पशु खरीदने जा रहे हैं तो रखें इन बातों का ध्यान ,नहीं तो हो सकते है ठगी का शिकार

ज्यादातर पशुपालक दूसरे राज्यों से महंगी कीमत पर दुधारू पशु तो खरीद लेते हैं। लेकिन बाद में पता चलता है कि दूध का उत्पादन उतना नहीं हो रहा जितना बिचौलिए या व्यापारी ने बताया था और कई बार पशु को कोई गंभीर बीमारी होती है जो कभी ठीक नहीं हो सकती ऐसे में पशुपालकों को आर्थिक नुकसान भी होता है।

ऐसे में आप निचे दी हुई बातों का ध्यान रख कर ठगी से बच सकते है और आपको सही नस्ल का पशु चुनने में भी आसानी होगी

शारीरिक बनावट : अच्छे दुधारू पशु का शरीर आगे से पतला और पीछे से चौड़ा होता है। उस के नथुने खुले हुए और जबड़े मजबूत होते हैं। उस की आंखें उभरी हुई, पूंछ लंबी और त्वचा चिकनी व पतली होती है। छाती का हिस्सा विकसित और पीठ चौड़ी होती है। दुधारू पशु की जांघ पतली और चौरस होती है और गर्दन पतली होती है। उस के चारों थन एकसमान लंबे, मोटे और बराबर दूरी पर होते हैं।

दूध उत्पादन कूवत : बाजार में दुधारू पशु की कीमत उस के दूध देने की कूवत के हिसाब से ही तय होती है, इसलिए उसे खरीदने से पहले 2-3 दिनों तक उसे खुद दुह कर देख लेना चाहिए. दुहते समय दूध की धार सीधी गिरनी चाहिए और दुहने के बाद थनों को सिकुड़ जाना चाहिए।

आयु : आमतौर पर पशुओं की बच्चा पैदा करने की क्षमता 10-12 साल की आयु के बाद खत्म हो जाती है। तीसरा चौथा बच्चा होने तक पशुओं के दूध देने की कूवत चरम पर होती है, जो धीरे धीरे घटती जाती है। दूध का कारोबार करने के लिए 2-3 दांत वाले कम आयु के पशु खरीदना काफी फायदेमंद होता है। पशुओं की उम्र का पता उन के दांतों की बनावट और संख्या को देख कर चल जाता है। 2 साल की उम्र के पशु में ऊपर नीचे मिला कर सामने के 8 स्थायी और 8 अस्थायी दांत होते हैं। 5 साल की उम्र में ऊपर और नीचे मिला कर 16 स्थायी और 16 अस्थायी दांत होते हैं। 6 साल से ऊपर की आयु वाले पशु में 32 स्थायी और 20 अस्थायी दांत होते हैं।

वंशावली : पशुओं की वंशावली का पता लगने से उन की नस्ल और दूध उत्पादन कूवत की सही परख हो सकती है। हमारे देश में पशुओं की वंशावली का रिकार्ड रखने का चलन नहीं है, पर बढि़या डेरी फार्म से पशु खरीदने पर उस की वंशावली का पता चल सकता है।

प्रजनन : सही दुधारू गाय या भैंस वही होती है, जो हर साल 1 बच्चा देती है। इसलिए पशु खरीदते समय उस का प्रजनन रिकार्ड जान लेना जरूरी है। प्रजनन रिकार्ड ठीक नहीं होने, बीमार और कमजोर होने से पाल नहीं खाने, गर्भपात होने, स्वस्थ बच्चा नहीं जनने, प्रसव में दिक्कतें होने जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं।

चौथी क्लास में तीन बार फेल होने वाला आज दे रहा है दे रहे 700 को रोजगार

छत्तीसगढ़ के दुर्ग के सिरसा के किसान अशोक चंद्राकर चौथी क्लास में तीन बार फेल हो गए, तो 12 साल की उम्र में सब्जी बेचनी शुरू की। वे गली-गली घूमकर सब्जी बेचा करते थे। आज उनके पास 100 एकड़ जमीन है और रेंट के खेतों को मिलाकर कुल 900 एकड़ में खेती करते हैं। उन्होंने करीब 700 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी दिया है।

अलग-अलग देशों में 10 करोड़ की सब्जियां कर रहे सप्लाई…

आज अशोक सालाना 10 करोड़ की सब्जियां देश के अलग-अलग हिस्सों में सप्लाई करते हैं। 1973 में जन्मे अशोक का पढ़ाई में मन लगा नहीं, इसलिए उन्होंने काम में मन लगाया। उनके माता-पिता गांव के ही एक घर में काम किया करते थे। अशोक ने 14 साल की उम्र में नानी से एक खेत बटाई पर लेकर सब्जी उगानी शुरू की। इसे वे खुद घूम-घूमकर चरोदा, सुपेला भिलाई, चंदखुरी की गलियों में बेचते। इसी पैसे से पहले तीन, फिर चार, पांच आगे चलकर दस एकड़ खेत रेघा में ले लिया। उनका कारोबार बढ़ने लगा।

इन जगहों पर है जमीन

अशोक के पास आज सौ एकड़ की मालिकाना जमीन सिरसा, तर्रा सहित कई जगहों पर है। इसके अलावा नगपुरा, सुरगी, मतवारी, देवादा, जंजगीरी, सिरसा जैसे गांवों में बटाई की जमीन है, जिस पर सब्जियां उगाई जा रही हैं। इसमें नगपुरा में सबसे अधिक दो सौ एकड़ पर टमाटर लगा है। आज उनके पास 25 से ज्यादा ट्रैक्टर व दूसरी गाड़ियां हैं। आधुनिक मशीनें हैं, जो दवा छिड़काव से लेकर सब्जियों को काटने का काम करती हैं।

मेहनत का कोई विकल्प नहीं

अशोक के मुताबिक, आजकल लोग शॉर्टकट के चक्कर में रहते हैं, अगर आप किसी प्लान पर लगातार चलते हैं और इंतजार करते हैं, तो आपको रिजल्ट जरूर मिलेंगे। मेहनत का कोई ऑप्शन हो ही नहीं सकता। कल तक मैं दो-दो हजार के लिए तरसता था और आज 15-15 हजार रुपए वेतन दे रहा हूं।

किसान के बेटे ने पिता के लिए बनाया Remote से चलने वाला ट्रैक्टर

भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, ये बात अक्सर लोग कहते हैं, साथ ही ये भी कहा जाता है कि भारत में प्रतिभाओं को उचित मंच नहीं मिल पाता है। उसके बाद भी अक्सर आप देखते होंगे कि प्रतिभा अपने आप चमक बिखेर देती है। कुछ बड़ा या फिर नया करने के लिए जरूरी नहीं कि आप किसी बड़े संस्थान में पढ़ाई करें, जो काम आईआईटी के छात्र नहीं कर सकते हैं वो काम एक किसान के बेटे ने कर दिखाया है। उसकी प्रतिभा का डंका आज पूरे देश में बज रहा है।

राजस्थान के बारां जिले के बमोरीकलां गांव में एक किसान के बेटे ने जो कारनामा किया है उस से उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। 19 साल का ये युवक लगातार नए आविष्कार करने में लगा रहता है। उस ने अब जो चीज तैयार की है उस से खेती काफी आसान हो सकती है। छोटी सी उम्र में इस युवक ने अपनी बुद्धि के बल पर 27 से अधिक आविष्कार किए हैं। इस लड़के का नाम योगेश कुमार है। इसके आविष्कार देख कर आईआईटी में पढ़ने वाले लोग भी हैरान हैं। योगेश नागर फिलहाल मैथ्स से बीएससी कर रहा है। वो फर्स्ट ईयर का स्टूडेंट है।

योगेश के पिता राम बाबू नागर 15 बीघा जमीम पर खेती करते हैं. इसी से परिवार का खर्चा चलता है। अपने पिता की मुश्किलों को देख कर योगेश ने कुछ ऐसा करने की ठानी जिस से उनका काम आसान हो जाए, इसके लिए वो लगातार काम कर रहा था। उसके पिता को ट्रैक्टर चलाते समय पीठ में दर्द की शिकायत होती थी। पिता की तकलीफ को दूर करने के लिए योगेश ने रिमोट ऑपरेटिव सिस्टम डेवलप किया है। इससे खेत में एक जगह बैठकर रिमोट से ट्रैक्टर चलाकर जुताई की जा सकती है। बिना ड्राइवर के ट्रैक्टर को चलता देखकर गांव वाले भी हैरान रह जाते हैं।

अब योगेश के पिता का काम काफी आसान हो गया है। वो एक जगह खड़े हो कर ट्रैक्टर चलाते हैं। इस से उनका समय भी बचता है और पीठ दर्द की शिकायत से भी मुक्ति मिल गई है। योगेश के इस आविष्कार से गांव के लोग भी हैरान हैं, उनका कहना है कि योगेश में बहुत प्रतिभा है, उसे सही मार्गदर्शन मिले तो वो भारत का नाम रोशन कर सकता है। अब योगेश की चर्चा पूरे देश में हो रही है। रिमोट से ट्रैक्टर चला कर योगेश ने वो कारनामा किया जिस से भारत के किसानों की काफी मदद हो सकती है।अब योगेश को उम्मीद है कि उनके पिता को खेती के दौरान आने वाली समस्याओं का सामना नहीं करकना पड़ेगा।

वीडियो भी देखें

क्या अब धान की फसल लेने वाले किसान जाएंगे जेल?

मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार में किसानों के लगातार प्रदर्शन की खबरें तो आपने पढ़ी होंगी लेकिन प्रदेश सरकार अब ऐसा कदम उठाने जा रही है जिससे शिवराज सरकार फिर सुर्खियों में आ सकती है। राज्य प्रशासन ने गर्मी के मौसम में धान की फसल लेने वाले किसानों को उनकी जगह दिखा दी है।

दरअसल शुक्रवार को यहां संभागायुक्त टीसी महावर की अध्यक्षा में जल उपयोगिता समिति की बैठक हुई। जिसमें राज्य शासन के निर्देशों का हवाला देते हुए प्रशासनिक अमले से दो टूक कहा कि जलाशयों में उपलब्ध पानी सबसे पहले उद्योगों को दें। मनाही के बाद भी अगर किसान धान की फसल लेते हैं तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिले में इस बार बहुत कम बारिश के कारण बांधों व जलाशयों में पानी की उपलब्धता बीते वर्ष की तुलना में कम है। राज्य शासन की चिंता इस इस बात को लेकर है कि जिले में संचालित होने वाले उद्योगों को अगले बारिश के मौसम में पानी की आपूर्ति हो पाएगी या नहीं शुक्रवार को बैठक के दौरान राज्य सरकार की चिंता की झलक दिखाई दी।

बैठक के दौरान पूरे समय इसी बात को लेकर चर्चा होती रही कि किस जलाशय में कितना पानी है। जिले में स्थापित उद्योगों को उनकी मांग के अनुसार पूरे गर्मी भर पानी दे पाएंगे या नहीं। जल भराव का आंकलन करने के बाद कमिश्नर ने कहा कि बांधों व जलाशयों में पानी का पहला उपयोग उद्योगों का होगा। इसके बाद पेयजल आपूर्ति के लिए रिजर्व वाटर रखा जाएगा। रिजर्व वाटर के बाद अगर जलाशयों व बांधों में पानी बच पाता है तो रबी फसल के रुप में दलहन व तिलहन की खेती करने वाले किसानों को जल आपूर्ति की जाएगी।

बैठक में कमिश्नर ने साफ कहा कि जल्द ही कृषि, सिंचाई व पीएचई विभाग के अधिकारियों की बैठक कर स्थिति के अनुसार जल भराव क्षेत्र घोषित करने और भूजल स्तर के दोहन को रोकने के लिए कड़े कानून बनाए जाए।

संभाग के चार वृहद जलाशयों मिनीमाता हसदेव बांगों, खारंग जलाशय, मनियारी जलाशय और केलो परियोजना तथा मध्यम जलाशय घोंघा, मांड, केदार, पुटका, किंकारी और ख्महार पाकुट जलाशयों में वर्तमान में 64.23 प्रतिशत जल उपलब्ध है तथा 337 लघु जलाशयों में 25.9 प्रतिशत जल भराव स्थिति है।

ऐसे शुरू करें ड्रैगन फ्रूट की उन्नत खेती

 

एक ड्रैगन फलों के पेड़ मूल रूप से जीसस हीलोसेरियस का कैक्टस बेल है। यह मध्य अमेरिका के मूल निवासी है, लेकिन अब पूरी दुनिया में विशेषकर उष्णकटिबंधीय देशों में उगता है। यह एक बढ़ती हुई बढ़ती हुई बेल है जिसके लिए एक ऊर्ध्वाधर पोल का समर्थन करने के लिए बढ़ने की आवश्यकता होती है और फिर एक छाता जैसा गिरने के लिए एक अंगूठी होती है। इसमें 15-20 साल का जीवन काल है, इसलिए पोल और रिंग का उचित चयन महत्वपूर्ण है।

एक मजबूत और स्थायी समर्थन सुनिश्चित करने के लिए विशेष आरसीसी पोल लगाए गए हैं आमतौर पर चार पोल प्रति पोल को अधिकतम उपज देने के लिए लगाए जाते हैं। कटाई और रखरखाव के काम के दौरान उचित ध्रुव को पोल और पंक्ति अंतर को रोके रखा जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के वृक्षारोपण की मिट्टी और पानी की संपत्ति के अनुसार मूल पोषक तत्व और उर्वरक समय-समय पर लागू होते हैं। धातु तैयार करने से बचा जा सकता है क्योंकि इससे पौधों को धूप / गर्मी जल जाती है।

उष्णकटिबंधीय मौसमों में आम तौर पर उत्तर-दक्षिण पंक्तियों को प्राथमिकता दी जाती है, जहां गर्मियों में तापमान 40 डिग्री से ऊपर होता है। अधिक धूप की गर्मी का कारण सूर्य की रोशनी हो सकती है लेकिन उपचारात्मक कदम आसानी से स्थानीय रूप से उपलब्ध हैं। इस संयंत्र से ज्यादा बीमारी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, आम समस्याओं जैसे जड़ सड़ांध, धूप की कालिमा, पक्षी हमलों आदि का आसानी से ध्यान रखा जा सकता है।

ड्रैगन फलों – पिठया, 21 वीं सदी की ‘आश्चर्यजनक फल’ भारतीय उद्यान परिदृश्य में एक क्रांति में रिंग के लिए सेट है। यह किसानों और उपभोक्ताओं के लिए एक बून है मूल रूप से मध्य अमेरिका से यह सफलतापूर्वक थाईलैंड, मलेशिया, वियतनाम, श्रीलंका, बांग्लादेश में वाणिज्यिक रूप से उगता है और भारत में हमारे दरवाजे पर अब दस्तक दे रहा है।

मुख्य विशेषताएं:

  • किसी भी प्रकार की मिट्टी में बढ़ता है
  • पानी की न्यूनतम आवश्यकता
  • रखरखाव की न्यूनतम आवश्यकता
  • भारतीय जलवायु स्थितियों को सहिष्णु बना सकता है
  • 2 एनडी / 3 आरडी वर्ष में निवेश रिटर्न
  • अधिक प्रसार / पुनर्विक्रय के लिए कटिगों का उपयोग किया जा सकता है
  • स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भारी मांग
  • मूल्य संवर्धन उत्पाद कमांड प्रीमियम दरें

मिट्टी:

ड्रैगन फलों के पौधे किसी भी प्रकार की मिट्टी को बर्दाश्त कर सकते हैं, हालांकि वे अच्छी तरह से मिट्टी में सूखने में अच्छी तरह से बढ़ते हैं। जल को बनाए रखने वाली मिट्टी जड़ सड़ांध का कारण बन सकती है और इस घातक कारक से बचने के लिए, जल निकासी की सुविधा के लिए मिट्टी को रेत या छोटे पत्थर के कंकड़ों से मिलाया जा सकता है।

जलवायु:

भारत एक उष्णकटिबंधीय देश है, जिसमें हर साल मध्यम जलवायु होती है। ड्रैगन फल उष्णकटिबंधीय मौसम के लिए अच्छी तरह से अनुकूल है। चरम भारतीय मौसम के लिए मामूली समायोजन जहां तक ​​जलवायु स्थितियों का संबंध है, सभी बाधाएं दूर कर सकते हैं।

सिंचाई:

अन्य फसलों / फलों की तुलना में कैक्टस होने के कारण ड्रैगन फल को कम पानी की आवश्यकता होती है। यह महीनों के लिए पानी के बिना जीवित रह सकता है सिंचाई का सर्वोत्तम अनुशंसित तरीका ड्रिप सिंचाई है। बाढ़ से सिंचाई की सिफारिश नहीं की जाती क्योंकि यह पानी बर्बाद करता है और फूस का काम बढ़ाता है। प्रति दिन लगभग 1 से 2 लीटर पानी प्रति संयंत्र प्रतिदिन गर्मियों / सूखे दिनों के दौरान पर्याप्त है। आपकी मिट्टी, जलवायु और पौधे स्वास्थ्य के आधार पर जल की आवश्यकता बढ़ सकती है या कम हो सकती है

उपज और अर्थशास्त्र:

पौधरोपण के बाद 18-24 महीनों के बाद ड्रैगन फल सामान्य रूप से फल होता है। यह एक वनस्पति फल पौधे है, जो आम तौर पर मानसून के दौरान या बाद में फलों के फल के साथ होता है। यह एक सीजन के दौरान 3 से 4 तरंगों में फल होता है। प्रत्येक ध्रुव का फल प्रति लहर लगभग 40 से 100 फल होता है। प्रत्येक फल का वजन लगभग 300 से 1000 ग्राम होता है। एक पोल आम तौर पर लगभग 15 से 25 किलोग्राम फल पैदा करता है। (60 / 80kgs प्रति पोल की खेती भारत में दर्ज की गई है) इन फलों को बाजार में 3 से 400 रुपये प्रति किलोग्राम में बेची जाती है, लेकिन सामान्य फार्म की दर लगभग रु। 125 से 200 रुपये प्रति किलो

वार्षिक आय की एक सामान्य गणना शायद इस प्रकार की गणना की जा सकती है:
एक एकर x 300 पोल एक्स 15 किग्रा (कम) x रु .25 (न्यूनतम) = रु। 5,62,500 = 00 प्रति एकड़ प्रति वर्ष

ध्यान दें:

  • सभी गणना अच्छी तरह से बनाए गए खेत के लिए हैं
  • सभी उपरोक्त गणना सबसे कम ओर हैं
  • एक एकड़ में 400 पोल भी हो सकते हैं
  • उचित खेती के तरीके / पोषक तत्व अधिक पैदावार दे सकते हैं
  • उचित विपणन नेटवर्क या निर्यात बेहतर दरें ला सकते हैं
  • नाइट लाइटिंग पद्धति फ्राईटिंग के अतिरिक्त तरंगों को दे सकती है
  • मूल्य अतिरिक्त उत्पाद उच्च रिटर्न प्राप्त करेंगे

भारत में खेती की स्थिति और मांग:

महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के राज्यों में बहुत कम किसानों ने भारत में दार्गन फलों की खेती की है। ड्रैगन फलों की खेती का कुल अखिल भारतीय क्षेत्र शायद 100 एकड़ से कम हो। भारत में इसके फल, पोषण और औषधीय गुणों के लिए जागरूकता और मांग बहुत बड़ी है। भारत थाईलैंड, मलेशिया, वियतनाम और श्रीलंका से इसकी आवश्यकता का 95% आयात करता है। इस फल में खाड़ी, यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के निर्यात के लिए भी काफी संभावना है।

अब इस मोबाइल ऐप से मिंटों में करें जमीन को नापने का मुश्किल काम

अगर आप अपने खेत ,प्लाट ,दुकान जा किसी और चीज जो नापना चाहते है तो आप सिर्फ एक मोबाइल के साथ कर सकते है और वो भी बहुत आसानी और सटीकता के साथ । बस उसके लिए आपके फ़ोन में मोबाइल इंटरनेट और जीपीएस सिस्टम होना चाहिए । जो की अब लगभग हर मोबाइल फ़ोन में होता ही है । जमीन को नापने के लिए बस आपको एक ऐप अपने फ़ोन पर करनी होगी और उसके बाद जिस जमीन को नापना है । उसके इर्द गिर्द चक्र लगाना है बस बाकि बाकि का काम ऐप ही करेगी ।

सबसे पहले Google Play Store पर जा कर “Distance and area measurement ” ऐप इंसटाल करो इस ऐप की रेटिंग 4.1 है जो काफी अच्छी है । उसके बाद इसका जीपीएस सिस्टम ऑन करें ।अब ऐप को OPEN करें ।

उसके बाद Distance : के लिए मीटर,फ़ीट ,यार्ड आदि में से चुने ,आप फ़ीट चुन सकते है क्यूंकि ज्यादतर हमारे ये ही इस्तेमाल होता है । अब अगर अपने अपने खेत का ज़मीन नापना है तो Area : के लिए acre चुने । एक और ऑप्शन Logging है जिसे Auto पर रहने दे ।

अब इसमें एक स्टार्ट का बटन दिया हुआ है उसको दबा कर जिस जमीन को नापना है उसके इर्द गिर्द पूरा एक चक्र लगायें । ध्यान रहे जिस जगह को नापना है उसके किनारों पर बिलकुल साथ साथ चलें नहीं तो एरिया ज्यादा आ ज्यागा । जहाँ से आप ने चलना शुरू क्या था वहां तक चक्र पूरा करें । बस जैसे ही आप चक्र पूरा करेंगे साथ की साथ आप को पता चल जायगा की टोटल एरिया कितना है ।

वैसे तो यह ऐप बहुत हद तक बिलकुल सही एरिया बताती है लेकिन कभी कभी इंटरनेट ठीक ना चलने के वजह से थोड़ी बहुत गड़बड़ हो जाती है इस लिए इस ऐप का का प्रयोग सिर्फ कच्चा अंदाज़ा लगाने के लिए करें । कल जब आप खेत जायेंगे तो इसका इस्तेमाल कर अपना खेत जरूर नाप के देखना ।

राजस्थान के किसान भी करने लगे केसर की खेती ,सरकार से माँगा सहयोग

जम्मू-कश्मीर जैसे ठंडे प्रदेश में पनपने वाली केसर की खेती शेखावाटी के धोरों में भी होने लगी है। केसर का जायका थोड़ा कड़वा जरूर होता है, लेकिन यही केसर शेखावाटी की धरा में नई खुशबू और मिठास घोल रही है। शेखावाटी में केसर की खेती की बात करना मजाक समझा जाता था, लेकिन केसर के जरिए किसानों की जिंदगी में नए रंग घोलने के लिए मोरारका फाउंडेशन आगे आया है।

फाउंडेशन के प्रयासों से आठ किसान प्रायोगिक तौर पर इसकी खेती करने लग गए है और यह खेती कुछ सफल भी होने लगी है। सबसे पहले चेलासी गांव के किसान मुरली धर सैनी ने इसकी खेती कर इसकी संभावना को मजबूती दी है। मोरारका हवेली में भी केसर की क्यारी तैयार की गई है। करीब नौ-दस में फूल भी खिले हैं। इन फूलों से केसर का उत्पादन होगा।

 

मोरारका फाउंडेशन के स्थानीय मैनेजर अनिल सैनी ने बताया कि कश्मीर से लाए प्रमाणित बीज से खेती शुरू की है गई। सर्दी का मौसम केसर की फसल के लिए सबसे उत्तम है। दिन में धूप खिलने और रात को सर्दी पड़ने से फूल ज्यादा आते हैं। केसर के फूलों को रात के अंधेरे में बंद कमरे में सुखाना पड़ता है। सुखाते समय भी फूलों की खास देखभाल करनी पड़ती है।

कृषि विभाग के अधिकारी इस बात का दावा करते हैं कि यहां पैदा होने वाली केसर की गुणवत्ता अच्छी नहीं हो सकती, क्योंकि श्रेष्ठ किस्म के लिए लम्बे समय तक शून्य से कम तापमान चाहिए। अनिल सैनी इस दावे को खारिज करते हैं। फिलहाल मोरारका हवेली, कल्याणपुरा के रामावतार बुगालिया, बलवंतपुरा फाटक के संजू सैनी, बड़ी झीगर के ओमप्रकाश पचार, बसावा के भानाराम सैनी, बलरिया का बास के नेमीचंद धायलों का बास के बलवीर सिंह केसर की खेती कर रहे हैं।

पायलट प्रोजेक्ट बनाकर सरकार के पास भेजा जाएगा

किसान केसर की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार से सहयोग मांग रहे हैं। पायलट प्रोजेक्ट बना सरकार के पास भेजा जाएगा। जैविक खेती करने वाले किसानों को शामिल किया जाएगा। सरकार की ओर से केसर के बीज खाद उपलब्ध कराई जाए तो इसकी खेती को बढ़ावा मिल सकता है।

यूरिया की खपत घटाने के लिए सरकार ने निकाला यह अनोखा जुगाड़

किसान यूरिया का कम उपयोग करें इसके लिए सरकार ने नई तरकीब निकाली है। अब यूरिया 50 किलो के बदले 45 किलो के बैग में मिलेगा। उर्वरक मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी है। अधिकारी ने कहा कि यूरिया के 45 किग्रा के बैग की बिक्री 245 रुपए (टैक्स अलग से) में की जाएगी। ये अभी की 50 किग्रा के यूरिया की कीमत 268 रुपए (टैक्स अलग से) से कम होगी।

कंपनियां तैयार

अधिकारी ने बताया कि योजना तैयार की जा रही है। कंपनियां इस परिवर्तन के लिए तैयार हैं। वे 45 किग्रा बैग होने की छपाई करेंगे। इसे अगले वर्ष से लागू किया जायेगा।उन्होंने कहा कि असल उद्देश्य यूरिया की खपत को कम करना तथा उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना है। चूंकि यूरिया अन्य उर्वरकों से सस्ता है, इसलिए व्यापक तौर पर इसका इस्तेमाल करते हैं। सरकार की ओर से इसको काफी सब्सिडी प्राप्त होती है तथा इसकी अधिकतम खुदरा कीमत अब 5,360 रुपए प्रति टन की है।

खपत कम करेंगे

अधिकारी ने ब्योरा दिया, यूरिया की खपत को घटाने के लिए हमने विभिन्न उपायों के बारे में सोचा। नीम लोपित यूरिया उनमें से एक था। जो हमने लागू किया है। अब हम 45 किग्रा के बैग के बारे में सोच रहे हैं। सामान्य तौर पर किसान प्रत्येक हेक्टेयर भूमि के लिए बैगों की संख्या के हिसाब से यूरिया का इस्तेमाल करते हैं। जब हमने किसानों को 50 किग्रा के बैग की संख्या को कम करने के लिए कहा, उन्होंने नहीं सुना। इसलिए हमने खपत को कम करने के लिए 45 किग्रा के बैग का इस्तेमाल करने का फैसला किया है।

40 हजार करोड़ है सबसिडी

अधिकारी ने कहा कि किसान 45 किग्रा का बैग खरीदेंगे और जितने बैग का वह पहले इस्तेमाल करते थे उतने का ही इस्तेमाल करेंगे। यह अप्रत्यक्ष रूप से खपत में 10 प्रतिशत की कमी करेगा। यूरिया की वार्षिक सब्सिडी करीब 40,000 करोड़ रुपए है। भारत में पिछले वर्ष से करीब 2.4 करोड़ टन यूरिया का उत्पादन हो रहा है जो 2.2 करोड़ टन की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।

सरकारी नौकरी छोड़ शुरू की एलोवेरा की खेती सिर्फ दो साल में होने लगी करोड़ों की कमाई

ये कहानी बदलते हुए भारत के एक ऐसे किसान की है जो पढ़ा-लिखा है, इंजीनियर है और फर्राटेदार अंग्रेजी भी बोलता है। इतना ही नहीं उन्होंने तो एमबीए की पढ़ाई के लिए दिल्ली के एक कॉलेज में दाख़िला भी लिया था, लेकिन शायद उनकी मंज़िल कहीं और थी। ये कहानी जैसलमेर के हरीश धनदेव की है जिन्होंने 2012 में जयपुर से बीटेक करने के बाद दिल्ली से एमबीए करने के लिए एक कॉलेज में दाख़िला लिया,

लेकिन पढ़ाई के बीच में ही उन्हें 2013 में सरकारी नौकरी मिल गई सो वो दो साल की एमबीए की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। हरीश जैसलमेर की नगरपालिका में जूनियर इंजीनियर के पद पर तैनात हुए। यहां महज दो महीने की नौकरी के बाद उनका मन नौकरी से हट गया।

हरीश दिन-रात इस नौकरी से अलग कुछ करने की सोचने लगे। कुछ अलग करने की चाहत इतनी बढ़ गई थी कि वो नौकरी छोड़कर अपने लिए क्या कर सकते हैं इस पर रिसर्च करना शुरु किया।

वह किसानों के परिवार से ताल्लुक रखता था और कुछ अलग हट कर करना चाहता था। एक बार दिल्ली में आयोजित एक कृषि प्रदर्शनी में उसे जाने का मौका मिला और यहीं से उसका जीवन बदल गया।

उसने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दिया और अपने 120 एकड़ के खेत में एलोवेरा यानि की घृतकुमारी सहित अन्य फसलों की खेती शुरू कर दी। जैसलमेर से 45 किलोमीटर दूर धहीसर में हरीश ने अपनी कंपनी ‘नेचुरलो एग्रो’ की भी शुरूआत की । थार के मरूस्थल में हो रहे इस एलोवेरा को बड़ी मात्रा में पतंजली फूड प्रोडेक्ट्स को भेजा जाता है जहां उससे जूस बनाया जाता है।

इस रेगिस्तानी इलाके में होने वाले एलोवेरा की गुणवत्ता इतनी बेहतरीन है कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में इसकी बेहद मांग है। पतंजली के विशेषज्ञों ने यहां उपजाए जाने वाले एलोवेरा की गुणवत्ता को इतना अच्छा पाया कि उन्होंने इसकी पत्तियों का तुरंत आर्डर दे दिया। नौकरी से त्यागपत्र देकर खेती किसानी शुरू करने के धनदेव के इस साहसिक फैसले का सुखद परिणाम सामने आया।

आमतौर पर रेगिस्तान में बाजरा, गेंहू, मूंग और सरसों उपजाए जाते हैं लेकिन वो कुछ नया उपजाना चाहते थे। उन्होंने अपने 120 एकड़ के खेत में एलोवेरा की बेबी डेनसिस प्रजाति लगायी। एलोवेरा की यह प्रजाति इतनी बेहतरीन है कि ब्राजील, हांगकांग और अमेरिका जैसे देशों में भी इसकी बड़ी मांग है।

शुरूआत में उन्होंने एलोवेरा के 80 हजार पौधे लगाए जो आज बढ़कर तकरीबन सात लाख हो चुके हैं। वो बताते हैं कि पिछले चार महीनों में उन्होंने हरिद्वार के पतंजली फैक्ट्री में 125 से 150 टन तक एलोवेरा के पत्तियों के प्रसंस्कृत गुदे भेजे हैं। धनदेव ये भी बताते हैं कि एलोवेरा के पत्तों का प्रसंस्करण आधुनिकतम प्रणाली के जरिए होता है जिसके लिए उन्होंने एक संयंत्र भी स्थापित किया है।

अब आपके गांव के सरपंच नहीं कर सकेंगे गोलमाल

आज हम आप को एक  ऐसी सरकारी वेबसाइट (gov.in)  का लिंक बताने जा रहे है , जिसका उपयोग कर के आप अपने गांव , अपने मोहले और अपने देश के विकाश में मत्वपूर्ण  योगदान कर सकते है , यह पर आप देख सकते है की भररत सरकार  ने आप के गांव के निर्माण कार्यों के लिए कितना पैसा दिया है ( यह डाटा पूरी तरह से ऑथेंटिकेट है ), अगर आप को कोई अनियमितता लगती है तो इसकी शिकायत आप जनसुनवाई में सीधे कर सकते है

Step 1 .  सर्वप्रथम नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

http://www.planningonline.gov.in/ReportData.do?ReportMethod=getAnnualPlanReport

Step 2  .आप होनी सुबिधा के अनुसार अपनी भाषा चुन सकते है , अभी यहाँ पर इंग्लिश,हिंदी और पंजाबी का ऑप्शन है। …इमेज देखें

Step 3  .यहाँ पर आप अपना योजना बर्ष और अपने राज्य  का नाम चुन कर GET REPORT पर क्लिक करें , इसके  बाद आप से योजना इकाई के बारे में पूछेगा , For Example अगर आप को ये देखना है की आप के गांव  में इस बर्ष कितना पैसा सरकार  की तरफ से आया है तो आप GRAM PANCHYAT का ऑप्शन चुनेँगे

Step 4 . उसके बाद आप से ये पूछा जायेगा की आप किस जिला पंचायत में रहते है, आप अपने जिले का नाम सेलेक्ट कर लेंगे

Step 5  . जिला पंचायत सेलेक्ट करने के बाद आप अपने जनपद पंचायत  या ब्लॉक का नाम सेलेक्ट कर लेंगे, For Example – अगर मुझे ये देखना है की 2017-2018 में मेरे गांव में किस मद में सरकार ने  कितना पैसा दिया है ,

Step 6  .जनपद पंचायत के बाद आप से ग्राम PANCHYAT का नाम पुछा  जायेगा , उसके बाद आप GET REPORT पर क्लिक करेंगे।

यहाँ पर आप के सामने आप के गाँव / मोहल्ले / बार्ड में अभी तक कितना पैसा आया है  और आप के मुखिया( ग्राम PANCHYAT प्रद्यान), आप के बार्ड के मेंबर ने कितना काम किया है और सरकार से कितना पैसा लिया है, इसकी पूरी जानकारी ले सकते है, यदि आप को कुछ ऐसा डेटा मिलता  है जो आप को सही नहीं लगता है तो इसकी शिकायत आप जनसुनवाई पर जा कर कर सकते है , जहा पर आप के शिकायत पर सीधे मुखयमंती की सीधे नजर रहेगी

अब हमको जागरूक होने की जरूरत है। सभी जानकारियां सरकार ने ऑनलाइन वेबसाइट पे उपलब्ध करा दी है बस हमें उन्हें जानने की जरूरत है, यदि हर गांव के सिर्फ 2-3 युवा ही इस जानकारी को अपने गांव के लोगो को बताने लगे, समझ लो 50% भ्रष्टाचार तो ऐसे ही कम हो जाएगा।

इसलिए आपसे गुजारिश है कि आप अपने गांव में वर्ष 2016-17 मे हुए कार्यो को जरूर देखें और इस लिंक को देश के हर गांव तक भेजने की कोशिश करे ताकि गांव के लोग अपना अधिकार पा सके।