देश में इन 14 कीटनाशकों पर तत्काल प्रतिबंध, इनसे फैलता है कैंसर

केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए खतरनाक 18 कीटनाशकों पर रोक लगा दी है। सरकार की ओर से गठित समिति ने अपनी सिफारिश में इन कीटनाशकों से होने वाले संभावित नुकसान पर प्रकाश डाला था, जिसके बाद केंद्र ने इन पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया।

इन कीटनाशकों के इस्तेमाल पर कई देशों ने पहले से ही पाबंदी लगा रखी है। सरकार ने बेनोमिल, कार्बाराइल, फेनारिमोल, मिथॉक्सी एथाइल मरकरी क्लोराइड, थियोमेटॉन सहित कुल 14 कीटनाशकों पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया है, जबकि एलाचलोर, डिचलोरवस, फोरेट और फोस्फामिडॉन देश में 2020 से प्रतिबंधित होंगे।

कीटनाशकों की समीक्षा के लिए गठित समिति ने 16 जुलाई को इस मुद्दे पर सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी, जिसने सिफारिशों में कहा कि ये कीटनाशक लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं। विभिन्न स्तरों पर इनका प्रयोग फसल को कैंसर कारक व विषैला बनाता है। इसी वजह से कई देशों ने इनके इस्तेमाल पर पूरी तरह से पाबंदी लगा रखा है। समिति ने कहा कि इन्हें प्रतिबंधित किया जाना ही उचित व्यवस्था होगी।

कंपनियां जारी करेंगी चेतावनी

केंद्र सरकार द्वारा जारी आदेश के अनुसार, जिन कीटनाशकों को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित किया गया है, उनका निर्माण करने वाली कंपनियों को देशभर में मौजूद इन कीटनाशकों का इस्तेमाल रोकने के लिए चेतावनी जारी करनी होगी। उन्हें बाजार से अपना माल वापस लेना होगा। कंपनियों को चेतावनी में स्पष्ट करना होगा कि स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए खतरनाक होने के मद्देनजर इन कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाए।

सर्वोच्च न्यायालय का रुख सख्त

सर्वोच्च न्यायालय ने भी केंद्र को इन कीटनाशकों पर जल्द फैसला लेने के लिए कहा था। न्यायालय ने सरकार को दो महीने का वक्त दिया था। इससे पहले महाराष्ट्र में नवंबर 2017 में कीटनाशकों के इस्तेमाल से 50 से भी ज्यादा किसानों की मौत हो गई थी।

जानलेवा 66 कीटनाशकों का हो रहा इस्तेमाल

हाल में सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने स्पष्ट किया था कि देश में ऐसे 66 कीटनाशकों को इस्तेमाल में लाया जाता है, जो एक या उससे ज्यादा देशों में प्रतिबंधित हैं। इनमें 28 पर पहले ही रोक लगाई जा चुकी है।

राउंडअप का उपयोग करने वाले किसान को इस कारण मिलेगा 1,900 करोड़ रुपये का मुआवजा

अमरीका के सैन फ्रांसिस्को में एक माली ने एक बड़ी कंपनी के ख़िलाफ लगभग (1900 करोड़) 29 करोड़ डॉलर का मुकदमा जीत लिया है.डिवेन जॉनसन की ज़िंदगी में जीत की इस खुशी से पहले कैंसर आया जो उन्हें माली की नौकरी के दौरान हुआ.

कैंसर का पहला लक्षण दिखा लाल चकते के रूप में जो उनके लगभग 80 फ़ीसद शरीर में फैल गए थे. जॉनसन तब 42 साल के थे. साल 2012 में बेनिसिया के स्कूलों में माली का काम करने के दौरान उन्होंने पौधों में साल भर खरपतवार नाशक दवा लगाई. ये दवा थी- राउंडअप एंड रेंजर प्रो हर्बिसाइड जिसे मोन्सेंटो कंपनी बनाती है.

साल 2014 में पता चला कि उन्हें हॉजकिन लिम्फ़ोमा कैंसर है. कंपनी मोन्सेंटो के ख़िलाफ़ मुक़दमे के लिए उन्होंने साल 2015 में तैयारी शुरू की. जॉनसन का दावा इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर के शोध पर आधारित था

जिसमें राउंडअप हर्बिसाइड को कैंसर का कारण बताया गया है. इस हर्बिसाइड में ग्लाइफोसेट होता है जो कैंसर पैदा कर सकता है. ये एजेंसी विश्व स्वास्थ्य संगठन से संबद्ध है.

दुनिया की सबसे ताकतवर सब्जी है ये, खाएंगे तो शरीर बन जाएगा फौलादी

आजकल के दौर में जंक फूड का इतना क्रेज बढ़ चुका है कि लोग अपने शरीर को जरूरी ताकत देनी वाली सब्जी, दाल का सेवन कम ही करते हैं. लेकिन, बहुत कम लोग जानते हैं कि कुछ सबज्यिां ऐसी होती हैं, जिन्हें कुछ दिन खाने पर ही इसका फायदा मिल जाता है.

ऐसी ही एक सब्जी है कंटोला. यह दुनिया की सबसे ताकतवर सब्जी है. इसे औषधि के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. इस सब्जी में इतनी ताकत होती है कि महज कुछ दिन के सेवन से ही आपका शरीर तंदुरुस्त बन जाता है या यूं कहें कि फौलादी बन जाता है. कंटोला को ककोड़े और मीठा करेला नाम से भी जाना जाता है.

कंटोला आमतौर पर मॉनसून के मौसम में भारतीय बाजारों में देखा जाता है. इसमें कई स्वास्थ्य लाभ है जिसकी वजह से इसकी खेती दुनियाभर में शुरू हो गई है. इसकी मुख्य रूप से भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में खेती की जाती है.

यह सब्जी स्वादिष्ट होने के साथ-साथ प्रोटीन से भरपूर होती है. इसे रोज खाने से आपका शरीर ताकतवर बनता है. इसके लिए कहा जाता है कि इसमें मीट से 50 गुना ज्यादा ताकत और प्रोटीन होता है. कंटोल में मौजूद फाइटोकेमिकल्स स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में काफी मदद करता है. यह एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर सब्जी है. यह शरीर को साफ रखने में भी काफी सहायक है.

अगर आप भी अपनी रोजाना डाइट में इसे शामिल करते हैं तो दूसरे तत्वों और फाइबर की कमी को भी यह पूरी करती है. ककोड़े यानी मीठा करेला को सेहतमंद माना जाता है. आयुर्वेद में भी इसे सबसे ताकतवर सब्जी के रूप में माना गया है.

एंटी एलर्जिक : कंटोल में एंटी-एलर्जन और एनाल्जेसिक सर्दी खांसी से राहत प्रदान करने और इस रोकन में काफी सहायक है.

हाई ब्लड प्रेशर होगा दूर : कंटोला में मौजूद मोमोरडीसिन तत्व और फाइबर की अधिक मात्रा शरीर के लिए रामबाण हैं. मोमोरेडीसिन तत्व एंटीऑक्सीडेंट, एंटीडायबिटीज और एंटीस्टे्रस की तरह काम करता है और वजन और हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखता है.

पाचन क्रिया होगी दुरुस्त : अगर आप इसकी सब्जी नहीं खाना चाहते तो अचार बनाकर भी सेवन कर सकते हैं. आयुर्वेद में कई रोगों के इलाज के लिए इसे औषधि के रूप में प्रयोग करते हैं. यह पाचन क्रिया को दुरुस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

कैंसर से बचाए : कंटोला में में मौजूद ल्युटेन जैसे केरोटोनोइडस विभिन्न नेत्र रोग, हृदय रोग और यहां तक कि कैंसर की रोकथाम में सहायक है.

वजन घटाने में सक्षम: कंटोला में प्रोटीन और आयरन भरपूर होता है जबकि कैलोरी कम मात्रा में होती है. यदि 100 ग्राम कंटोला की सब्जी का सेवन करते हैं तो 17 कैलोरी प्राप्त होती है. जिससे वजन घटाने वाले लोगों के लिए यह बेहतर विकल्प है.

पंजाब का ये किसान खीरे की फसल से 4 महीने में कमा रहा है 18 लाख रुपए

गांव बठोई खुर्द के युवा किसान धान की खेती न कर पॉली हाउस में देसी खीरे उगाकर अच्छ मुनाफा कमा रहे हैं। युवा किसान बलजिंदर सिंह का कहना है कि पंजाब में पानी के हालतों को देखते हुए, अब रिवायती खेती को कम कर देना चाहिए।

इसलिए उन्होंने पहली बार एक एकड़ एरिया में देसी खीरा लगाया है। वह इसकी खेती के लिए आर्गेनिक खाद खुद ही तैयार कर रहा है। इस खीरे की खास बात यह है कि इस पर किसी प्रकार के कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं किया जाता।

खीरे की बेल को 15 दिन के अंदर 100 ग्राम कैल्शियम डाला जाता है। फसल साल में दो बार दो महीने चलती है और 22 से 25 रुपए के बीच रेट मिलता है। धान की फसल लगाने से पानी का लेवल तो नीचे जाता ही है, साथ में मुनाफा भी कम होता है।

देसी खीरा साल में दो बार जून-जुलाई आैर अक्टूबर-नवंबर में होता है, पानी की होती है बचत

चाइनीज खीरे से अलग है देसी खीरा, चार लाख रुपए आता है खर्च

साल में दो बार खीरे की फसल की खेती होती है। इससे पहले गर्मी के दो महीने जून व जुलाई और सर्दी के अक्तूबर आैर नवंबर में फसल लगती है। किसान की मानंे तो बीज से लेकर लेबर तक चार महीने में करीब 4 लाख रुपए खर्च अाता है और मुनाफा 18 लाख के करीब होता है।

चाइनीज खीरे से देसी खीरे की अलग पहचान है। चाइनीज खीरे की चमक ज्यादा होने के साथ ही बाहरी परत पर किसी प्रकार के रेशे नहीं होते। देसी खीरे में बाहरी परत पर कई जगह अलग-अलग निशान के साथ रेशे देखे जा सकते हैं। इस पर किसी प्रकार के पेस्टिसाइड का इस्तेमाल नहीं किया जाता।

पॉलीहाउस में खेती से होती है पानी की बचत

पॉलीहाउस में खीरे की खेती करने से पानी की बचत की जा सकती है। इसके लिए किसान तुपका प्रणाली से पानी बेल तक पहुंचाता है। इसमें उतना पानी ही इस्तेमाल किया जाता है, जितना पौधे को चाहिए। देसी खीरे की बेल 9 फीट तक बढ़ती है। जैसे-जैसे यह बढ़ती है वैसे ही पानी की मात्रा कम या ज्यादा हो सकती है। खीरे की बेल को 15 दिन के अंदर 100 ग्राम कैल्शियम डाला जाता है।

बासमती उगाने वाले किसानों के लिए चिंता की खबर, घटकर आधा हो सकता है मुनाफा

इस साल मानसून में खूब बारिश हो रही है। इस बारिश को धान के लिए वरदान लिए कहा जाता है। किसानों के चेहरे पर रौनक भी है। लेकिन चावल की सबसे बेहतरीन प्रजाति यानी बासमती पैदा करने वाले किसानों के लिए ये खबर निराश करने वाली हो सकती है।

अच्छे मुनाफे की बाट जोह रहे इन किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। खतरनाक रसायनों के अत्यधिक प्रयोग के कारण यूरोपियन संघ के बाद अब सऊदी अरब ने भी भारत से आयात होने वाले बासमती चावल पर कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है।

कुछ महीने पहले यूरोपीय संघ ने बासमती चावल में फंफूदीनाशक ट्रासाइक्लाजोल के लिए अवशेष सीमा कम कर 0.01 एमजी (मिलीग्राम) प्रति किलो निर्धारित किया था वहीं अब सऊदी फूड एंड ड्रग अथॉरिटी (SAUDA) ने नई गाइडलाइंस के तहत बासमती धान में कीटनाशकों के प्रयोग को 90 फीसदी तक कम करने को कहा है।

बाजार में अभी नई फसल नहीं आई है बावजूद इसके इसका असर दिखने लगा है। कृषि और प्रंसस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के ताजा आंकड़ों के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2018-19 के पहले तीन महीनों अप्रैल से जून के दौरान बासमती चावल के निर्यात में सात फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई है। बासमती धान की फसल अगले दो से तीन महीने में पककर तैयार हो जाएगी।

भारत पिछले पांच वर्षां से विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है, लेकिन निर्धारित अवशेष सीमा (एमआरएल) से अधिक कीटनाशकों के अवशेषों के पाए जाने के कारण पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका, यूरोप और ईरान जैसे बाजारों में निर्यातकों की परेशानी बढ़ गई है।

यूरोप की तरह सऊदी अरब ने भी कीटनाशकों के प्रयोग के लिए नई गाइडलाइन जारी कर दी है जिसके बाद से भारतीय ट्रेडिंग कंपनियों पर संकट आ गया है। यूरोपियन संघ ने आयात किए जाने वाले बासमती में मिलने वाले फंगेसाइड केमिकल (ट्राइसाइक्लोजाल) की मात्रा 1 पीपीएम से घटाकर 0.01 पीपीएम कर दिया था और अब सउदी अरब भी ऐसा करने जा रहा है।

“बासमती चावल में निर्यात सौदे कम होने के कारण धान की मांग कम हो गई है। जैसी खबरें आ रही हैं, उसके अनुसार तो आने वाले समय में मांग और घट सकती है।

यदि यह रोक जारी रहती है तो बासमती से प्रति क्विंटल औसतन 3500 रुपए तक कमाने वाले किसान को इसका आधा दाम भी मिलना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि इस धान का भाव निर्यात पर निर्भर करता है। इस रोक के बाद अब यूरोप में पाकिस्तान के चावल की दखल बढ़ सकती है। भारत बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है।

बासमती चावल के बड़े किसान अमृतसर के हरवंश सिंह कहते हैं “हमें दवाओं के बारे में सही जानकारी ही नहीं है। यूरोपिय संघ के रोक के बाद सऊदी का ये फैसला हम जैसे किसानों के लिए बहुत परेशानी खड़ी करे वाला है। दाम सही नहीं मिला तो हमारे यहां के किसानों को किसी और फसल की ओर ध्यान देना पड़ेगा।

एक्सपोर्ट में बड़ी गिरावट

भारत बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है।  जहरीले कीटनाशकों के प्रयोग के कारण निर्यात में लगातार कमी दर्ज की जा रही है। चालू वित्त वर्ष 2018-19 के पहले तीन महीनों अप्रैल से जून के दौरान बासमती चावल के निर्यात में मात्रा के हिसाब से 7 फीसदी की गिरावट आई है।

बासमती चावल बेचने वाले देश के बड़े बासमती चावल निर्यातकों में शुमार कोहिनूर फूड्स के संयुक्त प्रबंध निदेशक गुरनाम अरोड़ा ने को बताया “निर्यात में कमी आ रही है। हम किसानों को कीटनाशकों के बारे में जानकारी भी दे रहे हैं। ये उनके हित में ही है। नई फसल आने में अभी समय है। ऐसे में हम लगातार यूरोपीय संघ और सऊदी अरब के अधिकारियों से बात कर रहे हैं।

हो सकता है कि आने वाले समय में समस्या का समाधान भी हो जाए। लेकिन अब समय आ गया है कि किसान मानकों के अनुसार ही कीटनाशकों का प्रयोग करें, वरना नुकसान बढ़ता ही जाएगा लेकिन अब चीन भी भारतीय बासमती चावल भारत से आयात करने जा रहा है, ऐसे में स्थिति में थोड़ा सुधार हो सकता है।”

ऐसे में किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे अगर पेस्टीसाइड का प्रयोग कम कर देंगे तो पैदावार घट सकती है। ऐसे में उनके पास विकल्प कम बचते हैं। इस बारे में गुरनाम अरोड़ा ने कहा कि हम किसानों को कुछ मुआवजा भी देने की बात कर रहे हैं, ताकि उनके घाटे को कम किया जा सके।

Alert ! देश के इन 21 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट जारी

देश में जहां बारिश ने कई हिस्सों में भारी तबाही मचाई हुई है। वहीं कई हिस्से ऐसे भी हैं जहां या तो सूखा पड़ा है या फिर सामान्य से भी कम बारिश हुई है। अगर बारिश से मची भारी तबाही की बात करें तो केरल की स्थिति दयनीय है ।

यहां बीते 24 घंटे में बारिश और भूस्खलन से 26 मौतें हो चुकी हैं। इनमें 11 लोग इडुक्की जिले के हैं। मलबे से दो लोगों को जिंदा निकाला गया है। वहीं अमेरिका ने आज एक परामर्श जारी कर अपने नागरिकों से कहा कि वह बारिश और बाढ़ से जूझ रहे केरल की यात्रा पर जाने से बचें। वही दूसरी तरफ मौसम विभाग ने अगले तीन दिन तक 21 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है।

उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, झारखंड, बिहार, पश्चिमी बंगाल, सिक्किम, मध्यप्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और अंडमान निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं। वहीं पूरे देश में अभी तक सामान्य से 10 फीसदी कम बारिश हुई है। 47 फीसदी हिस्सा ऐसा है जहां सामान्य बारिश हुई है। वहीं 39 फीसदी हिस्से में कम बारिश हुई है।

भारी बारिश के कारण कई नदियां उफान पर हैं जिस कारण राज्य के विभिन्न हिस्सों में कम से कम 24 बांधों को खोल दिया गया है। एशिया के सबसे बड़े अर्ध चंद्राकार बांध इडुक्की जलाशय से पानी छोड़े जाने से पहले रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केरल में भारी वर्षा एवं बाढ़ के आलोक में गुरुवार को मुख्यमंत्री पिनराई विजयन से बातचीत की और प्रभावित लोगों के लिए सभी संभव सहायता की पेशकश की।

जिन राज्यों ने बारिश ने भारी तबाही मचाई हुई है उनमें उत्तराखंड का भी नाम शामिल है। बारिश के कारण कैलाश मानसरोवर यात्रा प्रभावित हुई है। इस दौरान भूस्खलन आने से राज्य की 150 से अधिक सड़कें भी ब्लॉक हो चुकी हैं। जिस कारण चारधाम यात्रा रोकनी पड़ी। वहीं ऋषिकेश-यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग भी बीते एक सप्ताह से प्रभावित है। मौसम विभाग ने राज्य में अगले तीन दिनों में भारी बारिश का अनुमान जताया है।

पशुओं  के लिए घर पर त्यार करें यह दलिया, 100% दूध बढ़ने की है गरंटी

आज हम आपको एक ऐसा दलिया बनाना सिखएंगे जिस से आपके पशु की दूध देने की क्षमता बहुत बढ़ जाएगी और यह सस्ता है कोई महंगा नहीं है और इसको बनाने के लिए जो हर जगह मिल जाएगा ।

इसमें दो चीजें का ध्यान जरूर रखें एक इसके बनाने की विधि और दूसरा इसको देने का समय दोनों को ध्यान से समझें । दलिया बनाने के लिए सबसे पहले आपको चाहिए गेहूं का दलिया। गेहूं का दलिया आप मक्की का और चीज का भी ले सकते हैं लेकिन गर्मी में गेहूं का दलिया सबसे अच्छा रहता है और इसके साथ आपको चाहिए तारा मीरा अगर आपको मिलता है तो बहुत अच्छी बात है अगर नहीं मिलता है तो कोई बात नहीं है ।

इसके बाद आती है हमारी शक्कर की जगह गुड का इस्तेमाल कर सकते है लेकिन गर्मी में शक्कर सबसे अच्छी रहती है । इसके साथ आप सरसों का तेल और मीठा सोढा का इस्तेमाल करें मीठा सोढा पांचन शक्ति के लिए बहुत अच्छा होता है । इसके अलावा किसान इसमें हमारे कॉटन सीड और कैल्शियम आदि डाल सकते है ।

इसको बनाना कैसे है सबसे पहले आपको लेना है दलिया और इसमें आपको पानी डाल कर आग पर पका लेना है उसके बाद हम इसमें हम सबसे पहले शक्कर डालेंगे और इसके बाद किसान भाइयो सरसों का तेल डालना है जोकि आपको सौ ग्राम के लगभग लेना है अपने पशुओं के हिसाब से अगर आपका पशु ज्यादा बड़ा है भी या तो आप इसको ज्यादा भी ले सकते है ।

तारामीरा भी आप 50 ग्राम तक इस्तेमाल कर सकते हैं कोई दिक्कत नहीं है ज्यादा भी कर लिया तो कोई प्रॉब्लम नहीं है यह पशु के लिए बहुत अच्छा है और इसके बाद सबसे जरूरी चीज आती है कि मीठा सोडा इसको इस्तेमाल करना अगर आपको इस्तेमाल करना है तो आप एक चम्मच दे सकते है लेकिन पशु को आपके पशु को दस्त वगैरह नहीं लगी होनी चाहिए ।

इस दलिया की पूरी जानकारी के लिए नीचे दिए हुए वीडियो को देखें ।

आप भी कर सकते है हींग की खेती ,एक किल्लो की कीमत है 35000

देश में खेती को लेकर पहले कई प्रयोग किए जा चुके हैं और कई प्रयोगों में भारत को सफलता हासिल हो चुकी है. इसी के साथ देश को खेती की क्षेत्र में एक और सफलता हासिल हुई है. देश में पहली बार हिंग की खेती में सफलता दिखाई दे रही है. भारत में अभी तक हिंग की खेती संभव नहीं हो सकी थी या फीर यूं कहें की यहां एक ग्राम भी हिंग की उत्पादन नहीं हो सकी थी.

हींग की खपत हमारे देश में लगभग 40 प्रतिशत है. यह शायद थोड़ी अजीब भी है की जिस देश में हींग की खपत इतनी ज्यादा है उस देश में इसकी खेती नहीं होती और इसे दूसरे देश से आयात करना पड़ता है. वहीं हींग का बाजार भाव 35000 रुपए प्रति किलो ग्राम है.

इन देशों में होती है हींग की खेती

हिंग एक सौंफ प्रजाति का पौधा है और इसकी लम्बाई 1 से 1.5 मीटर तक होती है. इसकी खेती जिन देशों में प्रमुख तौर पर होती हैं वो है अफगानिस्तान, ईरान, तुर्कमेनिस्तान और ब्लूचिस्तान.

कब और कहां कर सकते हैं हींग की खेती

हींग की खेती के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस का तापमान उपयुक्त होता है. भारत में यह तापमान पहाड़ी क्षेत्रों में होता है और इन क्षेत्रों में इसकी खेती आसानी से की जा सकती है. अन्य शब्दों में कहें तो इसकी खेती के लिए न ज्यादा ठण्ड और न ही ज्यादा गर्मी की आवश्यक्ता होती है.

महत्वपूर्ण जानकारी

हींग की खेती के लिए ऐसी जमीन उपयुक्त मानी जाती है जिसमें रेत, मिठ्ठी के ठेले व चिकनी अधिक हो. इसके साथ ही सूरज की धूप सीधे उस जगह पड़नी चाहिए जहां इसकी खेती की जा रही है. जहां छाया पड़ती हो वहां पर इसे नहीं उगाया जा सकता है. पौधों के बीच में 5 फीट की दूरी का होना आवश्यक है.

हींग की खेती की प्रकिया

हींग के बीज को पहले ग्रीन हाऊस में 2-2 फीट की दूरी से बोया जाता है. पौध निकलने पर इसे फिर 5-5 फीट की दूरी पर लगाया जाता है. हाथ लगाकर जमीन की नमी को देख कर ही इसमें पानी का छिड़काव किया जा सकता है, अधिक पानी पौधे को नुकसान पहुंचा सकता है.

पौधों को नमी के लिए गीली घास का भी प्रयोग किया जा सकता है, एक खास बात यह है कि हींग पौधे को पेड़ बनने के लिए 5 वर्ष का समय लगता है. इसकी जड़ों व सीधे तनों से गौंद निकाला जाता है.

हींग के प्रकार और कुछ अन्य जानकारी

हींग मुख्य: दो प्रकार की होती हैं दुधिया सफेद जिसे काबूली सुफाइद बोला जाता है और दूसरी लाल हींग. सल्फर के मौजूद होने के कारण इसकी गंध बहुत तीखी होती है. इसके भी तीन रूप होते है टिमर्स, मास और पेस्ट. यह गोल, पतला राल शुद्ध रूप में होता है जोकि 30 मि.मि. का होता है यह भूरा और फीका पीला होता है. सफेद व पीला पानी में घुलनशील है. जबकि गहरे व काले रंग वाला तेल में ही घुलता है, स्टार्च व गोंद मिला कर ईट के रूप में बेचा जाता है.

भारत में कहां हो रही है हींग की खेती ?

भारत में हिंग की खेती की शुरुआत हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति से हुई है. इंडियन कॉफी बोर्ड के सदस्य डॉ.विक्रम शर्मा और हिमाचल सरकार के वजह से संभव हो पाया है. डॉ. शर्मा ने इसके बीज को इरान और तुर्की से मंगाकर यहां इसकी बीज तैयारल की है.

इसके साथ ही पहांड़ी इलाकों में रह रहे किसानों के लिए अच्छी खबर यह है की वहां के किसान आसानी से हींग की खेती कर सकते हैं. भारत में अभी तक हिंग की खेती संभव नहीं हो सकी थी या फीर यूं कहें की यहां एक ग्राम भी हिंग की उत्पादन नहीं हो सकी थी.

यह है ट्रेक्टर से चलने वाली मिनी कंबाइन ,पूरी जानकारी के लिए वीडियो पर क्लिक करें

भारत में फसल कटाई का काम कंबाइन से किया जाता है । कंबाइन चलाना बहुत ही मुश्किल काम होता है लेकिन अब ये काम बहुत आसान होने वाला है ।भारत में अब ऐसी कंबाइन आ चुकी है जिसे चलाना बहुत ही आसान है। कोई भी किसान इस कंबाइन को खुद चला सकता है । यह कंबाइन Gahir Agro Industries Limited द्वारा त्यार की गई है ।

इस कंबाइन का नाम Nippy 45 है । यह ट्रेक्टर से चलने वाली छोटी कंबाइन है ।इस कंबाइन की क्वालिटी बहुत ही बढ़िया है और इसके रख-रखाव का खर्च भी बहुत कम है । इसको चलाने के लिए कम से कम 45 डबल क्लच ट्रेक्टर जा उस से ऊपर की जरूरत पड़ती है । इस मशीन के कटर का साइज़ 7.5 फ़ीट है ।

वीडियो देखे

New Mini Combine Harvester on the Name of “NIPPY-45” Launched by Gahir Agro Industries.

Posted by Gahir Agro Industries Limited on Sunday, August 5, 2018

इसके अनाज निकलने वाले पाइप से किसी भी तरफ से अनाज निकला जा सकता है ।यह मिनी कंबाइन चलने मैं बहुत लाजवाब है और बहुत कम कीमत पर फसल काटती है । अगर आप इस मशीन की कीमत जा किसी प्रकार की और जानकारी चाहते है तो इस नंबर 097799 11580 पर संपर्क कर सकते है ।

गाजर घास से ऐसे त्यार करें यूरिया जैसी ताकतवर खाद

गाजर घास का वैज्ञानिक नाम पार्थेनियम हिस्टोफोरस है, इसमें प्रचुर मात्रा में नाइट्रोजन होती है। वैसे तो इसका पौधा इंसानों ही नहीं, जानवरों को भी कई तरह के रोग दे सकता है लेकिन इसके पौधे से अच्छी किस्म की कंपोस्ट खाद भी बनाई जा सकती है। यूपी समेत देश के अलग-अलग कृषि विज्ञान केंद्रों में इसके उपयोग के तरीके सिखाए जा रहे हैं।

इसी बीच कुछ किसानों ने इसके तरल खाद बनानी भी शुरू कर दी है। मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के करताज में रहने वाले प्रगतिशील किसान राकेश दुबे ने गोमूत्र और गाजर खास के स्वरस से तरल खाद बनानी शुरू की है, जो यूरिया का अच्छा विकल्प बन रही है।

राकेश दुबे बताते हैं, “कांग्रेस या गाजर खास किसानों को एलर्जी समेत कई बीमारियां दे रही है, इसकी रोकथाम भी बहुत मुश्किल है, खासकर जैविक खेती करने वाले किसान काफी परेशान रहते हैं, मगर ये किसान गाजर घास और गोमूत्र के स्वरस के जरिए अच्छी जैविक खाद बना सके हैं,

जो गेहूं, मक्का से लेकर कई फसलों में काम आएगी। जहर मुक्त खेती में नाइट्रोजन की आपूर्ति हमेशा समस्या रही है। कुछ किसान आंवला और मट्टा मिलाकर छिड़काव करते हैं, कुछ घनजीवामृत से लेकर वेस्टडीकंपोजर तक। लेकिन राकेश दुबे अब गाजर घास का रस छिड़क रहे हैं।

देश के अलग-अलग हिस्सों के किसान भी गाजर घास का सदुपयोग कर सकें, इसके लिए राकेश दुबे ने स्वरस बनाने का एक वीडियो और पूरी जानकारी सोशल मीडिया पर शेयर की है। जिसमें बनाने की पूरी विधि और छिड़काव के तरीके बताए गए हैं।

गाजर स्वरस बनाने की विधि आठ एकड़ मक्के के लिए राकेश दुबे की विधि:

30 किलो गाजर घास को बारीक काटकर 60 किलो गौमूत्र में मिला दिया। फिर उसमें 100 फिटकरी को 3-4 लीटर के गोमूत्र में घोलकर अच्छी तरह मिलाने के बाद गोमूत्र और गाजर घास वाले ड्रम में डाल देंगे। फिर इसे पूरे 3 दिन के लिए ड्रम में रख दिया जाएगा और जिसे समय-समय पर चलाना पड़ेगा। बाद में इसे महीन कपड़े से छानकर अलग कर लिया जाएगा। जिसे बाद फसल पर छिड़काव किया जा सकता है।

प्रति टंकी (20 लीटर वाली) में 2 लीटर गाजर घास स्वरस मिलाना है। इसे सुबह 10 बजे से पहले ही खेतों में छिड़काव करना चाहिए क्योंकि नाइट्रोजन उठाने और स्टोमेटा खुलने का ये उपयुक्त समय होता है।

एक एकड़ की विधि:

चार किलो गाजर घास, 8 लीटर गोमूत्र और 10 ग्राम फिटकरी के जरिए आप स्वरस बना सकते हैं

पाया जाता है विषाक्त रसायन

गाजर घास में रेस्क्युपटरपिन नामका विषाक्त रसायन पाया जाता है। जो फसलों की अंकुरण क्षमता पर विपरीत असर डालता है। इसे पराकरण अगर फसलों में ज्यादा पड़ जाएं तो उनमें दाना बनने की क्षमता कम हो जाती है। इनका दुष्प्रभाव इतना ज्यादा होता है कि दहलनी फसलों में नाइट्रोजन सोखने की जो क्षमता होती है ये उसे भी प्रभावित करते हैं। इसके संपर्क में आने पर किसानों को एग्जिमा, एलर्जी, बुखार और नजला जैसी बीमारियां हो जाती है।

अगर पशु इनके लपेटे में आ जाएं तो या दूसरी घास के साथ इसे खा जाएं तो उनके थनों और नथुनों में सूजन आ सकता है, समस्या ज्यादा गंभीर होने पर मौत भी हो सकती है।

रासायनिक तरीकों से रोकथाम के उपाय

गाजर घास को खत्म करना थोड़ा मुश्किल है लेकिन लगातार अगर कोशिश की जाए तो इसे नष्ट कर सकते है। सबसे जरुरी है इसके पौधों में फूल आने से पहले इन्हें काटकर जलाया जाए। या फिर उनकी खाद बनाई। तीसरा तरीका है।

खरपतवार नाशक का छिड़काव करें? गाजर घास के ऊपर 20 प्रतिशत साधारण नमक का घोल बनाकर छिड़काव करें। हर्बीसाइड जैसे शाकनाशी रसायनों में ग्लाईफोसेट, 2, 4-डी, मेट्रीब्युजिन, एट्राजीन, सिमेजिन, एलाक्लोर और डाइयूरान आदि प्रमुख हैं। अगर घास कुल की वनस्पतियों को बचाते हुए केवल गाजर घास को ही नष्ट करना है तो मेट्रीब्युजिन का उपयोग करना चाहिए।

मैक्सिकन बीटल (जाइगोग्रामा बाईकोलोराटा) जो इस खरपतवार को बहुत मजे से खाता है, इसके ऊपर छोड़ देना चाहिए। इस कीट के लार्वा और वयस्क पत्तियों को चटकर गाजर घास को सुखाकर मार देते हैं।

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गाजर घास से कंपोस्ट बनाने के उपाय

जौनपुर के बक्शा कृषि विज्ञान केन्द्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. संदीप कन्नोजिया हैं,”इस घास से यदि किसान खाद बना लें तो उनकी परेशानी का हल निकल आएगा। गाजर घास से खाद बनाने के लिए किसानों को एक गड्ढा खोदना होता है। गड्ढे की लम्बाई 12 फीट, चौड़ाई चार फीट और घहराई पांच फीट होनी चाहिए। इस गड्ढे में नौ इंच चौड़ी की दीवार बनानी होगी। इसे सीधा जोड़ेंगे। जब तीन स्टेप तीन रदृा ईंट रखने के बाद सात इंच चारों ओर जाली बनाई जाएगी।

इसी तरह ईंट की जोड़ाई सीधी और जालीदार करते रहेंगे। इसके बाद सूखी गाजर घास को अलग और हरी गाजर घास को अलग रख लेंगे। छह इंच तक हरा और सूखा वाला डंठल नीचे भर देंगे। इसके बाद 5 किलो गोबर पानी में ढीला घोलकर इसमें डाल देंगे। साथ में 2 इंच मिट्टी भी डालेंगे। भराई करने के बाद उसके ऊपर से मुलायम वाला डंठल डाला जाएगा। फिर पांच किलो गोबर पानी के साथ मिक्स करके तर करेंगे। इसी तरह गड्ढे को उपर तक भरना होगा।”. संदीप कन्नोजिया कहते हैं, “गाजर घास से बनी 20 टन खाद एक हेक्टेयर खेत के लिए मुफीद है।

news sources: gaonconnection.