पंजाब के किसान ने इंग्लैंड जाकर बनाया यह अनोखा वर्ल्ड रिकॉर्ड

कहते हैं प्रार्थना करना से सभी काम पूरे होते हैं और भगवान हमारी सारी इच्छाएं भी पूरी करते हैं. ऐसे ही हमारे बड़े बुजुर्ग भी कहते थे हर दिन हमे प्रार्थना करना चाहिए. लेकिन कभी अापने सुना प्रार्थना करने का इतना बड़ा फल मिले कि रिकॉर्ड ही बन जाये.

जी हाँ, आज ऐसा ही एक किस्सा हम आपको बताने जा रहे हैं जिसे सुनकर आप भी हैरान तो होंगे ही. 75 साल के रघबीर सिंह संघेरा ने ये बता दिया कि प्रार्थना करने का कितना बड़ा फल मिल सकता है.

दरअसल, रघबीर सिंह संघेरा ने अपने घर में किचन गार्डेन बनाया है जिसमें उन्होंने कई तरह के फल, फूल और सब्जी लगा के रखे हैं. आपको बता दें, करीब 4 महीने उन्होंने अपने गार्डन में ककड़ी के बीज रोपे थे जिसके लिए वो रोज़ प्रार्थना करता था. जी हाँ, पानी और खाद देने के अलावा हर दिन तीन घंटे इन पौधों के पास बैठकर प्रार्थना करते थे.

इस प्रार्थना का असर ऐसा हुआ कि उनकी उगाई ककड़ी इतनी लम्बी हो गई जिसने रिकॉर्ड बना लिया है. आपको बता दें,ककड़ी की लंबाई 51 इंज हो चुकी है और यह अभी भी बढ़ रही है. गिनीज बुक में दर्ज सबसे लंबी ककड़ी करीब 42 इंच है लेकिन इस ककड़ी ने ये रिकॉर्ड तोड़ दिया.

इस पर विशेषज्ञ का कहना है कि संघेरा ने जिस अरमेनियन कुकुंबर प्रजाति नाम की ककड़ी उगाई है जो पहले भी वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए रिजेक्ट हो चुकी है. वहीं गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के प्रवक्ता का कहना है ‘सबसे लंबे अरमेनियन कुकुंबर संबंधी कोई रिकॉर्ड दर्ज नहीं है,

मगर हमारी वेबसाइट पर जाकर कोई भी नए टाइटल के लिए आवेदन दे सकता है.’ आपको बता दें, रघबीर अब इस ककड़ी को लेकर नॉटिंगघम स्थित सिंह सभा गुरुद्वारा लेकर जायेंगे जहां पर वो सेवा करते हैं. उनका कहना है कि वहां ये इसलिए ले जायेंगे ताकि और भी ऐसी ही सब्जियां उगाई जा सके.

एग्री बिजनेस के गुर के साथ ऑर्गेनिक फार्मिंग सीख ऐसे कमाए पैसा , सरकार दे रही है ट्रेनिंग, ऐसे करे अप्लाई

पिछले कुछ सालों में एग्री प्रोडक्‍ट्स (Agri Business) खासकर ऑर्गेनिक (Organic) की डिमांड काफी बढ़ी है। एक रिपोर्ट बताती है कि साल 2020 तक देश में ऑर्गेनिक मार्केट 12 हजार करोड़ रुपए को छू लेगा। देश ही नहीं, विदेशों में भी ऑर्गेनिक प्रोडक्‍ट्स की डिमांड बढ़ रही है। इसी संभावना को देखते हुए केंद्र सरकार द्वारा बेरोजगार युवाओं को एग्री बिजनेस के गुर सिखाए जा रहे हैं। इसमें,ऑर्गेनिक फार्मिंग की बारीकियां भी बताई जाएंगी।

आप भी दो दिन की यह ट्रेनिंग ले सकते हैं। ट्रेनिंग मिनिस्‍ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट द्वारा संचालित निसबड इंस्‍टीट्यूट द्वारा दी जा रही है। इस दो दिन की ट्रेनिंग के लिए 7000 रुपए फीस ली जा रही है। आइए, आज आज हम आपको बताएंगे कि ऑर्गेनिक फार्मिंग क्‍या है और इसका बिजनेस कैसे किया जा सकता है।

क्‍या है ऑर्गेनिक फार्मिंग

ऑर्गेनिक फार्मिंग टॉक्सिक लोड कम करती है। हवा, पानी, मिट्टी से केमिकल को हटाकर फसल पैदा करने की प्रक्रिया को ऑर्गेनिक फार्मिंग कहा जाता है। जो इन्‍वायरमेंट फ्रेडली होती है, नेचर को नुकसान नहीं पहुंचाती और हमारे शरीर के लिए पूरी तरह फिट होती है।

पिछले कुछ सालों में हमारे देश वासी अपनी हेल्‍थ के प्रति काफी जागरूक हो गए हैं और ऐसे प्रोडक्‍ट्स को अपना रहे हैं, जो उनके शरीर के साथ-साथ इन्‍वायरमेंट को नुकसान नहीं पहुंचाते हों। हालांकि कैमिकल के इस्‍तेमाल से पैदा होने वाले फूड प्रोडक्‍ट्स सस्‍ते होते हैं। बावजूद इसके, जागरूकता के चलते ऑर्गेनिक फार्मिंग से पैदा प्रोडक्‍ट्स की डिमांड बढ़ रही है।

सरकार दे रही है ट्रेनिंग

सरकार ने देश में ऑर्गेनिक फार्मिंग बिजनेस को प्रमोट करने के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार किया है। केंद्र सरकार की मिनिस्‍ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट के अंतर्गत चल रहे इंस्टिट्यूट निसबड ने यह प्रोग्राम तैयार किया है। निसबड द्वारा 18 व 19 अगस्‍त को इसकी ट्रेनिंग दी जाएगी। जिसकी फीस 7000 रुपए रखी गई है।

क्‍या मिलेगी ट्रेनिंग

  • ऑर्गेनिक फार्मिंग का सिद्धांत
  • ऑर्गेनिक एग्रीकल्‍चर का वर्तमान परिदृश्‍य
  •  ऑर्गेनिक फार्मिंग क्‍यों
  • ऑर्गेनिक फार्मिंग के फायदे
  •  पारंपरिक खेती को ऑर्गेनिक खेती में कैसे बदलें
  • इनपुट मैनेजमेंट
  • सीड एवं प्‍लांटिंग मैनेजमेंट
  •  ऑर्गेनिक फार्मिंग सर्टिफिकेशन कैसे हासिल करें
  •  न्‍यूट्रिशियन मैनेजमेंट
  • ऑफ फार्म टैक्‍नोलॉजी इनपुट
  • ऑर्गेनिक फील्‍ड एवं क्रॉप मैनेजमेंट

कैसे शुरू करें बिजनेस

आप ऑर्गेनिक फार्मिंग की बेसिक बातें सीखकर एग्री बिजनेस शुरू कर सकते हैं। ट्रेनिंग के दौरान एग्री बिजनेस के बारे में बताया जाएगा। जैसे कि –

  • स्‍टार्ट अप इंडिया मुहिम के तहत एग्री बिजनेस को कैसे जोड़ा जाए
  • एग्री एंटरप्रेन्‍योर कौन हो सकते हैं
  •  एग्री बिजनेस का ओवरव्‍यू, मार्केट साइज, संभावनाएं, डेयरी, ऑर्गेनिक फार्मिंग प्रोडक्‍ट्स, फूड प्रोसेसिंग, पॉल्‍यूटरी एवं सहायक मार्केट
  •  कैसे शुरू किया जाए एग्री बिजनेस
  • फार्म से रिटेल यूनिट तक सप्‍लाई चेन कैसे बनाएं
  • अपने प्रोडक्‍ट्स को बेचने के लिए सोशल मीडिया का इस्‍तेमाल कैसे करें
  • ऑर्गेनिक फूड प्रोडक्‍ट्स के लिए फॉरेन मार्केट तक कैसे पहुंच बनाएं
  • अपने बिजनेस का बढ़ाने के लिए सरकारी स्‍कीमों का लाभ कैसे लें।
  • इसके अलावा ट्रेनिंग के दौरान डेयरी बिजनेस की भी बारीकियां बताई जाएंगी।

कैसे करें अप्‍लाई

अगर आप इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल होना चाहते हैं तो आप इस लिंक पर क्लिक करके रजिस्‍ट्रेशन संबंधी जानकारी ले सकते हैं या फार्म भर सकते हैं।

https://www.niesbud.nic.in/

बहुत ही कमल का है ये आधुनिक थ्रेशर,वीडियो देखें

फसलों की गहाई में मशीन (थ्रेशर) का बड़ा योगदान है। गहाई मशीनों के उपयोग से समय पर गहाई पूरी करके पैदावार की क्षति को जहां काफी हद तक कम किया जा सका है वहीं गहाई का कार्य जो पारम्परिक तरीके से बहुत श्रमसाध्य हुआ करता था, अब बहुत आसान हो गया है।

महीनों तक चलने वाला गहाई का कार्य अब कुछ दिनों में ही सम्पन्न हो जाता है। देश में गहाई मशीनों की संख्या लगभग 25 लाख से ज्यादा है।

यह थ्रेशर कैसे काम करता है उसके लये वीडियो देखें

यह थ्रेशर बहुत ही आधुनिक है और बड़ी ही सफाई से काम करता है ।यह थ्रेशर GS AUTO FEED MULTI CROP THRESHER ,नंदयाल,आंध्रा प्रदेश द्वारा त्यार किया गया है ।

इस थ्रेशर की सहयता से विभिन्न फसलों जैसे सोयाबीन, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि तथा तिलही व दलहनी फसलों जैसे अलसी, सरसों, मूंग, चना, उड़द आदि की गहाई की जाती है।

अगर आप इस मशीन की कीमत और दूसरी जानकारी चाहिए तो निचे दिए हुए नंबर पर संपर्क करें 9010889900 ,9010801581 ,9849751998

गन्ने की 25% ज्यादा पैदवार के लिए गन्ने के साथ ऐसे उगाएं चना

गन्ने-चने की शरदकालीन मिश्रित खेती से श्री भगत सिंह (M: 9466941251) गांव कहानगड़- शाहबाद जिला कुरूक्षेत्र (हरिय़ाना ) ने पिछले तीन सालो मे अपनी आमदनी को दुगना कर दिखाया है !

शरदकालीन बीजाई मे (अक्तुबर माह) गन्ने की पैदवार लगभग 25% ज्यादा होती हैं ! पर किसान गेहू की फसल के लालच मे, गन्ने की बीजाई अप्रेल मे देर से करते हैं !

यह फसल भगत सिंह ने 4 एकड़ में उगाई है। चना बैड पर तीन लाइन में है, चौथी नाली में गन्ने की फसल अक्टूबर अंत में बिजाई की गई। मार्च के प्रथम सप्ताह में चने का छोलिया होगा, चने की फसल के साथ गन्ने का उत्पादन होगा।

क्या होता है फायदा:

किसान के अनुसार सर्दकालीन गन्ने की खेती दो साल से कर रहे है। इससे 25 फीसदी अधिक पैदावार होती है। यही नहीं धरती की उर्वरा शक्ति भी खूब बनी रहती है। गन्ने में पानी हलका नालियाें में ही देते हैं।

इसका समाधान हैं गन्ने- चने की शरदकालीन मिश्रित खेती, ज़िसे चने की सीधी बढवार वाली किसम HC-5 ने ज्यादा आसान कर दिया हैं ! क्योंकि किसान को गन्ने की फसल के पूरी पैदवार के साथ , 8 किवटल प्रति एंकड़ चने की फसल भी मिलती हैं और ज़मीन की उपजाऊ शक्ती भी बनी रहती हैं !

चने की ह्च सी -5 ( HC-5) किसम के बीज के लिये सम्पर्क करे : श्री जगदीप सिंह ढ़िल्लों, पंजाब ( 9915463033) य़ा श्री राजिन्द्र पवार मध्य प्रदेश ( 9907236006)

विडिओ देखें .

इस राज्य में दूध से महंगा बिक रहा है गौमूत्र, किसानों को बढ़ सकता है मुनाफा

किसानों के लिए डेयरी उद्दोग भी एक अच्छी आमदनी का जरिया बनता जा रहा है. पिछले कुछ वर्षों में किसानों के बीच डेयरी उद्दोग रफतार पकड़ता दिखाई दिया है.

एसे कई उदाहरण देखन को मिले हैं जिसमें युवाओं ने मल्टीनेश्नल कंपनी की जॉब छोड़कर डेयरी उद्दोग को व्यवसाय के तौर पर अपनाया है. वहीं डेयरी किसान गायों के जरिए कई तरह से कमाई कर सकते हैं यह बात तो लगभग सभी डेयरी किसानों ने सुना है. और यह बात सच भी साबित हो रही है.

राजस्थान के डेयरी किसान अब गाय के दूध को नहीं बल्कि गौमूत्र को भी अपनी मुनाफे का जरिया बना रहे हैं… गौमूत्र की मांग इतनी ज्यादा बढ़ रही है कि किसान थोक बाजार में गिर और थारपारकर जैसी हाई ब्रीड गायों के मूत्र को बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं.

किसान गौमूत्र को 15 से 30 रुपए प्रति लीटर पर बेच रहे हैं. वहीं राज्य में गाय के दूध की कीमत 22 से 25 रुपए प्रति लीटर ही है. किसान गौमूत्र उन किसानों को बेच रहे हैं जो किसान जैविक खेती करते हैं. किसान ऐसा मान रहे हैं कि जब से वह गौमूत्र बेच रहे हैं तब से उनकी कमाई लगभग 30 प्रतिशत बढ़ गई है.

जैविक खेती करने वाले किसान गौमूत्र का प्रयोग कीटनाशकों के विकल्प में करते हैं… इसके साथ ही लोग औषधिक उद्देश्यों और अनुष्ठानों में भी इसका उपयोग करते हैं. राज्य में ऐसे एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी भी हैं जो गौमूत्र का प्रयोग अपने ऑर्गेनिक फार्मिंग प्रोजेकेट के लिए करती हैं और लगभग हर महीने 300 से 500 लीटर गौमूत्र का प्रयोग करते हैं.

खेती में अब यूरिया का उपयोग बंद करेगी सरकार,पंजाब पर होगा सबसे ज्यादा असर

खेती के उपयोग में लिए जाने वाले यूरिया के खतरनाक परिणामो को देखते हुए अब केन्द्र सरकर यूरिया का उपयोग को बंद करने की तैयारी कर रही है । प्रधानमंत्री की मंशा के बाद अब केन्द्र ने सभी राज्यो पत्र लिख कर यूरिया का उपयोग कम करने निर्देश दिए है ।

दरअसल प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों निति आयोग की बैठक में निर्देश दिए थे के किसानो को यूरिया का कम से कम प्रयोग करने के सुचेत प्रयास किए जाएं । और प्रधानमंत्री ने सभी राज्यों को इन निर्देशों पर अमल करने को कहा ।

रसायनिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुध इस्तेमाल और गोबर-हरी खाद के कम उपयोग से देश की 32 फीसदी खेती योग्य जमीन बेजान होती जा रही है। जमीन में लगातार कम होते कार्बन तत्वों की तरफ अगर जल्द ही किसान और सरकारों ने ध्यान नहीं दिया तो इस जमीन पर फसलें उगना बंद हो सकती हैं।

देश में सबसे ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल पंजाब के किसान करते है अगर केन्द्र सरकार यूरिया बंद करने के फैसले को अमल में लाती है तो सबसे ज्यादा नुकसान भी पंजाब के किसानो को ही होगा । क्योंकि अब पंजाब की मिट्टी ऐसी हो गई है की फसल उगाने के लिए यूरिया की जरूरत पड़ती है ।

जानकारी के अनुसार भारत में पिछले कुछ दशकों में यूरिया का इस्तेमाल कई गुना बढ़ गया है। 1960 के दशक में यह 10 प्रतिशत प्रयोग में लाया जाता था, वहीं 2015-16 में नाइट्रोजन फर्टीलाइजर का इस्तेमाल खेतीबाड़ी के लिए 80 प्रतिशत तक पहुंच गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समय किसान अपने एक खेत में 200 किलो यूरिया प्रयोग में ला रहे हैं।

ये हैं किसानों के गुरू, केचुओं से कमाई के सिखाते हैं तरीके

अलीगढ़। तालों और अपने प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के साथ अलीगढ़ इन दिनों किसानों के बीच भी चर्चा में आ रहा है। जिले का एक किसान तमाम किसानों को केचुए से कमाई के तरीके बता रहा है, जिसे सीखने के लिए कई जिलों के लोग आते हैं।

अलीगढ़ जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर अतरौली तहसील ब्लाक अतरोली के गांव बैमवीरपुर में रिटायर्ड शिक्षक अपने जैसे तमाम किसानों को जैविक खाद के उत्पादन और बेहतर पैदावार की राह दिखा रहे हैं। 100 से भी अधिक किसान उनके साथ जुड चुके हैं और केंचुआ खाद का प्रयोग कर फसल में अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। उनकी जैविक खाद की सप्लाई तमाम जिलों में हो रही है।

जिला अलीगढ़ के तहसील अतरौली के गांव बैमवीरपुर के रहने वाले शंभूदयाल शर्मा वर्ष 2006 में प्राथमिक स्कूल के हेडमास्टर के पद से रिटायर्ड हुए थे। साल 2009 में अतरौली ब्लाक मुख्यालय से उन्हें केंचुआ खाद के उत्पादन और उसके प्रयोग से होने वाले लाभ की जानकारी मिली। उन्होंने प्रयोग के तौर पर केंचुआ खाद का उत्पादन शुरू किया।

उन्होंने खुद की ही फसल में इसका प्रयोग किया। कम लागत में मुनाफा देख उन्होंने इसका विस्तार किया। एक साल में ही दर्जनों गाँवों के कई किसान उनसे जुड़ गए। उनकी लगन और उत्पादन के तरीके को देखकर ब्लाक से उन्हें जिला मुख्यालय पर भेजा गया। सरकार से भी वह प्रोत्साहित हुए तो उन्होंने केंचुआ खाद को बिजनेस के रूप में अपना लिया।

शंभूदयाल शर्मा कहते हैं, ”अब इस खाद की सप्लाई हाथरस, कासगंज, औरेया, पीलीभीत, बरेली, मुरादाबाद, झांसी आदि जिलों में है। खाद के निकलने वाले सरकारी टेंडरों के माध्यम से उनकी सप्लाई इतनी अधिक है कि कभी कभी तो वह पूर्ति भी नहीं कर पाते। स्थानीय किसान भी जैविक खाद खरीद ले जाते हैं।”

लहलहा रही है पिपरमिंट और मक्का की फसल

जैविक खाद के उत्पादन से इस वक्त किसानों की मक्का और पिपरमिंट की फसल लहलहा रही है। मक्का और पिपरमिंट में किसानों को अच्छा मुनाफा मिलने की उम्मीद है। किसान जैविक खाद के प्रयोग से गेहूं और आलू की भी अच्छी पैदावार ले चुके हैं। किसान जगवीर सिंह (50वर्ष) का कहना है,

“रसायन खाद से पैदा होने वाली फसल स्वास्थ्य के लिए लाभदायक नहीं है। जैविक खाद से पैदा होने वाली स्वास्थ्य के लिए नुकसान दायक नहीं है। साथ ही कम लागत से अच्छी पैदावार मिलती है। मक्का और पिपरमिंट की फसल अच्छी हो रही हैं। हाल ही में गेहूं ने अच्छा मुनाफा दिया।”

आसपास के किसानों को दे रहे प्रेरणा

केंचुआ की खेती से हो रहे फायदे को देखकर आसपास के किसान भी प्रेरणा ले रहे हैं। जागरुक किसान अब रसायन खाद का प्रयोग छोड़कर केंचुआ की खाद से फसल पैदा कर रहे हैं।

ऐसे होता है केचुआ खाद का उत्पादन

सबसे पहले गोबर एकत्रित किया जाता है। गोबर को हिस्सों में बांटकर उसके बेड बनाए जाते हैं। जिन पर जिला मुख्यालय से मिलने वाला विशेष किस्म के केंचुआ छोड़ दिए जाते हैं। ऊपर से टाट का बोरा-पत्ता आदि डाल दिए जाते हैं।

दो महीने तक बस रोज सुबह शाम पानी का छिड़काव करते रहें। धीरे धीरे खाद उतारते जाएं। इस खाद में ही केंचुआ नर और मादा भी होते हैं, जिनसे केंचुओं की संख्या भी बढ़ती जाती है और खाद का उत्पादन भी। केंचुआ जितने बढ़ जाएं उसी हिसाब से गोबर के बेड बढ़ा लेने चाहिए।

किसानों की आमदनी बढ़ा रहें है ये 3 Mobile App ,ऐसे करें इस्‍तेमाल

किसानों को जितना नुकसान मौसम और सूखे से नहीं होता, उतना सही समय पर सही सूचना न मिलने से होता है। लेकिन अब बाजार में कई ऐसे ऐप आ गए हैं जिससे किसान खेती से जुड़ी हर जानकारी हो लेकर अपडेट रह सकते हैं। इसमें मौसम से लेकर मंडी तक का अपडेट रहता है। अगर किसान इन ऐप का इस्‍तेमाल करें तो न सिर्फ उनका नुकसान कम होगा बल्कि उनकी आमदनी भी बढ़ सकती है।

अच्‍छी फसल का फायदा भी नहीं ले पाते किसान

कई बार बाढ़ से तो कई बार सूखे से किसानों की फसल चौपट हो जाती है। लेकिन जब अच्‍छी फसल होती है, तो उस वर्ष फसल के दाम गिर जाते हैं। ऐसेे में भी कई बार किसान अच्‍छा फायदा नहीं ले पाते हैं। हालांकि किसान अगर इन ऐप का इस्‍तेमाल करें तो अपनी फसल की अच्‍छी कीमत घर बैठे पा सकता है।

मोबाइल ऐप दे रहे जानकारी

कई कंपनियों और स्‍टार्टअप ने मोबाइल ऐप तैयार किए हैं। यह किसानों से जुड़ी पूरी जानकारी दे रहे हैं। इसमें फसल का रेट कहां क्‍या है, यह जानकारी सबसे महत्‍वपूर्ण है। इससे किसान घर बैठे जानकारी कर सकता है कि उसकी फसल का सही रेट कहां मिल सकता है। इसके अलावा किसान यह भी जान सकता है कि कौन उस फसल को खरीदेगा।

मिलती हैं अन्‍य जानकारियां भीं

इन ऐप से आपको सरकारी की कृषि से जुड़ी सब्सिडी की जानकारी भी मिलती है। इस आधार पर भी आप अपनी पैदावार से ज्‍यादा फायदे में बदल सकते हैं। इसके अलावा मौसम की जानकारी भी आपको कौन सी फसल लगानी चाहिए, यह फैसला करने में मदद कर सकती है। इसके अलावा मिट्टी से जुड़ी जानकारी, फूड प्रोसेसिंग यूनिट, रिटेलर सहित एग्री मार्केटिंग की जानकारी भी मिल सकती है।

कई ऐप हैं बाजार में

IFFCO किसान संचार

IFFCO का ऐप किसान संचार के नाम से है। इससे अभी तक 40 लाख किसान जुड़ चुके हैं। इस एेप में फसलों सहित अन्‍य कृषि से जुड़ी चीजों के रेट, मौसम की भविष्‍यवाणी, मिट्टी के टेस्‍ट सहित जानवरों की देखरेख तक की जानकारी आसानी से ली जा सकती है। यह ऐप एयरटेल के सिम पर उपलब्‍ध है और इसके लिए कंपनी मामूली सा चार्ज लेती है।

RML एजीटेक

इस ऐप से अभी तक 12 लाख किसान जुड़ चुके हैं। इस ऐप में फसलों के दाम के अलावा उसके भाव का ट्रेंड, फसल के ट्रेंड के अलावा फसल की सुरक्षा की जानकारी दी जाती है। हालांकि यह ऐप फ्री है, लेकिन इसके कुछ फीचर के इस्‍तेमाल के लिए पैसे देने पड़ते हैं।

वोडा किसान मित्र

इस ऐप में मंडियों का भाव, सरकारी सब्सिडी सहित अन्‍य जानकारी और मौसम की जानकारी मिलती है। इसके अलावा किसानों से जुड़ी कई अन्‍य जानकारी भी मिलती हैं। यह ऐप वोडा के कनेक्‍शन के साथ मिलता है। इसके लिए 9 रुपए की फीस ली जाती है।

फोन पर भी जानकारी लेने का विकल्‍प

कई ऐप ऐसे भी हैं जो फोन पर भी जानकारी लेने का विकल्‍प देते हैं।

IARI M-Krishi

इस एेप से अभी तक करीब 50 हजार किसान जुड़ चुके हैं। इस ऐप के माध्‍यम किसान SMS से जानकारी ले सकते हैं। अगर किसी किसान को लगता है कि उसे और जानकारी की जरूरत है, तो वह ऐप से जुड़े कॉलसेंटर से फोन करके और जानकारी ले सकता है। इसमें देशभर में लगने वाले किसान मेलों की जानकारी भी दी जाती है। यह ऐप बिल्‍कुल फ्री है।

क्रोपिन (CROPIN)

इस ऐप से करीब 5 लाख किसान फायदा उठा रहे हैं। इस ऐप से कृषि कारोबार से जुड़ी जानकारी दी जाती है। इस ऐप को लाने वाली कंपनी ने करीब 120 बड़ी कंपनियों से समझौता किया है, जो कृषि कारोबार से जुड़ी हैं। यह ऐप फ्री में डाउनलोड किया जा सकता है, इस ऐप के कुछ फीचर का इस्‍तेमाल फीस देने के बाद ही किया जा सकता है।

HANDYGO

इस ऐप से अभी तक करीब 30 लाख किसान जुड़े हैं। इस ऐप में किसानों को IVRS मॉडल से कॉल करके जानकारी की सुविधा मिलती है। इसमें किसान कृषि से जुड़ी जानकारी के अलावा मौसम, बीज और फसल सुरक्षा की जानकारी ले सकते हैं। इस एेप से जुड़े कॉल सेंटर पर फोन करने पर 1 से लेकर 2 रुपए प्रति मिनट का चार्ज देना पड़ता है।

15 मिनट में 1 ट्राली भूसा भर देती है ये भूसा भरने वाली मशीन ,यहाँ से खरीदें

तमाम फसलों में कटाई व मड़ाई करने के बाद निकले भूसे को भरने में बहुत समय लगता है और तकलीफ भी बहुत होती है. हाथ से भरने और ज्यादा समय लगने के कारण लागत भी बढ़ जाती है. कई बार तो समय पर भूसा न भर पाने के कारण खेत पर ही काफी भूसा हवाओं द्वारा उड़ा दिया जाता है या फिर बरसात की चपेट में आने के कारण बुरी तरह से भीग जाता है.

मगर अब चिंता करने की बात नहीं है, क्योंकि भूसा भरने वाली खास मशीन बाजार में आ चुकी है. इसे मध्य प्रदेश की एक निजी कंपनी ने ईजाद किया है. यह मशीन स्ट्रा ब्लोअर के नाम से बाजार में आ गई है.

स्ट्रा ब्लोअर से संबंधित जानकारियां इस तरह हैं :

  •  यह मशीन पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है. ट्रैक्टर चालित इस मशीन को किसी भी कंपनी के ट्रैक्टर के सहारे आसानी से चलाया जा सकता है. इस का आकार देखने में तोपनुमा होता है.
  • भूसा भरने और निकालने के लिए इस मशीन में 6-6 इंच लंबाई के 2 पाइप लगाए जाते हैं, जिन्हें सुविधा और जरूरत के मुताबिक घटायाबढ़ाया जा सकता है.
  • भूसा भरने वाले पाइप को सक्सन पाइप और भूसा बाहर निकालने वाले पाइप को डिलीवरी पाइप कहा जाता है.

  • इस मशीन से 15 मिनट में 1 ट्राली भूसा भरा जा सकता है.
  • इस के जरीए 20 फुट ऊंचाई तक भूसा भर सकते हैं.
  • अगर भूसा गीला हो तो भी इस मशीन से भूसा भरने में कोई परेशानी नहीं होती है.
  • कंपनी सीधे बिक्री का काम करती है, जिस से देश भर में कहीं इस के डीलर नहीं हैं. इस की बुकिंग कर के इसे हासिल कर सकते हैं.
  • सीधे बिक्री के पीछे कंपनी का मानना है कि इस से किसानों को सस्ती दर पर मशीनें मिल जाती हैं.

ज्यादा जानकारी के लिए कंपनी के प्रबंध संचालक भगवान दास विश्वकर्मा के मोबाइल नंबर 09425483416 पर संपर्क किया जा सकता है.

कंपनी का पूरा पता इस प्रकार है :

भारत कृषि यंत्र उद्योग, उदय नगर कालोनी, सागर रोड, विदिशा (मध्य प्रदेश)

फोन नंबर : 07592-250216, 09826294216

वीडियो देखे

मेंथा किसानों की बल्ले-बल्ले, इतने रुपए किलो में बिका तेल

मौजूदा सीजन मेंथा किसानों के लिए कमाई वाला साबित हो रहा है। इस पेराई सीजन में मेंथा की कीमतें 1600 रुपए प्रति किलो तक पहुंच चुकी हैं। पिछले 15 दिनों से ये कीमतें 1400 से 1600 रुपए के बीच बनी हुई हैं। मेंथा से इस साल हुई आय से न सिर्फ अगले वर्ष मेंथा का रकबा बढ़ेगा, बल्कि इस वर्ष आलू की फसल ज्यादा बोई जाएगी।

“ये सीजन मेंथा के लिए बहुत अच्छा गया है। जिन किसानों ने सीमैप या दूसरी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया है, उनका उत्पादन प्रति एकड़ 60 किलो तक उत्पादन हुआ है, अगर 1500 रुपए का भी रेट मिला तो करीब 90 हजार रुपए मिले, जिसमें से अगर 31,250 रुपए की लागत निकाल दें तो भी करीब 58000 रुपए का किसानों को शुद्ध मुनाफा होने की उम्मीद है।”

डॉ. सौदान सिंह कहते हैं। डॉ. सिंह मेंथा की नई किस्में और तकनीकी विकसित करने वाली सरकारी संस्था सीमैप में मुख्य वैज्ञानिक हैं। यूपी, बिहार, उत्तराखंड और पंजाब समेत कई राज्यों में इस बार मेंथा की फसल ली गई। मेंथा के गढ़ यूपी के बाराबंकी समेत कई जिलों में किसान पहली चक्र की कटाई कर दूसरे की तैयारी में लगे हुए। मेंथा की रोपाई फरवरी-मार्च में की जाती है।

जिससे 90 दिन में पहली कटाई हो जाती है। मेंथा की सूखी पत्तियों का आसवन कर तेल निकाला जाता है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक दुनिया में प्रति वर्ष करीब 40,000 टन तेल की मांग है, जबकि भारत में अभी भी सिर्फ 25,000 टन का उत्पादन हो रहा है, जिसका सीधा मतलब है कि आगे बहुत संभावनाएं हैं। भारत दुनिया में प्राकृतिक मेंथा का सबसे बड़ा निर्यातक बनकर उभरा है।

सीमैप के एक और वरिष्ठ वैज्ञानिक संजय सिंह के मुताबिक, “इस बार सीमैप द्वारा दी गई जड़ों और किसानों के पास की पौध के आसार पर करीब 2 लाख 80 हजार हेक्टेयर में मेंथा की बुआई हुई थी, अगले साल ये आंकड़ा साढ़े तीन लाख हेक्टेयर को पार कर सकता है। जर्मनी में सिंथेटिक मेंथा बनाने वाली फर्म इस सीजन भी चालू नहीं हो पाई है। जिसके चलते प्राकृतिक मेंथा की मांग बढ़ी है।”

हालांकि मौसम की बेरुखी के चलते उत्पादन पर असर पड़ा है। संजय सिंह के मुताबिक कई राज्यों के शुरुआती दिनों में 10 फीसदी तक तेल कम निकला है। मेंथा कल्टीवेशन और प्रोडक्शन से जुड़ी फर्म एग्रीबिजनेस सिस्टम इंटरनेशनल में शुभ मिंट प्रोजेक्ट के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिजीत शर्मा गांव कनेक्शन को बताते हैं,

“जिन किसानों ने जून से पहले पेराई की, उनमें तेल कम निकला है, क्योंकि पुरवा हवाओं के चलते पर्याप्त गर्मी नहीं थी। उसके बाद का उत्पादन अच्छा रहा, जो हमारे किसानों के बीच भी 60-62 किलो प्रति एकड़ तक गया है।” मेंथा का उत्पादन उसकी अच्छी किस्म की पौध और नई तकनीकों और वैज्ञानिक सलाहों पर निर्भर करता है। पुरानी जड़ों से पौध तैयार करने, जलभराव, वक्त पर सिंचाई और रोग का निदान न करने पर ये उत्पादन 40 से 50 किलो या उससे कम प्रति एकड़ उत्पादन होता है।

मेंथा का तेल उसकी पत्तियों की सतह पर उपस्थित ग्रंथियों में होता है। करीब 85-90 दिन की फसल तेज गर्मी होने पर ये तेल जमीन से पत्तियों में जमा हो जाता है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक मेंथा ऐसी फसल है, जिसमें अच्छे उत्पादन के लिए जरूरी है कि पेराई से पहले पौधों को (तनाव) टेंशन हों, जिसके लिए तेज गर्मी और सिंचाई का न होना अच्छा माहौल होता है।

इसीलिए पेराई से एक हफ्ते पहले से सिंचाई बंद कर दी जाती है। बाराबंकी के जिला उद्यान अधिकारी महेंद्र कुमार बताते हैं, “इस बार जिले में करीब 80 लाख हेक्टेयर में मेंथा था, मेंथा के सीजन में यहां ज्यादातर जगह मेंथा होता है।

किसानों को इसका अच्छा लाभ हुआ है, लेकिन सामान्य पेराई टंकियों के चलते कई हादसे हुए हैं, इसलिए मेरी किसान भाइयों से अपील है कि अगली बार अच्छी गुणवत्ता वाले पेराई संयंत्र लगवाएं, जिसमें सेफ्टी वाल्व हो, ताकि हादसे का डर न रहे, दूसरा आधुनिक संयंत्र से 10-15 फीसदी तेल ज्यादा निकलता है।” मेंथा के तेल में हुए मुनाफे से न सिर्फ आगामी वर्ष में मेंथा रकबा बढ़ने की उम्मीद है, बल्कि इससे आलू का भी रकबा बढ़ेगा।

किसानों में मेंथा काटकर खेत तैयार कर आलू बोएंगे और फिर अगैती आलू की फसल निकालकर मेंथा। सीमैप के वैज्ञानिक डॉ. सैदान सिंह गांव कनेक्शन को बताते हैं, “90-100 दिनों में किसान को औसतन प्रति हेक्टेयर पौने दो लाख तक मुनाफा हुआ है। जो किसी फसल के अनुपात में काफी ज्यादा है। इसलिए पहले आलू और फिर मेंथा का रकबा बढ़ना लगभग तय है, अभी किसान नर्सरी के लिए पौधों के लिए दौड़भाग कर रहे हैं।”