इसकी खेती करना आसान काम नहीं है। काफी रखरखाव करना होगा। जब फल आते हैं तब खासतौर पर देखभाल करनी होती है। फलों की बैगिंग करनी होती है। एक पेड़ से दूसरे पेड़ के बीच में 12 फुट सामने और आठ फुट की दूरी पर बगल में होनी चाहि‍ए। नीरज कि‍सानों को इस पौधे को लगाने और रखरखाव की ट्रेनिंग भी देते हैं, मगर ये फ्री नहीं है। वह इसके लि‍ए फीस लेते हैं। ट्रेनिंग आमतौर पर दो दि‍न की होती है।

कहां से मि‍ल सकता है पौधा

अमरूद की यह प्रजाति वैसे तो थाईलैंड से आई है। यहां अभी इसकी पौध मि‍लती है। इसे आप डायरेक्‍ट VNR की नर्सरी से खरीद सकते हैं। कंपनी की वेबसाइट पर रेट सहि‍त इसकी पूरी जानकारी दी गई है। कंपनी की वेबसाइट के मुताबि‍क, अगर आप 1 से 10 पौधे लेते हैं तो प्रति पौधा इसकी कीमत 330 रुपए है। पौधों की गि‍नती बढ़ने पर रेट कम हो जाते हैं।

इस यंत्र से फसलों की हर जानकारी मिलेगी मोबाइल पर, पशु खेत में आने पर भी मिलेगा अलर्ट

एग्रीकल्चर प्रोटेक्शन सिस्टम (एपीएस) डिवाइस खेतों की निगहबानी करेगी। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि अब किसान के मोबाइल में उसका पूरा खेत होगा। खेत को किस उर्वरक की जरूरत है, फसल पर कीट पतंगों का हमला, आवारा पशुओं के खेत में आने पर एलर्ट करना, मिट्टी की आद्रता, पीएच वेल्यू और तापमान का पता बताने के साथ सिंचाई पूरी होने तक की जानकारी यह डिवाइस मोबाइल के जरिए किसान तक पहुंचाएगी।

यह डिवाइस चंदौली के बबुरी गांव निवासी मेरठ के आइआइएमटी विवि से इलेक्ट्रॉनिक एवं कम्यूनिकेशन में रिसर्च कर रहे संदीप वर्मा पुत्र संतोष कुमार ने प्रो-वीसी डॉ. दीपा शर्मा के निर्देशन और वीसी प्रो. योगेश मोहन गुप्ता के संरक्षण में तैयार की है। दो साल में कई बार परीक्षण कर इसमें सुधार करने के बाद जुलाई  में यह डिवाइस तैयार हुई। सूक्ष्म एवं लघु उद्योग भारत सरकार ने इसके लिए पांच लाख की फंडिंग भी की।

क्या है एपीएस डिवाइस

डिवाइस माइक्रो प्रोससर चिप बेस्ड है। इसमें ह्यूमेंडिटी सेंसर, रेन सेंसर, फायर सेंसर, टेंप्रेचर सेंसर, इरीगेशन सेंसर और मोशन सेंसर लगा है। यह सौर ऊर्जा और बिजली से संचालित है। ये सभी सेंसर खेत की हर हलचल पर नजर रखेंगे। एक एकड़ में यह काम करेगी। इससे ज्यादा क्षेत्रफल पर अतिरिक्त डिवाइस खेत में लगानी होगी।

इस तरह काम करेगी यह डिवाइस

सेंसर लगी डिवाइस खेत में होगी। जबकि कंट्रोलर नलकूप में। डिवाइस किसान के मोबाइल से कनेक्ट रहेगी। खेत में ट्यूबवेल चल रहा है और बारिश हो जाती है तो रेन सेंसर काम करते हुए ट्यूबवेल को बंद कर देगा। यदि बारिश नहीं हुई और मिट्टी सूखने लगी तो सेंसर मोटर को चालू कर देगा। इसमें वाटर लेबल तय करने का विकल्प रहेगा।

खेत में कितने इंच पानी चाहिए इसे सेट करने पर जैसे ही खेत में पानी का तल उस पर पहुंचेगा मोटर बंद हो जाएगी। डिवाइस यह भी बताएगी कि खेत में कब और किस खाद की जरूरत है। खेत में रात्रि या दिन के समय जंगली जानवर आ गए तो मोशन सेंसर मोबाइल पर एलर्ट करेगा। खेत में यदि तार बिछाए गए हैं तो किसान उसमें करेंट एक्टिवेट कर सकेंगे।

क्या कहते हैं शोधार्थी संदीप वर्मा

उन्होंने अपने बारे में बताया, ‘गरीब घर में पैदा हुआ। करीब से खेती किसानी देखी है। बचपन से ही यह लक्ष्य रखा था कि खेती किसानी के लिए कुछ नया करूंगा। अपना विजन प्रो-वीसी डॉ. दीपा शर्मा को बताया। कुछ काम करके भी दिखाया।

उन्होंने कई बदलाव किए। पहली डिवाइस 2016 में तैयार हुई, लेकिन वह कारगर नहीं थी, 2017 में दो प्रयोग किए लेकिन जो चाहता था वैसा तैयार नहीं हुआ। जून 2018 में डिवाइस पूरी तरह से तैयार हो गई। इसका जुलाई में प्रयोग किया जो सफल रहा।

अब बैलों से खेती करने वाले किसानो के लिए आ गई नई बिजाई मशीन

आप ने ट्रेक्टर के साथ खेत में बिजाई तो बहुत देखी होगी । लेकिन अभी भी बहुत से लोग है जो बैलों से खेती करते है । ऐसे किसान बीज बोने के लिए हाथ से छींटे दे देते है । जिस से फसल अच्छी नहीं होती । ऐसे किसानो के लिए अब बहुत सी कंपनी बिजाई की मशीन बना रही है ।

आज  हम आपको जिस कंपनी की मशीन दिखने वाले है उस कंपनी का नाम है “मौसम एग्रो” । यह कंपनी ट्रेक्टर के साथ चलने वाली बिजाई मशीन तो बनती ही है साथ में जानवरों यानि के बेलों के साथ चलनी वाली बिजाई मशीन भी बनती है ।

इस मशीन में एक बार में 14 किल्लो बीज डाला जा सकता है । यह मशीन 5 कतारों में एक साथ बिजाई करती है ।इसके इलावा धरती एग्रो भी ऐसे ही मशीन बनाते है आप वहां से भी इसकी जानकारी ले सकते है

यह मशीन कैसे काम करती है इसके लिए यह वीडियो देखें

अगर आप इस मशीन की कीमत और दूसरी कोई जानकारी के बारे में जानना चाहते है तो निचे दिए हुए नंबर पर कांटेक्ट करें

Ph. +91 – 2827 – 253454, 253654
Mob. +91 – 98795 76920 / 65
info@mausamagro.com
www.mausamagro.com

ऐसे करें नीम का खेती में इस्तेमाल ,महंगे कीटनाशक से मिल जायगा छुटकारा

नीम का वृक्ष प्रकृति का अनुपम उपहार हैं। नीम से तैयार किये गए उत्पादों का कीट नियंत्रण अनोखा हैं, इस कारण नीम से बनाई गई दवा विश्व में सबसे अच्छी कीट नियंत्रण दवा मानी जाती हैं। लेकिन इसके उपयोग को लोग अब भूल रहे हैं। इसका फायदा अब बड़ी-बड़ी कम्पनिया उठा रही हैं ये कम्पनिया इसकी निम्बोलियों व पत्तियों से बनाई गई कीटनाशक दवाये महंगे दामों पर बेचती हैं।

इसकी कड़वी गन्ध से सभी जिव दूर भागते हैं। वे कीट जिनकी सुगंध क्षमता बहुत विकसित हो गयी हैं, वे इसको छोड़कर दूर चले जाते हैं जिन पर नीम के रसायन छिड़के गए हों।

इसके संपर्क में मुलायम त्वचा वाले कीट जैसे चेंपा, तैला, थ्रिप्स, सफेद मक्खी आदि आने पर मर जाते हैं। नीम का मनुष्य जीवन पर जहरीला प्रभाव नहीं पड़ना ही इसको दवाओं के रूप में उच्च स्थान दिलाता हैं। नीम की निम्बोलिया जून से अगस्त तक पक कर गिरती हैं निम्बोली का स्वाद हल्का मीठा होता हैं।

इसकी निम्बोली गिरने पर सड़कर समाप्त हो जाती हैं परन्तु गिरी सफेद गुठली से ढकी होने के कारण लम्बे समय तक सुरक्षित रहती हैं। निम्बोली को तोड़ने पर 55% भाग गुठली के रूप में अलग हो जाता हैं। तथा 45% गिरी के रूप में प्राप्त होता हैं। अच्छे ढंग से संग्रहित की गई गिरी हरे भूरे रंग की होती हैं।

नीम से तैयार दवाइयों के अनेक गुण

  •  रासायनिक दवाइयों की स्प्रे नीम में मिलाकर करें। इस तरह करने से रासायनिक दवाइयों के प्रयोग में 25-30 प्रतिशत तक कमी आती है।
  • नीम की स्प्रे सुबह या शाम के समय करनी चाहिए।
  • नीम केक पाउडर डालने से खेत में बहुत तरह के प्रभाव देखे जा सकते हैं जैसे कि इससे पौधे निमाटोड और फंगस से बचे रहते हैं। इस विधि से ज़मीन के तत्व आसानी से पौधे में मिल जाते हैं।
  •  नीम हानिकारक कीटों के जीवन चक्र को भी प्रभावित करती है, जैसे कि अंडे, लार्वा आदि। इसके अलावा भुंडियों, सुंडियों और टिड्डों आदि पर भी प्रभाव पड़ता है। यह रस चूसने वाले कीटों की ज्यादा रोधक नहीं है।
  • यदि नीम का गुद्दा यूरिया के साथ प्रयोग किया जाये, तो खाद का प्रभाव बढ़ जाता है और ज़मीन के अंदरूनी हानिकारक बीमारियों और कीटों से बचाव होता है।
  • दीमक से बचाव के लिए 3-5 किलो नीम पाउडर को बिजाई से पहले एक एकड़ मिट्टी में मिलायें।
  • मूंगफली में पत्ते के सुरंगी कीट के लिए 1.0 प्रतिशत नीम के बीजों का रस या 2 प्रतिशत नीम के तेल की स्प्रे बिजाई के 35-40 दिनों के बाद करें।
  • जड़ों में गांठे बनने की बीमारी की रोकथाम के लिए 50 ग्राम नीम पाउडर को 50 लीटर पानी में पूरी रात डुबोयें और फिर स्प्रे करें

अब गीली और गिरी हुई फसल को बड़ी आसानी से कटेगी यह कंबाइन

वैसे तो धान की फसल तैयार करना काफी मुश्किल भरा होता है, किसान जी-जान लगा देता है फसल को तैयार करने में, लेकिन इसके बाद भी धान की मड़ाई करना भी काफी मुश्किल भरा काम होता है। खास तोर पर जब फसल बिलकुल त्यार हो और आंधी और बारिश से आप की खड़ी फसल फसल गिर जाये ।लेकिन अब बारिश और आंधी से ख़राब हुई फसल वाले किसानो को घबरने की जरूरत नहीं क्योंकि अब आ गई है हाफ फीड कंबाइन (Head Feed Combine Harvester )

आम कंबाइन से गिरी हुई फसल को काट पाना बहुत ही मुश्किल काम है और फसल का बहुत ही नुकसान होता है । लेकिन इस मशीन के इस्तेमाल करने के बहुत से फायदे है जैसे यह बहुत कम जगह लेता है ।साथ में इस कंबाइन से आप गिरी हुई फसल भी फसल को नुकसान पहुंचाए बिना अच्छे तरीके से काट सकते है ।अगर जमीन गीली भी है तो भी हल्का होने के कारण यह कंबाइन गीली जमीन पर आसानी से चलती है ज़मीन में धस्ती नहीं ।

छोटा होने के कारण हर जगह पर पहुँच जाता है । और इस मिनी कम्बाइन से एक एकड़ काटने में बहुत ही कम खर्च आता है।और इसमें ग्रेन लोस्स मतलब अनाज का नुकसान भी बहुत कम होता है।

इसमें 72 Hp का फ़ोर स्ट्रोक डीजल इंजन लगा हुआ है इस मॉडल का नाम Model – Model- 4L 88 है । सिर्फ धान ही नहीं इस से आप बाकी की अनाज फसलें जैसे गेहूं ,धान सरसों अदि भी काट सकते है ।यह कंबाइन भारतीए सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है और इसके ऊपर सब्सिडी भी उपलब्ध है ।

यह कंबाइन कैसे काम करता है और कैसे गिरी हुई फसल उठा सकता है उसके लिए वीडियो देखें

अगर आप इस कंबाइन को खरीदना चाहते है तो नीचे दिए हुए पते और नंबर पर संपर्क करें

JASHODA AGRO WORKS
Mr. Vikram Patel

Khara Kuva, Railway Station Road, Sojitra, Anand, Gujarat, India – 387240

Call Us : 08048066431
Phone : +91-2697-234993
Mobile : +91-9426394460, +91-9427643303
Email Address : jashodaagroworks@gmail.com
Web Site : http://www.jashodaagroworks.in

सर्वे के मुताबिक किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी,इस राज्य का किसान है सबसे अमीर

राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण बैंक (नाबार्ड) के सर्वे के मुताबिक 2012-13 से 2015-16 के बीच देश के किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी हुई है। हर तीसरे साल होने वाले अखिल भारतीय समावेश सर्वेक्षण (एनएएफआईएस) के आधार पर नाबार्ड ने कहा है कि 2015-16 में किसानों की मासिक आय 2012-13 के 6,426 रुपये से बढ़कर 8,059 रुपये हो गई।

इस सर्वेक्षण के मुताबिक, 2015-16 के दौरान देश में ग्रामीण परिवार की औसत मासिक आय 8,059 रुपये थी, जबकि उसका औसत खर्च 6,646 रुपये था। इस लिहाज से हर महीने इन परिवारों को 1,413 रुपये की बचत होती है।

पंजाब, हरियाणा और केरल में रहने वाले ग्रामीण परिवार की मासिक आय देश में सबसे ज्यादा क्रमश: 23,133 रुपये, 18,496 रुपये और 16,927 रुपये हो गई है जबकि 2012-13 में इन राज्यों में मासिक आय क्रमश:18,059 रुपये, 14,434 रुपये और 11,888 रुपये थी। अभी भी पंजाब का किसान देश के बाकि किसानो के मुकाबले सबसे अमीर है ।

ताजा सर्वे के अनुसार, उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे नीचे है। उत्तर प्रदेश के गांवों में रहने वाले परिवारों की औसत मासिक आय महज 6,668 रुपये ही है जबकि वर्ष 2012-13 में राज्य के परिवारों की मासिक आय 4,923 रुपये ही थी।

सर्वे में कहा गया है कि आंध्रप्रदेश के किसान की कमाई सबसे कम है आंध्रप्रदेश में आमदनी की तुलना में मंहगाई अधिक होने से ग्रामीण परिवार एक महीने में महज 95 रुपये ही बचा पता है। बिहार के ग्रामीण परिवार की एक माह की बचत 262 रुपये और उत्तर प्रदेश के गांव में रहने वाला परिवार एक महीने में 315 रुपये बचा पाता है।

देश में इन 14 कीटनाशकों पर तत्काल प्रतिबंध, इनसे फैलता है कैंसर

केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए खतरनाक 18 कीटनाशकों पर रोक लगा दी है। सरकार की ओर से गठित समिति ने अपनी सिफारिश में इन कीटनाशकों से होने वाले संभावित नुकसान पर प्रकाश डाला था, जिसके बाद केंद्र ने इन पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया।

इन कीटनाशकों के इस्तेमाल पर कई देशों ने पहले से ही पाबंदी लगा रखी है। सरकार ने बेनोमिल, कार्बाराइल, फेनारिमोल, मिथॉक्सी एथाइल मरकरी क्लोराइड, थियोमेटॉन सहित कुल 14 कीटनाशकों पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया है, जबकि एलाचलोर, डिचलोरवस, फोरेट और फोस्फामिडॉन देश में 2020 से प्रतिबंधित होंगे।

कीटनाशकों की समीक्षा के लिए गठित समिति ने 16 जुलाई को इस मुद्दे पर सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी, जिसने सिफारिशों में कहा कि ये कीटनाशक लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं। विभिन्न स्तरों पर इनका प्रयोग फसल को कैंसर कारक व विषैला बनाता है। इसी वजह से कई देशों ने इनके इस्तेमाल पर पूरी तरह से पाबंदी लगा रखा है। समिति ने कहा कि इन्हें प्रतिबंधित किया जाना ही उचित व्यवस्था होगी।

कंपनियां जारी करेंगी चेतावनी

केंद्र सरकार द्वारा जारी आदेश के अनुसार, जिन कीटनाशकों को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित किया गया है, उनका निर्माण करने वाली कंपनियों को देशभर में मौजूद इन कीटनाशकों का इस्तेमाल रोकने के लिए चेतावनी जारी करनी होगी। उन्हें बाजार से अपना माल वापस लेना होगा। कंपनियों को चेतावनी में स्पष्ट करना होगा कि स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए खतरनाक होने के मद्देनजर इन कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाए।

सर्वोच्च न्यायालय का रुख सख्त

सर्वोच्च न्यायालय ने भी केंद्र को इन कीटनाशकों पर जल्द फैसला लेने के लिए कहा था। न्यायालय ने सरकार को दो महीने का वक्त दिया था। इससे पहले महाराष्ट्र में नवंबर 2017 में कीटनाशकों के इस्तेमाल से 50 से भी ज्यादा किसानों की मौत हो गई थी।

जानलेवा 66 कीटनाशकों का हो रहा इस्तेमाल

हाल में सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने स्पष्ट किया था कि देश में ऐसे 66 कीटनाशकों को इस्तेमाल में लाया जाता है, जो एक या उससे ज्यादा देशों में प्रतिबंधित हैं। इनमें 28 पर पहले ही रोक लगाई जा चुकी है।