70 हजार रूपये किलो कीमत पर बिकता है ये खीरा, किसान हो रहे मालामाल

लोग गर्मियों में शरीर को ठंडा रखने के लिए अक्सर खीरे का सेवन करते हैं। ये जीभ का स्वाद बनाए रखने के साथ शरीर में पानी की कमी को भी पूरा करता है। लेकिन क्या आप किसी खीरे को खरीदने के लिए 70 हजार रुपए खर्च कर सकते हैं? आज हम आपको ऐसे ही खीरे के बारे में बताने जा रहे हैं ,यह कोई मामूली खीरा नहीं इसका नाम है समुद्री खीरा।

आम तौर पर समुद्र खीरे की लम्बाई 10 से 30 सेमी (3.9 – 11.8 इंच) होती है। और इनका कम से कम साइज 3 मिमी होता है। यह दिखने में गोलाकार होते हैं। यह खीरा कोई फल या सब्जी नहीं बल्कि एक समुद्री जीव है।

चीन के लोग लोग इस खीरे को बड़े शौक से खाते हैं। सूखे हुए सी-कुकम्बर की एक किलो की कीमत लगभग एक हजार डालर (70 हजार रुपए) तक होती है। बाजार में बिकने के लिए इस खीरे का वजन कम से कम 400 ग्राम होना चाहिए। जबकि 450 ग्राम का व्यस्क सी कुकम्बर अच्छा माना जाता है।

इसे मार्केट में बेचने से पहले नीचे से काटकर मिट्टी में दबा दिया जाता है। मिट्टी से निकालने के बाद इसे पकाया जाता है। जिसके बाद ही ग्राहकों को ये प्रोडक्ट के रूप में बेचा जाता है।

सी कुकम्बर का सेवन करने से पहले इन्हें दोबारा पानी में डाला जाता है। जिसकी वजह से काफी मुलायम हो जाते हैं। आप चाहें तो इन्हें सलाद के तौर पर काटकर प्लेट पर सजा सकते हैं या सलाद के साथ सूशी की तरह भी खा सकते हैं।

इस खीरे की अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत अधिक कीमत होती है। यह एक ऐसा प्राणी है जो इकोसिस्टम के लिए बेहद जरूरी है। ये बिल्कुल रेत के अनुरूप होता हैए और जो पानी में रहकर कचरे, सूक्ष्म इकाई, बैक्टीरिया जैसी चीजों को साफ करता है। मेडागास्कर के तट से एक किलोमीटर दूर टाम पोलो में सी कुकम्बर की खेती हो रही हैं।

यहां ब्लू वेंचर नाम के एक एनजीओ की मदद से गांव के लोगों ने फार्म बनाएं। जिसके बाद 70 फीसदी से ज्यादा गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले किसानों और आम लोगों के जीवन स्तर में काफी सुधार देखने को मिल रहा है। अनुमान लगाया गया है कि समुद्र में सी कुकम्बर की कुल 1200 से अधिक प्रजातियां मौजूद हैं।

इस किसान ने इजरायल के तरीके से आम की खेती कर बनाया उत्पादन का रिकॉर्ड, जाने क्या है इजरायली तकनीक

इजरायल आम उत्पादन के मामले में दुनियाभर में पहले स्थान पर है। ऐसा क्यों है इसको समझने के लिए नासिक के जनार्दन वाघेरे ने अपने 10 एकड़ खेत में एक प्रयोग किया। उन्होंने यह प्रयोग केसर आमों पर किया। जनार्दन के मुताबिक, इजरायल की तकनीक से लगाए गए पौधों में प्रति एकड़ 3 टन आम की पैदावार हुई। जर्नादन वाघेरे ने बताया क्या है इजरायली तकनीक और भारत में आम की पैदावार इतनी कम क्यों है-

ज़्यादा रसायनों का नहीं किया इस्तेमाल

जनार्दन वाघेरे किसान होने के साथ नासिक में मैंगो फार्म के मालिक भी हैं। उन्होंने बताया, इजरायल में आम की खेती के दौरान 6X12 का नियम लागू किया जाता है। यानी हर 6 फीट की दूरी पर एक पेड़ लगाया जाता है और एक से दूसरी कतार की दूरी 12 फीट होती है।

उन्होंने यह दूरी कम करके 3X14 का नियम लागू किया। फसल में रसायनों का इस्तेमाल न्यूनतम किया। नतीजा यह रहा है कि प्रति एकड़ 3 टन आम की पैदावार हुई। अब यही तकनीक जनार्दन महाराष्ट्र और गुजरात के किसानों को सिखा रहे हैं।

भारत इसलिए है उत्पादन में पीछे

उन्होंने बताया, भारत में आम के उत्पादन में 30X30 का नियम लागू किया जाता है। पौधों के बीच दूरी अधिक होने के कारण बड़ी जगह पर भी कम पौधे लगाए जाते हैं। इसलिए हम उत्पादन में इजरायल से पीछे हैं। इजरायल में आमों के रिकॉर्ड उत्पादन का श्रेय मैंगो प्रोजेक्ट को भी जाता है जिसे यहां की सरकार चला रही है। खेती से लेकर ब्रांडिंग तक की जिम्मेदारी मैंगो प्रोजेक्ट का ही हिस्सा है।

जून से दिसंबर तक होती है कटाई

इजरायल में 90 फीसदी आमों की पैदावार गिलबोआ और 10 फीसदी सेंट्रल अरावा व जॉर्डन वैली में होती है। यहां आमों की काफी वैरायटी हैं और इनकी खासियत के मुताबिक कटाई का समय भी अलग-अलग होता है। 15 जून से लेकर दिसंबर तक आमों की कटाई की जाती है। जून से अगस्त के बीच अरावा में पैदा होने वाली हादेन, टॉमी और माया प्रजाति तोड़ ली जाती है। अगस्त में शेली, नोआ, ओमर और सितंबर में केंट की कटाई की जाती है।

एक साल में 50 हजार टन का उत्पादन

इजरायल में हर साल 50 हजार टन आमों का उत्पादन किया जाता है। इसमें से 20 हजार टन आम को यूरोप, फ्रांस, नीदरलैंड, गाजा, वेस्ट बैंक और रशिया जैसे देशों में निर्यात किया जाता है। 30 हजार टन स्थानीय बाजारों में बिक्री के लिए भेजा जाता है।

यहां हर साल 100-150 हेक्टेयर नए हिस्से में पौधरोपण किया जाता है ताकि धीरे-धीरे आमों की पैदावार को बढ़ाया जा सके। औसतन एक हेक्टेयर में यहां 30-40 टन आम की पैदावर होती है जबकि दूसरे देशों में 10 टन प्रति हेक्टेयर ही पैदावार हो पाती है।

3000 रूपये पेंशन पाने के लिए हर किसान आज ही करे यह काम

मोदी सरकार अपनी पहली कैबिनेट बैठक में 60 साल की उम्र पर कर चुके किसानों के लिए 3000 रुपए प्रतिमाह की पेंशन देने की घोषणा कर चुकी है और अब इसको लेकर गंभीर हो गई है।

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसान पेंशन स्कीम को लेकर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कृषि मंत्रियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए चर्चा की। इस चर्चा में केंद्रीय मंत्री ने राज्यों के कृषि मंत्रियों को पेंशन स्कीम की रूपरेखा की जानकारी दी।

बयान के अनुसार, इस स्कीम का लाभ लेने वाले किसानों को औसतन 100 रुपए प्रतिमाह का योगदान करना होगा और सरकार की ओर से भी इस स्कीम में इतना ही योगदान किया जाएगा। योजना से जुड़ते समय यदि किसी लाभार्थी की उम्र 29 साल है तो उसे 100 रुपए प्रति माह का योगदान देना होगा।

इसी प्रकार यदि लाभार्थी की उम्र 29 साल से ज्यादा है तो उसे ज्यादा योगदान देना होगा। केंद्रीय कृषि मंत्री ने राज्यों से जल्द इस योजना को अमल में लाने की अपील की है। उन्होंने ये भी कहा कि प्रधानमंत्री किसान पेंशन के लाभार्थी प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना से मिलने वाले लाभ में से सीधे योगदान का विकल्प भी चुन सकते हैं।

इस स्कीम के लिए किसानों और सरकार की ओर से दिए जाने वाले पेंशन फंड का प्रबंधन एलआईसी की ओर से किया जाएगा और पेंशन का वितरण भी एलआईसी ही करेगी। 60 साल की उम्र पार करने के बाद लाभार्थी किसान को 3000 रुपए मासिक पेंशन दी जाएगी।

गर्मियों में इन बातों का रखे ध्यान, नहीं घटेगा दूध उत्पादन

गर्मियों के मौसम में ज्यादातर पशुपालक पशुओं के खान-पान पर बहुत कम ध्यान देते हैं, जिससे दूध का उत्पादन कम हो जाता है। जबकि इस मौसम में पशुओं की विशेष देखभाल बहुत जरूरी है।
पशुचिकित्सक डॉ रुहेला कहती हैं के “पशुओं को दिन में तीन से चार बार ताज़ा पानी पिलायें। सुबह और शाम पशुओं को नहलाना जरूरी है।

गर्मियों में पशुओं का दूध कम हो जाता है इसलिए इनके खान-पान का विशेष ध्यान दें, हरा चारा और मिनिरल मिक्चर दें, इससे पशु का दूध उत्पादन नहीं घटेगा। इस मौसम पशुओं को गलाघोटू बीमारी का टीका लगवा लें। यह टीका नजदीकी पशुचिकित्सालय में दो रुपए लगता है।”

ज्यादा समय तक धूप में रहने पर पशुओं को सनस्ट्रोक बीमारी हो सकती है। गर्मी के मौसम में हवा के गर्म थपेड़ों और बढ़े हुए तापमान से पशुओं में लू लगने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए उन्हें किसी हवादार या छायादार जगह पर बांधे। इस मौसम में नवजात बच्चों की भी देखभाल जरूर करें। अगर पशुपालक उनका ढंग से ख्याल नहीं रखता है तो उसको आगे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

इन बातों का रखें ध्यान

  • सीधे तेज धूप और लू से नवजात पशुओं को बचाने के लिए पशु आवास के सामने की ओर खस या जूट के बोरे का पर्दा लटका देना चाहिए ।
  • नवजात बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उसकी नाक और मुंह से सारा म्यूकस (लेझा बेझा) बाहर निकाल देना चहिए।
  • यदि बच्चे को सांस लेने में ज्यादा दिक्कत हो तो उसके मुंह से मुंह लगा कर सांस प्रक्रिया को ठीक से काम करने देने में सहायता पहुंचानी चहिए।
  • नवजात बछड़े का नाभि उपचार करने के तहत उसकी नाभिनाल को शरीर से आधा इंच छोड़ कर साफ धागे से कस कर बांध देना चहिए।

  • बंधे स्थान के ठीक नीचे नाभिनाल को स्प्रिट से साफ करने के बाद नये और स्प्रिट की मदद से कीटाणु रहित किये हुए ब्लेड की मदद से काट देना चहिए। कटे हुई जगह पर खून बहना रोकने के लिए टिंक्चर आयोडीन दवा लगा देनी चहिए।
  • नवजात बछड़े को जन्म के आधे घंटे के अंदर खीस पिलाना बेहद जरूरी होता है। यह खीस बच्चे के भीतर बीमारियों से लड़ने में मदद करता है।
  • अगर कभी बच्चे को जन्म देने के बाद मां की मृत्यु हो जाती है तो कृत्रिम खीस का प्रयोग भी किया जा सकता है। इसे बनाने के लिए एक अंडे को फेंटने के बाद 300 मिलीलीटर पानी में मिला देते हैं । इस मिश्रण में 1/2 छोटा चम्मच अरेंडी का तेल और 600 मिली लीटर सम्पूर्ण दूध मिला देते हैं। इस मिश्रण को एक दिन में 3 बार 3-4 दिनों तक पिलाना चहिए।इसके बाद यदि संभव हो तो नवजात बछड़े/बछिया का नाप जोख कर लें। साथ ही यह भी ध्यान दें कि कहीं बच्चे में कोई असामान्यता तो नहीं है। इसके बाद बछड़े/बछिया के कान में उसकी पहचान का नंबर डाल दें।

मौसम अपडेट: अगले 24 से 36 घंटे में देश के इन राज्‍यों में भारी बारिश की संभावना

पुरे देश में रिकार्ड तोड़ गर्मी पड़ रही है और लोग गर्मी से राहत पाने के लिए बारिश की प्रतीक्षा कर रहे हैं,इसी बीच मौसम विभाग ने अगले 24 घंटों में देश के 5 राज्‍यों के 50 से अधिक शहरों में जोरदार बारिश की संभावना जताई है।

मौसम विभाग का कहना है कि गुजरात में वायु चक्रवात के असर के कारण आसपास के इलाकों में बारिश होगी, वहीं मानसून की दस्‍तक देते ही कई राज्यों में बारिश होगी। स्‍कायमेट ने उत्‍तर प्रदेश, मध्‍यप्रदेश और कर्नाटक ऐसे राज्‍य में भारी बारिश की संभावना जताई है। ये इलाके होंगे प्रभावित..

छत्तीसगढ़ और मध्‍यप्रदेश:

मौसम विभाग के अनुसार छत्‍तीसगढ़ के बलरामपुर, रायगढ़, सूरजपुर, बिलासपुर, जशपुर और मध्‍यप्रदेश के दमोह, डिंडोरी, गुना, होशंगाबाद,बालाघाट, छतरपुर, छिंदवाड़ा, जबलपुर, कटनी, मंडला, पन्ना, रायसेन, रीवा, शिवपुरी, सीधी, उमरिया,सागर, सिवनी, शहडोल, विदिशा आदि जिलों में आंधी और बारिश की संभावना है।

उत्‍तर प्रदेश के इन इलाकों में होगी बारिश

बहराइच, बारा बांकी,आरा, अमेठी, बदायूं, बांदा, इटावा,चित्रकूट, एटा, फैजाबाद, गोंडा, हरदोई, कन्नौज, कानपुर, फर्रुखाबाद, फ़िरोज़ाबाद, रायपुर, लक्सर, मैनपुरी, मथुरा, पीलीभीत, प्रयागराज, रायबरेली में तेज हवाओं के साथ बारिश होगी।

गुजरात :

वायु चक्रवात के प्रकोप से तो गुजरात बच गया , लेकिन इसकी नुकसानदेह हवाओं के साथ बहुत भारी बारिश के आसार है। यहां अमरेली, गिर सोमनाथ, राजकोट, जामनगर,दीव, जूनागढ़, पोरबंदर, और द्वारका जैसे क्षेत्रों में बहुत भारी बारिश होगी। कुछ स्थानों पर आज भी भारी बारिश से निचले इलाकों में बाढ़ आ सकती है।

कर्नाटक :

मौसम विभाग के अनुसार अगले 24 से 36 घंटों के दौरान कर्नाटक के आंतरिक भागों के कई जिलों में हल्की से मध्यम बारिश और गरज के साथ हल्की से मध्यम बारिश और गरज के साथ तटीय कर्णकटाव का असर रहेगा।

किसानो के कई काम आसान करेगी ये अनोखी बाइक, जरूरत के हिसाब से किया गया है डिज़ाइन, जाने कितनी होगी कीमत

आज हम आपको एक ऐसी बाइक के बारे में बताने जा रहे हैं जो किसानो की जरूरत के हिसाब से बनाई गई है, किसान इस की मदद दे बहुत सारे काम आसानी के साथ कर सकते हैं। कहते है की आवशकता ही अविष्कार की जननी है। ऐसे ही किसानो की जरूरत के हिसाब से तैयार किया गया है यह लीफान तिपहिया कार्गो (lifan cargo tricycle)।

इसमें लीफान के इंजन के साथ एक ट्राली जुडी हुई होती है। यह बाइक 800 किल्लो तक का वजन आसान से उठा कर 80 किल्लो मीटर की स्पीड से चल है।इसकी चैसी फ्रेम और कार्गो बॉक्स मजबूत होता है। इसमें एक सिलेंडर इंजन लगा हुआ होता है। यह पेट्रोल से चलता है गियर शिफ़्ट में इसके 5 आगे + 1 रिवर्स होता है।

यह (175cc,200cc, 150cc, 250cc) तीन मॉडल में आता है। 150cc वाले लीफान इंजन कार्गो 3 व्हीलर मोटरसाइकिल की कीमत 36000 रुपये है।जो की मॉडल के हिसाब से अलग-अलग है।

फ़िलहाल अभी ये भारत में नहीं मिलता लेकिन जल्द ही ये भारत में लांच होने जा रहा है, चीन की दोपहिया वाहन निर्माता कंपनी लिफान ने इस साल भारत में मोटरसाइकिल निर्माण कारखाना लगाने का इरादा जताया है।

कारखाना संयुक्त उपक्रम में लगाया जाएगा। उन्होंने बताया कि संभवत: पुणे में एक इंजन निर्माण संयंत्र भी लगाया जाएगा। कंपनी के उप महाप्रबंधक चू श्याओमन ने बताया कि कंपनी फैक्ट्री लगाने के लिए करीब 180 करोड़ रुपये का निवेश करेगी।

100 दिन में एक करोड़ किसानों के लिए जारी होंगे किसान क्रेडिट कार्ड, जानें इस कार्ड पे कितना मिलेगा क़र्ज़

सरकार ने अगले 100 दिनों में एक करोड़ किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड देने का फैसला किया है।इस काम के लिए गांव-गांव में अभियान चलाया जाएगा। केन्द्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने इस अभियान को सफल बनाने के लिए सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के कृषि मंत्रियों के साथ बैठक की।

इस बैठक में सरकार की तीन प्रमुख योजनाओं – प्रधानमंत्री किसान सम्‍मान निधि योजना (पीएम-किसान), लघु और सीमांत किसानों के लिए पेंशन योजना और किसान क्रेडिट कार्ड अभियान को लागू करने के बारे में विचार-विमर्श किया गया।

कृषि मंत्री ने सभी राज्यों से अगले 100 दिनों में किसान क्रेडिट कार्ड योजना के तहत एक करोड़ किसानों को क्रेडिट कार्ड देने के लिए गांव-गांव में अभियान चलाने का अनुरोध किया। साथ ही कृषि मंत्री ने सभी 18-40 वर्ष की आयु वर्ग के किसानों के लिए पेंशन योजना शुरू करने के बारे सभी प्रदेशों को जानकारी दी।

सरकार जल्द ही किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड पे एक लाख रूपये तक का लोन बिना ब्याज के उपलब्ध करवा सकती है। सरकार का मकसद है कि किसानों को फसल क़र्ज़ के लिए आढ़ती के पास न जाना पड़े और सस्ती ब्याज डॉ पे बैंकिंग क़र्ज़ का फ़ायदा उठा सकें।

फ़िलहाल किसान क्रेडिट कार्ड पर खेती के लिए 3 लाख और पशुपालन, मच्छी पालन के लिए 2 लाख रिप्ये तक का क़र्ज़ 7 फीसदी ब्याज पे मिलता है। और जो किसान समय पे क़र्ज़ वापिस कर देते हैं उन को 3 फीसदी छूट मिलती है।

अब धान की जगह पर दूसरी खेती करने वाले किसानो को सरकार देगी इतने रुपये

धान की खेती करने वाले गांवों पर मंडरा रहे पानी के संकट से निपटने के लिए हरयाणा सरकार ने एक योजना बनाई है। किसान धान की खेती ना करें इस लिए सरकार 2000 रुपए प्रति एकड़ की सहायता देगी, इस सहायता के साथ-साथ बीज देने जैसे अन्य फायदे भी किसानों तक पहुंचने की योजना है।

पिछले महीने की 21 तारीख को हरियाणा के मुख्यमंत्री ‘मनोहरलाल खट्टर’ ने चंडीगढ़ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया था, ‘हरियाणा में गिरते भू जल स्तर को लेकर सरकार चिंतित है। हरियाणा में जो धान की खेती का जो क्रेज बना हुआ है हम उसे डिस्करेज करना चाहते हैं ताकि पानी के स्तर को और गिरने से बचाया जा सके, हरियाणा सरकार पानी के लिए काम कर रही है। इसमें लोगों और किसानों की मदद की भी उम्मीद है।”

बता दें कि हरियाणा के 9 जिले डार्क ज़ोन में हैं और इन जिलों में पानी की स्तर बिलकुल नीचे जा चुका है। यमुनानगर, अंबाला, करनाल, कुरुक्षेत्र, कैथल, जींद और सोनीपत धान बाहुल्य क्षेत्रों में धान की बजाय अलग विकल्प खोजे जा रहे हैं।

इस सब के बारे में कंडेला गांव के किसान नेता रामफल ने बताया, ‘हम बावले लोग थोड़े हैं. हम भी पानी को लेकर चिंतित हैं। लेकिन सरकार ये बताए कि अभी तक हम किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य बताया है क्या?

सरकार कह रही है कि दो हज़ार रुपए देगी लेकिन बीज के पैसे भी इसी से काटेगी। जिन फसलों को बोने की सरकार बात कर रही है उनके बीजों का मार्केट का दाम ही 2800 के करीब है। हमने अरहर की फसल उगा कर देख ली है, ये फसलें हरियाणा में कामयाब ही नहीं है।”

भूजल को लेकर सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अगले 20 से 25 साल में भूजल स्तर खत्म होने की संभावना है। आंकड़ों की मानें तो पंजाब के 82 फीसदी और हरियाणा के 76 फीसदी हिस्से में बहुत तेजी से भूजल स्तर गिरा है। अगर ऐसे ही चलता रहा तो पंजाब, हरियाणा व राजस्थान में भूजल स्तर 300 मीटर तक पहुंचने के आसार हैं।

किसी समय पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसते थे ये किसान, अब ऐसे कर रहे है विदेशों में अनार का निर्यात

किसी समय रेतीले धोरों में पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसने वाले बाड़मेर के किसानों ने ऐसा करिश्मा कर दिखाया है कि अब विदेशों तक उनकी पहचान है। इन किसानों रेतीले धोरों में अनार उगने की आस के साथ 2010 में बालोतरा के बूड़ीवाड़ा में अनार का पहला प्लांट लगाया था।

उसके बाद सिर्फ बस 4 साल में अनार तैयार हो गया। इनके अनार की क्वालिटी व स्वादिष्टता के चर्चे दूर-दूर तक छा गए। फिर इन किसानों ने अनार की बंपर बुवाई शुरू कर दी। आज के समय में 4500 हैक्टेयर में ये किसान अनार की खेती कर रहे हैं। इसके चलते अनार की खेती और उत्पादन में बाड़मेर प्रदेश में पहले नंबर पर है।

बाड़मेर में कम आर्द्रता के कारण इनके अनार में बीमारियां कम फ़ैल रही हैं। यही वजह है कि अनार का साइज, क्वालिटी और स्वाद अनोखा है और बाड़मेर का अनार नेपाल सहित कई देशों में निर्यात हो रहा है। 4500 हैक्टेयर में ये किसान अरबों रुपए के अनार की खेती कर रहे हैं।

अनार की पैकिंग के लिए मजदूर टेंट लगाकर श्रमिक रात-दिन जुटे रहते हैं। किसानो ने बताया कि 2500 पौधों का 3.5 हैक्टेयर में बगीचा लगाकर शुरुआत कि गयी थी और अब तो हर गांव में अनार की खेती होने लगी है। व्यापारी ने 52 रुपए प्रति किलो के हिसाब से अनार की बोली लगाकर नेपाल भेजने के लिए खरीदा है।

बाड़मेर में 4500 हेक्टयेर में 135 करोड़ के अनार का उत्पादन हो रहा है। एक हैक्टेयर में 625 पौधे लगाए जाते है। इससे एक हैक्टेयर में 3 से 3.5 लाख का अनार उत्पादन होता है।

अपने खेत में बनाओ यह ‘चोका सिस्टम’,सूखे में भी खेती के लिए नहीं होगी पानी की कमी

आज हम आपको एक ऐसी तकनीक की जानकारी देना चाहते है जिस से हर किसान को लाभ मिलेगा और वो काफी हद तक अपने खेत की सिंचाई के लिए पानी इकठा कर सकता है ।भारत का एक किसान ऐसा भी है, जिस से दुनिया के सब से हाईटैक देश इजरायल के लोग भी सीखने आते हैं। इस किसान की विकसित की गयी तकनीक अब इजरायल में लागू की जा रही है। आज हम आपको इस तकनीक के बारे में बताने जा रहे हैं।

इस हाईटेक तकनीक का नाम है ‘चोका सिस्टम’। यह एक ऐसी तकनीकी है जिसे देश के हर कोने, हर गांव, हर शहर का किसान अपने हिसाब से इस्तेमाल कर सकता है। यह तकनीक किसान को कमाई कराने, उसे गांव में ही रोजगार देने, पानी बचाने और जमीन को सही रखने के लिए विकसित की गयी है।

‘चोका सिस्टम’ तकनीक का  ज्ञान देने वाले इस किसान का नाम है लक्ष्मण सिंह। 62 साल के लक्ष्णम सिंह राजस्थान के जयपुर से करीब 80 किलोमीटर दूर लाहोडिया गांव के रहने वाले हैं।

किसी समय ये गांव भीषण सूखे का शिकार था। 40 साल पहले लक्ष्मण सिंह ने अपने गांव को बचाने के लिए मुहिम शुरु की । आज लापोडि़या समेत राजस्थान के 58 गांव चोका सिस्टम की बदौलत तरक्की की ओर है। यहां पानी की समस्या काफी हद तक कम हुई है। किसान साल में कई फसलें उगाते हैं। पशुपालन करते हैं और काफी पैसा कमाते हैं।

‘चोका सिस्टम’बनाने का तरीका

चोका सिस्टम हर पंचायत की सार्वजनिक जमीनों पर बनता है। एक ग्राम पंचायत में करीब 400 से 1,000 बीघा जमीन खाली पड़ी रहती है, इस खाली जमीन में ग्राम पंचायत की सहभागिता से चोका सिस्टम बनाया जाता है। खाली पड़ी जमीन में जहां बरसात का नौ इंच पानी रुक सके वहां तीन चौड़ी मेड (दीवार) बनाते हैं, मुख्य मेड 220 फिट लम्बाई की होती है और दोनों साइड की दीवारे 150-150 फिट लम्बी होती हैं।

लेवल नौ इंच का करते हैं जिससे नौ इंच ही पानी रुक सके, इससे घास नहीं सड़ेगी। इससे ज्यादा अगर पानी रुका तो घास नहीं जमेगी। हर दो बीघा में एक चोका सिस्टम बनता है, एक हेक्टेयर में दो से तीन चोका बन सकते हैं। एक बारिश के बाद धामन घास का बीज इस चोका में डाल देते हैं इसके बाद ट्रैक्टर से दो जुताई कर दी जाती है।

सालभर इसमें पशुओं के चरने की घास रहती है। इस घास के बीज के अलावा देसी बबूल, खेजड़ी, बेर जैसे कई और पेड़ों के भी बीज डाले जाते हैं। इसके के आसपास कई नालियां बना दी जाती हैं, जिसमें बरसात का पानी रुक सके। जिससे मवेशी चोका में चरकर नालियों में पानी पी सकें।