दोगुनी कमाई करने के लिए ऐसे करें मिर्च की उन्नत खेती

मिर्च भारत के अनेक राज्यों में पहाड़ी व मैदानी क्षेत्रों में फल के लिए उगायी जाती है।  मिर्चों में तीखापन या तेज़ी ओलियोरेजिल कैप्सिसिन नामक एक उड़नशील एल्केलॉइड के कारण तथा उग्रता कैप्साइसिन नामक एक रवेदार उग्र पदार्थ के कारण होती है।  भारत में मिर्च का प्रयोग हरी मिर्च की तरह एवं मसाले के रूप में किया जाता है।  इसे सब्जियों और चटनियों में डाला जाता है।

मिर्च के सुखाए हुए फलों में 0.16 से 0.39 प्रतिशत तक था सूखे बीजों में 26.1 प्रतिशत तेल पाया जाता है।  बाजार में आमतौर पर मिलने वाली मिर्चो में कैप्सीसिन की केवल 0.1 प्रतिशत मात्रा पायी जाती है।  मिर्च में अनेक औषधीय गुण भी होते हैं।  एक एस्कार्बिक अम्ल, विटामिन-सी की धनी होती है।

दोगुनी कमाई

हरी मिर्च की खेती से किसान लागत की तुलना में दोगुनी कमाई कर सकते हैं। शर्त यह है कि वे कृषि जलवायु क्षेत्र के अनुसार उन्नत प्रजातियों का प्रयोग करने के साथ ही फसल सुरक्षा के उचित उपाय करें।

फैजाबाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से संबद्ध कृषि विज्ञान केंद्र बेलीपार के सब्जी वैज्ञानिक डा.एसपी सिंह के अनुसार प्रति एकड़ खेती की लागत करीब 35-40 हजार रुपये आती है। इतने रकबे में करीब 60 क्विंटल तक उपज संभव है। बाजार में यह 20 रुपये प्रति किग्रा के भाव से भी बिके, तो भी किसान को करीब एक लाख 20 हजार रुपये मिलेंगे। 40 हजार की लागत निकालने के बाद भी करीब दो गुने का लाभ होगा

जलवायु

मिर्च गर्म और आर्द्र जलवायु में भली-भाँति उगती है।  लेकिन फलों के पकते समय शुष्क मौसम का होना आवश्यक है।  गर्म मौसम की फ़सल होने के कारण इसे उस समय तक नहीं उगाया जा सकता, जब तक कि मिट्टी का तापमान बढ़ न गया हो और पाले का प्रकोप टल न गया हो।  बीजों का अच्छा अंकुरण 18-30 डि सें. ग्रे. तापामन पर होता है।

यदि फूलते समय और फल बनते समय भूमि में नमी की कमी हो जाती है, तो फलियाँ, फल व छोटे फल गिरने लगते हैं।  मिर्च के फूल व फल आने के लिए सबसे उपयुक्त तापमान 25-30 डि सें. ग्रे. है. तेज़  मिर्च अपेक्षाकृत अधिक गर्मी सह लेती है।  फूलते समय ओस गिरना या तेज़  वर्षा होना फ़सल के लिए नुकसानदाई होता है।  क्योंकि इसके कारण फूल व छोटे फल टूट कर गिर जाते हैं |

क़िस्में

पूसा ज्वाला : इसके पौधे छोटे आकार के और पत्तियॉ चौड़ी होती हैं।  फल 9-10 सें०मी० लम्बे ,पतले, हल्के हरे रंग के होते हैं जो पकने पर हल्के लाल हो जाते हैं।  इसकी औसम उपज 75-80 क्विंटल  प्रति  हेक्टेअर , हरी मिर्च के लिए तथा 18-20 क्विंटल  प्रति  हेक्टेअर सूखी मिर्च के लिए होती है।

पूसा सदाबाहर : इस क़िस्म के पौधे सीधे व लम्बे ; 60 – 80 सें०मी० होते हैं।  फल 6-8 सें मी. लम्बे, गुच्छों में , 6-14 फल  प्रति  गुच्छा में आते हैं तथा सीधे ऊपर की ओर लगते हैं पके हुए फल चमकदार लाल रंग ले लेते है।  औसत पैदावार 90-100 क्विंटल, हरी मिर्च के लिए तथा 20 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर , सूखी मिर्च के लिए होती है।  यह क़िस्म मरोडिया, लीफ कर्लद्ध और मौजेक रोगों के लिए प्रतिरोधी है।

नर्सरी प्रबन्ध

नर्सरी बैंगन व टमाटर की तरह ही तैयारी की जाती है नर्सरी के लिए मिट्टी हल्की , भुरभुरी व पानी को जल्दी सोखने वाली होनी चाहिए।  पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों का होना भी जरूरी है।  नर्सरी में पर्याप्त मात्रा में धूप का आना भी जरूरी है।  नर्सरी को पाले से बचाने के लिए , नवम्बर-दिसम्बर बुआई में पानी का अच्छा प्रबन्ध होना चाहिए ।  नर्सरी की लम्बाई 10-15 फुट तथा चौड़ाई 2.3-3 फुट से अधिक नहीं होनी चाहिए क्योंकि निराई व अन्य कार्ये में कठिनाई आती है।  नर्सरी की उंचाई 6 इंच या आधा फीट रखनी चाहिए।  बीज की बुआई कतारों में करें।  कतारों का फासला 5-7 सें०मी० रखा जाता है।  पौध लगभग 6 सप्ताह में तैयार हो जाती है।

मृदा एवं खेती की तैयारी

मिर्च यद्यपि अनेक प्रकार की मिट्टियों में उगाई जा सकती है, तो भी अच्छी जल निकास व्यवस्था वाली कार्बनिक तत्वों से युक्त दुमट मिट्टियाँ इसके लिए सर्वेतम होती हैं। जहाँ फ़सल काल छोटा है, वहां बलुई तथा बलुई दोमट मिट्टयों को प्राथमिकता दी जाती है।  बरसाती फ़सल भारी तथा अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में बोई जानी चाहिए।

जमीन पांच-छः बार जोत कर व पाटा फेर कर समतल कर ली जाती है।  गोबर की सड़ी हुई खाद 300-400 क्विंटल, जुताई के समय मिला देनी चाहिए।  खेती की ऊपरी मिट्टी को महीन और समतल कर लिया जाना चाहिए तथा उचित आकार की क्यारियां बना लेते हैं।

बीज-दर

एक से डेढ़ किलोग्राम अच्छी मिर्च का बीज लगभग एक हेक्टेअर में रोपने लायक पर्याप्त पौध बनाने के लिए काफ़ी होता है।

निराई-गुड़ाई

पौधों की वृद्धि की आरम्भिक अवस्था में खरपतवारो पर नियंत्रण पाने के लिए दो तीन बाद निराई करना आवश्य होता है।  पौध रोपण के दो या तीन सप्ताह बाद मिट्टी चढाई जा सकती है।

सिंचाई

पहली सिंचाई पौध प्रतिरोपण के तुरन्त बाद की जाती है।  बाद में गर्म मौसम में हर पाँच-सात दिन तथा सर्दी में 10-12 दिनों के अन्तर पर फ़सल को सींचा जाता है।

बुआई

मैदानी और पहाड़ी ,दोनो ही इलाकों में मिर्च बोने के लिए सर्वोतम समय अप्रैल-जून तक का होता है।  बडे फलों वाली क़िस्में मैदानी में अगस्त से सितम्बर तक या उससे पूर्व जून-जुलाई में भी बोई जा सकती है।  पहाडों में इसे अप्रैल से मई के अन्त तक बोया जा सकता है।

उत्तर भारत में जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध हैं, मिर्च का बीज मानसून आने से लगभग 6 सप्ताह पूर्व बोया जता है और मानसून आने के साथ-साथ इसकी पौध खेतों में प्रतिरोपित कर दी जाती है।  इसके अलावा दूसरी फ़सल के लिए बुआई जाता नवम्बर-दिसम्बर में की जाती है और फ़सल मार्च से मई तक ली जाती है।

खाद एवं उर्वरक

गोबर की सड़ी हुई खाद लगभग 300-400 क्विंटल जुताई के समय गोबर मृदा में मिला देना चाहिए रोपाई से पहले 150 किलोग्राम यूरिया ,175 किलोग्राम सिंगल सुपर फ़ॉस्फ़ेट तथा 100 किलोग्राम म्यूरिएट ऑफ पोटाश तथा 150 किलोग्राम यूरिया बाद में लगाने की सिफारिश की जाती है।  यूरिया उर्वरक फूल आने से पहले अवश्य दे देना चाहिए।

पौध संरक्षण

आर्द्रगलन रोग  यह रोग ज्यादातर नर्सरी की पौध में आता है।  इस रोग में सतह , ज़मीन के पास द्धसे हुआ तना गलने लगता है तथा पौध मर जाती है।  इस रोग से बचाने के लिए बुआई से पहले बीज का उपचार फफंदूनाशक दवा कैप्टान 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करना चाहिए।  इसके अलावा कैप्टान 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर सप्ताह में एक बार नर्सरी में छिड़काव किया जाना चाहिए।

एन्थ्रेक्नोज रोग  इस रोग में पत्तियों और फलों में विशेष आकार के गहरे, भूरे और काले रंग के घब्बे पड़ते है।  इसके प्रभाव से पैदावार बहुत घट जाती है इसके बचाव के लिए वीर एम-45 या बाविस्टन नामक दवा 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव  करना चाहिए।

मरोडिया लीफ कर्ल रोग  यह मिर्च की एक भंयकर बीमारी है।  यह रोग बरसात की फ़सल में ज्यादातर आता है।  शुरू में पत्ते मुरझा जाते है।  एवं वृद्धि रुक जाती है।  अगर इसके समय रहते नहीं नियंत्रण किया गया हो तो ये पैदावार को भारी नकुसान पहुँचाता है।  यह एक विषाणु रोग है जिसका कोई दवा द्धारा नित्रंयण नहीं किया जा सकता है।

यह रोग विषाणु, सफेद मक्खी से फैलता है।  अतः इसका नियंत्रण भी सफेद मक्खी से छुटकारा पा कर ही किया जा सकता है।  इसके नियंत्रण के लिए रोगयुक्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें तथा 15 दिन के अतंराल में कीटनाशक रोगर या मैटासिस्टाक्स 2 मि०ली० प्रति ली की दर से छिड़काव करें।  इस रोग की प्रतिरोधी क़िस्में जैसे-पूसा ज्वाला, पूसा सदाबाहर और पन्त सी-1 को लगाना चाहिए।

मौजेक रोग  इस रोग में हल्के पीले रंग के घब्बे पत्तों पर पड़ जाते है।  बाद में पत्तियाँ पूरी तरह से पीली पड़ जाती है।  तथा वृद्धि रुक जाती है।  यह भी एक विषाणु रोग है जिसका नियंत्रण मरोडिया रोग की तरह ही है।

थ्रिप्स एवं एफिड  ये कीट पत्तियों से रस चूसते है और उपज के लिए हानिकारक होते है।  रोगर या मैटासिस्टाक्स 2 मि. ली.  प्रति ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से इनका नियंत्रण किया जा सकता है।

उपज

सिंचित क्षेत्रों में हरी मिर्च की औसत पैदावार लगभग 80-90 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर और सूखें फल की उपज 18-20 क्विंटल प्रति  हेक्टेअर होती है।

ऐसे करे खेती में नई तकनिक प्लास्टिक मल्चिंग का उपयोग, पूरी जानकारी पढ़े।

प्लास्टिक मल्चिंग क्या है।

खेत में लगे पोधों की जमीन को चारों तरफ से प्लास्टिक फिल्म के द्वारा सही तरीके से ढकने की प्रणाली को प्लास्टिक मल्चिंग कहते है। यह फिल्म कई प्रकार और कई रंग में आती है।

इस तकनीक का क्या फ़ायदा होता है।

इस तकनीक से खेत में पानी की नमी को बनाए रखने और वाष्पीकरण रोका जाता है। ये तकनीक खेत में मिटटी के कटाव को भी रोकती है। और खेत में खरपतवार को होने से बचाया जाता है। बाग़वानी में होने वाले खरपतवार नियंत्रण एवं पोधों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने में बहुत सहायक होती है।क्यों की इसमे भूमि के कठोर होने से बचाया जा सकता है और पोधों की जड़ों का विकास अच्छा होता है।

सब्जियों की फसल में इसका प्रयोग कैसे करे।

जिस खेत में सब्जी वाली फसल लगानी है उसे पहले अच्छे से जुताई कर ले फिर उसमे गोबर की खाद् और मिटटी परीक्षण करवा के उचित मात्रा में खाद् दे। फिर खेत में उठी हुई क्यारी बना ले। फिर उनके उपर ड्रिप सिंचाई की पाइप लाइन को बिछा ले।फिर 25 से 30 माइक्रोन प्लास्टिक मल्च फिल्म जो की सब्जियों के लिए बेहतर रहती है उसे उचित तरीके से बिछा दे फिर फिल्म के दोनों किनारों को मिटटी की परत से दबा दिया जाता हे। इसे आप ट्रैक्टर चालित यंत्र से भी दबा सकते है। फिर उस फिल्म पर गोलाई में पाइप से पोधों से पोधों की दूरी तय कर के छिद्र कर ले। किये हुए छेदों में बीज या नर्सरी में तैयार पोधों का रोपण कर ले।

फल वाली फसल में इसका प्रयोग।

फलदार पोधों के लिए इसका उपयोग जहाँ तक उस पौधे की छाँव रहती है। वाह तक करना उचित रहता है।इसके लिये फिल्म मल्च की लम्बाई और चौड़ाई को बराबर कर के कटिंग करे।उसके बाद पोधों के नीचे उग रही घास और खरपतवार को अच्छी तरह से उखाड़ के सफाई कर ले उसके बाद सिंचाई की नली को सही से सेट करने के बाद 100 माइक्रोन की प्लास्टिक की फिल्म मल्च जो की फल वाले पोधों के लिए उपयुक्त रहती है। उसे हाथों से पौधे के तने के आसपास अच्छे से लगनी है। फिर उसके चारों कोनों को 6 से 8 इंच तक मिटटी की परत से ढँकना है।

खेत में प्लास्टिक मल्चिंग करते समय सावधानियां।

  •  प्लास्टिक फिल्म हमेशा सुबह या शाम के समय लगानी चाहिए।
  •  फिल्म में ज्याद तनाव नही रखना चाहिए।
  •  फिल्म में जो भी सल हो उसे निकलने के बाद ही मिटटी चढ़ा वे।
  •  फिल्म में छेद करते वक्त सावधानी से करे सिंचाई नली का ध्यान रख के।
  •  छेद एक जैसे करे और फिल्म न फटे एस बात का ध्यान रखे।
  • मिटटी चढाने में दोनों साइड एक जेसी रखे
  • फिल्म की घड़ी हमेशा गोलाई में करे
  • फिल्म को फटने से बचाए ताकि उसका उपयोग दूसरी बार भी कर पाए और उपयोग होने के बाद उसे चाव में सुरक्षित रखे।

प्लास्टिक मल्चिंग की लागत कितनी आती है।

मल्चिंग की लागत कम ज्यादा हो सकती हे क्यों की इसका कारण खेत में क्यारी के बनाने के ऊपर होता हे क्यों की अलग अलग फसल के हिसाब से क्यारिया सकड़ी और चौड़ी होती हे और प्लास्टिक फिल्म का बाज़ार में मूल्य भी कम ज्यादा होता रहता है।
प्रति बीघा लगभग 8000 रूपये की लागत हो सकती है और मिटटी चढ़ाने में यदि यंत्रो का प्रयोग करे तो वो ख़र्चा भी होता है।

प्लास्टिक मल्चिग में शासन का अनुदान कितना है।

कृषि को उन्नत करने और इसे बढावा देने लिए मध्यप्रदेश सरकार द्वारा उधानिकी विभाग में इसके लिये समस्त किसानो को 50%या अधिकतम 16000 रूपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से अनुदान उपलब्ध कराया जाता है। इस योजना का लाभ पहले आओ पहले पाओ की तर्ज पर दिया जाता है।इसके अनुदान पाने के लिए आपको अपने जिले के विकास खंड में विरिष्ट उधान विकास अधिकारी को अपने आवेदन जमा करवा सकते हें। और जानकरी आप अपने ग्राम सेवक से भी ले सकते है।

खेती संग पोपलर लगाएं और डबल मुनाफा कमाएं

कृषि वानिकी तकनीक अब तेजी से बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश , हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के मैदानी भागों में यह तकनीक बहुत तेजी से किसानों में अपनी पैठ जमा रही है। इन इलाकों में पोपलर बहुत ज्यादा पोपुलर हो रहा है। राजस्थान के कुछ इलाकों में भी पोपलर की कतारों के बीच फसलें लहलहाती दिख जाती हैं या फिर फसलों के बीच सिर उठाते पोपलर के पेड़ फसल के प्रहरी बने खड़े नजर आते हैं।

पोपलर जल्दी से बढ़ने वाला वह पेड़ है, जो किसानों को अच्छा मुनाफा देता है। यह जंगलों की कमी को पूरा करता है और लकड़ी उद्योग की मांग को भी पूरा करता है।भारत में पोपलर साल 1950 में अमेरिका से लाया गया था। उत्तर भारत में यह बड़े पैमाने पर उगाया जाता है। यह पेड़ कार्बन डाईआक्साइड गैस को आबोहबा से सोख कर उसे लकड़ी और जैविक पदार्थ को तैयार करने में इस्तेमाल करता है।

पोपलुर के फायदेः

तेजी से बढ़ने की वजह से पोपुलर 5 से 8 साल में 90 से सौ सेंटीमीटर मोटा हो कर तकरीबन 2 सौ घनमीटर प्रति हेक्टेयर लकड़ी तैयार करता है। इस के अलावा यह उन नर्सरियों के लिए वरदान साबित हुआ है, जिन में बीज से फूल या सब्जी वाली पौध तैयार की जाती है और जहां ज्यादा गरमी में पौध के झुलसने का खतरा बना रहता है। यह पेड़ ओले, तेज बूंदों और आंधी से होने वाले नुकसान से भी फसल को बचाता है।

पोपलर की 1 साल पुरानी पौध तकरीबन 3 से 5 मीटर लंबी हो जाती है, जो बाजार में 15 से 20 रुपए में आसानी से बेची जा सकती है। 1 पेड़ के लट्ठे या लकड़ी 8 सौ से 24 सौ रुपए तक में बिकती है। किसान 1 हेक्टेयर पोपलर से साढ़े 5 से 9 लाख रुपए की कमाई कर सकते हैं और दूसरी फसलों से कमाई कर सकते हैं।

हरे चारे की कमी के समय पोपलर की पत्तियां गाय-भैंसों को सूखे चारे के साथ दी जा सकती हैं। भेड़-बकरियों को आधा किलो पोपलर रोजाना खिलान से खनिज प्रोटीन और विटामिन मिल जाते हैं।
पोपलुर की लकड़ी पैकिंग पेटी, कागज माचिस, खेल का सामान और फर्नीचर वगैरह बनाने में इस्तमाल होती है।

पौध और किस्मः

उत्तर भारत को आबोहवा के लिए जी-3, जी-4बी, एल-34, एस-7, सी-15, उदय क्रांति और बहार पोपलर की अच्छी किस्में हैं। डी-61, डी-66, एस-7सी8, एस-7सी 15, एस-7सी 4, एस 7 सी सी 20 एल-49, एल-247, एल-154 और एल-143 ऐसी किस्में हैं, जो फसलों के बढ़ने और पैदावार पर कम असर डालती हैं।

किसान इन किस्मों को कृषि विश्वविद्यालय, वन विभाग या प्राइवेट नर्सरियों से खरीद कर लगा सकते हैं या अपनी नर्सरी भी तैयार कर सकते हैं।

 

नर्सरी तैयार करनाः

पोपलर की नर्सरी भुरभुरी, रेतीली और उपजाऊ मिट्टी में बनाएं, इस की पौध कटिंग से तैयार की जाती है। अच्छी पौध के लिए 1-2 साल के पौधे से कटिंग करें। कटिंग में 3-4 आंखें हों, जिन की लंबाई 18-20 सेंटीमीटर और मोटाई 2-3 सेंटीमीटर हो। यह कटिंग जनवरी महीने में कर सकते हैं। कटिंग के बाद उन कलमांं को 24 घंटे के लिए पानी में भिगो कर रखें।

कलम कटिंग करने के साथ हम क्यारी भी तैयार करते हैं। क्यारी का साइज 15-5 मीटर होना चाहिए। क्यारी में कटिंग को मिट्टी में खड़ा कर के 50ग50 सेंटीमीटर की दूरी पर लगा देना चाहिए। इस साइज में 1 हेक्टेयर रकबे में 96 क्यारियां तैयार हो जाती हैं और हर क्यारी में 30 कटिंग लग जाती हैं। इस तरह 1 हेक्टेयर खेत में 28 हजार 8 सौ कटिंग लग जाती है।

रोपाईः

नर्सरी में उगने वाला पौधा 1 साल बाद खेत में रोपने के लिए तैयार हो जाता है। पौधे लगाने के लिए गड्ढे 4×4 या 3×3 मीटर की दूरी पर 90 सेंटीमीटर गहरे और 15 सेंटीमीटर चौड़े खोदने चाहिए।

गड्ढे से निकली मिट्टी में 2-3 किलो गोबर की खाद, 50 ग्राम डीएपी और 25 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश मिला कर मिट्टी तैयार कर लें, अगर मिट्टी में जिंक की कमी हो, तो 1 गड्ढे में 15-20 ग्राम जिंक सल्फेट और 10 ग्राम एल्डेक्स पाउडर मिलाएं।

पौधे को गड्ढे में सीधा खड़ा कर मिट्टी को इस तरह भरें कि गड्ढा ऊपर से 6 इंच खाली रहे। पौधे लगाने का समय जनवरी फरवरी होता है। इस के बाद हर 15 दिनांं पर सिंचाईं करते रहें। मानसून आने से पहले तक सिंचाई करना जरूरी होता है।

देखभालः

पोपलर की पहले साल हर 15 दिनों बाद नीचे से 3 मीटर तक आंखें तोड़तें रहें, दूसरे व तीसरे साल जनवरी में जो टहनियां बीच वाली टहनी के साथ-साथ चल रहीं हो या दूसरी टहनियों में उलझ रहीं हों, उन्हें निकाल दें, चौथे साल मई व अगस्त में 2 बार निराई करें, इस के बाद पांचवे और छठे साल नीचे के एक तिहाई व आधे हिस्से से टहनियां छांट दें|

कृषि वानिकीः

पोपलर की यह खासियत है कि यह पौधा पतझड़ होने पर दिसंबर से मार्च-अप्रैल के महीनां तक पत्तियां को गिरा देता है। नंगा पेड़ खेत में खड़ा रहता है। इसलिए गेहूं, जौ, जई, बरसीम, मटर, आलू, सरसों, गोभी, टमाटर, बैंगन या मिर्च वगैरह की फसलें पोपलर के नीचे आसानी से उगाई जा सकती हैं।

खरीफ की फसलों में मक्का, ज्वार, अरहर, उड़द, मूंग और सूरजमुखी शुरू के 3 सालों तक आसानी से उगाई जा सकती है। जायद में लौकी, टिंडा, टमाटर, खीरा, ककड़ी, और खरबूजे की खेती की जा सकती है। 4-5 साल पुराने पापुलर के नीचे हल्दी, अदरक, पुदीना और छाया में पनपने वाली फसलें उगा सकते हैं।

इस तकनीक से गेहूं बोने पर कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी बेमौसम बारिश

खेती में पहली बार ये सिद्ध हुआ है कि ज़ीरो टिलेज तकनीक से गेहूं की बुआई करने पर उत्पादन बढ़ जाता है। ये तरीका खासतौर पर मौसम के बदलावों और अनियमितताओं से लड़ रहे छोटे किसानों के खेती में अच्छे भविष्य के लिए एक सशक्त विकल्प हो सकता है।

ज़ीरो टिलेज तकनीक में किसान धान की कटाई के बाद बिना खेत से खरपतवार हटाए और बिना जुताई किये सीधे नई फसल के बीज बो देता है।

इस तरीके की पुष्टि हरियाणा के करनाल में 200 छोटे-मंझोले किसानों के साथ खेती के शोध के बाद की गई। इन 200 किसानों ने ज़ीरो टिलेज तकनीक से खेती करके ये पाया कि पहले पारम्परिक तकनीक के मुकाबले गेंहू की उपज औसतन 16 प्रतिशत ज़्यादा हुई। इस तकनीक का दूसरा फायदा ये पाया गया कि मौसम की अनियमितताओं के चलते दिसम्बर-फरवरी के दौरान की बेमौसम बारिश की स्थिति में भी गेहूं खराब नहीं हुए।

पारंपरिक तरीके से गेंहू की खेती किसानों के लिए एक खर्चीला व्यवसाय बन चुका है। पारम्परिक तरीके से खेती का मतलब ये हुआ कि किसान धान की फसल हटने के बाद पहले मजदूर लगाकर खरपतवार खेत से हटाएं, फिर दो-तीन पर ट्रैक्टर किराए पर लेकर पूरे खेत की जुताई करें। फिर अकेले या मजदूरों के माध्यम से छिड़काव करके बीज की बुआई होती है। इन प्रक्रियाओं के बाद एक राउंड रोटरी से फिर जुताई करनी पड़ती है।

बेमौसम बारिश से नहीं पड़ेगा गेहूं को फर्क

ज़ीरो टिलेज तकनीक से गेहूं की खेती करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें बेमौसम बारिश से फसल बर्बाद नहीं होती। हाल के कुछ वर्षों में विश्व भर के मौसम में आ रहे बदलावों का असर भारत की खेती पर भी पड़ा है। लगातार कुछ वर्षों से जनवरी से मार्च के दौरान होने वाली बारिश से देश की रबी की फसल में काफी नुकसान देखा गया है। लेकिन नई तकनीक गेहूं की फसल बर्बाद होने का ख़तरा कम हो जाता है।

‘पारम्परिक तरीके से बोए गए गेहूं के बीज तेज़ बारिश से पानी भर जाने पर खराब हो जाते हैं,” करनाल में हुई रिसर्च के मुखिया जीतेंद्र प्रकाश आर्यल ने बताया। जीतेंद्र की रिसर्च को गेहूं पर शोध करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था सीमिट ने अपनी पत्रिका में प्रकाशित किया है।

जीतेंद्र ने बताया कि ज़ीरों टिलेज तकनीक में होता यह है कि गेहूं को बिना जुताई सीधे धान के खरपतवार के साथ एक निश्चित गहराई पर बो दिया जाता है। बुवाई में खास तरह की मशीन का इस्तेमाल होता है। धान के खरपतवार बारिश होन की स्थिति में न सिर्फ बीजों की रक्षा करते हैं बल्कि पानी तेजी से सोखकर फसल को बचाते हैं।

विश्व की बड़ी आबादी को रोज़गार देने वाले गेहूं के लिए ज़रूरी है ये नई तकनीक

भारत में लगभग तीन करोड़ हेक्टेयर में गेहूं की खेती की जाती है। एशिया महाद्वीप के दक्षिणी भाग में गेहूं करोड़ों लोगों को रोज़ाना खाना उपलब्ध कराने के लिए ज़रूरी फसल है। इस फसल पर करोड़ों किसानों की कमाई भी निर्भर है।

इतनी ज़रूरी फसल को मौसम के बदलावों से बचाने की बहुत ज़रूरत है। शोध में प्रकाशित जानकारी के अनुसार एशिया महाद्वीप के दक्षिणी हिस्से में तापमान में वृद्धि हो रही है और बेमौसम बारिश स्थिति और खराब बना रही है।

गेहूं जैसी फसल पर रात के तापमान में एक डिग्री सेल्सियस का अंतर भी उपज में 6 प्रतिशत तक प्रभाव डालता है। ऐसे में गेहूं की फसल को मौसम के बदलावों से बचाने के लिए इस तरह की नई तकनीकों को अपनाना किसानों के लिए ज़रूरी होता जा रहा है।इस मशीन की कीमत 35000 से शुरू हो जाती है यह मशीन बहुत आम है इस लिए आप इस मशीन को कहीं से भी खरीद सकते है ।

यह मशीन कैसे काम करती है उसके लिए वीडियो देखें

एमपी के इस किसान ने 7 हज़ार रुपये लगाकर एक एकड़ गेहूं से कमाए 90 हज़ार

मध्यप्रदेश के 23 वर्षीय एक युवा किसान ने सेल्स ऑफिसर की नौकरी छोड़कर पिछले तीन वर्षों से सात बीघे जैविक खेती करना शुरू किया। इनके खेत में इस वर्ष एक एकड़ ‘बंशी’ गेहूं में लागत सात हजार आयी और मुनाफा 90 हजार हुआ, क्योंकि जैविक ढंग से किया गया बंशी गेहूं तीन गुना अधिक कीमत पर बिका।

इस तरह तैयार की खाद

वो आगे बताते हैं, “पोषक तत्वों से भरपूर बंशी गेहूँ को जैविक ढंग से करने की वजह से खाने के लिए इसे खरीदने वालों ने 5000 कुंतल में खरीदा, अपने खेतों में हमने सिर्फ गाय के गोबर, गोमूत्र, बेसन और गुण के मिश्रण से तैयार खाद का ही प्रयोग किया।” डाक्टर ईश्वर गुर्जरमंदसौर जिले के पहले किसान नहीं हैं जो जैविक ढंग से खेती कर अपनी फसल से अच्छा मुनाफा कमा रहे हों बल्कि मंदसौर जिले के सैकड़ों किसानो का मानना है कि जैविक ढंग से की गयी किसी भी फसल को सामान्य दाम से तीन गुना ज्यादा कीमत पर बेच सकते हैं।

5000 रुपये कुंतल में बिका गेहूं

गेहूं के सही मूल्य के लिए जहां एक ओर किसान आन्दोलन कर रहे हैं वहीं आयुर्वेदिक डॉक्टर ईश्वर गुर्जर अपने खेत के गेहूं को पांच हजार प्रति कुंतल बेच रहे हैं। मध्यप्रदेश शासन के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी पीएस बारचे देशी बीज की महत्ता बताते हैं, “देशी बीज किसी भी फसल का हो उसे संरक्षित करने की जरूरत है, बंशी गेहूं वर्षों पुराना गेहूं है पंजाब और महाराष्ट्र की लैब में इस गेहूं का परिक्षण कराया जिसमे 18 पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जबकि बाकी गेहूं में आठ नौ प्रतिशत ही पोषक तत्व होते हैं।”

उन्होंने आगे बताया, “इस समय देश कुपोषण से गुजर रहा है इसलिए देशी बीजों को बचाना बहुत जरूरी है क्योंकि सबसे ज्यादा पोषक तत्व देशी बीजों में ही पाए जाते हैं, किसान अपने खेतों में देशी बीजों का प्रयोग कर जीरों बजट से खेती करें, जैविक ढंग से की गयी फसलों की मांग देश के साथ-साथ विदेशों में भी बहुत हैं और इन फसलों की कीमत भी सामान्य कीमत से ज्यादा होती है।”

                                                                                                                                                

खेत में नहीं करते कीटनाशक का प्रयोग

ये अपने खेतों में बाजार से खरीदी गयी किसी भी खाद या कीटनाशक का प्रयोग नहीं करते। बोआई से पहले बीज शोधन जरुर करते हैं। भूमि के पोषक तत्व और उपजाऊंपन को बनाये रखने के लिए डॉक्टर गुर्जर जैविक खाद बनाने से लेकर कीटनाशक दवाइयां भी खुद ही बना लेते हैं। उनका मानना है, “अगर हमारे पास अपने देशी बीज संरक्षित हो, खुद की बनाई खाद हो तो हमारी निर्भरता बाजार से कम होगी, देशी बीज और जैविक खेती दोनों ही हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहतर हैं, हमारे भोजन में पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा मिलेगी साथ बाजार भाव भी अच्छा मिलेगा।”

ग्लूकोज की मात्रा होती है कम

महाराष्ट्र के प्रगतिशील किसान पद्मश्री सुभाष पालेकर अपने शिविरों में किसानों को देशी बीज और जीरो बजट खेती करने के लिए प्रेरित करते हैं। बंशी गेहूं के बारे में उनका कहना है कि इस गेहूं को खाने में मधुमेह के रोगियों को लाभ मिलता है, क्योंकि इसमें ग्लूकोज की मात्रा काफी कम रहती है। साथ ही यह अन्य गंभीर बीमारियों में भी गेहूं कारगर है। यह आसानी से पच जाता है।

बीज शोधन के लिए बीजामृत (100 किलो बीज के लिए सामग्री)-

पांच किलो देशी गाय का गोबर, पांच किलो गोमूत्र, 20 लीटर पानी, 50 ग्राम चूना, 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी।

सभी सामग्री को मिलाकर 24 घंटे प्लास्टिक के ड्रम में भरकर रख देते हैं। इसके बाद इस बीजामृत को 100 किलो बीज में मिलाकर फर्श पर कपड़े के ऊपर बिछाकर छांव में एक दिन के लिए सुखा देते हैं, ये बीज शोधन की प्रक्रिया है इसके बड़ा बीज की बोआई करते हैं।

पौधों का भोजन जीवामृत

10 किलो गोबर, 10 किलो गोमूत्र, दो किलो गुड़ या फलों का गूदा, दो किलो बेसन, 200 लीटर पानी, 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी।

सभी सामग्री को मिलाकर 48 घंटे सीमेंट या प्लास्टिक के ड्रम में भरकर रख देते हैं। 48 घंटे बाद फसल की सिंचाई के दौरान इसका प्रयोग करते हैं। जीवामृत बनाने के 15 दिन तक ही इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, किसी भी फसल में 21 दिन बाद इसको पानी के साथ या छिड़काव करके प्रयोग कर सकते हैं। ये फसल में खाद का काम करता है इसका प्रयोग पूरी फसल में तीन से चे बार किया जा सकता है।

100 किलो गाय का गोबर, एक लीटर गोमूत्र, एक किलो गुड़ या फलों का गूदा, दो किलो बेसन(किसी भी डाल का), 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी।सभी सामग्री को एक साथ मिलाकर पालीथिन पर फैला देते हैं, 48 घंटे छायादार जगह पर रखकर जूट के बोरे से ढक देते हैं, इसके बाद 48 घंटे और रखकर इसे सुखाकर इसका भंडारण भी कर सकते हैं, ये खाद एक एकड़ के लिए पर्याप्त है। इससे खेत में पोषण और जीवाणु की पूर्ति होती है।

कीटनाशक और फसल की सुरक्षा के लिए अग्नियास्त्र (तनो के अन्दर कीट, इल्ली सफेद मच्छर, माहू)—

20 लीटर गोमूत्र, पांच किलो नीम के पत्ते, 500 ग्राम तम्बाकू पाउडर, 500 ग्राम हरी तीखी मिर्च, 500 ग्राम लहसुन की चटनी।

सभी सामग्री को मिट्टी के बर्तन में डालकर तीन चार उबाल लगाते हैं, इसके बाद इसे ठंडा होने के लिए 48 घंटे के लिए रख देते हैं। इसके बाद इसे छानकर किसी बर्तन में रख देते हैं। 16 लीटर की टंकी में 250 एमएल अग्नियास्त्र डालते हैं, एक एकड़ में जितनी पानी की टंकी का छिड़काव करेंगे हर टंकी में 250 एमएल अग्नियास्त्र डाल देंगे। इसके छिड़काव से फसल में कोई भी कीट नहीं लगेंगे। तीन महीने तक ही इसका उपयोग कर सकते हैं।

NEWS SOURCE- Gaonconnection News

एक-एक मीटर की दूरी पर लगाए अनार, आंधी में भी नहीं गिरे पौधे

डीडीए उद्यानिकी अजय चौहान ने बताया अनार की खेती के लिए हल्की जमीन अत्यंत उपयुक्त होती है। ऐसी जमीन में क्यारी से क्यारी 5 मीटर व पौधे से पौधे की दूरी 3 मीटर रखना चाहिए। एक हेक्टेयर में 667 पौधे लगाए जाते हैं। पौधे लगाने के दूसरे वर्ष में प्रति पौधा 10-15 किलो का उत्पादन शुरू होता है। जो साल-दर-साल बढ़कर 30-35 किलो तक पहुंच जाता है। इस प्रकार एक बार पौधा लगाने के बाद वह आगामी 30 साल तक लगातार उत्पादन देता रहता है।

अनार के पौधे को विशेष काट-छांट की आवश्यकता पड़ती है। वही ड्रिप से पानी देने के कारण उत्पादन लागत भी कम हो जाती है। शासन भी राष्ट्रीय कृषि मिशन के तहत प्रति हेक्टेयर प्रथम वर्ष 45 हजार और दूसरे व तीसरे वर्ष 15-15 हजार रुपए का अनुदान देता है।

यह है हाईडेंसिटी प्लांटेशन तकनीक

अल्टाडेंसिटी प्लांटेशन तकनीक में पौधों को कम दूरी पर लगाया जाता है। ऊंचाई को नियंत्रित रखने के लिए समय-समय पर कटाई-छंटाई करना आवश्यक है। शाखा आने पर उसे ऊपर से काट दें। काटी शाखा में फिर तीन शाखाएं आती है। एक बढ़ने पर इसे फिर काट देते हैं। इस तरह यह पेड़ छतरीनुमा बन जाता है, इसकी ऊंचाई छह फीट रहती है। कृषि कॉलेज में हो रहे अनुसंधान में पौधे से पौधे की दूरी 1 मीटर और कतार से कतार की दूरी 3 मीटर रखी है। इस लिहाज से एक एकड़ में 674 पौधे आते हैं।

इसलिए हवा-आंधी से आड़ी नहीं होती है फसल 

उद्यानिकी विभाग के सेवानिवृत्त उद्यान विकास अधिकारी जवाहरलाल जैन ने बताया अल्ट्रा डेंसिटी प्लांटेशन तकनीक से पौधे रोपने पर तेज हवाओं का असर नहीं होता है। पेड़ अधिक व नुकसान कम होने के कारण चार गुना तक पैदावार में बढ़ोतरी होती है। किसानों की आय में बढ़ोतरी होगी। वहीं, सामान्य पद्धति से रोपे गए पौधे तेज हवा, बेमौसम बारिश होने से आड़े हो जाते हैं, फल झड़ने लगते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

अद्भुत हुनरः गेहूं के दानों से बनाया 222 किलो का सिक्का

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में एक किसान के बेटे का अद्भुत हुनर देखने को मिला है। यहां किसान के बेटे ने 222 किलो का गेहूं का सिक्का बनाकर जिले व प्रदेश का नाम रोशन किया है। इस सिक्के को देखने के लिए गांव ही नहीं बल्कि पड़ोसी जनपद के लोगों का हुजूम भी इकठ्ठा हो रहा है।

दरअसल मामला जिले के धरमपुर सराय गांव का है। जहां के रहने वाले शैलेन्द्र कुमार ने 5 फुट उंचाई का 2 क्विंटल, 11 किलो गेहूं के दानों से एक रुपए का सिक्का बनाया है।

यह सिक्का महज 45 दिनों में एक साधारण किसान के बेटे ने बनाकर तैयार किया है। वहीं गांव की युवा पीढ़ी भी शैलेन्द्र के इस कार्यों की प्रशंसा करते हुए गेहूं से तैयार इस एक रुपए के सिक्के को गिनीज बुक में दर्ज कराने की मांग कर रही है।

शैलेन्द्र ने बताया कि एक रुपए के सिक्के में गेहूं की बाली देख कर उसे यह सिक्का बनाने की प्रेरणा मिली। उसका मानना है कि देश में गेहूं नहीं होगा तो किसान खुशहाल नहीं होगा इसीलिए उसने यह सिक्का बनाया है। किसी भी देश की धातुई मुद्रा का गेहूं या अन्य किसी अनाज के दाने से बनाया गया इतना विशाल और अद्भुत प्रतिरूप शायद विश्व में पहली बार बना होगा।

71 साल के किसान का कमल ,इस नई तकनीक से ऊगा दी सूखे में धान की फसल

छतीसगढ़: ग्राम रेड़ा के 71 वर्षीय ननकी दाऊ साहू द्वारा कृषि में कुछ नया करने की जुनून देखते ही बनता है। इनकी खेती के प्रति वैज्ञानिक सोच और एसआरआई पद्घति से धान की खेती कर रहें हैं। इस पद्घति से की जा रही खेती से सूखा के बाद भी हरियाली नजर आ रही है।

सारंगढ़ एवं बरमकेला अंचल के किसान धान की खेती में सूखे की मार झेल रहे हैं। इन ब्लाकों के तो कई-कई गांव में धान की फसल पुरी तरह से समाप्त हो चुकी है। लेकिन ननकी की धान की फसल लहलहा रही है। जो क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल ननकी दाऊ एसआरआई पद्घति से धान की खेती कर रहें हैं। इस पद्घति से की जा रही खेती से इनकी खेतों में एक अजीब सी हरियाली नजर आ रही हैं।

वहीं इनके एक खेत में लगे मकरंद धान की फसल के खेत के पास से गुजरने में एक भिनी भिनी खुशबू आती है। जिसे देखने के लिए आसपास गंाव के किसान ही नहीं दूर दराज के किसान भी देखने आ रहें हैं। कृषक ननकी दाऊ बताते है कि इस वर्ष जब पुरे देश में कमजोर मानसून होने की आशंका की खबर सुनने के बाद वह अपनी खेतों में एसआरआई पद्घति से धान की फसल लेने का निर्णय लिया।

इस विधि से धान की खेती में कई फायदे हैं। पारंपरिक खेती इसकी खेती बहुत अच्छी है। बीज दर में भी बहुत फर्क है। पारंपरिक खेती में प्रति एकड़ 30 किलो धान बीज लगता है। जबकि इसकी खेती में प्रति एकड़ 2.5 से 3 किलो धान बीज लग रहा है। पारंपरिक खेती में प्रति एकड़ 20 से 21 हजार खर्च आता है।

वर्तमान में इस खेती में अभी तक प्रति एकड़ की खेती में 5 हजार 800 रुपए खर्च आया है। 4 से 5 हजार कटाई के दौरान खर्च आएगा। वहीं रसायनिक खाद के स्थान पर वह केंचुआ डाल रहा है। इससे धान में होने वाले बीमारी एवं कीड़े नहीं हो रहे हैं। जिस कारण कीटनाशक एवं फफूंद नाशक दवाई का उपयोग नहीं हो रहा है। केंचुआ खाद से धान के लिए सभी पोषण तत्व होने से रसायनिक खाद डालने की आवश्यकता नहीं हो रही है।

एसआरआई विधि में कम पानी में अच्छी धान की फसल 

एसआरआई विधि में लगातार खेत में पानी नहीं रखा जाता है जड़ों को आर्द्र रखने लायक पानी दिया जाता है। आमतौर पर पारंपरिक धान की खेती में एक किलो के धान के उत्पादन में करीब 3 हजार 5 सौ लीटर की आवश्यकता होती है। कृषि अधिकारियों द्वारा इस पद्घति में खेती करने से करीब 1 हजार लीटर पानी में ही एक किलो धान उत्पादन बताया जा रहा है।

ननकी को मिल चुके हैं कई सम्मान 

नककी दाऊ को खेती करने का अजीब सा जिद व जुनून सवार रहता है। 71 वर्ष के उम्र में भी रोजाना खेतों में 8 घंटा तक का समय देता है। यही कारण है कि इनकी खेती की चर्चा होनी लगी है। 10 नवम्बर 2014 को भारतीय किसान संघ अधिवेशन नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री व वर्तमान के उपराष्ट्रपति वैंकैया नायडू ने कृषि क्षेत्र में अच्छे कार्य को लेकर सम्मानित हुए। वही जयपुर में 20 फरवरी 2016 आयोजित भारतीय किसान संघ अधिवेशन में भी सम्मान किया गया। सारंगढ़ ब्लाक के ग्राम रेड़ा के कृषक ननकी दाऊ की लहलहा रही है जबकि सारंगढ़ अंचल सूखे के चपेट से जूझ रहा है।

एसआरआई विधि से की गई धान की खेती से बीज दर न्यूनतम मात्रा में आता है। वही कम पानी व कम लागत से अच्छी पैदावार किसान पा सकते है। इस विधि में किस्सों की संख्या 45 से 50 तक जाती है। इससे उत्पादन में फर्क आता है। वहीं इस खेती में देशी खादों का उपयोग होता है। ” जीपी गोस्वामी, वरिष्ठ कृषि अधिकारी, सारंगढ़

बासमती धान ने खिलाये किसानों के चेहरे। इतने रुपए बढ़े भाव

बासमतीधान ने किसानों के चेहरे को खिला दिया है। पहली ही ढेरी तरावड़ी में 3725 रुपए के भाव में बिकी है। इसका रेट चार हजार रुपए प्रति क्विंटल तक जाने की उम्मीद है। अनाज मंडियां धान से अट चुकी हैं। प्रत्येक वैरायटी के अच्छे भाव से इस बार खेत के ठेके भी बढ़ेंगे और कृषि की तरफ रुझान बढ़ेगा।

जिले में तरावड़ी मंडी में सोमवार को 20 क्विंटल बासमती धान पहुंची। इसका पहला रेट 3725 रुपए लगा। पिछले साल इसका रेट 3100 रुपए तक ही था। इसी तरह 1121 का रेट 3200 और 1509 का रेट 2800 रुपए तक पहुंच गया है। किसानों ने बताया कि इस बार पैदावार भी अच्छी है और भाव में बेहतर मिल रहा है। इस बार की धान पिछले खर्चे भी पूरे करेगी। जिलेभर की मंडियों में धान की आवक जबरदस्त बढ़ रही है।

मंडी में पांव टेकने की जगह नहीं है। लिफ्टिंग की गति तेज की है, ताकि किसानों को धान डालने की जगह मिलती रहे। किसान देसराज, सुरेश कुमार, बलजीत सिंह, सुरेश, मदनलाल, सोमदत्त बताते हैं कि धान फसल ने इस बार खर्चे पूरे कर दिए है। भाव अच्छे मिल रहे हैं। उम्मीद करते हैं बासमती का रेट चार हजार रुपए पार कर जाए। तरावड़ी मंडी धान का कटोरा है। इसी मंडी में सबसे ज्यादा बासमती धान खरीदा जाता है।

बासमती में पैदावार बेहतर होने के कारण उनकी सोमवार को 20 क्विंटल धान 3725 रुपए के भाव लगी है। मंडी में बासमती का आगाज हो गया है। बासमती लेट आने के कारण अब मंडियों में बासमती पर ही फोक्स रहेगा।

^तरावड़ी मंडी में 3725 रुपए के भाव बिकी है। किसानों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं आने दी जाएगी। किसानों को चाहिए कि वह धान को सुखाकर लेकर आए। जल्दबाजी में नमीयुक्त धान कटवाएं। -गौरवआर्य, सेक्रेटरी, अनाज मंडी तरावड़ी।

 

अच्छे मुनाफे के लिए इस समय और ऐसे करें टमाटर की खेती

ये मौसम टमाटर की फसल लगाने के लिए सही होता है, वैसे तो टमाटर की खेती साल भर की जाती है, लेकिन इस समय टमाटर की खेती कर किसान अच्छी आमदनी कमा सकते हैं।

कृषि विज्ञान केन्द्र अंबेडकरनगर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ़ रवि प्रकाश मौर्या बताते हैं, “किसान समय से टमाटर की नर्सरी तैयार कर टमाटर की खेती कर सकता है, इस समय ट्रे में नर्सरी तैयार कर सकते हैं, इसमे जल्दी पौध तैयार होती है और पौधे समान्य तरीके से उगाए पौधों से ज्यादा रोग प्रतिरोधी भी होते हैं। इसलिए समय से खेत तैयार कर पौध लगा लें।”

टमाटर का पौधा ज्यादा ठण्ड और उच्च नमी को बर्दाश्त नहीं कर पाता है। विपरीत मौसम की वजह से इसकी खेती बुरी तरह प्रभावित होती है। बीज के विकास, अंकुरण, फूल आना और फल होने के लिए अलग-अलग मौसम की व्यापक विविधता चाहिए। 10 डिग्री सेंटीग्रेड से कम तापमान और 38 डिग्री सेंटीग्रेड से ज्यादा तापमान पौधे के विकास को धीमा कर देते हैं।

टमाटर पौध की तैयारी

पौध की तैयारी के लिए जीवांशयुक्त बलुवर दोमट मिट्टी की जरुरत होती है। स्वस्थ और मजबूत पौध तैयार करने के लिए 10 ग्राम डाई अमोनियम फास्फेट और 1.5-2.0 किग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति वर्ग मीटर की दर से लगाना चाहिए। क्यारियों की लंबाई लगभग तीन मीटर, चौड़ाई लगभग एक औ भूमि की सतह से उचाई कम से कम 25-30 सेमी. रखना उचित होता होता है। इस प्रकार की ऊंची क्यारियों में बीज की बुवाई पंक्तियों में करना चाहिए, जिनकी आपसी दूरी पांच-छह सेमी. रखना चाहिए, जबकि पौध से पौध की दूरी दो-तीन सेमी. रखना चाहिए।

बुवाई के बाद क्यारियों को सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट से ढक दें। इसके बाद फुहारे से हल्की सिचाई करें। अब इन क्यारियों को घास-फूस या सरकंडे के आवरण से ढ़क दें। आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई करते रहें। बुवाई के 20-05 दिनों बाद पौध रोपाई योग्य तैयार हो जाती है।

टमाटर की किस्में

  • सामान्य किस्में: पूसा गौरव, पूसा शीतल, सालेनागोला, साले नबड़ा, वी.एल.टमाटर-1, आजाद टी-2, अर्का विकास, अर्का सौरभ,पंत टी -3
  • संकर किस्में: रुपाली, नवीन, अविनाश-2, पूसा हाइब्रिड-4, मनीशा, विशाली, पूसा हाइब्रिड-2, रक्षिता, डी.आर.एल-304, एन.एस. 852, अर्कारक्षक, अर्का सम्राट, अर्का अनन्या

बीज की मात्रा

  • सामान्य किस्में: 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर

संकर किस्में: 200-250 ग्राम प्रति हेक्टेयर

टमाटर बीज का चयन

बीज उत्पादन के बाद खराब और टूटे बीज छांट लिया जाता है। बुवाई वाली बीज हर तरह से उत्तम किस्म की होनी चहिये| आकार में एक समान, मजबूत और जल्द अंकुरन वाली बीज को बुवाई के लिए चुना जाता है। विपरीत मौसम को भी सहनेवाली एफ-1 जेनरेशन वाली हाइब्रिड बीज जल्दी और अच्छी फसल देती है।

मिट्टी का चयन

खनिजीय मिट्टी और बलुई मिट्टी में टमाटर की खेती अच्छी होती है, लेकिन पौधों के लिए सबसे अच्छी बलुई मिट्टी होती है| अच्छी फसल के लिए मिट्टी की गहराई 15-20 सेमी होनी चाहिए।

टमाटर पौध की रोपाई

जब पौध में चा-छह पत्तियां आ जाए और ऊंचाई लगभग 20-25 सेमी. हो जाए तब पौध रोपाई के लिए तैयार समझना चाहिए। रोपाई के तीन-चा दिन पहले पौधशाला की सिंचाई बन्द कर देनी चाहिए। जाड़े के मौसम पौध को पाला से बचने के लिए क्यारियों को पालीथीन चादर की टनेल बनाकर ऊपर से ढक देना चाहिए।

उर्वरक देने की विधि

नत्रजन की आधी मात्रा तथा फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत की अंतिम जुताई के समय मिलानी चाहिए। गोबर की खाद की संपूर्ण मात्रा रोपाई से 15-20 दिन पहले ही मिलानी चाहिए। नत्रजन की शेष मात्रा सिंचित दशा में खरपतवार नियंत्रण के पश्चात रोपाई के 30-35 दिन बाद देनी चाहिए।