एमपी के इस किसान ने 7 हज़ार रुपये लगाकर एक एकड़ गेहूं से कमाए 90 हज़ार

मध्यप्रदेश के 23 वर्षीय एक युवा किसान ने सेल्स ऑफिसर की नौकरी छोड़कर पिछले तीन वर्षों से सात बीघे जैविक खेती करना शुरू किया। इनके खेत में इस वर्ष एक एकड़ ‘बंशी’ गेहूं में लागत सात हजार आयी और मुनाफा 90 हजार हुआ, क्योंकि जैविक ढंग से किया गया बंशी गेहूं तीन गुना अधिक कीमत पर बिका।

इस तरह तैयार की खाद

वो आगे बताते हैं, “पोषक तत्वों से भरपूर बंशी गेहूँ को जैविक ढंग से करने की वजह से खाने के लिए इसे खरीदने वालों ने 5000 कुंतल में खरीदा, अपने खेतों में हमने सिर्फ गाय के गोबर, गोमूत्र, बेसन और गुण के मिश्रण से तैयार खाद का ही प्रयोग किया।” डाक्टर ईश्वर गुर्जरमंदसौर जिले के पहले किसान नहीं हैं जो जैविक ढंग से खेती कर अपनी फसल से अच्छा मुनाफा कमा रहे हों बल्कि मंदसौर जिले के सैकड़ों किसानो का मानना है कि जैविक ढंग से की गयी किसी भी फसल को सामान्य दाम से तीन गुना ज्यादा कीमत पर बेच सकते हैं।

5000 रुपये कुंतल में बिका गेहूं

गेहूं के सही मूल्य के लिए जहां एक ओर किसान आन्दोलन कर रहे हैं वहीं आयुर्वेदिक डॉक्टर ईश्वर गुर्जर अपने खेत के गेहूं को पांच हजार प्रति कुंतल बेच रहे हैं। मध्यप्रदेश शासन के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी पीएस बारचे देशी बीज की महत्ता बताते हैं, “देशी बीज किसी भी फसल का हो उसे संरक्षित करने की जरूरत है, बंशी गेहूं वर्षों पुराना गेहूं है पंजाब और महाराष्ट्र की लैब में इस गेहूं का परिक्षण कराया जिसमे 18 पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जबकि बाकी गेहूं में आठ नौ प्रतिशत ही पोषक तत्व होते हैं।”

उन्होंने आगे बताया, “इस समय देश कुपोषण से गुजर रहा है इसलिए देशी बीजों को बचाना बहुत जरूरी है क्योंकि सबसे ज्यादा पोषक तत्व देशी बीजों में ही पाए जाते हैं, किसान अपने खेतों में देशी बीजों का प्रयोग कर जीरों बजट से खेती करें, जैविक ढंग से की गयी फसलों की मांग देश के साथ-साथ विदेशों में भी बहुत हैं और इन फसलों की कीमत भी सामान्य कीमत से ज्यादा होती है।”

                                                                                                                                                

खेत में नहीं करते कीटनाशक का प्रयोग

ये अपने खेतों में बाजार से खरीदी गयी किसी भी खाद या कीटनाशक का प्रयोग नहीं करते। बोआई से पहले बीज शोधन जरुर करते हैं। भूमि के पोषक तत्व और उपजाऊंपन को बनाये रखने के लिए डॉक्टर गुर्जर जैविक खाद बनाने से लेकर कीटनाशक दवाइयां भी खुद ही बना लेते हैं। उनका मानना है, “अगर हमारे पास अपने देशी बीज संरक्षित हो, खुद की बनाई खाद हो तो हमारी निर्भरता बाजार से कम होगी, देशी बीज और जैविक खेती दोनों ही हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहतर हैं, हमारे भोजन में पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा मिलेगी साथ बाजार भाव भी अच्छा मिलेगा।”

ग्लूकोज की मात्रा होती है कम

महाराष्ट्र के प्रगतिशील किसान पद्मश्री सुभाष पालेकर अपने शिविरों में किसानों को देशी बीज और जीरो बजट खेती करने के लिए प्रेरित करते हैं। बंशी गेहूं के बारे में उनका कहना है कि इस गेहूं को खाने में मधुमेह के रोगियों को लाभ मिलता है, क्योंकि इसमें ग्लूकोज की मात्रा काफी कम रहती है। साथ ही यह अन्य गंभीर बीमारियों में भी गेहूं कारगर है। यह आसानी से पच जाता है।

बीज शोधन के लिए बीजामृत (100 किलो बीज के लिए सामग्री)-

पांच किलो देशी गाय का गोबर, पांच किलो गोमूत्र, 20 लीटर पानी, 50 ग्राम चूना, 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी।

सभी सामग्री को मिलाकर 24 घंटे प्लास्टिक के ड्रम में भरकर रख देते हैं। इसके बाद इस बीजामृत को 100 किलो बीज में मिलाकर फर्श पर कपड़े के ऊपर बिछाकर छांव में एक दिन के लिए सुखा देते हैं, ये बीज शोधन की प्रक्रिया है इसके बड़ा बीज की बोआई करते हैं।

पौधों का भोजन जीवामृत

10 किलो गोबर, 10 किलो गोमूत्र, दो किलो गुड़ या फलों का गूदा, दो किलो बेसन, 200 लीटर पानी, 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी।

सभी सामग्री को मिलाकर 48 घंटे सीमेंट या प्लास्टिक के ड्रम में भरकर रख देते हैं। 48 घंटे बाद फसल की सिंचाई के दौरान इसका प्रयोग करते हैं। जीवामृत बनाने के 15 दिन तक ही इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, किसी भी फसल में 21 दिन बाद इसको पानी के साथ या छिड़काव करके प्रयोग कर सकते हैं। ये फसल में खाद का काम करता है इसका प्रयोग पूरी फसल में तीन से चे बार किया जा सकता है।

100 किलो गाय का गोबर, एक लीटर गोमूत्र, एक किलो गुड़ या फलों का गूदा, दो किलो बेसन(किसी भी डाल का), 50 ग्राम मेड या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी।सभी सामग्री को एक साथ मिलाकर पालीथिन पर फैला देते हैं, 48 घंटे छायादार जगह पर रखकर जूट के बोरे से ढक देते हैं, इसके बाद 48 घंटे और रखकर इसे सुखाकर इसका भंडारण भी कर सकते हैं, ये खाद एक एकड़ के लिए पर्याप्त है। इससे खेत में पोषण और जीवाणु की पूर्ति होती है।

कीटनाशक और फसल की सुरक्षा के लिए अग्नियास्त्र (तनो के अन्दर कीट, इल्ली सफेद मच्छर, माहू)—

20 लीटर गोमूत्र, पांच किलो नीम के पत्ते, 500 ग्राम तम्बाकू पाउडर, 500 ग्राम हरी तीखी मिर्च, 500 ग्राम लहसुन की चटनी।

सभी सामग्री को मिट्टी के बर्तन में डालकर तीन चार उबाल लगाते हैं, इसके बाद इसे ठंडा होने के लिए 48 घंटे के लिए रख देते हैं। इसके बाद इसे छानकर किसी बर्तन में रख देते हैं। 16 लीटर की टंकी में 250 एमएल अग्नियास्त्र डालते हैं, एक एकड़ में जितनी पानी की टंकी का छिड़काव करेंगे हर टंकी में 250 एमएल अग्नियास्त्र डाल देंगे। इसके छिड़काव से फसल में कोई भी कीट नहीं लगेंगे। तीन महीने तक ही इसका उपयोग कर सकते हैं।

NEWS SOURCE- Gaonconnection News

एक-एक मीटर की दूरी पर लगाए अनार, आंधी में भी नहीं गिरे पौधे

डीडीए उद्यानिकी अजय चौहान ने बताया अनार की खेती के लिए हल्की जमीन अत्यंत उपयुक्त होती है। ऐसी जमीन में क्यारी से क्यारी 5 मीटर व पौधे से पौधे की दूरी 3 मीटर रखना चाहिए। एक हेक्टेयर में 667 पौधे लगाए जाते हैं। पौधे लगाने के दूसरे वर्ष में प्रति पौधा 10-15 किलो का उत्पादन शुरू होता है। जो साल-दर-साल बढ़कर 30-35 किलो तक पहुंच जाता है। इस प्रकार एक बार पौधा लगाने के बाद वह आगामी 30 साल तक लगातार उत्पादन देता रहता है।

अनार के पौधे को विशेष काट-छांट की आवश्यकता पड़ती है। वही ड्रिप से पानी देने के कारण उत्पादन लागत भी कम हो जाती है। शासन भी राष्ट्रीय कृषि मिशन के तहत प्रति हेक्टेयर प्रथम वर्ष 45 हजार और दूसरे व तीसरे वर्ष 15-15 हजार रुपए का अनुदान देता है।

यह है हाईडेंसिटी प्लांटेशन तकनीक

अल्टाडेंसिटी प्लांटेशन तकनीक में पौधों को कम दूरी पर लगाया जाता है। ऊंचाई को नियंत्रित रखने के लिए समय-समय पर कटाई-छंटाई करना आवश्यक है। शाखा आने पर उसे ऊपर से काट दें। काटी शाखा में फिर तीन शाखाएं आती है। एक बढ़ने पर इसे फिर काट देते हैं। इस तरह यह पेड़ छतरीनुमा बन जाता है, इसकी ऊंचाई छह फीट रहती है। कृषि कॉलेज में हो रहे अनुसंधान में पौधे से पौधे की दूरी 1 मीटर और कतार से कतार की दूरी 3 मीटर रखी है। इस लिहाज से एक एकड़ में 674 पौधे आते हैं।

इसलिए हवा-आंधी से आड़ी नहीं होती है फसल 

उद्यानिकी विभाग के सेवानिवृत्त उद्यान विकास अधिकारी जवाहरलाल जैन ने बताया अल्ट्रा डेंसिटी प्लांटेशन तकनीक से पौधे रोपने पर तेज हवाओं का असर नहीं होता है। पेड़ अधिक व नुकसान कम होने के कारण चार गुना तक पैदावार में बढ़ोतरी होती है। किसानों की आय में बढ़ोतरी होगी। वहीं, सामान्य पद्धति से रोपे गए पौधे तेज हवा, बेमौसम बारिश होने से आड़े हो जाते हैं, फल झड़ने लगते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

अद्भुत हुनरः गेहूं के दानों से बनाया 222 किलो का सिक्का

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में एक किसान के बेटे का अद्भुत हुनर देखने को मिला है। यहां किसान के बेटे ने 222 किलो का गेहूं का सिक्का बनाकर जिले व प्रदेश का नाम रोशन किया है। इस सिक्के को देखने के लिए गांव ही नहीं बल्कि पड़ोसी जनपद के लोगों का हुजूम भी इकठ्ठा हो रहा है।

दरअसल मामला जिले के धरमपुर सराय गांव का है। जहां के रहने वाले शैलेन्द्र कुमार ने 5 फुट उंचाई का 2 क्विंटल, 11 किलो गेहूं के दानों से एक रुपए का सिक्का बनाया है।

यह सिक्का महज 45 दिनों में एक साधारण किसान के बेटे ने बनाकर तैयार किया है। वहीं गांव की युवा पीढ़ी भी शैलेन्द्र के इस कार्यों की प्रशंसा करते हुए गेहूं से तैयार इस एक रुपए के सिक्के को गिनीज बुक में दर्ज कराने की मांग कर रही है।

शैलेन्द्र ने बताया कि एक रुपए के सिक्के में गेहूं की बाली देख कर उसे यह सिक्का बनाने की प्रेरणा मिली। उसका मानना है कि देश में गेहूं नहीं होगा तो किसान खुशहाल नहीं होगा इसीलिए उसने यह सिक्का बनाया है। किसी भी देश की धातुई मुद्रा का गेहूं या अन्य किसी अनाज के दाने से बनाया गया इतना विशाल और अद्भुत प्रतिरूप शायद विश्व में पहली बार बना होगा।

71 साल के किसान का कमल ,इस नई तकनीक से ऊगा दी सूखे में धान की फसल

छतीसगढ़: ग्राम रेड़ा के 71 वर्षीय ननकी दाऊ साहू द्वारा कृषि में कुछ नया करने की जुनून देखते ही बनता है। इनकी खेती के प्रति वैज्ञानिक सोच और एसआरआई पद्घति से धान की खेती कर रहें हैं। इस पद्घति से की जा रही खेती से सूखा के बाद भी हरियाली नजर आ रही है।

सारंगढ़ एवं बरमकेला अंचल के किसान धान की खेती में सूखे की मार झेल रहे हैं। इन ब्लाकों के तो कई-कई गांव में धान की फसल पुरी तरह से समाप्त हो चुकी है। लेकिन ननकी की धान की फसल लहलहा रही है। जो क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल ननकी दाऊ एसआरआई पद्घति से धान की खेती कर रहें हैं। इस पद्घति से की जा रही खेती से इनकी खेतों में एक अजीब सी हरियाली नजर आ रही हैं।

वहीं इनके एक खेत में लगे मकरंद धान की फसल के खेत के पास से गुजरने में एक भिनी भिनी खुशबू आती है। जिसे देखने के लिए आसपास गंाव के किसान ही नहीं दूर दराज के किसान भी देखने आ रहें हैं। कृषक ननकी दाऊ बताते है कि इस वर्ष जब पुरे देश में कमजोर मानसून होने की आशंका की खबर सुनने के बाद वह अपनी खेतों में एसआरआई पद्घति से धान की फसल लेने का निर्णय लिया।

इस विधि से धान की खेती में कई फायदे हैं। पारंपरिक खेती इसकी खेती बहुत अच्छी है। बीज दर में भी बहुत फर्क है। पारंपरिक खेती में प्रति एकड़ 30 किलो धान बीज लगता है। जबकि इसकी खेती में प्रति एकड़ 2.5 से 3 किलो धान बीज लग रहा है। पारंपरिक खेती में प्रति एकड़ 20 से 21 हजार खर्च आता है।

वर्तमान में इस खेती में अभी तक प्रति एकड़ की खेती में 5 हजार 800 रुपए खर्च आया है। 4 से 5 हजार कटाई के दौरान खर्च आएगा। वहीं रसायनिक खाद के स्थान पर वह केंचुआ डाल रहा है। इससे धान में होने वाले बीमारी एवं कीड़े नहीं हो रहे हैं। जिस कारण कीटनाशक एवं फफूंद नाशक दवाई का उपयोग नहीं हो रहा है। केंचुआ खाद से धान के लिए सभी पोषण तत्व होने से रसायनिक खाद डालने की आवश्यकता नहीं हो रही है।

एसआरआई विधि में कम पानी में अच्छी धान की फसल 

एसआरआई विधि में लगातार खेत में पानी नहीं रखा जाता है जड़ों को आर्द्र रखने लायक पानी दिया जाता है। आमतौर पर पारंपरिक धान की खेती में एक किलो के धान के उत्पादन में करीब 3 हजार 5 सौ लीटर की आवश्यकता होती है। कृषि अधिकारियों द्वारा इस पद्घति में खेती करने से करीब 1 हजार लीटर पानी में ही एक किलो धान उत्पादन बताया जा रहा है।

ननकी को मिल चुके हैं कई सम्मान 

नककी दाऊ को खेती करने का अजीब सा जिद व जुनून सवार रहता है। 71 वर्ष के उम्र में भी रोजाना खेतों में 8 घंटा तक का समय देता है। यही कारण है कि इनकी खेती की चर्चा होनी लगी है। 10 नवम्बर 2014 को भारतीय किसान संघ अधिवेशन नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री व वर्तमान के उपराष्ट्रपति वैंकैया नायडू ने कृषि क्षेत्र में अच्छे कार्य को लेकर सम्मानित हुए। वही जयपुर में 20 फरवरी 2016 आयोजित भारतीय किसान संघ अधिवेशन में भी सम्मान किया गया। सारंगढ़ ब्लाक के ग्राम रेड़ा के कृषक ननकी दाऊ की लहलहा रही है जबकि सारंगढ़ अंचल सूखे के चपेट से जूझ रहा है।

एसआरआई विधि से की गई धान की खेती से बीज दर न्यूनतम मात्रा में आता है। वही कम पानी व कम लागत से अच्छी पैदावार किसान पा सकते है। इस विधि में किस्सों की संख्या 45 से 50 तक जाती है। इससे उत्पादन में फर्क आता है। वहीं इस खेती में देशी खादों का उपयोग होता है। ” जीपी गोस्वामी, वरिष्ठ कृषि अधिकारी, सारंगढ़

बासमती धान ने खिलाये किसानों के चेहरे। इतने रुपए बढ़े भाव

बासमतीधान ने किसानों के चेहरे को खिला दिया है। पहली ही ढेरी तरावड़ी में 3725 रुपए के भाव में बिकी है। इसका रेट चार हजार रुपए प्रति क्विंटल तक जाने की उम्मीद है। अनाज मंडियां धान से अट चुकी हैं। प्रत्येक वैरायटी के अच्छे भाव से इस बार खेत के ठेके भी बढ़ेंगे और कृषि की तरफ रुझान बढ़ेगा।

जिले में तरावड़ी मंडी में सोमवार को 20 क्विंटल बासमती धान पहुंची। इसका पहला रेट 3725 रुपए लगा। पिछले साल इसका रेट 3100 रुपए तक ही था। इसी तरह 1121 का रेट 3200 और 1509 का रेट 2800 रुपए तक पहुंच गया है। किसानों ने बताया कि इस बार पैदावार भी अच्छी है और भाव में बेहतर मिल रहा है। इस बार की धान पिछले खर्चे भी पूरे करेगी। जिलेभर की मंडियों में धान की आवक जबरदस्त बढ़ रही है।

मंडी में पांव टेकने की जगह नहीं है। लिफ्टिंग की गति तेज की है, ताकि किसानों को धान डालने की जगह मिलती रहे। किसान देसराज, सुरेश कुमार, बलजीत सिंह, सुरेश, मदनलाल, सोमदत्त बताते हैं कि धान फसल ने इस बार खर्चे पूरे कर दिए है। भाव अच्छे मिल रहे हैं। उम्मीद करते हैं बासमती का रेट चार हजार रुपए पार कर जाए। तरावड़ी मंडी धान का कटोरा है। इसी मंडी में सबसे ज्यादा बासमती धान खरीदा जाता है।

बासमती में पैदावार बेहतर होने के कारण उनकी सोमवार को 20 क्विंटल धान 3725 रुपए के भाव लगी है। मंडी में बासमती का आगाज हो गया है। बासमती लेट आने के कारण अब मंडियों में बासमती पर ही फोक्स रहेगा।

^तरावड़ी मंडी में 3725 रुपए के भाव बिकी है। किसानों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं आने दी जाएगी। किसानों को चाहिए कि वह धान को सुखाकर लेकर आए। जल्दबाजी में नमीयुक्त धान कटवाएं। -गौरवआर्य, सेक्रेटरी, अनाज मंडी तरावड़ी।

 

अच्छे मुनाफे के लिए इस समय और ऐसे करें टमाटर की खेती

ये मौसम टमाटर की फसल लगाने के लिए सही होता है, वैसे तो टमाटर की खेती साल भर की जाती है, लेकिन इस समय टमाटर की खेती कर किसान अच्छी आमदनी कमा सकते हैं।

कृषि विज्ञान केन्द्र अंबेडकरनगर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ़ रवि प्रकाश मौर्या बताते हैं, “किसान समय से टमाटर की नर्सरी तैयार कर टमाटर की खेती कर सकता है, इस समय ट्रे में नर्सरी तैयार कर सकते हैं, इसमे जल्दी पौध तैयार होती है और पौधे समान्य तरीके से उगाए पौधों से ज्यादा रोग प्रतिरोधी भी होते हैं। इसलिए समय से खेत तैयार कर पौध लगा लें।”

टमाटर का पौधा ज्यादा ठण्ड और उच्च नमी को बर्दाश्त नहीं कर पाता है। विपरीत मौसम की वजह से इसकी खेती बुरी तरह प्रभावित होती है। बीज के विकास, अंकुरण, फूल आना और फल होने के लिए अलग-अलग मौसम की व्यापक विविधता चाहिए। 10 डिग्री सेंटीग्रेड से कम तापमान और 38 डिग्री सेंटीग्रेड से ज्यादा तापमान पौधे के विकास को धीमा कर देते हैं।

टमाटर पौध की तैयारी

पौध की तैयारी के लिए जीवांशयुक्त बलुवर दोमट मिट्टी की जरुरत होती है। स्वस्थ और मजबूत पौध तैयार करने के लिए 10 ग्राम डाई अमोनियम फास्फेट और 1.5-2.0 किग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति वर्ग मीटर की दर से लगाना चाहिए। क्यारियों की लंबाई लगभग तीन मीटर, चौड़ाई लगभग एक औ भूमि की सतह से उचाई कम से कम 25-30 सेमी. रखना उचित होता होता है। इस प्रकार की ऊंची क्यारियों में बीज की बुवाई पंक्तियों में करना चाहिए, जिनकी आपसी दूरी पांच-छह सेमी. रखना चाहिए, जबकि पौध से पौध की दूरी दो-तीन सेमी. रखना चाहिए।

बुवाई के बाद क्यारियों को सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट से ढक दें। इसके बाद फुहारे से हल्की सिचाई करें। अब इन क्यारियों को घास-फूस या सरकंडे के आवरण से ढ़क दें। आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई करते रहें। बुवाई के 20-05 दिनों बाद पौध रोपाई योग्य तैयार हो जाती है।

टमाटर की किस्में

  • सामान्य किस्में: पूसा गौरव, पूसा शीतल, सालेनागोला, साले नबड़ा, वी.एल.टमाटर-1, आजाद टी-2, अर्का विकास, अर्का सौरभ,पंत टी -3
  • संकर किस्में: रुपाली, नवीन, अविनाश-2, पूसा हाइब्रिड-4, मनीशा, विशाली, पूसा हाइब्रिड-2, रक्षिता, डी.आर.एल-304, एन.एस. 852, अर्कारक्षक, अर्का सम्राट, अर्का अनन्या

बीज की मात्रा

  • सामान्य किस्में: 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर

संकर किस्में: 200-250 ग्राम प्रति हेक्टेयर

टमाटर बीज का चयन

बीज उत्पादन के बाद खराब और टूटे बीज छांट लिया जाता है। बुवाई वाली बीज हर तरह से उत्तम किस्म की होनी चहिये| आकार में एक समान, मजबूत और जल्द अंकुरन वाली बीज को बुवाई के लिए चुना जाता है। विपरीत मौसम को भी सहनेवाली एफ-1 जेनरेशन वाली हाइब्रिड बीज जल्दी और अच्छी फसल देती है।

मिट्टी का चयन

खनिजीय मिट्टी और बलुई मिट्टी में टमाटर की खेती अच्छी होती है, लेकिन पौधों के लिए सबसे अच्छी बलुई मिट्टी होती है| अच्छी फसल के लिए मिट्टी की गहराई 15-20 सेमी होनी चाहिए।

टमाटर पौध की रोपाई

जब पौध में चा-छह पत्तियां आ जाए और ऊंचाई लगभग 20-25 सेमी. हो जाए तब पौध रोपाई के लिए तैयार समझना चाहिए। रोपाई के तीन-चा दिन पहले पौधशाला की सिंचाई बन्द कर देनी चाहिए। जाड़े के मौसम पौध को पाला से बचने के लिए क्यारियों को पालीथीन चादर की टनेल बनाकर ऊपर से ढक देना चाहिए।

उर्वरक देने की विधि

नत्रजन की आधी मात्रा तथा फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत की अंतिम जुताई के समय मिलानी चाहिए। गोबर की खाद की संपूर्ण मात्रा रोपाई से 15-20 दिन पहले ही मिलानी चाहिए। नत्रजन की शेष मात्रा सिंचित दशा में खरपतवार नियंत्रण के पश्चात रोपाई के 30-35 दिन बाद देनी चाहिए।

जनवरी से पूरे देश में उर्वरकों पर मिलेगी डायरेक्ट सब्सिडी

सरकार द्वारा उर्वरकों पर दी जाने वाली मदद के सही वितरण के मकसद से सरकार तय समय से 3 महीने पहले ही पूरे देश में डायरैक्ट बैनीफिट ट्रांसफर ऑफ फर्टीलाइजर्स सबसिडी योजना को लागू कर देगी।

सूत्रों के मुताबिक आगामी 1 जनवरी को यह योजना पूरे देश में लागू कर दी जाएगी जबकि इसके लिए मार्च आखिर का समय तय किया गया था।

राजस्थान, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, अंडमान और निकोबार, त्रिपुरा तथा असम में 1 नवम्बर से यह योजना लागू कर दी जाएगी। एक महीने बाद यानी दिसम्बर में इसे हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु में लागू किया जाएगा।

बाकी राज्यों में 1 जनवरी से इसे लागू कर दिया जाएगा। नई योजना के तहत उर्वरक की बिक्री हो जाने के बाद कम्पनी को सबसिडी का पैसा मिलेगा। इसके लिए सरकार ने सभी कम्पनियों से पी.ओ.एस. मशीन लगाने को कहा है।

सबसिडी देने का नया सिस्टम अभी 8 राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में लागू है। इनमें दिल्ली, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, गोवा, पुड्डुचेरी, दमन व दीव और दादर व नागर हवेली शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक इस योजना को तय समय से 3 महीने पहले इसलिए लागू किया जा रहा है ताकि 3 महीने में यह देखा जा सके कि इसमें कहां क्या खामियां रह गई हैं।

110 दिन में तैयार होगी गेहूं की यह प्रजाति

रबी सीजन की फसलों बुवाई हो रही है. ऐसे में गेहूं का उत्पादन करने वाले कई राज्य हैं, जिनसे गेहूं की पैदावार की एक बड़ी हिस्सेदारी इन राज्यों की है. उत्तर प्रदेश गेहूं उत्पादन में एक बड़ा राज्य है इस राज्य के किसान प्रकाश रघुवंशी ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है.

उन्होंने गेहूं की दो देशी किस्मों को विकसित किया है. यह खोज वाराणसी जिले के कुदरत कृषि शोध संस्थान के प्रकाश रघुवंशी ने की है. गेहूं की इस किस्म का नाम कुदरत 8 और कुदरत विश्वनाथ है. यह दोनों बौनी प्रजातियाँ हैं.

इन प्रजातियों की लम्बाई लगभग 90 सेंटीमीटर और इसकी बाली की लम्बाई लगभग 20 सेंटीमीटर होती है. गेहूं की यह प्रजाति 110 दिन में तैयार हो जाती है. इसकी पैदावार 25-30 कुंतल प्रति एकड़ निकलती है. इस प्रजाति का दाना भी मोटा और चमकदार होता है.

इसकी पैदावार और गुणवत्ता को देखते हुए कई राज्यों में इसकी मांग बढ़ी है . गेहूं की यह प्रजाति ओलावृष्टि जैसी समस्याओं को आसानी से झेल सकती है. अभी तक प्रकाश सिंह कृषि फसलों की 300 से अधिक प्रजातियाँ विकसित कर चुके हैं .

भूलकर भी ना बोए गेहूं की ये नई किसम ,वरना पड़ेगा पछताना

भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (आईआईडब्ल्यूबीआर) की ओर से बनारस में रिलीज की गई गेहूं की नई किस्म डब्ल्यूबी-2 के दावे पर विवाद शुरू हो गया है। इसके खिलाफ करनाल स्थित पूसा (इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट) के क्षेत्रीय संस्थान से रिटायर्ड पौध प्रजनन विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र लाठर ने केंद्रीय कृषि मंत्री से शिकायत करके मामले को वैज्ञानिक धोखाधड़ी करार दिया है और इसकी सीबीआई जांच की मांग की है।

केंद्रीय कृषि मंत्री, कृषि सचिव, आईसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) के महानिदेशक आदि से की गई शिकायत में उन्होंने कहा है कि गेहूं की किस्म डब्ल्यूबी-2 को आईआईडब्ल्यूबीआर ने देश की प्रथम जैव पोषित किस्म करार दिया है।उनके मुताबिक यह दावा गलत है, क्योंकि इससे ज्यादा जैव पोषित गेहूं की किस्म डब्ल्यूएच-306 हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (हकृवि) ने 52 साल पहले वर्ष 1965 में ही बना दी थी। यही नहीं, अपने रिकॉर्ड को तोड़ते हुए हकृवि ने 25 साल पहले वर्ष 1992 में उससे भी पोषित किस्म डब्ल्यूएच-712 बना दी थी।

अपनी शिकायत के साथ उन्होंने आईआईडब्ल्यूबीआर के पूर्व निदेशक एवं पूसा इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक प्रोफेसर एस नागराजन के रिसर्च पेपर की प्रतिलिपि भी लगाई है जिसमें उन्होंने गेहूं की विभिन्न किस्मों के पोषण तत्वों के बारे में भी जानकारी दी है। यहां बता दें कि गेहूं की जिस किस्म को लेकर बवाल शुरू हुआ है, उसके प्रचार के लिए प्रकाशित किए गए पैम्फलेट में केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह की फोटो भी लगाई गई है।

यह है कथित गलत दावे का आधारआईआईडब्ल्यूबीआर ने गेहूं की अपनी नई किस्म डब्ल्यूबी-2 में आयरन की मात्रा 35.4 पीपीएम दशाई है जबकि डॉ. एस नागराजन के रिसर्च पेपर में हकृवि की गेहूं की किस्म सी-306 में यह 70 पीपीएम और डब्ल्यूएच 712 में 85 पीपीएम है। इसी प्रकार डब्ल्यूबी-2 में जिंक की मात्रा 42 पीपीएम दर्शाई गई है जबकि सी-306 में यह 80 व डब्ल्यूएच-712 में 105 है।

 

इस सब्जी का दाम सुन लेंगे तो बेशक अपने कानों पर यकीन ही नहीं कर पाएंगे

सब्जी खरीदने जाने वाला हर शख्स इन दिनों एक ही बात कहता मिलता है कि सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं। हां अगर वे दुनिया की सबसे महंगी इस सब्जी का दाम सुन लेंगे तो बेशक अपने कानों पर यकीन ही नहीं कर पाएंगे। अमूमन सब्जियां 50 रुपए किलो तक आ जाती हैं, हालांकि सीजन की शुरुआत में जब कोई नई सब्जी आती है तो उसका दाम 100 रुपए किलो तक हो सकता है, बाद में यह दाम गिर जाते हैं।

दुनिया की सबसे महंगी सब्जी गुच्छी का दाम सुनकर आप चौंक ही जाएंगे। बाजार में गुच्छी की कीमत है 25000 से 30000 रुपए प्रति किलो। यह सब्जी हिमाचल, कश्मीर और हिमालय के ऊंचे हिस्सों में पैदा होती है। यह सब्जी पहाड़ों पर बिजली की गडग़ड़ाहट व चमक से बर्फ से निकलती है।यह दुर्लभ सब्जी पहाड़ों पर साधु-संत ढूंढकर इकट्ठा करते हैं और ठंड के मौसम में इसका उपयोग करते हैं।

इसको बनाने की विधि में ड्रायफ्रूट, सब्जियां, घी इस्तेमाल किया जाता है। लजीज पकवानों में गिनी जाने वाली यह सब्जी औषधीय गुणों से भरपूर होती है और इसका वैज्ञानिक नाम मार्कुला एस्क्यूपलेंटा है। इसे हिंदी में स्पंज मशरूम भी कहा जाता है। प्राकृतिक रूप से जंगलों में उगने वाली गुच्छी फरवरी से अप्रेल के बीच मिलती है। बड़ी बड़ी कंपनियां और होटल इसे हाथोंहाथ खरीद लेते हैं। इस कारण इन इलाकों में रहने वाले लोग सीजन के समय जंगलों में ही डेरा डालकर गुच्छी इकट्ठा करते हैं।

इन लोगों से गुच्छी बड़ी कंपनियां 10 से 15 हजार रुपए प्रति किलो के हिसाब से खरीदते हैं, जबकि बाजार में इसकी कीमत 25 से 30 हजार रुपए प्रति किलो है।गुच्छी की डिमांड भारत में ही नहीं बल्कि अमरीका, यूरोप, फ्रांस, इटली और स्विट्जरलैंड तक भी है। इसमें विटामिन बी और डी के अलावा सी और के प्रचुर मात्रा में होता है। इसे नियमित खाने से दिल की बीमारी नहीं होती।