इस देसी जुगाड़ ने दिलाया फसल को नीलगाय और कीट-पतंगों से छुटकारा

“खेत में हर दिन नीलगाय आने से फसलों का बहुत नुकसान होता था, रोशनी को देखकर नीलगाय खेत में नहीं आती है, इसलिए मैंने ढिबरी (दीपक) का एक देसी तरीका अपने खेत में लगाया। इसकी रोशनी से नीलगाय और कीट-पतंग फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।” ये कहना है लखीमपुर के किसान गुड्डू कुमार (41 वर्ष) का।

गुड्डू द्वारा अपने खेत में रात के समय ढिबरी जलाने वाला तरीका इसलिए कारगार है क्योंकि किसानों का मानना है कि अगर रात के समय खेतों में रोशनी रहती हैं तो नीलगाय खेत में इस डर से नहीं आती है क्योंकि उसे लगता है खेत में कोई बैठा है। गुड्डू उत्तरप्रदेश के लखीमपुर जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर मितौली ब्लॉक के मैनहन गाँव के रहने वाले हैं।

गुड्डू अपने देशी तरीके का अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, “ खेत में कीटपतंगों को रोकने के लिए बाजार से दवा डाल-डालकर परेशान हो गया था। दवा बहुत महंगी मिलती थी, जो खेत के उपजाऊंपन को तो कम कर ही रही थी, साथ ही इसे खाकर हम बीमार भी पड़ रहे थे। नीलगाय तो जिस खेत में घुस जाती वो पूरी फसल को ही बर्बाद करके निकलती।”

वो आगे बताते हैं, “कुछ साल पहले मैंने अपने धान के खेत में एक टीन के डिब्बे में एक गोला करके उसके अन्दर ढिबरी जलाकर, बांस के एक डंडे में लगाकर खेत के एक कोने पर लगा दिया। इसकी रोशनी से धान की पूरी फसल में न तो नीलगाय आयी और न ही कीट-पतंग लगें। इस साल भी मैंने गन्ने के खेत में इस यंत्र को लगाया था,

अब गन्ना लम्बा हो गया है इसलिए हटा दिया है।” गुड्डू की तरह अगर कोई भी किसान इस यंत्र को अपने खेत में लगाते हैं तो वो फसल के नुकसान से तो बचेंगे ही साथ ही कीटनाशक के इस्तेमाल से भी बच जायेंगे। जिससे उन्हें पैसे की बचत, खेत की मिट्टी और किसान की सेहत दोनों बेहतर होगी।

“बहुत से कीट जो फसल को नुकसान पहुंचाते हैं, इस यंत्र को लगाने से वो कीट फसल को नुकसान पहुंचाने की बजाए इस यंत्र की तरफ आकर्षित हो जाते हैं, या फिर जहाँ यह यंत्र लगा होता है उससे दूर भागते हैं। मिट्टी का तेल फेरोमोन की तरह काम करता है, इसलिए ढिबरी की रोशनी के अलावा इसके तेल की गंध से भी कीटों को आकर्षित या अनाकर्षित करती है।” वो आगे बताते हैं, “इस वजह से ज्यादातर कीट इस यंत्र के आसपास मंडराते हैं और ढिबरी की लौ में या तो मर जाते हैं या फिर इसी यंत्र के आसपास रहते हैं, जिस वजह से फसल को नुकसान नहीं पहुंचता है।”

गुड्डू बताते हैं, “हर शाम ढिबरी में मिट्टी का तेल भरकर रख देते थे, महीने में तीन से चार लीटर तेल खर्च होता है। धान के अलावा किसी भी सब्जी वाली फसल या फिर किसी भी फसल में इस ढिबरी को लगाया जा सकता है। ढिबरी, टीन के डिब्बे और मिट्टी के तेल के अलावा इसमें कोई भी खर्चा नहीं है।”

बारिश के मौसम में रात के अँधेरे में हमारे घरों में जहाँ रोशनी जल रही होती हैं, वहां कीट-पतंगों की भरमार होती है। पहले के बुजुर्ग थाली में पानी भरकर रख देते थे जिससे कीट प्रकाश की तरफ आकर्षित होते थे और उस पानी में गिर जाते थे। जिससे उनके पंख भीग जाते थे, और वह उड़ने में अक्षम हो जाते थे। ज्यादातर कीट पतंगे दीपक की लौ में जलकर मर भी जाते थे। इस तरह ग्रामीणों के भोजन में ये कीट पतंग नही गिरते थे। ये उनके द्वारा अपनाया गया देशी तरीका था जो बहुत ही कारगार था।

ठंड लौटने से आई गेहूं उगाने वाले किसानो के लिए यह बड़ी खुशखबरी

मौसम में अचानक आए बदलाव की वजह से उत्‍तरी भारत के इलाकों में गेहूं की अच्‍छी पैदावार के आसार बन गए हैं। मौसम वि‍भाग के मुताबि‍क, अगले तीन से चार दि‍नों तक न्‍यूनतम तापमान में कोई कमी आने के आसार नहीं है।

जम्‍मू कश्‍मीर पर बने वेस्‍टर्न डि‍स्‍टरबेंस की वजह से जम्‍मू-कशमीर, हिमाचल प्रदेश और उत्‍तराखंड में बारि‍श और बर्फबारी के आसार हैं। वहीं उत्‍तर प्रदेश, हरि‍याणा, पंजाब और उत्‍तरी राजस्‍थान में ठंडी हवाएं चलेंगी। । मौसम वि‍भाग ने 13 फरवरी को उत्‍तर के मैदानी इलाकों और मध्‍य भारत में भी बारि‍श की संभावना जताई है। इस तरह के मौसमी हालात गेहूं के लि‍ए बहुत अच्‍छे रहते हैं।

फसल को मि‍ल जाएगा टाइम

इंडियन एग्रीकल्‍चर रि‍सर्च इंस्‍टीट्यूट में कृषि वैज्ञानि‍क डॉक्‍टर जे पी डबास के मुताबि‍क, गर्मी जि‍तना धीमी रफ्तार से आएगी उतना ही गेहूं के लि‍ए अच्‍छा रहेगा। अगर मौसम में अचानक कोई बदलाव आ जाए तो ये गेहूं के लि‍ए नुकसान दायक होता है। अगर अभी हल्‍की बारि‍श पड़ जाए तो ये और अच्‍छा होगा। इससे फसल को टाइम मि‍ल जाएगा और दानों का वजन बढ़ जाएगा।

3.3 करोड़ टन गेहूं की खरीद का लक्ष्‍य

अप्रैल में गेहूं की कटाई शुरू हो जाती है। इस साल सरकार ने 3.3 करोड़ टन गेहूं की खरीद का लक्ष्‍य रखा है। यह पि‍छले साल के मुकाबले करीब 43 फीसदी ज्‍यादा है। पिछले साल सरकार टारगेट से कम खरीद कर पाई थी।

पि‍छले साल गेहूं की कुल खरीद 2.296 करोड़ टन थी। वर्ष 2015-16 के रबी सीजन में पंजाब से 104.44 लाख टन और हरि‍याणा से 67.78 लाख टन गेहूं की खरीद की गई थी। सरकार ने इस बार गेहूं की एमएसपी 1735 और चने की एमएसपी और बोनस 4400 रुपए तय कि‍या है।

इस बार घटा है रकबा

हालांकि‍ इस बार गेहूं का रकबा घटा है। यह पि‍छले रबी सीजन के मुकाबले 5.38 फीसदी कम है। एग्रीकल्‍चर मि‍नि‍स्‍टरी की ओर से 2 फरवरी को जारी आंकड़ों के मुताबि‍क, अभी तक 300.70 हैक्‍टेयर इलाके में गेहूं की बुवाई हुई है, जबकि‍ बीते साल 317.82 हैक्‍टेयर में गेहूं की बुवाई हुई थी।

रात का तापमान 5 से 6 डिग्री उपयुक्‍त

गेहूं को शुरू में ठंडक की जरूरत पड़ती है। ज्‍यादा गर्मी होने पर गेहूं के बीज अंकुरि‍त होने में दि‍क्‍कत आती है। रबी के मौसम में रात में ठंडक बढ़ने से गेहूं, चना और सरसों को फायदा होता है। वहीं अगर रात का तापमान ज्‍यादा रहा तो इन फसलों को नुकसान होता है। रात में श्‍वसन (रेस्पिरेशन) की रफ्तार बढ़ जाती है। उसके लिए न्यूनतम तापमान 5 से 6 डिग्री होना चाहिए। वहीं दिन का तापमान 20-25 डिग्री होना चाहिए।

ऐसे करें करेले की खेती, प्रति एकड़ होगी 60 हजार रु की इनकम

खेतीबाड़ी से जुड़े लोगों के लिए अच्छी खबर है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आई ए आर आई) ने करेले की एक ऐसी कि‍स्‍म तैयार की है, जि‍समें 15 दिन पहले फल लग जाते हैं। यही नहीं, इसका उत्पादन भी 20 से 30 फीसदी अधिक है। इस करेले की नई किस्म का नाम पूसा हाईब्रिड-4 है। वैज्ञानिकों का दावा है कि एक एकड़ में इसकी खेती से 50 से 60 हजार रुपए की इनकम हो सकती है।

क्या खासियत है मेडिकल करेले की

कृषि वैज्ञानिकों ने करेले की एक ऐसी संकर किस्म का विकास किया है जो डायबिटीज को नियंत्रित करने में और अधिक कारगर सिद्ध होगी। पूसा हाईब्रिड -4 में पारांटिन, मोमोडीसीन और सपोनीन जैसे तत्व पाए जाते हैं जो इसे मधुमेहरोधी बनाता है।

15 दिन पहले तैयार होगा फल

आमतौर पर करेले की फसल में 55 से 60 दिनों में फल आने शुरू होते हैं जबकि नयी किस्म में 45 दिन में फल लग जाते हैं। इसके साथ ही इसकी पैदावार भी 20 से 30 प्रतिशत अधिक है। गहरे हरे रंग का यह करेला मध्यम लम्बाई और मोटाई का है जिसका औसत वजन 60 ग्राम होता है। इसकी पैदावार प्रति हेक्टेयर 22 टन से अधिक है।

साल में दो बार लगाएं

नयी किस्म दो बार फरवरी के अंत और मार्च में और अगस्त व सितंबर के दौरान लगायी जाती है। लगभग चार माह तक इसमें फल लगते हैं। करेले की यह एक ऐसी किस्म है जिससे जमीन और मचान पर भी भरपूर पैदावार ली जा सकती है।

किन देशों में होता है एक्सपोर्ट

देश से जिन सब्जियों का एक्सपोर्ट किया जाता है उनमें करेला भी शामिल है। खाड़ी के देशों में भारतीय करेले की अच्छी मांग है। इसके अलावा कुछ अन्य देशों में भी इसकी मांग है। देश के सभी प्रमुख सब्जी उत्पादक राज्यों में करेले की खेती की जाती है।

किसान ने बनाई छोटे किसानो के लिए फसल कटाई मशीन

खेती-बाड़ी में सबसे मेहनत का काम होता है फसल की कटाई करना। इसमें समय के साथ-साथ पैसा भी अधिक लगता है और साथ ही यह डर रहता है कि कहीं ऐसे में अगर बारिश या आंधी-तूफान आ गया तो पूरी फसल बर्बाद हो जाएगी। इन समस्याओं से निबटने के लिए जो मशीनें बनाई गईं वो सिर्फ बड़े किसानों के लिए ही लाभदायक थीं क्योंकि वह काफी महंगी होती हैं। ऐसे में छोटे किसानों की समस्यों को ध्यान में रखते हुए एक किसान ने ऐसा यन्त्र बनाया जिसे छोटे किसान आसानी से खरीद सकते हैं।

”खेत में सबसे ज्यादा समस्या कटाई में आती है। बाकी सभी काम के लिए मशीन हैं, कटाई के हार्वेस्टर (कटाई मशीन) बड़े किसान ही खरीद सकते हैं, इसलिए मुझे छोटे किसानों के लिए रिपर यानी कटाई मशीन मार्केट में लाना था।” मध्य प्रदेश के विदिशा ज़िले के सोजनवाले गाँव के किसान भगवान सिंह डांगी (63 वर्ष) बताते हैं,

”हमारे यहां सोयाबीन की खेती हेती है मैं भी करता हूं। इसकी कटाई करना काफी मुश्किल होता है था, इस लिए मैंने ऐसी मशीन बनाने का फैसला किया और पांच वर्ष पहले यह मशीन बनाई।” भगवान सिंह भले ही सिर्फ आठवी तक पढ़ें हैं, लेकिन मशीनों के प्रति उनका रुझान बचपन से ही था।

उनका रिपर विंडरोअर एक ऐसी मशीन है जो फसल काटती है और कटे अनाज की लाइन को बीच में जमा कर देता है। इस अविष्कार के लिए उन्हें तीन अवार्ड भी मिले, जिसमें उन्हें वर्ष 2013 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

उनके गाँव के आस पास के क्षेत्र में सोयाबीन एक बड़ी फसल है। फसल कटाई के व्यस्त समय में मजदूर की कमी एक बड़ी समस्या है। इसका समाधान निकालने के लिए भगवान सिंह ने एक ऐसी मशीन चाहते थे जो दो मुख्य कार्य कर सके- कटाई और विंड्रोइंग यानी कटी फसलों को एक जगह जमा करना। कटाई में पूरी फसल को व्यवस्थित तरीके से काटना और जबकि विंड्रोइंग का मतलब कटी फसल को एक लाइन में जमा करना ताकि आसानी से पैक किया जा सके और कटाई के बाद की प्रक्रिया को पूरा किया जा सके। इसके बाद उन्होंने इस रिपर को बनाने का फैसला किया।

उन्होंने बताया, ”इस मशीन से सोयाबीन, चना और गेहूं की कटाई की जा सकती है। इससे एक दिन में 10 एकड़ फसल की कटाई आसानी से की जा सकती है और अगर मज़दूरों से फसल की कटाई की जाए तो एक दिन में 20 मज़दूर सिर्फ एकड़ फसल की कटाई कर पाएंगे।”

मशीन को चलाने के लिए सिर्फ एक आदमी की जरूरत पड़ती है और मशीन के पीछे दो लोग चाहिए जो फसल को जमा करने का काम करेंगे। यह छोटे से खेत में, खड़ी फसल को नुकसान पहुंचाए बिना तेज गति से मुड़ने में सक्षम है। परंपरागत रिपर यूनिट में, प्राइमर मूवर तक पहुंचे में कटी फसल सीधे नीचे गिर जाती है जिससे अनाज का नुकसान होता है।

नई खोज में विंड्रोइंग अटैचमेंट में नयापन डिजाइन और स्थानिक उपायों में मौजूद होती है, इससे अनाज नुकसान बहुत कम होता है। जमा किया गया अनाज दोनों टायर के बीच साफ-सुथरी लाइन में गिरता है जिससे जमा करने समेत दूसरे कार्य आसानी हो जाता हैं।

वो कहते हैं कि बेहतर प्रगति के लिए खेती के तरीकों में बदलाव किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि आज खेती का ढंग अच्छा नहीं है, हमें तरक्की करने के लिए खेती करने का तरीका बदलना पड़ेगा और वो इस बदलाव में भागीदारी निभाना चाहते हैं जैसे कि, खेती के नए तरीके विकसित करके, कृषि कार्यप्रणाली और बीज की किस्मों में बदलाव कर।

अब पराली से भी होगी कमाई, 6600 के रेट से खरीदेगी ये कंपनी

कृषि‍ अवशेषों को खेतों में जलाने की समस्‍या पर लंबे समय से बहस हो रही है। कि‍सानों को इसके निपटारे का सबसे आसान रास्‍ता यही नजर आता है कि‍ उसे खेत में ही जला दि‍या जाए। इस वजह से दि‍ल्‍ली-एनसीआर में प्रदूषण का लेवल भी बढ़ता है। हालांकि‍ अब अगर कि‍सान खेत में पराली जलाएगा तो समझें कि‍ वह नोट जला रहा है, क्‍योंकि‍ पराली अब बेकार की चीज नहीं रह गई है। इसका एक बड़ा खरीददार आ गया है।

देश में सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे बड़ी बिजली उत्पादक कंपनी नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) अब पराली खरीदेगा। इसकी शुरुआत जल्‍द होने वाली है। फि‍लहाल कंपनी अपने दादरी प्‍लांट के लि‍ए रोजाना 1,000 टन कृषि अवशेष खरीदेगी।

कोई भी आ सकता है आगे कंपनी के एक प्रवक्ता ने बताया कि‍ बायोमास आधारित पैलेट्स की टेस्ट फायरिंग के आरंभिक चरण पूरे होने पर एनटीपीसी ने प्रति दिन 1000 मीट्रिक टन कृषि अवशेष आधारित ईंधन यानी बायोमास (500 मीट्रिक टन प्रतिदिन कृषि अवशेष पैलेट्स और 500 मीट्रिक टन प्रतिदिन टॉरेफाइड कृषि अवशेष पैलेटस या ब्रिकेट्स) की खरीद के लिए निविदा आमंत्रित की है।

उन्‍होंने बताया कि‍ हम चाहते हैं कि‍ इस काम में स्‍टार्टअप भी आगे आएं। एनटीपीसी ने एक्‍सपीरिएंस की कोई शर्त नहीं रखी है। अगर पर्याप्‍त संख्‍या में बोली लगाने वाले मि‍ल गए तो एनटीपीसी अपने सभी प्‍लांट के लि‍ए कृषि‍ अवशेष खरीदेगी।

यह होगी कीमत

एनटीपीसी की विज्ञप्ति के अनुसार, निविदा दो वर्षों के लिए मंगाई गई है, जिसमें रोजाना 1000 टन पराली खरीदी जाएगी। इसमें पैलेट्स की कैपिंग कीमत 5500 रुपये टन तय की गई है और ब्रिकेट्स के लि‍ए यह कीमत 6,600 रुपये प्रति टन निर्धारित की गई है।

गौरतलब है कि‍ बजट भाषण के दौरान वि‍त्‍त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि एनसीआर में प्रदूषण की स्‍थि‍ति को देखते हुए सरकार ऐसे कदम उठाएगी जि‍ससे कि‍सान कृषि अवेशेषों को खेत में ही न जलाएं।

फसल की बीमारी की फोटो खींचे ,यह ऐप एक मिंट में बताएगी ईलाज

अगर आप घर पर तरह तरह के फूलों और बागवानी पौधे उगाना पसंद करते हैं, तो प्लांटिक्स ऐप आपके गार्डेन की और भी अच्छी तरह से देखभाल करने में आपकी मदद कर सकती है।बागवानी फसलों में सबसे अधिक खतरा कीटों का होता है।

फलों व फूलों के पौधों में कई तरह के कीड़े लग जाते हैं, जिनकी पहचान न हो पाने से किसानों को काफी नुकसान सहना पड़ता है। बागवानी फसलों को कीटों के बचाने के लिए प्लांटिक्स ऐप में एक बहुत ही अच्छा फीचर है।

अगर आपके बगीचे या फिर खेत में लगे पौधों में आपको किसी कीट का प्रकोप नज़र आता है, पर आप उसे पहचान नहीं पा रहे हैं, तो आप प्लांटिक्स ऐप पर जाकर उस पौधे के सबसे अधिक प्रकोप वाले हिस्से की तस्वीर खीच लें।

 

खीची गई तस्वीर को ऐप में लगा सेंसर सिस्टम पहचान लेगा और आपको यह बता देगा कि पौधे में कौन सा कीट लगा है। इससे साथ साथ ऐप में उस कीट से पौधे को बचाने का तरीका भी बताया जाता है, जो आपकी फसल में होने वाले नुकसान को कम करने में कारगर साबित होगा।

प्लांटिक्स ऐप में बागवानी और कृषि से संबंधित फसलों की एक ई-लाइब्रेरी का भी ऑप्शन है। आप इसकी मदद से तरह तरह की फसलों में लगने वाले कीट व उनके जैविक व रासायनिक उपचारों की जानकारी भी ले सकते हैं।

कैसे डॉउनलोड करें प्लांटिक्स ऐप

प्लांटिक्स ऐप गूगल प्ले स्टोर पर नि:शुल्क उपलब्ध है, इसे डाउनलोड करने के लिए आप किसी भी एंड्रॉइड फोन में गूगल प्ले स्टोर पर जाकर Plantix – grow smart मोबाइल ऐप को डाउनलोड कर सकते हैं।

यह ऐप कैसे काम करता है उसके लिए वीडियो भी देखें

एक शहर जिसने छत पर सब्ज़ी उगाकर दूर की बेरोज़गारी

दक्षिण अफ्रीका के शहरों में खेती की एक विधा शांति से देश की शहरी गरीबी और बेरोज़गारी से लड़ रही है। दक्षिण अफ्रीका में लोग इसे शहरी खेती कहते हैं। जोहेनसबर्ग जैसे शहरों में 60 प्रतिशत तक सब्जी इसी छत वाली खेती से आती है।

शहरी खेती और कुछ नहीं, बल्कि घरों की छत पर की जाने वाली खेती ही है जिसे शौकिया तौर पर भारत में भी बहुत से शहरी करते हैं। लेकिन बस अंतर तकनीक और फसलों के चुनाव और प्रबंधन का है।

बेरोजगारी मिटाने के लिए एक गंभीर औजार

अफ्रीका में छत पर की जाने वाली या रूफटॉप खेती का शौक नहीं, बल्कि बेराज़गारी मिटाने के एक गंभीर औज़ार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके लिए वहां के प्रशासन और शोधकर्ताओं ने मिलकर ऐसी फसलों और सब्ज़ियों के सुझाव और उन्नत बीज जारी किये जो आसानी से छत पर उगाई जा सकें। इसका असर भी जल्द ही दिखने लगा।

एक छोटी सी सोच ने दिया रोजगार

अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ चैनल अलजज़ीरा के अनुसार, अफ्रीका जैसे देश में जहां हर चार में से एक व्यक्ति बेरोज़गार है, इस छोटी सी सोच ने बहुतों को रोज़गार दिया है। भारत में भी रूफटॉप खेती को लेकर कई प्रयास किये गए। साल 2014-15 में कर्नाटक सरकार ने नागरिकों को बढ़ावा देने के लिए रूफटॉप तकनीक में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं पर छूट की घोषणा की थी।

भारत के लोगों को फिलहाल फायदा नहीं

इसी तरह राजस्थान में भी घर की छत पर सब्ज़ियां उगाने वाले लोगों को सब्सिडी की तोहफा देने की घोषणा की गई थी। हालांकि भारत में ये प्रयास एकीकृत रूप से अभी तक लागू नहीं किये जा सके हैं। संगठित न होने के कारण ही इनसे लोगों और बाज़ार को फायदा नहीं हो पा रहा है

DBT के सहारे कि‍सानों की इनकम दोगुना करेगी सरकार, जाने क्या है ये DBT

बजट 2018 के एलान के मुताबि‍क कि‍सानों को लागत का डेढ़ गुना एमएसपी दि‍लाने के लि‍ए सरकार डायरेक्‍ट बेनेफि‍ट ट्रांसफर का सहारा ले सकती है। इसमें आधार और 38 करोड़ जनधन एकाउंट की बड़ी भूमि‍का होगी। मुमकि‍न है कि‍ मार्च से पहले इसका एलान कर दि‍या जाएगा क्‍योंकि‍ मार्च – अप्रैल में ही रबी की फसलों का प्रोक्‍योरमेंट शुरू हो जाता है।

नीति‍ आयोग के सूत्रों के मुताबि‍क, कि‍सानों को बढ़ी हुई एमएसपी का पूरा लाभ दि‍लाने के लि‍ए सरकार डीबीटी यानी डायरेक्‍ट बेनेफि‍ट ट्रांसफर का सहारा ले सकती है। इसमें होगा ये कि अगर बाजार भाव एमएसपी से कम है तो इस अंतर का भुगतान सरकार डायरेक्‍ट कि‍सान के खाते में करेगी। इसे मध्‍यप्रदेश की भावांतर भुगतान योजना का एक्‍सपेंशन मान सकते हैं। वहां भी सरकार इसी तरह से कि‍सानों को एमएसपी का लाभ देती है।

फि‍लहाल यही ऑप्‍शन नजर आ रहा है

नीति‍ आयोग में लैंड पॉलि‍सी सेल के चेयरमैन डॉक्‍टर टी हक ने बताया कि इसके लि‍ए सरकार के पास फि‍लहाल जो ऑप्‍शन नजर आ रहे हैं उनमें सबसे फिजिबल ये है कि एमएसपी और मार्केट प्राइज के बीच जो अंतर आ रहा है उसका भुगतान सरकार करे। यह भुगतान डायरेक्‍ट कि‍सानों के खाते में कि‍या जा सकता है। फि‍लहाल जो तंत्र है उसमें फसलों का पूरा प्रोक्‍योरमेंट करना आसान नहीं है। इसलि‍ए मध्‍य प्रदेश की भावांतर योजना की तर्ज पर बजट के इस एलान को पूरा कि‍या जा सकता है।

सरकार खुद नहीं खरीद सकती

इसके अलावा दूसरा ऑप्‍शन ये है कि कुछ कमोडि‍टी जैसे दाल व रागी वगैरह को भी सरकार खरीदे और उसे पीडीएस के माध्‍यम से आगे भेजे। कर्नाटक ने इस दि‍शा में काफी काम कि‍या है। लेकि‍न फि‍लहाल ये उतना फि‍जिबल नहीं दि‍ख रहा। बड़े पैमाने पर खरीद करने के लि‍ए तंत्र उतना मजबूत नहीं है। सरकार खरीद भी लेगी तो रखेगी कहां। अभी इतनी स्‍टोरेज कैपेसि‍टी ही नहीं है।

अभी गेहूं और चावल को ही मैनेज करने में दिक्‍कते आ रही हैं। सब कमोडि‍टीज को खरीदना पॉसि‍बल नहीं होगा लेकि‍न दाल कुछ सेलेक्‍टेड कमोडिटीज को तो खरीद सकते हैं। वैसे थोड़ा ही सही मगर सरकार को इनकी दालों व मोटे अनाज की खरीदारी करनी चाहि‍ए। ऐसा करने से मार्केट प्राइस अपने आप ही बढ़ने लगता है, फि‍र एमएसपी के बराबर वैसे ही हो जाएगा।

6 फीसदी कि‍सान ही एमसपी का लाभ ले पाते हैं

एमएसपी तय करने का मकसद यही था कि‍ कि‍सानों को अपनी उपज का वाजि‍ब दाम मि‍ल सके, मगर न तो केंद्र और न ही राज्‍यों का तंत्र इतना दुरुस्‍त है कि सभी कि‍सानों तक इसका लाभ पहुंच सके। सरकारी आंकड़ों के मुताबि‍क, 6 फीसदी से भी कम कि‍सान एमएसपी का लाभ ले पाते हैं। इस तथ्‍य को ध्‍यान में रखते हुए ऐसा होना मुमकि‍न है कि‍ सरकार बाजार भाव और एमएसपी का अंतर सीधे कि‍सानों के खाते में ट्रांसफर करे।

अब किसानों को मुफ्त में मिलेगी बिजली,और साथ में कमाने का भी मौका

आम बजट 2018-19 में हुई तमाम घोषणाओं के बीच एक योजना ऐसी भी है, जो आने वाले दिनों में गेम चेंजर’ साबित हो सकती है। इस योजना के तहत देश में सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले सभी पंपों को सोलर आधारित बनाया जाएगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट पेश करते हुए इसकी घोषणा की।

योजना का नाम होगा किसान ऊर्जा सुरक्षा व उत्थान महाअभियान (कुसुम)। योजना के तहत 2022 तक देश में तीन करोड़ पंपों को बिजली या डीजल की जगह सौर ऊर्जा से चलाया जाएगा। कुसुम योजना पर कुल 1.40 लाख करोड़ रुपये की लागत आएगी।

इसमें केंद्र सरकार 48 हजार करोड़ रुपये योगदान करेगी, जबकि इतनी ही राशि राज्य सरकारें देंगी। किसानों को कुल लागत का सिर्फ 10 फीसद ही उठाना होगा, जबकि लगभग 45 हजार करोड़ रुपये का इंतजाम बैंक लोन से किया जाएगा।

बिजली मंत्री आरके सिंह ने बताया कि योजना का प्रस्ताव कैबिनेट को भेज दिया गया है। पहले चरण में उन पंप को शामिल किया जाएगा जो डीजल से चल रहे हैं। इस तरह के 17.5 लाख सिंचाई पंपों को सौर ऊर्जा से चलाने की व्यवस्था की जाएगी। इससे डीजल की खपत कम होगी।

यह योजना किसानों को दो तरह से फायदा पहुंचाएगी। एक तो उन्हें मुफ्त में सिंचाई के लिए बिजली मिलेगी और दूसरा अगर वह अतिरिक्त बिजली बना कर ग्रिड को भेजते हैं तो उसके बदले कीमत भी मिलेगी। योजना का विस्तृत प्रस्ताव सचिवों की समिति को भेजा गया है। उसके बाद कैबिनेट इसे मंजूरी देगा। इसे आगामी वित्त वर्ष से ही लागू किया जाएगा।

सरकार की योजना कहती है कि अगर देश के सभी सिंचाई पंपों में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल होने लगे तो न सिर्फ मौजूदा बिजली की बचत होगी बल्कि 28 हजार मेगावाट अतिरिक्त बिजली का उत्पादन भी संभव होगा। कुसुम योजना के अगले चरण में सरकार किसानों को उनके खेतों के ऊपर या खेतों की मेड़ों पर सोलर पैनल लगा कर सौर ऊर्जा बनाने की छूट देगी।

यह किसानों को आय का एक अतिरिक्त जरिया देगा। साथ ही इस योजना के पूरी तरह से लागू होने से कृषि क्षेत्र में बिजली देने की मौजूदा सारी दिक्कतें खत्म हो जाएंगी, क्योंकि किसानों को इसकी जरूरत नहीं होगी। इसका एक असर होगा कि किसानों को मुफ्त बिजली दे कर शहरी उपभोक्ताओं से बिजली शुल्क वसूलने की मौजूदा राजनीति का भी समापन हो जाएगा।

एमबीए और इंजीनियरिंग करने के बाद शुरू की खेती, 6 साल में टर्नओवर हो गया 11 करोड़ रूपये …

जहां आज गांव के नौजवान खेती को छोडते जा रहें है वहीं उत्तर प्रदेश के दो भाईयों ने एमबीए और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद खेती-बाड़ी को अपना लिया है. 4 साल की मेहनत के बाद अब इनका 11 करोड़ का सालाना टर्नओवर है.

दोनों भाइयों ने बातचीत में बताया कि 2011 में इन्हें जॉब के लिए 4 लाख का पैकेज मिला था. लेकिन ये बिजनेस करना चाहते थे, इसलिए इन्होंने टेक्नॉलजी के माध्यम से खेती करने की ठान ली.

ऐसे आया खेती करने का ख्याल

लखनऊ के रहने वाले अभिषेक भट्ट कहते हैं, मेरे पिता की इंजीनियरिंग की नौकरी थी. इसलिए हम दोनों भाइयों को भी इसी फील्ड के लिए प्रोत्साहित किया गया. 2011 में मैंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डि‍ग्री हासिल की, जबकि भाई ने एमबीए कम्पलीट किया. पासआउट होते ही मुझे 4 लाख पैकेज की जॉब ऑफर हुई थी, लेकिन मैंने नहीं की. हम सिर्फ जॉब के भरोसे नहीं रहना चाहते थे. कुछ अलग करने की चाह थी.

एक बार मैं बैगलोर अपने अंकल के पास गया. उस वक्त वो किराए पर जमीन लेकर कैप्सकम यानी शि‍मला मिर्च की खेती करते थे. जिससे उनको लाखों की इनकम हो रही थी. वो देख मुझे बड़ा अजीब लगा क्योंकि हमारे यहां लोगों के पास जमीन होने के बावजूद वो खेती नहीं करते.

वहीं से मुझे खेती का ख्याल आया और हम दोनों भाइयों ने एग्रीकल्चर बिजनेस की बारीकियां सीखीं. इसके बाद हम अंकल के साथ महाराष्ट्र गए और वहां के किसानों के खेती करने का तरीका और उससे होने वाले बिजनेस को समझा.

वहां के किसानों की मार्केटिंग देख हमारे अंदर थोड़ा बहुत जो डर था, वो भी खत्म हो गया और हम अपनी तैयारी में जुट गए. मैंने टेक्निकल काम और खेती पर ध्यान दिया. भाई शशांक ने उसकी ब्रांडिग और मार्केटिंग पर काम किया.

बिजनेस पहुंचा सालाना 11 करोड़ टर्नओवर

साल 2011 में हमने ‘एग्रीप्लास्ट’ नाम से फर्म का पंजीकरण कराया. लखनऊ से थोड़ी दूर देवां रोड पर 3 एकड़ जमीन किराए पर ली, जिसका किराया प्रति एकड़ के हिसाब से 1 लाख रुपए सालाना है.

पहले कैप्सिकम की खेती शुरू की, फिर उसके आसपास अन्य सब्जियां उगाने लगे. थोड़े समय में ही छोटे-छोटे व्यापारी हमारे पास सब्ज‍ियां खरीदने आने लगे. 6 महीने में हमारे सेटअप को देखने के लिए आसपास के कई गांवों से लोग आने लगे.

3 साल तक शिमला मिर्च की खेती की. पहले साल 5 लाख रुपए की लागत आई, 8 लाख का टर्नओवर हुआ. 3 लाख का शुद्ध मुनाफा हुआ. दूसरे साल 7 लाख, तीसरे साल 12 लाख का मुनाफा हुआ.

प्रॉफिट से मिले पैसे से हमने और जमीनें किराए पर ली और उनपर भी खेती शुरू कर दी. हम इजराइली टेक्नॉलिजी से विदेशों में डिमांड होने वाले फूल और सब्ज‍ियों की खेती करते हैं. साल 2017-18 में हमारा टर्नओवर 11 करोड़ का रहा. यह दोनों भाई उन युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत है जो कृषि को छोड़कर शहरो का रुख करते हैं .