इजरायल की तकनीक से खेती करेंगे यूपी के किसान

प्रदेश में उम्दा किस्म की फल और सब्जियां उगाने के लिए दो सेंटर ऑफ एक्सिलेंस इसी साल जुलाई से शुरू हो जाएंगे। इजरायल के तकनीकी सहयोग से फलों का सेंटर बस्ती में और सब्जियों का कन्नौज में शुरू होने जा रहा है। यहां किसानों को उन्नत किस्म की पौध तैयार करके दी जाएंगी। साथ ही किसानों को सब्जियों और फलों के रख-रखाव की सलाह और प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

भारत में फलों और सब्जियों का उत्पादन तो खूब होता है,लेकिन क्वॉलिटी को लेकर किसान ज्यादा जागरूक नहीं हैं। वे खुद बीज बोते हैं, पौध बनाते हैं। पौध कितनी दूरी पर लगाई जाए, कौन से कीटनाशक डाले जाएं और कैसे तोड़ाई की जाए, इस बारे में भी सभी किसानों को पर्याप्त जानकारी नहीं होती।

विशेषज्ञों का मानना है कि बीज से पौध बनाने के स्तर पर ही इतनी चूक हो जाती है कि अच्छी क्वॉलिटी के पौधे ही तैयार नहीं हो पाते। इन बातों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने इजरायल सरकार के सहयोग से देशभर में फल और सब्जियों के सेंटर ऑफ एक्सिलेंस बनाने का प्रॉजेक्ट शुरू किया था। इसमें यूपी को दो सेंटर ऑफ एक्सिलेंस मिले।

केंद्र और प्रदेश सरकार दे रही आर्थिक सहयोग

उद्यान विभाग के निदेशक आरपी सिंह बताते हैं कि यूपी में दो सेंटर ऑफ एक्सिलेंस बनकर तैयार हो चुके हैं। बस्ती में फलों का सेंटर करीब 7.4 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा है। कन्नौज में सब्जियों का सेंटर 7.6 करोड़ की लागत से तैयार हुआ है।

ये दोनों इस साल जुलाई से शुरू हो जाएंगे। इजरायल की तकनीक आधारित खेती का लाभ लेने के लिए यह योजना शुरू की गई है। इनमें केंद्र और राज्य सरकारें आर्थिक मदद कर रही हैं।

किसान बीज लाएंगे, सेंटर पौध तैयार करके देगा

आरपी सिंह ने बताया कि यहां पर किसानों को सर्विस और प्रशिक्षण दोनों मिलेगा। किसान अपना बीज लेकर यहां संपर्क करेंगे। उससे सेंटर पर पौध तैयार कर किसानों को दी जाएंगी। यह सुविधा नि:शुल्क होगी। इसके अलावा फल और सब्जियों को रोग से बचाव, कीटनाशकों के छिड़काव और अन्य जरूरी सलाह भी किसानों को यहां मिलेगी।

राजस्थान में इस खेती से किसानों को हो रहा लाखों का मुनाफा

अनार में जो गुण है वो किसी और फल में नहीं है इसलिए कहावत भी है एक अनार सौ बीमार । अनार के इन्हीं गुणों का महत्व समझते हुए अब अलवर के किसान फसलों के बजाय अनार की खेती में रूचि लेने लगे हैं।

कम लागत मेें लगने वाले अनार से प्रतिवर्ष लाखों रुपए की कमाई हो रही है। पिछले तीन सालों में उद्यान विभाग करीब 60 हजार पौधे वितरित कर चुका है। यदि यही स्थिति रही तो वो दिन दूर नहीं जब अलवर का नाम अनार के खेती के लिए पहचाना जाएगा।

घरेलू खेती से कम हो गए अनार के दाम

आज से तीन साल पहले बाजार में अनार की कीमत 140 – 150 रुपए थी। महंगा होने के कारण आम आदमी को अनार नसीब नहीं हो पाता था। लेकिन जब अलवर जिले में अनार की खेती बढऩे के कारण अब घरेलू अनार बाजार में आया तो दाम भी 70 – 80 रुपए तक आ गए हैं।

तीन साल पहले तक मात्र 10 प्रतिशत ही किसान अनार की खेती करते थे, लेकिन अब करीब 50 प्रतिशत किसानों ने अनार के बाग लगा लिए हैं। एक बार पौधा लगने के बाद दूसरे साल ही फल दे देता है। एक पौधा करीब 25 साल तक फल देता है।प्रतिदिन अनार का जूस पीने से खून तो बढ़ता ही है। इसे प्रतिदिन खाने से शारीरिक सौंदर्य भी बढ़ता है।

सरकार देती है सब्सिडी

अनार का बाग लगाने के लिए उद्यान विभाग शर्तो के अनुसार सब्सिडी देता है। एक किसान को 24 हजार रुपए की सब्सिडी दी जाती है। जो कि तीन किश्तों में दी जाती है। पहली किश्त में 60 प्रतिशत, द्वितीय में 20 प्रतिशत व तृतीय में भी 20 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है।

राजस्थान में अभी तक जयपुर, सीकर, पाली, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, झालावाड, जालोर आदि जगहों के नाम ही अनार की खेती के लिए जाने जाते थे। अब इसमें अलवर का नाम भी शामिल हो गया है। अलवर में टिश्यू कल्चर वाले अनार के पौधे लगाए जा रहे हैं। वर्तमान में अलवर जिले में किशनगढ़बास, राजगढ़, मुंडावर, बहरोड, तिजारा व उमरैण में अनार की खेती बहुतायत में हो रही है।

मांग बढऩे से बढ़ा रूझान

घरेलू व विदेशी बाजार में अनार की मांग बढऩे के कारण किसानों का रूझान अनार की खेती की तरफ बढ़ा है। किसानों को सरकार सब्सिडी भी दे रही है। उत्पादकता बढ़ाने के लिए समय समय पर प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। तीन सालों में 60 हजार अनार के पौधे वितरित किए जा चुके हैं।

15 हजार लगाकर किसान ने कमाए 3 लाख रु., आप भी कर सकते हैं तुलसी की खेती

औषधीय गुणों से भरपूर तुलसी का पौधा अधिकांश घरों में होता है। इसकी पूजा भी की जाती है। आप चाहें तो तुलसी की खेती कर मोटी कमाई भी कर सकते हैं। कॉस्मेटिक्स प्रोडक्ट्स के साथ ही दवाई बनाने वाली कंपनियों को इसकी जरूरत होती है।

उज्जैन के एक किसान ने 10 बीघा जमीन में 10 किलो बीज की बुवाई की थी। लागत का खर्चा 15 हजार रुपए आया और मुनाफा ढाई लाख रुपए से ज्यादा का रहा। आप भी चाहें तो तुलसी की खेती कर अच्छी कमाई कर सकते हैं।

3 माह में फसल हो जाती है तैयार

  • किसान अनोखीलाल पाटीदार ने 10 बीघा खेत में तुलसी की खेती की। 10 बीघा जमीन में फसल 3 माह में तैयार हो गई।
  • 1 बीघा पर खर्चा 1500 रुपए आया। इस तरह से 10 बीघा जमीन पर फसल लगाने पर कुल लागत 15 हजार रुपए आई।
  • किसान ने फसल को 3 लाख रुपए में बेचा। इस तरह 2 लाख 85 हजार रुपए की कमाई हुई।

कब करें खेती?

  • जुलाई तुलसी के पौधे को खेत में लगाने का सबसे सही समय होता है।
  • पौधे 45 गुणा 45 सेंटीमीटर के डिस्टेंस पर लगाए जाना चाहिए।
  • वहीं RRLOC 12 और RRLOC 14 किस्म के पौधे 50 गुणा 50 सेंटीमीटर के डिस्टेंस पर लगने चाहिए।
  • पौधों को लगाने के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करना जरूरी है।
  • हफ्ते में कम से कम एक बार या जरूरत के अनुसार पानी देना होता है।
  • एक्सपर्ट्स के अनुसार, कटाई से 10 दिन पहले सिंचाई देना बंद कर देना चाहिए।

गोबर खाद डालना फायदेमंद

  • 200 से 250 क्विंटल गोबर की खाद या कम्पोस्ट को जुताई के समय खेत में बराबर मात्रा में डालना चाहिए।
  • इसके बाद ही जुताई करना चाहिए। इससे खाद अच्छी तरह से मिट्टी में मिल जाती है।
  • खेत में आखिरी जुताई करते समय 100 किलोग्राम यूरिया, 500 किलोग्राम सुपर फास्फेट और 125 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश को एक हेक्टेयर के हिसाब से भूमि में मिला दें।
  • यूरिया की खाद को ऐसे डालना चाहिए जिससे यह पौधे की पत्तियों पर न जाए।

कब होती है कटाई

  • जब पौधों की पत्तियां हरे रंग की होने लगती हैं, तभी इनकी कटाई शुरू की जाती है। सही समय पर कटाई करना जरूरी है। ऐसा न करने पर तेल की मात्रा पर इसका असर होता है।
  • पौधे पर फूल आने के कारण भी तेल मात्रा कम हो जाती है, इसलिए जब पौधे पर फूल आना शुरू हो जाएं, तब इनकी कटाई शुरू कर देना चाहिए।
  • जल्दी नई शाखाएं आ जाएं, इसलिए कटाई 15 से 20 मीटर ऊंचाई से करनी चाहिए।

कितना आता है खर्चा

  • 1 बीघा जमीन पर खेती करते हैं तो 1 किलो बीज की जरूरत होगी। 10 बीघा जमीन पर 10 किलो बीज लगेंगे। इसकी कीमत 3 हजार रुपए के करीब होगी।
  • 10 से 15 हजार रुपए की खाद लगेगी।
  • सिंचाई का इंतजाम करना होगा।
  • एक सीजन में 8 क्विंटल तक पैदावार होती है। मार्केट में इसका प्राइस ढाई से 3 लाख रुपए तक है।
  • मंडी में 30 से 40 हजार रुपए प्रति क्विंटल के भाव तक तुलसी के बीज बिक जाते हैं।

कैसे बेचें माल

  • आप मंडी एजेंट्स के जरिए अपना माल बेच सकते हैं।
  • सीधे मंडी में जाकर भी खरीददारों से संपर्क कर सकते हैं।
  • कॉन्ट्रेक्ट फॉर्मिंग करवाने वाली दवा कंपनियों या एजेंसियों के जरिए खेती करें और इन्हें ही माल बेचें।

9 तरह के एग्री बि‍जनेस से पैसा कमाना सि‍खा रही है सरकार, 7000 रुपए में ट्रेनिंग

एग्री प्रोडक्‍ट्स का बिजनेस करना फायदे का सौदा साबित हो सकता है। हालांकि‍ इसमें सफल वही होता है, जि‍से इसकी जानकारी हो। अगर आपको खेतीबाड़ी की बेसिक जानकारी है और गांव में कुछ कनेक्‍शंस हैं तो आप और अच्‍छे ढंग से इस तरह का बि‍जनेस कर सकते हैं। आपके पास अच्‍छा मौका है कि आप एग्री बिजनेस पर हो रहे एंटरप्रेन्‍योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम में हिस्‍सा ले सकें।

आप सरकार की मिनिस्‍ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट के अधीन नेशनल इंस्टिट्यूट फॉर एंटरप्रेन्‍योरशिप एंड स्‍मॉल बिजनेस डेवलपमेंट (निसबड) द्वारा खेती से जुड़े अलग- अलग तरह के बिजनेस के बारे में ट्रेनिंग ले सकते हैं। आपको इस ट्रेनिंग प्रोग्राम के दौरान एग्री बिजनेस से जुड़ी छोटी से छोटी जानकारी दी जाएगी। आज हम अपको बताएंगे कि निसबड किस-किस तरह की ट्रेनिंग देगा और आप कैसे इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल हो सकते हैं।

कैसे करें ऑर्गेनिक फार्मिंग

निसबड द्वारा ऑर्गेनिक फार्मिंग के बारे में पूरी जानकारी दी जाएगी, जैसे कि क्‍या है ऑर्गेनिक फार्मिंग, इसके फायदे क्‍या हैं, ऑर्गेनिक फार्मिंग की मार्केट क्‍या है, किस तरह की टैक्‍नोलॉजी का इस्‍तेमाल होता है, न्‍यूट्रीशन मैनेजमेंट क्‍या है, आर्गेनिक फार्मिंग की मैथेडोलॉजी, क्‍वालिटी अश्‍योरेंस, नेशनल प्रोग्राम ऑन ऑर्गेनिक प्रोडक्‍शन, ऑनलाइन सेल्‍स मॉडल, इको टूरिज्‍म, सरकार की स्‍कीम और सपोर्ट सिस्‍टम, भारत सरकार के असिस्‍टेंस प्रोग्राम आदि की जानकारी दी जाएगी।

कैसे करें डेयरी बिजनेस

इसी दौरान आपको डेयरी बिजनेस के बारे में भी ट्रेनिंग दी जाएगी। इसमें डेयरी लगाने से लेकर चलाने तक की पूरी गाइडेंस दी जाएगी। साथ ही, आपको सरकार के सपोर्ट सिस्‍टम और स्‍कीम के साथ साथ लोन स्‍कीम की भी जानकारी दी जाएगी। डेयरी बिजनेस में सफल स्‍टार्ट-अप्‍स के बारे में भी केस स्‍टडी के बारे में निसबड द्वारा बताया जाएगा।

कैसे करें फूड प्रोसेसिंग बिजनेस

निसबड के इस एंटरप्रेन्‍योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम के दौरान आपको फूड प्रोसेसिंग बिजनेस के अलग-अलग मॉडल के बारे में भी बताया जाएगा। जैसे कि – फूड प्रोसेसिंग के एवेन्‍यू, छोटा फूड प्रोसेसिंग प्‍लांट कैसे लगाएं, फूड प्रोसेसिंग ब्रांड कैसे क्रिएट किया जाए, सरकार की सपोर्ट स्‍कीम, सक्‍सेसफुल स्‍टार्ट अप्‍स की केस स्‍टडी के बारे में जानकारी दी जाएगी।

इसके अलावा आपको कोल्‍ड स्‍टोरेज चेन खोलने के फायदे, तरीके और सरकारी स्‍कीम के बारे में भी ट्रेनिंग दी जाएगी। यहां यह उल्‍लेखनीय है कि देश में कोल्‍ड स्‍टोरेज चेन की सख्‍त जरूरत है और सरकार भी प्रमोट कर रही है। आप कोल्‍ड स्‍टोरेज चेन शुरू करने के बारे में सोच सकते हैं।

इन बिजनेस के भी लें सकेंगे ट्रेनिंग

  • ग्रीन हाउस
  • अरोमेटिक ऑयल
  • फ्लोरीकल्‍चर
  • फ्रूट कल्‍टीवेशन
  • पॉल्‍यूटरी एंड फिशरी

कैसे करें अप्‍लाई

यह दो दिन का ट्रेनिंग प्रोग्राम है। जो 16 व 17 जून को निसबड के नोएडा सेक्‍टर 62 स्थित सेंटर में होगा। इस प्रोग्राम की फीस 7000 रुपए है।

अगर आप हिस्‍सा लेना चाहते हैं तो इस लिंक पर क्लिक करके रजिस्‍ट्रेशन फॉर्म डाउनलोड कर सकते हैं।

http://niesbud.nic.in/docs/EDP-on-agri-business-16%20June-to-17-June-2018.pdf

पौधों के लिए बनाता है ‘टॉनिक’, कमाता है 50 हजार रुपए महीना

जिस तरह इंसान को नूट्रीएंट्स की जरूरत होती है, उसी तरह से पौधों को भी बढ़ने के लिए कुछ नूट्रीएंट्स की जरूरत होती है। इन नूट्रीएंट्स के न मिल पाने से पौधों का विकास रूक जाता है। यदि ये नूट्रीएंट्स एक निश्चित समय तक न मिलें तो पौधा सूख जाता है।

किसानों के साथ खुद इस परेशानी का सामना करने वाले हरिदास कुंभर ने पौधों के लिए एक खास ‘टॉनिक’ तैयार करने की सोची और फिर कई सालों के रिसर्च के बाद प्लांट ग्रोथ रेग्युलेटर्स (PGR) बनाने में सफलता हासिल की। टॉनिक बेचकर आज वो अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं।

कैसे मिला ‘टॉनिक’ बनाने का आइडिया

महाराष्ट्र के सांगली जिले के निवासी हरिदास कुंभर ने मनी भास्कर को बताया कि वो खुद अंगूर की खेती करते हैं। खेती के दौरान उन्होंने गौर किया कि जितनी मेहनत वो कर रहे हैं, उस हिसाब से उनको रिटर्न नहीं मिल रहा है।

समय पर खाद, पानी देने के बावजूद पौधे अच्छी तरह विकसित नहीं हो रहे हैं। साथ ही उनमें फल भी ज्यादा नहीं आ रहे हैं और उपज की क्वालिटी भी अच्छी नहीं है। इसलिए उनको उपज का वाजिब दाम नहीं मिल रहा था। इसके निदान के लिए उन्होंने कुछ रिसर्च किए और फिर पौधों के लिए टॉनिक बनाने का आइडिया मिला।

एग्री बिजनेस सेंटर से ली ट्रेनिंग

पौधों के लिए पीजीआर बनाने के वास्ते हरिदास ने सरकार द्वारा किसानों के लिए चलाए जा रहे प्रोग्राम एग्री क्लिनिक एंड एग्री बिजनेस सेंटर्स से ट्रेनिंग ली। वहां पर उन्होंने विभिन्न पौधों के ग्रोथ के लिए आवश्यक पोषक तत्वों के बारे में जाना।

उन्हें मालूम चला कि इंसान की तरह ही पौधों को भी बढ़ने, प्रजनन और अन्य कार्यों के लिए अतिरिक्त नूट्रीएंट्स की जरूरत होती है। इसके मिलने पर पौधों की ग्रोथ बेहतर होती है और फल भी ज्यादा मिलते हैं।

1 लाख रुपए से की शुरुआत

ट्रेनिंग लेने के बाद हरिदास ने प्लांट ग्रोथ रेग्युलेटर्स बनाने के प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। खुद की जमीन पर 1 लाख रुपए से मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाए। फिर मल्टीएक्सेल नाम से पीजीआर बनाने का काम शुरू किया।

उनका कहना है कि बाजार में उनके प्रोडक्ट को अच्छा रिस्पॉन्स मिला है। महाराष्ट्र के दो जिलों में 1500 से ज्यादा किसानों ने इस प्रोडक्ट का इस्तेमाल किया है और उनकी उपज 30 फीसदी बढ़ी है।

सालाना कमाते हैं 6 लाख रुपए

हरिदास प्लांट ग्रोथ रेग्युलेटर्स बनाकर सालाना 6 लाख रुपए की कमाई कर रहे हैं। उनकी कंपनी का सालाना टर्नओवर 20 लाख रुपए है। उनका कहना है कि सारे खर्च काटकर इस पर उनको 30 फीसदी तक प्रॉफिट मिल जाता है।

उनका यह प्रोडक्ट फिलहाल सांगली के आप-पास के जिलों में ही बिक्री के लिए उपलब्ध है। अपने बिजनेस को बढ़ाने की उनकी कोई प्लानिंग नहीं है। उनका कहना है कि वो छोटे स्तर पर यह प्रोडक्ट बना रहे हैं। वृहद स्तर पर प्रोडक्शन के लिए ज्यादा इन्वेस्टमेंट की जरूरत होगी। इसलिए अभी इस पर ध्यान नहीं है।

इस्तेमाल करने की क्या है विधि

पीजीआर का इस्तेमाल करने का सबसे आसान तरीका ड्रेंचिंग है। इस विधि से पीजीआर का इस्तेमाल करने पर पौधों का समुचित विकास होता है।

किसानों को मिलेंगे 27 लाख सोलर पंप, मिलेंगे ये फायदे

ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने कहा कि कुसुम योजना के तहत 27.50 लाख सोलर पंप किसानों को मुहैया कराए जाएंगे। आगामी जुलाई से कुसुम योजना की शुरुआत होगी। उन्होंने कहा कि किसानों को सस्ती बिजली की जरूरत है, डीजल से पंप चलाना किसानों के लिए तर्कसंगत नहीं है।

उन्होंने बताया कि सरकार एक अप्रैल 2019 से सातों दिन 24 घंटे बिजली आपूर्ति करने को लेकर प्रतिबद्ध है और उसके लिये रूपरेखा तैयार की जा चुकी है। इसके अलावा, सभी गांवों को बिजली सुविधा उपलब्ध कराने के बाद अब इस साल दिसंबर तक बिजली से वंचित सभी परिवारों को बिजली कनेक्शन उपलब्ध करा दिया जाएगा।

मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार अभी करीब 3.13 करोड़ परिवार बिजली से वंचित हैं। सिंह ने बताया कि बीते चार साल में कुल विद्युत उत्पादन क्षमता में रिकार्ड एक लाख मेगावाट से अधिक की वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों की 48 साल की तुलना में मौजूदा सरकार ने 48 महीने में जो उपलब्धियां हासिल की हैं, वह आंखें खोलने वाली है।

सिंह ने कहा कि पूर्व सरकारों में जहां क्षमता में सालाना औसतन 4,800 मेगावाट का इजाफा हुआ। वहीं हमने हर वर्ष 24,000 मेगावाट क्षमता जोड़े। पारेषण क्षमता में हमने हर साल 25,000 सर्किट किलोमीटर (सीकेएम) क्षमता सृजित की जबकि पिछली सरकारों में यह 3,400 सीकेएम थी।

2,630 से बढ़कर 22,000 मेगावाट हुआ सौर ऊर्जा उत्पादन

उन्होंने कहा कि पिछले चार साल में एक लाख मेगावाट बिजली क्षमता जोड़ी गयी और एक लाख सर्किट किलोमीटर अंतर-राज्यीय पारेषण क्षमता सृजित हुई। मार्च 2018 में कुल उत्पादन क्षमता 3,44,000 मेगावाट पहुंच गयी जो मार्च 2014 में 2,43,029 मेगावाट थी। पिछले साल सितंबर के अंतिम में सौभाग्य योजना शुरू किये जाने के बाद से अब तक लगभग 67.34 लाख घरों को बिजली पहुंचायी गयी है।

मंत्री ने बताया कि पिछले साल के मुकाबले कोयला आपूर्ति में 14 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे सिंह ने कहा कि अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भी हमारी क्षमता पिछले चार साल में दोगुनी होकर 70,000 मेगावाट पहुंच गयी है।

सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता 2013-14 के 2,630 मेगावाट से बढ़कर मार्च 2018 में 22,000 मेगावाट तथा पवन ऊर्जा इसी अवधि में 21,000 मेगावाट से बढ़कर 34,000 मेगावाट पहुंच गयी है। सरकार ने 2022 तक अक्षय ऊर्जा स्रोतों से 1,75,000 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा है।

इस शख्स ने अपनाई ऐसी तरकीब, एक ही पेड़ पर उगने लगे 51 तरह के आम

एक इंजीनियर कब क्या कर जाए कोई नहीं कह सकता। अब देखिए ना, 10 साल से जो शख्स ओमान में बतौर सिविल इंजीनियर काम कर रहा था, गांव में खेती की बदतर हालात को देखते हुए किसान बन गया। फिर ऐसी तरकीब अपनाई कि देखते ही देखते एक ही पेड़ पर 51 तरह के आम उगा डाले।

एक तरफ जहां खराब फसल की वजह से कर्ज चुकाने में नाकाम होने पर किसान आत्महत्या कर रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ महाराष्ट्र के विदर्भ से ताल्लुक रखने वाले रवि मारशेटवार की खेती ना सिर्फ फल-फूल रही है बल्कि देशभर में उनका नाम भी रौशन कर रही है। अब यह सब जानना चाहते हैं कि 50 साल पुराने पेड़ पर उन्होंने ऐसा क्या जादू कर दिया कि उस पर दर्जनों किस्म के आम फलने लगे?

दरअसल, रवि ने ग्राफ्टिंग की तकनीक से यह करिश्मा कर दिखाया है। उन्हें यह सफलता रातों-रात नहीं मिली है। 1350 बार रिसर्च के बाद रवि को यह मुकाम हासिल हुआ है। साल 2001 में गांव लौटने के बाद उन्होंने खेती की बारीकियां सीखने के लिए कुल 500 जगहों का दौरा किया। इसी दौरान उनकी मुलाकात एक खास शख्स से हुई।

एग्रो ट्रिप्स के दौरान रवि की मुलाकात महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के किसान देवरीकर से हुई। देवरीकर ने ग्राफ्टिंग तकनीक का इस्तेमाल कर एक ही पेड़ पर 15 अलग तरीके के आम उगाए थे। उनसे ही रवि ने यह तकनीक सीखी। ग्राफ्टिंग की तकनीक सीखने का बाद रवि ने आम की दुर्लभ और विलुप्तप्राय: होने वाली प्रजातियों को इकट्ठा किया और सालों की मेहनत के बाद एक ही पेड़ पर उन्हें उगाने में सफलता पाई।

रवि के चमत्कारी आम के पेड़ ने ना सिर्फ नाम और दाम दिलाया बल्कि उनकी एक और तमन्ना भी पूरी की। उन्होंने बताया,’इस तकनीक के जरिए मैं आमों की विलुप्त हो रही प्रजातियों को बचाना चाहता था।’ रवि जुलाई से लेकर सितंबर तक किसानों को ग्राफ्टिंग तकनीक की ट्रेनिंग देते हैं।

किसानों को डेढ़ गुना एमएसपी से खुश करने की तैयारी में सरकार, आज लग सकती है मुहर

दस दिनों की हड़ताल पर गए किसानों को खुश करने के लिए केंद्र सरकार बुधवार को डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का ऐलान कर सकती है। कैबिनेट बैठक में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों पर मुहर लग सकती है। सीएसीपी ने पिछले साल की तुलना में प्रति क्विंटल 80 से 400 रुपये तक एमएसपी बढ़ाने को कहा है।

कृषि मंत्रालय को भेजी गई सीएसीपी की सिफारिशों में दालों और अनाज की एमएसपी में 40 से 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की सिफारिश की गई है। सूत्र बताते हैं कि मंत्रालय ने सीएसीपी की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है, हालांकि उसमें मामूली बदलाव किए गए हैं।

इसमें ज्यादातर फसलों की एमएसपी को 50 प्रतिशत तक बढ़ाया गया है जबकि कुछेक में बढ़त का प्रतिशत कम है। इसकी वजह सीएसीपी द्वारा कुछेक अनाज के एमएसपी में बढ़ोतरी को पिछले साल की तुलना में 40 प्रतिशत से कम रखा जाना था। माना जा रहा है कि यह अनाज ज्वार, बाजरा, मक्का और रागी समेत अन्य हैं।

सूत्र बताते है कि मंत्रालय ने नीति आयोग के कृषि विशेषज्ञों से इस पर विचार-विमर्श कर राय भी ली है। इसके बाद ही मंत्रालय ने कैबिनेट नोट जारी किया है जिस पर बुधवार को विचार-विमर्श किया जाएगा। याद रहे कि आयोग द्वारा खरीफ फसल में सरकार को लागत का डेढ़ गुना एमएसपी मुहैया कराने का खर्च 1.12 लाख करोड़ रुपये बताया गया था।

एक जून से दस दिनों की हड़ताल पर गए किसानों की मांगों में कर्ज माफी, डेढ़ गुना एमएसपी मुहैया कराना और स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करना है। केंद्र ने किसान हड़ताल को अब तक तव्वजो नहीं दी है, बल्कि केंद्र और भाजपा शासित राज्य में मंत्रियों ने इसे राजनीति से प्रेरित करार दिया है।

कृषि मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक सरकार का इरादा किसानों से बजट में किए गए वादे को पूरा करना है। वह उस दिशा में बढ़ रही है और जल्द ही खरीद पर डेढ़ गुना एमएसपी किसानों को मिलेगा। सीएसीपी ने ने अरहर, उड़द की एमएसपी प्रति क्विंटल 400 रुपये बढ़ाने की सिफारिश की है।

सीएसीपी ने मूंग पर 350 रुपये, धान (सामान्य व ग्रेड ए) पर प्रति क्विंटल 80 रुपये, ज्वार (हाइब्रिड, मलडांडी) पर 75 रुपये, बाजरा पर 95 रुपये, मक्का पर 60 रुपये और रागी पर 175 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी करने को कहा है। गौरतलब है कि सीएसीपी ने सिफारिशों में बढ़ोतरी का आकलन पिछले साल के एमएसपी के आधार पर किया है।

पहली ही फसल में किसान ने खजूर की खेती से कमाए 4 लाख रु

इराक से शुरू हुई खजूर की खेती अब मिस्र, लीबिया, पाकिस्तान, यूएसए, सूडान,सऊदी अरब और भारत तक में होती है। भारत खूजर के सबसे बड़े इम्पोर्टर देशों में से भी एक है। खजूर का इस्तेमाल अचार, जूस, चीनी, स्टार्च, छुहारा और शराब बनाने में भी किया जाता है। इसकी हर एक चीज काम की है।

खजूर की गुठली से पोल्ट्री आहार तैयार किया जाता है। इसकी पत्तियों से टोकरियां, कागज, रस्सी और झाड़ू बनाई जाती है। कई बीमारियों में भी खजूर दवा की तरह काम करता है। इस तरह से खजूर की खेती करना भी काफी फायदे का सौदा है। इसकी कई तरह की किस्म होती हैं।

राजस्थान के बाड़मेर जिले के चाइटन तहसील के आलमसर गांव के किसान सादुलाराम सियोल ने पहले ही साल में खूजर की खेती कर साढ़े तीन लाख रुपए कमाए थे। आज हम बता रहे हैं आप कैसे खजूर की खेती कर लाखों रुपए कमा सकते हैं।

50 साल से भी ज्यादा होती है लाइफ

  • खजूर के पेड़ सालों तक लगे होते हैं, इनकी लाइफ 50 साल से भी ज्यादा होती है ऐसे में जरूरी है कि इनके बीच में प्रॉपर स्पेस रखा जाए।
  • इन पेड़ों की अच्छी ग्रोथ के लिए हर रो (पंक्ति) के बीच 8 मीटर तक का डिस्टेंस रखा जाता है।
  • प्रति हेक्टेयर इसके करीब 160 प्लांट लगाए जाते हैं।

जमीन को कैसे तैयार करें

  • जिस जमीन पर खेती करना है उसकी 2 से 3 बार जुताई जरूरी होती है। बाद में मिट्टी को एक लेवल में करना होता है।
  • इसके लिए खोदे गए गड्ढों को करीब 2 हफ्ते तक ओपन रखने की सलाह दी जाती है।
  • जुलाई से सितंबर का टाइम प्लांटिंग के लिए बेस्ट होता है।
  • यदि जमीन में इरिगेशन की फेसिलिटी है तो फार्मर खजूर के प्लांट के बीच वाली जगह में दूसरी फसलें भी लगा सकते हैं। जैसे काला चना, हरा चना, मसूर, पपीता या सब्जियां भी उगा सकते हैं।

कितना पानी देना जरूरी

  • पेड़ों को कितना पानी देना है यह एरिया की क्लाइमेट कंडीशन और मिट्टी की मॉइश्चर होल्ड करने की कैपेसिटी पर डिपेंड करता है।
  • पेड़ों में लगातार मॉइश्चर बने रहना चाहिए लेकिन पानी ठहरना नहीं चाहिए। बारिश के मौसम में अलग से पानी देने की कोई जरूरत नहीं होती।
  • भारी बारिश से पानी जम जाए तो उसका निकलना सही होता है, वरना यह प्लांट को डैमेज कर सकता है।
  • हर साल 5 से 6 बार सिंचाई पर्याप्त होती है। प्लांटिंग के तुरंत बाद फ्रिक्वेंट इरिगेशन की जरूरत होती है।

अच्छी क्वालिटी के लिए क्या करना जरूरी

  • अच्छी क्वालिटी के लिए ओर्गेनिक फर्टिलाइजर्स का यूज करना चाहिए। इससे खजूर की पैदावार भी बढ़ती है।
  • केमिकल फर्टिलाइजर N: P: K को 30:20:50 के रेशो में अप्लाई करना चाहिए। यह मार्च और अप्रैल के महीने में यूज करना चाहिए।
  • इंडिया में ‘N’ का रिकमंडेड डोज 1.40kg/ट्री है। एक एडल्ट ट्री को 600ग्राम ‘N’, 100 ग्राम ‘P’ और 75 ग्राम ‘K’ की जरूरत हर साल होती है।
  • खजूर में मादा पौधों के बीच में 10 फीसदी नर पौधे होने चाहिए।

अब होती है हार्वेस्टिंग

  • खजूर प्लांटिंग के 6 से 7 साल में हार्वेस्टिंग के लिए तैयार हो जाते हैं। वैरायटी के हिसाब से खजूर अलग-अलग स्टेज में तोड़े जाते हैं। इसलिए हार्वेस्टिंग लोकल डिमांड पर भी डिपेंड करती है।
  • खजूर की पैदावार मिट्टी और क्लाइमेट पर डिपेंड करती है। 10 साल पुराना पेड़ हर साल 50 से 60 किलो खजूर देता है। साल दर साल इसकी खपत बढ़ती है। 15 साल तक एक पेड़ 80 किलो तक फल देता है।

विदर्भ के किसान की कहानी

68 साल के सवी थंगवाल विदर्भ के किसान हैं। जब खराब खेती से परेशान होकर विदर्भ के किसान आत्महत्या तक करने पर मजबूर हो गए थे तब थंगवाल ने एक अलग राह खोजी। उन्होंने ट्रेडीशनल खेती न करते हुए खजूर की खेती शुरू की। उन्होंने 2 एकड़ जमीन में खूजर के 130 प्लांट लगाए। एक प्लांट की कॉस्ट 6 हजार रुपए आई।

3 साल के बाद ही प्लांट में फ्रूट्स आना शुरू हो गए। चौथे साल 25 से 30 किलो खजूर प्रति पेड़ से प्राप्त होने लगे। खजूर बाजार में 300 रुपए किलो तक बिके। जिससे थंगवाल को बड़ा प्रॉफिट हुआ। अब उन्होंने 25 एकड़ जमीन में 300 प्लांट लगाए हैं। हर पेड़ से 100 किलो तक खजूर मिल रहा है। वे कहते हैं कि एक प्लांट को लगाने का खर्चा भी अब 3600 रुपए तक आ चुका है।

कितनी हुई इनकम

  • एक प्लांट की लागत 6 हजार रुपए।
  • इसी तरह 130 प्लांट की लागत 7 लाख 80 हजार रुपए।
  • एक प्लांट से 30 किलो खजूर एक सीजन में।
  • इसी तरह 130 प्लांट से 3900 किलो खजूर मिले।
  • एक किलो खजूर की कीमत 300 रुपए किलो।
  • इसी तरह 3900 किलो खजूर की कीमत 11 लाख 70 हजार रुपए।
  • इस तरह किसान को एक सीजन में ही 3 लाख 90 हजार रुपए का मुनाफा हुआ।
  • अगले सीजन से इसमें लागत की रकम भी नहीं जुड़ेगी और सौ प्रतिशत मुनाफा होगा।

कीड़े-मकोड़े पकड़ने का मिला नया आइडिया, सालाना लाखों में कर रही कमाई

कीड़े-मकोड़े फसल की पैदावार को अत्यधिक क्षति पहुंचाते हैं जिससे न सिर्फ किसानों की मेहनत बर्बाद होती है, बल्कि उनको आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। इन समस्याओं से निपटने के लिए किसान कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं,

जिसका प्रतिकूल असर खेती पर पड़ता है और प्रोडक्शन घट जाता है। किसानों की इस समस्या से निजात दिलाने के लिए महाराष्ट्र के वर्धा की रहने वाली निलिशा जिभकाटे को एक नया आइडिया मिला और आज वो अपने खास आइडिया से सालाना लाखों में कमाई कर रही हैं।

क्या मिला नया आइडिया

निलिशा ने मनी भास्कर को बताया कि कीट-पतंगों का प्रकोप बढ़ जाता है, ऐसे में किसान कीटनाशक का प्रयोग करते हैं, जो कि फसल और पर्यावरण दोनों के लिए नुकसानदायक होता है। ऐसे में स्टिकी ट्रैप के इस्तेमाल से फसलों में होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है।

स्टिकी ट्रैप एक पीले रंग की शीट होती हैं जो फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए खेत में लगाई जाती है। इससे फसलों पर कीटों से रक्षा हो जाती है। एक ऐसी तकनीक है कि ये कीड़े खुद व खुद जाल में फंस जाएंगे।

कैसे करता है काम

हर कीट पीले रंग की ओर आकर्षित होता है। अब अगर उसी रंग की शीट पर कोई चिपचिपा पदार्थ लगाकर फसल की ऊंचाई से करीब एक फीट और ऊंचे पर टांग दिया जाए तो कीट रंग से आकर्षित होकर इस शीट पर चिपक जाता है।

फिर यह फसल को नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं। मकसद यह है कि कीड़ों से न सिर्फ फसलों की सुरक्षा हो, बल्कि रसायन का इस्तेमाल भी घटे व बंपर उत्पादन भी हो। इसका प्रयोग बेहद आसान व सस्ता है। यह हर मौसम के लिए कारगर है।