बिना किसी अनुभव के इस किसान ने चंदन की खेती से कमा लिए करोड़ों रूपये, जानिए कैसे

चन्दन के बारे तो आप लोगों ने सुना ही होगा हमारे जीवन में लकड़ी का महत्व है इसे बहुत पवित्र लकड़ी माना जाता है । और जितनी ज्यादा यह लकड़ी महत्वपूर्ण है उतनी ही इसकी कीमत ज्यादा है आज हम आपको एक किसान अल्पेश पटेल के बारे में बताने जा रहे हैं जो बिना किसी अनुभव के चंदन की खेती (Chandan ki Kheti) से करोड़ों रूपये कमा चुका है।

गुजरात के एक छोटे से इलाके भरुच के पास अलपा गाँव में रहने वाले एक किसान अल्पेश पटेल ने पुरे गुजरात में बिना किसी पूर्व अनुभव के चंदन की खेती करने का निर्णय लिया। ये एक बहुत मुश्किल और जोखिम भरा काम था फिर भी उन्होंने खुद पर विश्वास किया और अंत में सफलता प्राप्त की।

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गुजरात के अल्पेश भाई पटेल ने जब पहली बार खेती में कुश नया प्रयोग करने का विचार किया तो उनकी राह आसान नहीं थी। 2003 में गुजरात सरकार ने वहाँ के किसानों को चंदन की खेती करने की इजाज़त तो दे दी थी लेकिन नए मौसम और नए माहौल में अपने खेत पर चंदन की खेती का जोखिम उठाने को कोई किसान तैयार नहीं था लेकिन अल्पेश ने अपने आप में भरोसा रखा और यह जोखिम उठाया।

अल्पेश पटेल ने करीब 5 एकड़ जमीन पर चंदन के 1050 पेड़ लगा दिए लेकिन उनकी फसल शुरुआत में खराब हो गई जिससे उन्हें घाटा खाना पड़ा।

सबको पता है कि सब्र का फल मीठा होता है लेकिन चंदन की खेती में तो सब्र कुछ ज्यादा ही करना पड़ता है । चंदन की खेती को तैयार होने में 15 से 20 साल तक का समय लग जाता है और यही कारण है कि कई किसान इतना अधिक इंतजार नहीं कर पाते। और जो सब्र करते हैं, उन्हें चंदन की खेती पकने के बाद एक किलो चंदन की लकड़ी के लिए 10 से 12 हजार रुपए तक की कीमत मिलती है।

अल्पेश ने सब्र रखा और उन्हें इसका फायदा भी मिला। उनकी खेती पकने पर उन्हें करोड़ो का लाभ प्राप्त हुआ। 9.5 लाख रुपये के निवेश से शुरू हुई चंदन की खेती की कीमत आज 15 साल बाद करीब 15 करोड़ रुपये पहुँच गयी है। मतलब 150 गुना तक का फायदा चंदन की खेती से अल्पेश को प्राप्त हुआ।

गौरतलब है कि गुजरात समेत कुछ राज्यों में किसानों को अपनी चंदन की फसल बेचने के लिए परेशान नहीं होना पड़ता क्योंकि राज्य सरकार ने इसे बेचने और एक्सपोर्ट करने तक की जिम्मेदारी स्वयं ले रखी है। अल्पेश को अपनी मेहनत के फलस्वरूप राज्य में सर्वश्रेष्ठ किसान का खिताब भी मिल चुका है और वे दक्षिण गुजरात में हजारों किसानों के लिए एक प्रेरणा बन चुके हैं।

अल्पेश की सफलता को देखकर अन्य किसान भी अब जोखिम उठाने को तैयार हैं। और जो किसान चंदन की खेती नहीं कर पाए उन्होंने नीलगिरी की खेती शुरू कर दी है। नीलगिरी की लकड़ी से भी किसानों को काफी फायदा हो रहा है। यदि हमारे किसान इसी तरह जागरूक होने लगे तो वो दिन दूर नहीं जब यह कृषि प्रधान देश पुनः सोने की चिड़िया कहलाने लगेगा।