27 साल की वल्लरी चंद्राकर कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर रह चुकी है

जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर छोटा सा गांव है सिर्री (बागबाहरा) । यहां की बेटी वल्लरी चंद्राकर को अपनी धरती से इस कदर प्रेम हुआ कि वह राजधानी रायपुर के एक प्राख्यात कालेज से नौकरी छोड़कर आ गई ।

धरती का कर्ज चुकाने और ‘अपने लोग-अपनी जहां” का नारा बुलंद करते हुए वल्लरी कहती है कि नौकरी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, खेती से श्रेष्ठ नहीं हो सकती है। खेती में परिश्रम थोड़ा अधिक करना पड़ता है। किंतु, अन्‍नदाता होने का जो सुकून खेती में है, वह भाव किसी भी नौकरी में आ ही नहीं सकता । उन्‍नत तकनीक को अपनाकर खेती किया जाए तो यह घाटे का सौदा नहीं है।

वल्लरी के पिता जल मौसम विज्ञान विभाग रायपुर में उपअभियंता हैं । उनका पैतृक ग्राम सिर्री है। वल्लरी अपनी पुश्तैनी जमीन में खेती को देखने पिता के साथ कभी-कभी रायपुर से बागबाहरा के पास सिर्री गांव आती थी ।अपनी धरती से वल्लरी को इस कदर लगाव हुआ कि वह रायपुर के दुर्गा कालेज में सहायक प्राध्यापक की नौकरी छोड़कर गांव आ गई ।

बीई (आईटी) और एम टेक (कंप्यूटर साइंस) तक उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बावजूद सफ्टवेयर इंजीनियर इस बेटी ने खेती को अपना व्यवसाय बनाकर सबको चौंका दिया है। इतना ही नहीं वल्लरी खुद ट्रैक्टर चलाकर खेती कर लेती है । इन दिनों उनकी बाड़ी में मिर्ची, करेला, बरबट्टी और खीरा आदि की फसल लहलहा रही है।

अपनी शिक्षा का सदुपयोग आधुनिक तकनीक से उन्न्त खेती में करने पर जोर देते हुए वल्लरी कहती हैं कि उनकी प्रतिभा को गांव वालों और समाज के लोगों ने प्रोत्साहित किया, इससे हौसला बढ़ता गया। अब तो जिस धरती पर जन्म ली, वहां खेती करके उन्नतशील कृषक बनना ही उनका सपना है।

वल्लरी बताती हैं कि उनके दादा स्वर्गीय तेजनाथ चंद्राकर राजनांदगांव में प्राचार्य थे। शासकीय सेवा में होने से उनके घर में तीन पीढ़ियों से खेती किसी ने स्वयं नहीं किया । दादा और पिता नौकरीपेशा होने से खेती नौकर भरोसे होती रही । वल्लरी को खेती की प्रेरणा अपने नाना स्वर्गीय पंचराम चंद्राकर से मिली है। वह अपने ननिहाल सिरसा (भिलाई) जाती थी, तो वहां की खेती देखकर व भाव विभोर हो उठती थी । बचपन का उनका खेती के प्रति लगाव उन्हें अपनी धरती पर खेती करने खींच लाया । वल्लरी की छोटी बहन पल्लवी भिलाई के कालेज में सहायक प्राध्यापक हैं।

मां-बाप को है इस बेटी पर गर्व

वल्लरी की मां युवल चंद्राकर गृहणी है । वे कहती हैं कि उनकी दो बेटियां हैं। दोनों ही इस कदर होनहार हैं कि उन्हें कभी बेटे की कमी महसूस नहीं हुई । हमें बेटा और बेटी में कोई फर्क नहीं करना चाहिए । अब जब बड़ी बेटी वल्लरी खुद खेती कर सिर्री के 26 एकड़ और घुंचापाली (तुसदा) के 12 एकड़ खेत में सब्जी-भाजी की उन्नत फसलें ले रही हैं, तब उन्हें और भी ज्यादा गर्व होता है। अब तो समाज में लोग उन्हें वल्लरी की मां के नाम से पहचानते हैं।

खेती के साथ फैला रही ज्ञान का उजियारा

शहर से गांव आई वल्लरी कंप्यूटर की खास जानकार हैं। गांव के गरीब बच्चे आगे बढ़ सकें, सूचना क्रांति के क्षेत्र में उनका नाम हो। इसके लिए वह गांव के दर्जनभर बच्चों को नि:शुल्क कंप्यूटर शिक्षा भी दे रही है। दिनभरखेत में कामकाज और प्रबंधन देखने के बाद देर शाम से रात तक बच्चों को कंप्यूटर की शिक्षा देना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।

सालाना आय करीब 20 लाख रूपए

युवा सोच और ड्रीप ऐरिगेशन (टपक पद्धति से सिंचाई) से सब्जी-भाजी की खेती को वल्लरी ने लाभदायक बनाया है। उनका कहना है कि शुरूआत में प्रति एकड़ करीब डेढ़ लाख स्र्पए खर्च करना पड़ा। इस तरह उनके दो फार्म हाउस में करीब 55 से 60 लाख स्र्पए खर्च हुआ । यह वन टाइम इन्वेस्टमेंट है । इससे फार्म हाउस खेती के लिए पूरी तरह विकसित हो चुका है। सालभर में सभी खर्च काटकर प्रति एकड़ करीब 50 हजार स्र्पए शुद्ध आय हुई। इस तरह उनकी खेती से वार्षिक आय 19 से 20 लाख स्र्पए हो रहा है। वल्लरी का कहना है कि खेती को व्यवसायिक और सामुदायिक सहभागिता से उन्नत बनाने की दिशा में वे प्रयास कर रही हैं।

जाने कैसे करोड़पतियों का गांव बना महराष्ट्र का हिवरे बाजार

इस गांव में न पानी की कमी है, न हरियाली की। ये है हिवरे बाजार गांव। यह महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में आता है। यहां की आबादी 300 लोगों से ज्यादा है, जिसमें से 80 से ज्यादा लोग करोड़पति हैं। महाराष्ट्र फिलहाल सूखे की चपेट में है, पर इस गांव में न पानी की कमी है, न हरियाली की। जानें कैसे

बदली गांव की किस्मत…

  • इस गांव की किस्मत यहां के लोगों ने खुद लिखी है। क्योंकि 1990 में यहां 90 फीसदी     परिवार गरीब थे।
  •  इस बारे में गांव के सरंपच पोपट राव कहते हैं कि हिवरे बाजार 80-90 के दशक में भयंकर   सूखे से जूझा। पीने तक के लिए पानी नहीं बचा।
  •  कुछ लोग अपने परिवारों के साथ दूसरी जगहों पर चले गए। गांव में महज 93 कुएं ही थे।
  •  वाटर लेवल भी 82-110 फीट नीचे पहुंच गया था। लेकिन फिर लोगों ने खुद को बचाने की   कवायद शुरू की।

ऐसे बदली गांव की तस्वीर

  • सूखे से निपटने के लिए 1990 में एक कमेटी, ज्वाइंट फॉरेस्ट मैनेजमेंट कमेटी बनाई गई।   इसके तहत गांव में कुआं खोदने और पेड़ लगाने का काम श्रमदान के जरिए शुरू किया गया।
  • इस काम में, महाराष्ट्र इम्प्लॉयमेंट गारंटी स्कीम के तहत फंड मिला, जिससे काफी मदद     मिली। साल 1994-95 में आदर्श ग्राम योजना आई, जिसने इस काम को और रफ्तार दे दी।
  • फिर कमेटी ने गांव में उन फसलों को बैन कर दिया, जिनमें ज्यादा पानी की जरूरत थी।
  • पोपट राव ने बताया कि अब गांव में 340 कुएं है। ट्यूबवेल खत्म हो गए हैं और जमीन का   वाटर लेवल भी 30-35 फीट पर आ गया है।

गांव में 80 करोड़पति परिवार

  • सरपंच पोपट राव के मुताबिक, गांव के 305 परिवार रहते हैं। इनमें से करीब 80 करोड़पति परिवार हैं।
  •  वे बताते हैं कि यहां सभी लोगों की मुख्य आय खेती से ही होती है। यह लोग सब्जी उगाकर   ज्यादातर कमाई करते हैं।
  •  हर साल इनकी आय बढ़ रही है। खेती के जरिए जहां 80 परिवार करोड़पति के दायरे में आ   गए हैं। वहीं, 50 से अधिक परिवारों की सालाना इनकम 10 लाख रुपए से ज्यादा है।
  •  गांव की प्रति व्यक्ति आय देश के टॉप 10 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों के औसत आय (890 रुपए    प्रति माह) की दोगुनी है। यानी पिछले 15 वर्षों में औसत आय 20 गुनी हो गई है।

पीएम मोदी ने मन की बात में की थी तारीफ…

पीएम नरेंद्र मोदी ने 24 अप्रैल को ‘मन की बात’ में हिवरे बाज़ार की तारीफ करते हुए कहा था कि पानी का मूल्य क्या है, वो तो वही जानते हैं, जिन्होनें पानी की तकलीफ झेली है। और इसलिए ऐसी जगह पर, पानी के संबंध में एक संवेदनशीलता भी होती है और कुछ-न-कुछ करने की सक्रियता भी होती है। महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के हिवरे बाज़ार ग्राम पंचायत पानी की समस्या से निपटने के लिए क्रॉपिंग पैर्टन को बदला और पानी ज्यादा उपयोग करने वाली फसलों को छोड़ने का फैसला लिया। सुनने में बात बहुत सरल लगती है, लेकिन इतनी सरल नहीं है।

पांच साल का प्लान बनाया

  • पोपट राव ने बताया कि गांव को बचाने के लिए यशवंत एग्री वाटर शेड डेवलपर्स एनजीओ के   साथ मिलकर पांच साल का प्लान बनाया गया था।
  •  इसके तहत गांव में कुएं खोदे जाने थे। पेड़ लगाने थे। गांव को 100 फीसदी शौचालय वाले   गांव में शुमार करना था।
  •  उन्होंने बताया कि एक बार लोग जुड़े तो जुनून कुछ ऐसा हो गया कि पांच साल का प्लान 2     साल में ही खत्म हो गया।

 

ऐसे शुरू करें अपना पोल्ट्री फार्म ,जाने इस बिज़नेस की हर बारीकी को

हमारे देश में पूरे साल अंडों की बहुत मांग रहती है और नेशनल इंस्टीट्यूट आफ न्यूट्रीशन की राय के तहत भी हर इनसान को 1 साल में 180 अंडे और 11 किलोग्राम चिकन मीट खाना चाहिए, जबकि हमारे देश में साल भर में हर इनसान केवल 53 अंडे और 2.5 किलोग्राम चिकन मीट ही खा पाता है. अब आप इस आंकड़े से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे देश में पोल्ट्री इंडस्ट्री के विकास की कितनी गुंजाइश है.

गांव के बहुत से बेरोजगार नौजवान पोल्ट्री बिजनेस शुरू करना चाहते हैं, पर वे जानकारी न होने की वजह से इस कारोबार में हाथ डालने से घबराते हैं. कोई व्यक्ति इस काम में हाथ डाल भी देता है, तो पोल्ट्री बिजनेस की पूरी जानकारी नहीं होने की वजह से उस का पोल्ट्री कारोबार कामयाब नहीं होता. पोल्ट्री का बिजनेस शुरू करने से पहले इस बिजनेस की हर बारीकी को जान लेना चाहिए, जैसे कौन सी नस्ल (स्ट्रेन) को पाल कर कम खर्चे पर ज्यादा अंडे पैदा किए जा सकते हैं.

हमारे देश के गांवों में ज्यादातर किसान बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग कर के अंडे और चिकन मीट पैदा करते हैं, जिस का इस्तेमाल वे अपने परिवार के खाने में ही कर लेते हैं. अगर ये किसान अपनी बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग को कमर्शियल लेयर/ब्रायलर प्रोडक्शन की यूनिट में बदल दें, तो घर के खाने के अलावा कमाई का एक अच्छा जरीया बना सकते हैं.

किसानों के पास खुद की जमीन होती है और शेड बनाने में ज्यादा खर्च भी नहीं होता. अंडा एक बहुत ही पौष्टिक खाना है, सुबह नाश्ते में 1 या 2 अंडे खाए जाएं तो दोपहर तक भूख नहीं लगेगी यानी नुकसानदायक चीजें जैसे परांठे, ब्रेडपकौड़े, समोसे वगैरह खाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि आप को भूख नहीं लगेगी. वैसे भी ब्रेडपकौड़े व समोसे वगैरह हर इनसान को नुकसान पहुंचाते हैं. अगर इस की जगह अंडे खाए जाएं, तो शरीर को जरूरी विटामिन व मिनरल की पूर्ति कम दामों में होगी और सेहत भी अच्छी बनी रहेगी.

हमारे देश में अंडे पैदा करने के लिए बहुत सी मुरगियां यानी स्ट्रेन (ब्रीड) उपलब्ध हैं, पर हमारे देश की आबोहवा ऐसी नहीं है कि कोई भी स्ट्रेन कम खर्च पर ज्यादा अंडे पैदा करने की कूवत रखती हो. इसलिए ऐसी नस्ल का चुनाव करें जो आप के इलाके की आबोहवा में अच्छा उत्पादन कर सके. अंडे पैदा करने के लिए बीवी 300 स्ट्रेन और चिकन मीट पैदा करने के कोब्ब 400 स्ट्रेन बढि़या मानी गई हैं. ये दोनों स्ट्रेन हमारे देश के सभी राज्यों में गरमी, सर्दी व बरसात सभी मौसमों में कम खर्च पर ज्यादा उत्पादन देने की कूवत रखती हैं.

सामान्य मैनेजमेंट पर भी इन दोनों स्ट्रेनों में ज्यादा गरमी, ज्यादा बरसात, ज्यादा ठंड और ज्यादा नमी में मौत दर भी कम है. बीवी 300 मुरगी 18 हफ्ते की होने के बाद अंडे देना शुरू कर देती है और 80 हफ्ते तक 374 अंडे देती है. ये 374 अंडे पैदा करने के लिए (19 से 80 हफ्ते तक) यह मुरगी कुल 46.6 किलोग्राम दाना (फीड) खाती है और पहले दिन से ले कर 18 हफ्ते तक 5.60 किलोग्राम दाना खाती है. यह मुरगी अंडा देना शुरू करने के बाद 80 हफ्ते तक रोजाना औसतन 111 ग्राम दाना खाती है. पहले दिन से ले कर 18 हफ्ते तक डेप्लेशन यानी मोर्टेलिटी व कलिंग 3-4 फीसदी तक ही होती है और 19 हफ्ते से 80 हफ्ते तक डेप्लेशन 7 फीसदी तक होता है.

वेनकोब्ब 400 ब्रायलर दुनिया में जानीमानी कमर्शियल ब्रायलर की उम्दा स्ट्रेन (नस्ल) है. यह हमारे देश के सभी हिस्सों में अच्छे नतीजे देती है. ज्यादा गरमी और ठंड या बरसात के मौसम में इस स्ट्रेन में मोर्टेलिटी बहुत कम होती है और बढ़वार अच्छी होती है. बड़े पैमाने पर ब्रायलर फार्मिंग करने वाले किसान वेनकोब्ब 400 ब्रायलर को ही पालना पसंद करते हैं. वेनकोब्ब 400 ब्रायलर स्ट्रेन 35 दिनों में तकरीबन 3 किलोग्राम फीड खा कर 2 किलोग्राम तक यानी 1900-2000 ग्राम तक वजन हासिल करने की कूवत रखती है. फार्म पर मैनेजमेंट अच्छा हो तो 35 दिनों में केवल 2.75 फीसदी की मौत दर देखी गई है.

कमर्शियल लेयर (अंडे देने वाली मुरगी) को केज और डीपलिटर सिस्टम और कमर्शियल ब्रायलर को केवल डीपलिटर सिस्टम से पालते हैं. मुरगी पालने के शेड हमेशा साइंटिफिक स्टैंडर्ड के मुताबिक ही बनाने चाहिए. अगर आप ने पोल्ट्री शेड गलत दिशा और गलत तरीके से बना दिया है, तो आप का सारा पैसा बरबाद होगा ही और गलत तरीके से बनाए गए शेड में आप मुरगी से उस की कूवत के मुताबिक उत्पादन नहीं ले पाएंगे. गलत बने शेड में मुरगियों की मौतें भी ज्यादा होती हैं. मुरगियों को जंगली जानवरों, कुत्ते व बिल्ली वगैरह से बचाने के लिए शेड की चैन लिंक (जाली) अच्छी क्वालिटी की होनी चाहिए.

सर्दी के मौसम में शेड को गरम रखने और गरमी के मौसम में शेड को ठंडा रखने के लिए कूलर, पंखे, फागर वगैरह का भी इंतजाम रखें. शेड को थोड़ी ऊंचाई पर बनाएं जिस से बरसात का पानी शेड के अंदर नहीं घुसे. शेड के अंदर गरमीसर्दी के असर को कम करने के लिए शेड की छत पर 6 इंच मोटा थैच (घासफूस का छप्पर) डाल देना चाहिए. पर थैच को आग से बचाने के लिए शेड की छत पर स्प्रिंकलर लगा देना चाहिए ताकि जरूरत पड़ने पर उसे चलाया जा सके. शेड की छत पर थैच डालने पर गरमी के मौसम में शेड के अंदर 7-10 डिगरी तापमान कम हो जाता है. सर्दी के मौसम में भी थैच शेड के अंदर का तापमान ज्यादा नीचे तक नहीं जाने देता है.

चिकन मीट और अंडा उत्पादन के कुल खर्च का 60 से 70 फीसदी दाने पर खर्च होता है. इसलिए दाने की क्वालिटी एकदम अच्छी होनी चाहिए. पोल्ट्री फीड उम्र, स्ट्रेन, मौसम, प्रोडक्शन स्टेज, फीडिंग मैनेजमेंट वगैरह के पैमाने पर खरा उतारना चाहिए. पोल्ट्री फीड संतुलित नहीं है तो मुरगी कम अंडे पैदा करेगी और पोषक तत्त्व और विटामिन की कमी से होने वाली बीमारियां भी मुरगियों को होने लगेंगी, जैसे फैटी लिवर सिंड्रोम, पेरोसिस, डर्मेटाइटिस, रिकेट्स, कर्लटाय पेरालिसिस वगैरह. अंडे देने वाली मुरगी को लगातार अंडे देने के लिए 2500 से 2650 किलोग्राम कैलोरी वाले फीड की जरूरत होती है, उम्र और अंडे के वजन के मुताबिक ही फीड की कैलोरी तय की जाती है. 1 से 7 हफ्ते के चूजे को 2900 किलोग्राम कैलोरी का फीड, जबकि ग्रोवर को 2800 किलोग्राम कैलोरी का फीड देना चाहिए.

मुरगी दाने और फीड बनाने वाले इंग्रेडिएंट (मक्का वगैरह) में नमी कभी भी 10-11 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. अगर मक्के में नमी ज्यादा होती है, तो फंगस लग सकता है और फंगस लगा मक्का फीड में इस्तेमाल करने से उस में अफ्लाटाक्सिन (एक प्रकार का जहर) की मात्रा बढ़ जाएगी, जो मुरगी की इम्युनिटी (बीमारी झेलने की कूवत) को कमजोर कर देगी और मुरगी जल्द ही बीमारी की चपेट में आ जाएगी. बेहतर होगा कि पोल्ट्री फीड प्राइवेट कंपनी से खरीदा जाए ताकि फीड से जुड़ी किसी भी तरह की परेशानी से बचा जा सके.

उत्तरा फीड कंपनी देश में बड़े पैमाने पर उम्दा क्वालिटी का पोल्ट्री फीड बेचती है. इस कंपनी की सेल्स टीम से संपर्क कर के फीड खरीदें. मुरगियों के लिए रोशनी सब से खास चीज है. अंडे देने वाली कमर्शियल मुरगी को 16 घंटे लाइट देते हैं और चूजे को ब्रूडिंग के दौरान 24 घंटे, ग्रोवर/पुलेट को 12 घंटे लाइट (नेचुरल लाइट) देते हैं. लाइट मौसम व स्ट्रेन वगैरह पर निर्भर करती है और इसी आधार पर ही लाइट का मैनेजमेंट करते हैं. कमर्शियल लेवल पर पीली, लाल, आरेंज रंग की लाइट से अच्छे नतीजे मिलते हैं. ब्रायलर को 24 घंटे लाइट दी जाती है. लाइट देने में किसी तरह की कोई कंजूसी न करें. लाइट 1 वाट प्रति 4 वर्ग फुट के हिसाब से दें. अपने फार्म की मुरगियों (फ्लाक) को समय पर टीके दें. सामान्य वैक्सीनेशन शिड्यूल इलाके और फार्म के मुताबिक पोल्ट्री चूजा बेचने वाली कंपनी से लें और उसे अपनाएं.

फार्म की मुरगियों से लगातार अच्छे अंडे लेने और उन को बीमारी से बचाने के लिए पानी भी सब से अहम चीज है. फार्म की मुरगियों को हमेशा ताजा व साफ पानी यानी जो इनसानों के लिए भी पीने लायक हो, देना चाहिए. ई कोलाई, साल्मोनेला बैक्टीरिया, पीएच, हार्डनेस, कैल्शियम वगैरह की जांच के लिए पानी की जांच समयसमय पर कराते रहें. अगर जांच में पानी में कोई कमी मिलती है, तो उसे फौरन दुरुस्त करें. सब से अच्छा होगा कि पोल्ट्री फार्म पर आरओ प्लांट लगा कर मुरगियों को उस का पानी दें, इस से मुरगियों की अंडा पैदा करने की कूवत में काफी इजाफा होगा और वे ज्यादा अंडे देंगी और पानी से जुड़ी बीमारियों से भी बची रहेंगी. 3000 लीटर प्रति घंटा आरओ का पानी तैयार करने के लिए आरओ प्लांट पर तकरीबन 5-6 लाख रुपए का खर्च आएगा.

फार्म पर नया फ्लाक डालने से पहले फार्म और शेड की साफसफाई तय मानकों के अनुसार करना जरूरी होता है. शेड के सभी उपकरण (दानेपानी के बरतन, परदे, ब्रूडर, केज) व परदे वगैरह को अच्छी तरह साफ करना चाहिए. पहले फ्लाक के पंख, खाद, फीड बैग वगैरह को जला दें. शेड को साफ पानी से अच्छी तरह धो कर साफ करने के बाद शेड और उपकरणों की सफाई के लिए डिसइन्फेक्टेंट का इस्तेमाल करें. शेड की छत, पिलर वगैरह पर वाइट वाश (चूना) करने के बाद फिर से डिसइन्फेक्टेंट का स्प्रे करें.शेड का फर्श पक्का है तो उसे अच्छी तरह से लोहे के ब्रश से रगड़ कर साफ करें और फिर उस की साफ पानी से अच्छी तरह सफाई कर के उस पर 10 फीसदी वाले फार्मलीन के घोल का छिड़काव करें. खाली शेड में एक्स 185 डिसइन्फेक्टेंट की 4 मिलीलीटर मात्रा 1 लीटर पानी में घोल कर 25 वर्ग फुट रकबे में अच्छी तरह छिड़काव करें. शेड का फर्श कच्चा हो तो शेड के फर्श की 2 इंच तक मिट्टी की परत खरोंच कर निकाल दें और उस जगह पर दूसरे खेत की साफ ताजी मिट्टी डाल दें. अगर पिछले फ्लाक में किसी खास बीमारी का हमला हुआ था, तो पोल्ट्री कंपनी के टेक्निकल डाक्टर से शेड की सफाई का शेड्यूल लें और उसी के अनुसार ही शेड की साफसफाई करें.

फार्म पर बायो सिक्योरिटी अपनाएं मतलब फार्म पर बाहर के किसी भी शख्स को न आने दें.आप के फार्म पर बायोसिक्योरिटी जितनी अच्छी होगी तो फार्म की मुरगियों को बीमारी लगने की संभावना उतनी ही कम होगी. इसलिए बायोसिक्योरिटी बनाए रखने के लिए फार्म के गेट पर फुटबाथ बनाएं. सभी वर्कर, सुपरवाइजर, डाक्टर, विजिटर को नहला कर और फार्म के कपड़े पहना कर ही फार्म में घुसने दें. जंगली पक्षी भी बायोसिक्योरिटी को तोड़ते हैं और फार्म पर बीमारी फैलाने में खास रोल अदा करते हैं. इसलिए फार्म पर लगे पेड़ों पर अगर जंगली पक्षियों का बसेरा है, तो उन को खत्म कर दें. अपने मुरगी फार्म से अच्छा मुनाफा कमाने के लिए सभी मुरगीपालकों को बायोसिक्योरिटी पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. फार्म माइक्रो लेवल पर साइंटिफिक मैनेजमेंट अपनाना जरूरी है, तब जा कर पोल्ट्री फार्म से अच्छे मुनाफेकी उम्मीद की जा सकती है. बीवी 300 और कोब्ब 400 के 1 दिन के चूजे, दाना, दवा, वैक्सीन वगैरह खरीदने के लिए

इन कंपनियों में संपर्क करें :

  •  वैंकीस इंडिया लिमिटेड.
  •  वेंकटेश्वर रिसर्च एंड ब्रीडिंग फार्म प्राइवेट लिमिटेड.
  •  बीवी बायो कार्प प्राइवेट लिमिटेड.
  •  उत्तरा फूड्स एंड फीड प्राइवेट लिमिटेड.

ध्यान देने लायक बातें:

अंडों को लंबे समय तक खाने लायक बनाए रखने के लिए उन्हें फ्रिज में रखें. अंडे से बनी डिश को फौरन खा कर खत्म कर दें. अंडे से बनी डिश को फ्रिज में कतई स्टोर न करें. वर्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन और पान अमेरिका हेल्थ आर्गनाइजेशन की सलाह के मुताबिक अंडे रोज खाने चाहिए. अंडे में सभी जरूरी न्यूट्रिएंट्स जैसे आयरन और जिंक वगैरह अच्छी मात्रा में मौजूद होते हैं.

पोल्ट्री फार्म ऐसे शुरू करें:

पोल्ट्री फार्म खोलने से पहले पोल्ट्री एक्सपर्ट से सलाहमशवरा करें. इस के नफेनुकसान पर गौर करें. तैयार माल को बेचने की पहले से प्लानिंग तैयार करें. पोल्ट्री एक्सपर्ट या पोल्ट्री चूजादाना बेचने वाली कंपनी के टेक्निकल सर्विस के डाक्टर से बात कर के ट्रेनिंग लें और उन्हीं की देखरेख में ब्रायलर फार्म चलाएं. अगर इस काम को बड़े लेवल पर करना हो, तो प्रोजेक्ट बना कर बैंक से लोन ले सकते हैं. प्रोजेक्ट बनाने में पोल्ट्री कंपनी के टेक्निकल डाक्टर और बैंक के एग्रीकल्चर डेवलपमेंट अफसर से मदद लें.
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किसानो के लिए खुशखबरी ! इतने रुपये तक बढ़ सकता है गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य

गेहूं की एमएसपी पर सरकार जल्द फैसला ले सकती है। मिनिमम सपोर्ट प्राइस बढ़ाने के लिए सरकार ने तैयारियां शुरु कर दी हैं। जानकारी मिली है कि गेहूं के इंपोर्ट पर भी ड्यूटी बढ़ाने की योजना फिलहाल नहीं है।

इसी बीच किसानों के लिए खुशखबरी यह है, कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइसेज यानी सीएसीपी ने रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की सिफारिश की है। सीएसीपी ने गेहूं की एमएसपी 115 रुपये प्रति क्विंटल और दालों की एमएसपी 225 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाने की सिफारिश की है। कृषि मंत्रालय ने कैबिनेट को ये प्रस्ताव भेजा है।

कैबिनेट इस पर अंतिम फैसला लेगी। बता दें कि कैबिनेट की बैठक अगले बुधवार को होगी।अगर इस बार गेहूं के एमएसपी 115 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ती है तो गेहूं की समर्थन मूल्य पिछले साल (2016 -2017) के एमएसपी 1625 रुपये प्रति क्विंटल में जोड़ने पर 1625 +115 =1740 प्रति क्विंटल तक हो सकती है । देखने में यह भाव ठीक लग रहा है लेकिन आज के खेती खर्चे देखें तो उस हिसाब से कम है ।आज के खेतीबाड़ी खर्चों के हिसाब से गेहूं का भाव कम से कम 2300 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए ।

आपको बता दें इस महीने से गेहूं की बुआई शुरु हो जाएगी। इस बीच सरकार ने गेहूं पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने से भी इनकार किया है। कृषि मंत्रालय के मुताबिक फिलहाल ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है और इस तरह की मांगों पर बाद में विचार किया जाएगा।

कबाड़ से तैयार किया ट्रैक्टर, इंजन ऑटो का और टायर मारुति के

अाम तौर पर एक ट्रैक्टर एक लीटर डीजल में 12 किलोमीटर दौड़ता है। लेकिन हरियाणा के हिसार के मिस्त्री कृष्ण जांगड़ा ने ऐसा ट्रैक्टर तैयार किया है, जो एक लीटर में 22 किलोमीटर दौड़ता है। इसकी स्पीड 50 किलोमीटर प्रति घंटा है।

खास बात है कि इस छुटकू ट्रैक्टर की सामने आैर पीछे दोनों तरफ की स्पीड की एवरेज भी एक समान है। कृष्ण को इसे तैयार करने में डेढ़ महीना ही लगा।यह ट्रैक्टर 100 रुपये के खर्च में ही एक एकड़ गेहूं की कटाई कर देता है।

कृष्ण का मिनी ट्रैक्टर लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मात्र 45 हजार रुपए की लागत से तैयार इस मिनी ट्रैक्टर में पीटीओ सिस्टम सहित वे सभी खासियत हैं जो नामी कंपनियों के बड़े ट्रैक्टरों में होती है।

कबाड़ के सामान से बनाया जुगाड़

कृष्ण का कहना है कि मिनी ट्रैक्टर में इंजन पुराने ऑटो का लगाया गया है, वहीं टायर और स्टेयरिंग मारुति कार के हैं। अन्य स्पेयर पार्ट्स भी कबाड़ से ही एकत्रित किए गए हैं।

तीन घंटे में करेगा एक एकड़ फसल की कटाई

मिनी ट्रैक्टर मात्र तीन घंटे में एक एकड़ की गेहूं की फसल की कटाई कर देता है। तीन घंटे में केवल 100 रुपए का डीजल खर्च होता है। कृष्ण का कहना है कि बड़े ट्रैक्टरों से एक एकड़ की गेहूं की कटाई पर करीब 300 से 400 रुपए प्रति एकड़ के तेल का खर्च हो जाता है। छोटी रिपर मशीन भी कृष्ण ने खुद ही तैयार की है।

अधिक जानकारी के लिए वीडियो देखें :

अब पथरीली ज़मीन पर स्प्रींग कल्टीवेटर से करें खेत की जुताई

स्प्रींग टाइन कल्टीवेटर में फ्रेम, टाइन, रिवर्सिबल शावेल, खिंचने वाली प्रणाली, भारी कार्य करने वाला स्प्रिींग इत्यादि भाग होते हैं। स्प्रींग का कार्य टाइन को चलते समय कठोर-वस्तु एवं पत्थर से बचाना है। शावेल हीट ट्रिटेड स्टील का बना होता है।

इसका इस्तेमाल विशेष तोर पर उस भूमि में किया जाता है जहाँ पर बड़े पथर ज्यादा होते है ।
यहाँ पर आम कल्टीवेटर के इस्तमाल से कल्टीवेटर को बहुत नुकसान उठाना पड़ता है और उसके मुड़ने और टूटने का डर रहता है । वहीँ स्प्रिंग कल्टीवेटर में स्प्रिंग लगे होने के कारण ये टूटता नहीं है।

यह कल्टीवेटर माउन्टेड टाइप होता हैं जो ट्रैक्टर के हाइड्रोलिक प्रणाली द्वारा नियंत्रित होता है। यह यंत्र पशु चालित कल्टीवेटर (डोरा) की तुलना में 50 प्रतिशत मजदूरी की बचत तथा 30-35 प्रतिशत संचालन खर्च में बचत करती है।

उपयोग: इसका मुख्य कार्य सूखा या गीला नर्सरी बेड तैयार करने एवं चौड़ी कतार में निकाई-गुड़ाई करने तथा कादो करने में भी इसका प्रयोग करते हैं।

  • उत्पाद विवरण:
  • फ़्रेम: 75 x 40 मिमी
  • ट्यून्स संख्या : 11
  • ट्यून्स: 50 x 19 मिमी (जाली)
  • एंगल पिन: 50 x 6 मिमी
  • स्प्रिंग: 10 mm
  • लंबाई: 2458 मिमी:
  • पावर की आवश्यकता (एचपी): 50 – 55 एचपी
  • वजन : 260 किलोग्राम

 

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यह  कैसे काम करते  है उसके लिए वीडियो भी देखें

सेब की खेती से किसान ऐसे कमाते है सलाना 75 लाख रुपए

शोफियां ( कश्मीर)। सेब की खेती भारत के कई प्रांतों में होती है। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सेब की कई नस्लें पैदा की जाती हैं। इन प्रदेशों में उन्नत किस्म के सेब की खेती होती है। पर अगर अनुकूल वातावरण मिले तो यह सेब कहीं भी पैदा हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश में भी कई स्थानों पर किसान सेब पैदा करते हैं। तस्वीरों में देखें कश्मीर में सेब की खेती।

पूरी दुनिया मे साल 2013 में आठ करोड़ टन सेब पैदा हुआ था। इसमें से भी आधा तो केवल चीन में पैदा किया गया। अकेले अमरीका मे सेब का कारोबार क़रीब चार अरब डॉलर का माना जाता है।

सेब की विश्व में 7500 से अधिक नस्लें पाई जाती हैं। मतलब साफ है अगर एक दिन में एक सेब का स्वाद आप चखेंगे तो तकरीबन 25 साल खर्च हो जाएंगे। सेब में औसतन 10 बीज पाए जाते हैं।

आपको एक और जानकारी बताता हूं कि सेब का एक पेड़ चार-पांच साल की उम्र में फल देना शुरू कर देता है और लगभग सौ साल तक फल देता रहता है।

हिमाचल प्रदेश सेब की खेती के लिए पूरे विश्व में मशहूर है। यहां एक ऐसा गांव है जहां के एक-एक किसान सेब खेती से करीब 75 लाख रुपए सालाना कमाते हैं। सेब की खेती ने इस गांव को इतना विकसित कर दिया है कि यह कहा तो गांव जाता है पर यहां पर आलीशान मकानों की कमी नहीं है। यहां हर साल करीब 150 करोड़ रुपए का सेब पैदा होता है। अब आप को हम इसका नाम बताते हैं इसका नाम है मड़ावग गांव।

 

खेती से हर दिन कैसे कमाएं मुनाफा, ऑस्ट्रेलिया से लौटी इस महिला किसान से समझिए

वो अपने फेसबुक पेज पर इंट्रो में लिखती हैं ‘Farmer’, एक शब्‍द का यह इंट्रो ही उनके बारे में सबकुछ बता देता है। आज के जमाने में जब लोग खेती किसानी का मतलब भूलने लगे हैं उस समय में कोई सोशल मीडिया पर अपना इंट्रो इस तरह देता है तो वो काबिलेतारीफ है। ये कहानी है पूर्वी व्‍यास की, जिन्‍होंने 1999 में ऑस्‍ट्रेलिया में पढ़ाई पूरी करने के बाद वहां नौकरी की बजाय भारत में किसानी करने की सोची।

कैसे शुरू हुआ पूर्वी का सफर

पूर्वी ऑस्ट्रेलिया से 1999 में अपना पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद पूर्वी लौटकर भारत आ गईं और उन्होंने कुछ गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर स्थिरता और विकास के लिए काम करना शुरू कर दिया। 2002 में उन्हें प्रसिद्ध पर्यावरणविद् बीना अग्रवाल के साथ एक प्रोजेक्ट पर किसान समुदाय के लिए काम करने का पहला मौका मिला। इस रिसर्च के लिए वह दक्षिणी गुजरात के नेतरंग और देडियापाड़ा जैसे आदिवासी इलाकों में गईं।

इस काम ने पूर्वी के सोचने का पूरा तरीका ही बदल दिया, उन्‍होंने बताया क‍ि यहां रहने से मुझे समझ में आया कि शहर में रहने वाले लोगों की पर्यावरण के प्रति गंभीरता की बातों और उनके रहन-सहन में पर्यावरण को शामिल करने के बीच कितनी गहरी खाई है, और इसमें मैं भी शामिल हूं। और मैंने एक ऐसे तरीके की खोज करना शुरू कर दिया जिससे मैं उस तरीके को अपना सकूं जिसे गांव के ये लोग अपना रहे हैं।

घर से मिली प्रेरणा

वहां से लौटने के कुछ ही दिनों बाद उन्हें उनकी इस समस्या का समाधान मिल जाएगा। उनकी मां और दादी हमेशा से ही किचन गार्डन को महत्व देती थीं। वह रसोई के कामों में इस्तेमाल होने वाली जड़ी बूटियां और कुछ मसाले घर में ही उगाती थीं। अपने परिवार की इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पूर्वी की मां ने अहमदाबाद से 45 किलोमीटर दूर मतार गांव में अपने 5 एकड़ के खेत में कुछ सब्जियों और फलों की खेती करना शुरू कर दिया। वह हर सप्ताह के अंत में इस खेत में जाकर फसल की देखरेख करती थीं।

अहमदाबाद में जिस खुली और ताज़ी हवा के लिए पूर्वी तरसती थीं, मतार में उन्हें वही हवा अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। वह बाताती हैं कि यही वह चीज़ थी जिसे मैं शहर में खोज रही थी। यहीं से उन्होंने निर्णय लिया कि वो अपनी नौकरी छोड़कर पूरी तरह से किसान बन जाएंगी।

किसानी की दुनिया को नजदीक से देखा

किसानी की दुनिया में शुरुआती दिन पूर्वी के लिए बहुत कठिनाइयों भरे थे। उन्हें खेती-किसानी के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी। यहां तक कि जब वह खेती की बहुत आम सी बातें समझने की कोशिश करती थीं तो छोटे बच्चे तक उन पर हंसते थे लेकिन पूर्वी ने हार नहीं मानी और वह पूरी लगन के साथ खेती की बारीकियों को समझती रहीं।

वह कहती हैं समय के साथ मैंने खेती की कई तकनीकों के बारे में सीख लिया। मैंने यह भी जाना कि उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से फसल को कितना नुकसान होता है इसलिए मैंने जैविक खेती के नए तरीकों की खोज करना शुरू किया। साल 2002 में यह इतना ज़्यादा प्रचलित नहीं था।

ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत की

उन्हें समझ आ गया कि जैविक खेती करके पर्यावरणीय असंतुलन को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने यह भी निष्कर्ष निकाला कि यह किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए फायदेमंद है क्योंकि इसमें लागत लगभग नगण्य थी और उत्पादन बहुत स्वस्थ था।

उन्होंने अपने ही खेत में एक आत्मनिर्भर मॉडल बनाया, जहां खेती के उत्पादों से जीवन की सभी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता था। इसके बाद पूर्वी ने एक डेयरी फार्म की शुरुआत की, जो जैविक खेती के लिए बहुत ज़रूरी था। एक समय में उनके पास 15 भैंस, छह गाय, छह बकरियां थीं और उनकी डेरी से गांव में सबसे ज़्यादा दूध सप्लाई होता था।

किसानों को जैविक खेती से जोड़ा

पारंपरिक किसान जैविक खेती को तरजीह नहीं देते क्योंकि उनका मानना है कि सिर्फ आर्थिक रूप से मज़बूत किसान ही जैविक खेती कर सकते हैं। इसके अलावा जैविक खेती से वास्तविक लाभ हासिल करने के लिए कम से कम तीन साल का समय लगता है और एक छोटा किसान इतने समय तक सीमित आय में गुजारा नहीं कर सकता। इसके लिए पूर्वी ने दूसरा तरीका निकाला।

उन्होंने किसानों से जैविक खेती को करने के लिए कहने के बजाय उपभोक्ताओं को जागरूक करना शुरू किया कि वे जैविक उत्पादों को खरीदें। अपने परिवार की सहायता से पूर्वी ने 50 से 60 परिवारों को इस बात के लिए मना लिया कि वे अब जैविक उत्पादों को पैदा करने वालों से सीधे सामान खरीदें और तीन साल तक उनकी इस काम में मदद करें, जब तक वे सीधे तौर पर जैविक खेती से मुनाफा कमाने के ज़ोन में नहीं आ जाते। जब किसानों को इस बात का भरोसा हो गया कि उनकी फसल की उन्हें नियमित तौर पर कीमत मिलेगी तो वे भी जैविक खेती करने के लिए तैयार हो गए।

युवाओं को किया प्रेरित

खेतों में काम करते हुए पूर्वी हमेशा सोचती थीं कि कैसे शहरी युवाओं को अच्छी और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। उन्होंने पंडित दीन दयाल उपाध्याय पेट्रोलियम विश्वविद्यालय के लिबरल आर्ट के छात्रों को अपने खेत में एक दिन के कार्यक्रम के लिए बुलाया। उन छात्रों को यह कार्यक्रम इतना पसंद आया कि उन्होंने मांग की कि इस तरह की खेतों की यात्रा को उनके पाठ्यक्रम का नियमित हिस्सा बनाया जाए।

इसके बाद पूर्वी गांधी नगर और अहमदाबाद के कई कॉलेजों में जाकर गेस्ट फैकल्टी के तौर पर पढाने लगीं। आज, पूर्वी मुनाफे की खेती के मॉडल पर 2,000 से अधिक किसानों के साथ पांच से छः गांवों को बदलने की दिशा में काम कर रही हैं। ये किसान खाद्य मेला और गैर सरकारी संगठनों की सहायता से सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ते हैं और अच्छा मुनाफा कमाते हैं।

एलोवेरा की खेती का पूरा गणित समझने के लिए फोटो पर क्लिक करें

एलोवेरा की खेती से किसान ने साल भर में कमाए करोड़ों रुपए… ऐलोवेरा की खेती मतलब कमाई पक्की। ऐसी ख़बरें अक्सर सोशल साइट्स और व्हॉट्सऐप ग्रुप पर वायरल होती रहती हैं। ऐसा नहीं है कि एलोवेरा से किसान कमाई नहीं कर रहे हैं लेकिन इस खेती के लिए कुछ जानकारियां होना जरूरी हैं, वर्ना फायदे की जगह नुकसान हो सकता है।

गांव कनेक्शन जब एलोवेरा से संबंधित कोई ख़बर प्रकाशित करता है सैकड़ों किसान फोन और मैसेज कर उस बारे में जानकारी मांगते हैं, क्योंकि लोगों तक सही जानकारी नहीं पहुंच पाती है। पिछले कुछ वर्षों में एलोवेरा के प्रोडक्ट की संख्या तेजी से बढ़ी है।

कॉस्मेटिक, ब्यूटी प्रोडक्ट्स से लेकर खाने-पीने के हर्बल प्रोडक्ट और अब तो टेक्सटाइल इंडस्ट्री में इसकी मांग बढ़ी है। मांग को देखते हुए किसान इस खेती के फायदे समझाने और इसकी प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए लखनऊ के सीमैप में पिछले दिनों देशभर के युवाओं को ट्रेनिंग दी गई। इनमें एलोवेरा की खेती करने वाले बड़े किसान, इंजीनियरिंग और प्रबंधन की डिग्री पाने वाले युवा भी शामिल थे।

केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) में ट्रेनिंग देने वाले प्रमुख वैज्ञानिक सुदीप टंडन ने गांव कनेक्शन को बताया, जिस तरह से एलोवेरा की मांग बढ़ती जा रही है ये किसानों के लिए बहुत फायदे का सौदा है। इसकी खेती कर और इसके प्रोडक्ट बनाकर दोनों तरह से अच्छी कमाई की जा सकती है। लेकिन इसके लिए थोड़ी सवाधानियां बरतनी होंगी। किसानों को चाहिए कि वो कंपनियों से कंट्रैक्ट कर खेती करें और कोशिश करें की पत्तियों की जगह इसका पल्प बेंचे।’

सुदीप टंडन ने न सिर्फ इसकी पूरी प्रक्रिया गांव कनेक्शन के साथ साझा की बल्कि ऐसे किसानों से भी मिलवाया जो इसकी खेती कर मुनाफा कमा रहे हैं। करीब 25 वर्षों से गुजरात के राजकोट में एलोवेरा और दूसरी औषधीय फसलों की खेती कर रहे हरसुख भाई पटेल (60 वर्ष ) बताते हैं, “एलोवेरा की एक एकड़ खेती से आसानी से 5- 7 लाख रुपए कमाए जा सकते हैं। वर्ष 2002 में गुजरात में इसकी बड़े पैमाने पर खेती हुई लेकिन खरीदार नहीं मिले। इसके बाद मैंने रिलायंस कंपनी सेकरार किया।

शुरू में उन्हें पत्तियां बेचीं लेकिन बाद में पल्प बेचने लगा। आजकल मेरा रामदेव की पतंजलि से करार है और रोजाना 5000 किलो पल्प का आर्डर है। इसलिए मैं दूसरी जगहों पर भी इसकी संभावनाएं तलाश रहा हूं। वो आगे बताते है , ‘किसान अगर थोड़ा जागरूक हो तो पत्तियों की जगह उसका पल्प निकालकर बेचें। पत्तियां जहां 5-7 रुपए प्रति किलो में बिकती है वहीं पल्प 20-30 रुपए में जाता है।

इंजीनियरिंग के बाद कई वर्षों तक आईटी क्षेत्र की बड़ी कंपनी में काम कर चुकीं बेंगलुरु की रहने वाली आंचल जिंदल एलोवेरा की प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए सीमैप में चार दिन की विशेष ट्रेनिंग करने आईं थीं, गांव कनेकशन से बात करते हुए वो बताती हैं, ऐलोवेरा जादुई पौधा है। इसके कारोबार में बहुत संभावनाएं हैं, क्योंकि आजकल हर चीज़ में इसका उपयोग हो रहा है। अब मैं यूपी के बरेली में शिफ्ट हो गई हूं और कोशिश कर रही हूं कि एलोवेरा का उद्योग लगाऊं।

आंचल की तरह ही महाराष्ट्र के विदर्भ के रहने वाले आदर्श पाल अंतरिक्ष विज्ञान में पढ़ाई कर चुके हैं लेकिन आजकल वो खेती में फायदे का सौदा देख रहे हैं। वो बताते हैं, पैर जमीन पर होने चाहिए, मेरे पास खेती नहीं है इसलिए किसानों के साथ कांट्रैक्ट फार्मिंग (समझौता पर खेत लेकर खेती) करता हूं। पंतजलि के प्रोडक्ट की लोकप्रियता के बाद संभावनाएं अब और बढ़ गई हैं।

(साभार-गांव कनेक्शन)