किसान ने त्यार की धान की नई किसम

अच्छी पैदावार और स्वाद वह दो सबसे महत्वपूर्ण खूबियां हैं जिनकी किसान बुवाई के लिए बीज का चयन करते समय तलाश करता है। अगर बीज रासायनिक आदानों की आवश्यकता के बिना अच्छी तरह विकास कर सकता है, तो यह किसान और उपभोक्ता दोनों के लिए बोनस है।

मैसूर के एम.के. शंकर गुरू, जिन्‍हें धान उगाने का 50 साल से भी अधिक का अनुभव है, ने धान की ऐसी किस्म विकसित की है जिसमें उपरोक्त सभी गुण हैं। उन्होंने इस बीज को एनएमएस-2 नाम दिया है।

गुरु 1992 से ही विभिन्न किस्मों के बीज एकत्र और संरक्षित करने में लगे हुए हैं। बीजों के प्रति उनके आकर्षण ने एनएमएस-2 नामक इस नई किस्म का विकास करने में उनकी मदद की। उन्हें राष्ट्रीय नवाचार फाउंडेशन-भारत, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार द्वारा सम्मानित किया गया है।

एनएमएस-2 के बारे में अधिक जानें

एनएमएस-2, 130-135 दिन की फसल है। एक एकड़ के लिए, 10-15 किलो बीज की आवश्यकता होती है। पैदावार 28-30 क्विंटल होती है। जैविक खेती की पद्धतियों का उपयोग कर इसे उगाया जाता है।

यह रोग प्रतिरोधी किस्म है जो सफेद रंग का चावल देती है। बीज का आकार मध्यम होता है। कटाई के बाद चावल में संसाधित करने पर, धान की अन्‍य किस्‍मों की तुलना में हानि का प्रतिशत तुलनात्मक रूप से कम होता है।

अगर आप इसका बीज खरीदना चाहते है तो 3000-3500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से ख़रीदने के लिए एमके शंकर गुरू मोबाइल- 09900658921 पर संपर्क करें । इसकी फसल 2000 प्रति क्विंटल के हिसाब से बिकती है ।

जिन गायों को बेकार समझ लोगों ने छोड़ दिया, उन्‍हीं से यहाँ होती है लाखों की कमाई

दूध नहीं दे पाने की स्थिति में जिन गायों को किसानों और गौपालकों ने अनुपयोगी समझकर लावारिस भूखा-प्यासा भटकने के लिए छोड़ दिया था। अब उन्हीं गायों के गोबर और पेशाब से नगर निगम की लालटिपारा गौशाला में कैचुआ खाद, नैचुरल खाद और धूपबत्ती बनाई जा रही है।

वहीं पेशाब से कैमिकल रहित गोनाइल और कीटनाशक दवाईयां व मच्छर भगाने की धूपबत्ती तैयार की जा रही है। कीटनाशक दवाईयां खेती और बागवानी के लिए बेहद उपयोगी हैं। इससे नगर निगम को भी अभी तक करीब 3 लाख रुपये का आर्थिक लाभ हो चुका है।

गौमूत्र से बन रहा गौनाइल

प्रकृति में गाय के गोबर और पेशाब को सबसे पवित्र और शुद्ध माना जाता है। हिन्दू धर्म में गाय के पेशाब और गोबर का उपयोग पंचगव्य में किया जाता है, कहा जाता है कि इसके पीने से मनुष्य के सभी दोष दूर हो जाते हैं। नगर निगम की लालटिपारा गौशाला में करीब 6000 गाय हैं, इन गायों से प्रतिदिन नगर निगम को 60 हजार किलो गोबर मिलता है।

इस गोबर का नगर निगम ने कई तरह से उपयोग करना शुरू कर दिया है। वहीं गाय की पेशाब जिसका अभी तक कोई उपयोग नहीं होता था उससे वहां पर अब फिनाइल के स्थान पर गौनाइल बन रहा है, जो फिनाइल से भी बेहतर कार्य करता है। साथ ही पेशाब से बनने वाले कीटनाशकों का उपयोग खेती में किया जा रहा है। जिससे खेती को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का खात्मा तो होता ही है साथ ही मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी इसका कोई विपरित असर नहीं पड़ता।

धूपबत्ती में आयुर्वेदिक औषधी और घी का उपयोग

नगर निगम की लालटिपारा गौशाला में बनाई जा रही धूपबत्ती में गाय का गोबर, लाल चंदन, नागरमोथा, जटामासी, कपूर काचरी, गौमूत्र और देशी घी डाला जाता है। इनको मिलाने के बाद इसे आकार देकर सूखने के लिए रखा जाता है।

गौनाइल ऐसे हो रही तैयार

गौनाइल बनाने के लिए गाय और बछियाओं का गौमूत्र एकत्रित किया जाता है, इसके बाद इसमें चीड़ का तेल और नीम मिलाया जाता है। इससे जहां भी पोछा लगाया जाता है वहां के कीटाणु खत्म हो जाते हैं।

सुगंधित व केमिकल रहित मच्छर भगाने वाली धूप

गोबर, गौमूत्र में जामारोजा, तुलसी, नीमगिरी, चीड़ का तेल, कपूर तेल, नीम तेल, नागरमोथा, मैंदा लकड़ी और रोहतक लकड़ी को मिलकर धूपबत्ती तैयार की जा रही है। बताया जाता है कि इसके जलाने से घर में सुगंध तो रहती ही है साथ ही मच्छर भी भाग जाते हैं।

कैचुआ खाद भी हो रही तैयार

गाय के गोबर से गौशाला में कैचुआ खाद भी तैयार की जा रही है, इस खाद को उद्यानों और किसानों को दिया जाएगा। गाय के गोबर को एकत्रित कर उसके स्ट्रक्चर बनाए गए हैं इन पर समय-समय पर पानी का छिड़काव किया जाता है। जब यह सूख जाता है तो इसे छान कर किसानों को जैविक खाद बेचने के लिए तैयार किया जा रहा है।

ताजे गोबर से बन रही गोबर गैस

गाय के ताजे गोबर से प्रदेश के सबसे बड़े गोबर गैस प्लांट से गैस तैयार हो रही है, इस गैस से गौशाला में कार्य करने वाले कर्मचारियों एवं गौशाला का भ्रमण करने के लिए आने वाले करीब 200 लोगों का भोजन तैयार होता है। वहीं इससे निकलने वाले गोबर को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

निगम आयुक्त विनोद शर्मा कहते हैं-

जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए गोबर गैस प्लांट और कैचुआ खाद को किसानों में बेचा जाता है। साथ ही गौनाइन का भी उत्पादन शुरू हो गया है जल्द ही इसे बड़े स्तर पर करने के लिए गौशाला में ही बाटलिंग प्लांट लगाया जाएगा। वहीं मार्केट में जल्द ही धूपबत्ती भी ला रहे हैं।

फैक्ट फाइल

  • वर्ष 2017-18 में किसानों को गौशाला से 2.5 लाख रुपये की खाद बेची गई।
  •  होली पर करीब 42 हजार रुपये के कण्डे बेचे गए, साथ ही श्मशान में भी अभी तक करीब 30 शवों का लकड़ी विहीन कण्डों से दाह संस्कार किया गया।
  • 40 हजार की अभी तक गौनाइल बिक चुकी है।
  • अभी तक करीब 10 हजार रुपये की धूपबत्ती बनायी जा चुकी है। इसे जल्द ही मार्केट में लाया जाएगा।

किसान भाई इन तरीकों से बचा सकते है ट्रैक्टर का डीजल…

मंहगाई की इस मार में प्रतिदिन रोजमर्रा की चीजें मंहगी होती जा रही है. मंहगाई की मार से कोई भी तबका बचा नहीं है. डीजल तथा पेट्रोल के दाम भी आसमान छू रहे हैं. कृषि कर्यो में खनिज तेल की खपत बहुत तेजी से हो रही है. ऐसे में किसान भाइयों के लिए भी मुनाफ़ा मिलना बड़ा मुश्किल हो जाता है.

आज हम आपको बताएंगे कि डीजल की खपत को कम करने के लिए वो कौन से प्रमुख बिंदु है, जिनपर अगर आप ध्यान दे तो आप डीजल की खपत को कम कर सकतें है…

1- किसान भाई जब भी ट्रैक्टर खरीदतें है, तो उसके साथ आपको एक निर्देशन पुस्तिका मिलती है. मशीन के उपयोग से पहले आप इस पुस्तिका को एक बार ध्यान से जरूर पढ़ लें और जो निर्देश पुस्तिका में दिए गए, आप उसी के अनुसार मशीन का उपयोग करें.

2- जब आप इंजन को चालू करते है तो अगर टैपित का शोर ज्यादा सुनाई दे रहा है तो आप समझ जाइए इंजन में कम हवा जा रही है, और अगर इंजन में हवा कम मात्रा में जा रही है तो इससे डीजल की खपत बढ़ जाती है. इससे निपटने के लिए आपको टैपित को दोबारा से बंधवाना चाहिए.

3- अगर ट्रैक्टर के इंजन से निकले धुंए का रंग काला ज्यादा है तो यह भी एक कारण है कि डीजल की खपत ज्यादा हो रही है. इसलिए 600 घंटे तक ट्रैक्टर चलाने के बाद एक बार आप इंजेक्टर की जाँच करवाइए और उसे फिर से बंधवाइए.

4- एक बार जब आपने इंजेक्शन पम्प और इंजेक्टर को भी बढ़िया रूप से रखा है, उसके बाद भी काला धुआं लगातार निकलता है तो आप समझ लीजिये यह इंजन पर पड़ रहे बोझ की निशानी है. किसान भाइयों ट्रैक्टर से लेने वाले काम के बोझ को उतना ही रखे जितना उसकी क्षमता है, अन्यथा भार ज्यादा पड़ने पर डीजल की खपत तो ज्यादा होगी है.

5- अगर इंजन ठंडा है और आप उससे काम कर रहें है तो उसके पुर्जों में ज्यादा घिसावट होती है और डीजल की खपत भी जयादा मात्रा में हीनी शुरू हो जाती है. इसलिए जब भी आप काम करें इंजन को गर्म होने का समय होने दें.

6- डीजल की जयादा खपत का एक कारण ट्रैक्टर की पहियों की हवा भी हो सकती है, इसलिए निर्देश पुस्तिका में पहियों की हवा का जो दाब बताया गया है उसी अनुसार हवा को कायम रखे.

किसान भाइयों ये वो बिंदु है जिनपर अगर आप अमल करें तो निश्चित तौर पर डीजल की खपत को काफी हद तक कम कर सकतें है.

इस जानकारी को बाक़ी लोगों के साथ शेयर करें, जिससे खनिज तेल की खपत को कम करके मुनाफे को बढाया जा सके.

सरकारी नौकरी में नहीं लगा मन तो शुरू किया ये काम

आज के दौर में युवाओं को खेतों में काम करना अच्छा नहीं लगता और हर कोई नौकरी करना चाहता है। वहीं कुछ शख्स ऐसे भी हैं जो नौकरी छोड़ खेती की ओर लौट रहे हैं या इससे जुड़ा बिजनेस शुरू कर रहे हैं।

गुजरात के जूनागढ़ के रहने वाले ऐसे ही एक शख्स हैं तुलसीदास लुनागरिया जिन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ अपना खुद का बिजनेस शुरू किया और सिर्फ 6 साल में वो करोड़पति बन गए। इतना ही इस शख्स ने एक नहीं बल्कि चार बिजनेस की शुरुआत की। आइए जानते हैं इस शख्स ने कैसे की शुरुआत…

नौकरी छोड़कर शुरू किया बिजनेस

तुलसीदास लुनागरिया ने बातचीत में बताया कि जूनागढ़ के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर से एग्रीकल्चरल साइंस में ग्रैजुएशन करने के बाद उन्होंने नौकरी की तैयारी की। इसके बाद उन्हें ग्रामीण बैंक में नौकरी लगी, जो सरकारी नौकरी थी।

उनका कहना है कि नौकरी के दौरान उनको काम में मन नहीं लगा। उन्हें महसूस हुआ कि वो बिना महत्वाकांक्षा और चुनौती के एक रूटिव वर्क कर रहे हैं। वो खुद के एग्रीवेंचर की शुरुआत करने का सपना देखने लगे। इसलिए 4 महीने बाद ही उन्होंने नौकरी छोड़ दी और अपना खुद का बिजनेस शुरू किया।

एक-दो नहीं 4 बिजनेस किया शुरू

नौकरी छोड़ने के बाद तुलसीदास को एग्री सेंटर एंड एग्री बिजनेस स्कीम के बारे में पता चला। उन्होंने एसीएंडएबीसी के दो महीने के कोर्स में दाखिला लिया और अहमदाबाद में इंटरनेशनल स्कूल ऑफ पब्लिक लीडरशिप (आईएसपीएल) से ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने मार्केटिंग, अकाउंटिंग और डीपीआर बनाना सीखा। इस दौरान उन्होंने एग्री बिजनेस से एक्सपर्ट्स से मिलने-सुनने का मौका मिला।

ट्रेनिंग खत्म होने के बाद उन्होंने चार बिजनेस की शुरुआत की। कितना है कंपनियों का टर्नओवर कॉटन सीड्स ऑयल एक्सप्लोरेशन और कॉटन सीड्स केक बनाने वाली कंपनी अविरत कॉटन इंडस्ट्रीज का सालाना टर्नओवर 60 करोड़ रुपए है। एडवेंता एक्सपोट प्राइवेट लिमिटेड वाटर सॉल्यूएबल फर्टिलाइजर, प्लांट ग्रोथ प्रोमोटर औऱ स्वाइल कंडिशनर जैसे पोटैसियम ह्यूमेट, फूलविक एसिड्स का देश भर में सप्लाई करती है। साथ ही एग्रो कमोडिटीज जैसे रॉ कॉटन बेल्स, मसाले, फल और सब्जी का एक्सपोर्ट करती है।

कंपनी का सालाना टर्नओवर 2 करोड़ रुपए है। इसके अलावा रेनो एग्री-जेनेटिक्स प्राइवेट लिमिटेड का टर्नओवर 5 करोड़ और विमैक्स कॉर्प साइंस लिमिटेड का टर्नओवर 28 करोड़ रुपए है। चार कंपनियों का कुल टर्नओवर 95 करोड़ रुपए है। आगे भी पढ़ें

8 राज्यों में फैला है बिजनेस

तुलसीदास का कहना है कि उनका बिजनेस देश के 8 राज्यों में फैला है। यूपी, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में उनके ग्राहक हैं। विमैक्स कॉर्प साइंस एग्रोकेमिलकल्स की मैन्युफैक्चरिंग और मार्केटिंग करती है।

एग्रो केमिकल्स में इंसेक्टिसाइड्स, फंगीसाइड्स, विडीसाइड्स, प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर्स और माइक्रो नूट्रीएंट्स के साथ ऑर्गेनिक पेस्टिसाइट्स बनाती है। 120 लोगों को दे रखा है रोजगार कमाई के साथ वो लोगों को रोजगार भी उपलब्ध करा रहे हैं। उनकी कंपनी में 120 कर्मचारी काम करते हैं। उन्होंने हरके साल एक लाख किसानों तक पहुंच बनाने का लक्ष्य बनाया है जिसके लिए वो प्रयासरत हैं।

5 करोड़ रु है सालाना इनकम

तुलसीदास बताते हैं कि चारों बिजनेस से उनको अच्छी कमाई हो जाती है। वो करीब 5 करोड़ रुपए सालाना इनकम कर लेते हैं। प्रोडक्ट खरीदने वाले किसानों को वो खेती के बारे में ज्ञान भी देते हैं। कब उस फसल को पानी देना है, कब नूट्रीएंट्स देने हैं और पेस्टिसाइड्स का छिड़काव करना है। वो कहते हैं कि उनके इस सर्विस से किसान खुश हैं।

बिना जुताई खेती करने का तरीका इस किसान से सीखें

खेती में लागत लगातार बढ़ती जा रही है, ऐसे में होशंगाबाद के किसान राजू टाइटस ने बिना रासायनिक खाद के खेती करने की तकनीक इजाद कर खेती को लाभ का धंधा बनाने की ओर कदम बढ़ाया है। टाइटस ने इसे जंगली खेती नाम दिया है।

वे बताते हैं कि जंगली खेती स्वत: ही होती है। इसमें खेत की जुताई की आवश्यकता नहीं होती। राजू 12 एकड़ जमीन में 30 साल से जंगली खेती कर रहे हैं।राजू ने बताया, वह सिक्योरिटी पेपर मिल में जॉब करते थे। जापानी कृषि वैज्ञानिक फुकुओकाजी की किताब में बिना निदाई-गुड़ाई के खेती का जिक्र था, इसके बाद उन्होंने जंगली खेती शुरू की।

कई किसान लेते हैं सलाह

राजू के अनुसार उनके पास स्थानीय और अन्य राज्यों के किसान इस खेती के टिप्स लेने के लिए संपर्क करते हैं। फिलहाल पंजाब और आंध्रप्रदेश के दो किसान बड़े स्तर पर इस खेती को कर रहे हैं। इन्होंने राजू टाइटस से ही इसे सीखा है।

जंगली खेती के फायदे

  • इस प्रकार की खेती में लागत ना के बराबर होती है, क्योंकि जुताई व रासायनिक खाद का उपायोग नहीं होता।
  • खरपतवार को नष्ट करने की जरूरत नहीं होती।
  • परंपरागत खेती से कम पानी की जरूरत होती है।
  • उपज जैविक होने से अन्य उपज से अधिक दाम मिलते हैं।
  • फलदार पौधों के साथ यह खेती आसानी से की जाती है।

ऐसे होती है यह खेती

72 वर्षीय राजू जंगली खेती में सीड बॉल का उपयोग करते हैं। सीड बॉल(Seed Ball) बनाने के लिए क्ले मिट्टी (चिकनी मिट्टी) लेते हैं, जो तालाब या नदी नालों के किनारे पर आसानी से उपलब्ध हो जाती है। यह बीज के लिए खाद का काम करती है। इसे बारीक कर पाउडर के रूप में पीसकर बीज पर लपेटा जाता है।

 

इस दौरान बीज पर मशीन से पानी का छिड़काव करते हुए मिला लें, जिससे बीज के ऊपर मिट्टी की परत चढ़ जाती है। फिर इसे बारिश की शुरुआत में एक पानी गिरने पर जैसे ही खेत में हरियाली आ जाए इन सीड बॉल को खेत में फेंक दिया जाता है।

इस दौरान खेत में जुताई नहीं करनी चाहिए, चूंकि क्ले मिट्टी उपजाऊ होती है, इसलिए खाद की भी आवश्यकता नहीं होती। यह सीड बॉल ही फिर पौधों को रूप ले लेती हैं।

सोशल मीडिया पर सक्रिय

टाइटस सोशल मीडिया पर भी सक्रिय रहते हैं। उन्होंने यू-ट्यूब पर राजू टाइटस नाम से चैनल, ब्लॉग और फेसबुक अकाउंट बनाया है। जिसमें समय-समय पर खेती किसानी से जुड़े हुए अपडेट डालते रहते हैं।

बिहार के किसानों ने सूखे में ही ऊगा दी स्ट्रॉबेरी की खेती

बिहार का एक छोटा सा गांव है चिल्हाकी बीघा जो एक सूखा प्रभावित क्षेत्र के अंतर्गत आता है, यहां सिर्फ 60 घर हैं। यह गांव रबी, गेहूं, दालों, सरसों और सब्ज़ियों की खेती के लिए जाना जाता था। कृषि के अवसर होने के बावजूद गांव के लोग अक्सर पलायन कर जाते हैं क्योंकि उन्हें कृषि से कम ही लाभ मिल पाता है।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस गांव में, जो न तो हिल स्टेशन है और न ही यहाँ की ज़मीन ही उपजाऊ है परन्तु यहाँ के लोगों ने स्ट्रॉबेरीज की फसल उगाने में सफलता प्राप्त की है। इससे गांव वालों के न केवल लाभ की सीमा में बढ़ोत्तरी हुई है बल्कि इस अविकसित इलाक़े में रोजगार के अवसर में भी वृद्धि हुई है।

इस गांव में यह परिवर्तन बृजकिशोर मेहता के बेटे गुड्डू कुमार की वजह से आया जो हरियाणा के हिसार में एक फार्म में काम करता है। जब बृजकिशोर ने अपने बेटे से हिसार के उसके काम के बारे में पूछा तब उन्होंने स्ट्रॉबेरी की खेती के बारे में बताया।

इस गांव की जलवायु हिसार से काफ़ी मिलती जुलती थी। बृजकिशोर ने इसीलिए इसे लगाने के बारे में सोचा। जोखिम लेने से पूर्व बृजकिशोर औरंगाबाद के कृषि विज्ञान केंद्र गए। उन्होंने बृजकिशोर को समस्तीपुर जिले के सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी इन पूसा जाने की सलाह दी। वहां पर कृषि वैज्ञानिकों ने कहा कि बिहार में स्ट्रॉबेरी की खेती करना असंभव है। बृजकिशोर यह सुनकर दुःखी और निराश हो गए।

यह सब सुनकर भी बृजकिशोर जोख़िम लेने पर अड़े थे। वे अपने बेटे के साथ हिसार के किसानों से मिले। आख़िर में उन्होंने अपने फार्म में 2013 में स्ट्रॉबेरी के सात पौधे लगाए।

स्ट्रॉबेरी की खेती की सफलता को देखकर गांव के लोगों ने भी बृजकिशोर से सलाह लेकर इसकी खेती प्रारम्भ कर दी। यह बदलाव पूरे गांव और आस-पास के क्षेत्रों में पहुंच गया और इससे खेती में फायदा भी होने लगा। गांव के लोग जो पलायन कर बाहर चले गए थे वे भी वापस लौटने लगे।

विलेज स्क्वायर से बातचीत के दौरान एक स्थानीय निवासी प्रेमानंद कुमार कहते हैं, “ मैं बहुत खुश हूँ कि मैं इससे महीने में 7000 रुपये कमा लेता हूँ।”

आज ब्रजकिशोर और उनके तीन लड़के ने अपने काम के लिए 15 परमानेंट कर्मचारी और 30 टेंप्रेरी कर्मचारी रखे हुए हैं। वे अपने दो बीघा जमीन के अलावा लीज में 6 बीघा जमीन लेकर स्ट्रॉबेरी बो रहे हैं। पड़ोसी गांवों की बहुत सारी महिलाओं को भी इस गांव में नौकरी मिल रही है। उन्हें इसके लिए 1 दिन का ₹200 और खाना मिल रहा है।

कुछ किसान स्ट्रॉबेरी की खेती लगाने से जुड़े जोखिम से डरे हुए हैं क्योंकि इसमें शुरूआती इन्वेस्टमेंट और जमीन की तैयारी की काफी जरूरत होती है अगर यह अच्छे से हो गया तो बेहतर लाभ प्राप्त होता है। शुरुआत में इस गांव में स्ट्रॉबेरी के वितरण को लेकर बड़ी चुनौती थी क्योंकि खरीददार विश्वास ही नहीं कर पाते थे कि यह बिहार में संभव है। पर जैसे-जैसे संख्या बढ़ी, व्यापारियों ने खरीदने से मना कर दिया।

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इस स्थिति को देखते हुए किसानों कीमत घटाकर स्ट्रॉबेरी बेचने लगे। वह ₹200 और ₹300 प्रति किलो की दर से होलसेल व्यापारियों को बेचते थे। आखिर में बहुत संघर्ष के बाद व्यापारियों ने गांव वालों के लिए मदद का हाथ बढ़ाया। कोलकाता से 10 व्यापारियों ने जो होलसेल फ्रूट मार्केट से आते थे वह सीधे चिल्हाकी बीघा के खेतों से ताजे स्ट्रोबेरी रोजाना ले जाते थे।

इस गांव में और आस-पास के क्षेत्रों में स्ट्रॉबेरी की खेती की डिमांड बढ़ने लगी। इससे गांव वालों को बहुत फायदा पहुंचने लगा। यहां के किसान कम समय में एक बीघे से 2.5 से 3 लाख तक कमा लेते थे। इस खेती का कांसेप्ट कृषि के किसी भी रिसर्च पेपर में नहीं मिलता था। वहां के कृषि विज्ञान केंद्र ने चिल्हाकी बीघा गांव के कुछ किसानों के स्ट्रॉबेरी की खेती के मॉडल को लेकर ट्रेनिंग की शुरुआत की। वे खेती की प्लानिंग और खेती से जुड़ी हर चीज में किसानों की हर संभव मदद करने लगे।

अंग्रेजों को सब्जी की खेती सिखा रहा कुरुक्षेत्र का किसान

शाहबाद के गांव डाडलू निवासी हरबीर सिंह ने रोजगार पाने की खातिर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से एमए की डिग्री हासिल की। इस नौजवान का कृषि से कोई लम्बा चौड़ा नाता भी नहीं था।

महज 2 कनाल की भूमि वाले इस नौजवान के सिर पर एकाएक सब्जी की खेती करने का एक ऐसा जुनून सवार हुआ कि आज हरबीर सिंह अपने आपको एक प्रगतिशील किसान के रूप में स्थापित कर चुका है। किसान हरबीर सिंह अब अंग्रेजों को सब्जी की खेती करने के गुर सिखा रहा है।

नर्सरी फार्म हाउस पर कृषि विश्वविद्यालयों व कृषि संस्थानों से विद्यार्थी ट्रेनिंग लेने के लिए पहुंचते हैं। इतना ही नहीं हरबीर सिंह कृषि विश्वविद्यालयों व संस्थानों में बतौर प्रवक्ता के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। गांव डाडलू में हरबीर सिंह ने वर्ष 2005 में 2 कनाल क्षेत्र में सब्जियों की नर्सरी लगाने का प्रयास शुरू किया।

उसने धीरे-धीरे 2 कनाल से आज 14 एकड़ भूमि पर सब्जियों की नर्सरी को स्थापित किया। उनकी नर्सरी की पौध इतनी उत्तम है कि लगभग 8 हजार से ज्यादा किसान सब्जी फार्म हाउस से जुड़े हैं और सब्जियों की पौध भी खरीदते हैं। इतना ही नहीं हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, राजस्थान, उत्तराखंड, बिहार से किसान उनकी पौध खरीदने के लिए पहुंचते हैं। पिछले 2 वर्षों से किसान हरबीर सिंह की पौध की मांग इटली जैसे देशों में भी की जा रही है।

150 तरह के बीजों का प्रतिवर्ष ट्रायल

प्रगतिशील किसान हरबीर सिंह ने बताया कि इस नर्सरी में टपका व फव्वारा सिंचाई तकनीकी को अपनाकर हरी मिर्च, शिमला मिर्च, टमाटर, गोभी, प्याज, बैंगन जैसी सब्जियों के साथ-साथ पपीते के फल की पौध भी तैयार की जा रही है।

इस नर्सरी में करीब 200 लोगों को रोजगार के अवसर भी मुहैया करवाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि लगभग 2 एकड़ जमीन पर 150 से ज्यादा किस्मों के विभिन्न मल्टीनेशनल कम्पनियों के बीज ट्रायल के तौर पर प्रतिवर्ष लगा रहे हैं।

विदेशी सीख रहे हैं खेती के गुर

हरबीर सिंह के नर्सरी फार्म हाउस पर इंगलैंड, हालैंड, अफगानिस्तान, इस्राइल, बांग्लादेश, नेपाल आदि देशों के डेलिगेट‍्स पहुंचते हैं। इन सभी देशों के प्रतिनिधि सब्जी की खेती करने के गुर सीखते है। हरबीर सिंह के फार्म हाउस पर किसानों को अप टू डेट करने के लिए प्रतिवर्ष 4 से 5 राज्य व जिलास्तरीय सेमिनारों का आयोजन बागवानी विभाग के सहयोग से किया जा रहा है।

पेड़ों को एक से दूसरी जगह लगा इस शख्स ने खड़ा किया 2.5 करोड़ का बिजनेस

हर दिन तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण में हमारे अंदर अक्सर एक सवाल उठता है कि हम शहर के विकास को प्राथमिकता दें या पेड़ों को बचाएं? क्या विकास और अच्छा पर्यावरण एक साथ नहीं मिल सकता? हैदराबाद के रहने वाले रामचंद्र अप्पारी के पास इस बात का जवाब है। उनका कहना है कि किसी भी अपार्टमेंट या फ्लाइओवर को बनाने के लिए पेड़ को काटने के बजाय उसे बचाया जा सकता है।

38 साल के रामचंद्र ने ग्रीन मॉर्निंग हॉर्टीकल्चर सर्विस प्राइवेट लिमिटेड नाम से एक कंपनी बनाई है जो पेड़ों के ट्रांसलोकेशन यानि एक जगह से हटाकर दूसरी जगह पर लगाने का काम करती है। ट्री ट्रांसलोकेशन एक प्रक्रिया है जिसमें पेड़ को काटने के बजाय उसे जड़ से उखाड़ लिया जाता है और फिर दूसरी जगह पर उसे जैसे का तैसा लगा दिया जाता है।

पुराना है तरीका

ट्री ट्रांसलोकेशन कोई नया तरीका नहीं है। मिस्र में 2000 ईसा पूर्व भी ये तरीका अपनाया जाता था रामचंद्र बताते हैं कि जिन पेड़ों को स्थानांतरित करना होता है उन्हें पहले छांट दिया जाता है। पेड़ की लगभग 80 फीसदी पत्तियां, तना और बाकी हिस्सा काटा जाता है।

इसके बाद पेड़ के चारो ओर एक खाई को खोदा जाता है। इस खाई की गहराई पेड़ की उम्र के हिसाब से तय होती है। इसके बाद पेड़ की जड़ों में कुछ केमिकल्स लगाए जाते हैं और उन्हें टाट के बोरे में लपेटा जाता है। इसके बाद क्रेन से वह पेड़ उठाया जाता है और उसे ट्रेलर पर रख दिया जाता है यहां से वह उस जगह पहुंचाया जाता है जहां उसे दोबारा लगाना हो।

इसके बाद पेड़ को फिर से एक खाई में रखा जाता है और उसमें केमिकल्स डाले जाते हैं। रामचंद्र बताते हैं कि उनकी कंपनी 90 प्रजातियों के 5000 पेड़ों को स्थानांतरित कर चुकी है। हर प्रजाति के लिए उसके बचने के चांसेज बराबर नहीं होते। मुलायम लकड़ी वाले पेड़ जैसे बरगद, पीपल, गुलमोहर आदि के बचने का चांस 90 फीसदी होता है वहीं कठोर लकड़ी वाले पेड़ जैसे नीम, इमली और सागौन आदि के पेड़ों के बचने का चांस 60 से 70 फीसदी तक होता है।

कितना होती है कमाई

कंपनी सरकारी संस्थानों के लिए काम तो करती है अगर कोई व्यक्तिगत रूप से ये काम कराना चाहे तो कंपनी उसके लिए भी तैयार रहती है। व्यक्तिगत रूप से काम कराने वाले ज्यादातर लोग पेड़ों को अपने फार्महाउस में ट्रांसलोकेट कराते हैं। पेड़ को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने और लगाने में क्या खर्च आएगा ये पेड़ के साइज़ पर निर्भर करता है। रामचंद्र बताते हैं कि इसकी शुरुआत 6 हज़ार रुपये से होती है लेकिन हम एक पेड़ के लिए 1.5 लाख रुपये भी चार्ज करते हैं।

ऐसा नहीं है कि ये कंपनी सिर्फ हैदराबाद में ही काम करती है। पेड़ों को ट्रांसलोकेट करने का काम दिल्ली, बेंगलुरू, विशाखापट्टनम और देश के बाकी कई शहरों में भी होता है।2009 में शुरू हुई उनकी कंपनी का बिजनेस अब करोड़ों में हो गया है। पिछले साल कंपनी का टर्न ओवर 2.5 करोड़ रुपए था। रामचंद्र कहते हैं कि टर्नओवर पर 25% तक प्रॉफिट हो जाता है। उनका दावा है कि इस तरह का बिजनेस देश में शुरू करने वाले वो पहले शख्स हैं।

कैसे हुई शुरुआत

रामचंद्र ने एग्रीकल्चर में मास्टर डिग्री ली है और एग्री बिजनेस में एमबीए किया है लेकिन कैंपस प्लेसमेंट में उनकी नौकरी एक प्राइवेट बैंक में लग गई। इस कंपनी में उन्होंने 4 साल काम किया लेकिन उनका मन यहां नहीं लगा। आठ साल तक एग्रीकल्चर की पढ़ाई करने के बाद उससे अलग कुछ करना उन्हें समझ नहीं आ रहा था, इसीलिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी।

2009 में रामचंद्र हैदराबाद से विजयवाड़ा जा रहे थे जब उन्होंने देखा कि एक सड़क का चौड़ीकरण किया जा रहा है, जिसमें कई पेड़ों को काट दिया गया। यहीं से उनके मन में आया कि इन पेड़ों को कटने से बचाने का कोई तो तरीका होगा। इसके बाद उन्होंने ट्रांसलोकेशन के बारे में पढ़ा और अपने ऑस्ट्रेलिया के एक दोस्त से इसके बारे में समझा।

ऐसे आप भी खुद त्यार करें कीटनाशक,दोगनी होगी पैदावार

किसान परंपरागत खेती कर मौसम की मार झेल घाटा सह रहे हैं, लेकिन जिले के कुछ किसान खेती में नए-नए प्रयोग कर अलग किस्म की खाद व कीटनाशक तैयार करने के साथ पैदावार तो बढ़ा ही रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों की मदद से खेती कर खूब मुनाफा भी कमा रहे हैं।

ये किसान खुद के बनाए कीटनाशक अौर खाद खेती में प्रयोग कर रहे हैं और कई प्रदेशों में इसकी सप्लाई भी कर रहे हैं। इनमें से कोई किसान बैंक मैनेजर की नौकरी छोड़कर खेती कर रहा है तो कोई मजदूरी छोड़कर। यही नहीं, वे आस-पास के किसानों को उच्च तकनीक और सरकारी योजनाओं की मदद से खेती करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं

पॉली हाउस या शेड नेट लगाने के लिए एक बार अधिक लागत लगती है, लेकिन बाद में किसान इससे काफी कमाई कर सकते हैं। छोटी जोत वाले किसान भी प्रशिक्षण लेकर परंपरागत खेती छोड़ आधुनिक तरीके से खेती शुरू करे तो आय काफी बढ़ सकती है।

गरीब किसान जो तकनीकी खेती में आने के लिए रुपए नहीं होने से डरते हैं, वे एमपीयूएटी या कृषि विभाग में जाकर सरकार के अनुदान के बारे में जानकारी ले सकते हैं।

कोई बैंक मैनेजर की नौकरी छोड़ कृषि से कर रहा दोगुनी कमाई, कोई बेटे को एग्रीकल्चर में एमबीए करा तकनीकी खेती कर रहा 

3 कहानियां : जो न खुद खेती कर रहे हैं… नई तकनीक बताकर औरों को भी कर रहे प्रेरित

पिता तैयार करते हैं कीटनाशक, बेटा कृषि में एमबीए, अब करते हैं ऑनलाइन व्यापार

बुझड़ा गांव निवासी किसान वरदीचंद पटेल ने कुछ साल पहले एमपीयूएटी में प्रशिक्षण लेकर वर्मीकंपोस्ट खाद बनाना शुरू किया। खुद की खेती में प्रयोग किया व आसपास भी सप्लाई किया।

फिर एग्रीकल्चर में एमबीए बेटा भी इस व्यापार से जुड़ा और ऑनलाइन ऑर्डर लेना शुरू किया। आज एमपी, हिमाचल प्रदेश तक खाद सप्लाई करते हैं। दोनों अन्य किसानों को प्रशिक्षण भी देते हैं। दोनों की सालभर की कमाई 12 लाख से अधिक है।

वर्मीकंपोस्ट खाद

बैंक की नौकरी छोड़ शुरू की खास मिर्च की खेती, नौकरी से दोगुनी कमाई कर रहे

फतहनगर के नारायण सिंह उर्फ राजू पहले बैंक मैनेजर थे। नौकरी के दौरान भीलवाड़ा में एक किसान का मिर्च फार्म देखा। उस किसान ने सालभर में मिर्च बेचकर 13 लाख से अधिक कमाए थे।

इसके बाद राजू ने नौकरी छोड़कर किसान से प्रशिक्षण लिया। फिर गोपालसागर में 85 हजार प्रतिवर्ष किराए पर चार बीघा जमीन ली और मिर्च की खेती शुरू की। पिछले साल डेढ़ लाख लगाकर इजराइली पैटर्न पर मलचिंग स्टाइल में मिर्च लगाई। चार माह में ही साढ़े तीन लाख कमाए।

मजदूरी छोड़ शुरू की खीरे की खेती, पहली फसल में 6-7 लाख का मुनाफा

सलूंबर जैताणा के कांतीलाल मेहता व सराड़ा चावंड के शिवराम जोशी महाराष्ट्र में मजदूरी करते थे। वहीं हाइटेक खेती का प्रशिक्षण लिया और यहां खेती में संभावनाएं तलाशी। फिर मजदूरी छोड़ वापस उदयपुर आए और पॉली हाउस में खेती करने का प्रशिक्षण लिया।

पिछले साल दोनों ने अलग-अलग अनुदान प्राप्त कर 4 हजार वर्ग मीटर का पॉली हाउस लगाया व खीरा-ककड़ी की खेती शुरू की। पहली फसल में ही कांतीलाल को 6 लाख व शिवराम को 7 लाख का मुनाफा हुआ।

लोहे की यह गाय कूड़ा और घास फूस खाकर देगी जैविक खाद

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) बरेली के वैज्ञानिकों ने आईआईटी रुड़की के साथ मिलकर एक मेकेनिकल काउ बनाई है। भले ही यह गाय की तरह न दिखे पर गाय की तरह खरपतवार खाती है और बदले में जैविक खाद देती है।

मशीन की संरचना गाय के पेट से मेल खाती है इसलिए इसका नाम मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन रखा गया है। आईवीआरआई के पशु आनुवांशिकी विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रणवीर सिंह बताते हैं कि उन्होंने जयगोपाल वर्मीकल्चर तकनीक विकसित की थी। स्वदेशी प्रजाति के केंचुए जयगोपाल की मदद से जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया 40 दिन हो गई।

इससे भी तेजी से खाद बनाने के बारे में शोध जारी थी। इस दौरान मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन का विचार आया। इसको लेकर आईआईटी रुड़की की मदद ली गई। मशीन तैयार होने के बाद से अब तक इसमें लगातार बेहतर रिजल्ट के लिए काम जारी है। मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन न्यूनतम सात दिन में यह खाद तैयार कर देती है।

रोज 100 किलो खरपतवार डालेंगे तो अगले सात दिनों के बाद से रोजाना 100 किलो खाद मिलनी शुरू हो जाएगी। 30 दिन में तैयार होते हैं सूक्ष्मजीवी, 7 से 10 दिन में बन जाती है खाद मैकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन से खाद बनाने से पहले सूक्ष्मजीवी विकसित करने में 40 से 50 दिन लगते हैं। रोटरी ड्रम में सूक्ष्मजीवीयों के विकास के बाद इसमें खरपतवार, सब्जियों के कचरे डाले जा सकते हैं।

साथ ही बीच बीच में गोबर, कूड़े, कचरे और पत्तियों को मिक्स कर उसपर सूक्ष्मजीवीयों का घोल डाला जाता है। मशीन के रोटरी ड्रम को दिन में कुछ मिनट के लिए घुमाना पड़ता है ताकि कूड़ा-कचरा आक्सीजन और सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आ जाए। हर दिन 120 किलो कचरा डाला जा सकता है जिससे प्रतिदिन 100 किलो जैविक खाद निकाली जा सकती है।

गाय के पेट में मौजूद सूक्ष्मजीवी, मशीन में भी रहकर बनाते हैं खाद मैकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन का कांसेप्ट बिल्कुल गाय के पाचन तंत्र से मेल खाता है। जिस तरह गाय के पेट में कई भाग होते हैं उसी तरह से मैकेनिकल काऊ कंपोस्टिंग मशीन के रोटरी ड्रम में भी कई चरणों के खाद बनती है। बस मशीन को हर रोज कुछ मिनट के लिए घुमाना पड़ता है। यह मशीन एक कोण पर झुकी होती है।

आगे से खरपतवार डाली जाती है और पीछे से खाद निकलती है। डा. रणवीर बताते हैं कि दिन में एक बार मशीन को तीन मिनट के लिए घुमाते हैं सर्दियों में भी ड्रम का तापमान 70 डिग्री तक होता है रोटरी ड्रम में मौजूद माइक्रोआर्गनिज्म (जीवाणु और सूक्ष्मजीवी) की वजह से सर्दियों में भी जब तापमान छह डिग्री तक पहुंच जाता है, ड्रम के बीच के भाग का तापमान 70 डिग्री होता है।

डॉ. रणवीर कहते हैं कि यह सूक्ष्मजीवीयों की ओर से जारी अपघटन प्रक्रिया के कारण होता है। सबसे खास खाद की क्वालिटी है। इसमें कुल नाइट्रोजन 2.6 फीसदी और फासफोरस 6 ग्राम प्रति किलो होता है। अब किसानों को दी जा रही है ट्रेनिंग डॉ. रणवीर सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है।

जैविक खाद बनाने के लिए किसानों को सब्सिडी भी दी जा रही है। ऐसे में मेकेनिकल काउ कंपोस्टिंग मशीन काफी कारगर होगी। यह मशीन 2014 में तैयार की गई थी और तब से इस मशीन को और बेहतर बनाने पर शोध चन रहा है।

अब मशीन रोजाना 100 किलो खाद मिलती है वहीं किसान इसका छोटा प्रतिरुप भी बनवा सकते हैं। जैविक खाद को लेकर किसानों को लगातार जागरुक किया जा रहा है। किसान चाहे तो इसे समूह में मिलकर तैयार करा सकते हैं।