खर्च 30 हजार, महज 4 महीने की मेहनत के बाद कमाए ये किसान कमाने लगा 8 लाख रु

अधिकतर लोग खेती को घाटे का सौदा मानते हैं और घटती जमीन के चलते किसान परिवारों का अपने पुस्तैनी काम से मोह भंग हो रहा है। ऐसे में राजस्थान के किसान ने खेती का नया रास्ता खोज कर बाकी लोगों को हैरान कर दिया।

सीदपुरा के किसान ने खेती से मुनाफे का नया रास्ता खोजा है। दुर्गाप्रसाद ओला ने नीदरलैंड खीरा की बुवाई कर सिर्फ चार महीने में आठ लाख रुपए की पैदावार की है। किसान का मानना है कि नीदरलैंड से बीज मंगवाकर खीरा की पैदावार करने वाला वह राजस्थान में पहला किसान है। इस खीरे में बीज नहीं होने की वजह से बड़े होटल-रेस्त्रां में डिमांड रहती है।

दुर्गाप्रसाद ने बताया कि उसने कुछ साल पहले उद्यान विभाग से 18 लाख रुपए का अनुदान लेकर खेत में सैडनेट हाउस लगाया। अनुदान मिलने के बाद छह लाख रुपए खुद को खर्च करने पड़े। एक कंपनी प्रतिनिधि से मिली जानकारी के बाद 72 हजार रुपए में नीदरलैंड से बीज मंगवाया। एक बीज के छह रुपए लगते हैं।

30 हजार रुपए बुवाई अन्य खर्चा लग गया। चार महीने के दौरान वह आठ लाख रुपए के खीरे बेच चुका है। खर्चा निकालकर सात लाख रुपए की आय हुई है। उद्यान विभाग के सहायक निदेशक भगवान सहाय यादव के मुताबिक शेखावाटी में पहला किसान है, जिसने नीदरलैंड किस्म का खीरा उगाया है।

बीज रहित और गुणवत्ता अच्छी होने से बाजार में खीरा की मांग भी देशी से ज्यादा रही। कारोबारियों के अनुसार मंडी में पहली बार नीदरलैंड का बीज रहित खीरा आया है। ऐसे में मंडी में खीरा के भाव भी देशी से दोगुना ज्यादा रहे।

स्थानीय खीरे के थोक भाव मंडी में किसान को 20 रुपए किलो मिल रहा है, वहीं नीदरलैंड का खीरा 40 से 45 रुपए प्रति किलो तक बिक रहा है। तो अगर आपके पास भी खाली जमीन या खेत है तो एक बार ये आइडिया अपना कर देखिए क्या पता कब किस्मत बदल जाए।

जुताई से लेकर पिसाई तक सारे काम करेगी यह मशीन

प्रधानमंत्री मोदी के स्टार्टअप योजना के तहत केरल शिवापुरम के ‘सेंट थामस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिग’ के छात्रों ने खेतीब़ाडी के कई कामो को एकसाथ अंजाम देने वाली एक ऐसी अद्भभुत मशीन तैयार की है, जो किसानो के लिए और खेतीबाडी के क्षेत्र में वरदान साबित हो सकती है।

छात्रो ने इस मशीन को ‘मन्नीरा’ नाम दिया है। ‘मन्नीरा’ एकसाथ जुताई, रोपाई, सिंचाई, कटाई, सूप, पिसाई यह सारे कार्य कर सकती है।

इस मशीन को बनाने का एकमात्र मकसद लागत को कम करके मुनाफा डबल करना है। हमे उम्मीद है कि यह मशीन कृषि क्षेत्र में एक क्रांति साबित होगी। जब 10 एकड़ की जमीन पर 5 साल के अंतराल में यही सारे कार्य अलग-अलग मशीनो द्वारा किए गए तो लागत लगभग 27,08,500 रुपए रही, वहीं मन्नीरा का उपयोग किया तो यह लागत गिरकर 6,20,500 रुपए आ गई ।

इम मशीन को ब़डी उपल्बधि बताते हुए छात्रों ने कहा कि अगर अंतिम निरीक्षण के बाद इसका चयन हो जाता है। तो हमें 2 लाख का अनुदान मिलेगा। गौर करने वाली बात यह है कि इस मशीन को बनाने की कीमत भी 2 लाख रूपये ही है.

सिट्रोनेला घास की खेती से कमाएं प्रति एकड़ लाख रूपये

सिट्रोनेला घास की खेती कर आप अधिक लाभ कमा सकते हैं। दरअसल यह घास कई प्रकार से उपयोग में लायी जाती है। जहां एक ओर सौंदर्य के लिए क्रीम आदि बनाने में इसका उपयोग होता है तो वहीं दूसरी ओर मच्छर व मक्खियों को दूर भगाने के लिए इस घास की खास उपयोगिता है। यह काफी दिनों तक लगने वाली घास है जिसके फलस्वरूप किसान एक बार की लागत में कई गुना ज्यादा उत्पादन प्राप्त कर आसानी से अच्छा लाभ कमा सकते हैं।

इस घास की एक नई किस्म जोर लैब सी- 5 जावा जो कि असम के उत्तर-पूर्व विज्ञान एवं प्रौद्दोगिकी संस्थान द्वारा अनुसंधान की गई थी उसे खेती के लिए स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जारी की थी।

यह घास अधिक औषधीय गुण रखने के कारण आजकल काफी व्यापक पैमान पर खेती के अन्तर्गत किसानों को अधिक मुनाफा दे रही है। बताते हैं कि यह घास कम उर्वरा शक्ति वाली भूमि पर आसानी से उपजाई जा सकती है। इस घास से निकला हुआ तेल में मौजूद रसायन ही कई प्रकार के उत्पाद बनाने में लाभकारी होते हैं।

इसकी खेती भारत में पूर्वोत्तर राज्यों समेत यूपी, पश्चिम बंगाल मध्य प्रदेश के साथ-साथ दक्षिण में तमिलनाडु एवं केरल में बड़े स्तर पर की जाती है। यह बुवाई के तीन महीने बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है। एक कटाई के बाद बहुत जल्द कटाई के लिए तैयार होने के कारण यह साल में तीन से चार फसल देती है। जिससे सिंट्रोनेला व्यावसायिक खेती के लिए काफी लाभकारी है।

इस घास की एक एकड खेती से 80 किलोग्राम तक तेल प्राप्त किया जा सकता है जबकि इसकी तेल की कीमत डेढ़ हजार रुपए तक मिलती है।

बताते चलें कि दैनिक जीवन में इस्तेमाल किए जाने वाले साबुन, क्रीम, आदि के लिए इस घास के तेल में मौजूद रसायन काफी लाभकारी होते हैं। मच्छर व मक्खी आदि को भगाए जाने के लिए आज कल बनने वाले उत्पादों के निर्माण में यह लाभदायक होती है।

गन्ना किसानों के लिए खुशखबरी !

गन्ना किसानों के लिए अच्छी खबर है. सरकार ने किसानों को प्रोडक्शन लिंक्ड सब्सिडी के तहत 5.50 रुपये प्रति क्विंटल की सब्सिडी देने का फैसला किया है. आज कैबिनेट की बैठक में यह फैसला लिया गया.

बताया जाता है कि कर्नाटक में विधानसभा चुनावों को देखते हुए सरकार ने यह फैसला लिया है. कर्नाटक में इस महीने चुनाव होने वाले हैं. कर्नाटक यूपी, महाराष्ट्र के बाद तीसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य है.

इस फैसले के बाद कृषि मंत्रालय सीधे किसानों के खाते में प्रति क्विंटल पर 5.5 रुपये सब्सिडी देगा. इससे चीनी मिलों को भी राहत मिलेगी. गन्ना किसानों का चीनी मिलों पर बकाया बढ़कर 19 हजार करोड़ रुपये के करीब पहुंच गया है. यह अब तक का सर्वाधिक है. मिलों से समय पर भुगतान नहीं मिलने से गन्ना किसानों को भारी आर्थिक दिक्कत हो रही है.

अनाज और दालों का विवरण विस्तार से देखें

गन्ना किसानों की मुश्किलों को देखते हुए हाल ही में मंत्रियों के समूह ने तीन फॉर्मूलों पर विचार किया था. पहला. इसमें चीनी बिक्री पर सेस लगाने, दूसरा, किसानों को गन्ना बिक्री पर सब्सिडी देने और तीसरा एथेनॉल पर जीएसटी कम करने का प्रस्ताव शामिल था.

मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, सेस के लिए 4 मई को होने वाली जीएसटी परिषद की बैठक में अंतिम निर्णय लिया जाएगा. इधर, किसानों को तत्काल राहत की जरूरत है. इसी के मद्देनजर, प्रति टन 55 रुपये की सब्सिडी मुहैया कराने का प्रस्ताव मंत्रालय ने कैबिनेट को भेजा था.

19000 करोड़ पहुंचा गन्ना बकाया

चालू पेराई सीजन में चीनी का रिकॉर्ड उत्पादन 310-315 लाख टन होने का अनुमान है. दूसरी ओर वैश्विक बाजार में कीमतें कम होने से निर्यात में भी तेजी नहीं है.

यही वजह है कि घरेलू बाजार में चीनी की कीमतें उत्पादन लागत की तुलना में काफी नीचे बनी हुई हैं. इसका सीधा असर गन्ना किसानों के बकाया भुगतान पर पड़ रहा है.

खरबूजे की फसल से किसान ने 70 दिन में कमाए 21 लाख रूपए

एक ओर जहां गुजरात में किसान आलू की फसल की अच्छी फसल न मिलने से परेशान हैं, वहीं एक किसान ने फसल बदलकर काफी मुनाफा कमा लिया है। गुजरात के बनासकांठा जिले के किसान खेताजी सोलंकी ने आलू की जगह खरबूजे की फसल लगाई है जो उनके लिए अच्छी साबित हुई है।

इलाके में आलू की फसल के अच्छे दाम न मिलने पर सभी किसान परेशान थे। ऐसे में अपने सात बीघा के खेत में सोलंकी ने आलू की जगह खरबूजे की फसल बोने का फैसला किया। सातवीं पास सोलंकी ने गांव के दूसरे लोगों को भी रास्ता दिखाया।

नई तकनीकों के इस्तेमाल से फायदा

उन्होंने आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर खरबूजा उगाया। उन्होंने बेहतर बीज, टपक सिंचाई और सोलर वॉटरपंप का इस्तेमाल किया। फरवरी में लगाई फसल अप्रैल में तैयार हो गई और 70 दिन में उन्होंने 21 लाख रुपये कमा लिए। उनके खेत में 140 टन खरबूजा पैदा हुआ।

उन्होंने 1.21 लाख रुपये खर्च किए थे। उनकी फसल इतनी अच्छी थी कि उन्हें उसे बेचने के लिए कहीं जाना भी नहीं पड़ा और दूसरे राज्यों से व्यापारी उनके पास आकर फसल खरीदकर गए। उन्हें इसके काफी अच्छे पैसे मिले।

खेताजी बहुत पढ़े-लिखे नहीं हैं लेकिन तकनीक का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। वह मोबाइल ऐप के जरिये किसानों पर टिप्स लेते हैं और फलों की फसल के लिए नई तकनीकें सीखते रहते हैं। वह अब चेरी टमाटर की फसल लगाना चाहते हैं।

किसान ने 90 दिन में तरबूज की खेती से कमाए 3.5 लाख

देशभर में लगातार किसान सूखे और कर्ज की समस्‍याओं की वजह से आत्‍महत्‍या कर रहे हैं। वहीं कई ऐसे राज्‍य हैं जहां किसानों ने तरबूज की खेती कर अपने जीवन में मिठास भर रहे हैं। उन्‍हीं किसानों में से एक हैं तमिलनाडु के रहने वाले मुरुगा पेरुमल।

तरबूज की खेती से पेरुमल न सिर्फ लोगों को प्रेरित कर रहे हैं बल्कि लाखों में कमाई भी कर रहे हैं। दिलचस्‍प ये है कि उनकी कमाई लागत से करीब 8 गुना ज्‍यादा है। तो आइए समझते हैं पेरुमल के कमाई के गणित को।

तरबूज की खेती को चुना

तमिलनाडु के तिरुवन्नमलाई जिले के रहने वाले मुरुगा पेरुमल के गांव वेपुपुचेक्की के अधिकतर लोग खेती पर निर्भर हैं। सभी ने अलग – अलग फसल की खेती की है। वहीं पेरुमल ने ड्रिप इरीगेशन सिस्‍टम के जरिए तरबूज की खेती की है।

2.2 हेक्टेयर जमीन में की खेती

उन्‍होंने इस खेती के लिए 2.2 हेक्टेयर जमीन का इस्‍तेमाल किया। उन्होंने इसमें 1 हेक्टेयर जमीन का इस्‍तेमाल Pukeeza वैराइटी के लिए किया। जबकि 1.2 हेक्‍टेयर जमीन को अपूर्व वैराइटी के लिए इस्‍तेमाल किया।

कैसे की खेती

  • इसके बाद उन्होंने खेत की चार बार जुताई की ।
  • आखिरी बार जुताई से पहले उन्होंने 25 टन / हेक्टेयर की दर से खाद का इस्‍तेमाल किया।
  • 300 किलोग्राम डीएपी खाद
  • 150 किलो पोटाश एक बेसल डोज
  • एक हेक्टेयर के लिए 3.5 किलो बीज का इस्तेमाल किया ।
  • नवंबर में बीज बोया, ड्रिप सिस्टम के जरिए प्रति दिन 1 घंटे खेत की सिंचाई करते थे।

49 हजार रुपए का लोन

पेरुमल ने वेपुपुचेक्की को-ऑपरेटिव सोसाइटी से 1 हेक्‍टेयर जमीन के लिए 49 हजार रुपए का लोन लिया। पेरुमल पहली बार खेती कर रहे थे इसलिए सरकार की ओर से 50% फर्टिलाइजर सब्‍सिडी भी मिला। ऐसे में उनकी जेब से मामूली खर्च हुए।

70 दिन बाद काटी फसल

पेरुमल के मुताबिक करीब 70 दिन बाद उसने मजूदरों के साथ मिलकर फसल काटा। तब पेरुमल के खेत से Pukeeza वैराइटी के तरबूज 55 टन निकले जबकि अपूर्व वैराइटी में 61 टन तरबूज की पैदावार हुई। वहीं दो सप्‍ताह बाद एक बार फिर फसल काटी गई। इस बार उन्‍हें Pukeeza वैराइटी से 6 टन और अपूर्व वैराइटी से 4 टन तरबूज मिले ।

3 लाख 30 हजार रुपए का मुनाफा

पेरुमल ने तरबूज की पहली खेप 3100 रुप प्रति टन बेची। जबकि दूसरे खेप को 1000 रुपए प्रति टन बेचा। उन्‍होंने कुल 3 लाख 30 हजार रुपए का मुनाफा कमाया।

2 माह के कोर्स ने बदली कि‍स्‍मत, हर माह 1.2 लाख कमा रहे रेड्डी

आई वॉक फार्मिंग, आई टॉक फार्मिंग, आई ब्रीद फार्मिंग – कुछ ऐसा कहते हैं 52 साल के श्री के रंगा रेड्डी, जो आज बेहद सफलतापूर्वक ‘ताजी-ताजी सब्‍जी’ के नाम से एग्री बि‍जनेस कर रहे हैं। फरवरी 2010 में उन्‍होंने नई तकनीकों और ट्रेनिंग का सहारा लेते हुए सब्‍जि‍यों की फार्मिंग शुरू की और आज उनका सालाना टर्नओवर 1 करोड़ रुपए पहुंच गया है।

तेलंगाना के चंदापुर गांव के रहने वाले रेड्डी अब इलाके के लोगों के लि‍ए मि‍साल बन गए हैं। वह हैराबाद के कृषि‍ विश्‍वविद्यालयों व इंस्‍टीट्यूट में फाइनल ईयर के छात्रों को लेक्‍चर भी देते हैं। वह आसपास के कि‍सानों को खेतीबाड़ी के आधुनि‍क तौर तरीकों से वाकि‍फ कराते हैं।
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काम की तलाश में गए सऊदी

रेड्डी ने एग्रीकल्‍चर में ग्रेजुएशन की मगर भारत में खेती उतनी लाभदायक साबि‍त नहीं हुई। काम की तलाश में वह सऊदी चले गए। उनके पास कोई टेक्‍नि‍कल डि‍ग्री तो थी नहीं इसलि‍ए उन्‍हें वहां फार्म हाउस पर काम मि‍ल गया। खेतीबाड़ी की जानकारी होने की वजह से यहां उन्‍हें तवज्‍जो मि‍ली और वह खेतीबाड़ी के काम में जुटी कंपनी में प्रोडक्‍शन मैनेजर हो गए।

रेड्डी ने देखा कि कैसे खेती के लि‍ए अनुकूल माहौल न होने के बावजूद सऊदी में तकनीक की बदौलत सब्‍जि‍यां पैदा की जा रही हैं। वर्ष 2010 में उन्‍होंने भारत लौटने का मन बना लि‍या। रेड्डी के दि‍माग में सब्‍जि‍यों वाली बात घूमती रही और यहां आकर उन्‍होंने सब्‍जी की खेती शुरू कर दी।

कि‍या दो महीने का कोर्स

रेड्डी के पास खेतीबाड़ी का करीब 25 साल का अनुभव है। मगर उन्‍होंने इसकी बारीकि‍यां सीखने के लि‍ए पार्टि‍सि‍पेटरी रूरल डेवलपमेंट इनि‍शि‍एटि‍व सोसायटी से दो महीने का कोर्स कि‍या। यह कोर्स नि‍शुल्‍क था। इसके बाद उन्‍होंने पंडाल और शेड का यूज करते हुए सब्‍जि‍यों की हाईटेक खेती शुरू की।

उन्‍होंने एक मोबाइल वैन तयार की जि‍ससे वह सब्‍जयों को नजदीकी दुकानों और बाजार तक पहुंचाते हैं। जब सब्‍जि‍यों का प्रोडक्‍शन ज्‍यादा हो जाता है तो वह अपनी वैन लेकर सरकारी दफ्तरों के बाहर पहुंच जाते हैं। यहां सरकारी कर्मचारी शाम को दफ्तर से लौटते हुए सस्‍ती सब्‍जि‍यां ले पाते हैं। इसके अलावा वह सब्‍जि‍यों और फलों की खेती करने वाले कि‍सानों को सलाह भी मुहैया कराते हैं।

आसपास के इलाकों के कई कि‍सान इनके खेतों को देखने के लि‍ए यहां आते हैं। उनकी सफलता को देखते हुए बैंक ऑफ बड़ौदा ने उन्‍हें 25 लाख का लोन भी दि‍या है ताकि वह अपने काम का वि‍स्‍तार कर सकें। रेड्डी से इस मेल आईडी पर संपर्क कर सकते हैं krreddy28@yahoo.com

इस तरीक से किसान शुरू करेंगे “महा हड़ताल”

सहकारी बैंकों का कर्ज नहीं चुका पाने पर किसानों पर पंजाब सरकार की ओर से कार्रवाई की बात कही गई है. इसके जवाब में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के किसानों ने 1 से 10 जून तक अपने गांव को सील करने और शहरों में सब्जियां, फल और दूध की सप्लाई रोकने का ऐलान किया है. चंडीगढ़ में बुधवार को जुटे किसान नेताओं ने यह ऐलान किया है. किसानों के इस आंदोल की अगुवाई राष्ट्रीय किसान महासंघ कर रहा है. इस संगठन के अंदर में देशभर के 110 किसान संगठन आते हैं.

इतना ही नहीं किसानों ने ऐलान किया है कि जब तक कोई जरूरी काम नहीं होगा तब तक किसान गांव के बाहर शह नहीं जाएंगे. तीनों राज्यों में गांवों की सीमा को पूरी तरह सील कर दिया जाएगा. किसानों का कहना है कि सरकारें वादाखिलाफी कर रही है. न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को बढ़ाया नहीं जा रहा है, जिसके चलते किसानों को सीधा नुकसान हो रहा है. किसानों के इस आंदोलन को बीजेपी के पूर्व नेता यशवंत सिन्हा का भी समर्थन है.

किसान नेताओं ने बुधवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि हम लंबे समय से स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार बिल्कुल भी ध्यान नहीं दे रही है. सभी राज्य सरकारें अन्य सेक्टर के लोगों पर पैसे खर्च करती है, लेकिन किसानों की बेहतरी पर कोई ध्यान नहीं दे रही है. मजबूर होकर किसानों ने शहरों में सब्जियों, दूध और फल की सप्लाई रोकने का फैसला लिया है.

दिल्ली में आसमान छू सकती है महंगाई

दिल्ली के विभिन्न सब्जी मंडी एसोसिशन से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर किसान ऐसा करते हैं तो इसका सीधा असर पड़ेगा. उनका कहना है कि दिल्ली में करीब 40 फीसदी सब्जी हरियाणा और पंजाब से आते हैं.

पंजाब-हरियाणा की सब्जियां मंडी में नहीं आने पर यूपी पर दबाव बनेगा, जिससे महंगाई बढ़ना तय है. बताया जा रहा है कि गर्मी शुरू होने के चलते पहले ही सब्जियों की आवक कम है और भाव तेज हैं. किसानों के आंदोलन के चलते ये और महंगे हो सकते हैं.

अंडा ट्रे के इस्तेमाल से आप भी ऐसे ले सकते है सड़े हुए प्याज़ से मुनाफा

आपकी जेब ढीली कर देने वाली प्याज कभी-कभी कौड़ियों के दाम पर बिकने को मजबूर हो जाती है जिससे किसानों को काफी सही मुनाफा नहीं मिल पाता। किसानों को उनके प्याज की सही कीमत मिले इसके लिए राजविंदर सिंह राना ने एक नई तकनीक इजाद की है। राजविंदर पंजाब के लुधियाना जिले के मदियानी गांव में रहते हैं।

उन्होंने यह देखा कि कई बार जब प्याज हल्का सड़ने लगता हैं तो किसानों को उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता। राजविंदर ने समस्या का हल निकालने के लिए इस विषय शोध किया। उन्होंने ‘एग ट्रे’ में प्याज रखकर सप्ताह में दो बार पानी का छिड़काव किया। इसके बाद उससे हरी पत्ती वाला प्याज निकलने लगा।

राजविंदर बताते हैं कि एक किलो प्याज में जितने गुण पाए जाते हैं, उतने ही गुण एक हरे पत्ती वाले प्याज में पाए जाते हैं। वैसे तो इस इस तकनीक का इस्तेमाल हम उस समय कर सकते हैं जब हमारे पास मिट्टी का कोई साधन न हो लेकिन अभी मैंने इसका इस्तेमाल अपनी किचेन में किया है।

इस प्याज का इस्तेमाल हम रोजाना कर सकते हैं। ये वर्षों चलने वाली प्रक्रिया है, इससे हमारे घर में हल्का खराब हो रहा प्याज प्रयोग में आ जाएगा। राजविंदर आगे बताते हैं कि इस प्रक्रिया से किसानों के प्याज का उन्हें सही दाम भी मिलेगा। साथ ही अगर कोई इस हरे प्याज एग ट्रे को बाजार में बेचना चाहेगा तो उस समय बाजार भाव के हिसाब से 40-60 रुपए आसानी से कमाए जा सकते हैं।

आप भी अपनी रसोई में खाली एग ट्रे में घर में हल्के खराब हो रहे प्याज को एग ट्रे के खानों में भरकर रख सकते हैं। सप्ताह में दो बार हल्के पानी का इसमें छिड़काव करें। इसमें हर सप्ताह में दो बार पानी डालते रहें जिससे ये हरा बना रहेगा। इस तकनीक से घर में खराब हो रहे प्याज का हम सही से प्रयोग कर सकते हैं।

बेबी कॉर्न एक बार में कमा कर देगा 2 लाख

कम इन्‍वेस्‍टमेंट में अच्‍छी इनकम के लिए खेती को जरिया बनाने वालों के लिए बेबी कॉर्न की खेती भी एक अच्‍छा विकल्‍प हो सकती है। खास बात यह है कि बेबी कॉर्न की पैदावार को पूरे साल में 3 से 4 बार लिया जा सकता है। बड़ी-बड़ी रेस्‍टोरेंट चेन और होटलों में अच्‍छी-खासी डिमांड होने के चलते इसकी कीमत भी अच्‍छी मिलती है।

यदि एक हेक्‍टेयर भूमि में बेबी कॉर्न की खेती का मॉडल समझा जाए तो इससे सालभर में 3 से 4 लाख रुपए की इनकम आसानी से की जा सकती है। जबकि, एक बार में लागत 10 से 15 हजार रुपए प्रति हेक्‍टेयर की आती है। इस हिसाब से देखा जाए तो शुद्ध लाभ 2.5 लाख रुपए से 3.5 लाख रुपए अर्जित किया जा सकता है। आइए जानते हैं कि अच्‍छी इनकम के लिए कब, कैसे और किन किस्‍मों की करें बुआई

अभी है बुआई का अच्‍छा समय

बेबी कॉर्न मक्‍का की एक प्रजाति होती है। या यूं कहें कि यह मक्‍का का प्री-मैच्‍योर भुट्टा होता है। भारत के अधिकतर हिस्‍सों में मक्‍का की बुआई तीनों सीजन (सर्दी, गरमी और बरसात) में की जाती है। उत्‍तर भारत में दिसंबर और जनवरी के महीनों में बुआई ठीक नहीं रहती है। वर्तमान में खरीफ सीजन के लिए बेबी कॉर्न की फसल को बोया जा सकता है।

कितनी लगती है लागत

एक हेक्‍टेयर कृषि भूमि में बेबी कॉर्न पैदा करने के लिए लगभग 15 किलोग्राम बीज की आवश्‍यकता हेाती है। सीड कंपनी के प्रमाणित बीज 200 से 300 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से मिलते हैं। इसके अलावा बीमारियों से बचाने के लिए कीटनाशक व अन्‍य लागत पर 6 से 10 हजार रुपए का खर्च आ जाता है।

इसमें जल्‍दी पैदावार देने वाली (50 से 55 दिनों में) हरियाणा मेज(एचएम)-4, एचक्‍यूपीएम आदि उन्‍नत किस्‍मों को चुना जा सकता है। इन किस्‍मों में बेबी कॉर्न के सभी गुण मौजूद होते हैं। 16 से 20 क्विंटल तक होती है पैदावार एक हेक्‍टेयर बेबी कॉर्न की फसल से लगभग 16 से 20 क्विंटल बेबी भुट्टा (बिना छिलके) के प्राप्‍त होता है।

इसके अलावा 200 से 300 क्विंटल हरा चारा भी प्राप्‍त होता है। गर्मियों के दिनों में बेबी कॉर्न और हरा चारा की बेहद अच्‍छी डिमांड रहती है। बेबी कॉर्न को तोड़ने के बाद नरमंजरी, रेशा, छिलका आदि पोष्टिक चीजें भी मिलती हैं। ये भी बाजार में आसानी से बिक जाती हैं।

एक बार में 1.5 से 2 लाख रुपए की इनकम

बेबी कॉर्न की बिक्री अधिकतर बड़े शहरों में की जाती है। इसकी फुटकर कीमत 70 से 120 रुपए प्रतिकिलो के आसपास होती है। थोक में इसका रेट 4000 से 6000 रुपए प्रति क्विंटल (क्‍वालिटी के अनुसार) होता है। यदि कम से कम दाम 4000 रुपए प्रति क्विंटल को भी आधार बनाया जाए तो सिर्फ बेबी कॉर्न से ही 80000 रुपए इनकम होती है।

इसके अलावा हरा चारा स्‍थानीय बाजारों में लगभग 200 रुपए से 300 रुपए प्रति क्विंटल की दर से बिकता है। इससे 60 हजार रुपए तक इनकम होती है। इस तरह यदि साल में दो बार भी बेबी कॉर्न की फसल ली जाए तो इससे 2.50 रुपए तक कमाए जा सकते हैं। इसके साथ अन्‍य मौसमी फसलें भी ली जा सकती हैं।

ऐसे करें मार्केटिंग

इसकी बिक्री बड़े शहरों (जैसे- दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता आदि) के मंडियों में की जा रही है | विरेंद्र कुमार यादव ने बताया कि कुछ किसान इसकी बिक्री सीधे ही होटल, रेस्तरां, कम्पनियों (रिलायन्स, सफल आदि) को कर रहे हैं | कुछ यूरोपियन देशों तथा अमेरिका में बेबी कॉर्न के आचार एवं कैन्डी की बहुत ही ज्यादा माँग है | हरियाणा राज्य के पानीपत जिला से पचरंगा कम्पनी द्वारा इन देशों में बेबी कॉर्न के आचार का निर्यात किया जा रहा है |

अच्‍छे दामों के लिए करें प्रोसेसिंग

बाजार में बेबी कॉर्न (छिलका उतरा हुआ) को बेचने के लिये छोटे–छोटे पोलिबैग में पैकिंग किया जा सकता है | इसे अधिक समय तक संरक्षित रखने के लिये काँच(शीशा) की पैकिंग सबसे अच्छी होती है | काँच के पैकिंग में 52% बेबी कॉर्न और 48% नमक का घोल होता है | बेबी कॉर्न को डिब्बा में बंद करके दूर के बाजार या अन्तराष्ट्रीय बाज़ारों में बेचा जा सकता है।