प्रोफेसर का अनोखा जुगाड़, घास काटने वाली मशीन से बना दी धान काटने वाली मशीन

जेरोम सोरेंगे को-ऑपरेटिव कॉलेज और वर्कर्स कॉलेज में मनोविज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं. रिटायरमेंट के बाद उन्होंने बालीगुमा गोड़गोड़ा में फार्म हाउस खोला. यहां वे सूकर, मुर्गी, ऐमु और मछली पालन कर रहे हैं. थोड़ी जमीन पर खेती-बाड़ी भी है. उन्हें खेत में धान काटने-कटवाने में बहुत परेशानी होती थी.

इससे बचने के लिए वह दिमाग लगाते रहते थे. अंतत: उन्होंने धान काटने की मशीन बना डाली. उन्होंने अलग से कुछ किया नहीं. मवेशी को खिलाने के लिए उनके पास पहले से घास मशीन हेच कटर थी. इस मशीन में ही उन्होंने विज्ञान ढूंढ़ निकाला.

तर्क भिड़ाया कि इससे घास कट सकता है तो धान क्यों नहीं. धान तो कट जा रहा था लेकिन इसकी बालियां बिखर जा रही थीं. उनके मुताबिक इस समस्या का हल उनकी बेटी नीरा मृदुला सोरेंग ने ढूंढ़ निकाला. नीरा चिरीमिरी (छत्तीसगढ़) में रहती हैं. वहां से उन्होंने पापा को धान काटने वाली मशीन का फोटो ह्वाट्सएप किया. इससे प्रो सोरेंग को आइडिया मिल गया.

उन्होंने हेच कटर में प्रोटेक्टर की जगह धान की बाली समेटने के लिए प्लास्टिक की पुरानी बाल्टी काटकर लगा दी. हो गयी मशीन तैयार. जेरोम बताते हैं कि तीन मजदूर तीन दिन में जितना काम कर सकता है, उतना काम कुछ घंटे में यह मशीन कर देती है.

मशीन में सिर्फ दो लीटर डीजल खर्च होगा. दो लीटर डीजल की कीमत 120 से 130 रुपये होती है. मान लिया जाये दो घंटे मशीन चलाने के लिए आप एक व्यक्ति को 150 रुपये देते हैं. इस तरह हिसाब लगाया जाये तो कुल खर्च 280 रुपये या अधिक-से-अधिक 300 रुपये होता है.

धान काटने के लिए एक मजदूर की प्रतिदिन की मजदूरी 150 रुपये होती है. तो तीन मजदूर की तीन दिनों की मजदूरी 1350 रुपये होती है. इस तरह समय के साथ-साथ एक हजार रुपये से अधिक की बचत भी हो रही है.इनके इस प्रयोग के बाद बहुत सारी कंपनी यह मशीन बनाने लगी है .जिनमे बाल्टी की जगह पर धातु लगाई जाती है .और ब्लेड भी बदल दिया है . जिससे अब यह मशीन पूरी तरह से कामयाब बन गई है

इसी सिद्धांत पर बनी मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

सबसे महंगी कॉफी ऐसे होती है तैयार, जानकर पीना छोड़ देंगे!

अगर आप कॉफी पीने के शौकिन है तो हमारी यह ख़बर आपको निराश कर सकती है। जी हां, दुनिया की सबसे मंहगी कॉफी ‘कोपी लुवाक’ जो पीने में तो बेहद टेस्टी लगती हैं लेकिन इसको बनाने की प्रक्रिया काफी हैरान कर देने वाली है।

कॉफी ‘कोपी लुवाक’ जिसका जायका लेने के लिए लोग दुनिया भर से इंडोनेशिया आते हैं। लोगों की मानें तो इस कॉफी को जो एक बार टेस्ट कर ले फिर उसे कोई और कॉफी रास नहीं आती।
इस कॉफी की कीमत €550 / US$700 प्रति किलोग्राम होती है। यानि के 42000 रूपए प्रति किल्लो ।जो आम कॉफी की तुलना में बहुत ही ज्यादा है ।

आईए अब हम आपको बताते हैं कैसे बनाई जाती है दुनिया की सबसे महंगी कॉफी…

यह कॉफी किसी किसान के द्वारा खेतों में नहीं उगाई जाती बल्कि इस कॉफी का निर्माण जंगली रेड कॉफी बीन्स से होता है जो कि एशियन पाम सिवेट नाम के जानवर की पॉटी से निकलती है।यह जानवर पेड़ पर ही अपना आसियाना टिकाए रहता है। बेर खाने वाला यह जानवर बेर तो ज़रुर खाता है लेकिन यह पचा नहीं पाता।

आप सोच रहे होंगे एशियन पाम सिवेट के पेट में बेर ना पचने से कॉफी के तैयार होने से क्या लेना-देना… अब जो हम बताएंगे आप चौंक जाएंगे… दरअसल एशियन पाम सिवेट पेड़ो पर रहने वाला जानवर होता है जो कि बेरी खाता है लेकिन वो बेरी के बीजों को पचा नहीं पाता है और मल के जरिये उसे पेट से बाहर निकाल देता है जो कि बींस के रूप में वातावरण में आता है और इसी बींस को सुखाकर ‘कोपी लुवाक’ कॉफी बनायी जाती है, जो कि यह बहुत ज्यादा दुर्लभ होती है ।

पहले यह जानवर सिर्फ जंगल में मिलते थे और यह कॉफी बहुत ही दुर्लभ थी । लेकिन अब इसकी फार्मिंग होने लगी है लोग एशियन पाम सिवेट को अपने फार्म में उसका मल लेने के लिए पालते है।क्यों हैरान हो गए ना इस ख़बर को पढ़कर कि जिस कॉफी को सभी राजसी घरानों की पार्टी में शामिल किया जाता है वह ऐसे तैयार होता है।

इस ऑटो ड्राइवर ने लगाए आंवले के 60 पौधे और बन गया करोड़पति

अगर सफल होना चाहते हैं तो एक चीज जो आपके पास होनी चाहिए है वह है ‘धैर्य’. मेहनत और सच्ची लगन से किए हुए काम का अच्छा नतीजा तभी मिलता है जब आपके पास धैर्य हो. इसी का जीता-जागता उदाहरण है राजस्थान के किसान अमर सिंह. 57 साल के अमर सिंह सभी किसानों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है, जो खेती-बाड़ी कर पैसा कमाना चाहते है.

दरअसल अमर मूल रूप से किसान नहीं हैं बल्कि ऑटोड्राइवर हैं. इन्होंने सालों पहले महज 1200 रुपये में आंवला के 60 पौधे रोपे थे. 22 साल बाद ये पौधे बड़े हुए. आपको जानकर यकीन नहीं होगा लेकिन मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आज अमर इन्हीं पेड़ों से 26 लाख का टर्नओवर कमा रहे हैं.

इस कारोबार में अमर सिंह की मदद करने वाले ल्यूपिन ह्यूमन वेलफेयर ऐंड रिसर्च फाउंडेशन के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर सीताराम गुप्ता बताते हैं कि उनकी मेहनत के कारण आज कई लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ है. जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं.

ऑटोड्राइवर अमर सिंह ऐसे बने किसान

अमर सिंह का पैतृक पेशा खेती का था. साल 1977 में अमर सिंह के पिता का देहांत हो गया. हालांकि खेती से ही उनका घर चल रहा था. पर उस दौरान खेती से कुछ कमाई नहीं होती थी. घर के हालात ठीक नहीं थे इसलिए अमर ने ऑटो चलाना शुरू कर दिया.

हालांकि इसमें उनका मन नहीं लगा और 1985 में वह अपने ससुराल में, गुजरात, अहमदाबाद पहुंच गए. वहीं रास्ते में सड़क पर उन्हें अखबार का एक टुकड़ा मिला था, जिसमें आंवले की खेती के बारे में जानकारी दी गई थी.

वह उस आर्टिकल से इतने इंप्रेस हुए कि उन्होंने ठान लिया की वह अब आंवले की ही खेती करेंगे. उन्होंने 2 एकड़ जमीन पर आंवले के 60 पौधे बोए. उन्हीं बोए हुए पौधों का नतीजा है कि आज वे करोड़पति किसानों में गिने जाते हैं.

खेती के लिए बहुत ही उपयोगी है यह 12 प्रकार के जैविक टीके

 

आज कल खेती के लिए ज्यादतर रासयनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग ज्यादा क्या जा रहा है । जो एक बार तो असर करते है लेकिन लम्बे समय तक प्रयोग करने से वो मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को कम कर देते है ।साथ में धीरे धीरे इनका असर भी कम होने लग जाता है ऐसे में अगर आप जैविक टीकों का इस्तेमाल करेंगे तो आप की फसल उत्पादन तो बढ़ेगा ही साथ में इनका असर भी सालों साल चलेगा

नील हरित शैवाल टीका: धान में काफी लाभकारी है। यह नत्रजन के अलावा जैविक कार्बन एवं पादप वृद्धि करने वाले पदार्थ भी उपलब्ध कराता है। एक एकड़ की धान की फसल को उपचारित करने के लिए 500 ग्राम का एक पैकेट टीका काफी है। 20 से 30 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर फसल में लाभ होता है।

अजोला टीका: यह एक आदर्श जैविक प्रणाली है। जो उष्ण दिशाओं में धान के खेत में वायुमंडलीय नत्रजन का जैविक स्थिरीकरण करता है। अजोला 25 से 30 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर प्रति फसल को योगदान करता है।

हरी खाद: साल में एक बार हरी खाद उगाकर खेत में जोतकर कार्बनिक अंश को बनाए रख सकते हैं। हरी खादों में दलहनी फसलों, वृक्षों की पत्तियां खरपतवारों को जोतकर उपयोग किया जाता है। एक दलहनी परिवार की फसल 10-25 टन हरी खाद पैदा करती है। इसके जोतने से 60 से 90 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर की दर से प्राप्त होती है।

ढैंचा: यह फसल 40 से 60 दिनों में जोतने लायक हो जाती है। यह 50 से 60 किलोग्राम नत्रजन की भी प्रति हेक्टेयर आपूर्ति करता है। बुवाई के लिए 30 से 40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर डालें दो से तीन सिंचाई ही करनी पड़ती है। इसके अलावा नील हरित शैवाल टीका, आरबसक्ूयलर माइकोराजा न्यूट्रीलिंक टीका, सूबबूल आदि भी लाभकारी हैं।

कंपोस्ट टीका: इस टीके के प्रयोग से धान के पुआल का 6 से 9 सप्ताह के अंदर बहुत अच्छा कंपोस्ट बन जाता है। एक पैकेट के अंदर 500 ग्राम टीका होता है जो एक टन कृषि अवशेष को तेजी से सड़ाकर कंपोस्ट बनाने के लिए काफी है।

राइजोबियम टीका: राइजोबियम का टीका दलहनी, तिलहनी एवं चारे वाली फसलों में प्रयोग होता है। ये 50 से 100 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर का जैविक स्थिरीकरण कर सकते हैं। इससे 25 से 30 फीसदी फसल उत्पादन बढ़ता है।

एजोटोबैक्टर टीका: यह स्वतंत्र जीवी जीवाणु है। इसका प्रयोेग गेहूं, धान, मक्का, बाजरा आदि, टमाटर, आलू, बैंगन, प्याज, कपास सरसों आदि में करते हैं। 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर की बचत करता है। 10 से 20 प्रतिशत फसल बढ़ती है।

एजोस्पिरिलम टीका: इसका प्रयोग अनाज वाली फसलों में होता है। जैसे ज्वार, बाजरा, रागी, मोटे छोटे अनाजों एवं जई में होता है। चारे वाली फसलों पर भी लाभकारी होता है। 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर बचत करता है। फसल चारा उत्पादन बढ़ता है।

फास्फोरस विलयी जीवाणु टीका: फास्फोरस पौधों के लिए मुख्य पोषक तत्व है। इस टीके के प्रयोग से मृदा में मौजूद अघुलनशील फास्फोरस घुलनशील होकर पौधों को उपलब्ध हो जाता है

अब प्रिया पावर वीडर पर बैठ कर करें खेत की निराई गुड़ाई

अक्सर आप ने देखा होगा के कपास और दूसरी फसलों में खपतवार बहुत होते है जिनको निकलना बहुत ही जरूरी है अगर इन्हे वक्त पर ना निकला जाये तो सारी फसल ख़राब हो जाती है । बहुत से लोग गुड़ाई के लिए ट्रेक्टर जा फिर बैल का इस्तेमाल करते है  ।

क्योंकि ट्रेक्टर महंगा पड़ता है और बैल से काम बहुत धीरे होता है  । इस लिए दोनों ही विकलप कामयाब नहीं है  । ऐसे किसानो के लिए “प्रिया पावर वीडर” आया है । इसका एक फ़ायदा यह भी है के बाक़ी पावर वीडर की तरह इसे पकड़ कर चलने के जरूरत नहीं होती बल्कि आप इसके ऊपर बैठ कर चला सकते है ।

यह एक आधुनिक पावर मशीन है जो आमतौर पर कपास और गन्ने की फसल में से नदीन निकालने के लिए प्रयोग की जाती है। यह ज़मीन को नर्म करती है और गोडाई का काम भी कम करती है।

यह 2 मॉडल में उपलब्द है एक मॉडल में इसमें पेट्रोल इंजन लगा होता है जिसकी पावर 4.7 HP होती है । दूसरे मॉडल में इसमें डीज़ल इंजन लगा होता है जिसकी पावर 9 HP होती है। अधिक जानकारी के लिए आप निचे दिए हुए नंबर पर संपर्क कर सकते है । कृष्णा गोहिल +91 8347472029, +91 8000935123

इस मशीन की विशेषताएं:

• अंतर फसली उगाने में सहायक मशीन है।
• जोताई के घेरे को आवश्यकतानुसार कम या ज्यादा किया जा सकता है।
• खर्चा कम करती है।
• फसल को बिना कोई नुकसान पहुंचाए गोडाई करती है।
• इसे चलाना इतना आसान है कि महिलायें भी इसे आसानी से चला सकती हैं।

यह मशीन कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें 

धान को रोग, कीटों से बचाने के लिए करें ये उपाय

किसान महंगे बीज, खाद इस्तेमाल कर धान की खेती करता है, ऐसे में सही प्रबंधन न होने से कीट और रोगों से काफी नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए सही समय से ही इनका प्रबंधन कर नुकसान से बचा जा सकता है।

धान की फसल को विभिन्न बीमारियों में जैसे धान का झोंका, भूरा धब्बा, शीथ ब्लाइट, आभासी कंड व जिंक कि कमी आदि की समस्या प्रमुख समस्या होती है। क्षतिकर कीटों जैसे तना छेदक, गुलाबी तना छेदक, पत्ती लपेटक, धान का फूदका और गंधीबग कीटों से नुकसान पहुंचता है।

धान का तना छेदक

इस कीट की सूड़ी अवस्था ही क्षतिकर होती है। सबसे पहले अंडे से निकलने के बाद सूड़ियां मध्य कलिकाओं की पत्तियों में छेदकर अन्दर घुस जाती हैं और अन्दर ही अन्दर तने को खाती हुई गांठ तक चली जाती हैं। पौधों की बढ़वार की अवस्था में प्रकोप होने पर बालियां नहीं निकलती हैं। बाली वाली अवस्था में प्रकोप होने पर बालियां सूखकर सफ़ेद हो जाती हैं और दाने नहीं बनते हैं।

कीट प्रबंध:

फसल की कटाई जमीन की सतह से करनी चाहिए और ठूठों को एकत्रित कर जला देना चाहिए। जिंक सल्फेट+बुझा हुआ चूना (100 ग्राम+ 50 ग्राम) प्रति नाली की दर से 15-20 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। पौध रोपाई के समय पौधों के ऊपरी भाग की पत्तियों को थोड़ा सा काटकर रोपाई करें, जिससे अंडे नष्ट हो जाते हैं। धतूरा के पत्ते नीम के पती तम्बाकू को 20 लीटर पानी में उबालें यह पानी 4-5 लीटर रह जाए तो ठंडा करके 10 लीटर गौमूत्र में मिलाकर छिड़काव करें।

रासायनिक विधि – तना छेदक की रोकथाम के लिए कार्बोफूरान तीन जी 20 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से 3-5 सेमी स्थिर पानी में अथवा कारटाप हाइड्रोेक्लोराइड चार प्रतिशत 18 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 3-5 सेमी स्थिर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

धान का पत्ती लपेटक कीट

मादा कीट धान की पत्तियों के शिराओं के पास समूह में अंडे देती हैं। इन अण्डों से छह-आठ दिनों में सूड़ियां बाहर निकलती हैं। ये सूड़ियां पहले मुलायम पत्तियों को खाती हैं और बाद में अपने लार से रेशमी धागा बनाकर पत्ती को किनारों से मोड़ देती हैं और अन्दर ही अन्दर खुरच कर खाती है।

धान की गंधीबग

वयस्क लम्बा, पतले और हरे-भूरे रंग का उड़ने वाला कीट होता है। इस कीट की पहचान कीट से आने वाली दुर्गन्ध से भी कर सकते हैं। इसके व्यस्क और शिशु दूधिया दानों को चूसकर हानि पहुंचाते हैं, जिससे दानों पर भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं और दाने खोखले रह जाते हैं।

देसी तरिके से –यदि कीट की संख्या एक या एक से अधिक प्रति पौध दिखायी दे तो मालाथियान पांच प्रतिशत विष धूल की 500-600 ग्राम मात्रा प्रति नाली की दर से छिड़काव करें। खेत के मेड़ों पर उगे घास की सफाई करें क्योंकि इन्ही खरपतवारों पर ये कीट पनपते रहते हैं और दुग्धावस्था में फसल पर आक्रमण करते हैं।

रासायनिक विधि –10 प्रतिशत पत्तियां क्षतिग्रस्त होने पर केल्डान 50 प्रतिशत घुलनशील धूल का दो ग्राम/ली. पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें।

भूरी चित्ती रोग

इस रोग के लक्षण मुख्यतया पत्तियों पर छोटे- छोटे भूरे रंग के धब्बे के रूप में दिखाई देतें है। उग्र संक्रमण होने पर ये धब्बे आपस में मिल कर पत्तियों को सूखा देते हैं और बालियां पूर्ण रूप से बाहर नहीं निकलती हैं। इस रोग का प्रकोप धान में कम उर्वरता वाले क्षेत्रों में अधिक दिखाई देता है।

इस रोग के रोकथाम के लिए बुवाई से पहले बीज को ट्राईसाइक्लेजोल दो ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करें। पुष्पन की अवस्था में जरुरत पड़ने पर कार्बेन्डाजिम का छिड़काव करें। रोग के लक्षण दिखाई देने पर 10-20 दिन के अन्तराल पर या बाली निकलते समय दो बार आवश्यकतानुसार

रासायनिक विधि –कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत घुलनशील धूल की 15-20 ग्राम मात्रा को लगभग 15 ली पानी में घोल बनाकर प्रति नाली की दर से छिड़काव करें।

पर्णच्छाद अंगमारी

इस रोग के लक्षण मुख्यत: पत्तियों पर दिखाई देते हैं। संतुलित मात्रा में नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश का प्रयोग करें। बीज को थीरम 2.5 ग्राम/किग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बुवाई करें। जुलाई महीने में रोग के लक्षण दिखाई देने पर मैकोजेब (0.24 प्रतिशत) का छिड़काव करें।

आभासी कंड

यह एक फफूंदीजनित रोग है। रोग के लक्षण पौधों में बालियों के निकलने के बाद ही स्पष्ट होते हैं। रोगग्रस्त दाने पीले से लेकर संतरे के रंग के हो जाते हैं जो बाद में जैतूनी- काले रंग के गोलों में बदल जाते हैं। फसल काटने के बाद अवशेषों को जला दें। खेतों में अधिक जलभराव नहीं होना चाहिए। रोग के लक्षण दिखाई देने पर प्रोपेकोनेजोल 20 मिली. मात्रा को 15-20 ली. पानी में घोल बनाकर प्रति नाली की दर से छिड़काव करें।

अब बैलों से खेती करने वाले किसानो के लिए आ गई नई बिजाई मशीन

आप ने ट्रेक्टर के साथ खेत में बिजाई तो बहुत देखी होगी । लेकिन अभी भी बहुत से लोग है जो बैलों से खेती करते है । ऐसे किसान बीज बोने के लिए हाथ से छींटे दे देते है । जिस से फसल अच्छी नहीं होती । ऐसे किसानो के लिए अब बहुत सी कंपनी बिजाई की मशीन बना रही है ।

आज  हम आपको जिस कंपनी की मशीन दिखने वाले है उस कंपनी का नाम है “मौसम एग्रो” । यह कंपनी ट्रेक्टर के साथ चलने वाली बिजाई मशीन तो बनती ही है साथ में जानवरों यानि के बेलों के साथ चलनी वाली बिजाई मशीन भी बनती है ।

इस मशीन में एक बार में 14 किल्लो बीज डाला जा सकता है । यह मशीन 5 कतारों में एक साथ बिजाई करती है ।इसके इलावा धरती एग्रो भी ऐसे ही मशीन बनाते है आप वहां से भी इसकी जानकारी ले सकते है

यह मशीन कैसे काम करती है इसके लिए यह वीडियो देखें

अगर आप इस मशीन की कीमत और दूसरी कोई जानकारी के बारे में जानना चाहते है तो निचे दिए हुए नंबर पर कांटेक्ट करें

Ph. +91 – 2827 – 253454, 253654
Mob. +91 – 98795 76920 / 65
info@mausamagro.com
www.mausamagro.com

ऐसे करें नीम का खेती में इस्तेमाल ,महंगे कीटनाशक से मिल जायगा छुटकारा

नीम का वृक्ष प्रकृति का अनुपम उपहार हैं। नीम से तैयार किये गए उत्पादों का कीट नियंत्रण अनोखा हैं, इस कारण नीम से बनाई गई दवा विश्व में सबसे अच्छी कीट नियंत्रण दवा मानी जाती हैं। लेकिन इसके उपयोग को लोग अब भूल रहे हैं। इसका फायदा अब बड़ी-बड़ी कम्पनिया उठा रही हैं ये कम्पनिया इसकी निम्बोलियों व पत्तियों से बनाई गई कीटनाशक दवाये महंगे दामों पर बेचती हैं।

इसकी कड़वी गन्ध से सभी जिव दूर भागते हैं। वे कीट जिनकी सुगंध क्षमता बहुत विकसित हो गयी हैं, वे इसको छोड़कर दूर चले जाते हैं जिन पर नीम के रसायन छिड़के गए हों।

इसके संपर्क में मुलायम त्वचा वाले कीट जैसे चेंपा, तैला, थ्रिप्स, सफेद मक्खी आदि आने पर मर जाते हैं। नीम का मनुष्य जीवन पर जहरीला प्रभाव नहीं पड़ना ही इसको दवाओं के रूप में उच्च स्थान दिलाता हैं। नीम की निम्बोलिया जून से अगस्त तक पक कर गिरती हैं निम्बोली का स्वाद हल्का मीठा होता हैं।

इसकी निम्बोली गिरने पर सड़कर समाप्त हो जाती हैं परन्तु गिरी सफेद गुठली से ढकी होने के कारण लम्बे समय तक सुरक्षित रहती हैं। निम्बोली को तोड़ने पर 55% भाग गुठली के रूप में अलग हो जाता हैं। तथा 45% गिरी के रूप में प्राप्त होता हैं। अच्छे ढंग से संग्रहित की गई गिरी हरे भूरे रंग की होती हैं।

नीम से तैयार दवाइयों के अनेक गुण

  •  रासायनिक दवाइयों की स्प्रे नीम में मिलाकर करें। इस तरह करने से रासायनिक दवाइयों के प्रयोग में 25-30 प्रतिशत तक कमी आती है।
  • नीम की स्प्रे सुबह या शाम के समय करनी चाहिए।
  • नीम केक पाउडर डालने से खेत में बहुत तरह के प्रभाव देखे जा सकते हैं जैसे कि इससे पौधे निमाटोड और फंगस से बचे रहते हैं। इस विधि से ज़मीन के तत्व आसानी से पौधे में मिल जाते हैं।
  •  नीम हानिकारक कीटों के जीवन चक्र को भी प्रभावित करती है, जैसे कि अंडे, लार्वा आदि। इसके अलावा भुंडियों, सुंडियों और टिड्डों आदि पर भी प्रभाव पड़ता है। यह रस चूसने वाले कीटों की ज्यादा रोधक नहीं है।
  • यदि नीम का गुद्दा यूरिया के साथ प्रयोग किया जाये, तो खाद का प्रभाव बढ़ जाता है और ज़मीन के अंदरूनी हानिकारक बीमारियों और कीटों से बचाव होता है।
  • दीमक से बचाव के लिए 3-5 किलो नीम पाउडर को बिजाई से पहले एक एकड़ मिट्टी में मिलायें।
  • मूंगफली में पत्ते के सुरंगी कीट के लिए 1.0 प्रतिशत नीम के बीजों का रस या 2 प्रतिशत नीम के तेल की स्प्रे बिजाई के 35-40 दिनों के बाद करें।
  • जड़ों में गांठे बनने की बीमारी की रोकथाम के लिए 50 ग्राम नीम पाउडर को 50 लीटर पानी में पूरी रात डुबोयें और फिर स्प्रे करें

अब गीली और गिरी हुई फसल को बड़ी आसानी से कटेगी यह कंबाइन

वैसे तो धान की फसल तैयार करना काफी मुश्किल भरा होता है, किसान जी-जान लगा देता है फसल को तैयार करने में, लेकिन इसके बाद भी धान की मड़ाई करना भी काफी मुश्किल भरा काम होता है। खास तोर पर जब फसल बिलकुल त्यार हो और आंधी और बारिश से आप की खड़ी फसल फसल गिर जाये ।लेकिन अब बारिश और आंधी से ख़राब हुई फसल वाले किसानो को घबरने की जरूरत नहीं क्योंकि अब आ गई है हाफ फीड कंबाइन (Head Feed Combine Harvester )

आम कंबाइन से गिरी हुई फसल को काट पाना बहुत ही मुश्किल काम है और फसल का बहुत ही नुकसान होता है । लेकिन इस मशीन के इस्तेमाल करने के बहुत से फायदे है जैसे यह बहुत कम जगह लेता है ।साथ में इस कंबाइन से आप गिरी हुई फसल भी फसल को नुकसान पहुंचाए बिना अच्छे तरीके से काट सकते है ।अगर जमीन गीली भी है तो भी हल्का होने के कारण यह कंबाइन गीली जमीन पर आसानी से चलती है ज़मीन में धस्ती नहीं ।

छोटा होने के कारण हर जगह पर पहुँच जाता है । और इस मिनी कम्बाइन से एक एकड़ काटने में बहुत ही कम खर्च आता है।और इसमें ग्रेन लोस्स मतलब अनाज का नुकसान भी बहुत कम होता है।

इसमें 72 Hp का फ़ोर स्ट्रोक डीजल इंजन लगा हुआ है इस मॉडल का नाम Model – Model- 4L 88 है । सिर्फ धान ही नहीं इस से आप बाकी की अनाज फसलें जैसे गेहूं ,धान सरसों अदि भी काट सकते है ।यह कंबाइन भारतीए सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है और इसके ऊपर सब्सिडी भी उपलब्ध है ।

यह कंबाइन कैसे काम करता है और कैसे गिरी हुई फसल उठा सकता है उसके लिए वीडियो देखें

अगर आप इस कंबाइन को खरीदना चाहते है तो नीचे दिए हुए पते और नंबर पर संपर्क करें

JASHODA AGRO WORKS
Mr. Vikram Patel

Khara Kuva, Railway Station Road, Sojitra, Anand, Gujarat, India – 387240

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क्यों आए भगवान शिव, महाकाली के पैरों के नीचे?

भगवती दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक हैं महाकाली। जिनके काले और डरावने रूप की उत्पति राक्षसों का नाश करने के लिए हुई थी। यह एक मात्र ऐसी शक्ति हैं जिन से स्वयं काल भी भय खाता है। उनका क्रोध इतना विकराल रूप ले लेता है की संपूर्ण संसार की शक्तियां मिल कर भी उनके गुस्से पर काबू नहीं पा सकती। उनके इस क्रोध को रोकने के लिए स्वयं उनके पति भगवान शंकर उनके चरणों में आ कर लेट गए थे। इस संबंध में शास्त्रों में एक कथा वर्णित हैं जो इस प्रकार है-

दैत्य रक्तबिज ने कठोर तप के बल पर वर पाया था की अगर उसके खून की एक बूंद भी धरती पर गिरेगी तो उस से अनेक दैत्य पैदा हो जाएंगे। उसने अपनी शक्तियों का प्रयोग निर्दोष लोगों पर करना शुरू कर दिया। धीरे धीरे उसने अपना आतंक तीनों लोकों पर मचा दिया। देवताओं ने उसे युद्ध के लिए ललकारा। भयंकर युद्ध का आगाज हुआ। देवता अपनी पूरी शक्ति लगाकर रक्तबिज का नाश करने को तत्पर थे मगर जैसे ही उसके शरीर की एक भी बूंद खून धरती पर गिरती उस एक बूंद से अनेक रक्तबीज पैदा हो जाते।

सभी देवता मिल कर महाकाली की शरण में गए। मां काली असल में सुन्दरी रूप भगवती दुर्गा का काला और डरावना रूप हैं, जिनकी उत्पत्ति राक्षसों को मारने के लिए ही हुई थी। महाकाली ने देवताओं की रक्षा के लिए विकराल रूप धारण कर युद्ध भूमी में प्रवेश किया। मां काली की प्रतिमा देखें तो देखा जा सकता है की वह विकराल मां हैं। जिसके हाथ में खप्पर है,लहू टपकता है तो गले में खोपड़ीयों की माला है मगर मां की आंखे और ह्रदय से अपने भक्तों के लिए प्रेम की गंगा बहती है।

महाकाली ने राक्षसों का वध करना आरंभ किया लेकिन रक्तबीज के खून की एक भी बूंद धरती पर गिरती तो उस से अनेक दानवों का जन्म हो जाता जिससे युद्ध भूमी में दैत्यों की संख्या बढ़ने लगी। तब मां ने अपनी जिह्वा का विस्तर किया।

दानवों का एक बूंद खून धरती पर गिरने की बजाय उनकी जिह्वा पर गिरने लगा। वह लाशों के ढेर लगाती गई और उनका खून पीने लगी। इस तरह महाकाली ने रक्तबीज का वध किया लेकिन तब तक महाकाली का गुस्सा इतना विक्राल रूप से चुका था की उनको शांत करना जरुरी था मगर हर कोई उनके समीप जाने से भी डर रहा था।

सभी देवता भगवान शिव के पास गए और महाकाली को शांत करने के लिए प्रार्थना करने लगे। भगवान् शिव ने उन्हें बहुत प्रकार से शांत करने की कोशिश करी जब सभी प्रयास विफल हो गए तो वह उनके मार्ग में लेट गए। जब उनके चरण भगवान शिव पर पड़े तो वह एकदम से ठिठक गई। उनका क्रोध शांत हो गया। आदि शक्ति मां दुर्गा के विविध रूपों का वर्णन मारकण्डेय पुराण में वर्णित है।