ईरान ने चावल आयात पर लगी रोक हटाई, 1121 धान में 200 रुपए तक आया उछाल

ईरान ने चावल आयात पर लगी रोक हटा दी है। इससे 1121 धान के रेट में 200 रुपए तक का उछाल आया है। इसका सीधा फायदा चावल निर्यातकों किसानों को होगा। ईरान सीजन में आयात पर अस्थाई रोक लगा देता है, ताकि लोकल किसानों का धान खरीदा जा सके। इस बार वहां लोकल पैदावार कम है और डिमांड ज्यादा है। इसलिए रोक हटा दी गई है।

ईरान ने 22 नवंबर से 22 जुलाई 2018 तक चावल निर्यात खोल दिया है। ईरान में हर साल तीन मिलियन टन चावल की खपत है, जबकि उसका घरेलू उत्पादन 2.2 मिलियन टन है। इसलिए उसे 8 से 10 लाख टन का आयात करना पड़ता है। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स के पूर्व प्रधान विजय सेतिया ने बताया कि देश के लिए यह अच्छी खबर है। इसका राइस एक्सपोर्टर्स को फायदा होगा। एक्सपोर्टर्स को परमिट देना शुरू कर दिया है।

एक लाख टन चावल ईरान के पोर्ट पर पड़ा है, यह भी अब जल्द उठ जाएगा। सेतिया ने बताया कि भारत से 40 लाख टन चावल का निर्यात होता है। इसमें से 25 प्रतिशत निर्यात ईरान में होता है। इस बार चावल निर्यातकों ने महंगे दाम पर धान खरीदी हुई है, अब चावल बाहर जाने से निर्यातकों को फायदा होगा। अगले कुछ दिनों मेें इसका और किसान दोनों को फायदा होगा। पूसा-1121 का चावल ईरान में सबसे ज्यादा जाता है। अरब के देशों में ज्यादातर 1121 की खपत है। यूरोप में सुपर बासमती चावल की डिमांड ज्यादा होती है।

1121 में ऐसे आया उछाल 

ईरानमें चावल का निर्यात खुलते ही 1121 जीरी के भाव में 200 रुपए प्रति क्विंटल का उछाल आया है। पहले 1121 धान 3200 रुपए प्रति क्विंटल तक बिकी थी, लेकिन गुरुवार को नरवाना मंडी में 1121 जीरी 3390 रुपए प्रति क्विंटल, पिल्लूखेड़ा 3379, जींद 3380, निसिंग 3400, हांसी 3351, चीका मंडी 3350 , कलायत 3411, खन्ना मंडी 3470, अमृतसर 3485, करनाल 3370, कैथल 3380 रुपए प्रति क्विंटल बिकी। बासमती जीरी में 30 से 40 रुपए प्रति क्विंटल का उछाल आया है।

 

किसानों को मिला अच्छा भाव 

इसबार किसानों को धान का भाव सीजन की शुरुआत से ही अच्छा मिल रहा है। पीआर धान समर्थन मूल्य से ज्यादा भाव में बिकी। 1509 किस्म का भाव 2300 रुपए से लेकर 2600 रुपए प्रति क्विंटल मिला। डुप्लीकेट बासमती भी 2800 रुपए, 1121 का रेट 2800 से 3300 रुपए, परंपरागत बासमती का रेट 3500 रुपए से लेकर 4000 रुपए प्रति क्विंटल मिल रहा है। विदेशों में ज्यादा सौदे होते हैं तो रेटों में उछाल सकता है।

अब ट्रैक्टर-ट्राली पर भी लगेगा इतना टोल टैक्स

देश भर के किसान अब यदि अपनी ट्रैक्टर ट्राली के साथ किसी भी टोल प्लाजा से गुजरेंगे तो उन्हें ट्रकों के समान टोल देने पड़ेंगे। केंद्र सरकार किसानों के ट्रैक्टर ट्राली को कामर्शियल वाहनों की श्रेणी में डालने जा रही है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की अधिसूचना के ड्राफ्ट रूल में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि ट्रैक्टर अब नान ट्रांसपोर्ट व्हीकल (गैर व्यवसायिक वाहनों) की श्रेणी से बाहर माने जाएंगे।

केंद्र सरकार के इस फैसले का विरोध भी शुरू हो गया है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री देवीलाल जब देश के उप-प्रधानमंत्री बने, तब उन्होंने सड़क एवं परिवहन विभाग, मोटर व्हीकल अधिनियम तथा एनएचएआइ की नियमावली में संशोधन करवाकर ट्रैक्टर-ट्राली को ‘गड्डे’ का दर्जा दिलाया था। यह 1989 की बात है। इसके बाद से ट्रैक्टर ट्रालियों को टोल संग्र्रहण केंद्रों पर टोल टैक्स नहीं देना पड़ता था।

देवीलाल के प्रयासों से मिली राहत का देश भर के किसानों को फायदा हुआ था। लेकिन अब दुबारा ट्रेक्टर ट्राली पर ट्रकों के समान टैक्स लगेगा । केंद्र सरकार लगातार किसान विरोधी फैसले ले रही है। किसानों को उनकी फसल के वाजिब दाम नहीं दिए जा रहे, उल्टे गलत फैसलों से किसानों की कमर तोड़ी जा रही है। किसानों के ट्रैक्टर ट्राली से टोल वसूल किए जाने का फैसला निहायत ही गलत है।

तीन नस्लों के मेल से गाय की नई प्रजाति विकसित, देगी 55 लीटर तक दूध

वैज्ञानिकों ने तीन नस्लों के मेल से गाय की नई प्रजाति विकसित की है। इसे नाम दिया है ‘हरधेनू’। यह 50 से 55 लीटर तक दूध दे सकती है। 48 डिग्री तापमान में सामान्य रहती है। यह 18-19 महीने में प्रजनन करने के लिए सक्षम है। जबकि अन्य नस्ल करीब 30 माह का समय लेती है। ‘हरधेनू’ प्रजाति में 62.5% खून हॉलस्टीन व बाकी हरियाना व शाहीवाल नस्ल का है। यह कमाल किया हिसार के लुवास विवि के अनुवांशिकी एवं प्रजनन विभाग के वैज्ञानिकों ने।

कामधेनू की तर्ज पर नाम :डॉ. बीएल पांडर के अनुसार कामधेनू गाय का शास्त्रों में जिक्र है कि वह कामनाओं को पूर्ण करती है। इसी तर्ज पर ‘हरधेनू’ नाम रखा गया है। नाम के शुरुआत में हर लगने के कारण हरियाना की भी पहचान होगी।

पहले 30 किसानों को दी : वैज्ञानिकों ने पहले करीब 30 किसानों को इस नस्ल की गाय दीं। वैज्ञानिकों ने अब यह नस्ल रिलीज की है। अभी इस नस्ल की 250 गाय फार्म में हैं। कोई भी किसान वहां से इस नस्ल के सांड का सीमन ले सकता है।

जर्सी को पीछे छोड़ा :‘हरधेनू’ ने दूध के मामले में आयरलैंड की नस्ल ‘जर्सी’ को भी पीछे छोड़ दिया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि ‘जर्सी’ नस्ल की गाय आैसत 12 लीटर और अिधकतम 30 लीटर तक दूध दे सकती है। वहीं, ‘हरधेनू’ औसत 16 लीटर और अधिकतम 50 से 55 लीटर दूध दे सकती है।

ऐसे तैयार की नस्ल : हरियाना नस्ल की गाय के अंदर यूएसए व कनाडा की हॉलस्टीन और प्रदेश की शाहीवाल और हरियाना नस्ल का सीमन छोड़ा गया। तीन नस्लों के मेल से तैयार हुए गाय के बच्चे को ‘हरधेनू ‘ नाम दिया गया।

45 साल शोध :1970 में हरियाणा कृषि विवि की स्थापना हुई। तभी गाय की नस्ल सुधार के लिए ‘इवेलेशन ऑफ न्यू ब्रीड थ्रू क्राॅस ब्रीडिंग एंड सिलेक्शन’ को लेकर प्रोजेक्ट शुरू हुआ। 2010 में वेटनरी कॉलेज को अलग कर लुवास विश्वविद्यालय बनाया गया। शंकर नस्ल की गाय की नई प्रजाति ‘हरधेनू ‘ को लेकर चल रही रिसर्च का परिणाम 45 साल बाद अब सामने आया है।

 

किसान ने निकाली एक ऐसी स्कीम के पैसे भी बच गए और लेबर भी फ्री

यह कहानी सबक देती है कि हमारे पास जितने भी सीमित संसाधन हैं, उन्हीं का सही इस्तेमाल करके हम न केवल कामयाबी हासिल कर सकते हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी मॉडल स्थापित कर सकते हैं। इसके लिए जरूरत होती है सही नेतृत्व और टीम वर्क की।

बेंगलुरु से करीब 100 किलोमीटर दूर एक जगह है मांड‍या। पिछले साल जुलाई की बात है, यहां गन्ने की खेती करने वाले 20 से ज्यादा किसानाें ने मौत को गले लगा लिया। इन किसानों की आत्महत्या की वजह यह नहीं थी कि खेती नहीं हुई, वजह थी वह भारी कर्ज जो उन्होंने कभी लिया था और अब बढ़ते-बढ़ते इतना हो चुका था कि उसे चुकाना उनके वश की बात नहीं रही थी। फसल की सही कीमत न मिलना, भारी स्टॉक और सही सलाह के अभाव में ये किसान हालात के सामने हार चुके थे।

इधर, मांडया से हजारों मील दूर बैठा एक शख्स इन हालात से दुखी था। वह रोजाना मांडया में किसानों की आत्महत्या की खबरें सुनता और मन मसोस कर रह जाता। कैलिफोर्निया में आईटी प्रोफेशनल मधुचंद्रन चिक्कादैवेया मांडया में ही जन्मे थे। उनका संबंध भी किसान परिवार से है, उनका बचपन 300 एकड़ में फैली बेंगलुरु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के प्रांगण में बीता था, उनके पिता यहां वाइस चांसलर थे।

वर्ष 2014 में उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागप्ात्र दे दिया और मांडया लौट आए। मधु कहते हैं- मेरा एक ही मकसद था, मांडया के किसानों को बचाना, उनकी मदद करना। उनके मुताबिक देश के हालात ऐसे हैं कि किसान अपनी खेती को छोड़कर छोटे-मोटे काम-धंधों के लिए शहर की तरफ दौड़ रहे हैं, ऐसा इसलिए है क्योंकि खेती अब फायदे की चीज नहीं रही।

मधु कहते हैं, जब मैं मांडया आया तो मैंने पाया कि यहां किसान आर्गेनिक तरीके से खेती कर रहे हैं, लेकिन समस्या यह थी कि यहां कोई बेहतर मार्केट नहीं थी और न ही किसानों को गाइड करने वाला। तब हमने पहला काम यही किया- मंडया आर्गेनिक फार्मर्स को-ऑपरेटिव सोसायटी स्थापित की।

मधु ने अपने दोस्तों, पूर्व सहयोगियों के साथ मिलकर करीब 1 करोड़ रुपये जुटा कर इस सोसायटी का गठन किया, उन्हें सरकार से मंजूरी लेने और आर्गेनिक मांडया नाम से एक ब्रांड शॉप खोलने में 8 महीने का समय लगा। इस ब्रांड के जरिये किसान अपने आर्गेनिक फल-सब्िजयों को बेचते हैं। मधु के मुताबिक हमने बेंगलुरु-मैसूर हाईवे पर आर्गेनिक मांडया नाम से इस शॉप को स्थापित किया है। मेरा मकसद था कि एक किसान सीधे अपने ग्राहक से बात कर सके, उसकी जरूरत को समझ सके वहीं एक ग्राहक किसान की मेहनत को जान सके। हाईवे पर शॉप स्थापित करने का फायदा यह हुआ कि वहां से गुजरने वाले लोग उन आर्गेनिक फल-सब्जियों को खरीदने लगे। किसानों को वहां से कहीं और नहीं जाना पड़ा। इसकी कामयाबी के बाद एक आर्गेनिक रेस्टोरेंट खोल दिया गया।

क्या है फार्म शेअर (farm share)प्रोग्राम

मधु कहते हैं, लोग आर्गेनिक पदार्थों से जुड़ते हुए हिचकते हैं,हमारे लिए यह बेहद जरूरी था कि हम लोगों को बताएं कि आर्गेनिक खाद्य पदार्थों का सेवन ही क्यों जरूरी है। इसके लिए हमने लोगों को मांडया में बुलाकर उन्हें इस काम से जोड़ने की सोची। जिन लोगों की खेती में रुचि है या जो प्रकृति के साथ रहकर अपना समय बीताना चाहते हैं, उन्हें आमंत्रित किया गया। मधुचंद्रन का यह आइडिया काम कर गया है, चार महीनों के अंदर उनकी सोसायटी ने एक करोड़ रुपये का बिजनेस किया है, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है, वे अपने कर्ज चुका पा रहे हैं, उनकी जिंदगी में बदलाव आ गया है।

इसके लिए उन्होंने “फार्म शेअर” नाम का प्रोग्राम शुरू किआ जिसमे वह शहर में रहने वाले परिवारों को 35000 \ रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन मुहैया करवाते है।यहाँ पर लोग खुद के लिए और परिवार के लिए आधे से 2 एकड़ तक जमीन किराये पर लेते है  ।उनकी मदद के लिए एक गांव का एक किसान हर वक़्त उनके साथ रहता है और खेतीबाड़ी में शहरी परिवार की मदद करता है ।

तीन महीने बाद परिवार की मर्जी हो तो वो उत्पाद बाजार में बेच सकता है और अगर चाहे तो अपने लिए भी रख सकता है । इस प्रोग्राम की खासियत यह है यहाँ पर लोग ख़ुशी -ख़ुशी काम करते है जिस के लिए खेत एक मौजमस्ती और पिकनिक मानाने की जगह बन गया है ।

मधुचंद्रन का यह आइडिया काम कर गया है, चार महीनों के अंदर उनकी सोसायटी ने एक करोड़ रुपये का बिजनेस किया है, किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर गई है, वे अपने कर्ज चुका पा रहे हैं, उनकी जिंदगी में बदलाव आ गया है।

ये किसान यू-ट्यूब से नई-नई ट्रिक ले करता है खेती, फिर ऐसे बेचता है फसल

कहा जाता है आज के दौर में इंटरनेट युवाओं को गलत कामों में फंसा रहा है, लेकिन दूसरी ओर एक किसान ऐसा भी है, जो इंटरनेट का सही मायनों में इस्तेमाल कर रहा है। फतेहाबाद के जिले के गांव चूहड़पुर के रहने वाले युवा किसान हरविन्द्र सिंह लाली ने सोशल मीडिया में व्हाट्सऐप्प, फेसबुक, ट्विटर व यू-टयूब से जुड़कर हर्बल खेती को आधुनिक तकनीक से जोड़ दिया और आज उसके दिखाए रास्ते पर गांव के अन्य किसान भी चल रहे हैं। यू-ट्यूब से लेता है नई-नई ट्रिक, एफबी और व्हाट्सऐप्प पर बेचता है फसल

किसान हरविन्द्र सिंह का कहना है कि ऐसी खेती की प्रेरणा उन्हें अपने चाचा से मिली। हर्बल खेती में काफी अनुभव हासिल किया। यू-टयूब के माध्यम से खेती की आधुनिक मशीनों व तकनीक का ज्ञान प्राप्त किया।हरविंद्र कीटनाशक का प्रयोग नहीं करता, क्योंकि उसका मानना है कि हर्बल खेती में कीट प्रवेश नहीं करते।

हरविन्द्र ने बताया कि, उसे फेसबुक पर खरीददार हर्बल खेती को उपज को मुंह मांगी कीमत देने को तैयार है। जहां अन्य किसान पराली जलाने पर जोर दे रहे हैं वहीं किसान हरविन्द्र ने पिछले लगभग 15 साल से अपने खेतों में पराली नहीं जलाई।पराली न जलाने से खेती की उर्वरक क्षमता में जबरदस्त इजाफा हुआ है। जब तक दूसरे किसान गेहूं बोने की तैयारी कर रहे होते हैं, तब तक उसके खेत में गेहूं अंकुरित हो जाता है।

लोगों की सेहत से खिलवाड़ नहीं है पसंद

हरविंद्र का कहना है कि इस खेती में लागत कम लगती है बस उत्पादन दूसरे से कम होता है, पर उसका वाजिब दाम मिलने से हरविन्द्र सिंह को इसका कोई मलाल नहीं है, उसका मानना है कि अपने मुनाफे के लिए दूसरे की सेहत से खिलवाड़ बिल्कुल भी सही नहीं है।

गौरतलब है कि, इस आधुनिक व पुरातन खेती के समावेश के सफल प्रयोग पर हरविन्द्र को सम्मानित करने के लिए न तो कभी कोई मंत्री आया न ही कोई अधिकारी और उसे इस बात का मलाल भी नहीं है। फिलहाल वो मित्रों की प्रंशसा से खुश रहता है।

यह एक पावर टिलर करता है खेती के 10 तरह के काम

पावर टिलर खेतीबारी की एक ऐसी मशीन है, जिस का इस्तेमाल खेत की जुताई से ले कर फसल की कटाई तक किया जाता है। इस के इस्तेमाल से खेतीबारी के अनेक काम आसानी से किए जा सकते हैं।

तकनीक

इस मशीन से खरपतवार का निबटान, सिंचाई, फसल की कटाई, मड़ाई और ढुलाई का काम भी लिया जाता है। इस के अलावा इस मशीन का बोआई और उस के बाद के कामों में भी खासा इस्तेमाल होता है।

इस तरह के कामों के लिए पहले कई मजदूर खेत में लगाने पड़ते थे, लेकिन पावर टिलर के प्रयोग से कम लागत और कम समय में सभी काम आसानी से खत्म हो जाते हैं।

खासतौर से पहाड़ी इलाकों में खेती के काम के लिए यह मशीन काफी कारगर है।आज अनेक कंपनियां पावर टिलर बना रही?हैं। उन्हीं में से एक वीएसटी शक्ति 130 डि पावर टिलर के बारे में जानकारी दी जा रही है :

वीएसटी शक्ति 130 डि – पावर टिलर

यह वीएसटी शक्ति द्वारा बनाया गया पावर टिलर है। इस से खेतों, बागानों व लाइनों में होने वाली फसलों की गुड़ाई आदि की जाती?है। यह पहाड़ी इलाकों में खेतों की जुताई करने वाला खास यंत्र है।

खासीयत : यह काफी हलका और चेन रहित होता है। यह चलने में बेहद आसान है।इसका आकार 2720 ​​x 865 x 1210 मिमी होता है और वजन (इंजन और ट्रांसमिशन रोटरी के साथ) 405 किलोग्राम होता है। इसका 4 स्ट्रोक सिंगल सिलेंडर इंजन 13HP की पावर पैदा करता है।इसमें आगे के लिए 6 गेअर और रिवर्स के लिए 2 गेअर होते है ।

इस मॉडल की कीमत 165000 के करीब है इसके बाकि मॉडल की कीमत मॉडल के हिसाब से कम जा ज्यादा हो सकती है ।

इस से आप क्या-क्या मशीने चला सकते है वो निचे देखें

आज किसान पावर टिलर के साथ अन्य यंत्रों को जोड़ कर खेती के कई काम आसानी से कर रहे?हैं। यह एक ऐसी खास मशीन है, जिस से अन्य यंत्रों को जोड़ कर खेती के तमाम काम लिए जा सकते हैं।

1.पानी का पंप

Water Pump

 

2.थ्रेशर

अक्षीय फ्लो थ्रेशर

3.रीपर

काटनेवाला

4.बैल प्रकार इंटर कल्टीवेटर

Bullock Type Inter Cultivator

4.बीज ड्रिल

ये सभी मशीने इस टिलर के साथ जुड़ सकती है किसान अपनी जरूरत के हिसाब से इन में से कोई भी मशीन खरीद सकता है लेकिन हर मशीन की अलग किमत होती है

अधिक जानकारी के लिए Toll Free फोन नंबर : 18004190136 और मोबाइल नंबरों 080 – 28510805 / 06/ 07 व 080 – 67141111 पर बात कर सकते हैं।

यह पावर टिलर कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

अब इंटरनेट पर 5 मिंट में निकालें किसी भी खेत का खाता नकल(जमाबंदी)

दोस्तों किसान का हर काम अपने खेत से जुडा हुआ रहता है। इसलिए उसे अपने खेत की पूरी जानकारी होना जरुरी होता है। आज की पोस्ट में में आपको आपके खेत की जानकारी घर बेठे अपने खेतों की जानकारी सिर्फ 5 मिंट में हांसिल कर सकते है ताकि आपको खेत की खसरा नकल नक्शा और किस बेंक का ऋण है।

इस के बारे में जानकारी मील सके।इसके लिए आपके फ़ोन जा कंप्यूटर पर इंटरनेट की सुविधा होना जरूरी है आज हम मध्यप्रदेश और राजस्थान के किसान के लिए जानकारी लायें है।बाकि राज्य के लिए इस से अगली पोस्ट में जानकारी देंगे

मध्य प्रदेश के किसान ऐसे देखें अपनी जमीन की जानकारी

सबसे पहले आप m.p. govt की website http://landrecords.mp.gov.in/ पर जाये जेसे ही आप इस साइड पर जायेगे आपको मध्यप्रदेश शासन की भूअभिलेख एवं बंदोबस्त के होम पेज दिखेगा।

उसमे साइड के बीचो बिच मध्यप्रदेश का नक्शा दिखेगा जिसमे अलग अलग कलर में mp के सभी जिले दिखेगे अब आप आपका जिला चुने उस जिले पर cilik करे जेसे ही आप अपने जिले पर ok करेगे

आपके सामने उस जिले की जितनी भी तहसील हे वो आपके सामने आ जाएगी उसमे से आप आपकी जो भी तहसील हो उसे सलेक्ट करे।

उसके बाद में आपके सामने हल्का आ जायेगा यानी आप अपने गाव को चुनिये।गाव चुनने के बाद आपके सामने विकल्प ई आयेगे के आप किस तरह देखना चाहेगे

  • खसरा नाम के अनुसार
  • खसरा नंबर के अनुसार
  • खसरा खाते के समस्त
  • किश्त बंदी खेतानी
  • एरया सम्बधित रिपोर्ट
  • भूमि का प्रकार
  • शासकीय नंबर की सुची
  • भूमी का ब्यौरा
  • फसल का ब्यौरा

आप इनमे से जो विकल्प ठीक लगे चुने यदी आपका गाव छोटा है। तो आप खसरा नाम के अनुसार भी आसनी से देख सकते है। फिर आप उसको सलेक्ट करोगे तो आपके सामने फिर सभी खातेदारों की लिस्ट आ जाएगी आप अपना नाम सलेक्ट करे और ओके करे उसके बाद आपके सामने दस्तावेज की जानकारी दिखने लगेगी ।

मध्य प्रदेश राज्य में खेत जमीन की ऑनलाइन नक़ल निकालने के लिए यहाँ क्लिक करे।

और ज्यादा जानकारी के लिए निचे दी हुई वीडियो देखें

राजस्थान के किसान ऐसे देखें अपनी जमीन की जानकारी

राजस्थान में रहने वाले किसान भाई अपनी ज़मींन की जानकरी ऑनलाइन देखेने के लिए ऊपर दी गयी प्रोसिसर को अपनाये वो अपनी जमींन की नकल निकलने के लिए निचे दी गयी लिंक को खोले फिर अपने जिले का चुनाव करे फिर जिले में लगने वाली तहसील को ओके करे बाद में अपने गाव को सलेक्ट करे फिर खसरा अनुसार या अपने नाम के 3 अक्षर हिंदी में टाइप कर के नक़ल को आसानी से ले सकते है।

राजस्थान राज्य में खेत जमीन की ऑनलाइन नक़ल निकालने के लिए यहाँ क्लिक करे।

और ज्यादा जानकारी के लिए निचे दी हुई वीडियो देखें

 

40 हज़ार रुपये /किल्लो वाली केसर ने किसान को कर दिया मालोमाल

27 साल के संदेश पाटिल ने केवल ठंडे मौसम में फलने-फूलने वाली केसर की फसल को महाराष्ट्र के जलगांव जैसे गर्म इलाके में उगाकर लोगों को हैरत में डाल दिया है। उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई छोड़कर जिद के बलबूते अपने खेतों में केसर की खेती करने की ठानी और अब वे हर महीने लाखों का मुनाफा भी कमा रहे हैं। इसके लिए उन्होंने लोकल और ट्रेडिशनल फसल के पैटर्न में बदलाव किए।

इंटरनेट से ली खेती की जानकारी

  • जलगांव जिले के मोरगांव खुर्द में रहने वाले 27 साल के संदेश पाटिल ने मेडिकल ब्रांच के बीएएमएस में एडमिशन लिया था, लेकिन इसमें उनका मन नहीं लगा।
  • उनके इलाके में केला और कपास जैसी लोकल और पारंपरिक फसलों से किसान कुछ खास मुनाफा नहीं कमा पाते थे।
  • इस बात ने संदेश को फसलों में एक्सपेरिमेंट करने के चैलेजिंग काम को करने इंस्पायर किया।
  • इसके बाद उन्होंने सोइल फर्टिलिटी की स्टडी की। उन्होंने मिट्टी की उर्वरक शक्ति (फर्टिलिटी पावर) को बढ़ाकर खेती करने के तरीके में एक्सपेरिमेंट करने की सोची।
  • इसके लिए उन्होंने राजस्थान में की जा रही केसर की खेती की जानकारी इंटरनेट से ली।

 

पिता और चाचा ही थे उनके खिलाफ

  • सारी जानकारी जुटाकर संदेश ने इस बारे में अपनी फैमिली में बात की। शुरुआत में उनके परिवार में उनके पिता और चाचा ही उनके खिलाफ थे।
  • लेकिन संदेश अपने फैसले पर कायम रहे। आखिरकार उनकी जिद और लगन को देखते हुए घरवालों ने उनकी बात मान ली।
  • इसके बाद उन्होंने राजस्थान के पाली शहर से 40 रुपए के हिसाब से 9.20 लाख रुपए के 3 हजार पौधे खरीदे आैर इन पौधों को उन्होंने अपनी आधा एकड़ जमीन में रोपा।
  • संदेश ने अमेरिका के कुछ खास इलाकों और इंडिया के कश्मीर घाटी में की जाने वाली केसर की खेती को जलगांव जैसे इलाकों में करने का कारनामा कर दिखाया है।

दूसरे किसान भी ले रहे दिलचस्पी

  • संदेश पाटिल ने अपने खेतों में जैविक खाद का इस्तेमाल किया। मई 2016 में संदेश ने 15.5 किलो केसर का प्रोडक्शन किया।
  • इस फसल के उन्हें 40 हजार रुपए किलो के हिसाब से कीमत मिली। इस तरह टोटल 6.20 लाख रुपए की पैदावार हुई।
  • पौधों, बुआई, जुताई और खाद पर कुल 1.60 लाख की लागत को घटाकर उन्होंने साढ़े पांच महीने में 5.40 लाख रुपए का नेट प्रॉफिट कमाया।
  • मुश्किल हालात में भी संदेश ने इस नमुमकिन लगने वाले काम को अंजाम दिया।
  • जिले के केन्हाला, रावेर, निभोंरा, अमलनेर, अंतुर्की, एमपी के पलासुर गांवों के 10 किसानों ने संदेश पाटिल के काम से मोटीवेट होकर केसर की खेती करने का फैसला किया है।

News Source- Dainik Bhasker News

पांचवी पास महिला आज करती हैं 56 हजार लीटर दूध का कारोबार

हमारे आस-पास कई ऐसे लोग हैं, जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि कामयाबी के लिए बड़ी डिग्रियों की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है, तो सिर्फ लगन और सच्ची मेहनत की। आज हम आपको एक ऐसी महिला की कहानी बताने जा रहे हैं, जो गाँव में रहने के बाद भी बाकी महिलाओं के लिए मिसाल बन चुकी हैं। लखनऊ की बिटाना देवी ने सीमित संसाधन में अपनी कामयाबी की जो कहानी लिखी है वह सच में बेहद प्रेरणादायक है।

बिटाना की शादी सिर्फ 15 साल की उम्र में ही हो गयी थी, शिक्षा के नाम पर उनके पास सिर्फ पिता का आर्शीवाद था। शादी में पिता से भेंट स्वरुप मिले एक गाय और एक भैंस ही उनकी कमाई का एकमात्र जरिया था। अपनी गायों और बछड़ों को बच्चों जैसा प्यार देकर बिटाना आज एक सफल डेयरी फर्म की संचालिका हैं।

गांव में रहने वाली औरतों को लोग अक्सर असहाय समझते हैं। परन्तु पांचवी पास बिटाना देवी ने इस मिथ को गलत ठहरा दिया। उन्होंने महिला सशक्तिकरण की एक नई परिभाषा गढ़ते हुए दूसरी ग्रामीण महिलाओं को भी नई राह दिखाई है। निगोहां के मीरकनगर गांव से ताल्लुकात रखने वाली बिटाना ने अपने पिता के भेंट स्वरुप दिए गाय और भैंस का दूध बेचना प्रारंभ किया।

गाय और भैंस का दूध बेंचकर उसने एक गाय खरीद ली। सीमित संसाधनों के बीच दूध बेचकर अर्जित कमाई से वो निरंतर दुधारू मवेशियों की संख्या बढ़ाती चलीं गईं। साल 1996 में उन्होंने दुग्ध उत्पादन का व्यवसाय शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने इस कारोबार में एक वर्चस्व स्थापित किया और 2005 से लगातार 10 बार सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन के लिए गोकुल पुरूस्कार भी जीत रहीं।

अपने घर का खर्च भी वो अपने कमाए हुए पैसे से ही चलाती है। इन्हें देखकर और भी महिलाएं प्रेरित हुई और दुग्ध उत्पादन का व्यवसाय शुरू किया। इस समय बिटाना के पास 40 दुधारू पशु हैं। बिटाना रोज सुबह 5 बजे उठकर जानवरों को चारा पानी देती है, उनका दूध निकालती हैं और डेरी तक दूध पहुँचाने का काम भी वह स्वयं करती हैं।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इन्होंने साल 2014-2015 में कुल 56,567 लीटर दूध का उत्पादन किया। धीरे-धीरे बिटाना ने इसे व्यापार बना लिया, लगभग 155 लीटर दूध रोजाना पराग डेयरी को सप्लाई करती हैं। वर्तमान में उनके फार्म से रोजाना 188 लीटर दूध का उत्पादन होता है। उनके प्रयासों को देखते उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें गोकुल पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। बिटाना बताती हैं कि औपचारिक रूप से उन्होंने साल 1985 से इस काम की शुरूआत की थी।

दरअसल आज लाखों का कारोबार करने वाली बिटाना को शुरुआती समय में आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था लेकिन उन्होंने कठिन मेहनत के दम पर परिस्थितियों को बदल कर रख दिया और एक सफल उद्यमी के रूप में हमारे सामने खड़ी हैं।

News Source- hindi.kenfolios.com

किसान के बेटे ने बाइक के इंजन से बनाई फ्लाइंग मशीन

यदि हौंसला हो तो सपनों की उड़ान भरने के लिए पंख अपने आप लग जाते हैं. फिर उसके सामने बड़ी से बड़ी बाधा बहुत छोटी नजर आती हैं. ऐसा ही उदाहरण पेश किया है हिसार जिले के आदमपुर हल्के के गांव ढाणी मोहब्बतपुर निवासी बीटेक के छात्र कुलदीप टाक ने.

23 वर्षीय कुलदीप ने देसी जुगाड़ से उडऩे वाली अनोखी फ्लाइंग मशीन तैयार की है. ये मशीन 1 लीटर पेट्रोल में करीब 12 मिनट तक आसमान में उड़ती है. इसे पैराग्लाइडिंग फ्लाइंग मशीन या मिनी हैलीकॉप्टर का नाम दिया गया है.

कुलदीप ने 3 साल की कड़ी मेहनत के बाद पैराग्लाइडिंग फ्लाइंग मशीन को आसमान में उड़ाने में सफलता पाई है. मशीन दिखने में भले ही साधारण लगती हो, लेकिन ये उड़ान गजब की भरती है. ढाणी मोहब्बतपुर निवासी कुलदीप के पिता प्रहलाद सिंह टाक गांव में खेतीबाड़ी करते हैं. चंडीगढ़ से बीटेक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अब कुलदीप इसी प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहा है. फ्लाइंग मशीन को बनाने में गांव आर्यनगर निवासी सतीश कुमार का भी योगदान रहा.

टंकी फुल हो तो 1 घंटे की उड़ान

कुलदीप ने बताया कि मशीन को तैयार करने में करीब ढाई लाख रुपये का खर्च आया है. इस फ्लाइंग मशीन से किसी को खतरा नहीं है. मशीन में बाइक का 200CC इंजन लगाया गया है. इसके अलावा लकड़ी का पंखा लगा हैं, साथ ही साथ छोटे टायर लगाए हैं.

इसके ऊपर पैराग्लाइडर लगाया गया है जो उड़ान भरने और सेफ्टी के साथ लैंडिंग करवाने में सहायक है.फिलहाल इस मशीन में केवल 1 ही व्यक्ति बैठ सकता है, लेकिन कुलदीप ने दावा किया है कि कुछ ही माह में ये मशीन 2 लोगों को लेकर उड़ेगी, जिसमें सबसे पहले वो अपने पिता को बैठाएगा.

2 हजार फीट तक भरी उड़ान

यह मशीन 10 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरने में सक्षम है. गांव चौधरीवाली से आसपास के गांवों में कुलदीप ने अब तक करीब 2 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरी है. ये मशीन पेट्रोल से उड़ती है जिसमें 5-6 लीटर का टैंक है. पूरी फ्लाइंग मशीन में स्थानीय स्तर के सामान का प्रयोग किया गया है. यानी कुल मिलाकर इस मशीन की टंकी फुल होने के बाद आप 1 घंटे तक आसमान में उड़ सकते हैं.

पितो बोले, रातभर लगा रहता था बेटा

कुलदीप ने बताया कि उसके इस सपने को साकार करने में उसके परिवार का सबसे बड़ा योगदान है. उसके पिता प्रहलाद सिंह टाक और सहयोगी सतीश आर्यनगर ने भी उसकी मेहनत को हौसला दिया. पिता प्रहलाद सिंह खेत में रहते हैं. कुलदीप के पिता प्रहलाद सिंह टाक ने बताया कि उसका बेटा देर रात इस मशीन को बनाता रहता था.

उसके मना करने के बावजूद कुलदीप मशीन को पूरा करने में लगा रहा. करीब 6 माह पहले गोवा में पायलट की 3 माह ट्रेनिंग की थी. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद भी कुलदीप का फ्लाइंग मशीन बनाने का जुनून कम नहीं हुआ. वहीं कुलदीप के सहयोगी सतीश आर्यनगर ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास था कि कुलदीप उन्हें हवा में जरूर सैर कराएगा.कुलदीप की मां कमला ने बताया कि बेटे को हवा में उड़ता देखकर बहुत खुशी हो रही है बेटे ने बड़े साल मेहनत की आखिर अब जा कर इसका फायदा मिला है.

पहले भी बनाया था एयरक्राफ्ट जो हो गया था क्षतिग्रस्त

सहयोगी सतीश ने बताया हालांकि इससे पहले भी उसने एक एयरक्राफ्ट तैयार किया था, लेकिन वो ट्रायल के दौरान पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया. इसके बावजूद भी उसने हिम्मत नहीं हारी. फिर से पैराग्लाडिंग फ्लाइंग मशीन बनाने का निर्णय लिया और आज वो इसमें कामयाब हो ही गया.