ऐसे करे कीवी की खेती , 1 एकड़ से कमाए 8 लाख रुपये


कीवी का उत्पति स्थल चीन है, हालांकि कीवी को चीन के अलावा न्यूजीलैंड, इटली, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, पाकिस्तान, ईरान,नेपाल, चिली, स्पेन और भारत में भी उगाया जा रहा है.

भारत में इसकी खेती हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मेघालय , सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाया जा रहा है. इसकी खेती मैदानी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, केरल में भी की जाने लगी है. इस फल को 1000 मीटर से 2500 मीटर की समुन्द्र तल से ऊँचाई पर उगाया जा सकता है.

किस्में : इसकी प्रचलित किस्मों में अब्बोट, अलिसन, ब्रूनो, हेवर्ड और तोमुरी हैं.

कैसे उगायें :  कीवी का पौधा एक बेल होती है जो 9 मीटर तक बढ़ सकती है और यह 4 से 5 वर्ष के बाद फल देना शुरू कर देती है. फूल आने से फसल पकने तक की अवधि लगभग 100 दिन होती है. यह एकलिंगी पौधा होता है, इसलिए मादा कलमों के साथ नर की जड़ित कलमों को लगाया जाता है ताकि अच्छी तरीके से परागण हो सके और ज्यादा उत्पादन लिया जा सके.

आठ मादा बेलों के लिए एक नर बेल आवश्यक होती है. इसकी कलमों को बसंत ऋतु में लगाया जाता है. इसको अंगूर की तरह ही ढाँचे पर चढ़ाना चाहिए. इसकी कटाई-छटाई गर्मी और सर्दी दोनों मौसम में करनी चाहिए ताकि ज्यादा उत्पादन लिया जा सके. कीवी को पाले से बचाना बहुत जरुरी होता है. इसके फल नवम्बर महीने से पकने शुरू हो जाते हैं. कीवी को काफी पानी की आवश्यकता होती है इसलिए सिंचाई का उचित प्रबंध होना चाहिए.

500 ग्राम एनपीके मिश्रण प्रत्येक वर्ष प्रति बेल 5 साल की उम्र तक देना चाहिए उसके बाद 900 ग्राम नाईट्रोजन, 500 ग्राम फोस्फोरस और 900 ग्राम पोटाश को प्रति वर्ष प्रति बेल देना चाहिए. जड़ गलन से बचाने के लिए बाविस्टिन 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से पौधों में देना चाहिए. इसके फल औसतन 80 से 90 ग्राम के होते हैं.

इसके फलों को 0 डिग्री तापमान पर कोल्ड स्टोरेज में 4 से 6 महीने रखा जा सकता है पर सामान्य अवस्था में 8 हफ्ते तक फल ख़राब नहीं होता है. एक बेल से प्रत्येक वर्ष 40 से 60 किलो फल मिलते हैं. इसकी औसतन पैदावार 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर है. फलों को बाजार में भेजने से पहले 3 से 4 किलो की क्षमता वाले कार्ड बोर्ड में पैक करना चाहिए .बाजार के औसत भाव को देखते हुए 1 एकड़ बगीचे से लगभग 8 लाख रुपए प्रति वर्ष कमाये जा सकते हैं.

कलम मिलने के स्थान :

  • डॉ.वाई.एस. परमार यूनिवर्सिटी ऑफ़ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री, नौनी जिला सोलन हिमाचल प्रदेश,01792 252326, 252310
  • शेख गुलज़ार, श्री नगर, जम्मू कश्मीर , 9858986794

कीवी खाने के लाभ :

कीवी में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. यह अनिंद्रा रोग को दूर करता है और पाचन क्रिया को सही करता है. आयरन का भी बेहतरीन स्त्रोत है.

कृषि यंत्रों पर सब्सिडी चाहिए तो पढ़े ये लेख…

किसानों की आय को बढाने के लिए वैसे तो हर कोई प्रयास कर रहा है. फिर चाहे सरकारी तंत्र हो या फिर निजी क्षेत्र की कंपनिया हो सभी किसानों की आय को बढाने के लिए प्रयास कर रहे हैं. लेकिन किसानों की आय बढाने के लिए जरुरी है उनके पास आधुनिक कृषि यंत्रों का होना. जो कंपनियां कृषि के अच्छे कृषि यन्त्र बना रही है, वो थोड़े महंगे होने की वजह से किसान उनको आसानी से नहीं खरीद पाता है. क्योंकि जब भी किसान उस कृषि यंत्र को खरीदने की सोचता है तो उससे पहले अपनी जेब देखता है.

लेकिन इन बड़ी कृषि मशीनों पर सरकार की और से अनुदान भी दिया जा रहा है, ताकि किसान अच्छे कृषि यंत्रों को आसानी से खरीद सके. लेकिन अधिकतर किसान इससे अनभिज्ञ है. उसको पता ही नहीं है कि सरकार द्वारा कृषि यंत्रो पर कोई अनुदान भी दिया जा रहा है या नहीं. और जिनको पता है वो किसान यह नहीं जानते की उनको किससे संपर्क करना है. बहरहाल इसके दो तरीके है जिससे किसानों को कृषि मशीनरी पर अनुदान की पूरी जानकारी उपलब्ध हो सकती है.

सरकारी तरीका :

यदि कोई किसान नया कृषि यन्त्र खरीदना चाहता है सबसे वो सबसे पहले तो यह सुनिश्चित करले कि उसको किस कंपनी का कृषि यन्त्र खरीदना है. उसके बाद किसान उस कृषि यंत्र पर अनुदान की जानकारी के लिए अपने जिले या ब्लाकस्तर के कृषि कार्यालय पर संपर्क करे. वहां से अनुदान की पूरी प्रक्रिया को समझे. उसके बाद ही उस कृषि यंत्र को ख़रीदे. यदि कोई भी कृषि अधिकारी जानकारी देने में जरा भी आनाकानी करता है तो इसके लिए जिलास्तर पर कृषि अधिकारीयों से मुलाकात कर किसान अपनी समस्या बता सकते है. किसान को कृषि यंत्रों के विषय में पूरी जानकारी जिला और ब्लाकस्तर कृषि कार्यालय पर आसानी से मिल जाएगी.

कृषि यंत्र डीलर द्वारा जानकारी :

नकारी:यदि किसान किसी भी यन्त्र को खरीदने की योजना बना रहा है. इसके लिए किसान को चाहिए की वो किसी अधिकृत कृषि यंत्र डीलर से ही ख़रीदे. इससे किसान को फायदा होगा. सबसे पहले सरकार द्वारा कृषि यंत्रों पर दी जाने वाली अनुदान राशी के विषय में किसान को सही जानकारी उस डीलर के पास से मिलेगी. दूसरा वह उत्पाद जो किसान खरीद रहा है. वह गुणवत्ता वाला होगा और उत्पाद की सही जानकारी के साथ लम्बे समय तक उसकी सर्विस की वारंटी भी मिलेगी.

सरकार द्वारा किन कृषि यंत्रों पर है सब्सिडी :

वैसे तो लगभग सभी कृषि यंत्रों पर सरकार द्वारा सब्सिडी दी जाती है. लेकिन यह राज्य सरकार पर भी निर्भर करता है कि वो किन कृषि यंत्रों पर सब्सिडी दे रही है. किसान सरकार द्वारा मैनुअल स्प्रेयर्स, पावर नैपसेक स्पेयर्स, मल्टीक्राप प्लांटर, सीडड्रिल, रोटावेटर, जीरोटिल मल्टीक्राप प्लांटर, पंपसेट, मल्टीक्राप थ्रेसर, रिज फैरो प्लांटर, ट्रैक्टर माऊंड स्पेयर्स, स्प्रिंकलर सेट, बखारी, एचडीपीई पाइप, पीवीसी पाइप, एचडीपीई लैमिनेटेड पाइप, बड़े तिरपाल, छोटा तिरपाल जैसे कृषि यंत्रों पर अनुदान पा सकते हैं।

सरकार द्वारा कितनी सब्सिडी दी जाती है :

सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी राज्य सरकारों पर निर्भर करती है. क्योंकि हर एक राज्य के कृषि विभाग की अलग योजना है जिसके हिसाब से अनुदान दिया जाता है. वैसे ज्यादातर राज्यों में 30 प्रतिशत से 50 प्रतिशत का अनुदान कृषि यंत्रों पर दिया जाता है.

इस किसान से सीखें 2 एकड़ में 30 फसलें उगाने का फार्मूला,एक साल में कमाता है 22 लाख

ऐसे में जब खेती घाटे का सौदा बनकर रह गई है, अगर कोई खेती से एक साल में 22 लाख कमाने का दावा करे तो आसानी से भरोसा नहीं होता, लेकिन यह सच है। कर्नाटक के बेंगलुरु में एक किसान हैं एच. सदानंद, जो ऐसा करके दिखा रहे हैं। उनके पास केवल 2.1 एकड़ या लगभग 5.2 बीघा जमीन है। मतलब जमीन के क्षेत्रफल के लिहाज से उनकी हैसियत एक सीमांत किसान की है, लेकिन वह इतनी जमीन में ही लगभग 30 तरह की फसलें उगाकर सालाना 22 लाख रुपये कमा रहे हैं।

मुनाफे का गणित

वह ऐसा कैसे कर पाते हैं? यह पूछने पर सदानंद कहते हैं, “मेरी पॉलिसी एकदम साफ है। मैं मानकर चलता हूं कि मुझे अपने फॉर्म से हर रोज, हर हफ्ते, हर महीने, हर तीन महीने, हर छह महीने और हर साल आमदनी होनी चाहिए। अपने इसी सूत्र के हिसाब से मैं तय करता हूं कि मुझे अपनी जमीन पर कौन सी खेती करनी है।“ सदानंद आगे कहते हैं, “इसके लिए मैं पॉली हाउस (पॉलिथीन से बना एक किस्म का ग्रीन हाउस) में फल, फूल, देशी-विदेशी सब्जियां उगाता हूं। साथ में गाय-भैसें, सुअर, कुत्ते, मुर्गियां और मछली भी पालता हूं।“

आम के आम गुठलियों के दाम

इस तरह सदानंद की रोजाना आमदनी मुर्गियों और गाय-भैंसों से मिलने वाले अंडे और दूध से होती है, वहीं उन्हें हर हफ्ते फूलों से, हर तीन महीने पर सब्जियों से और हर छह महीने पर फलों से कमाई होती है। लेकिन मुनाफा यहीं नहीं रुकता, मतलब सदानंद आम के आम और गुठलियों के दाम भी वसूलते हैं। वर्मी कंपोस्ट, गोबर और बीट से उन्हें लगभग फ्री में खाद मिल जाती है, साथ में गोबरगैस भी बनती है, इस तरह खेती पर लागत और कम हो जाती है। सदानंद कहते हैं, सबसे अहम बात यह है कि मुझे और मेरे परिवार को शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक भोजन मिलता है।

पहले नौकरी करते थे फिर बने किसान

सदानंद शुरू में 15 सालों तक एक प्राइवेट फैक्ट्री में काम करते रहे। वह कहते हैं, “मैंने देखा कि व्यापारी खेती की जमीन तो खरीदते थे, लेकिन उनकी रुचि खेती में बिल्कुल भी नहीं होती थी। वे केवल निवेश के नजरिए से जमीन में पैसे लगाते थे। वहीं मेरा मन नौकरी की जगह खेती में लगता था। कुछ समय मैंने नौकरी के साथ खेती की पर बाद में नौकरी छोड़कर पूरी तरह किसान बन गया। यह मेरे जीवन का सबसे अच्छा फैसला था।“

ढेरों फसल और नित नए प्रयोग

दरअसल सदानंद की इस कामयाबी का राज है बहुफसली तकनीक। वह आधे एकड़ में टमाटर और सुपारी की खेती करते हैं। टमाटर से उन्हें 2 लाख और सुपारी से 50 हजार की आमदनी होती है। सुपारी के साथ सदानंद ने अदरक उगाने का सफल प्रयोग किया और उनसे एक साल में 70 हजार रुपये कमाए।

पालते हैं गिरिराजा नस्ल की मुर्गियां

अपने फार्म पर सदानंद गिरिराजा नस्ल की 250 मुर्गियां भी पालते हैं। इन मुर्गियों की खासियत है कि इस नस्ल में रोगों से लड़ने की काफी क्षमता होती है। इसके अलावा ये खेतों से निकलने वाले कूड़े-करकट को भी खा जाती हैं। सदानंद मुर्गियों को हर तीसरे महीने बेचकर साल में एक लाख रुपये कमा लेते हैं। इन मुर्गियों से निकली बीट सुपारी के पेड़ों के लिए बेहतरीन खाद भी साबित होती है।

और भी अपना रखे हैं तरीके

इसी छोटे से फार्म पर सदानंद ने गाय-भैसें भी पाल रखी हैं, जिनसे रोजाना 80 से 100 लीटर दूध मिलता है। यहीं एक छोटा सा तालाब है जिसमें रोहू और कतला मछलियां पाली गई हैं। मछलियों को तो बेचा जाता ही है, साथ ही इस तालाब में उगने वाले जलीय पौधे गाय-भैसों के लिए चारे के तौर पर इस्तेमाल होते हैं। इस तालाब से निकलने वाली गंदगी भी बहुत अच्छी खाद होती है। इतना ही नहीं इस फार्म पर सदानंद रॉटवीलर और ग्रेट डेन नस्ल के कुत्ते भी पालते हैं। इन्हें बेचकर उन्हें सालाना 1.2 लाख मिल जाते हैं।

गुलाब और सब्जियों की जुगलबंदी

सदानंद तीन-चौथाई एकड़ में 2 हजार गुलाबों की कलमें लगाते हैं। इनसे हर साल उन्हें 4 लाख रुपये मिल जाते हैं। एक चौथाई एकड़ में सदानंद ने ग्रीनहाउस बना रखा है जिसमें वह छह महीने गुलाब की एक किस्म बटन रोज और बाकी के छह महीने शिमला मिर्च, ब्रॉकली व सलाद पत्ता लगाते हैं। बटन रोज का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि इसमें ज्यादा कांटे नहीं होते और ये ऊंचे दाम पर बिकते हैं। इसके अलावा खाली जगह पर कॉफी, नारियल, कटहल, पपीते, चीकू, और नींबू उगाए गए हैं।

टेक्नोलॉजी ने बनाई राह आसान

जब सदानंद से पूछा गया कि अपने फार्म पर वह 30 तरह की अलग-अलग खेती कैसे कर पाते हैं तो उन्होंने कहा, “तकनीक के इस्तेमाल से।“ वह कहते हैं, “इससे मेरा काम जल्दी और आसानी से हो जाता है, साथ ही ज्यादा लोगों की भी जरूरत नहीं पड़ती। मैं दूध निकालने वाली मशीन, पावर वीडर जैसे यंत्रों के अलावा टपक सिंचाई, स्प्रिंकलर, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग तकनीक का इस्तेमाल करता हूं। सब्जियों को ग्रीन हाउस में उगाता हूं जिससे फसलें तेज हवा, गर्मी व रोगों से बच पाती हैं।

पौधों की नमी बनी रहती है, जिससे कि उनसे मिलने वाली उपज की क्वॉलिटी अच्छी होती है। खुले में खेती करने की जगह ग्रीन हाउस में ज्यादा पैदावार मिलती है।“ ग्रीनहाउस में फसलें उगाने से पहले ही मैं खरीददारों से एग्रीमेंट कर लेता हूं, इसमें पहले से रेट तय कर लिए जाते हैं। सिंचाई बोरवेल से होती है, पानी को स्प्रिंकलर और टपक सिंचाई के जरिए फसलों तक पहुंचाया जाता है जिससे पानी की एक-एक बूंद का सदुपयोग होता है।

सरकार और बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से मिली मदद

अपनी इस अनूठी पहल में सदानंद को सरकार से भी मदद मिली है। उनका ग्रीन हाउस 7 लाख की लागत से बनकर तैयार हुआ, इसमें 3 लाख रुपये सरकारी सब्सिडी के तौर पर मिले हैं। सदानंद समय-समय पर बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से भी सलाह लेते रहते हैं। कृषि मंत्रालय सदानंद को कई बार सम्मानित भी कर चुका है। सदानंद की कामयाबी बताती है कि आज जरूरत है कि सही तकनीक और सूझबूझ से खेती की जाए। सदानंद देश के तमाम युवा और नई सोच वाले युवा किसानों के लिए एक सशक्त उदाहरण हैं।

देश में पहली बार उगेगा काला गेहूं ,दुगनी कीमत पर बिकेगा बाजार में

सात साल की रिसर्च के बाद नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नोलाॅजी इंस्टीट्यूट (एनएबीआई) मोहाली ने ब्लैक व्हीट का पेटेंट करा लिया है। नाम दिया है ‘नाबी एमजी)। काले, नीले और जामुनी रंग में मिलने वाली ये गेहूं आम गेहूं से कहीं ज्यादा पौष्टिक है।

ये कैंसर, डायबिटीज, तनाव, मोटापा और दिल की बीमारियों की रोकथाम में मददगार साबित होगी। रोजाना खा सकते हैं। देश में पहली दफा ये पंजाब में उगाई जाएगी। हालांकि ट्रायल के तौर पर किसानों के जरिए इसका 850 क्विंटल उत्पादन किया जा चुका है। किसानों को भी इसका आम गेहूं के मुकाबिले दोगुना दाम मिलेगा। मोहाली में 2010 से चल रही रिसर्च साइंटिस्ट डाॅ. मोनिका गर्ग के नेतृत्व में की गई है।

शरीर से फ्री रेडिकल्स बाहर करता है

ब्लैक व्हीट में एंथोसाइनिन नामक पिग्मेंट आम गेहूं से काफी ज्यादा होता है। आम गेहूं में जहां एंथोसाइनिन की मात्रा 5 से 15 पास प्रति मिलियन (पीपीएम) होती है, वहीं ब्लैक व्हीट में 40 से 140 पीपीएम पाई जाती है। एंथोसाइनिन ब्लू बेरी जैसे फलों की तरह सेहत लाभ प्रदान करता है। एंथोसाइनिन एक एंटीआॅक्सीडेंट का भी काम करता है। यह शरीर से फ्री रेडिकल्स निकालकर हार्ट, कैंसर, डायबिटीज, मोटापा और अन्य बीमारियों की रोकथाम करता है। इसमें जिंक की मात्रा भी अधिक है।

कंपनियों से होगा करार

एनएबीआई ने ब्लैक व्हीट की मार्केटिंग के लिए बैंकिंग और मिलंग समेत कई बड़ी कंपनियों से करार करने की कार्रवाई शुरू कर दी है। डॉ. मोनिका गर्ग ने बताया, इसे उगाने के इच्छुक किसानों के लिए एनएबीआई जल्द ही वेबसाइट लांच करेगी। इस वेबसाइट पर किसान अप्लाई कर सकेंगे, जिन्हें बीज व अन्य सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। किसानों की फसल भी एनएबीआई ही खरीदेगी।

ट्रायल पर 850 क्विंटल उगाई, किसानों को मिलेगा दोगुना रेट

टल उगाई, किसानों को मिलेगा दोगुना रेटएनएबीआई ने इसका उत्पादन गर्मी और सर्दी दोनों मौसम में किया है। सर्दी में यह फसल मोहाली के खेतों में उगाई गई, जबकि गर्मी में हिमाचल और केलोंग लाहौल स्पिति में। साइंटिस्ट डाॅ. मोनिका गर्ग ने बताया, इस साल विभिन्न किसानों के खेतों में 850 क्विंटल ब्लैक व्हीट उगाई है।

इसकी औसत उपज प्रति एकड़ 13 से 17 क्विंटल रही। सामान्य गेहूं की औसत उपज पंजाब में प्रति एकड़ करीब 18 से 20 क्विंटल है। किसानों को आम गेहूं मंडियों में बेचने पर न्यूनतम समर्थन मूल्य करीब 1625 रुपए प्रति क्विंटल मिलता है। जबकि ब्लैक व्हीट का रेट 3250 रुपए दिया गया है।

आवारा पशुओं को खेतों से दूर रखने के लिए अपनाएं यह 10 तरिके

भारत का हर एक किसान आवारा पशुओं के आतंक से परेशान हैं। हजारों रुपए की लागत और हड्डी तोड़ मेहनत से तैयार होती फसल को छुट्टा जानवर बर्बाद कर देते हैं, किसानों को सबसे अधिक नुकसान नीलगाय करती हैं। कई किसान रात-रात भर जागकर खेतों की रखवाली कर रहे हैं। इन छुट्टा जानवरों का असर खेती पर पड़ रहा है।

नीलगाय के आतंक से परेशान किसानों के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कई घरेलू और परंपरागत नुस्ख़े बताए हैं जिससे काफी कम कीमत में किसानों को ऐसे पशुओं से आजादी मिल सकती है। गोमूत्र, मट्ठा और लालमिर्च समेत कई घरेलू चीजों से तैयार हर्बल घोल इस दिशा में कारगर साबित हो रहा है।

हर्बल घोल की गंध से नीलगाय,गाय और दूसरे जानवर 20-30 दिन तक खेत के आसपास नहीं फटकते हैं। कृषि के जानकार, वैज्ञानिक और केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा संचालित किसान कॉल सेंटर (1800-180-1551) के किसान सलाहकार किसानों को इऩ देसी नुस्ख़ों को आजमाने की सलाह दे रहे हैं।

नीलगाय झुंड में रहती हैं तो जितना ये फसलों को खाकर नुकसान करती हैं उससे ज्यादा इनके पैरों से नुकसान पहुंचता है। सरसों और आलू के पौधे एक बार टूट गए तो निकलना मुश्किल हो जाता है।

परंपरागत तरीके किसानों को जरुर आज़माने चाहिए। हालांकि लंबे समय के लिए ये कारगर नहीं है क्योंकि ये (नीलगाय) बहुत चालाक जानवर हैं तो बाड़ लगवाना सबसे बेहतर रहता है।

नीलगाय,गाय रोकने के लिए इस तरह बनायें हर्बल घोल

  • नीलगाय को खेतों की ओर आने से रोकने के लिए 4 लीटर मट्ठे में आधा किलो छिला हुआ लहसुन पीसकर मिलाकर इसमें 500 ग्राम बालू डालें। इस घोल को पांच दिन बाद छिड़काव करें। इसकी गंध से करीब 20 दिन तक नीलगाय खेतों में नहीं आएगी। इसे 15 लीटर पानी के साथ भी प्रयोग किया जा सकता है।
  • बीस लीटर गोमूत्र, 5 किलोग्राम नीम की पत्ती, 2 किग्रा धतूरा, 2 किग्रा मदार की जड़, फल-फूल, 500 ग्राम तंबाकू की पत्ती, 250 ग्राम लहसुन, 150 लालमिर्च पाउडर को एक डिब्बे में भरकर वायुरोधी बनाकर धूप में 40 दिन के लिए रख दें। इसके बाद एकलीटर दवा 80 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करने से महीना भर तक नीलगाय फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाती है। इससे फसल की कीटों से भी रक्षा होती है
  • खेत के चारों ओर कंटीली तार, बांस की फंटियां या चमकीली बैंड से घेराबंदी करें।
  • खेत की मेड़ों के किनारे पेड़ जैसे करौंदा, जेट्रोफा, तुलसी, खस, जिरेनियम, मेंथा, एलेमन ग्रास, सिट्रोनेला, पामारोजा का रोपण भी नीलगाय से सुरक्षा देंगे।
  • खेत में आदमी के आकार का पुतला बनाकर खड़ा करने से रात में नीलगाय देखकर डर जाती हैं।
  • नीलगाय के गोबर का घोल बनाकर मेड़ से एक मीटर अन्दर फसलों पर छिड़काव करने से अस्थाई रूप से फसलों की सुरक्षा की जा सकती है।
  • एक लीटर पानी में एक ढक्कन फिनाइल के घोल के छिड़काव से फसलों को बचाया जा सकता है।
  • गधों की लीद, पोल्ट्री का कचरा, गोमूत्र, सड़ी सब्जियों की पत्तियों का घोल बनाकर फसलों पर छिड़काव करने से नीलगाय खेतों के पास नहीं फटकती।
  • देशी जीवनाशी मिश्रण बनाकर फसलों पर छिड़काव करने से नीलगाय दूर भागती हैं।
  • कई जगह खेत में रात के वक्त मिट्टी के तेल की डिबरी जलाने से नीलगाय नहीं आती है।

नौकरी छोड़ बंजर जमीन पर शुरू की कीवी की खेती , ऑनलाइन बिक्री से कमा रहे लाखों

हिमाचल के जिला सोलन के शिल्ली गांव में तैयार कीवी का स्वाद पूरे देश को लुभा रहा है। हिमाचल से एक्सपोर्ट क्वालिटी की कीवी तैयार कर देशभर में मिसाल बन रहे मनदीप वर्मा की करामात कई युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है।

खाने में लजीज और पाचन तंत्र समेत शारीरिक ऊर्जा देने वाले फल को अपनी सफलता का नया आधार बनाने वाले मनदीप एमबीए करने के बाद विप्रो कंपनी में मैनेजर पद पर कार्यरत थे।

नौकरी छोड़ बंजर जमीन पर कीवी की पैदावार में जुट गए। परिवार सदस्यों और बागवानी विशेषज्ञों के सहयोग से आज मनदीप वेबसाइट से देशभर में कीवी बेच रहे हैं।

14 लाख से बंजर जमीन पर तैयार किया बगीचा

उनकी पत्नी सुचेता वर्मा कंपनी सचिव हैं। साढ़े सात वर्ष पहले उन्होंने घर के पास बंजर जमीन पर बागवानी का विचार किया। इसके लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ी और गांव लौट आए। उनके पिता राजेंद्र वर्मा, माता राधा वर्मा ने कीवी की खेती में उनका पूरा सहयोग दिया।

सोलन के बागवानी विभाग और डा. यशवंत सिंह परमार यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों से बात करने के बाद उन्होंने विशेषज्ञों की सलाह पर मध्यपर्वतीय क्षेत्र में कीवी का बाग तैयार करने का मन बना लिया। उन्होंने 14 बीघा जमीन पर कीवी का बगीचा लगाया।

कीवी की उन्नत किस्में एलिसन और हैबर्ड के पौधे ही लगाए। करीब 14 लाख रुपये से बगीचा तैयार करने के बाद मनदीप ने वेबसाइट बनाई। मनदीप के मुताबिक बाग से उत्पाद सीधे उपभोक्ता तक पहुंचाने की उनकी कोशिश कारगर साबित हुई।

350 रुपये प्रति बॉक्स बिक रहा कीवी

कीवी की सप्लाई वेबसाइट पर ऑनलाइन बुकिंग के बाद की जाती है। कीवी ऑनलाइन हैदराबाद, बंगलूरू, दिल्ली, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में बेचा जा रहा है।

डिब्बे पर कब फल टूटा, कब डिब्बा पैक हुआ सारी डिटेल दी जा रही है। एक डिब्बे में एक किलो किवी पैक होती है और इसके दाम 350 रुपये प्रति बॉक्स है। जबकि सोलन में कीवी 150 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहा है।

हिमाचल में है कीवी की अपार संभावना

डा. वाईएस परमार यूनिवर्सिटी नौणी में कीवी पर दशकों से काम कर रहे विशेषज्ञ डा. विशाल राणा ने बताया कि शिल्ली गांव के मनदीप वर्मा कीवी की ऑनलाइन बिक्री कर रहे हैं। उनकी पैकिंग और ग्रेडिंग भी एक्सपोर्ट क्वालिटी की है।

उन्होंने कहा कि देश में कीवी की शुरुआत हिमाचल प्रदेश से हुई है। आज देश के कुल कीवी उत्पादन का 60 फीसदी कीवी अरुणाचल प्रदेश तैयार कर रहा है।

सिक्किम, मेघालय में भी कीवी की बागवानी की जा रही है। हिमाचल में कीवी उत्पादन की अपार संभावना है। सरकार कीवी को बढ़ावा देने के लिए 50 फीसदी सब्सिडी दे रही है। हिमाचल में अभी करीब 150 हेक्टेयर भूमि पर ही कीवी उगाई जा रही है।

वाह ! खेती से हर महीने कैसे कमाए जाएं लाखों रुपए, पूर्वांचल के इस किसान से सीखिए

खेती में लागत कम करे कोई कैसे लाखों रुपए कमा सकता है और खेती को फायदे का सौदा बना सकत है, पूर्वांचल के नागेंद्र पांडेय से सीखिए। अपने खेत, गाय-भैंस, गोबर और ज्ञान का उपयोग कर वो देश के चुनिंदा जैविक खेती और कंपोस्ट खाद बनाकर लाखों रुपए की कमाई करने वाले किसान और ट्रेनर बन गए हैं।

उत्तर प्रदेश के ज़िला महाराजगंज मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर अंजना गाँव के किसान नागेंद्र पाण्डेय ने न सिर्फ खेती की विधि में सुधार किया बल्कि आस-पास के कई परिवारों को रोज़गार भी उपलब्ध कराया।

नागेंद्र ने कृषि विषय में स्नातक किया और फिर नौकरी की तलाश शुरू कर दी। 15 साल तक उन्होंने एक अच्छी नौकरी ढूंढी लेकिन उनकी ये तलाश पूरी नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर खेती करना शुरू कर दिया। उन्हें पता था कि सिर्फ सामान्य तरीके से खेती करके इनती कम ज़मीन पर वो इतनी कमाई नहीं कर सकते, इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों न खेती में ही कुछ ऐसा किया जाए कि आमदनी भी अच्छी हो और खेती में नया प्रयोग भी हो।

उन्होंने देखा की अक्सर छोटे जोत के किसान खाद व रसायनों की किल्लत से दो चार हो रहे है। इसके बावजूद महंगी खादों का प्रयोग करने से भी किसानों को अपेक्षित उत्पादन व लाभ नही मिल पा रहा है। नागेंद्र ने इसका भी तोड़ निकाल लिया। उन्होंने फैसला लिया कि वह ज़मीन के कुछ हिस्से पर जैविक खाद तैयार करेंगे और बाकी बचे हिस्से पर जैविक तरीके से खेती करेंगे।

इस तरह की वर्मी कंपोस्ट बनाने की शुरुआत

नागेंद्र बताते हैं कि वर्मी खाद तैयार करने के लिए उन्हें केंचुओं की ज़रूरत थी। इसके लिए उन्होंने कृषि व उद्यान विभाग से संपर्क किया लेकिन उन्हें यहां से केंचुए नहीं मिल पाए। इसके बाद उनके एक दोस्त ने उन्हें लगभग 40-50 केंचुए दिए। नागेंद्र ने इन केचुओं को चारा खिलाने वाली नाद में गोबर व पत्तियों के बीच डाल दिया। 45 दिनों में इनसे लगभग 2 किलो केचुए तैयार हो गए। उन्होंने इसकी शुरुआत साल 2000 में की थी और अब वह 120 फीट जगह में वर्मी कम्पोस्ट तैयार कर रहे हैं। इसमें 750 कुंतल खाद तैयार होती है। इस खाद की पैकेजिंग और मार्केटिंग का काम भी यहीं से होता है। यहां मिलने वाली खाद की 25 किलो की बोरी की कीमत 200 रुपये होती है। इसके अलावा व किसानों को मुफ्त में केंचुआ भी उपलब्ध कराते हैं।

खाद की यूनिट से कई परिवारों को दिया रोजगार

नागेंद्र बताते हैं कि उनके यहां लगभग 35 लोग अलग-अलग काम कर रहे हैं। यहां लोग खाद की छंटाई, बिनाई, ढुलाई जैसे काम करते हैं। कई महिलाएं भी यहां पैकेजिंग का काम करती हैं। यहां इन्हें प्रतिदिन 150 रुपये मजदूरी दी जाती है। इस समय नागेंद्र पूर्वी उत्तर प्रदेश में सबसे बड़े वर्मी खाद उत्पादक हैं। वह महाराजगंज व गोरखपुर ज़िले में वर्मी खाद बनाने की तीन बड़ी यूनिट स्थापित कर चुके हैं।

करवाते हैं खाद की लैब टेस्टिंग

नागेंद्र बताते हैं कि उनके यहां बनाई जाने वाली खाद की यह खास बात है कि वह इसकी गुणवत्ता का पूरा ख्याल रखते हैं। वह समय समय पर खाद की गुणवत्ता की जांच कराने के लिए उसका लैब टेस्ट भी कराते रहते हैं। इस खाद में 1.8 प्रतिशत नाइट्रोजन, 2.5 प्रतिशत फास्फोरस और 3.23 प्रतिशत पोटाश पाया गया है। इसलिए इस खाद से पौधो की बढवार व उपज दोनों अच्छी होती है।

शहतूत की नर्सरी से अच्छी कमाई

वर्मी कम्पोस्ट के अलावा नागेन्द्र पाण्डेय एक एकड़ खेती में शहतूत की नर्सरी भी तैयार करते हैं जिसमें 10 लाख 50 हजार पौधे प्राप्त होते हैं। एस 1 (64) नाम की यह प्रजाति न केवल सामान्य प्रजातियों से अधिक पत्तियों का उत्पादन देती है बल्कि इसको रेशम कीट पालन के लिए सबसे अच्छा भी माना जा सकता है। इस नर्सरी को भी पूरी तरह से जैविक विधि से ही तैयार किया जाता है। यही कारण है कि यहां तैयार पौधे मध्य प्रदेश सरकार 2.5 रुपये प्रति पौधे की दर से खरीद लेती है। इस तरह नागेंद्र 6 महीने में सिर्फ शहतूत की नर्सरी से 26 लाख 25 हजार रुपये की कर लेते हैं। अगर लागत को निकाल दिया जाए तो भी 6 महीने में इनकी औसत आमदनी करीब 15 लाख रुपये हो जाती है।

वाटर हार्वेस्टिंग का नायाब तरीका

किसान नागेन्द्र पाण्डेय ने खेतों की सिंचाई में प्रयोग आने वाले पानी व वर्षा के पानी के लिए एक तालाब खुदवा रखा है। जिसमें खेत से सीधा पाइप लगाकर जोड़ा गया है। वहां से अतिरिक्त पानी पाइप के रास्ते गड्ढे में इकट्ठा हो जाता है। जिसका प्रयोग वह दोबारा वर्मी पिट की नमी बनाने व खेतों की सिंचाई के लिए करते हैं।

आधुनिक विधि से करते हैं खेती

बाकी फसलों में भी नागेन्द्र खेती की आधुनिक विधि का इस्तेमाल करते हैं। वह वह धान को श्री विधि रोपाई कर अधिक आमदनी प्राप्त करते हैं। वहीं गेहू की बुआई सीड ड्रिल से करते हैं जिससे लागत में कमी आती है। वह अपने खेतों में वर्मी खाद व वर्मी वास का ही इस्तेमाल करते हैं।

किस तरह बनता है वर्मीवास

वर्मीवास भी केंचुए से ही बनाया जाता है। इस विधि मेंं मटके में गोबर मिलाकर उसमें केंचुए डालकर उसे ऊपर टांगकर पानी डाल दिया जाता है। जिसमें इन केचुओं के हार्मोनस मिलकर बूंद-बूंद बाहर आता है। जो फसलों में छिड़काव के काम आता है। नागेन्द्र पाण्डेय स्थायी कृषि के लिए जो प्रयास कर रहे हैं उनके बारे में जानकर गोरखपुर जिले के कमिश्नर, उपनिदेशक कृषि, सीडीओ सहित तमाम लोग इनके युनिट का भ्रमण कर चुके है और इनके प्रयासों की सराहना भी की।

(वृहस्पति कुमार पाण्डेय के इनपुट के साथ)

News Source : Gaonconnection News

पशुओं में आस करवाने के बावजूद भी गर्भ ना ठहरना की समस्या के कारण और इलाज ।

जिस गाभिन में तीन बार आस करवाने के बावजूद भी गर्भ नहीं ठहरता, वह रिपीटर करार दी जाती है। इस समस्या को अक्सर रिपीट ब्रीडर भी कहा जाता है। यह समस्या आजकल बहुत ज्यादा आ रही है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे कि बच्चेदानी में गांठ आदि।

किसान भाई यह नहीं देखते कि आस करवाते समय ताप 22 दिन बाद है या समय से पहले है या बाद में। यदि 17-18वें दिन बोलती है तो बीमारी और है यदि 26-28वें दिन बोलती है तो बीमारी और है। क्या बीमारी मिली।

क्या वैटरनी डॉक्टर आया और टीका लगाकर चला गया, क्या उसने पूछा कि पिछले महीने कब ताप में आई थी। बहुत सारी ऐसी जानकारियां होती हैं जिनका किसान भाइयों को खुद रिकॉर्ड रखना चाहिए जैसे कि ताप में आने का समय, कितने दिन बाद ताप में आई आदि।

बाकी आपको शायद पता ही हो कि तारें सिर्फ शीशे की तरह बनी होनी चाहिए। यदि तारें घुसमैली हों या तारों में छेद हो तो पशु को कभी नए दूध नहीं करवाना चाहिए। बल्कि एक अच्छे माहिर डॉक्टर से बच्चेदानी की जांच करवाके दवाई भरवा देनी चाहिए।

इसके अलावा गाभिनों के बार बार गर्भपात के कुछ अन्य कारण जैसे :

  •  जनन अंगों में जमांदरू नुक्स
  •  कम शारीरिक भार
  •  शरीर में हारमोन का संतुलन बिगड़ जाना
  •  गर्म वातावरण
  •  आस करवाने का प्रबंध
  •  ताप के लक्षणों और आस करवाने के सही समय की कम जानकारी

इलाज :
इस तरह की समस्या के इलाज के लिए कुछ इलाज आपसे शेयर कर रहे हैं जो कि पशु पलन क व्यवसाय में काफी महत्तवपूर्ण हैं।

  •  पहली बात आप पशु को संतुलित डाइट ज़रूर दें। जब आप पशु को क्रॉस करवायें उससे 5 मिनट के अंदर अंदर 125 ग्राम रसौद जो कि पंसारी की दुकान या आयुर्वेदिक सामान वाली दुकान से मिल जाएगी उसे पशु को दें।
  •  यदि तारें साफ आ रही हैं तो एक होमियोपैथिक दवाई को सीरिंज से सीधे मुंह के द्वारा पशु को दिन में तीन टाइम देते रहें।

डेढ़ सौ रुपए का एक अमरूद बेचता है ये किसान,जाने इसके अमरुद में ऐसा क्या है खास

आपने कभी डेढ़ से दो किलो का एक बड़ा अमरूद देखा है ? बहुत कम लोग ऐसे होंगे जिन्होंने देखा होगा। आज हम आपको एक ऐसे ही किसान से मिलवाने जा रहे हैं जो अमरूद की खेती करते हैं और डेढ़ से दो किलो का एक अमरूद पैदा करते हैं, इस एक अमरूद को किसान 80 से 150 रुपए का बेचता है। हालांकि सभी फल इतने बड़े नहीं होते हैं।

मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के किसान सुभाष जैन कई फसलों की खेती करते हैं लेकिन अमरूद की खेती उन्हें दूसरे किसानों से एक अलग पहचान दिलाती है। सुभाष 25 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं, जिसमें से तीन एकड़ जमीन पर अमरूद की खेती करते हैं।


सुभाष बताते हैं, ”चार साल पहले बीएनआर किस्म के अमरूद के पौधे लगाए थे। इसे थाई ग्वावा भी कहते हैं। इसके एक एकड़ में 400 पौधे लगते हैं।” वो बताते हैं, ”एक पेड़ से दूसरे पेड़ के बीच में 12 फुट सामने और आठ फुट की दूरी पर बगल में पौधे लगाने चाहिए। एक एकड़ में पहली बार पौधे लगाने में कुल एक लाख रुपए का खर्च आता है।” एक पेड़ से 25 से 30 किलो ग्राम फसल निकलते हैं जो 80 से 150 रुपए किलो तक बिकता है।

सुभाष आगे बताते हैं, ”पौधों में जब फल आते हैं उस समय देखरेख सबसे ज्यादा करनी होती है। जहां पर एक साथ कई फसल होते हैं उसमें से सिर्फ एक फल ही रखा जाता है बाकी सभी फलों को तोड़ कर फेक दिया जाता है। जब फसल थोड़े बड़े हो जाते हैं तो उनकी बैगिंग करनी होती है, जिसमें हर फल पर 5 से 7 रुपए का खर्च आता है।” सुभाष बताते हैं कि फलों की बैगिंग इस लिए करते है ताकि फलों पर दाग न पड़ें पक्षी नुकसान न पहुंचाए। बैगिंग करने से फल पूरी तरह से सुरक्षित रहता है।


सुभाष बताते हैं, ”फल जब पूरी तरह से पक जाता है उस समय इसका वजह 1700 ग्राम तक हो जाता है। मैं तौल कर देख चुका हूं।” सुभाष का अमरूद दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा समेत कई राज्यों में बिकने के लिए जाता है।80 से 150 रुपए प्रर्ति किलो बिकाता है यह अमरूद।

हल्दी की इस नई किस्म से पूरे साल किसान कर सकते हैं हल्दी की खेती

अभी तक ज्यादातर किसान खरीफ में हल्दी की बुवाई करते हैं, लेकिन अब हल्दी की नई किस्म प्रजाति एनडीएच-98 देश के सभी तरह के जलवायु  में साल भर की जा सकती है।

डॉ. विक्रमा प्रसाद पांडेय बताते हैं, “राजस्थान में आयोजित एक कार्यक्रम में हल्दी की ये किस्म रिलीज की गई थी, ये प्रजाति शोध निदेशालय के अंर्तगत सब्जी विज्ञान विभाग में विकसित की गई है, इस प्रजाति को विकसित किए जाने से तीन साल पहले तक अखिल भारतीय स्तर के प्रोजेक्ट मैनेजर की देखरेख में कई प्रदेशों में इस किस्म पर शोध किया गया है।”

हल्दी की नई किस्म एनडीएच-98 इजाद की गई थी।, ये किस्म सभी तरह की जलवायु में उगायी जा सकती है साथ ही इसकी खेती देश के सभी प्रदेशों में की जा सकती है। यह गुणवत्ता व मात्रा में भी दूसरी किस्मों के मुकाबले ज्यादा बेहतर है।

वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए तरीकों से अगर हल्दी की खेती की जाए तो किसानों को अच्छे फसल की प्राप्ति हो सकती है। वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए तरीकों से अगर हल्दी की खेती की जाए तो किसानों को अच्छे फसल की प्राप्ति हो सकती है।

हल्दी की सफल खेती के लिए उचित फसल चक्र को अपनाना जरूरी होता है। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हल्दी की खेती लगातार उसी जमीन पर न की जाए। क्योंकि यह फसल जमीन से ज्यादा से ज्यादा पोषक तत्वों को खींचती है, जिससे दूसरे साल उसी जमीन में इसकी खेती नहीं करें तो ज्यादा अच्छा होगा।

जिन किसानों के पास सिंचाई की सुविधा है वो अप्रैल के दूसरे पखवाड़े से अगस्त के प्रथम सप्ताह तक हल्दी को लगा सकते हैं। जिनके पास सिंचाई सुविधा का अभाव है वे मानसून की बारिश शुरू होते ही हल्दी लगा सकते हैं। जमीन अच्छी तरह से तैयार करने के बाद पांच-सात मीटर, लंबी तथा दो-तीन मीटर चौड़ी क्यारियां बनाकर 30 से 45 सेमी कतार से कतार और 20-25 सेमी पौध से पौध की दूरी रखते हुए चार-पांच सेमी गहराई पर कंदों को लगाना चाहिए।

देश भर में आसानी से उगाई जा सकती है यह किस्म

डॉ. विक्रमा प्रसाद पांडेय बताते हैं, “शोध में पाया गया है कि ये देशभर में उगाने के सही किस्म है और देश भर में आसानी से उगाई जा सकती है, इसका उत्पादन प्रति हेक्टेयर 300-400 टन आसानी से हो जाता है, ये गुणवत्ता में भी दूसरी किस्मों के मुकाबले बेहतर है।” इस हल्दी की प्रजाति में पीलापन श्रेष्ठ स्तर तक पांच प्रतिशत और लीफ ऑयल की मात्रा एक से दो प्रतिशत मिली। बिहार और नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान केंद्रों के फार्म में इसका उत्पादन भी शुरू किया गया है।