किसानो के लिए खुशखबरी ! इतने रुपये तक बढ़ सकता है गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य

गेहूं की एमएसपी पर सरकार जल्द फैसला ले सकती है। मिनिमम सपोर्ट प्राइस बढ़ाने के लिए सरकार ने तैयारियां शुरु कर दी हैं। जानकारी मिली है कि गेहूं के इंपोर्ट पर भी ड्यूटी बढ़ाने की योजना फिलहाल नहीं है।

इसी बीच किसानों के लिए खुशखबरी यह है, कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइसेज यानी सीएसीपी ने रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की सिफारिश की है। सीएसीपी ने गेहूं की एमएसपी 115 रुपये प्रति क्विंटल और दालों की एमएसपी 225 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाने की सिफारिश की है। कृषि मंत्रालय ने कैबिनेट को ये प्रस्ताव भेजा है।

कैबिनेट इस पर अंतिम फैसला लेगी। बता दें कि कैबिनेट की बैठक अगले बुधवार को होगी।अगर इस बार गेहूं के एमएसपी 115 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ती है तो गेहूं की समर्थन मूल्य पिछले साल (2016 -2017) के एमएसपी 1625 रुपये प्रति क्विंटल में जोड़ने पर 1625 +115 =1740 प्रति क्विंटल तक हो सकती है । देखने में यह भाव ठीक लग रहा है लेकिन आज के खेती खर्चे देखें तो उस हिसाब से कम है ।आज के खेतीबाड़ी खर्चों के हिसाब से गेहूं का भाव कम से कम 2300 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए ।

आपको बता दें इस महीने से गेहूं की बुआई शुरु हो जाएगी। इस बीच सरकार ने गेहूं पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने से भी इनकार किया है। कृषि मंत्रालय के मुताबिक फिलहाल ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है और इस तरह की मांगों पर बाद में विचार किया जाएगा।

कबाड़ से तैयार किया ट्रैक्टर, इंजन ऑटो का और टायर मारुति के

अाम तौर पर एक ट्रैक्टर एक लीटर डीजल में 12 किलोमीटर दौड़ता है। लेकिन हरियाणा के हिसार के मिस्त्री कृष्ण जांगड़ा ने ऐसा ट्रैक्टर तैयार किया है, जो एक लीटर में 22 किलोमीटर दौड़ता है। इसकी स्पीड 50 किलोमीटर प्रति घंटा है।

खास बात है कि इस छुटकू ट्रैक्टर की सामने आैर पीछे दोनों तरफ की स्पीड की एवरेज भी एक समान है। कृष्ण को इसे तैयार करने में डेढ़ महीना ही लगा।यह ट्रैक्टर 100 रुपये के खर्च में ही एक एकड़ गेहूं की कटाई कर देता है।

कृष्ण का मिनी ट्रैक्टर लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मात्र 45 हजार रुपए की लागत से तैयार इस मिनी ट्रैक्टर में पीटीओ सिस्टम सहित वे सभी खासियत हैं जो नामी कंपनियों के बड़े ट्रैक्टरों में होती है।

कबाड़ के सामान से बनाया जुगाड़

कृष्ण का कहना है कि मिनी ट्रैक्टर में इंजन पुराने ऑटो का लगाया गया है, वहीं टायर और स्टेयरिंग मारुति कार के हैं। अन्य स्पेयर पार्ट्स भी कबाड़ से ही एकत्रित किए गए हैं।

तीन घंटे में करेगा एक एकड़ फसल की कटाई

मिनी ट्रैक्टर मात्र तीन घंटे में एक एकड़ की गेहूं की फसल की कटाई कर देता है। तीन घंटे में केवल 100 रुपए का डीजल खर्च होता है। कृष्ण का कहना है कि बड़े ट्रैक्टरों से एक एकड़ की गेहूं की कटाई पर करीब 300 से 400 रुपए प्रति एकड़ के तेल का खर्च हो जाता है। छोटी रिपर मशीन भी कृष्ण ने खुद ही तैयार की है।

अधिक जानकारी के लिए वीडियो देखें :

अब पथरीली ज़मीन पर स्प्रींग कल्टीवेटर से करें खेत की जुताई

स्प्रींग टाइन कल्टीवेटर में फ्रेम, टाइन, रिवर्सिबल शावेल, खिंचने वाली प्रणाली, भारी कार्य करने वाला स्प्रिींग इत्यादि भाग होते हैं। स्प्रींग का कार्य टाइन को चलते समय कठोर-वस्तु एवं पत्थर से बचाना है। शावेल हीट ट्रिटेड स्टील का बना होता है।

इसका इस्तेमाल विशेष तोर पर उस भूमि में किया जाता है जहाँ पर बड़े पथर ज्यादा होते है ।
यहाँ पर आम कल्टीवेटर के इस्तमाल से कल्टीवेटर को बहुत नुकसान उठाना पड़ता है और उसके मुड़ने और टूटने का डर रहता है । वहीँ स्प्रिंग कल्टीवेटर में स्प्रिंग लगे होने के कारण ये टूटता नहीं है।

यह कल्टीवेटर माउन्टेड टाइप होता हैं जो ट्रैक्टर के हाइड्रोलिक प्रणाली द्वारा नियंत्रित होता है। यह यंत्र पशु चालित कल्टीवेटर (डोरा) की तुलना में 50 प्रतिशत मजदूरी की बचत तथा 30-35 प्रतिशत संचालन खर्च में बचत करती है।

उपयोग: इसका मुख्य कार्य सूखा या गीला नर्सरी बेड तैयार करने एवं चौड़ी कतार में निकाई-गुड़ाई करने तथा कादो करने में भी इसका प्रयोग करते हैं।

  • उत्पाद विवरण:
  • फ़्रेम: 75 x 40 मिमी
  • ट्यून्स संख्या : 11
  • ट्यून्स: 50 x 19 मिमी (जाली)
  • एंगल पिन: 50 x 6 मिमी
  • स्प्रिंग: 10 mm
  • लंबाई: 2458 मिमी:
  • पावर की आवश्यकता (एचपी): 50 – 55 एचपी
  • वजन : 260 किलोग्राम

 

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यह  कैसे काम करते  है उसके लिए वीडियो भी देखें

सेब की खेती से किसान ऐसे कमाते है सलाना 75 लाख रुपए

शोफियां ( कश्मीर)। सेब की खेती भारत के कई प्रांतों में होती है। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सेब की कई नस्लें पैदा की जाती हैं। इन प्रदेशों में उन्नत किस्म के सेब की खेती होती है। पर अगर अनुकूल वातावरण मिले तो यह सेब कहीं भी पैदा हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश में भी कई स्थानों पर किसान सेब पैदा करते हैं। तस्वीरों में देखें कश्मीर में सेब की खेती।

पूरी दुनिया मे साल 2013 में आठ करोड़ टन सेब पैदा हुआ था। इसमें से भी आधा तो केवल चीन में पैदा किया गया। अकेले अमरीका मे सेब का कारोबार क़रीब चार अरब डॉलर का माना जाता है।

सेब की विश्व में 7500 से अधिक नस्लें पाई जाती हैं। मतलब साफ है अगर एक दिन में एक सेब का स्वाद आप चखेंगे तो तकरीबन 25 साल खर्च हो जाएंगे। सेब में औसतन 10 बीज पाए जाते हैं।

आपको एक और जानकारी बताता हूं कि सेब का एक पेड़ चार-पांच साल की उम्र में फल देना शुरू कर देता है और लगभग सौ साल तक फल देता रहता है।

हिमाचल प्रदेश सेब की खेती के लिए पूरे विश्व में मशहूर है। यहां एक ऐसा गांव है जहां के एक-एक किसान सेब खेती से करीब 75 लाख रुपए सालाना कमाते हैं। सेब की खेती ने इस गांव को इतना विकसित कर दिया है कि यह कहा तो गांव जाता है पर यहां पर आलीशान मकानों की कमी नहीं है। यहां हर साल करीब 150 करोड़ रुपए का सेब पैदा होता है। अब आप को हम इसका नाम बताते हैं इसका नाम है मड़ावग गांव।

 

खेती से हर दिन कैसे कमाएं मुनाफा, ऑस्ट्रेलिया से लौटी इस महिला किसान से समझिए

वो अपने फेसबुक पेज पर इंट्रो में लिखती हैं ‘Farmer’, एक शब्‍द का यह इंट्रो ही उनके बारे में सबकुछ बता देता है। आज के जमाने में जब लोग खेती किसानी का मतलब भूलने लगे हैं उस समय में कोई सोशल मीडिया पर अपना इंट्रो इस तरह देता है तो वो काबिलेतारीफ है। ये कहानी है पूर्वी व्‍यास की, जिन्‍होंने 1999 में ऑस्‍ट्रेलिया में पढ़ाई पूरी करने के बाद वहां नौकरी की बजाय भारत में किसानी करने की सोची।

कैसे शुरू हुआ पूर्वी का सफर

पूर्वी ऑस्ट्रेलिया से 1999 में अपना पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद पूर्वी लौटकर भारत आ गईं और उन्होंने कुछ गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर स्थिरता और विकास के लिए काम करना शुरू कर दिया। 2002 में उन्हें प्रसिद्ध पर्यावरणविद् बीना अग्रवाल के साथ एक प्रोजेक्ट पर किसान समुदाय के लिए काम करने का पहला मौका मिला। इस रिसर्च के लिए वह दक्षिणी गुजरात के नेतरंग और देडियापाड़ा जैसे आदिवासी इलाकों में गईं।

इस काम ने पूर्वी के सोचने का पूरा तरीका ही बदल दिया, उन्‍होंने बताया क‍ि यहां रहने से मुझे समझ में आया कि शहर में रहने वाले लोगों की पर्यावरण के प्रति गंभीरता की बातों और उनके रहन-सहन में पर्यावरण को शामिल करने के बीच कितनी गहरी खाई है, और इसमें मैं भी शामिल हूं। और मैंने एक ऐसे तरीके की खोज करना शुरू कर दिया जिससे मैं उस तरीके को अपना सकूं जिसे गांव के ये लोग अपना रहे हैं।

घर से मिली प्रेरणा

वहां से लौटने के कुछ ही दिनों बाद उन्हें उनकी इस समस्या का समाधान मिल जाएगा। उनकी मां और दादी हमेशा से ही किचन गार्डन को महत्व देती थीं। वह रसोई के कामों में इस्तेमाल होने वाली जड़ी बूटियां और कुछ मसाले घर में ही उगाती थीं। अपने परिवार की इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पूर्वी की मां ने अहमदाबाद से 45 किलोमीटर दूर मतार गांव में अपने 5 एकड़ के खेत में कुछ सब्जियों और फलों की खेती करना शुरू कर दिया। वह हर सप्ताह के अंत में इस खेत में जाकर फसल की देखरेख करती थीं।

अहमदाबाद में जिस खुली और ताज़ी हवा के लिए पूर्वी तरसती थीं, मतार में उन्हें वही हवा अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। वह बाताती हैं कि यही वह चीज़ थी जिसे मैं शहर में खोज रही थी। यहीं से उन्होंने निर्णय लिया कि वो अपनी नौकरी छोड़कर पूरी तरह से किसान बन जाएंगी।

किसानी की दुनिया को नजदीक से देखा

किसानी की दुनिया में शुरुआती दिन पूर्वी के लिए बहुत कठिनाइयों भरे थे। उन्हें खेती-किसानी के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी। यहां तक कि जब वह खेती की बहुत आम सी बातें समझने की कोशिश करती थीं तो छोटे बच्चे तक उन पर हंसते थे लेकिन पूर्वी ने हार नहीं मानी और वह पूरी लगन के साथ खेती की बारीकियों को समझती रहीं।

वह कहती हैं समय के साथ मैंने खेती की कई तकनीकों के बारे में सीख लिया। मैंने यह भी जाना कि उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से फसल को कितना नुकसान होता है इसलिए मैंने जैविक खेती के नए तरीकों की खोज करना शुरू किया। साल 2002 में यह इतना ज़्यादा प्रचलित नहीं था।

ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत की

उन्हें समझ आ गया कि जैविक खेती करके पर्यावरणीय असंतुलन को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने यह भी निष्कर्ष निकाला कि यह किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए फायदेमंद है क्योंकि इसमें लागत लगभग नगण्य थी और उत्पादन बहुत स्वस्थ था।

उन्होंने अपने ही खेत में एक आत्मनिर्भर मॉडल बनाया, जहां खेती के उत्पादों से जीवन की सभी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता था। इसके बाद पूर्वी ने एक डेयरी फार्म की शुरुआत की, जो जैविक खेती के लिए बहुत ज़रूरी था। एक समय में उनके पास 15 भैंस, छह गाय, छह बकरियां थीं और उनकी डेरी से गांव में सबसे ज़्यादा दूध सप्लाई होता था।

किसानों को जैविक खेती से जोड़ा

पारंपरिक किसान जैविक खेती को तरजीह नहीं देते क्योंकि उनका मानना है कि सिर्फ आर्थिक रूप से मज़बूत किसान ही जैविक खेती कर सकते हैं। इसके अलावा जैविक खेती से वास्तविक लाभ हासिल करने के लिए कम से कम तीन साल का समय लगता है और एक छोटा किसान इतने समय तक सीमित आय में गुजारा नहीं कर सकता। इसके लिए पूर्वी ने दूसरा तरीका निकाला।

उन्होंने किसानों से जैविक खेती को करने के लिए कहने के बजाय उपभोक्ताओं को जागरूक करना शुरू किया कि वे जैविक उत्पादों को खरीदें। अपने परिवार की सहायता से पूर्वी ने 50 से 60 परिवारों को इस बात के लिए मना लिया कि वे अब जैविक उत्पादों को पैदा करने वालों से सीधे सामान खरीदें और तीन साल तक उनकी इस काम में मदद करें, जब तक वे सीधे तौर पर जैविक खेती से मुनाफा कमाने के ज़ोन में नहीं आ जाते। जब किसानों को इस बात का भरोसा हो गया कि उनकी फसल की उन्हें नियमित तौर पर कीमत मिलेगी तो वे भी जैविक खेती करने के लिए तैयार हो गए।

युवाओं को किया प्रेरित

खेतों में काम करते हुए पूर्वी हमेशा सोचती थीं कि कैसे शहरी युवाओं को अच्छी और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। उन्होंने पंडित दीन दयाल उपाध्याय पेट्रोलियम विश्वविद्यालय के लिबरल आर्ट के छात्रों को अपने खेत में एक दिन के कार्यक्रम के लिए बुलाया। उन छात्रों को यह कार्यक्रम इतना पसंद आया कि उन्होंने मांग की कि इस तरह की खेतों की यात्रा को उनके पाठ्यक्रम का नियमित हिस्सा बनाया जाए।

इसके बाद पूर्वी गांधी नगर और अहमदाबाद के कई कॉलेजों में जाकर गेस्ट फैकल्टी के तौर पर पढाने लगीं। आज, पूर्वी मुनाफे की खेती के मॉडल पर 2,000 से अधिक किसानों के साथ पांच से छः गांवों को बदलने की दिशा में काम कर रही हैं। ये किसान खाद्य मेला और गैर सरकारी संगठनों की सहायता से सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ते हैं और अच्छा मुनाफा कमाते हैं।

एलोवेरा की खेती का पूरा गणित समझने के लिए फोटो पर क्लिक करें

एलोवेरा की खेती से किसान ने साल भर में कमाए करोड़ों रुपए… ऐलोवेरा की खेती मतलब कमाई पक्की। ऐसी ख़बरें अक्सर सोशल साइट्स और व्हॉट्सऐप ग्रुप पर वायरल होती रहती हैं। ऐसा नहीं है कि एलोवेरा से किसान कमाई नहीं कर रहे हैं लेकिन इस खेती के लिए कुछ जानकारियां होना जरूरी हैं, वर्ना फायदे की जगह नुकसान हो सकता है।

गांव कनेक्शन जब एलोवेरा से संबंधित कोई ख़बर प्रकाशित करता है सैकड़ों किसान फोन और मैसेज कर उस बारे में जानकारी मांगते हैं, क्योंकि लोगों तक सही जानकारी नहीं पहुंच पाती है। पिछले कुछ वर्षों में एलोवेरा के प्रोडक्ट की संख्या तेजी से बढ़ी है।

कॉस्मेटिक, ब्यूटी प्रोडक्ट्स से लेकर खाने-पीने के हर्बल प्रोडक्ट और अब तो टेक्सटाइल इंडस्ट्री में इसकी मांग बढ़ी है। मांग को देखते हुए किसान इस खेती के फायदे समझाने और इसकी प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए लखनऊ के सीमैप में पिछले दिनों देशभर के युवाओं को ट्रेनिंग दी गई। इनमें एलोवेरा की खेती करने वाले बड़े किसान, इंजीनियरिंग और प्रबंधन की डिग्री पाने वाले युवा भी शामिल थे।

केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) में ट्रेनिंग देने वाले प्रमुख वैज्ञानिक सुदीप टंडन ने गांव कनेक्शन को बताया, जिस तरह से एलोवेरा की मांग बढ़ती जा रही है ये किसानों के लिए बहुत फायदे का सौदा है। इसकी खेती कर और इसके प्रोडक्ट बनाकर दोनों तरह से अच्छी कमाई की जा सकती है। लेकिन इसके लिए थोड़ी सवाधानियां बरतनी होंगी। किसानों को चाहिए कि वो कंपनियों से कंट्रैक्ट कर खेती करें और कोशिश करें की पत्तियों की जगह इसका पल्प बेंचे।’

सुदीप टंडन ने न सिर्फ इसकी पूरी प्रक्रिया गांव कनेक्शन के साथ साझा की बल्कि ऐसे किसानों से भी मिलवाया जो इसकी खेती कर मुनाफा कमा रहे हैं। करीब 25 वर्षों से गुजरात के राजकोट में एलोवेरा और दूसरी औषधीय फसलों की खेती कर रहे हरसुख भाई पटेल (60 वर्ष ) बताते हैं, “एलोवेरा की एक एकड़ खेती से आसानी से 5- 7 लाख रुपए कमाए जा सकते हैं। वर्ष 2002 में गुजरात में इसकी बड़े पैमाने पर खेती हुई लेकिन खरीदार नहीं मिले। इसके बाद मैंने रिलायंस कंपनी सेकरार किया।

शुरू में उन्हें पत्तियां बेचीं लेकिन बाद में पल्प बेचने लगा। आजकल मेरा रामदेव की पतंजलि से करार है और रोजाना 5000 किलो पल्प का आर्डर है। इसलिए मैं दूसरी जगहों पर भी इसकी संभावनाएं तलाश रहा हूं। वो आगे बताते है , ‘किसान अगर थोड़ा जागरूक हो तो पत्तियों की जगह उसका पल्प निकालकर बेचें। पत्तियां जहां 5-7 रुपए प्रति किलो में बिकती है वहीं पल्प 20-30 रुपए में जाता है।

इंजीनियरिंग के बाद कई वर्षों तक आईटी क्षेत्र की बड़ी कंपनी में काम कर चुकीं बेंगलुरु की रहने वाली आंचल जिंदल एलोवेरा की प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए सीमैप में चार दिन की विशेष ट्रेनिंग करने आईं थीं, गांव कनेकशन से बात करते हुए वो बताती हैं, ऐलोवेरा जादुई पौधा है। इसके कारोबार में बहुत संभावनाएं हैं, क्योंकि आजकल हर चीज़ में इसका उपयोग हो रहा है। अब मैं यूपी के बरेली में शिफ्ट हो गई हूं और कोशिश कर रही हूं कि एलोवेरा का उद्योग लगाऊं।

आंचल की तरह ही महाराष्ट्र के विदर्भ के रहने वाले आदर्श पाल अंतरिक्ष विज्ञान में पढ़ाई कर चुके हैं लेकिन आजकल वो खेती में फायदे का सौदा देख रहे हैं। वो बताते हैं, पैर जमीन पर होने चाहिए, मेरे पास खेती नहीं है इसलिए किसानों के साथ कांट्रैक्ट फार्मिंग (समझौता पर खेत लेकर खेती) करता हूं। पंतजलि के प्रोडक्ट की लोकप्रियता के बाद संभावनाएं अब और बढ़ गई हैं।

(साभार-गांव कनेक्शन)